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अब 65 वर्ष तक के व्यक्ति खोल सकेंगे एनपीएस खाता

पीएफआरडीए के अध्यक्ष हेमंत कांट्रेक्टर ने एक कार्यक्रम के दौरान बताया कि अब राष्ट्रीय पेंशन योजना एनपीएस में 65 साल तक के व्यक्ति खाता खुलवा सकेंगे. इस बारे में पीएफआरडीए बोर्ड ने फैसला ले लिया है और जल्द ही इस बारे में अधिसूचना जारी कर दी जाएगी. एनपीएस से जुड़ने की आयु सीमा को बढ़ाकर 65 वर्ष करने का निर्णय हो गया है. अभी तक 60 वर्ष तक की उम्र के व्यक्ति ही इससे जुड़ सकते थे.

पेंशन क्षेत्र के नियामक पेंशन कोष विनियामक और विकास प्राधिकरण पीएफआरडीए ने सोमवार को इसकी घोषणा करते हुए कहा कि सरकार का उद्देश्य पेंशन क्षेत्र में सुधार कर पोर्टेबिलिटी को बढ़ाना या एनपीएस में वृद्धावस्था फंड को स्थांतरित कर इसे ज्यादा आकर्षक और ग्राहकों के लिए आसान बनाना है. यदि ऐसा नहीं होगा तो देश की अधिकतर आबादी को पेंशन का कवरेज उपलब्ध नहीं कराया जा सकेगा. उन्होने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य ऐसे सेक्टर के लिए पेंशन योजना शुरू करना है जहां यह उपलब्ध नहीं है.

इस समय देश में सिर्फ 15 से 16 फीसदी कामगारों को ही पेंशन का लाभ मिल रहा है. ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत में लगभग 85 फीसदी कामगार असंगठित और अनियमित क्षेत्रों में काम करते हैं.

एनपीएस के फायदे के बारे में बताते हुए पीएफआरडीए के अध्यक्ष ने कहा कि यह आज विश्व की सबसे कम लागत की पेंशन योजना है. लागत बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि लगातार 25 से 30 वर्षो तक एक प्रतिशत के भी फर्क से कम से कम 15 से 16 प्रतिशत का फर्क पैदा हो सकता है. एनपीएस का फंड प्रबंधन खर्च सबसे कम 0.01 फीसदी है.

जेम्स फौकनर इस सीरीज से टीम में करेंगे दमदार वापसी

भारत और आस्ट्रेलिया के बीच 17 सितंबर से शुरु हो रही सीरीज में पांच वनडे मैचों के बाद तीन टी-20 मैच भी खेले जायेंगे. इस सीरीज से चैम्पियंस ट्राफी में न खेल पाने वाले आस्ट्रेलियाई आलराउंडर फाकनर टीम में दमदार वापसी करेंगे. बायें हाथ के तेज गेंदबाज और दायें हाथ से बल्लेबाजी करने वाले फाकनर भारत के खिलाफ शानदार प्रदर्शन कर टीम में अपनी जगह पक्की करना चाहते हैं.

उन्होने कहा कि टीम से बाहर होना मेरे लिये काफी मुश्किल था, लेकिन इससे मुझे खुद को आंकने का मौका मिला है. अगर आप टीम से बाहर होते हैं तो वह काफी मुश्किल होता है. मैं चार महीने खेल से दूर रहा और खुद को मजबूत और फिट बनाने के लिये मैंने सत्र से पहले कुछ अभ्यास किया जो अच्छा रहा. ईमानदारी से कहूं तो पिछले 18 महीने से मैं संघर्ष कर रहा था. टीम में वापसी करना काफी मुश्किल था. मुझे लगता है अगर आप किसी भी खिलाड़ी से पूछेंगे कि टीम से बाहर होकर कैसा लग रहा तो वह बुरा ही कहेगा. टीम में वापसी करना खिलाड़ी पर ही निर्भर करता है. मैं वापसी से खुश हूं. बीते समय के बारे में ज्यादा सोचना नहीं चाहता. यह अच्छा अवसर है कि हम एक मजबूत टीम के खिलाफ उनके घर में खेल रहे है.

भारत के खिलाफ कई मैच जिताने वाले और वनडे वर्ल्डकप 2015 के फाइनल में ‘मैन आफ द मैच’ रहे फाकनर ने कहा, सीरीज से पहले हम अभ्यास मैच की तैयारी कर रहे हैं. हमारा लक्ष्य सीरीज में अच्छा करना है. चेन्नई में काफी गर्मी है और बहुत पसीना आ रहा इसलिए हमारे लिये परिस्थितियां बेहद मुश्किल हैं, पर यह अच्छी सीरीज होने वाली है क्योंकि टीम के खिलाड़ियों में अच्छा खेलने की ललक है. पिछली बार जब हम यहां आये थे तो हमने कठिन लेकिन अच्छा क्रिकेट खेला था, इसलिये हम काफी उत्सुक हैं.

जेम्स फाकनर का मानना है कि भारत में खेले जाने वाले आईपीएल और टी-20 वर्ल्डकप के अनुभव से वनडे सीरीज में उनकी टीम को फायदा मिलेगा. एम.ए. चिदंबरम स्टेडियम में टीम के प्रशिक्षण सत्र के बाद फाकनर ने कहा, हाल के दिनों में भारत ने बहुत सारे वनडे मैच खेले हैं. वे फार्म में है. यह हमारे लिये अच्छी परीक्षा होगी. भारतीय टीम को हराने के लिये आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को अपना जज्बा दिखाना होगा.

हौलीवुड फिल्म की नकल है वरुण और बनिता की फिल्म ‘अक्टूबर’

भेड़चाल व नकल करने के लिए मशहूर बौलीवुड इन दिनों हालीवुड फिल्मों की नकल करके फिल्में बनाने पर आमादा है. अब तक बौलीवुड की कई फिल्मों पर हालीवुड फिल्मों की नकल होने के आरोप लग चुके हैं. अब खबर है कि शुजीत सरकार भी एक हालीवुड फिल्म ‘हर’ को हिंदी में ‘अक्टूबर’ नाम से बना रहे हैं. जिसमें वरुण धवन के साथ नई अदाकारा बनिता संधू अभिनय कर रही हैं. यूं तो शुजीत सरकार अपनी फिल्म ‘अक्टूबर’ को एक प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, पर वास्तव में यह फिल्म एक साइंस फिक्शन फिल्म है.

वास्तव में हालीवुड कलाकार जाकिन फोनिक्स के अभिनय से सजी साइंस फिक्शन के साथ ही प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘हर’ 2013 में प्रदर्शित हुई थी. इस फिल्म की कहानी के अनुसार फिल्म का नायक इंटेलीजेंट कम्प्यूटर सिस्टम पर काम करता है. सिस्टम से एक महिला की आवाज आती है, जो कि महज एक प्रोग्रामिंग है. मगर फिल्म का नायक इस आवाज को सच मानकर उससे प्रेम करने लगता है.

जी हां! फिल्म ‘हर’ की यही कहानी फिल्म ‘अक्टूबर’ की भी है. फिल्म ‘अक्टूबर’ में वरुण धवन कम्प्यूटर पर काम करने वाले इंसान हैं, जो कि सिस्टम से आने वाली बंदिता संधू की आवाज को सच मानकर उससे प्यार करने लगते हैं. इसी वजह से इस फिल्म में किसी नामचीन अभिनेत्री की बजाय नवोदित अदाकारा बंदिता संधू को जोड़ा गया है. अब देखना है कि नकल करते हुए शुजीत सरकार अपनी फिल्म ‘अक्टूबर’ को कितना बेहतरीन बना पाते हैं.

सरकार और बाजार की यारी है सदी का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार

2014 के आम चुनाव और उसके परिणाम को हमने कौरपोरेट जगत के द्वारा सत्ता के अपहरण के नजरिये से ही देखा है. हम यह मानते रहे हैं कि यह वैधानिक तख्तापलट है, जिसमें वौलस्ट्रीट की निजी कंपनियां, बैंक और देशी कौरपोरेट ने भाजपा को अपना जरिया बनाया. मोदी कौरपोरेट की सूरत हैं और मोदी सरकार कौरपोरेट की सरकार है. जिसके लिये माहौल बनाया गया और आज भी माहौल बनाया जा रहा है. जन समर्थन को ‘चुनावी मार्केटिंग’ से हासिल किया गया है और आने वाला कल इससे अलग नहीं होगा. आम जनता के हाथों से अपने देश की सरकार बनाने का हक, चुनावी पद्धति से छीन लिया गया है. ‘पूंजीवादी लोकतंत्र’ में जनसमर्थक सरकार संभव नहीं. यह राजसत्ता की बाजार से साझेदारी है.

‘एसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स‘ ने 17 अगस्त 2017 को कौरपोरेट के द्वारा राजनीतिक दलों को दिये गये चंदे के बारे में एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 4 सालों में कौरपोरेट घरानों ने भाजपा और कांग्रेस सहित 5 राजनीतिक दलों को 956.77 करोड़ रूपये का चंदा दिया है. 2012-13 से 2015-16 में सबसे ज्यादा कौरपोरेट वित्तीय सहयोग भाजपा को मिला है. 2,987 दाताओं ने 705.81 करोड़ रूपये भाजपा को और कांग्रेस को 167 दानदाताओं ने 198.16 करोड़ रूपये दिये हैं. जिस साल 2014 में चुनाव हुआ कॉरपोरेट चंदा उस साल 60 प्रतिशत मिला. 2004-05 से 2011-12 की अवधि में यह राशि 378.89 थी, जो 4 साल में 956.77 करोड़ हो गयी.

भाजपा, कांग्रेस और उनके सहयोगी कौरपोरेट ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश की अवहेलना की है, जिसके तहत 20 हजार से ऊपर के चंदे के लिये पैन और पते की अनिवार्यता है. 956.77 करोड़ के चंदे में से 729 करोड़ रूपये का कौरपोरेट चंदा ऐसा है, जिसमें पैन और पते नहीं हैं, इस तरह के 99 प्रतिशत चंदा भाजपा को मिला है.

यह रिपोर्ट अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि मौजूदा सरकार किसकी सरकार है? इस रिपोर्ट से इस बात को समझा जा सकता है, कि मोदी सरकार किसके लिये काम कर रही है और एवज में भाजपा के लिये चंदे की वसूली कैसे की जा रही है? यह खुलासा राजनीतिक भ्रष्टाचार का एक हिस्सा है. जिसमें ‘ले’ और ‘दे’ के अलावा और कुछ नहीं. न देश, न समाज, न आदर्श और ना ही देश की आम जनता, जिसे भरम है कि वह सरकार बनाती है.

नीति आयोग के ‘चैम्पियन्स ऑफ चेंज’ कार्यक्रम में मोदी जी कहते हैं- ‘‘दलाली में नाकाम लोग ही रोजगार का शोर मचा रहे हैं.’’ फिर, जो शोर नहीं मचा रहे हैं, उन्हें हम क्या सफल दलाल समझें? करोड़ों लोगों को काम देने का दावा तो, अब तक झूठा ही प्रमाणित हुआ है. सरकार काम देने की जिम्मेदारी उन निजी कम्पनियों को सौंप कर निश्चिंत होना चाहती है, जिन्होंने भारत के आईटी सेक्टर को भी संकट में डाल दिया है, जिनकी नीति मुनाफा बढ़ाने के लिये आदमी के बिना काम चलाने की मानव श्रम शक्ति को सस्ते में, मशीन, टेक्नोलॉजी और अब ऑटोमेशन उनकी नीति है.

कांग्रेस-यूपीए की मनमोहन सरकार भ्रष्टाचार के आग में जली. मोदी 2014 के चुनवी प्रचार में भ्रष्टाचार के खिलाफ हमलावर रहे. लोगों ने यकीन किया कि वो भ्रष्टाचार मिटा देंगे, यह जाने बिना कि निजी कम्पनियों के रहते भ्रष्टाचार का अंत संभव नहीं, क्योंकि अर्थव्यवस्था में इनकी हिस्सेदारी ही भ्रष्टाचार का आधार है. कालाधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में नोटबंदी और विपक्ष के यहां छापों का आईटम सांग भी है. यह घोषणा भी है, कि भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो गया. यह दावा भी है, कि ‘‘मेरी सरकार पर कोई उंगली नहीं उठा सकता.‘‘ मगर सच वही ढाक के तीन पात हैं.

जरा आप बतायेंगे शाह साहब कि 4 साल में राजनीतिक चंदा तीन गुणा कैसे हो गया? यह वही समय है न, जब आम चुनाव होना था, मोदी को प्रायोजित किया जा रहा था, और भाजपा की सरकार बनी. मोदी की सरकार चल रही है. जो भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रही है. यह वही समय है न जब आप गंगा नहा रहे हैं, तमाम आरोपों से मुक्त होते जा रहे हैं, और विपक्ष को गड़ही में डुबा रहे हैं? यह वही समय है, न जब कौरपोरेट के हित में देश की अर्थव्यवस्था का निजीकरण हो रहा है? देश और आम जनता के हितों पर ताले लगाये जा रहे हैं? चुनावों में भाजपा की जीत हो रही है, पैसा पानी की तरह बह रहा है? यह पैसा कहां से आ रहा है?

जो खुलासा है, वह तो हमारे सामने है, मगर सच उसके पीछे है, कि यह पैसा हमारी जेब से जा रहा है. हमारी पेट से जा रहा है, एक के बदले चार जा रहा है. इतना जा रहा है कि कल को हमारे पास न जेब होगी, न देश होगा, सरकार तो हमारे हाथों से निकल ही चुकी है. अभी सपने और बकवास हैं. जो दिख रहा है, वह मुखड़ा है. सरकार और बाजार की यारी इस सदी का सबसे बड़ा आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रष्टाचार है, जिसके खैरख्वाह मोदी हैं, मोदी सरकार है. कोई भी राजनीतिक दल अलग नहीं है.

प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने को तैयार हैं राहुल गांधी

कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने पहली बार पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद की उम्‍मीदवार बनने की बात कही है. अमेरिकी दौरे के दौरान यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस में वास्‍तविक लोकतंत्र है. यदि पार्टी चाहेगी तो वह प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार बनने को भी तैयार हैं.

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि हिंसा से किसी का भला नहीं हो सकता. हिंसा में मैंने अपनी दादी (इंदिरा गांधी) और पिता (राजीव गांधी) को खोया. मुझसे बेहतर हिंसा को कौन समझेगा. उन्होंने कहा, ‘जिन लोगों ने मेरी दादी को गोली मारी, मैं उन लोगों के साथ बैडमिंटन खेलता था. मुझे पता है कि हिंसा से क्या नुकसान हो सकता है. जब आप अपने लोगों को खोते हैं, तो आपको गहरी चोट लगती है.’

राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुझसे अच्‍छे वक्‍ता हैं. उन्‍होंने कहा कि मैं विपक्ष का नेता हूं लेकिन मोदी मेरे भी पीएम हैं. प्रधानमंत्री मोदी अच्छे वक्ता हैं, उनके पास लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने की कला है. स्वच्छ भारत अभियान की तारीफ करते हुए उन्‍होंने कहा कि यह आइडिया मुझे काफी पसंद आया.

मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि नोटबंदी से देश को नुकसान हुआ है. देश की अर्थव्‍यवस्‍था GDP के दो प्रतिशत  प्रतिशत तक गिर गई. नोटबंदी करते समय संसद को अंधेरे में रखा गया. हमारी पार्टी ने लोगों को राइट टू इंफोर्मेशन (आरटीआई) का अधिकार दिया. लेकिन मोदी जी ने आरटीआई पर शिकंजा कस दिया और इसको बंद कर दिया.

कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि भारत में अभी नए रोजगार का सृजन नहीं हो रहा है. भारत को रोजगार का सृजन करना होगा. लेकिन इस मामले में हम चीन का अनुकरण नहीं कर सकते. उसकी नीतियों पर चलकर जॉब क्रिएट नहीं की जा सकती. हमें लोकतांत्रिक तरीके से ही ये करना होगा. भारत में छोटे-कारोबार में ही जॉब हैं.

राहुल ने अपने संबोधन में यह स्‍वीकार किया कि साल 2012 में कांग्रेस में घमंड आ गई थी और पार्टी ने जनता से संवाद कम कर दिया था. इस कारण पार्टी की लोगों से दूरी बन गई थी. राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स को भी लपेटे में लिया. उन्‍होंने कहा कि बीजेपी ने हजारों लोगों को सोशल मीडिया पर बैठा रखा है जो दिनभर मेरे खिलाफ एजेंडा चलाते हैं. मेरे हर बयान और मेरे काम को गलत संदर्भ में दिखाने की कोशिश करते हैं. लेकिन दुनिया मुझे देख रही है और मेरे काम से मेरे बारे में राय बनाई जानी चाहिए. कश्‍मीर में कांग्रेस पार्टी के नौ वर्षों के काम को एनडीए सरकार ने महज 30 दिनों में नष्‍ट कर दिया.

पुलिस की गिरफ्त में चंबल के बीहड़ों की आखिरी दस्यु जोड़ी

राजस्थान से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक फैले चंबल नदी के बीहड़ों में डकैत केदार गुर्जर का काफी आतंक था. उस ने अपनी पत्नी दस्यु सुंदरी पूजा के साथ ऐसा आतंक मचा रखा था कि लोग उन के नाम से कांपते थे. उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में कभी उस की तूती बोलती थी. दोनों धनी लोगों का अपहरण कर मोटी रकम फिरौती में वसूलते थे. इस मामले में दोनों काफी होशियार थे.

वे पकड़ (अपहृत) को जंजीर से बांध कर ताला लगा कर अपने साथ जंगल में रखते थे. फिरौती मिलने के बाद ही वे उसे छोड़ते थे. जब तक पैसा नहीं मिल जाता, तब तक वे पकड़ को मेहमान की तरह रखते थे.

हालांकि अब पहले जैसे खूंखार डकैत नहीं रहे, जो लोगों को कतार में खड़ा कर गोलियों से भून देते थे. एक जमाना था, जब चंबल के बीहड़ में डाकुओं का बोलबाला था. डाकुओं का ऐसा आतंक था कि लोग उन के नाम से कांपते थे. ऐसे तमाम डाकू हुए, जिन की कहानियां आज भी लोग सुनाते हैं. कई महिलाएं भी बीहड़ों में कूद कर डकैत बनीं. इन्हें बाद में दस्यु सुंदरी कहा गया.

लेकिन अब समय बदल गया है. अपराध भले ही पहले से ज्यादा बढ़ गए हैं, लेकिन अपराधों और अपराधियों का ट्रेंड बदल गया है. अब पहले की तरह बंदूकों की नोक पर डकैती की वारदात यदाकदा ही सुनने को मिलती है. डकैतों की पीढ़ी भी अब आखिरी पड़ाव पर है. बात राजस्थान, मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश की करें तो यहां के ज्यादातर डकैत गिरोहों का सफाया हो चुका है. डकैत सरगना जेल पहुंच चुके हैं या मुठभेड़ में अपनी जान गंवा चुके हैं.

समय के साथ अब डकैतों की कार्यप्रणाली बदल चुकी है. पहले की तरह अब डकैत फिल्मी स्टाइल में घोड़ों पर नहीं चलते. चंबल के बीहड़ों में भी अब घोड़ों के टाप नहीं सुनाई देते. वे भी वारदात को अंजाम देने के लिए वाहनों का उपयोग करने लगे हैं.

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केदार गैंग का देवेंद्र

डकैतों में मुठभेड़ें भी कम होती हैं. डकैत गिरोह खूनखराबा करने के बजाय पैसे पर विश्वास करते हैं. गिरोह के सदस्यों के पास आधुनिक हथियार होते हैं. एक यही बदलाव नहीं आया है. वे रहते भी जंगलों और बीहड़ों में हैं.

राजस्थान से ले कर मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश तक पसरी चंबल की घाटी भी अब अवैध खनन की वजह से सिमटती जा रही है. अपनी ही तरह के सामाजिक भौगोलिक कारणों से क्षेत्र को कुख्यात बनाने वाली वजहों में से एक सब से महत्त्वपूर्ण वजह यहां से बहने वाली चंबल नदी है.

मध्य प्रदेश की विंध्य की पहाडि़यों से निकलने वाली यह नदी राजस्थान के कोटा, धौलपुर आदि इलाकों को पार करते हुए मध्य प्रदेश के भिंड मुरैना इलाकों से बहती हुई उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की ओर चली जाती है. पानी के कटाव से चंबल नदी के किनारेकिनारे सैकड़ों मील तक ऊंचे घुमावदार बीहड़ों की संरचना हो गई है. चंबल के ये बीहड़ कई दशकों से डकैतों के अभेद्य ठिकाने रहे हैं.

चंबल से जुड़े इलाकों में अभी भी कुछ डकैतों का आतंक है. राजस्थान के धौलपुर में भी अभी कुछ दस्यु गिरोह सक्रिय हैं. धौलपुर के एसपी राजेश सिंह ने इन दस्युओं के खिलाफ मुहिम चला रखी है, जिस की वजह से अधिकांश दस्यु पकड़े जा चुके हैं. फिर भी डकैतों का खात्मा अभी पूरी तरह से नहीं हो सका है.

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केदार और पूजा

एसपी राजेश सिंह 16 अप्रैल को देर रात तक काम कर रहे थे. हालांकि उस दिन वह औफिस से जल्दी ही घर आ गए थे. लेकिन घर आने के बाद भी वह सरकारी कामकाज में उलझे थे. रात 11 बजे के करीब उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी तो उन्होंने स्क्रीन पर नंबर देखा. नंबर खास मुखबिर का था, इसलिए उन्होंने फोन रिसीव कर बिना कोई भूमिका बनाए पूछा, ‘‘बताओ, क्या खबर है?’’

‘‘सर, आज की सूचना धमाकेदार है.’’ दूसरी ओर से मुखबिर ने कहा.

‘‘अच्छा, ऐसी क्या सूचना है?’’ एसपी साहब ने दिलचस्पी लेते हुए पूछा.

‘‘सर, आप चाहें तो आप की कई महीनों की भागदौड़ कामयाब हो सकती है.’’ मुखबिर बोला.

‘‘वो कैसे?’’ एसपी साहब ने पूछा.

‘‘सर, डकैत केदार गुर्जर आज आप के इलाके में ही घूम रहा है.’’ मुखबिर ने धीमी आवाज में कहा.

केदार का नाम सुन कर एसपी साहब के चेहरे पर चमक आ गई. उन्होंने पूछा, ‘‘कहां है वो?’’

‘‘सर, वह चंदीलपुरा के आसपास जंगल में है. उस की दोस्त पूजा डकैत भी उस के साथ है.’’ मुखबिर ने कहा.

‘‘अगर सूचना पक्की है तो आज वह हमारे हाथों से बच नहीं सकता.’’ एसपी साहब ने कहा.

‘‘सर, सूचना सौ फीसदी सही है. फिर भी आप चाहें तो उस के मोबाइल फोन से उस की लोकेशन पता करा लें.’’ मुखबिर ने एसपी साहब को आश्वस्त करते हुए कहा.

‘‘ओके मैं पता कराता हूं.’’ एसपी साहब ने कहा.

डकैत केदार गुर्जर और दस्यु सुंदरी पूजा के बारे में मिली सूचना महत्त्वपूर्ण थी. राजेश सिंह ने तुरंत एडीशनल एसपी जसवंत सिह बालोत को फोन कर के साइबर सेल द्वारा केदार गुर्जर के मोबाइल फोन की लोकेशन पता कराने को कहा.

एडीशनल एसपी जसवंत सिंह बालोत ने साइबर सेल के माध्यम से डकैत केदार गुर्जर के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगवाया तो पता चला कि वह चंदीलपुरा की घाटी के आसपास है. उन्होंने तुरंत यह सूचना एसपी राजेश सिंह को दे दी.

केदार गुर्जर की लोकेशन का पता चलते ही राजेश सिंह ने एडीशनल एसपी जसवंत सिंह बालोत को तुरंत पुलिस फोर्स के साथ जा कर डकैत केदार को घेरने को कहा. रात को ही अत्याधुनिक हथियारों से लैस एक पुलिस टीम गठित की गई और श्री बालोत के नेतृत्व में वह पुलिस टीम डकैत केदार गुर्जर और दस्यु सुंदरी पूजा की तलाश में निकल गई.

पुलिस टीम जैसे ही चंदीलपुरा की घाटी में बाबू महाराज के मंदिर के पास पहुंची तो डकैतों ने पुलिस की तरफ गोलियां चलानी शुरू कर दीं. पुलिस और डकैतों के बीच रुकरुक कर गोलियां चलती रहीं.

आखिर सवेरा होने से पहले पुलिस टीम डकैत केदार गुर्जर और दस्यु सुंदरी पूजा गुर्जर को जीवित पकड़ने में सफल रही. उन के बाकी साथी अंधेरे में वहां से भाग निकले थे. पुलिस टीम ने दिन चढ़ने पर उन की तलाश में जंगल का चप्पाचप्पा छान मारा, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला.

पुलिस टीम डकैत केदार और पूजा गुर्जर को कड़ी सुरक्षा में धौलपुर ले आई. केदार गुर्जर से एक वनचेस्टर 11, 44 बोर की राइफल, 315 बोर का एक कट्टा और 22 जिंदा कारतूस बरामद हुए थे. दस्यु सुंदरी पूजा गुर्जर के पास से 315 बोर की एक राइफल, 3 जिंदा कारतूस व 3 खाली कारतूस बरामद किए गए थे.

धौलपुर जिले के बसई डांग थाने में केदार और पूजा के खिलाफ भादंवि की धारा 307, 323, 332, 353, 34 और 3/25 आर्म्स एक्ट एवं 11 आरडीए एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया.

डकैत केदार एवं पूजा गुर्जर की गिरफ्तारी से राजस्थान ही नहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस का भी एक बड़ा सिरदर्द खत्म हो गया. केदार गुर्जर के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, अपहरण, डकैती की योजना बनाने, बलात्कार आदि के 29 मामले दर्ज हैं.

वहीं दस्यु सुंदरी पूजा गुर्जर के खिलाफ हत्या के प्रयास एवं डकैती की योजना बनाने के 3 मुकदमे दर्ज हैं. केदार गुर्जर की गिरफ्तारी पर राजस्थान के भरतपुर रेंज के आईजी ने 10 हजार रुपए और उत्तर प्रदेश के आगरा के डीआईजी ने 5 हजार रुपए एवं आगरा के एसएसपी ने 5 हजार रुपए का इनाम घोषित कर रखा था.

दस्यु केदार एवं पूजा गुर्जर से की गई पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

केदार धौलपुर जिले के बाड़ी थाना के गांव भोलापुरा का रहने वाला था. फेरन सिंह गुर्जर के बेटे केदार को लोग ठेकेदार के नाम से पुकारते थे. डकैतों के बीच भी वह केदार उर्फ ठेकेदार के नाम से ही जाना जाता था. वहीं पूजा मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के कैलारस थाने के गांव डोंगरपुर निवासी बहादुर सिंह गुर्जर की बेटी थी. अब वह केदार गुर्जर उर्फ ठेकेदार की पत्नी है.

माना जा रहा है कि चंबल के बीहड़ों में केदार एवं पूजा के बाद अब कोई ऐसा दस्यु जोड़ा नहीं बचा है, जो डकैती की वारदातों में लिप्त हो. जो डकैत बचे हैं, वे अकेले पुरुष हैं. अगर उन की शादी हुई तो पत्नी गांव में रहती है. चंबल के बीहड़ में अब किसी पुरुष डकैत के साथ कोई महिला दस्यु नहीं है.

यह विडंबना ही है कि केदार और पूजा की 2-2 बार शादी हुई है. केदार की पहली पत्नी से उसे कोई संतान नहीं हुई थी. वहीं पूजा की बचपन में उस समय शादी हो गई थी, जब वह 11-12 साल की थी. अक्तूबर, 2004 में रामबाबू गड़रिया ने भंवरपुरा गांव में कई लोगों को एक कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया था. उन में पूजा का पति भी शामिल था.

पति की मौत के बाद पूजा ने ससुराल छोड़ दी और बीहड़ों में कूद गई. वह केदार गुर्जर के गिरोह में शामिल हो गई थी. कुछ दिनों बाद पूजा ने केदार से शादी कर ली थी. केदार ने ही पूजा को बंदूक चलाना सिखाया. शुरू में गिरोह में पूजा की भूमिका कोई खास नहीं थी, लेकिन सन 2007 के बाद से वह गिरोह के साथ पूरी तरह सक्रिय हो गई थी. वह अपहरण करने एवं वसूली से ले कर डकैती की योजना बनाने और पुलिस मुठभेड़ में केदार का कंधे से कंधा मिला कर साथ देने लगी थी.

करीब 2 साल पहले पुलिस ने पूजा को गिरफ्तार कर लिया था. तब वह लगभग 6 महीने तक धौलपुर की केंद्रीय जेल में बंद रही थी. बाद में जमानत मिलने पर वह वापस बीहड़ों में केदार के पास जा पहुंची थी.

बीहड़ों में पूजा साड़ी बांध कर रहती थी, लेकिन जब वह गिरोह के साथ वारदात करने निकलती थी तो ब्रांडेड जींस, टीशर्ट या शर्ट तथा स्पोर्ट्स शूज पहनती थी.

केदार और पूजा ने राजस्थान के धौलपुर से ले कर उत्तर प्रदेश के आगरा एवं मध्य प्रदेश के मुरैना तक अपना कार्यक्षेत्र बना रखा था. केदार का गिरोह लंबे समय तक बीहड़ों में नहीं रहता था. लेकिन जब बीहड़ों में रहता था तो अपने विश्वस्त लोगों से राशन और सामान मंगवाता था. वह जंगल में ही खाना बनाते और खाते थे. बारिश के मौसम में तिरपाल लगा कर रहते थे. रात हो या दिन, बीहड़ में जहां भी गिरोह रुकता था, वहां 1-2 सदस्य बंदूक ले कर पहरा देते रहते थे.

बीचबीच में केदार एवं पूजा के साथ डकैत गिरोह के सदस्य तीर्थयात्रा पर भी जाते थे. ये लोग विश्वविख्यात पुष्कर मेले और अलवर जिले के भर्तृहरि मेले में कई बार जा चुके हैं. इस बीच ये अपनी वेशभूषा बदल लेते थे. केदार गुर्जर धोतीकुरता और पगड़ी बांध कर ठेठ देहाती बन जाता था तो पूजा जंफर और कुरती पहन कर ठेठ गूजरी बन जाती थी. लेकिन 1-2 हथियार ये अपने साथ रखते थे. बाकी हथियारों को अपने ठिकानों पर जंगल में छिपा देते थे. केदार और पूजा सामान्य ग्रामीण की तरह जयपुर और आगरा के ताजमहल आदि जगहों पर भी घूम चुके हैं.

डकैत केदार की आदत थी कि वह जंगल में जहां खाना खाता था, वहां से 1-2 किलोमीटर दूर जा कर पानी पीता था. रात में भी ये 1-2 बार अपना ठिकाना बदल लेते थे.

इन की गिरफ्तारी से कुछ महीने पहले धौलपुर पुलिस की केदार और पूजा गिरोह से मुठभेड़ हुई थी. उस मुठभेड़ के बाद पुलिस ने इन के चंगुल से आगरा के एक ठेकेदार देवेंद्र ठाकुर को मुक्त कराया था. देवेंद्र का उत्तर प्रदेश के शमसाबाद से अपहरण किया गया था. वह शमसाबाद के पूर्व विधायक एवं व्यापारी डा. राजेंद्र सिंह का रिश्तेदार था. देवेंद्र ठेकेदारी करता था.

देवेंद्र के अपहरण के बाद केदार और पूजा के गिरोह ने उस के घर वालों से 50 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. बाद में 20 लाख रुपए में सौदा तय हो गया था. देवेंद्र के घर वाले 20 लाख रुपए ले कर आने वाले थे, इसी बीच पुलिस को सूचना मिल गई थी. पुलिस ने डकैतों की घेराबंदी कर ली. दोनों तरफ से गोलियां चलीं. मुठभेड़ के दौरान डकैत देवेंद्र को छोड़ कर भाग निकले थे.

देवेंद्र ने तब पुलिस को बताया था कि शमसाबाद से उस का एक कार में अपहरण किया गया था. रास्ते में उसे इंजेक्शन लगा कर बेहोश कर दिया गया था. जब होश आया तो वह मध्य प्रदेश के जंगलों में था. बाद में डकैत गिरोह उसे साथ ले कर इधरउधर घूमता रहा. गिरोह ने देवेंद्र को जंजीरों से बांध कर रखा था. जंजीर में ताला लगा रहता था.

केदार एवं पूजा की गिरफ्तारी से चंबल के बीहड़ों में आतंक के 2 साए भले ही कम हो गए हैं, लेकिन उन की दहशत अभी भी 3 राज्यों के कई जिलों में है. केदार की उम्र लगभग 60 साल है तो पूजा भी 40-45 साल के आसपास की है. दोनों को इस बात का दुख है कि उन की कोई औलाद नहीं है. 2 बार शादी करने के बाद भी कोई संतान न होने से केदार अब टूट सा गया है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

इंसाफ चाहिए इस निर्भया को, हैरान कर देगी इसकी कहानी

फोन की घंटी बजी तो अख्तर खान ने स्क्रीन पर नंबर देखा. नंबर जानापहचाना था, इसलिए उस ने तुरंत फोन रिसीव किया. तब दूसरी ओर से पूछा गया कि कौन, अख्तर खान बोल रहे हैं तो अख्तर खान ने कहा, ‘‘हां…हां गुड्डी, मैं अख्तर खान ही बोल रहा हूं. कहो, क्या आदेश है?’’

‘‘अरे खान साहब, आदेश कोई नहीं है. एक अच्छी सी बात है. एक बड़ा ही प्यारा सा माल आया है. आप शौकीन आदमी हैं, इसलिए उसे सब से पहले आप के सामने ही पेश करना चाहती हूं. आप पहले आदमी होंगे, जिस के साथ वह हमबिस्तर होगी.’’ गुड्डी ने मनुहार सा करते हुए कहा.

‘‘अरे गुड्डी, पहले माल तो दिखाओ. माल देखने के बाद ही आने, न आने के बारे में सोचूंगा.’’ अख्तर खान ने कहा.

गुड्डी ने तुरंत वाट्सऐप पर एक लड़की का फोटो भेज दिया. फोटो देख कर अख्तर खान की आंखें चमक उठीं. उस ने तुरंत पूछा, ‘‘मैडम, इस का रेट क्या होगा?’’

‘‘पूरे 10 हजार लगेंगे.’’ गुड्डी ने कहा.

‘‘गुड्डी, 10 हजार में तो किसी बिकाऊ हीरोइन को खरीदा जा सकता है. यह मुंबई से लाई गई कोई हीरोइन थोड़े ही है?’’ अख्तर खान ने कहा.

‘‘अख्तर साहब, यह हीरोइन भले नहीं है, पर हीरोइन से कम भी नहीं है. इसे दिल्ली से लाया गया है. एक बार चखोगे, तो गुलाम बन जाओगे. उस के बाद इस लड़की को ही नहीं, गुड्डी को भी नहीं भूल पाओगे. खान साहब, रेट की बात छोड़ो, अगर लड़की पसंद है तो आ जाओ. फाइनल डील तो मैडम मंजू ही करेंगी.’’ गुड्डी ने कहा.

‘‘गुड्डी मैं इस समय रावतसर ही हूं. तुम कह रही हो तो आधे घंटे में पहुंच रहा हूं. सीधे मैडम मंजू के घर ही पहुंचूंगा.’’

आधे घंटे बाद अख्तर खान हनुमानगढ़ जंक्शन के मोहल्ला सुरेशिया स्थित मंजू मैडम के घर पर था. चायनाश्ते के बाद अख्तर खान को बैडरूम में सजीधजी बैठी लड़की दिखाई गई तो उस की आंखें चमक उठीं. उस ने कुरते की जेब में हाथ डाला और 7 हजार रुपए निकाल कर मंजू के हाथों पर रख दिए. बिना किसी हीलहुज्जत के रुपए मुट्ठी में दबा कर मंजू बैडरूम से बाहर निकल गई. यह मार्च, 2017 के पहले सप्ताह की बात है.

तहसील रावतसर के गांव कल्लासर के रहने वाले सुमेरदीन का बेटा अख्तर खान रंगीनमिजाज युवक था. देहव्यापार का कारोबार करने वाली मंजू अग्रवाल और उस की सहायिका गुड्डी मेघवाल से उस की कई सालों पुरानी जानपहचान थी. अख्तर खान की खेती की जमीन में ‘जिप्सम’ के रूप में प्रचुर मात्रा में खनिज पाया गया है, जिस की वजह से इलाके में उस की गिनती धनी लोगों में होती है.

मंजू के बैडरूम में उस कमसिन लड़की के साथ घंटे, डेढ़ घंटे गुजार कर अख्तर खान संतुष्ट हो कर अपने घर लौट गया. जातेजाते उस ने मंजू और गुड्डी के प्रति आभार भी व्यक्त किया था. इस के बाद मंजू और गुड्डी द्वारा बुलाए गए कई ग्राहकों को उस लड़की ने संतुष्ट किया था.

रात हो गई थी. थक कर चूर हो चुकी उस लड़की ने लगभग रोते हुए कहा, ‘‘आंटी, अब और नहीं सह पाऊंगी शरीर का पोरपोर दर्द कर रहा है.’’

‘‘बस बेटा, आखिरी ग्राहक बचा है. वह एक बड़ा अफसर है. उस के लिए तुझे एक होटल में जाना होगा. जगतार तुझे वहां ले जाएगा. बस आधे घंटे की बात है.’’ मंजू ने सख्त लहजे में प्यार से कहा.

लड़की में मना करने की हिम्मत नहीं थी. इसलिए आधे घंटे में फ्रेश हो कर वह तैयार हो गई. जगतार उसे मोटरसाइकिल से संगम होटल ले गया. लड़की को बताए गए कमरे में पहुंचा कर वह स्वागत कक्ष में आ कर बैठ गया. आधे घंटे बाद लड़की रिशेप्शन पर आई तो जगतार उसे ले कर मंजू के घर आ गया.

2 दिन पहले ही मंजू के घर जबरदस्ती लाई गई यह लड़की बीते एक सप्ताह के हर लम्हे को याद कर के आंसुओं के सागर में गोते लगा रही थी. वहीं उस से देहव्यापार कराने वाली मंजू अग्रवाल पहले ही दिन की कमाई से निहाल हो उठी थी. एक ही दिन में उस की 22 हजार रुपए की कमाई हो चुकी थी.

लड़की, जिसे निर्भया कह सकते हैं, उसे दिल्ली से ला कर मंजू के हाथों बेचा गया था. वह मंजू के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी साबित हुई थी. 2 दिन पहले ही मंजू ने उसे दिल्ली के दलाल सुनील बागड़ी के माध्यम से गोलू और निशा से एक लाख रुपए में खरीदा था.

लेकिन मंजू ने अभी उन्हें 30 हजार रुपए ही दिए थे. बाकी के 70 हजार 15 दिनों बाद देने थे, अब तक की कमाई को देख कर मंजू को यही लगा कि उस ने जो पैसे इस लड़की पर लगाए हैं, वे 5-7 दिनों में ही निकल आएंगे. उस के बाद तो उस के घर रुपयों की बरसात होगी.

घर में निर्भया के कदम पड़ते ही मंजू के दिन फिर गए थे. उस के घर ग्राहकों की लाइन लग गई थी. एक बार जो निर्भया के साथ मौज कर लेता था, उस का दीवाना बन जाता था. उसे बाहर ले जाने के लिए मंजू ग्राहकों से मुंह मांगी रकम लेती थी. निर्भया कहीं मुंह ना खोल दे या भाग न जाए, इस के लिए 2-3 लड़के हमेशा उस पर नजर रखते थे. अगर वह ग्राहक के पास जाने से मना करती तो उसे डरायाधमकाया जाता.

मासूम और नाबालिग निर्भया शरीर के साथसाथ मानसिक रूप से भी मंजू ही नहीं, उस के गुर्गों की दासी बन चुकी थी. उस की शारीरिक कसावट और रूपलावण्य में गजब का आकर्षण था. उसे होटल में ले जाने वाला आदमी ग्राहक से पहले खुद उस के साथ मौज करता था. कमाई के चक्कर में मंजू ने उसे मशीन बना दिया था.

मंजू ने तमाम लड़कियों को अपने घर में रख कर धंधा करवाया था, लेकिन बरकत तो निर्भया के आने पर ही हुई थी. सुरेशिया इलाके में मंजू के 2 मकान थे. गुड्डी उस के पड़ोस में ही रहती थी. पहले वह मंजू के यहां देहधंधा करती थी. उम्र ज्यादा हो गई तो वह मंजू के लिए दलाली करने लगी थी. मंजू अपने ग्राहकों की हर सुखसुविधा का खयाल रखती थी.

उस ने अपने मकान के एक कमरे को फाइव स्टार होटल के कमरे की तरह सजा रखा था. वह ग्राहकों के लिए शबाब के साथसाथ शराब भी उपलब्ध कराती थी. बीते एक महीने में मंजू ने निर्भया से अपनी रकम तो वसूल कर ही ली थी, अच्छाखासा फायदा भी कमा लिया था.

निर्भया के चहेतों ने उस से शादी करने के लिए मंजू के सामने मुंहमांगी रकम देने की भी बात कही थी. मंजू तैयार भी थी, पर निर्भया का आईडी प्रूफ नहीं था, इसलिए वह शादी नहीं करवा पा रही थी. मंजू यह भी जानती थी कि एक तो निर्भया नाबालिग है, इस के अलावा वह दलित समुदाय से भी है. लेकिन अंधाधुंध कमाई के चक्कर में उस की आंखों पर परदा पड़ा हुआ था.

सालों पहले मंजू खुद भी देहधंधा करती थी, वह थी भी काफी आकर्षक. लेकिन उस के चहेतों में निर्भया के दीवानों जैसी दीवानगी नहीं थी. विचारों के भंवर में फंसी मंजू अपने 30-35 साल पुराने अतीत में खो गई थी.

तहसील टिब्बी के एक गांव में जन्मी मंजू के युवा होते ही घर वालों ने सूरतगढ़ निवासी इंद्रचंद अग्रवाल से उस की शादी कर दी थी. स्वच्छंद और आजाद खयालों वाली मंजू को ससुराल की परदा प्रथा और रोकटोक कतई पसंद नहीं आई. 7 सालों में मंजू ने 3 बेटों को जन्म दिया.

बच्चे पैदा होने के बाद मंजू की सुंदरता कम होने के बजाए और बढ़ गई थी. आखिर एक दिन ससुराल की बंदिशों से ऊब कर मंजू ने अपने दांपत्य को अलविदा कह दिया. तीनों बेटे कभी मां के पास तो कभी दादादादी के पास रह कर दिन काट रहे थे. मंजू की ज्यादातर रातें अपने आशिकों के साथ गुजर रही थीं.

मंजू का एक आशिक था बबलू. उस की दबंगई से प्रभावित हो कर मंजू उस के साथ लिवइन रिलेशन में हनुमानगढ़ के हाऊसिंग बोर्ड में रहने लगी थी. बबलू मारपीट, कब्जे करना, देहव्यापार कराना, लूटपाट और हत्या के प्रयास जैसे अपराध कर के डौन बन गया था.

मंजू भी हाऊसिंग बोर्ड इलाके में मजबूर युवतियों  से धंधा करवाने लगी तो पड़ोसियों ने उस का पुरजोर विरोध किया. इस के बाद मंजू सुरेशिया में शिफ्ट हो गई.

कहा जाता है कि सन 2006 में नारी सुख का एक तलबगार मंजू के घर पहुंचा. मंजू और उस के गुंडों ने उस दिन उस ग्राहक के लगभग 30 हजार रुपए छीन लिए थे. उस आदमी ने अपने खास दोस्त को आपबीती बताई तो वह एक नामी बदमाश को ले कर मंजू के घर  पहुंच गया.

बदमाश ने 2 दिनों में पूरी रकम लौटाने को कहा और न लौटाने पर परिणाम भुगतने की धमकी दी. अगले दिन मंजू अपनी बहू को ले कर हनुमानगढ़ के तत्कालीन एसपी के पास पहुंची और सोनू की ओर से उस आदमी और उस के साथी बदमाश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराने का आदेश करा दिया.

लेकिन दोनों लड़के इलाके के विशिष्ट लोगों को साथ जा कर सारी सच्चाई एसपी को बताई तो मंजू का मुकदमा दर्ज नहीं हुआ.

मंजू के 2 बेटे युवा होने से पहले ही चल बसे थे. बड़े बेटे सुरेश की शादी सोनू से हुई थी. मंजू ने अपनी बहू सोनू को भी धंधे में उतार दिया था. सन 2001 में बबलू डौन पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. उस के बाद मंजू ने उस की जगह ले ली. जल्दी ही वह लेडीडौन के रूप में कुख्यात हो गई.

कारण कोई भी रहा हो, मंजू ने पुलिस वालों, छुटभैये राजनेताओं से संबंध बना लिए थे. उस बीच मंजू के खिलाफ पीटा एक्ट, ब्लैकमेलिंग, देहव्यापार, कब्जा करने आदि के मुकदमे दर्ज हुए. पर उसे सजा एक में भी नहीं हुई.

उन दिनों मंजू के सैक्स रैकेट की तूती बोलती थी. उस के यहां राजस्थान की ही नहीं, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार आदि से दलालों के माध्यम से देहव्यापार के लिए लड़कियां मंगाई जाती थीं.

‘‘मैडम, कमरे में कोई ग्राहक आप का इंतजार कर रहा है.’’ गुड्डी के कहने पर मंजू की तंद्रा टूटी. मंजू कमरे में बैठे ग्राहक के पास पहुंची. चायपानी के बाद ग्राहक ने कहा, ‘‘मैडम, आप के यहां दिल्ली से कोई माल आया है, उस के बड़े चर्चे सुने हैं. मैं उस के साथ कुछ समय बिताना चाहता हूं.’’

‘‘हां, हां क्यों नहीं, उस का रेट 10 हजार रुपए हैं.’’ मंजू ने कहा.

‘‘मैं उस के साथ पूरी रात बिताऊं तो…?’’ ग्राहक ने कहा.

‘‘जरूर बिताइए, पर रात के डबल पैसे 20 हजार रुपए लगेंगे.’’ मंजू ने कहा.

ग्राहक ने 15 हजार रुपए मंजू की हथेली पर रख दिए और निर्भया के साथ विशिष्ट कमरे में घुस गया. निर्भया के लिए वह रात बहुत ही पीड़ादायक साबित हुई. उस ग्राहक ने एक ही रात में निर्भया को जैसे रौंद डाला. हवस में पागल उस आदमी ने निर्भया को जगहजगह काट खाया था. उस के साथ कुकर्म भी किया था. उस की हैवानियत से निर्भया के संवेदनशील अंगों में रक्तस्राव शुरू हो गया था.

वह गिड़गिड़ाती रही, पर शराब के नशे में मस्त ग्राहक को उस पर दया नहीं आई. निर्भया अस्तव्यस्त हालत में बैड पर पसरी पड़ी रही. उस की पीड़ा से मंजू को कोई सरोकार नहीं था. अगली रात को उस का सौदा एक ग्राहक से पुन: कर दिया गया. वह ग्राहक भी शराब पी कर निर्भया के कमरे में पहुंचा तो उस से कपड़े उतारने को कहा.

निर्भया ने कपड़े उतारे तो उस की हालत देख कर वह पीछे हट गया. बाहर आ कर उस ने मंजू से कहा, ‘‘तू ने मेरे साथ धोखा किया है. मेरे पैसे लौटा दे अन्यथा काट कर फेंक दूंगा.’’

हकीकत जान कर मंजू के बेटे मुकेश ने कहा, ‘‘मम्मी, इन के पैसे लौटा दो.’’

‘‘अरे भई इतना गुस्सा क्यों कर रहे हो? अगर वह पसंद नहीं है तो सोनू के साथ टाइम पास कर लो.’’ मंजू ने बहू की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘और अगर पैसा ही चाहिए तो सुबह आ कर ले लेना.’’

शराबी ग्राहक बड़बड़ाता हुआ चला गया. यह 27 मार्च, 2017 की बात है.

अगले दिन रात वाला ग्राहक किसी भी समय पैसे लेने आ सकता था. मंजू नहीं चाहती थी कि घर में बखेड़ा हो. इसलिए उसे लगा कि निर्भया को कहीं दूसरी जगह पहुंचा देना चाहिए. उस के पड़ोस में सरदारी बुआ (बदला हुआ नाम) रहती थीं. उसे उन का घर सुरक्षित लगा, इसलिए वह निर्भया को साथ ले कर उन के घर जा पहुंची.

सरदारी बुआ से उस ने कहा, ‘‘बुआ, यह मेरी भांजी है. मेरी कोलकाता वाली बहन की बेटी. आज इस की मम्मी आ रही है. मैं उन्हें लेने रेलवे स्टेशन जा रही हूं. घर में अकेली बोर हो जाएगी, इसलिए आप मेरे लौटने तक इसे अपने यहां रख लो.’’

इतना कह कर मंजू चली गई. उस के जाने के बाद निर्भया लड़खड़ाते हुए सरदारी बुआ के पास पहुंची तो उसे इस तरह से चलते देख सरदारी बुआ ने उस के सिर पर हाथ रख कर पूछा, ‘‘क्या बात है बिटिया, तेरी तबीयत ठीक नहीं क्या? तेरे पैरों में चोट लगी है क्या?’’

ममत्व भरे स्पर्श से निर्भया बिलख पड़ी. सरदारी बुआ के सीने पर सिर रख कर उस ने कहा, ‘‘आंटी, जख्म पैरों में ही नहीं, पूरे बदन पर हैं. हृदय घावों से छलनी हो चुका है. मंजू मेरी मौसी नहीं, इस ने मुझे खरीदा है. आंटी मुझे बचा लो.’’Crime news nirbhaya

सरदारी बुआ ने दुनिया देखी थी. निर्भया ने जितना कहा था, उतने में ही वह पूरा माजरा समझ गई. उस बच्ची की पीड़ा को उन्होंने गंभीरता से लिया. उन का मन निर्भया को बचाने के लिए तड़प उठा. उन्होंने तुरंत बाल संरक्षण कमेटी के जिलाध्यक्ष एडवोकेट जोट्टा सिंह को फोन कर के अपने घर बुला लिया. नाबालिग बच्ची से जुड़ा मामला था, इसलिए वह अकेले नहीं आए थे, उन के साथ उन के साथी भी आए थे.

नाबालिग निर्भया की हालत देख कर जोट्टा सिंह द्रवित हो उठे. उस की हालत काफी गंभीर थी. उसे तत्काल मैडिकल सहायता की जरूरत थी. मामला संगीन था, इसलिए पुलिस को भी सूचना देना जरूरी था. उन्होंने तुरंत एसपी भुवन भूषण यादव को मामले की जानकारी दे दी.

एसपी के निर्देश पर महिला थाने की थानाप्रभारी सहयोगियों के साथ सरदारी बुआ के घर पहुंच गईं. अब तक मंजू परिवार के साथ फरार हो चुकी थी. बाल संरक्षण कमेटी के संरक्षण में निर्भया को हनुमानगढ़ के जिला चिकित्सालय में भरती कराया गया.

शुरुआती पूछताछ में पुलिस को पता चला कि निर्भया दिल्ली के अमन विहार की रहने वाली थी. हनुमानगढ़ पुलिस ने दिल्ली के थाना अमन विहार पुलिस से संपर्क किया तो पता चला कि निर्भया के पिता कुंदन (बदला हुआ नाम) ने फरवरी महीने में उस की गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

सूचना पा कर थाना अमन विहार पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ दर्ज मुकदमे में गोलू, मंजू, निशा, सुनील बागड़ी आदि को नामजद कर लिया. इस के बाद दिल्ली पुलिस की सबइंसपेक्टर मनीषा शर्मा पुलिस टीम के साथ हनुमानगढ़ पहुंची और निर्भया का बयान ले कर लौट गई.

पुलिस टीम के साथ आए निर्भया के पिता ने बेटी की हालत देखी तो गश खा कर गिर गए. मामला मीडिया द्वारा जगजाहिर हुआ तो शहर में भूचाल सा आ गया. निर्भया को न्याय दिलाने के लिए हनुमानगढ़ में भी मुकदमा दर्ज करने की मांग करते हुए लोग सड़कों पर उतर आए. श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में कैंडल मार्च निकाला गया.

हनुमानगढ़ पुलिस दिल्ली में मुकदमा दर्ज होने की बात कह कर मुकदमा दर्ज करने से कतरा रही थी. लेकिन लोग मैदान में उतर आए. लोगों का कहना था कि यहां के आरोपियों से दिल्ली पुलिस को कोई सरोकार नहीं रहेगा. निर्भया का बुरा करने वालों को किए की सजा दिलाने के लिए यहां भी मुकदमा दर्ज होना चाहिए.

लोगों के गुस्से को देखते हुए हनुमानगढ़ पुलिस बेबस हो गई. तीसरे दिन महिला पुलिस थाने में मंजू, गोलू, निशा, मुकेश, सोनू आदि के खिलाफ भादंवि की धारा 370, 372, 373, 376 (डी), 377, 3/4 पौक्सो एक्ट व हरिजन उत्पीड़न अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस के बाद डीएसपी वीरेंद्र जाखड़ को मामले की जांच सौंप दी गई.

जानकारी मिलने पर 30 मार्च, 2017 को राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षा मनन चतुर्वेदी हनुमानगढ़ आईं और स्वास्थ्य केंद्र जा कर उपचाराधीन निर्भया से मिलीं. बच्ची की हालत देख कर वह रो पड़ीं. इस मामले में एक भी गिरफ्तारी न होने से उन्होंने पुलिस को आड़े हाथों लिया और शीघ्र गिरफ्तारी के आदेश दिए. 10वीं कक्षा में पढ़ने वाली निर्भया को अपनी पढ़ाई जारी रखने और वरिष्ठ अधिकारी बनने के लिए प्रेरित करते हुए हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया. कुछ संस्थाओं ने ही नहीं, जन साधारण ने भी निर्भया की आर्थिक मदद की.

आखिर कौन थी निर्भया, वह कैसे चकलाघर संचालिका मंजू अग्रवाल के पास पहुंची? पुलिस जांच में पता चला कि सुरेशिया में ही किराएदार के रूप में मंजू के पड़ोस में सुनील बागड़ी रहता था. इस के पहले वह पश्चिमी दिल्ली के अमन विहार में रहता था. सुनील मंजू का राजदार था और एक दो बार उस के लिए बाहर से लड़की ला चुका था.

एक दिन सुनील मंजू के पास बैठा था तो उस ने कहा, ‘‘अरे सुनील बाबू, आजकल मेरा धंधा बड़ा मंदा है. कोई बढि़या सी लड़की की व्यवस्था कर देते तो धंधा चमक उठता. ऐसे माल के लिए मैं लाख, डेढ़ लाख रुपए खर्च करने को तैयार हूं.’’

‘‘मैडम, यह कौन सा मुश्किल काम है. मैं आज ही अपने साथी से कहे देता हूं.’’ सुनील ने कहा.

दिल्ली में सुनील के पड़ोस में ही गोलू और निशा रहते थे. निशा का पति ट्रक चलाता था, जबकि गोलू टैंपो चलाता था. निशा और उस के पति में किसी बात को ले कर खटपट हो गई तो निशा पति से अलग हो कर गोलू के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगी. सुनील ने मंजू की मंशा गोलू और निशा को बताई तो लाखों मिलने की उम्मीद में उन के मुंह में पानी आ गया.

निशा के पड़ोस में ही रहती थी निर्भया. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी और दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी. पिता मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे परिवार की गाड़ी खींच रहे थे. आकर्षक कदकाठी और मनमोहक नयननक्श वाली निर्भया गोलू और निशा की निगाह में चढ़ गई. दोनों ने उसे मंजू के अड्डे पर पहुंचाने का मन बना लिया.

बस फिर क्या था. निशा और गोलू निर्भया पर डोरे डालने लगे. निशा को गोलू ने अपनी भाभी बताया था. जानपहचान बढ़ी तो निशा और गोलू निर्भया को गिफ्ट के साथ नकदी भी देने लगे. निशा ने निर्भया से कहा था कि वह गोलू से उस की शादी करा कर उसे अपनी देवरानी बनाना चाहती है.

फिसलन भरी राह पर आखिर एक दिन निर्भया फिसल ही गई और निशा तथा गोलू के साथ भाग गई. उसे ले जा कर पहले गोलू ने उस से शादी की. फिर 4-5 दिनों बाद वे उसे ले कर हनुमानगढ़ पहुंचे और सुनील बगड़ी के माध्यम से मंजू को सौंप दिया गया. निर्भया के गायब होने पर कुंदन ने थाना अमन विहार में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

हनुमानगढ़ पुलिस जब मुख्य अपराधियों को 3-4 दिनों तक गिरफ्तार नहीं कर सकी तो लोग नाराजगी व्यक्त करने गले. मीडिया भी पुलिस की भद्द पीट रही थी. साइबर क्राइम एक्सपर्ट हैडकांस्टेबल गुरसेवक सिंह ने मंजू के परिवार की लोकेशन पता कर रहे थे, पर शातिर मंजू पुलिस के पहुंचने से पहले ही उड़नछू हो जाती थी.

आखिर पांचवें दिन मंजू की आंख मिचौली खत्म हो गई. वह अपने बेटे मुकेश और बहू सोनू के साथ हरियाणा के ऐलनाबाद में पुलिस के हत्थे चढ़ गई. अदालत में पेश किए जाने पर अदालत ने तीनों को विस्तृत पूछताछ के लिए 10 दिनों  की पुलिस रिमांड पर सौंप दिया था.

मंजू से पूछताछ के बाद स्थानीय पुलिस ने पहले ग्राहक अख्तर खान सहित, 15 सौ रुपए में कमरा उपलब्ध कराने वाले संगम होटल के मैनेजर कृष्णलाल घूडि़या, दलाल गुड्डी मेघवाल और निर्भया का बुरा करने वाले विजय (रावतसर), नवीन खां, मंजूर खां (मोधूनगर) पूर्णचंद सिंधी (हनुमानगढ़) बिजली मैकेनिक जगदीश काला उर्फ अमरजीत आदि 15 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

अब दिल्ली पुलिस मंजू सोनू, मुकेश आदि को प्रोटक्शन वारंट पर अपनी सुपुर्दगी में लेने की कोशिश कर रही है. दिल्ली के दोनों आरोपी गोलू और निशा तिहाड़ जेल पहुंच गए हैं. हनुमानगढ़ पुलिस के लिए वे दोनों भी वांटेड हैं.

स्वास्थ्य लाभ के बाद निर्भया दिल्ली लौट गई थी. जिंदगी बरबाद करने वाले आरोपियों को फांसी की सजा की मांग करने वाली निर्भया की पुकार अब अदालत के फैसले पर निर्भर करेगी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

इश्क की आग में कुछ इस तरह बरबाद हुआ एक परिवार

2 लोगों के साथ जगराओं के थाना सिटी पहुंची लक्ष्मी ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर इंद्रजीत सिंह को बताया था कि उस के पति प्रवासराम 2 दिन पहले काम पर गए तो अब तक लौट कर नहीं आए हैं. थानाप्रभारी ने पूरी बात बताने को कहा तो लक्ष्मी ने बताया कि उस के पति प्रवासराम मूलरूप से बिहार के जिला बांका के थाना रजौली के गांव उपराम के रहने वाले थे.

कई सालों पहले वह काम की तलाश में जगराओं आ गया था और पीओपी का काम सीख कर बडे़बडे़ मकानों में पीओपी करने के ठेके लेने लगा था. उस का काम ठीकठाक चलने लगा तो वह गांव से पत्नी और बच्चों को भी ले आया. जगराओं में वह डा. हरिराम अस्पताल के पास रहता था.

सन 2001 में प्रवासराम की लक्ष्मी से शादी हुई थी. उस के कुल 6 बच्चे थे, जिन में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. वह सुबह काम पर जाता था तो शाम 7 बजे तक वापस आता था. लक्ष्मी की बात सुन कर इंद्रजीत सिंह ने पूछा, ‘‘जिस जगह तुम्हारा पति काम करता था, वहां जा कर तुम ने पता किया था?’’

‘‘जी साहब, यह लड़का उन्हीं के साथ काम करता था.’’ साथ आए 20-22 साल के एक लड़के की ओर इशारा कर के लक्ष्मी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उस लड़के की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सोनू है, मैं उन्हीं के साथ काम करता था. वह 2 दिनों से काम पर नहीं आए हैं, जिस से हम सभी बहुत परेशान हैं. हम सभी खाली बैठे हैं.’’

इंद्रजीत सिंह ने एएसआई बलजिंदर सिंह को पूरी बात समझा कर प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज करा कर उस की पत्नी से उस का एक फोटो लेने को कहा. थानाप्रभारी के आदेश पर बलजिंदर सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कर लक्ष्मी से उस का एक फोटो ले लिया. इस के बाद उन्होंने उस की फोटो के साथ सभी थानों को उस की गुमशुदगी की सूचना दे दी. यह 4 अप्रैल, 2017 की बात है. इस का मतलब प्रवासराम 2 अप्रैल से गायब था.

6 अप्रैल, 2017 को पुलिस को जगराओं के बाहरी इलाके में सेम नानकसर रोड पर स्थित एक गंदे नाले में एक लाश मिली. उसे बिस्तर में लपेट कर फेंका गया था. मौके पर पहचान न होने की वजह से पुलिस ने लाश को मोर्चरी में रखवा कर उस के पोस्टर जारी कर दिए थे. पोस्टर देख कर अगवाड़ लोपो के रहने वाले मृतक के साढू समीर ने उस की शिनाख्त डा. हरिराम अस्पताल के पास रहने वाले प्रवासराम की लाश के रूप में कर दी थी.

इंद्रजीत सिंह ने तुरंत सिपाही भेज कर लक्ष्मी को बुलवा लिया था. लाश देखते ही लक्ष्मी रोने लगी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. वह लाश उस के गुमशुदा पति प्रवासराम की ही थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रजीत सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी की जगह अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लाश लक्ष्मी और उस के रिश्तेदारों को सौंप दी. उसी दिन शाम को उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासराम की हत्या 4 दिनों पहले गला घोंट कर की गई थी. उस की गरदन पर रस्सी के निशान थे. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच बलजिंदर सिंह को ही सौंप दी थी. उन्होंने मृतक की पत्नी लक्ष्मी और उस के भाइयों को बुला कर विस्तार से पूछताछ की.

मृतक के भाई अनूप का कहना था कि उस के भाई की न किसी से कोई दुश्मनी थी और न किसी तरह का कोई लेनादेना था. इस के बाद बलजिंदर सिंह ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘तुम सोच कर बताओ कि काम पर जाने से पहले तुम्हारी पति से कोई खास बात तो नहीं हुई थी?’’

‘‘कोई बात नहीं हुई थी साहब, रोज की तरह उस दिन भी वह अपना खाने का टिफिन ले कर सुबह साढ़े 7 बजे घर से गए तो लौट कर नहीं आए.’’

बलजिंदर सिंह ने वहां जा कर भी पूछताछ की, जहां प्रवासराम काम करा रहा था. उस के साथ काम करने वाले मजदूर ही नहीं, मकान के मालिक ने भी बताया कि प्रवासराम निहायत ही शरीफ और ईमानदार आदमी था. लड़ाईझगड़ा तो दूर, वह किसी से ऊंची आवाज में बात भी नहीं करता था. समय पर काम कर के मालिक से समय पर मजदूरी ले कर अपने मजदूरों को उन की मजदूरी दे कर उन्हें खुश रखता था.

बलजिंदर सिंह को अब तक की पूछताछ में कोई ऐसा सुराग नहीं मिला था, जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाते. यह तय था कि हत्यारे 2 या 2 से अधिक थे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे शरीफ आदमी की भला किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी, जो उसे मार दिया.

थानाप्रभारी इंद्रजीत सिंह से सलाह कर के बलजिंदर सिंह मुखबिरों की मदद से यह पता करने लगे कि मृतक की पत्नी का किसी से अवैध संबंध तो नहीं था. इस की एक वजह यह थी कि लक्ष्मी ने कई बार बयान बदले थे. यही नहीं, पूछताछ के दौरान वह डरीडरी सी रहती थी. कभी वह कहती थी कि 2 अप्रैल को काम से लौटने के बाद वह कुछ लेने के लिए बाजार गए थे तो लौट कर नहीं आए तो कभी कहती थी कि सुबह काम पर गए थे तो लौट कर नहीं आए थे.

उस की इन्हीं बातों पर उन्हें उस पर शक हो गया था. मुखबिरों से उन्हें पता चला था कि लक्ष्मी के घर सिर्फ 20-22 सल के सोनू का ही आनाजाना था. उसी सोनू के साथ लक्ष्मी प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कराने थाने आई थी. उस की उम्र लक्ष्मी से इतनी कम थी कि उस पर संदेह नहीं किया जा सकता था. लेकिन मुखबिर ने जो खबर दी थी, उस से सोनू ही संदेह के घेरे में आ गया था. पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला.

बलजिंदर सिंह महिला सिपाही की मदद से लक्ष्मी को थाने ले आए और जब उस से कहा कि उसी ने सोनू के साथ मिल कर अपने पति की हत्या की है तो वह अपने बच्चों की कसम खाने लगी. उस का कहना था कि पुलिस को शायद गलतफहमी हो गई है. वह भला अपने पति की हत्या क्यों करेगी.

लेकिन पुलिस को मुखबिर पर पूरा भरोसा था. इसलिए जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने अपने पति प्रवासराम की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बता दिया कि उसी ने अपने प्रेमी सोनू के साथ साजिश रच कर पति प्रवासराम की हत्या कराई थी.

इस हत्या में उस का प्रेमी सोनू और उस के 2 दोस्त मिल्टन और छोटू सोनू शामिल थे.

सोनू के दोस्त का नाम भी सोनू था, इसलिए यहां उस का नाम छोटू सोनू लिख दिया गया है. लक्ष्मी ने ही प्रवासराम की हत्या करा कर उस की लाश गंदे नाले में फेंकवा दी थी.

इस के बाद लक्ष्मी की निशानदेही पर उस के प्रेमी सोनू और उस के साथी अवधेश (बदला हुआ नाम) को हिरासत में ले लिया गया था. जबकि उस का साथी सोनू फरार होने में कामयाब हो गया था. शायद उसे लक्ष्मी, अवधेश और सोनू के गिरफ्तार होने की सूचना मिल गई थी.

बलजिंदर सिंह ने उसी दिन यानी 9 अप्रैल, 2017 को तीनों अभियुक्तों लक्ष्मी, अवधेश और सोनू को जिला मजिस्टै्रट की अदालत में पेश कर के लक्ष्मी और सोनू को 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया, जबकि नाबालिग होने की वजह से अवधेश को बाल सुधारगृह भेज दिया गया. रिमांड अवधि के दौरान प्रवासराम की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह  इस प्रकार थी-

6 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी लक्ष्मी की देह की आग शांत होने के बजाय और भड़क उठी थी. इस की वजह यह थी कि प्रवासराम सीधासादा और शरीफ आदमी था. उस ने लक्ष्मी से कहा था कि अब उसे खुद पर संयम रखना चाहिए, क्योंकि उस के 6 बच्चे हो चुके हैं. अब उसे अपने इन बच्चों की फिक्र करनी चाहिए.

प्रवासराम दिनभर काम कर के थकामांदा घर लौटता और खाना खा कर अगले दिन काम पर जाने के लिए जल्दी सो जाता. लक्ष्मी को यह जरा भी नहीं सुहाता था. जब पति ने उस की ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया तो उस की नजरें खुद से लगभग 22 साल छोटे सोनू पर जा टिकीं.

काम से फारिग होने के बाद अकेला रहने वाला सोनू अक्सर प्रवासराम के साथ उस के घर आ जाता था. वह घंटों बैठा प्रवासराम और लक्ष्मी से बातें किया करता था. लक्ष्मी की नजरें उस पर टिकीं तो वह उस से हंसीमजाक के साथसाथ शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगी. युवा हो रहे सोनू को यह सब बहुत अच्छा लगता था.

crime story
पुलिस की गिरफ्त में सोनू

एक दिन दोपहर को जब सोनू काम से छुट्टी ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा तो लक्ष्मी ने उसे पकड़ कर बैड पर पटक दिया और मनमानी कर डाली. सोनू के लिए यह एकदम नया सुख था. उसे ऐसा लगा, जैसे वह जन्नत की सैर कर रहा है. उस दिन के बाद यह रोज का नियम बन गया. सोनू काम के बीच कोई न कोई बहाना कर के लक्ष्मी के पास पहुंच जाता और मौजमस्ती कर के लौट जाता. यह सब लगभग एक साल तक चलता रहा. किसी तरह इस बात की जानकारी प्रवासराम को हुई तो उस ने लक्ष्मी को खरीखोटी ही नहीं सुनाई, बल्कि प्यार से समझाया भी, पर उस के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

जब प्रवासराम ने लक्ष्मी पर रोक लगाने की कोशिश की तो सोनू के प्यार में पागल लक्ष्मी ने सोनू के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना डाली. एक दिन उस ने सोनू से कहा, ‘‘जब तक प्रवासराम जिंदा रहेगा तो हम दोनों इस तरह मिल नहीं पाएंगे. वैसे भी अब उस के वश का कुछ नहीं रहा. वह बूढा हो गया है, अब उस का मर जाना ही ठीक है.’’

लक्ष्मी के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना कर सोनू ने साथ काम करने वाले अवधेश और छोटू सोनू को कुछ रुपयों का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. घटना वाले दिन यानी 2 अप्रैल, 2017 को सोनू पार्टी देने के बहाने शराब की बोतल और चिकन ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा. अवधेश और छोटू सोनू भी उस के साथ थे. उस ने प्रवासराम से कहा, ‘‘भइया चिकन और शराब लाया हूं, आज पार्टी करने का मन है.’’

योजनानुसार चारों शराब पीने बैठ गए. खुद कम पी कर सोनू और उस के साथियों ने प्रवासराम को अधिक शराब पिला दी. रात के 11 बजे तक प्रवासराम जरूरत से ज्यादा शराब पी कर लगभग बेहोश हो गया तो लक्ष्मी ने सोनू को इशारा किया.

सोनू ने छोटू सोनू और अवधेश की तरफ देखा तो छोटू सोनू ने बेसुध पड़े प्रवासराम के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए. अवधेश उस की छाती पर सवार हो गया तो लक्ष्मी और सोनू ने प्रवासराम के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. प्रवासराम तड़प कर शांत हो गया तो चारों ने मिल कर लाश को बैड से उतार कर नीचे खिसका दिया.

अवधेश और छोटू सोनू तो अपनेअपने घर चले गए, जबकि सोनू लक्ष्मी के कमरे पर ही रुक गया. दोनों पूरी रात उसी बैड पर मौजमस्ती करते रहे, जिस बैड के नीचे प्रवासराम की लाश पड़ी थी.

अगले दिन यानी 3 अप्रैल की रात को अवधेश और छोटू सोनू की मदद से सोनू प्रवासराम की लाश को बिस्तर में लपेट कर रेहड़े से ले जा कर सेम नानकसर रोड पर बहने वाले गंदे नाले में फेंक आया.

रिमांड अवधि के दौरान लक्ष्मी की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से वह रस्सी बरामद कर ली थी, जिस से प्रवासराम का गला घोंटा गया था. हत्या करते समय लक्ष्मी ने अपने सभी बच्चों को दूसरे कमरे में सुला कर बाहर से कुंडी लगा दी थी, जिस से बच्चों को कुछ पता नहीं चल सका था.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर 11 अप्रैल, 2017 को लक्ष्मी और उस के प्रेमी सोनू को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. अवधेश को पहले ही बाल सुधार गृह भेज दिया गया था.

इस हत्याकांड का एक आरोपी छोटू सोनू अभी फरर है. पुलिस उस की तलाश कर रही है. प्रवासराम की हत्या और लक्ष्मी के जेल जाने के बाद उन के सभी बच्चों को प्रवासराम का छोटा भाई अपने घर ले गया है. लक्ष्मी ने अपनी वासना में अपना परिवार तो बरबाद किया ही, 3 लड़कों की जिंदगी पर सवालिया निशान लगा दिए.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अवधेश बदला हुआ नाम है.

नई शुरुआत (पहला भाग) : आभा और विनय के बीच क्या रिश्ता था

आभास पटना घूमने आया था. वह पटना से 20 किलोमीटर दूर फतुहा का रहने वाला था.

फतुहा पटना का सैटेलाइट टाउन है. वहीं के हाईस्कूल से उस ने मैट्रिक पास की थी, पर 12वीं जमात में फेल हो जाने के बाद उस के पिता ने उस की पढ़ाई छुड़वा कर अपने कारोबार में लगा दिया.

आभास के पिता नंदू का मछली का थोक कारोबार था. वह पिता के साथ पटना आया था. वहां गंगा किनारे बने गोलघर के ऊपर चढ़ कर दूर तक फैली हुई गंगा नदी और शहर को आंखें फाड़ कर देख रहा था.

उसी दिन आभास से थोड़ी ही दूर पर खड़ी आभा भी गोलघर की ऊंचाई से शहर का नजारा देख रही थी. उस के पिता पूरी सीढि़यां चढ़ नहीं सके, तो आभा को ऊपर भेज कर वे खुद बीच में ही थक कर बैठ गए. आभा आभास से एक क्लास जूनियर थी.

अचानक आभास की नजर आभा पर पड़ी, तो वह बोला, ‘‘क्यों री छबीली, तू यहां भी?’’

आभा बोली, ‘‘यह तेरे फतुहा का नुक्कड़ नहीं है. यहां पर तेरी दादागीरी नहीं चलेगी.’’

आभास के पिता नंदू बिहार सरकार की डेरी का फ्रैंचाइज लेने आए थे, जो उन्हें मिल गई थी. आभास उम्र में आभा से 5 साल बड़ा था. आभा के पिता स्कूल मास्टर थे. उन की 2 बेटियां थीं, आभा और विभा. दोनों ही बहुत खूबसूरत थीं, पर आभा जरा ज्यादा खूबसूरत थी.

आभा के पिता अपनी पत्नी से कहा करते, ‘मेरी बेटियां बिलकुल राजकुमारी जैसी हैं. मैं उन के लिए राजकुमार जैसे लड़के ढूंढूंगा.’

नंदू ने आभास को अपने मछली के कारोबार में लगा रखा था. मछली और डेरी दोनों से अच्छी कमाई हो जाती थी.

आभा जब स्कूल जाती, तो नुक्कड़ पर आभास अकसर उसे छेड़ता. कभी आंख मारता, कभी सीटी बजाता, तो कभी फिल्मी गाने गाता.

एक दिन जब आभा स्कूल जा रही थी, तो आभास गाने लगा, ‘‘हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा…’’

आभा ने भी तपाक से कहा, ‘‘हर दिल जो प्यार करेगा, वो जूते खाएगा…’’ और अपनी सैंडल उतार कर उस की ओर हवा में लहराई.

आभास भी कम नहीं था. वह बोला, ‘‘देखना, एक दिन तू मेरे जूते चाटेगी.’’

आभा घर में अपने मातापिता को यह सब बताती, तो वे कहते कि बस तू आंखें झुका कर उस की बातों को अनसुना समझ कर आगे बढ़ जाना. उस के मुंह मत लगना. आभा 12वीं में पढ़ रही थी. उस की मां ने पति से कहा भी, ‘‘अब इस के हाथ पीले कर दो.’’ पर आभा का मन आगे पढ़ने को था. उस के पिता भी यही चाहते थे. 12वीं के बाद आभा का दाखिला फतुहा के संत कबीर विद्यानंद कालेज में हुआ. कालेज जाने के रास्ते में भी आभास अकसर उसे छेड़ता, लेकिन वह उसे अनदेखा कर देती.

अभी आभा ने कालेज में पहला साल भी पूरा नहीं किया था कि उस के पिता की मौत हो गई. मां ने आभा की पढ़ाई छुड़ा दी. मां और मामा दोनों मिल कर उस के लिए लड़का खोजने लगे, पर जहां जाते दहेज मुंह फाड़े उन का काम बिगाड़ देता.

इसी बीच आभास की मां ने उस के लिए रिश्ते की बात की. उस ने कहा कि शादी का पूरा खर्च वे उठाएंगी. कोई दहेज नहीं चाहिए. उन्होंने तो अपनी ओर से 10 हजार रुपए भी शादी में खर्च के लिए दिए.

आभा की मां ने झटपट हां कर दी. आभा ने मना भी किया, पर मां ने कहा, ‘‘तू विदा होगी, तभी तो तेरी छोटी बहन विभा की शादी भी जल्दी कर के मुझे चैन मिलेगा.’’

आभा की शादी आभास से हो गई. मां ने उसे समझाया कि बीती बातों को भूल कर आभास को इज्जत देना.

मां ने विदाई के पहले कहा, ‘‘मेरी बेटी की खूबसूरती पर आभास फिदा हो जाएगा. घूंघट उठाते ही वह तुम से बेशुमार प्यार करने लगेगा. तलवे चाटेगा, देखना.’’

आभा ससुराल आ गई. सुहागरात थी. वह घूंघट में लाल सितारों वाली साड़ी में फूलों से सजे पलंग पर बैठी आभास का इंतजार कर रही थी.

देर रात ‘धड़ाम’ की आवाज से दरवाजा खुला और आभास ने अंदर आ कर जोर से सिटकिनी लगा दी.

आभास के आते ही देशी शराब की बदबू कमरे में फैल गई. वह पलंग पर कूदते हुए जा बैठा और बिना कुछ बात किए आभा के कपड़े उतारने लगा.

आभा बोली, ‘‘अरेअरे, यह क्या कर रहे हो?’’

आभास बोला, ‘‘वही जो मर्द को सुहागरात में करना चाहिए.’’

‘‘अरे, तो एकदम से ऐसे तो नहीं…’’ आभा बोली.

‘‘चुप, मुझे सब पता है कि क्या करना है,’’ आभास ने कहा.

आभास ने आभा को बिस्तर पर लिटा दिया. आभा के मुंह से एक चीख निकली ही थी कि आभास ने अपने हाथ से उस का मुंह बंद कर दिया और अपनी मर्दानगी दिखाने लगा.

शराब की बदबू से आभा को घिन आ रही थी. वह चाह कर भी उस की कैद से नहीं निकल सकी. थोड़ी ही देर में आभास की मर्दानगी खत्म हो गई और उस की पकड़ ढीली पड़ी, तो आभा को चैन मिला.

आभास अपनी प्यास बुझा कर एक ओर लुढ़क गया और जल्द ही खर्राटे लेने लगा. आभा ने भी दूसरी ओर करवट बदल ली. वह सोचने लगी कि क्या मर्दों के लिए सुहागरात का यही मतलब होता है?

आभास रोज सुबह गंगा किनारे से मछलियों की टोकरियां थोक भाव में खरीदता और अपने पुराने स्कूटर में बांध कर शहर के बाजार में बेचता. वह खुद खुदरा मछलियां नहीं बेचता था और न ही काटता था, फिर भी मछली की बदबू उस की देह से आती थी. कभी रात को घर लौटते समय रास्ते में वह अकसर शराब भी पी लेता.

इसी तरह रोज रात में वह आभा के पास आता और अपनी हवस पूरी कर लेता. आभा प्यार के दो शब्द सुनने के लिए तरस जाती.

इसी तरह 2 साल बीत गए. आभा बीचबीच में अकसर सासससुर से बोलती थी कि उसे आगे पढ़ना है, पर कोई उस की बात से सहमत नहीं था.

आखिर एक दिन आभा भूख हड़ताल पर बैठ गई. उस ने कहा कि उसे कम से कम प्राइवेट बीए करने दिया जाए, तब उसे पढ़ने की इजाजत मिली.

वह घर से ही पढ़ने लगी. लेकिन आभास के बरताव में कोई बदलाव नहीं आया था.

2 साल और बीततेबीतते आभा ने आभास में थोड़ा सा बदलाव महसूस किया. वह अब भी दारू पीता था, पर पहले से कम. अब वह उस के पास आने के पहले अकसर नहा लिया करता.

आभा को लगा कि शायद वह जल्द ही बीए करने वाली है, इसलिए आभास थोड़ा बदलने की कोशिश कर रहा है. आभा ने बीए पास कर लिया. उस को एक सरकारी स्कूल में लेडीज कोटे में क्लर्क की नौकरी मिल गई थी. पर समस्या थी कि यह स्कूल फतुहा से 45 किलोमीटर दूर इसलामपुर शहर में था. ट्रेनें तो थीं, पर आनेजाने के समय के मुताबिक नहीं थीं. आभा तो नौकरी करना ही चाहती थी. उस के सासससुर दोनों भी यही चाहते थे. सरकारी नौकरी में तनख्वाह के अलावा पैंशन वगैरह भी मिलती थी.

शुरू में तो आभास इस के खिलाफ था, पर बाद में मातापिता के समझाने पर वह भी मान गया.

आभा ने इसलामपुर आ कर नौकरी जौइन कर ली. उसे छोड़ने आभास और ससुर नंदू दोनों आए थे. उन्होंने आभा के लिए एक कमरे का मकान किराए पर ले लिया था. साथ में एक मोबाइल फोन, एक खाट, बिछावन, स्टोव, कुछ बरतन वगैरह भी खरीद कर दे दिए थे.

अगले दिन आभास और उस के पिता नंदू जब घर लौट रहे थे, तब उन्होंने बहू से कहा, ‘‘सरकारी नौकरी है, काम तो नाममात्र ही होगा. जब जी चाहे हाजिरी लगा कर आ जाना.

‘‘सरकारी स्कूलों में तो साल में 3-4 महीने छुट्टी ही रहती है. सासससुर और पति का भी खयाल तुम्हें ही रखना है न.’’

रास्ते में आभास ने कहा, ‘‘आप ने उस पर काफी पैसा खर्च कर दिया?’’ नंदू बोले, ‘‘बेटा, इसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझ. अगले महीने से इसे तनख्वाह मिलने लगेगी.’’

उन के लौट आने पर आभास की मां ने बेटे से कहा, ‘‘छोड़ आया बहू को… अब तुम लोग और कितने दिन इंतजार कराओगे? मैं पोतेपोती का मुंह देखने के लिए तरस रही हूं.’’

आभास चुप रहा. इधर आभा ने स्कूल जाना शुरू कर दिया. विनय भी उसी स्कूल में टीचर था. वह स्मार्ट और हंसमुख था. वह इसलामपुर से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर नालंदा के पास एक गांव से रोज अपनी मोटरसाइकिल से आताजाता था. धीरेधीरे आभा से उस की दोस्ती हो गई.

एक दिन बरसात में भीगते हुए विनय शाम को आभा के घर पहुंचा. आभा ने दरवाजा खोला, तो उसे देख कर कहा, ‘‘तुम इस समय यहां… अंदर आओ.’’

विनय बोला, ‘‘हैडमास्टर साहब ने कहा है कि आज से दफ्तर की चाबी तुम रखोगी. मैं तो दूर से आता हूं, आने में मुझे देर हो जाती है.’’

‘‘वह तो ठीक है, पर तुम तो बिलकुल भीग गए हो. मैं तौलिया देती हूं, बदन पोंछ लो, तब तक मैं चाय बना देती हूं.’’

‘‘हां, तुम्हारे हाथों की चाय पीए बिना जाऊंगा भी नहीं.’’

थोड़ी देर में आभा चाय बना लाई. चाय की चुसकी लेते हुए विनय बोला, ‘‘चाय कड़क बनी है, बिलकुल तुम्हारे जैसी.’’

‘‘मजाक अच्छा कर लेते हो.’’

‘‘मैं एकदम सही बोल रहा हूं. तुम जितनी खूबसूरत हो, चाय भी उतनी ही अच्छी बनाती हो.’’

‘‘अच्छा, बारिश तो थमने का नाम ही नहीं ले रही है. इतनी दूर जाओगे कैसे?’’

‘‘नहीं जाऊंगा. यहीं ठहर जाता हूं.

2 रोटियां आज ज्यादा बना देना.’’

‘‘रोटियां तो 2 की जगह 4 बना दूंगी, मगर तुम यहां रुकोगे कैसे?’’ आभा बोली.

विनय बोला, ‘‘तुम डर गईं. मैं ने तो यों ही कहा था. रोज सुबह गांव में गायबैलों को चारा खिलाना मेरा ही काम है.’’

एक घंटे बाद बारिश थमी, तो विनय चला गया. पर न जाने क्यों आभा सोच रही थी कि काश, बारिश न थमी होती और वह रुक ही जाता, तो कम से कम अकेलेपन का गम तो नहीं सताता.

उस दिन आभा को तनख्वाह मिली थी. शाम को विनय उस के घर आया और बोला, ‘‘तुम्हारी पहली तनख्वाह मिली है. पार्टी तो होनी ही चाहिए,’’ बोल कर विनय ने मिठाई का पैकेट उसे पकड़ा दिया.

आभा बोली, ‘‘बोलो, क्या चाहिए?’’

‘‘मेरे बोलने से क्या मिल जाएगा?’’ इतना कह कर विनय हसरत भरी निगाहों से उसे देखने लगा.

‘‘तुम कभी सीरियस नहीं होते क्या? हमेशा हंसीमजाक के मूड में रहते हो. बैठो, मैं ने आलू के परांठे और मटरपनीर की सब्जी बनाई है. खाने के बाद कौफी बनाती हूं.’’

‘‘तब तो मजा आ जाएगा,’’ विनय ने कहा.

दोनों ने डिनर किया और कौफी पी. रात के 8 बज चुके थे. आभा विनय को छोड़ने बाहर तक आई.

विनय ने मोटरसाइकिल स्टार्ट करनी चाही, पर नहीं हुई. फिर उसे याद आया, तो बोला, ‘‘मैं तो भूल ही गया था कि मोटरसाइकिल रिजर्व में थी और तेल लेना भूल गया था. अब तो यहां पैट्रोल पंप भी बंद हो जाता है. मैं तो घर नहीं जा सकता.’’

दोनों कुछ देर ऐसे ही एकदूसरे को देखते रहे. आभा कुछ बोल नहीं पा रही थी. विनय बोला, ‘‘आज की रात अपने घर में पनाह दे सकती हो क्या?’’

आभा ने न चाहते हुए भी हां में सिर हिलाया. घर में बैड तो एक ही था. उस ने विनय को बैड दे दिया. खुद रसोईघर के पास चटाई पर सो गई. नींद तो दोनों में से किसी को नहीं आ रही थी.

आधी रात में विनय पानी लेने के बहाने रसोईघर में गया, तो रास्ते में जानबूझ कर आभा से टकरा गया.

आभा बोली, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, पानी लेने आया था,’’ और गिलास ले कर उसी के पास बैठ गया.

आभा भी घबरा कर बैठ गई. तब विनय ने उसे लिटा दिया और कहा, ‘‘सौरी, मैं ने तुम्हें भी जगा दिया.’’

आभा मन ही मन सोच रही थी, ‘मैं सोई ही कब थी कि जगाने की जरूरत होगी.’

विनय बोला, ‘‘रात में बंद कमरे में एक मर्द और एक औरत को बंद कर दिया जाए और चुपचाप रहने को कहा जाए, तो यह तो एक कठोर सजा है, तो तुम कुछ बोलो न?’’

‘‘क्या बोलूं?’’

‘‘कुछ अपने बारे में ही बताओ. अपने मायके और ससुराल के बारे में.’’

आभा थोड़ी भावुक हो चली और उठ कर बैठ गई. उस ने भरी आंखों से अपनी कहानी सुनाई.

विनय ने धीरेधीरे उस के कंधे सहलाए, फिर माथे पर एक चुंबन लिया. आभा चुपचाप बैठी रही.

विनय बोला, ‘‘तुम बहुत ही बहादुर हो. तुम्हारी जितनी भी तारीफ करूं, कम होगी,’’ इतना बोल कर वह आभा से सट कर जा बैठा और कुछ देर तक उस के बालों को छेड़ता रहा. फिर उस के गालों को सहलाते हुए उस के होंठों को भी चूम लिया और अपने आगोश में ले लिया.

फिर विनय बोला, ‘‘जी चाहता है कि तुम्हें भरपूर प्यार करूं.’’

आभा के पूरे बदन में तरंगें उठने लगीं. दोनों के सब्र का बांध भी टूट पड़ा. एक अजीब सा दर्द हुआ उसे, पर दर्द और मजे का मधुर मेल उसे बेहद अच्छा लगा. सुबह विनय एक डब्बे में पैट्रोल ले कर आया. मोटरसाइकिल स्टार्ट कर आभा से बोला, ‘‘दफ्तर में बोल देना कि आज मैं नहीं आ पाऊंगा.’’

2 दिन बाद आभास आभा से मिलने आया. उस दिन छुट्टी थी. उस ने आभा से अपना पत्नी धर्म निभाने को कहा, तो वह बोली, ‘‘तुम्हें अक्ल कब आएगी? दिन में इस वक्त?’’

‘‘मुझे तो बस यही वक्त मिला है,’’ बोल कर आभास ने उसे जबरन खाट पर लिटा दिया. अपना पति हक हासिल कर वह बोला, ‘‘ला, अपनी तनख्वाह दे मुझे. बापू ने मांगी है.’’

आभा बोली, ‘‘कुछ तो मैं अपनी मां को दूंगी और कुछ अपने खर्च के लिए रखूंगी. बाकी पैसे देती हूं. ससुरजी को दे देना.’’

आभास ने जबरन और पैसे छीनने चाहे, तो वह गरज उठी, ‘‘इस के आगे कोई हरकत की, तो पुलिस को बुलाऊंगी और अभी शोर मचाऊंगी.’’ जितने पैसे आभा दे रही थी, उतने लेना ही आभास ने ठीक समझा. वह जाने लगा, तो आभा बोली, ‘‘पैसे के लिए तुम्हें दोबारा यहां आने की जरूरत नहीं है. मैं ससुरजी के अकाउंट में भेज दिया करूंगी.’’

आभास चला गया. उस के बाद लौट कर वह आभा के पास नहीं आया. आभा और विनय का मिलनाजुलना चलता रहा. आभा को उस से कोई शिकायत नहीं थी. बीचबीच में वह अपनी मां के यहां जाती थी. मां जब ससुराल का हाल पूछतीं, तो बोल देती कि सब ठीक है.

आभा 2-3 बार अपनी ससुराल भी गई, तो पता चला कि आभास ज्यादातर घर से बाहर ही रहता है. घर में बोलता था कि आभा के पास जाता रहता है.

इसी तरह तकरीबन 2 साल बीत गए. विनय के साथ उस का रिश्ता उसी तरह चलता रहा.

आभा की तबीयत कुछ गड़बड़ चल रही थी. वह लेडी डाक्टर के पास गई, तो पता चला कि वह पेट से है.

आभा ने विनय से कहा, तो वह उसे ही समझाने लगा, ‘‘तुम्हें सावधानी बरतनी चाहिए थी. अब भी वक्त है, तुम अपना बच्चा गिरवा लो.’’

‘‘क्यों? तुम अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हो. इसे हम दोनों को मिल कर हल करना होगा. मैं बच्चा नहीं गिरवा रही. क्यों न हम दोनों कोर्ट मैरिज कर लें? आभास का कोई अतापता नहीं. मैं उस से तलाक ले लूंगी.’’

‘‘हमारी शादी नहीं हो सकती?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘इसलिए कि मैं शादीशुदा हूं. मेरे बीवीबच्चे हैं.’’

‘‘पर, तुम ने तो कहा था कि घर पर सिर्फ तुम्हारे बूढ़े मातापिता हैं.’’

‘‘सच बोलने पर क्या तुम अपने पास आने देतीं?’’

‘‘तो क्या मैं तुम्हारे मनोरंजन का साधन थी?’’

‘‘तुम जो भी समझो. मैं इस बच्चे का बाप नहीं हो सकता. मैं तो तुम्हारी जिस्मानी जरूरतें पूरी कर रहा था.’’

(क्रमश:)

क्या आभा ने विनय के बच्चे को जन्म दिया? क्या आभास से उस का रिश्ता निभ पाया? पढि़ए अगले अंक में.

बेटी और बहू आखिर अब भी एकसमान क्यों नहीं

अभी भी कुछ परिवार बहू को अपनी संपत्ति समझते हैं. कमाऊ लड़की के साथ अपने बेटे का विवाह उस के ऊंचे पैकेज के लालच में कर लेते हैं. शादी के बाद पति और घर वाले बहू के बैंक अकाउंट पर अपना अधिकार समझते हुए उस की आय और व्यय का हिसाबकिताब रख कर उस पर अपना अधिकार दिखाते हैं. कुछ लड़कियां तो ससुराल वालों के दबाव में आजीवन दुखी रहती हैं पर अधिकतर इस तरह के अनावश्यक प्रतिबंध एवं दबाव को स्वीकार नहीं करतीं.

इस विषय में रांची, झारखंड की मनु जो पेशे से फोटोग्राफर हैं, कहती हैं, ‘‘बहू ससुराल की संपत्ति भला क्यों है? वह कोई वस्तु नहीं है वरन उस का अपना स्वतंत्र वजूद है. अब जितनी जिम्मेदारी अपने ससुराल के लोगों के प्रति बनती है उतनी ही अपने मांबाप के प्रति भी. हम दोनों पतिपत्नी का आपस में स्पष्ट समझौता है. यदि मैं ने उन के परिवार को अपनाया है, तो उन्होंने मुझे और मेरे परिवार को. दोनों परिवारों के बीच बहुत अच्छा रिश्ता और तालमेल है. न कोई झगड़ा न झंझट.’’

मुंबई की सुभी, जो इंटरनैशनल स्कूल में अध्यापिका हैं, का विचार है कि बहू को ससुराल की संपत्ति कहना तर्कसंगत नहीं है परंतु विवाह के बाद ससुराल के प्रति उस की जिम्मेदारी अधिक हो जाती है, क्योंकि अब वह उस परिवार की सदस्य बन कर वहां रह रही होती है. इसीलिए स्वाभाविक तौर पर उस परिवार के सदस्यों के प्रति अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह हो जाती है.

इलाहाबाद की 60 वर्षीय गृहिणी रंजना, जो 2 बहुओं की सास हैं, अपना अनुभव बताते हुए कहती हैं कि आजकल की बहू के साथ आप जोरजबरदस्ती या अधिकारपूर्वक कोई भी काम नहीं करवा सकते. आप को उसे प्यार, स्नेह और इज्जत देनी पड़ेगी. तभी बहू आप की इच्छानुसार कोई काम करेगी. इस का सब से बड़ा कारण यह है कि उस का पति उस के उचितअनुचित निर्णयों के पक्ष में हर समय उस के साथ खड़ा रहता है. आज की बहू शिक्षित है, आत्मनिर्भर है और आजाद खयालात की है, इसलिए आप को उस की इच्छानुसार अपने को बदलना होगा.

हम लोगों के समय में तो पति अपनी मां के इशारे पर ही चलते थे. अब स्थितियां बदल रही हैं, जो लड़कियों के लिए सकारात्मक पक्ष है.

यही कारण है कि आजकल कई लड़कियां अपने मायके की पूरी जिम्मेदारी उठा रही हैं. अब अकसर सुनने या पढ़ने में आने लगा है कि बेटी ने अपने माता या पिता का अंतिम संस्कार संपन्न किया या कामकाज संभाल लिया.

बहू को ससुराल की संपत्ति कहना उचित नहीं है. वह उस परिवार के एक सदस्य की तरह वहां की जिम्मेदारी भी निभा रही है. आज स्त्री आत्मनिर्भर एवं शिक्षित होने के कारण अपने फैसले स्वयं लेने में सक्षम है. इसीलिए अब कोई भी उसे अपनी संपत्ति समझता है, तो यह उस की भूल ही होगी.

हमारे समाज में लड़की को उस के अपने घर की पहचान का संकट आजीवन झेलना पड़ता है. मांबाप के घर जहां वह जन्म लेती है, वहां यही सुनती हुई बड़ी होती है कि बेटी को तो पराए घर जाना है और फिर जब वह ससुराल आती है तो सुनती है कि अपने घर से यही सीख कर आई हो?

समझदारी से बदलें सोच

लड़की के लिए नया परिवार, नए लोग, रीतिरिवाज, आचारविचार, वहां का खानपान आदि के साथसाथ तालमेल का भी संकट रहता है. वहां उसे अनेक समझौते करने पड़ते हैं. मगर लड़की को अपने निजत्व एवं स्वत्व को नहीं भूलना चाहिए. अपने भविष्य एवं व्यक्तित्व के अनुसार वह अपना जीवन खुल कर जीना चाहती है. वह अपने फैसले खुद ले रही है, इसलिए मात्र अपने घर के लिए कुंठा के साथ समझौता करने की कोई आवश्यकता नहीं है. आज वह पुरुषों से कहीं कमतर नहीं है. इसलिए उसे यह सोचने या चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है कि कोई क्या कहेगा? वह उसी भवन के प्रांगण में अपना एकल घर बना सकती है.

जिस पुरुष के साथ वह अपना जीवन बिताना चाह रही है, उस के घर के अंदर अपना घर बना कर रहना किसी तरह से गलत नहीं है वरन यह उस का अधिकार है.

आखिर बड़ेबुजुर्गों को भी तो आजादी से जीने का अधिकार है. उन्होंने जो अपने सपनों का घरौंदा सजाया है उस में बहू की घुसपैठ या दखलंदाजी हो सकता है उन्हें रुचिकर न लगे. इसलिए बहू स्वतंत्ररूप से उसी जगह अपना एकल घर बना कर प्रसन्नतापूर्वक रह सकती है.

ससुराल वालों को भी लचीला रुख रखते हुए यह समझना चाहिए कि अब यह घर आने वाली बहू का अपना घर है ताकि वह उस घर को अपना घर महसूस कर सके.

लड़की के लिए यह कतई आवश्यक नहीं है कि वह अपने सासससुर के ही साथ रहे. वह उसी घर में अपना एकल घर बना कर आजादी से रह सकती है. यदि साथसाथ रहने में परेशानी है, दोनों के विचार आपस में मेल नहीं खा रहे तो उचित यही होगा कि अपना अलग घर बना कर रहे ताकि आपसी रिश्ते मधुर बने रहें.

यदि आप की जीवनशैली या दिनचर्या से सासससुर को शिकायत है और उन के तरीके से उलझन है तो संयुक्त रूप से साथसाथ रहने का क्या लाभ? उदाहरणस्वरूप वे चाहते हैं कि बहू सुबह नहाधो कर ही किचन में जाए और वह आप को पसंद नहीं है तो अच्छा यही होगा कि न आप उन्हें दुखी करे और न स्वयं हों. उन के जीवन में अनावश्यक रूप से अशांति पैदा करने की कोशिश न करें. अपना घर बना कर प्रसन्नतापूर्वक रहें. परंतु अपनी जिम्मेदारियों से कभी न मुंह मोड़ें. आवश्यकता पड़ने पर बिन संकोच उन की सहायता के लिए तत्पर रहें. उन्हें पूरा आदरसम्मान दें.

मुंबई में एक बड़ा स्वस्थ एवं उत्तम उदाहरण देखने को मिला. वहां मांबाप और बेटाबहू एक ही बिल्डिंग में अलगअलग फ्लैट में रह रहे थे. बच्चे जब स्कूल से लौट कर आते तो दादी के पास खाना खाते और वहां रहते और रात का खाना सब एकसाथ बेटे के घर में बैठ कर खाते और बातचीत करते.

इस समय आवश्यकता है स्वस्थ मानसिकता की, समय के साथ स्वयं को बदलने की. आज शिक्षित कार्यशील महिलाओं का कार्यक्षेत्र बढ़ गया है. उन के पास अनेक समस्याएं हैं. वे घर में आजादी और सुकून की सांस लेना चाहती हैं. उन से यह आशा करना कि वे सासससुर के इशारे पर चलें तो यह अब संभव नहीं है.

बदल रहा माहौल

आज यदि बहू शिक्षित है तो सासससुर भी शिक्षित हैं. वे माहौल के बदलते रुख को समझ रहे हैं. इसीलिए अब पहले जैसी तकरार देखने को नहीं मिलती वरन सासबहू का आपसी प्यार और एकदूसरे की निजता के प्रति सम्मान एवं समझदारी के कारण आपसी रिश्ते में मधुरता देखने को मिलती है.

जब कोई भी लड़की शादी कर के ससुराल जाती है तो ऐसा नहीं होता कि सिर्फ वही बदलती है. वह ससुराल के रीतिरिवाजों को सीखती है और साथसाथ अपने संग लाए संस्कारों को भी परिलक्षित करती है. जब वह पति के साथ गृहस्थी बसाती है, तो दोनों परिवारों के संस्कारों का संगम होता है. उस परिवार में बहू की सोच का भी प्रभाव पड़ता है.

लड़की कोई वस्तु नहीं है कि उसे संपत्ति कहा या समझा जाए. ससुराल पक्ष के लोग भी यह अच्छी तरह समझते हैं कि आधुनिक आत्मनिर्भर लड़कियों पर अधिकारपूर्वक शासन करना संभव नहीं है. इसलिए इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उन से पहले जैसी अपेक्षाएं भी नहीं रखते.

ससुराल पक्ष समय की हवा के बदलते रुख को पहचान कर अब बेटी और बहू के बीच भेदभाव को त्याग कर समान रूप से लाड़प्यार और देखभाल कर रहे हैं. आज अनेक परिवारों में देखने को मिलता है कि शादी के बाद ससुराल वालों ने बहू को उस की रुचि के अनुरूप कैरियर बनाने के लिए प्रेरित कर के उसे अपने पैरों पर खड़े होने में सहयोग दिया.

समाज में लोगों की सोच में बदलाव आ रहा है. यह एक अच्छा संकेत है. हमें इस बदलाव का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए और आज यही समय की मांग है.

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