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फुटबॉल से जुड़ी ये 20 बातें कर देंगे आपको हैरान

एसोसिएशन फुटबॉल जिसे आमतौर पर सिर्फ फुटबॉल कहा जाता है, दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है. यह एक सामूहिक खेल है और इसे ग्यारह खिलाड़ियों के दो दलों के बीच खेला जाता हैं. यदि दुनिया में सबसे ज्यादा खेले जाने वाले और सबसे लोकप्रिय खेलों की बात की जाए तो यह फुटबॉल ही है.

तो आइए जानते है फुटबॉल से जुड़े कुछ रोचक फैक्ट्स…

1. फुटबॉल का खेल 476 B.C. के करीब चीन में शुरू हुआ था. वे इसे कुजू खेल कहते थें. ये दुनिया का सबसे ज्यादा खेला और देखा जाने वाला खेल है.

2. प्रोफेशनल फुटबॉल की शरुआत 31 अगस्त, 1895 को हुई थी. यह मैच लैटरोब (Latrobe) और जीन्नेट (Jeannette) के बीच खेली गई थी.

3. दुनियाभर की 80% से ज्यादा फुटबॉल सिर्फ पाकिस्तान में बनती हैं. यहां पर हैंडमेड फुटबॉल बनाई जाती हैं.

4. फुटबॉल के खेल को केवल अमेरिका और कनाडा में सॉकर कहा जाता है. जबकि दुनियाभर में इसे फुटबॉल कहते हैं.

5. साल 1950 के विश्वकप में भारतीय टीम को इस प्रतियोगिता से बाहर निकाल दिया गया था. वजह जान आप भी हैरान हो जाएंगे. खिलाड़ियों के पास जूते नहीं होने की वजह से उन्हें विश्वकप से निकाल दिया गया था.

6. सिंगल मैच में किसी एक खिलाड़ी द्वारा लगाए गए सबसे ज्यादा 16 गोल हैं. दिसंबर, 1942 में फ्रांस के स्टीफन स्टेनिस ने रेसिंग क्लब डी लेंस की तरफ से खेलते हुए ये कारनामा किया था.

7. फुटबॉल के खेल को केवल अमेरिका और कनाडा में सॉकर कहा जाता है. जबकि दुनियाभर में इसे फुटबॉल कहते हैं.

8. प्रोफेशनल फुटबॉल का साइज बीते 120 सालों से एक जैसा है. इसका साइज 28 इंच परिधि वाला और वजन करीब 450 ग्राम है.

9. 2 मई, 1964 को पेरू में मैच रेफरी के डिसीजन पर मैदान में दंगा हो गया था, जिसमें करीब 300 लोगों की मौत हो गई थी.

10. साल 1913 तक गोलकीपर अपनी टीम से अलग रंग के कपड़े नहीं पहनते थे.

11. चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान नील आर्मस्ट्रांग अपने साथ फुटबॉल लेकर जाना चाहते थे, लेकिन नासा ने इसकी अनुमति नहीं दी.

12. चिली के कार्लोस केजली ऐसे पहले फुटबॉल खिलाड़ी थे जिन्हें साल 1974 के विश्वकप में रेड कार्ड दिखाया गया था.

13. 10. साल 1998 में अफ्रीका में बिजली गिरने से एक टीम के 11 खिलाडियों की मौत हो गई थी, जबकि दूसरी टीम को कुछ नहीं हुआ.

14. फुटबॉल मैच का पहला लाइव कवरेज टेलीविजन पर साल 1937 में दिखाया गया. यह एक तरह का अभ्यास मैच था.

15. साल 1962 से 1996 तक यूरोपीय और दक्षिण अमेरिकी देशों ने विश्वकप का खिताब अपने नाम ही किए रखा.

16. फुटबॉल के इतिहास में सबसे जल्दी रेड कार्ड मिलने का रिकॉर्ड ली टोड के नाम है. उन्हें मैच शुरू होने के 2 सेकेंड का भीतर ही रेड कार्ड मिल गया था.

17. यूरोपियन टीम 1930 और 1950 साल को छोड़ कर हर बार फाइनल में पहुंची है.

18. पेले 17 साल की उम्र में फुटबॉल वर्ल्ड कप जीतने वाले सबसे छोटे प्लेयर हैं. वहीं डीने जौफ 40 साल की उम्र में फुटबॉल वर्ल्ड कप जीतने वाले सबसे उम्रदराज प्लेयर हैं.

19. विश्व युद्ध-2 के समय होने वाले बहुत से फुटबॉल मैच को ‘द डेथ मैच’ का नाम दिया गया था. इसे जर्मनी कंट्रोल करता था.

20. पहला बास्केटबॉल का खेल फुटबॉल से खेल गया था.

इस तरह डुप्लीकेट फाइल्स को ढूंढ कर, करें डिलीट

क्या आपके साथ भी कई बार ऐसा होता है कि अपनी फाइलों और फोल्डरों को सहेजने, बैक-अप लेने, दो कंप्यूटरों के बीच फाइलें लाते ले जाते या कई बार कम्प्यटर को फॉरमेट करने के चलते आपके सिस्टम में कब एक ही फाइल की बहुत सारी कॉपीज बन जाती हैं और आपको पता ही नहीं चलता. ऊपर से इनमें से कई बार कुछ बीच-बीच में खुद ही एडिट भी हो जाती हैं, और जबकि इनमें से कुछ कुछ वैसी ही पड़ी रहती हैं.

कम्प्यूटर में काम करते समय, एकाद बार जब एकदम सो आपको सही फाइल की जरूरत पड़ती है, तो आपको समझ ही नहीं आता है कि आप इनमें से कौन सी फाइल को इस्तेमाल में लें. ये फाइल या वो जिसका डुप्लीकेट हो गया है. इसके साथ ही ये समस्या भी होती है कि आप समझ नहीं पाते हैं कि कौन-सी फआइल नयी है, कौन-सी पुरानी, कौन-सी छोटी, कौन-सी बड़ी और कौन-सी सबसे ज्यादा अपडेटेड आदि.

तो हम आपको बताने जा रहे हैं कि इस समस्या का समाधान कर सकता है डुप्लीकेट फाइल सर्चर (Duplicate Files Searcher), जो आपके सिस्टम में डुप्लीकेट फाइल्स को ढूंढता है, फिर उनके बीच तुलना करता है और उन्हें खोलकर, आपको देखने का मौका देता है तथा इसके बाद आपको गैरजरूरी फाइलों को डिलीट करने की सुविधा भी देता है.

यहां हम आपको बता देना चाहते हैं ये सॉफ्टवेयर सब एक ही जगह से कर लेता है. एक बेहद जरुरी बात कि सिर्फ हर्ड ड्राइव (Hard Drive) ही क्यों, CD, पेन ड्राइव (Pen Drive), DVD आदि पर रखी सभी फाइलों को भी, यह दूसरी फाइलों के साथ कम्पेयर करके नतीजे दिखाता है. खास बात यह है कि अगर फाइलों के नाम अलग-अलग हों, मगर मैटर या कंटेंट एक समान हो तो ये सॉफ्टवेयर उसकी जानकारी भी दे सकता है.

तो इस सॉफ्टवेयर (Software) को डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें…

https://sourceforge.net/projects/dfr/files/Duplicate%20Files%20Searcher/2.2/src.zip/download

पुलिस की भूमिका पर मुखर हो रहे लोग

समाज में पुलिस की आलोचना करने से पहले लोग पीछे हटते थें. उनको लगता था कि पुलिस का विरोध करना उनको नाराज करने जैसा होता है. अब पुलिस की आलोचना होने लगी है. उसकी अपराध में भूमिका पर खुलकर चर्चा की जा रही है. इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि खुद पुलिस के रिटायर अफसर चाहते हैं कि ऐसी परिचर्चा हो जिससे पुलिस में सुधार आ सके.

लखनऊ में आभा जगत ट्रस्ट ने महिला अपराध और पुलिसकी भूमिका पर परिचर्चा का आयोजन किया तो समाज के हर वर्ग ने अपनी व्यथा सुनाई. इस परिचर्चा से सुधार के बिन्दू भी सामने आये. रिटायर पुलिस ऑफिसर सुव्रत त्रिपाठी ने अपने सुझाव में कहा कि अगर पुलिस अपनी जनरल डायरी जीडी मुकदमें की केस डायरी यानि सीडी और पीड़ित का धारा 164 का बयान समय पर सही से लिखें तो आधी परेशानी का अंत हो जायेगा.

परिचर्चा में कई समाजिक संगठनों से जुड़े वक्ताओं ने पुलिस के साथ अपने अनुभव शेयर किये जिससे यह पता चला कि पुलिस में जनता को लेकर कोई बदलाव सोच में नहीं हुआ है सत्ता के बदलने से किसी भी तरह का बदलाव नहीं होता है. यह बात भी सामने आई कि पुलिस तमाम मामलों में पीड़ित को ही फंसा देती है.

गांव में महिलाओं की क्या हालत है और वह पुलिस को कैसे देखती है. इस विषय पर मोहनलाल गल तहसील की ब्लॉक प्रमुख विजय लक्ष्मी ने अपनी बात रखी और कहा कि गांवो में अभी भी महिलाएं पुलिस के पास शिकायत लेकर जाने में डरती हैं. अधिवक्ता पवन उपाध्याय और अभिषेक चौहान ने कहा कि पुलिस मुकदमें की पैरवी सही से नहीं करती जिससे आरोपी छूट जाता हैं.

पावर विंग की सुमन रावत ने पुलिस के साथ अपने अनुभव बताते हुए कहा कि पुलिस को बहुत संवेदनशील होने की जरूरत है. मनोविज्ञानी डॉक्टर मधु पाठक ने अपनी बात में कहा कि पुलिस का भय शिकायत करने वालों में हट जाये. जिससे वह अपनी बात को सही तरह से कह सकें. आभा जगत ट्रस्ट की शिवा पांडये ने कहा कि ऐसे सेमिनार से लोगों में आपनी बात को बिना किसी डर के कहने की हिम्मत आती है. इस से पुलिस में भी सुधार होता दिखता है.

मुन्ना माइकल : समय व पैसे की बर्बादी

टीवी पर प्रसारित हो रहे नृत्य प्रधान रिएलिटी शो के हिमायती सब्बीर खान की सोच उन्हें ले डूबी. टाइगर श्रॉफ को अपना लक्की मानने वाले सब्बीर खान महज नृत्य व गानों के बल पर बिना ठोस पटकथा व कहानी के फिल्म ‘‘मुन्ना माइकल’’ बना डाली, जिसे देखना समय व पैसे की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है.

फिल्म की कहानी मुंबई के तीन बत्ती इलाके में रहने वाले नृत्य के शौकीन युवक मुन्ना (टाइगर श्रॉफ) की है, जो स्ट्रीट स्मार्ट होने के साथ-साथ माइकल जैक्सन का बहुत बड़ा फैन है. वास्तव में एक वरिष्ठ नृत्य कलाकार माइकल (रोनित राय) के बूढ़े हो जाने पर उन्हें काम मिलना बंद हो जाता है, तब वह शराब के नशे में अपने घर जाते हुए सड़क पर रो रहे बालक को उठाकर अपने घर ले जाते हैं, और मुन्ना नाम देकर पालते हैं. यह मुन्ना माइकल होटलों में जाकर लोगों के साथ नृत्य की शर्त लगाकर उन्हें हराकर जीतता रहता है. कई बार मारामारी भी कर लेता है. लोग उसे समझ जाते हैं, तब वह मुंबई से दिल्ली पहुंच जाता है.

दिल्ली में मुन्ना माइकल से नृत्य सीखने के लिए एक गैंगस्टर महेंद्र फौजी (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) आता है. महेंद्र फौजी बताता है कि वह एक लड़की डॉली (निधि अग्रवाल) के लिए नृत्य सीखना चाहता है. महेंद्र फौजी का अपना दिल्ली में बड़ा होटल है. महेंद्र फौजी एक दिन मुन्ना माइकल को डॉली को उपहार देने भेजता है. मुन्ना, डॉली से कह देता है कि वह तो महज कुरियर ब्वॉय है. महेंद्र फौजी, डॉली को अपने होटल में नौकरी और रहने के लिए फ्लैट दे देता है. एक दिन डॉली, मुन्ना के सामने अपना दिल खोलकर रख देती है कि वह मेरठ से मुंबई में टीवी का एक डांस रिएलिटी शो जीतना चाहती है. बात करते हुए मुन्ना माइकल, डॉली को अपना दिल दे बैठता है. इसी बीच एक दिन मुन्ना माइकल के सामने राज खुल जाता है कि महेंद्र फौजी शादीशुदा है. उसके बाद डॉली भागकर मुंबई आ जाती है. महेंद्र फौजी के कहने पर उसे ढूढ़ते हुए मुन्ना भी मुंबई पहुंच जाता है. फिर महेंद्र फौजी भी अपनी टीम के साथ पहुंचता है. उसके बाद कई बनावटी दृश्य आते हैं.

फिल्म की कहानी व पटकथा में दम नहीं है. इंटरवल के बाद फिल्म का कथानक ज्यादा कमजोर है. उन्होंने एक फॉर्मूला फिल्म बनायी है. यह फिल्म टीवी के रिएलिटी शो का घटिया संस्करण है. फिल्म में नृत्य, गाना, मारामारी यही हर दस मिनट में नजर आता है. गानों में कोई दम नही है. फिल्म में नृत्य, एक्शन और कॉमेडी, मनोरंजन सब कुछ स्तरहीन है. पूरी फिल्म अवास्तविक नजर आती है. निर्देशक के तौर पर सब्बीर खान पूरी तरह से मात खा गए हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो टाइगर श्रॉफ बहुत निराश करते हैं. यूं तो फिल्म के हर दृश्य में नवाजुद्दीन सिद्दिकी, टाइगर श्रॉफ पर भारी पड़ते हैं. मगर फिल्म ‘मुन्ना माइकल’ नवाजुद्दीन सिद्दिकी के करियर की सबसे कमजोर परफॉर्मेंस वाली फिल्म है. इसकी वजह यह है कि उन्हें पटकथा की मदद नहीं मिली. फिल्म में नवाजुद्दीन के किरदार का सही ढंग से चित्रण ही नहीं है. फिल्म के किरदार में नवाजुद्दीन फिट ही नहीं होते हैं. निधि अग्रवाल के करियर की पहली फिल्म है, पर वह अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाती हैं. वह लटके झटके व अंगप्रदर्शन ही करते हुए नजर आयी हैं.

दो घंटे 29 मिनट की अवधि की फिल्म ‘‘मुन्ना माइकल’’ का निर्माण ‘‘ईरोज इंटरनेशनल’’ और नेक्स्ट जनरेशन फिल्मस’’ ने किया है. फिल्म के लेखक अमल किंग, निर्देशक सब्बीर खान, कैमरामैन हरी के वेदांतम, संगीतकार मीत ब्रदर्स, तनिष्क बागची, प्रणय, विशाल मिश्रा, जावेद मोइसीन व गौरव रोशिन तथा कलाकार हैं टाइगर श्रॉफ, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, निधि अग्रवाल, सना सईद व अन्य.

सांसदों की ‘ठकुरसुहासी’

मीटिंग किसी की भी हो बौस के काम की तरीफ होती ही है. अपने दर्द को भी दूसरे तरह से कहना पड़ता है, जिससे बौस को बुरा न लगे. राजनीतिक मीटिंग में भी अब यह फामूर्ला हिट होता है. इस परिपाटी को ही हिन्दी मुहावरे में ‘ठकुरसुहासी’ के नाम से जाना जाता है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के कुछ सांसदों के साथ जब मींटिंग कर केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकार के कामकाज पर जानकारी चाही तो सांसदों ने केन्द्र की जीएसटी पालिसी की तारीफ की पर उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रियों की शिकायत की. कहा कि यह लोग जनता की सुनते नहीं. सासंदों ने उत्तर प्रदेश में मौरंग और बालू की कमी से होने वाली परेशानी का भी जिक्र किया. उत्तर प्रदेश के संदर्भ में बाद मे प्रधानमंत्री को बताया गया कि यहां मौरंग और बालू की कमी की वजह पिछली सरकार की नीतियां रही है.

उत्तर प्रदेश में आज के समय में किसी दुकानदार के पास चले जाये तो चर्चा का एक ही बिन्दू जीएसटी होता है. कारोबारी पूरी तरह से अनजान है कि वह जीएसटी का कैसे सामना करे. कई लोगों को यह पता ही नहीं है कि कैसे और कितना जीएसटी देना है. कारोबारी आपस में चर्चा कर इसको समझना चाहते हैं. इस वजह से ज्यादातर कारोबार बंद सा पड़ है कि जब जीएसटी समझ में आयेगा माल बेचेंगे. कई चालाक कारोबारी अपने मन से जीएसटी के नाम पर दाम बढ़ा कर वसूल रहे हैं. यह कारोबारी दाम बढ़ा कर तो वसूल रहे हैं, पर यह नहीं कहते कि इस वस्तु पर जीएसटी कम हुआ है तो यह सस्ता हो गया है.

देश में बड़ी संख्या में सामान्य दुकानदार हैं. यह पूरी तरह से जीएसटी को लेकर उहापोह में हैं. वह अपने मन से जीएसटी के नाम पर वसूली कर रहा है. जीएसटी को लेकर पूरा समाज उहापोह में है. ऐसे में यह कहना कि जीएसटी को लेकर सब कुछ सामान्य है उसे सांसदों की ‘ठकुरसुहासी’ माना जा सकता है. प्रधानमंत्री ने सांसदों से कहा कि वह जनता के बीच जाएं और वहां जीएसटी को लेकर सबको समझायें. मुख्य बात यह है कि खुद सांसदों को नहीं पता कि जीएसटी पर लोगों को क्या समझायें?

जीएसटी की मुश्किलों पर केन्द्र सरकार एक भी कदम पीछे खींचने को तैयार नहीं है. ऐसे में सांसदों ने जीएसटी को लेकर ऐसी कोई बात नहीं की जो सरकार पसंद न करे. उत्तर प्रदेश के संदर्भ में सांसदों ने बहुत अचछी बात कही कि यहां पर बालू और मौरंग को लेकर बड़ी परेशानी है. सरकार ने नदियों बालू और मौरंग के खनन के काम को बंद सा कर रखा है. जिससे इसके भाव तो बढ़ ही गये हैं, यह बाजार से बाहर हो गये हैं. जिससे लोगों का घर बनाना मुश्किल और मंहगा दोनों हो गया है. सांसदों की इस शिकायत को सपा सरकारी की खामी से जोड़ देने के बाद यह बात भी प्रभावी नहीं रह गई. सांसदों ने इस बात की तारीफ की कि प्रधानमंत्री ने उनकी बात को सुना और समझा.

इस खिलाड़ी के नाम है एक दिन में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड

मौजूदा समय में टेस्ट क्रिकेट क्रिकेट में काफी बदलाव आया हैं. अब टेस्ट में भी बल्लेबाज तेजी से खेलते हैं. बल्लेबाजों का स्ट्राइक रेट सुधरा है. आजकल कोई भी टीम 1 दिन में औसतन 275 से 300 रन बनाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक दिन में किसी एक बल्लेबाज द्वारा बनाया गया सर्वाधिक स्कोर क्या है?

क्रिकेट के शुरूआती दौर में भी ऐसे बल्लेबाज थे जिन्होंने एक दिन में दोहरा शतक बनाया. खासकर डॉन ब्रेडमैन तो एक दिन में 200 से ज्यादा रन बनाने के माहिर मानें जाते थें. उन्होंने अपने करियर में कुल 6 बार एक दिन में 200 से ज्यादा रन बनाया. तो आइए जानते हैं एक दिन में किसी बल्लेबाज द्वारा बनाया गया सर्वाधिक स्कोर क्या है?

डॉन ब्रेडमैन (309 रन)

ऑस्ट्रेलिया के महान बल्लेबाज डॉन ब्रेडमैन दुनिया के एकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में 300 से ज्यादा रन बनाने का कारनामा अंजाम दिया. यह कारनामा उन्होंने 1930 में इंग्लैंड के खिलाफ लीड्स टेस्ट के दौरान किया था. इस मैच में उन्होंने मैच के पहले ही दिन जबरदस्त बल्लेबाजी करते हुए 309 रन बना दिये. ब्रेडमैन की इस विस्फोटक बल्लेबाजी की बदौलत ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही दिन का खेल खत्म होने तक 3 विकेट खोकर 458 रन बना लिया था.

वॉली हेमंड (295 रन)

इंग्लैंड के महान बल्लेबाज वॉली हेमंड टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में दूसरे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज हैं. उन्होंने 1933 में न्यूजीलैंड के खिलाफ ऑकलैंड टेस्ट के दूसरे दिन 295 रन बना दिये थे. हेमंड पहले दिन 41 रन बनाकर नाबाद लौटे थे और दूसरे दिन जब वह आउट हुए तो उनका स्कोर 336 रन हो चुका था. हालांकि हेमंड की आक्रामक बल्लेबाजी भी मैच का नतीजा लाने में असफल रही और इंग्लैंड को यह मैच ड्रॉ से संतोष करना पड़ा.

वीरेन्द्र सहवाग (284 रन)

भारत के विस्फोटक सलामी बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग क्रिकेट में भी वनडे अंदाज में बल्लेबाज करने के लिए जानें जाते थे. सहवाग एकलौते ऐसे एशियाई बल्लेबाज हैं जिन्होंने 2 बार एक दिन में 250 से ज्यादा रन बनाने का कारनामा अंजाम दिया. सहवाग ने पहली बार यह कारनामा 2009 में अंजाम दिया. श्रीलंका के खिलाफ मुंबई टेस्ट में उन्होंने एक दिन में ही 284 रन ठोंक दिये थे. मैच के दूसरे दिन उनके बल्ले से 40 चौके और 7 हवाई छक्के निकले. सहवाग मैच के तीसरे दिन 293 रन बनाकर आउट हुए.

डेनिस कांपटन (273 रन)

इंग्लैंड के डेनिस कांपटन ने पाकिस्तान के खिलाफ 1954 में नॉटिंघम टेस्ट के दौरान एक दिन में 273 रन बना दिये थे. कांपटन मैच के पहले दिन 5 रन पर नाबाद थे, लेकिन दूसरे दिन उन्होंने पाकिस्तानी गेंदबाजों की खबर लेते हुए 273 रन और जोड़ दिये. कांपटन जब आउट हुए तो वह 278 रन बना चुके थे.

देखें कैसे हरमनप्रीत ने छुड़ाए कंगारुओं के छक्के

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्व कप सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया को 36 रनों से हराकर फाइनल में जगह बना ली है. अब फाइनल में भारतीय टीम का मुकाबला इंग्लैंड से होगा, जो साउथ अफ्रीका को हराकर पहले ही फाइनल में पहुंच चुकी है. हरमनप्रीत कौर की धमाकेदार (171*) पारी की बदौलत भारतीय टीम ने 42 ओवर में 281 रन बनाए. ऑस्ट्रेलिया को जीतने के लिए 282 रन बनाने थे लेकिन टीम 245 रनों पर ही सिमट गई.

भारतीय खिलाड़ी हरमनप्रीत कौर ने अपने वनडे करियर की सर्वश्रेष्ठ पारी खेलते हुए 171 रन बनाए. हरमनप्रीत ने 171 रनों की नाबाद पारी खेलकर इतिहास रच दिया. इस पारी में उन्होंने 7 छक्के और 20 चौके जमाए. वह अंत तक आउट नहीं हुईं.

हरमनप्रीत कौर ने इस मुकाबले में कई रिकॉर्ड तोड़े. बेहद दबाव भरी स्थिति में बल्लेबाजी करने आईं कौर ने ऑस्ट्रेलिया के हर गेंदबाज के खिलाफ आक्रामक बल्लेबाजी की और सेमीफाइनल मुकाबले में शतक लगाकर इतिहास के सुनहरे पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया.

महिला वर्ल्ड कप में भारत की तरफ से सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर

हरमनप्रीत कौर ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 171 रन बनाए जो आईसीसी महिला वर्ल्ड कप में भारत की तरफ से एक पारी में किसी भी भारतीय बल्लेबाज का सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर है. कौर से पहले ये रिकॉर्ड टीम इंडिया की कप्तान मिताली राज के नाम था. मिताली ने इसी वर्ल्ड कप में न्यूजीलैंड के खिलाफ 109 रनों की पारी खेली थीं. लेकिन कौर ने मिताली के उस रिकॉर्ड को तोड़कर अपने नाम कर लिया.

भारतीय पुरुष टीम को मात देते हुए बनाया ये रिकॉर्ड

हरमनप्रीत कौर वर्ल्ड कप के नॉकआउट में भारत की तरफ से 150 से ज्यादा रन बनाने वाली पहली खिलाड़ी हैं. आज तक भारत की पुरुष टीम का भी कोई खिलाड़ी इस कारनामे को अंजाम नहीं दे सका है. भारतीय पुरुष टीम के दिग्गज बल्लेबाजों में शुमार सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली भी आज तक ये कारनामा नहीं कर पाए. भारतीय पुरुष और महिला टीम अगर दोनों की बात करें तो कौर इस उपलब्धि को हासिल करने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी हैं. कौर के अलावा दुनिया के सिर्फ 6 खिलाड़ी ही आईसीसी नॉक आउट में 150 या इससे बड़ी पारी खेल सके हैं.

महिला वर्ल्ड कप का चौथा बड़ा व्यक्तिगत स्कोर

हरमनप्रीत द्वारा खेली गई 171 रनों की पारी महिला वर्ल्ड कप के इतिहास में किसी भी बल्लेबाज द्वारा खेली गई चौथी सबसे बड़ी पारी है. वर्ल्ड कप में सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर का रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया की बेलिंडा क्लार्क के नाम है, जिन्होंने 1997 के महिला वर्ल्ड कप में डेनमार्क के खिलाफ 229 रनों की पारी खेली थी.

वर्ल्ड कप नॉकआउट में शतक लगाने वाली दुनिया की दूसरी बल्लेबाज

हरमनप्रीत कौर ने जैसे ही ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल मुकाबले में शतक लगाया वैसे ही वो आईसीसी वर्ल्ड कप के किसी भी नॉक आउट में शतक लगाने वाली दुनिया की दूसरी खिलाड़ी बन गईं. कौर से पहले ऑस्ट्रेलिया की कैरन रॉल्टन ने ही इस कारनामे को अंजाम दिया था. कैरन रॉल्टन ने साल 2005 के वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले में भारत के खिलाफ नाबाद 107 रनों की पारी खेली थी. रॉल्टन के अलावा कोई भी बल्लेबाज आईसीसी वर्ल्ड कप के नॉक आउट में शतक नहीं जड़ सका था. लेकिन कौर ऐसा करने वाली दुनिया की दूसरी बल्लेबाज बन गईं.

महिला रिपोर्टर के ड्रेस कोड पर विवाद

महिलाओं के पहनावे को ले कर भारत में ही नहीं, अमेरिका जैसे आधुनिक देश में भी दकियानूसी सोच हावी है. अरब देशों की तो बात ही क्या. दिल्ली में जिस वक्त अभिजात्य कहे जाने वाले गोल्फ क्लब में असम की तैलिन लिंगदोह नामक महिला को अपनी पारंपरिक वेशभूषा में होने के कारण बाहर निकाला जा रहा था, लगभग उसी समय अमेरिकी सीनेट हाउस चैंबर से एक रिपोर्टर को सिर्फ इसलिए हटा दिया गया क्योंकि उस ने स्लीवलेस कपड़े पहन रखे थे. इस से बाद वहां ड्रेस कोड पर विवाद छिड़ गया.

घटना की शुरुआत महिला पत्रकार हैली बियर्ड को चैंबर से बाहर निकाले जाने से हुई. सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी की सांसद मार्था मैकसेली ने हैली के पक्ष में बयान दे कर बहस को और बढ़ा दिया. महिला सांसद एकजुट हो गईं और 30 से अधिक महिला सांसदों ने ड्रेस कोड के विरोध में स्लीवलेस ड्रेस पहन कर प्रदर्शन किया.

इन महिला सांसदों ने स्पीकर से कहा कि ड्रेस कोड के पुराने नियम अब बदलने होंगे और हमें ‘खुले बाजू के अधिकार’ चाहिए. इन सांसदों ने खुले बाजू के अधिकार के लिए स्पीकर की लौबी में प्रदर्शन किया, जहां पर रिपोर्टर किसी सांसद या मंत्री का इंटरव्यू लेते हैं. डेमोक्रेटिक सांसद लिंडा सांचेज ने कहा कि ये नियम पुरातन काल के हैं. अगर हम परंपरा का पालन करते तो फ्लोर पर महिला शौचालय भी नहीं होता. कांग्रेस सदस्य चिली पिंग्री ने कहा कि यह 2017 है. अब महिलाएं वोट डाल रही हैं. कार्यालय चला रही हैं. अपने तरीके से रह रही हैं. अब वक्त आ गया है कि सदन के नियम बदले जाएं.

इस पर स्पीकर पौल रेयान ने कहा कि ड्रेस सेंस तो होना चाहिए पर हम ये भी नहीं चाहते कि किसी व्यक्ति को ड्रेस कोड के कारण रोका जाए. हम यह ड्रेस कोड अपडेट करने जा रहे हैं. हाउस चैंबर के ड्रेस कोड के अनुसार यहां महिला सांसदों और रिपोर्टरों को ढकी बाजू वाले और पुरुषों के लिए जैकेट व टाई पहनना जरूरी है.

दुनिया भर में सब से ज्यादा बंदिशों की शिकार महिलाएं हैं. उन पर तरह तरह के बंधन लाधे गए हैं. ये बंधन धर्म की देन हैं. उसे सदियों ने जानबूझ कर बांध कर रखा ताकि वह पुरुषों की गुलाम बनी रहे. अब जब महिलाएं पढ़ लिख रही हैं, घर से बाहर कदम रखा है तो उन में विरोध की ताकत आ रही है. सरकारें, समाज उन की शक्ति को पहचान रहा है फिर भी जिस धर्म ने महिलाओं को जकड़न में रखा, वह उसी की पिछलग्गू बनी हुई हैं. महिलाएं पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही है तो वह अपनी मेहनत, काबिलियत की वजह से.

महिलाओं को बराबरी पर आने के लिए अभी बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ेगी. संघर्ष से ही आज सानिया मिर्जा, मिताली राज, गीता, बबीता फोगाट की जीत का डंका बज रहा है.

मैं 19 साल का हूं. मैं ने 26 साल की अपनी मौसेरी बहन के साथ हमबिस्तरी की है. अब वह मुझ से प्यार करने लगी है. मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 19 साल का हूं. मैं ने 26 साल की अपनी मौसेरी बहन के साथ हमबिस्तरी की है. अब वह मुझ से प्यार करने लगी है. मैं क्या करूं?

जवाब

मौसी की लड़की के साथ हमबिस्तरी कर के आप ने अच्छा नहीं किया है. घर वालों को पता चलेगा तो आप की फजीहत होगी. आइंदा आप यह गलती न करें.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

एक साथ 275 फिल्में ठुकराईं : नवाजुद्दीन सिद्दिकी

‘‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’’, ‘‘द लंच बाक्स’’, ‘‘बदलापुर’, ‘‘बजरंगी भाईजान’’, ‘‘मांझी द मांउटेनमैन’’ और ‘‘रईस’’ कुछ ऐसी फिल्मे हैं, जिनमें नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपने अभिनय के नए नए रंग दिखाएं हैं. कुछ समय पहले प्रदर्शित फिल्म ‘मॉम’ में उनका बहुत अलग रूप नजर आया. अब आज, 21 जुलाई को उनकी टाइगर श्रॉफ के साथ फिल्म ‘‘मुन्ना माइकल’’ प्रदर्शित हुई है. जबकि ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ और ‘मंटों’ में वह अपने अभिनय के कुछ दूसरे रंग दिखाते हुए नजर आएंगे.

14 साल के संघर्ष के बाद जब सफलता मिली तो आप एक साथ काफी फिल्में करने की बजाय बहुत चुनिंदा फिल्में कर रहे हैं?

‘गैंग्सऑफ वासेपुर’ के प्रदर्शित होते ही मेरे पास 275 फिल्मों की पटकथाएं आयीं थी पर मैंने नहीं की. इनमें से करीबन सौ निर्माताओं ने अपनी फिल्म से जुड़ने के लिए मेरे सामने ब्लैंक चेक यानी कि चेक पर बिना राशि लिखे देकर गए थें, पर मैंने हड़बड़ी नहीं की. उनकी मांग होती थी कि मैं अपनी मर्जी की राशि चेक में भर लूं और उन्हें फिल्म की शूटिंग के लिए तारीखें दे दूं. पर मैंने उस वक्त भी धड़ाधड़ फिल्में साइन कर चेक बैंक में जमा नहीं कराए. उस वक्त मुझे लगा कि अब सही मायने में मेरा इम्तिहान है. यदि उस वक्त मैंने धड़ाधड़ फिल्में साइन की होती, तो अब तक मेरा करियर खत्म हो चुका होता और आज हम दोंनो इस तरह बैठकर सिनेमा पर बात न कर रहे होते. उस वक्त सारी पटकथाएं ‘गैंग्सऑफ वासेपुर’ के इम्पैक्ट में आ रही थीं. मैंने छह माह तक चुप रहना उचित समझा. मैंने सोचा कि यह जो गर्द उड़ी है, उसे ठंडा हो जाने दूं. फिर सोच समझकर फिल्में चुनूंगा. सर जी यहां करियर बनाने में वर्ष लग जाते हैं और एक गलत फिल्म पूरे करियर को चौपट कर देती है.

लीड किरदार मिलने पर आपका कलाकार मन क्या कहता है?

मैं तो यही सोचता हूं कि फिल्म सफल हो जाए. मसलन, केतन मेहता की फिल्म ‘मांझी द माउंनटेनमैन’ दो तीन करोड़ के बजट की फिल्म थी. तीन करोड़ प्रचार पर खर्च किए थे. फिर उस फिल्म ने 18 करोड़ कमा लिए. और वह भी तब जब फिल्म के रिलीज से तीन सप्ताह पहले ही लीक हो गयी थी. आज जब मैं लोगों से मिलता हूं, तो पता चलता है कि लोगों ने जितना ‘बजरंगी भाईजान’ देखा है, उतना ही ‘मांझी द माउंनटेनमैन’ को भी देखा है. भले ही इस फिल्म को थिएटर की बजाय टैब पर ही क्यों न देखा हो. फिल्म की यह सफलता ही है.

फिल्म ‘‘मुन्ना माइकल’’ को लेकर क्या कहेंगे?

एक अलग तरह की फिल्म है. इसमें इस बात को रेखांकित किया गया है कि हर इंसान के अंदर अलग अलग प्रतिभा होती है. उसे उसकी प्रतिभा के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए. इस फिल्म में टाइगर श्रॉफ के साथ नृत्य करना मेरे लिए काफी कठिन रहा. मुझे नृत्य नहीं आता, मगर सेट पर टाइगर श्रॉफ ने मुझे सिखाया. मेरे लिए नृत्य करना काफी कठिन है. लेकिन किरदार की मांग को पूरा करना था, इसलिए मैंने नृत्य किया.

किस किरदार ने आपकी निजी जिंदगी पर असर किया?

मेरी जिंदगी पर कई किरदारों ने असर किया. मसलन ‘रमन राघव’ का किरदार. रमन राघव का किरदार निभाने से मुझ पर काफी असर पड़ा क्योंकि जिस थ्योरी पर वह यकीन करता है, उस थ्योरी पर मैं यकीन नहीं करता. जबकि उसके हिसाब से थ्योरी सही थी. जबकि उसमें सब बुराइयां हैं पर कुछ अच्छाई भी है. वह बोलता है कि, ‘मैं इंसान को खाते पीते मारता हूं. मैं तुम लोगों की तरह नही हूं. तुम लोग किसी इंसान को इंसानियत या धर्म का सहारा लेकर मारते हो.’ तो उसकी अपनी एक फिलॉसफी है.

इसी तरह फिल्म ‘मंटो’ में मंटो का किरदार निभाने से मेरे निजी जीवन में बदलाव आया. आज तक मैंने सआदत हसन मंटो जैसा रूथली सच्चा इंसान नहीं देखा. जब मैं इस किरदार को निभा रहा था, तो कहीं न कहीं वह मुझे इस बात का एहसास करा रहा था कि मैं झूठ बोल रहा हूं. जब तक मैं इस किरदार को निभाता रहा, तब तक यह किरदार हर दिन मुझसे लड़ता रहा कि मैं तो कभी झूठ नहीं बोलता, तुम लोग हमेशा झूठ बोलते हो. मंटो कहता था कि मैं जो देखता था, समझता था, वही सच लिखा. मैं आप लोगों की तरह फ्रॉड का जामा पहनकर समाज में नहीं घूमा. वह कहता है, ‘यदि आप में हिम्मत है, तो सच बोलकर समाज में जी कर दिखाएं.’ तो वही फिल्म ‘‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’’ के किरदार ने मुझे मेरे अंदर के स्याह पक्ष को तलाशने पर मजबूर किया.

फिल्म ‘‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’’ क्या है?

यह अजीब टेढ़ी मेढ़ी फिल्म है. मुझे नहीं पता, इसे कितने लोग पसंद करेंगे क्योंकि हमें सीधी सादी, देशभक्ति या उसूलों वाली, जीवन मूल्यों की बात करने वाली फिल्में देखने की आदत है. लेकिन यह फिल्म तो सभी सीमाएं तोड़ती है. यह पूरी तरह से यथार्थपरक, देसी और बेशरम फिल्म है. हम सभी इससे बचने का प्रयास करते हैं. पर हकीकत में हम सभी पाखंडी हैं, जो यह कहते हैं कि हम ऐसे लोगों को पसंद नही करते. जबकि अकेले में लोग वह सब देखना पसंद करते हैं, जो कुछ बाबूमोशाय करता है. सिर्फ समाज के सामने ‘‘शरीफ’’ बने रहते हैं. मैं तो यही कहूंगा कि यह बहुत ही बेशरम फिल्म है.

इसमें मैंने एक ऐसा किरदार निभाया है, जिसकी अपनी कोई फिलॉसफी न हो, जिसका कोई दीन ईमान न हो. वैसे ऐसे इंसान होते हैं. क्या हमारे इर्द गिर्द दारूबाज, रंडीबाज इंसान नहीं है. ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें देखकर हम घिन करते हैं. पर कुशान नंदी ने अपनी फिल्म में ऐसे किरदार को हीरो बनाया.

क्या सआदत हसन मंटो जैसे इंसान इस दुनिया में हो सकते हैं या उस तरह से जिया जा सकता है?

बहुत मुश्किल होता है. पर मंटो ने तो जिया था.

आपने श्रीदेवी के साथ फिल्म ‘‘मॉम’’ की थी. श्रीदेवी से कभी सिनेमा को लेकर कोई बातचीत हुई?

थोड़ी बहुत हुई. मैंने उनसे पूछा था कि आप अभी भी बहुत चुनिंदा फिल्में करती हैं. ‘इंग्लिश विंग्लिश’ की सफलता के बाद आप ‘मॉम’ कर रही हैं. तब उन्होंने साफ साफ कहा कि वह सिर्फ फिल्में करते जाने का क्या फायदा. फिल्म तभी करनी चाहिए, जब कहानी पढ़कर दिल कहे कि हमें यह फिल्म जरुर करनी चाहिए. ‘इंग्लिश विंग्लिश’ हिट होने पर धड़ाधड़ फिल्में नहीं की. उनकी चयन भी बहुत कमाल का है.

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