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सांवली सूरत पर भेदभाव क्यों, क्या आपके पास इसका जवाब है

ब्रिटेन में एक युगल को गोद लेने का अधिकार खोना पड़ा, क्योंकि वह युगल सिख है और भारतीय मूल का है. वह युगल गोरे बच्चे को गोद लेना चाहता था, लेकिन गोद एजेंसी के अधिकारियों ने सिख युगल से भारत में ही किसी बच्चे को गोद लेने को कहा.

ऐसा नहीं है कि इंटररेशियल गोद लेने पर पाबंदी है. सैकड़ों भारतीय बच्चे गोरे मातापिताओं की गोदों में जा कर यूरोप व अमेरिका में रह रहे हैं और उन की भाषा, व्यवहार, सोच बिलकुल वहां के वातावरण की तरह है, क्योंकि वे बचपन से उसी माहौल में रह रहे हैं.

प्रश्न है कि वह सिख दंपती आखिर क्यों गोरा बच्चा ही गोद लेना चाहता था? अगर उस का कारण अपनी नस्ल सुधारना नहीं है तो क्या है?

हम भारतीय आमतौर पर गोरों की रंगभेद नीति का पुरजोर विरोध करते हैं पर जो भेदभाव हमारे यहां गोरेकाले में है वह शायद अमेरिका में भी नहीं है, जहां काले अफ्रीका से गुलामों की तरह लाए गए थे.

हमारे देश में निम्न जातियों में अधिकांश काले ही हैं और हमारे गोरेपन के पागलपन के पीछे कारण यह है कि काले को नीची जाति का समझा जाता है. अगर ऊंची जातियों में आनुवंशिक कारणों से काले रंग का बच्चा पैदा हो जाए तो उसे जीवन भर हीनभावना से ग्रस्त रहना पड़ता है और यह उस के मानसिक व आर्थिक विकास में आड़े आता है. उसे आमतौर पर साक्षात्कारों में कम अंक मिलते हैं. विवाह के समय तो रंग काफी महत्त्व की बात मानी जाती है.

सांवली सूरत मोहक नहीं होती, ऐसा नहीं है. कुछ समय पहले तक देश की अधिकांश नर्तकी वेश्याओं का रंग काला ही होता था, क्योंकि वे उन जातियों से आती थीं जहां काले रंग वाले ही होते थे. दक्षिण भारत से कितने ही मेधावी विचारक, वैज्ञानिक, लेखक काले थे पर फिर भी उन्हें गोरों के मुकाबले की जगह नहीं मिली.

ब्रिटेन के सिख युगल को एक तरह से सही उत्तर दिया गया कि जो समाज इतना रंगभेदी है, उसे भला गोरे क्यों प्रोत्साहित करें. फिर गोरे खुद भी तो रंगभेद में विश्वास करते हैं. सदियों से साथ रहने के बावजूद वे कालों को अपने में मिलाने को तैयार नहीं हैं.

आप के सपनों की राजकुमारी : आप की जिंदगी में भी है कोई ऐसी लड़की

अश्विनी काफी अपसेट थी. अविनाश ने जब उस से कई बार पूछा तो आखिर उस ने रोतेरोते बताया कि जानते हो, पापा ने मेरे लिए लड़का देखा है. कल हमारा रिश्ता भी पक्का होने वाला है. अविनाश ने उस से कहा कि अरे, यह तो खुशी की बात है. इस में रोने की क्या जरूरत है? तुम्हें तो हमें मिठाई खिलानी चाहिए. अश्विनी नाराज हो कर बोली कि तुम्हें तो मिठाई की पड़ी है, यहां मेरी जान निकल रही है. मैं तो सिर्फ और सिर्फ तुम से शादी करना चाहती हूं किसी और से नहीं.

अश्विनी की बात सुन कर अविनाश हैरान रह गया. उस ने तो अश्विनी के बारे में ऐसा कभी सोचा भी नहीं था, लेकिन यह भी सच था कि वह दिन में जब तक एक बार उस से बात नहीं कर लेता तब तक उसे चैन नहीं पड़ता था. और यह भी सच था कि अश्विनी ने उस के अच्छेबुरे समय में हमेशा साथ दिया था. अविनाश ने उसे ढांढ़स बंधाते हुए कहा कि तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे पापा से अपने पापा की अभी बात करवाता हूं.

बात बन गई. अश्विनी के पापा तुरंत मान गए, क्योंकि एक तो अविनाश जानापहचाना लड़का था, ऊपर से अच्छा पढ़ालिखा और कमाऊ भी. लेकिन कई बार यह सब इतना सहज नहीं होता और जब तक बात संभल पाती है, तब तक गाड़ी छूट जाती है.

कई बार आप ध्यान नहीं दे पाते, लेकिन एक लड़की आप की जिंदगी में होती है. चाहे वह आप के पड़ोस में हो, क्लासमेट हो या फिर औफिस कलीग. आप लगभग हर दिन उस से मिलते और बात भी करते हैं, लेकिन आप जिसे जस्ट फ्रैंड समझते हैं, वही दरअसल आप की गर्लफ्रैंड होती है और उस में लाइफपार्टनर मैटीरियल भी होता है. यदि आप की जिंदगी में भी है कोई ऐसी लड़की तो जरा ध्यान दें, कहीं वह कुछ ऐसा तो नहीं करती :

–  जब आप किसी मुसीबत में हैं या उदास रहते हैं, तो वह आप से बारबार उदासी का कारण पूछती है. आप खाने के मूड में नहीं रहते, लेकिन आप को जबरन खिलाती है. चाहे अपने टिफिन बौक्स से खिलाए या फिर किसी रेस्तरां में ले जा कर. आप को तरहतरह के अल्टरनेट सजेशन भी देती है और धैर्य रखने की सलाह भी.

–  वह युवती अपनी किसी भी प्रौब्लम से आप को परेशान नहीं करना चाहती. घर में, औफिस में या फिर कौलेज में तमाम समस्याओं से रूबरू होने के बावजूद उस ने आप को कभी इनवौल्व नहीं किया. जब भी आप को बताया, मुसीबत का समय बीतने के बाद बताया.

–  आप ने महसूस किया होगा कि आसपास के युवक भले ही उस पर कितना भी मरते हों, चाहे जितने डोरे डालें, लेकिन वह किसी को खास अहमियत नहीं देती. वहीं, आप के प्रति उस के मन में न सिर्फ सौफ्ट कौर्नर रहता है बल्कि वह आप से बातचीत करने या आप के साथ दो बातें करने के मौके तलाशती रहती है.

–  आप उस के सामने दूसरी युवतियों से बातचीत करते हैं या उन से मिलते हैं, इस के बावजूद वह आप को पूरा स्थान देती है. भले ही उसे यह सब पसंद नहीं आता, लेकिन उस ने आज तक आप को टोका नहीं. हां, उस के चेहरे पर आप ने एक इनसिक्योर फीलिंग जरूर देखी होगी. इन सब के बाद भी वह घर लौटते वक्त या जौब पर या कालेज जाते वक्त आप का साथ ढूंढ़ती है.

–  कई बार आप किसी कंसर्ट या मूवी शो में जाने का प्रोग्राम सिर्फ इसलिए कैंसिल कर देते हैं कि आप के पास फाइनैंस की प्रौब्लम है. ऐसे में वह जबरदस्ती आप को पैसे थमा देती है या फिर खुद साथ चलने का औफर देती है. बाद में जब आप पैसे लौटाने की कोशिश करते हैं, तो वह आप के लाख कहने के बावजूद पैसे वापस नहीं लेती.

–  आप के हर झूठ को वह बेहद सहजता से स्वीकार कर लेती है, जबकि उसे पता होता है कि आप झूठ बोल रहे हैं और आप को भी पता है कि उसे वास्तविकता मालूम है. वह ऐसा सिर्फ इसलिए करती है कि आप के साथ उस का किसी प्रकार का तर्कवितर्क न हो. इसे उस का आप के प्रति समर्पण ही मानिए.

–  आप उस का स्मार्टफोन हाथ में ले कर उस के सोशल मीडिया अकाउंट्स, व्हाट्सऐप मैसेज, एसएमएस या कौल हिस्ट्री चैक करते हैं, तो वह कुछ नहीं कहती. आप पूछेंगे तो अपना पासवर्ड तक बता देगी. क्या यह आप को टू बी पार्टनर मैटीरियल से कम लगता है?

–  क्या आप ने कभी सोचा है कि आप अपनी कोई भी सुखदुख की बात अनजाने में ही सब से पहले उस के ही साथ शेयर करते हैं. जब तक आप उस को कौल या मैसेज कर के समाचार नहीं दे देते तब तक आप को सुकून नहीं मिलता. जब आप उदास होते हैं या किसी से झगड़ा हो जाता है, तब भी आप उसी को सब से पहले फोन करते हैं और वह आप की हर खुशी या दुख में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं.

– उस के अपनेपन और सैल्फलैस स्वभाव की प्रशंसा आप मन ही मन कई बार कर चुके हैं. कई बार आप की मां या भाईबहन भी कह चुके हैं कि इसे बड़ी परवा है तेरी. कभी आप उस की तुलना अपने किसी दूसरे फ्रैंड्स से कर के देखिए, आप उस का पलड़ा सदैव भारी पाएंगे.

–  आप ने कई बार मूड औफ रहने की स्थिति में उस के साथ बहुत गुस्से से बातचीत की है और उसे झिड़क भी दिया है, लेकिन उस ने कभी पलट कर आप से झगड़ा नहीं किया. हो सकता है उस वक्त आप के गुस्से से मायूस या रोंआसी हो कर वह चली गई हो, लेकिन अगले ही दिन वह वापस आप के पास आ गई या खुद उसी ने फोन कर के पूछा, ‘अब मूड ठीक है? मुझे पता है कि गुस्सा जनाब की नाक पर रहता है.’ ऐसे में आप अपनी बेरुखी पर शर्मिंदा हो जाते हैं.

अगर वाकई कोई ऐसी युवती आप के आसपास मौजूद है तो उसे अपना जीवनसाथी बनाने का मौका न गंवाएं.

गांवों की मूर्तियों पर टिकी चोरों की नजर

3 जुलाई, 2017 को बिहार के मधुबनी जिले के राजनगर थाना क्षेत्र के सिमरी गांव के रामजानकी मंदिर से राम, जानकी और लक्ष्मण की अष्टधातु से बनी सैकड़ों साल पुरानी मूर्ति पर चोरों ने हाथ साफ कर डाला. उस मूर्ति को खोजने के लिए पुलिस पूरे मधुबनी जिले में डौग स्क्वाड ले कर दरदर भटकती रह गई, लेकिन चोरों का कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस अफसरों का मानना है कि मूर्ति चोरी के मामलों में जांच के लिए माहिर होने चाहिए, जो केवल सीबीआई के पास हैं.

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, गिरोह के लोग चावल, दाल जैसे अनाज के बोरों में मूर्तियों को छिपा कर ले जाते हैं. इतना ही नहीं, मूर्ति चुराने में चोर काफी सावधानी बरतते हैं. वे रबड़ के दास्ताने पहन कर मूर्तियां उठाते हैं. प्लास्टिक की चादर पर पीओपी छिड़क कर उसे रबड़ की ट्यूब में पैक किया जाता है. उस के बाद उसे कार्बन शीट से लपेट दिया जाता है. इस से मूर्ति के बारे में मैटल डिटैक्टर से भी पता नहीं चल पाता है.

मूर्ति चोर गिरोह 3 लैवलों पर काम करते हैं. पहला होता है, लोकल अपराधी गिरोह. दूसरा होता है मिडिलमैन, जो सारी चीजें मैनेज करता है. उस के बाद खरीदार की बारी आती है, जो ज्यादातर देश के बाहर होते हैं.

मिडिलमैन ही पुरानी मूर्तियों की रेकी और इंटरनैशनल मार्केट में उस की कीमत का आकलन करता है. वही विदेशी खरीदारों के संपर्क में रहता है.

मिडिलमैन ही लोकल अपराधी से मिल कर मूर्ति को चुराने का काम कराता है और इस के एवज में चोर को 50 हजार से एक लाख रुपए तक दिए जाते हैं.

मिडिलमैन को 5 से 10 लाख रुपए मिलते हैं और विदेशों में बैठे तस्कर उन मूर्तियों को करोड़ों रुपए में बेचते हैं. बिहार से सटे नेपाल के विराटनगर और काठमांडू में ऐसे खरीदारों और चोरों का अड्डा है.

कुछ समय पहले अररिया पुलिस ने यादव नाम के एक अपराधी को पकड़ा था, जिस का काम चोरी की मूर्तियों का धंधा करना था.

उस चोर ने ही पुलिस को बताया था कि बिहार और उत्तर प्रदेश के मंदिरों से मूर्तियों को चुरा कर कुछ दिनों के लिए जमीन में गाड़ कर रख दिया जाता है. पुलिस की जांच धीमी पड़ने के बाद मूर्ति को निकाल कर नेपाल पहुंचा दिया जाता है. चोरी की गई ज्यादातर मूर्तियों की खरीदफरोख्त नेपाल में ही होती है.

बिहार सरकार के होश पिछले साल तब उड़ गए थे, जब बिहार के जमुई जिले के खैरा गांव से चोरों ने महावीर की 26 सौ साल पुरानी ऐतिहासिक मूर्ति गायब कर दी थी.

ब्लैक स्टोन से बनी महावीर की मूर्ति की कीमत इंटरनैशनल मार्केट में करोड़ों रुपए की है. चोरों की खोज में पुलिस ने ताबड़तोड़ छापामारी की, लेकिन वे हाथ नहीं लगे.

6 दिसंबर की सुबह जुमई के ही बिछबे गांव के दरगाही पोखर के पास सड़के के किनारे एक बोरा पड़ा मिला. लोगों को शक हुआ कि कहीं बोरी में किसी की लाश तो नहीं है?

जब बोरा खोला गया, तो उस में महावीर की मूर्ति नजर आई. गांव के मुखिया नरेंद्र कुमार यादव को जब इस बारे में बताया गया, तो उन्होंने पुलिस को सूचना दी.

जमुई से महावीर की कीमती मूर्ति चोरी होने के बाद जैनियों की श्वेतांबर सोसाइटी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मूर्ति की बरामदगी के लिए इंटरनैशनल दबाव डालना शुरू कर दिया.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले को ले कर पुलिस हैडक्वार्टर के अफसरों की क्लास लगा दी. उधर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात की.

खैरा थाना क्षेत्र के गरही में सीआरपीएफ की 215 बटालियन के अफसरों और खैरा थाने के अध्यक्ष रामनाथ राय की अगुआई में पुलिस के जवानों ने हरखार पंचायत के दीपाकरहर, रजला, सिरसिया, काली पहाड़ी और रोपावेल समेत आसपास के दर्जनों गांवों में मूर्ति ढूंढ़ने की मुहिम चलाई  थी.

पुलिस की दबिश से घबरा कर तस्करों ने 2 टन वजनी मूर्ति को छोड़ कर भागने में ही अपनी भलाई समझी और मूर्ति को बरामद कर सरकार और पुलिस ने अपनी लाज बचा ली.

जुमई जिले के लछुआर इलाके से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी पर मशहूर जैन मंदिर है. इस मंदिर में कुल 20 छोटीबड़ी मूर्तियां हैं, जिन में से सब से बड़ी मूर्ति 24वें तीर्थंकर महावीर की है. यह मूर्ति मंदिर के बाहरी भाग में थी और बेशकीमती होने के बाद भी उस की हिफाजत का कोई ठोस इंतजाम नहीं किया गया था.

इस मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि 26 सौ साल पुरानी महावीर की इस मूर्ति की स्थापना महावीर के घर छोड़ने के बाद उन के बड़े भाई नंदीवर्धन ने की थी.

इस मंदिर को देखने के लिए हर साल तमाम विदेशी सैलानी आते हैं. इस के बाद भी सरकार और जिला प्रशासन ने मूर्ति की हिफाजत का कोई खास इंतजाम नहीं किया था.

चोरी की सब से ज्यादा वारदातें नालंदा, नवादा और गया जिले में हुई हैं. साल 2015 में 13 मूर्तियों की चोरी हुई, जबकि साल 2014 में 28. साल 2013 में चोरों ने 65 ऐतिहासिक मूर्तियों पर हाथ साफ किया, तो साल 2012 में 62 मूर्तियां गायब की गईं. साल 2011 में चोरों ने 30 मूर्तियों की चोरी कर उन्हें ठिकाने लगा डाला. इन मूर्तियों का पता लगाने में पुलिस अभी तक नाकाम रही है.Crime story hindi

पिछले साल मूर्ति चोरी की वारदातों में तेजी से हुए उछाल के बाद सरकार की नींद टूटी थी और उस के बाद से अब तक वह ऐतिहासिक मूर्तियों की हिफाजत के पुख्ता इंतजाम करने का केवल ढिंढोरा पीट रही है  पुलिस हैडक्वार्टर ने ऐसे मामलों में शामिल सभी आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तारी का आदेश जारी किया

है. साथ ही, इस तरह के मामलों के अनुसंधान का जिम्मा आर्थिक अपराध इकाई यानी ईओयू को सौंपा गया है. अब तक ऐसे मामलों की जांच सीआईडी करती थी. आर्थिक अपराध इकाई यानी ईओयू के आईजी जितेंद्र सिंह गंगवार ने बताया कि ऐतिहासिक मूर्तियों की हिफाजत के लिए सभी जिलों के एसपी को मुस्तैद रहने को कहा गया है. तस्करों के नैशनल और इंटरनैशनल नैटवर्क का पता लगाने और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए स्पैशल टीम बनाई गई है.

18 जुलाई, 2016 को औरंगाबाद जिले के गोह इलाके में पुलिस ने 10 मूर्ति तस्करों को दबोच लिया था. पुलिस का दावा है कि जमुई से महावीर की मूर्ति चोरी में इसी गिरोह की भागीदारी रही थी.

गोह थाना क्षेत्र के मरही धाम मंदिर से सिंहवासिनी देवी और भृगु ऋषि की हजारों साल पुरानी मूर्तियों को चुराने के बाद गिरोह के लोग उन्हें बेचने की कोशिशों में लगे हुए थे.

सिंहवासिनी देवी की मूर्ति को गया जिले के आंती थाना क्षेत्र से बरामद कर लिया गया, जबकि दूसरी मूर्ति को बेचने के लिए राज्य से बाहर भेज दिया गया था. बिहार के औरंगाबाद जिले में पकड़े गए एक मूर्ति चोर ने पुलिस को बताया कि उस का इंटरनैशनल मूर्ति तस्करों से संबंध है. मूर्ति चोरी को अंजाम देने से पहले वे लोग देशभर के मंदिरों में घूमघूम कर देवीदेवताओं की मूर्ति के फोटो मोबाइल फोन से लेते हैं. इस के बाद सोशल मीडिया के जरीए मूर्तियों के फोटो विदेशों में बैठे खरीदारों को भेज देते हैं.

फोटो देखने के बाद विदेशी खरीदार अपनी पसंद की मूर्तियों के लिए काम करने का आदेश देते हैं.

21 जनवरी, 2017 को समस्तीपुर के मुसरीघरारी थाना क्षेत्र के हरपुर एलौथ के वार्ड नंबर-7 में रामजानकी मंदिर पर चोरों ने अपना हाथ साफ कर दिया. अष्टधातु से बनी सीता और लक्ष्मण की मूर्तियों को चुरा कर चोरों ने पुलिस को खुली चुनौती दे डाली.

6-6 किलो की इन दोनों मूर्तियों की कीमत इंटरनैशनल मार्केट में 20 लाख रुपए आंकी गई है.

मुजफ्फरपुर के बरियारपुर ओपी क्षेत्र के जोगनी जागा गांव में 10 जनवरी, 2017 की रात को चोरों ने रामजानकी मंदिर का ताला तोड़ कर अष्टधातु की 5 मूर्तियां और चांदी के 2 मुकुट चुराए और चंपत हो गए. 11 जनवरी की सुबह जब पुजारी मंदिर में पूजा करने पहुंचे, तो उन्होंने मंदिर का ताला टूटा देखा.

पंडित रामप्रीत झा ने थाने में शिकायत दर्ज कराई. मौके पर पहुंचे डीएसपी मुत्तफिक अहमद ने बताया कि मंदिर से कृष्ण, गणेश, विष्णु, हनुमान और छोटा गोपाल की मूर्तियां चोरी हुई हैं. इन की कीमत तकरीबन 10 लाख रुपए आंकी गई है.

ये कैसा मुखौटा ओढ़ बैठी हैं बौलीवुड की लैला

बौलीवुड की लैला के नाम से मशहूर हुई ये अभिनेत्री इन दिनों चेहरे पर अजीब सा लेप लगाए तस्वीरें खिंचवा रही हैं. इस लेप लगे चेहरे के पीछे आखिर कौन सी अदाकारा है, ये पहचानना आपके लिए मुश्किल हो सकता है. पहले तो हम आपको ये बता दें कि ये अजीब तस्वीर खुद बौलीवुड की अभिनेत्री ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट इन्स्टाग्राम पर शेयर की है. जिसे देखने के बाद लोगों से तरह-तरह के रिएक्शन मिल रहे हैं.

चलिए आपको बता ही देते हैं कि ये लैला आखिर है कौन. ये खूबसूरत अदाकारा और कोई नहीं, बौलीवुड में अपने ठुमकों से धूम मचा चुकी सनी लियोन हैं. अब आपके मन में ये सवाल आ रहा होगा कि आखिर उन्होंने चेहरे पर ये कैसा मास्क लगाया हुआ है.

Trying to find my inner zen!!!

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असल में ये मेकअप एक तरह से चेहरे को बदलने के लिए किया जाता है. इस मेकअप को प्रोस्थेटिक मेकअप कहा जाता है. इसकी मदद से चेहरे में आसानी से बदलाव लाया जा सकता है. सनी ने इस मेकअप के साथ अपनी तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है, ‘मैं इन दिनों कुछ ऐसा कर रही हूं, जो आपने पहले नहीं देखा होगा. ये है प्रोस्थेटिक मेकअप, मेरे नए प्रोजेक्ट के लिए.’

Something like you have never seen before – prosthetics for my next amazing project ? #SunnyLeone

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बता दें कि सनी से पहले इस तरह का मेकअप कई सेलेबस इस्तेमाल कर चुके हैं, जिसमें अमिताभ बच्चन का भी नाम आता है. अमिताभ ने ये मेकअप उनकी फिल्म ‘पा’ के लिए किया था. जिसमें उन्होंने प्रोजेरिया से ग्रसित बच्चे की भूमिका निभाई थी.

इस फिल्म के दौरान उन्हें रोजाना मेकअप करने के लिए घंटो बीत जाते थे. इस मेकअप को लगाने से लेकर उतारने तक कई घंटों का समय लगता है. अमिताभ के बाद अब सनी लियोन ने इस मेकअप को करने की ठानी है.

आखिर शाहरुख अपनी पत्नी को लेकर क्यों हो गए थे असुरक्षित

बौलीवुड के किंग खान शाहरुख खान फिल्मी लाइफ में ही नहीं असल जिंदगी में भी रोमांटिक हीरो हैं. शाहरुख को गौरी से तब प्यार हुआ था जब उनके बौलीवुड करियर की ठीक से शुरुआत भी नहीं हुई थी. शाहरुख खान और गौरी खान आज बौलीवुड के हैप्पी कपल में से एक हैं.

शादी के 25 साल होने के बाद भी दोनों का प्यार आज भी वैसा ही है जैसा कि शादी से पहले था. लेकिन क्या आप जानते हैं गौरी नहीं चाहती थीं कि शाहरुख एक्टिंग करें. आपको नहीं पता था ना कोई बात नहीं चलिए आज हम आपको बताते हैं इस बारें में.

यह वाकया तब का है जब शाहरुख खान अपने सपनो को सच करने के लिये संघर्ष कर रहे थे. उन  दिनों शाहरुख और गौरी रिलेशन में थे. गौरी उस समय इस बात से भी परेशान रहती थीं कि उनका परिवार उनके दूसरे धर्म वाले लड़के को कैसे अपनाएंगे. उसी दौरान जब गौरी ने दिल्ली के लेडी श्रीराम कौलेज से फैशन डिजाइनिंग का कौर्स कर लिया था और शाहरुख के साथ रिलेशन को भी 5 साल हो चुके थे. तब शाहरुख को टीवी सीरियल दूसरा केवल और दिल दरिया में काम करने का मौका मिला था.

एक तरफ शाहरुख अपने एक्टिंग करियर को संवारने में लगे थे तो दूसरी तरफ शाहरुख के बारे में घर में बताने को लेकर गौरी परेशान रहती थीं. ऐसे में शाहरुख व्यस्त रहने लगे और गौरी को समय नहीं दे पाते थे तब गौरी नहीं चाहती थीं की शाहरुख एक्टिंग करें.

एक मैगजीन में शाहरुख खान ने उन दिनों के बारे में बताते हुए कहा है कि उस समय गौरी के लिए मेरी दीवानगी बेहद बढ़ने लगी थी, अगर वो स्विमसूट पहनती या अपने बाल खुले रखती तो मैं उससे लड़ता था. मेरे अंदर असुरक्षा की भावना आ गई थी क्योंकि हम ज्यादा मिल नहीं पाते थे और अपने रिश्ते के बारे में बात भी नहीं कर पाते थे.

लेखक मुश्ताक शेख की किताब ‘Shah Rukh Can: The Life and Times of Shah Rukh Khan’ के मुताबिक उस समय शाहरुख गौरी से कहते थे कि मैं यह नहीं कहता कि मेरे साथ बैठो, बस दूसरों के साथ मत बैठो.

खैर, 25 अक्टूबर 1991 को शाहरुख खान और गौरी की शादी हो गई थी. शाहरुख खान आज भी गौरी खान के दीवाने हैं. वो एक पर्फेक्ट हसबैंड होने के साथ साथ पर्फेक्ट पिता भी हैं. इनके तीन बच्चे हैं, आर्यन, सुहाना और अबराम. शाहरुख की बेटी सुहाना जल्द ही धर्मा प्रोडक्शन के बैनर तले बनने वाली फिल्म से बौलीवुड में आने वाली हैं.

अगर चाहते हैं ज्यादा ब्याज तो अपनायें डाकघर का रास्ता

भविष्य की बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लोग बचत के लिए तरह तरह के निवेश विकल्प का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि लोग आमतौर पर बैंक के सेविंग अकाउंट को ही सुरक्षित और बेहतर मानते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें पैसा तो सुरक्षित रहता ही है साथ ही जमा पैसे पर 4 से 6 फीसद का ब्याज भी मिलता है.

मगर आपको जानकर हैरानी होगी कि डाकघर यानी पोस्ट औफिस में भी ऐसी तमाम स्कीम चलती हैं तो बैंक के सेविंग अकाउंट से भी ज्यादा ब्याज देती हैं. हम अपनी इस रिपोर्ट के माध्यम से आपको इनके बारे में ही बताने की कोशिश करेंगे.

डाकघर मासिक बचत आय

डाकघर की मासिक आय खाता योजना ऐसे निवेशकों के लिए होती है जो एकमुश्त राशि का निवेश कर मासिक आधार पर ब्याज पाना चाहते हैं. यह योजना रिटायर्ड कर्मचारियों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए बेहद उपयोगी होती है. इस खाते में म्योच्योरिटी पीरियड पांच साल होता है. इसमें खाता धारक को जमा पर हर महीने ब्याज मिलता है. मौजूदा समय में इस योजना में 7.50 फीसद की दर से ब्याज मिल रहा है. इसे सिंगल या फिर ज्वाइंट दोनों तरह से खोला जा सकता है, दोनों में ही जमा की सीमा अलग अलग है. जैसा कि सिंगल में अधिकतम निवेश 4.5 लाख है तो ज्वाइंट खाते में आप 9 लाख रुपए तक जमा करा सकते हैं.

पब्लिक प्रोविडेंट फंड

पीपीएफ अकाउंट वेतनभोगी और व्यापारी वर्ग दोनों के लिए ही होता है. इसमें एक वित्त वर्ष में अधिकतम एक लाख रुपए तक के निवेश पर कर छूट का लाभ मिलता है. इसे या एकमुश्त या फिर 12 किश्तों में जमा किया जा सकता है. यह अकाउंट नाबालिग और बालिग दोनों का हो सकता है. इसका म्योच्योरिटी पीरियड 15 साल है. इसमें जमा पर 7.9 फीसद का ब्याज मिलता है.

राष्ट्रीय बचत पत्र

अगर आप सुरक्षित निवेश के साथ बेहतर रिटर्न भी चाहते हैं तो आपको इसका चयन करना चाहिए. इस योजना को सरकारी कर्मचारी, बिजनेसमैन और कर अदा करने वाले अन्य वेतन भोगियों की जरूरतों को मद्देनजर रखते हुए जारी किया गया है. इसमें निवेश की कोई सीमा नहीं होती है. राष्ट्रीय बचत पत्र दो तरह के होते हैं पहल है, टाइप-1 (VIII इश्यू) और दूसरा टाइप-2 (IX इश्यू).

इस पर टीडीएस नहीं कटता है. ट्रस्ट और एचयूएफ इसमें निवेश नहीं कर सकते हैं. इसमें जमा पर 7.9 फीसद की दर से ब्याज मिलता है. इसमें जमा पर आयकर की धारा 80सी के तहत छूट मिलती है.

पांच वर्षीय डाकघर आवर्ती जमा खाता

यह भी निवेश का एक बेहतर टूल्स है. इसमें आपका पैसा पांच साल के लिए जमा रहता है. इस खाते में जमा पर 7.2 फीसद की दर से ब्याज मिलता है. साथ ही इस बचत योजना में एक साल के बाद 50 फीसदी रकम निकलाने की व्यवस्था है. ध्यान दें कि प्रति माह इसमें 10 रुपये का निवेश जरूरी है.

डाकघर सावधि जमा खाता

डाकघर सावधि जमा खाता भी निवेश का एक बेहतर माध्यम है, जिसमें आपको 6.8 से 7.6 फीसद की दर से ब्याज मिलता है. यह ब्याज दर आपको पांच वर्षीय खाते पर मिलता है. यह खाता व्यक्तिगत तौर पर खोला जा सकता है. सावधि जमा खाते पर आयकर अधिनियम 80c के तहत आयकर से छूट मिलती है.

वरिष्ठ नागरिक बचत खाता

यह बचत योजना खासतौर पर 60 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए है. ये 60 की उम्र पार कर चुके लोगों के लिए निवेश का शानदार विकल्प है. हालांकि, 55 साल से 60 साल की उम्र के बीच में रिटायर होने वाले या वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) लेने वाले व्यक्ति भी रिटायरमेंट के तीन माह पहले यह खाता खोल सकते हैं. एक हजार रुपए से यह खाता खोला जा सकता है. इसमें अधिकतम निवेश की सीमा 15 लाख रुपए है. इस अकाउंट का म्योच्योरिटी पीरियड पांच साल है. इस खाते को अपनी पत्नी के साथ ज्वाइंट अकाउंट के रुप में भी खोला जा सकता है. इस पर 8.4 फीसद की दर से ब्याज मिलता है.

मध्य प्रदेश कांग्रेस : वापसी की कवायद क्या कामयाब हो पाएगी

आमतौर पर चुनावों के दौरान या फिर सियासी जलसों के वक्त ही मध्य प्रदेश में नजर आने वाले 2 बड़े कांग्रेसी नेता कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की कोशिश यह रहने लगी है कि वे ज्यादा से ज्यादा प्रदेश ही में दिखें.

तकरीबन 2 साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए सियासी बिगुल बज उठा है. कांग्रेसी जगहजगह सियासी जलसे कर शिवराज सिंह चौहान की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार को उखाड़ फेंकने का दम भरने लगे हैं. इस की असल वजह यह नहीं है कि कांग्रेस यहां बहुत मजबूत हो गई है, बल्कि यह है कि भाजपा अब पहले के मुकाबले कमजोर पड़ने लगी है.

वैसे, कुछ महीने पहले तक कांग्रेसी जलसों का फीकापन हर किसी को नजर आता था, लेकिन किसान आंदोलन, जिस में मंदसौर में पुलिस फायरिंग में 6 किसान मारे गए थे, कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुआ.

किसान आंदोलन से कांग्रेस का कोई सीधा वास्ता नहीं था, लेकिन भाजपा से किसानों की नाराजगी जब उजागर हुई, तो कांग्रेस एकाएक ही उम्मीद के सागर में डुबकियां लगाते हुए हरकत में आ गई.

तेजी से बनतेबिगड़ते सियासी समीकरणों के बीच कांग्रेस की कोशिश अपना खोया हुआ परंपरागत वोट बैंक और साख हासिल करने की है. परंपरागत वोट बैंक यानी दलित, आदिवासी और कुछ पिछड़ों के अलावा मुसलिम वोट एकजुट हो जाएं, तो तख्ता पलटने में देर नहीं लगेगी.

कांग्रेस ने यह वोट बैंक अपने हाथों और हरकतों से खोया था, जिस के एकलौते जिम्मेदार दिग्गज कांगे्रसी नेता दिग्विजय सिंह माने जाते हैं. 10 साल मुख्यमंत्री रहते हुए दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. नतीजतन, साल 2003 के विधानसभा चुनावों में वोटर ने उन्हें खारिज कर दिया था.

आईना वही, चेहरे बदले

साल 1993 से ले कर साल 2003 तक कांग्रेस का मतलब ही दिग्विजय सिंह हो गया था. इसी दौर में हैरतअंगेज तरीके से हिंदुत्व सब से ज्यादा परवान चढ़ा था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उस के सहयोगी संगठनों ने हिम्मत न हारते हुए अपनी गतिविधियां बढ़ाईं और वोटरों को लुभाने में लगे रहे.

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने दलित, आदिवासी और मुसलिमों की नेतागीरी कुछ इस तरह खत्म कर दी कि ये तबके सियासी तौर पर खुद को लाचार महसूस करने लगे.

इन तबकों की परेशानी को भाजपाई उमा भारती ने बेहद नजदीक से समझा और दिग्विजय सिंह के खिलाफ पूरे प्रदेश में मुहिम छेड़ दी.

उमा भारती ने लोगों को बताया कि भ्रष्टाचार और मनमानी के दलदल में डूबी कांग्रेस सरकार उन का नुकसान कैसे कर रही है. दिग्विजय सिंह ने तब उमा भारती और भाजपा को बेहद हलके ढंग से लिया था.

साल 2003 में नाराज मतदाता ने दिग्विजय सिंह को ऐसा सबक सिखाया कि वे आज तक वोटरों से आंख मिला कर बात नहीं कर पाते हैं. तब कांग्रेस को डुबोने में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी अहम रोल निभाया था.

भाजपा का राज शुरुआती दौर में ठीकठाक रहा, पर जब उमा भारती को हुबली कांड के चलते मुख्यमंत्री पद की कुरसी छोड़नी पड़ी, तो बाबूलाल गौर के बाद हैरतअंगेज तरीके से शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिन्हें सत्ता चलाने का रत्तीभर भी तजरबा नहीं था.

अब हालात ये हैं कि भाजपा में शिवराज सिंह चौहान के अलावा कोई और नेता नजर ही नहीं आता है. जो आता भी है, उसे शिवराज सिंह चौहान चतुराई से चलता कर देते हैं.

फायदा उठाएगी कांग्रेस

इस बात में कोई शक नहीं कि शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में भाजपा राज्य में जितनी मजबूत हुई है, उतनी पहले कभी नहीं हो पाई थी. इस की अहम वजह यह थी कि लाल कृष्ण आडवाणी खेमे के चहेते शिवराज सिंह चौहान एक अच्छे संगठक रहे हैं, जिन्होंने कभी कांग्रेस को पनपने का मौका नहीं दिया.

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस महज 2 सीटों छिंदवाड़ा और गुना पर ही जीत दर्ज करा पाई. कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनेअपने गढ़ों में जीते, तो इस की वजह कांग्रेस कम इन दोनों की पकड़ ज्यादा थी.

दिग्विजय सिंह ने शुरू में तो वापसी की आस और कोशिशें जारी रखीं, पर साल 2013 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस की दुर्गति ने उन्हें यह अहसास करा दिया कि अब कोशिश करना बेकार है.

दिग्विजय सिंह के साथ एक दिक्कत यह भी रही है कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व के विरोध को ही राजनीति मानते रहे, जिस से आम लोगों की परेशानियों से कोई सीधा वास्ता नहीं था. इस के उलट दिग्विजय सिंह को उखड़ते देख रहे कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया चुपचाप अपनी पकड़ मजबूत करते रहे.

अब कांग्रेस 2 खेमों में बंट गई है. पहला खेमा कमलनाथ का है, जिन का दबदबा महाकौशल इलाके में ज्यादा है, तो दूसरा खेमा ज्योतिरादित्य सिंधिया का है, जिन का ग्वालियर, चंबल इलाकों में खासा दबदबा है. दोनों की ही पूछपरख राहुल गांधी व सोनिया गांधी दरबार में बराबर की है.

हालात और माहौल भाजपा विरोधी होते देख कमलनाथ और ज्यातिरादित्य सिंधिया दोनों ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो गए हैं. कांग्रेस की गुटबाजी अभी खत्म नहीं हुई है, जो भाजपा और शिवराज सिंह चौहान के लिए राहत देने वाली बात है, पर उन्हें डर यह भी है कि अगर कांग्रेस ने इन में से किसी एक को मुख्यमंत्री पेश कर दिया, तो जीत पहले की तरह आसान नहीं रह जाएगी, क्योंकि वोटर बदलाव का मन बना रहे हैं.

कांग्रेस मौके का फायदा उठाने के लिए अपनी खेमेबाजी से छुटकारा पाने की कोशिश कर रही है. सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी समझ आ रहा है कि हिंदीभाषी इलाकों में सत्ता वापसी का रास्ता अगर किसी राज्य से हो कर जाता है, तो वह मध्य प्रदेश है, पर इस के लिए जरूरी है कि कमलनाथ या ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसी एक को बतौर मुख्यमंत्री प्रोजैक्ट कर दिया जाए.

जुलाई महीने के दूसरे हफ्ते में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने यह कह भी डाला कि राज्य में कांग्रेस को चेहरा पेश कर देना चाहिए, तभी सत्ता मिलेगी. अपनी दावेदारी पहली दफा उन्होंने जताई, तो कमलनाथ गुट भी यही बात कहने लगा.

ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के खासमखास हैं, तो कमलनाथ सोनिया गांधी के चहेते, लेकिन ज्योदिरादित्य सिंधिया का यह कहना भी बेमतलब नहीं था कि न केवल मध्य प्रदेश में, बल्कि देशभर में कांग्रेस को अपना चेहरा पेश कर देना चाहिए यानी कांग्रेस की कमान राहुल गांधी को सौंप देनी चाहिए.

ये हैं हालात

साफ दिख रहा है कि कांग्रेस को अगर सत्ता वापस चाहिए, तो उसे इन दोनों दिग्गजों में से किसी एक की नाराजगी मोल लेनी पड़ेगी और अगर वह ऐसा करने की हिम्मत पहले की तरह नहीं कर पाती है, तो वोटर उस का भरोसा नहीं करेंगे और भाजपा के पाले में चले जाएंगे.

किसान आंदोलन में हुई मौतों से भाजपा की इमेज इस तरह बिगड़ी है कि किसानों का एक बड़ा तबका यह कहने लगा है कि हम वोट फेंक देंगे, पर भाजपा को नहीं देंगे.

तकरीबन 65 फीसदी किसानों के वोट ही सत्ता तय करते हैं. कांग्रेस नहीं चाहती कि किसानों की भाजपा से नाराजगी दूर हो या उन का गुस्सा ठंडा पड़े, इसलिए वह जगहजगह धरनाप्रदर्शन करते हुए किसानों की खुदकुशी के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है.

शिवराज सिंह चौहान किसानों के भले का राग ही अलापते रहे, पर जमीनी तौर पर उन के लिए कुछ किया नहीं, इसलिए कांग्रेस लगातार किसानों पर डोरे डाल रही है. किसान भरोसा तो कांग्रेस पर भी नहीं करते, पर जब उन्होंने भाजपा को सबक सिखाने का मन बना ही लिया है, तो तय है कि इस का फायदा कांग्रेस को मिलेगा.

कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह है कि इस दफा सोयाबीन की बोआई का रकबा घटा है और समर्थन मूल्य पर प्याज खरीदी में भी घोटाले हुए हैं. इस से किसानों का गुस्सा और बढ़ रहा है. ऐसे में जब भी कोई किसान कर्ज या दूसरी किसी वजह से खुदकुशी करता है, तो ज्योतिरादित्य सिंधिया तुरंत राज्य सरकार पर हमला बोल देते हैं.

8 नवंबर, 2016 में की गई नोटबंदी से कारोबारियों को खासा झटका लगा था. मझले और छोटे कारोबारियों को तो खाने के लाले पड़ गए थे. इस से भाजपा से कारोबारियों की नाराजगी बढ़ी थी.

जैसेतैसे नोटबंदी का जिन बोतल के भीतर जा रहा था कि केंद्र सरकार ने जीएसटी लागू कर दिया. नतीजतन, छोटेबड़े तमाम कारोबारी लामबंद हो कर भाजपा के खिलाफ हो गए.

जातिगत समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं. पिछले साल कुंभ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दलित संतों के साथ उज्जैन में क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई थी, पर इस से दलितों का कोई भला नहीं हुआ. उन पर होने वाले जोरजुल्म बदस्तूर जारी हैं.

एक दलित नेता सिद्धार्थ मोरे की मानें, तो भाजपा दलितों को हिंदुत्व की फीलिंग क्यों करवा रही है? इस से उलटा असर यह पड़ रहा है कि दलित, जिस ने पिछले 4 चुनावों में उसे वोट दिया, अब बिदकने लगा है और जबरन हिंदू कर्मकांड करवाए जाने से जरूर मानने लगा है कि वह हिंदू नहीं है और अगर है तो आखिरकार अछूत ही. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में दलितों ने भाजपा को वोट दिया था, पर नतीजों के बाद उजागर हुआ था कि बसपा समर्थक जाटव समुदाय ने कमल के फूल से परहेज ही किया था. मध्य प्रदेश में भी यही हालत है.

कुंभ की डुबकी का इतना फायदा भाजपा को मिल सकता है कि वाल्मीकि समाज के वोट उसे मिल सकते हैं, क्योंकि कुंभ में उन के संत उमेश महाराज को सवर्ण संतों के साथ नहलाया गया था.

मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में कभी कांग्रेस के अलावा वोटर कुछ सोचता नहीं था, पर अब वह कांगे्रस के बारे में ही नहीं सोचता, जो कांग्रेस के लिए चिंता की बात है. गरीब आदिवासियों का न तो किसान आंदोलन से कोई वास्ता है, न ही नोटबंदी और जीएसटी से कोई लेनादेना है. ऐसे में कांग्रेस को अगर सत्ता चाहिए, तो उसे खासतौर से आदिवासी इलाकों में पसीना बहाना पड़ेगा.

ये कारनामा कर विराट कोहली ने धोनी और द्रविड़ को पछाड़ा

औस्‍ट्रेलिया को दूसरे वन डे मैच में भारत ने 50 रनों से हरा दिया है. 5 मैचों की सीरीज में भारत अब 2-0 की बढ़त ले चुका है. कप्‍तान के तौर पर विराट कोहली की ये लगातार 8वीं जीत है.

विराट कोहली जब से कप्‍तान बने हैं, तब से ऐसा कारनामा तीन बार कर चुके हैं. उनके पहले ये कारनामा टीम के पूर्व कप्‍तान सौरव गांगुली, महेंद्र सिंह धोनी और राहुल द्रविड़ के नाम पर भी है. हालांकि इन सभी ने ये कारनामा एक एक बार किया है.

कोहली के नेतृत्‍व में टीम इंडिया ने ऐसा कारनामा तीन बार किया है. विराट ने 2013-14 के अलावा 2014 और 2017 में अंजाम दिया.

उनके रिकार्ड का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि औस्‍ट्रेलिया का रिकौर्ड भारत में बिगड़ गया. औस्‍ट्रेलिया ने इससे पहले चेन्‍नई में 4 मैच खेले और चारों जीते थे. इसी तरह कोलकाता में उनका रिकौर्ड भी शत प्रतिशत रहा था. लेकिन कोहली की टीम के आगे उनके सभी रिकौर्ड पर पानी फि‍र गया.

बस पौंटिंग ही आगे

इस रिकौर्ड के मामले में कोहली दक्षिण अफ्रीका के पूर्व दिवंगत कप्‍तान हैंसी क्रोन्‍ये की बराबरी पर आ चुके हैं. क्रोन्‍ये ने भी लगातार 8 मैच जीतने का कारनाम 3 बार किया था. कोहली से आगे बस सिर्फ औस्‍ट्रेलिया के कप्‍तान रिकी पोंटिंग हैं. रिकी पोंटिंग ने लगातार 8 या इससे ज्‍यादा मैच जीतने का कारनामा 4 बार किया है.

पोंटिंग ने ये रिकौर्ड 2003 में सबसे पहले बनाया था. इसके बाद 2003-04, 2006-07 और 2007 में उन्‍होंने ये कारनामा किया.

मिथाली राज और झूलन गोस्वामी : गुमनाम महिला क्रिकेट की शान

तकरीबन 6 साल पुरानी बात है. दिल्ली प्रैस की लोकप्रिय पत्रिका ‘गृहशोभा’ ने मई (प्रथम), 2011 अंक खेल जगत से जुड़ी 15 महिलाओं की कामयाबी के नाम समर्पित किया था.

तब क्रिकेट की शानदार खिलाड़ी मिथाली राज से मिलने का मौका हासिल हुआ था. अपने इंटरव्यू में उन्होंने महिला क्रिकेट खिलाडि़यों और बीसीसीआई को ले कर बड़ी अहम बात कही थी, ‘‘बीसीसीआई से पहले महिला क्रिकेट का एक अलग बोर्ड था. उस की माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी. साल 2006 में बीसीसीआई ने महिला क्रिकेट को अपने अंडर में ले लिया था. इस के बाद से महिला क्रिकेटरों को पहले के मुकाबले काफी अच्छी सुविधाएं मिलने लगी हैं. इस से हमें अच्छेअच्छे स्टेडियमों में खेलने का मौका मिल रहा है.’’

बीसीसीआई और महिला क्रिकेटरों की यह जुगलबंदी क्या आज साल 2017 में रंग ला पाई है? अगर इंगलैंड में हुए हालिया महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप की बात छोड़ दें, तो ऐसा कहीं से नहीं लगा कि?भारत में महिला क्रिकेट का कोई उज्ज्वल भविष्य है. हां, बीते सालों में भारत की कुछ खिलाडि़यों ने रिकौर्ड बनाए हैं, लेकिन उन्हें उस तरह की पब्लिसिटी नहीं मिली, जैसी पुरुष क्रिकेटरों को मिलती रही?है.

2 महिला खिलाडि़यों की बात करते हैं. पहली हैं मिथाली राज, जिन्हें उन के खेल कारनामों की वजह से ‘लेडी सचिन तेंदुलकर’ कहा जाता है.

3 दिसंबर, 1982 को राजस्थान के जोधपुर में जनमी मिथाली राज ने साल 1999 में 16 साल की उम्र में इंगलैंड में आयरलैंड के साथ अपना पहला इंटरनैशनल वनडे मैच खेला था. उन्होंने अब तक 186 वनडे मैच खेले हैं, जिन में उन्होंने 51.58 की औसत से 6190 रन बनाए हैं. वे वनडे मैचों में 6 हजार रन पूरे करने वाली दुनिया की पहली महिला बल्लेबाज हैं.

मिथाली राज ने अब तक 10 टैस्ट मैच खेले हैं, जिन में उन्होंने 51 की औसत से 663 रन बनाए हैं. उन्होंने टैस्ट मैचों में एक दोहरा शतक भी लगाया है.

भारतीय महिला क्रिकेट टीम भले ही इस बार के वर्ल्ड कप में मेजबान इंगलैंड से 9 रन से हार गई, लेकिन जब आईसीसी ने इस टूर्नामैंट को ध्यान में रखते हुए महिला वर्ल्ड कप, 2017 की?टीम बनाई, तो उस की कप्तानी मिथाली राज को ही सौंपी. क्रिकेट में अपनी उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘अर्जुन अवार्ड’ और ‘पद्मश्री अवार्ड’ भी मिल चुका है.

दूसरी खिलाड़ी हैं झूलन गोस्वामी. अगर मिथाली राज अपनी बल्लेबाजी से ‘लेडी सचिन तेंदुलकर’ कहलाती हैं, तो झूलन गोस्वामी को अपनी बेहतरीन गेंदबाजी की वजह से ‘लेडी कपिल देव’ का खिताब दिया जाना चाहिए.

25 नवंबर, 1982 को पश्चिम बंगाल के नदिया में जनमी झूलन गोस्वामी को ‘बाबुल’ के उपनाम से भी जाना जाता है. उन्होंने पहला वनडे मैच जनवरी, 2002 में चेन्नई में इंगलैंड के खिलाफ खेला था. सब से तेज गेंदबाज का खिताब पा चुकी झूलन गोस्वामी ने अब तक 164 वनडे मैच खेले हैं, जिन में उन्होंने 21.95 की औसत से 195 विकेट झटके हैं. अब तक 10 टैस्ट मैच खेलने वाली इस खिलाड़ी ने 16.62 की औसत से 40 विकेट बटोरे हैं.

5 फुट, 11 इंच लंबे कद की दाएं हाथ की तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी महिला क्रिकेटरों की दुनिया की सब से ज्यादा विकेट लेने वाली गेंदबाज हैं. उन्हें भी ‘अर्जुन अवार्ड’ और ‘पद्मश्री अवार्ड’ मिल चुका है.

झूलन गोस्वामी ने साल 2007 में ‘आईसीसी वुमन क्रिकेटर औफ द ईयर अवार्ड’ भी जीता?था और मिथाली राज से पहले वे ही भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तान थीं.

भारतीय महिला क्रिकेट टीम में ऐसी और भी कई खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अपने बेहतरीन खेल से भारत का नाम रोशन किया है, लेकिन दुख की बात है कि उन्हें वह शोहरत नहीं मिली है, जो पुरुष क्रिकेटरों को मिलती है.

अब वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंचने के बाद बीसीसीआई ने वर्ल्ड कप में खेलने वाली सभी भारतीय महिला खिलाडि़यों को 50-50 लाख रुपए देने की बात कही. इस के अलावा खिलाडि़यों को नौकरियां या उन्हें नौकरी में तरक्की देने की बात चल रही है, लेकिन ये इनाम इस हकीकत को नहीं छिपा सकते हैं कि ज्यादातर भारतीय महिला क्रिकेट खिलाड़ी अभी तक गुमनामी में ही खेली हैं.

इसी गुमनामी को दूर करने के लिए महिला क्रिकेट के आईपीएल टूर्नामैंट को शुरू करने की मांग जोर पकड़ने लगी है. इस से दूसरी महिला खिलाडि़यों को भी अपना हुनर दिखाने का मौका मिलेगा, साथ ही पैसा कमाने का भी.

महिलाओं के इस वर्ल्ड कप को टैलीविजन पर देखने वालों की तादाद बढ़ी है. भारत में क्रिकेट प्रेमी अब महिला खिलाडि़यों के नाम जानने लगे हैं, उन की काबिलीयत से रूबरू हो रहे हैं, जो भारतीय महिला क्रिकेट के लिए अच्छे संकेत हैं.

अगर महिलाओं का आईपीएल शुरू होगा, तो यकीनन उन्हें फायदा होगा और क्या पता वे लोगों की वाहवाही पा कर अपनी मेहनत के दम पर अगला वर्ल्ड कप ही जीत लाएं. मिथाली राज और झूलन गोस्वामी के कारनामों के लिए उन्हें ऐसी सौगात देना सोने पर सुहागा होगा.

अब घर का सपना होगा पूरा, निजी जमीन पर भी मिलेगी सब्सिडी

सस्ती आवास योजना में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने एक नई निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पी.पी.पी.) नीति की घोषणा की. इसके तहत निजी भूमि पर प्राइवेट बिल्डर द्वारा बनाए गए हर आवास के लिए 2.50 लाख रुपए तक की केंद्रीय सब्सिडी दी जाएगी. इससे शहरी क्षेत्रों में भी सस्ते घर की परियोजना के लिए निजी निवेश की संभावनाओं को बढ़ावा मिलेगा.

शहरी विकास एवं आवास मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने योजना की घोषणा करते हुए कहा कि इससे सस्ते घर के लिए निजी क्षेत्र को पीपीपी के कई विकल्प मिलेंगे.

एनएआरइडीसीओ की ओर से आयोजित ‘रियल इस्टेट और इंफ्रास्ट्रेक्चर इंवेस्टर्स समिट-2017’ को संबोधित करते हुए पुरी ने कहा कि इस योजना से सरकार, डवलपर्स, और वित्तीय संस्थानों में से उन पर पर जोखिम आवंटित करना चाहती है जो फायदा उठाने की बदले सभी को 2022 तक घर देने के लक्ष्य को पूरा कर सके.

निजी जमीन पर सस्ते घर के लिए दो पीपीपी मौडल अपनाए जाएंगे, जिसमें प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) से जुड़े क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी कंपोनेंट (सीएलएसस) की सहायता से बैंक ऋण पर ब्याज सब्सिडी के तहत प्रति घर 2.50 लाख की केंद्रीय सहायता दी जाएगी. दूसरे विकल्प के तहत, अगर लाभार्थी बैंक ऋण नहीं लेना चाहता है तो निजी जमीन पर घर बनाने के लिए 1.50 लाख प्रति घर की सहायता दी जाएगी.

पुरी ने कहा कि आठ पीपीपी विकल्पों में से छह को सरकारी जमीन का इस्तेमाल कर सस्ते घर के लिए राज्यों, प्रमोटर निकायों और अन्य साझेदारों के साथ मिलकर निजी निवेश किया जा रहा है.

सरकारी जमीन का इस्तेमाल कर छह डीबीटी मौडल हैं, जिसके अंतर्गत निजी बिल्डर लाभार्थी को सरकारी जमीनों पर मकान डिजाइन और ट्रांसफर कर सकते हैं. निर्माण के सबसे कम लागत के अंतर्गत सरकारी जमीन को आवंटित किया गया है. प्रोजेक्ट के निर्माण के हिसाब से बिल्डरों को भुगतान किया जाएगा.

पुरी ने सस्ते घर के परियोजना में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) और कई रियायतों और प्रोत्साहन के बावजूद निजी क्षेत्र के अब तक शामिल नहीं होने पर चिंता जताई. इसमें आधारभूत निर्माण पर छूट भी शामिल है.

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