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फोन गुम हो जाने पर ऐसे करें अपना डाटा डिलीट

स्मार्टफोन लोगों की लाइफस्टाइल का एक हिस्सा बन गया है. स्मार्टफोन में बहुत जरूरी डेटा रहता है. सोचिए कि आप एक एंड्रौयड स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं और वह अचानक खो जाए. आपके फोन में आपका बैंक से संबंधित डेटा भी है. ऐसा डेटा कि वह किसी गलत आदमी के हाथ पड़ जाए तो आपको कंगाल बना दे.

तो आइये हम आपको कुछ ऐसी ही टिप्स के बारे में बताते हैं कि अगर आपका एंड्रौयड स्मार्टफोन खो जाए तो उस स्थिति में आप घर बैठे कैसे अपने डेटा को बचा सकते हैं. कैसे अपने फोन को घर बैठे लौक कर सकते हैं, कैसे अपने फोन के डेटा को डिलीट कर सकते हैं. फोन को किस स्थिति में ढूंढा जा सकता है, इसके लिए कुछ शर्तें हैं.

  • जो एंड्रौयड फोन खोया है वह चालू हालत में होना चाहिए. मतलब फोन को तभी ढूंढा जा सकता है जब वह चालू हो.
  • फोन में कोई भी गूगल अकाउंट लौगिन होना चाहिए, जैसे ईमेल आदि.
  • फोन में इंटरनेट चलता हुआ होना चाहिए, मतलब फोन मोबाइल डेटा या वाई फाई किसी न किसी माध्यम से इंटरेनट से जुड़ा होना चाहिए.
  • फोन में जीपीएस औन होना चाहिए ताकि फोन की लोकेशन का पता लगाया जा सके.
  • फाइंड माय डिवाइस चालू होना चाहिए.

फोन खो जाने पर अपने कंप्यूटर पर सबसे पहले android.com/find पर जाएं. यहां आपको लौगिन करने के लिए कहा जाएगा. यहां उसी ईमेल आईडी से लौगिन करें जो खोए हुए फोन में चला रखी है. लौगिन करते ही आपकी डिवाइस के साथ गूगल मैप भी दिखाई देने लगेगा.

गूगल मैप पर आपकी डिवाइस की लोकेशन भी दिखाई देने लगेगी. इसमें कई औप्शन भी आपको मिलेंगे. लेफ्ट साइड में फोन के नीचे साउंड प्ले करने का औप्शन आ रहा होगा. यहां क्लिक करने पर फोन रिंग करने लगेगा, फोन अगर साइलेंट पर होगा, तब भी रिंग करेगा.

इसके नीचे लौक का दूसरा औप्शन आ रहा होगा. यहां क्लिक करके फोन, डिस्प्ले मैसेज या फोन नंबर को लौक किया जा सकता है. इसके बाद तीसरा औप्शन डिवाइस से डेटा डिलीट करने का आ रहा होगा. यहां क्लिक करके फोन के पूरे डेटा को डिलीट किया जा सकता है.

आस्ट्रेलियाई टीम की बस पर पथराव के मामले में चार युवक गिरफ्तार

आस्ट्रेलियाई टीम की बस पर पथराव करने के मामले में पुलिस ने रविवार को चार युवकों को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने गिरफ्तार युवकों के नाम का खुलासा अभी नहीं किया क्योंकि यह पता नहीं चल पाया है कि आरोपी किशोर हैं या वयस्क. गौरतलब है कि गुवाहाटी में तीन मैचों की सीरीज के दूसरे टी-20 मैच में आठ विकेट से जीत हासिल करने के बाद जब आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम 10 अक्टूबर की शाम को स्टेडियम से होटल लौट रही थी तब उनकी बस पर पत्थर फेंका गया था. इस दौरान बस का शीशा भी टूट गया था, हालांकि इस घटना में किसी भी खिलाड़ी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था.

पुलिस महानिदेशक मुकेश सहाय ने कहा, अभी तक हुई जांच से पता चला है कि युवक आस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत के बुरे प्रदर्शन से नाराज थे. उन्होंने मैच शुरू होने से पहले शराब भी पी थी. रात के खाने के बाद, वे शहर की साकुची इलाके के निकट बामूनपारा चौक में गपशप कर रहे थे जहां उन्होंने टीम की बस को जाते देखा और उनमें से एक ने बस पर पत्थर फेंका और वह सब भाग खड़े हुए.

असम के पुलिस प्रमुख ने बताया कि इन चारों को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या की कोशिश) के तहत गिरफ्तार किया गया. युवकों पर 336 (जीवन को खतरे में लाने), 427 (अपमानजनक क्षति) और 511 (अपराध करने का प्रयास) धाराएं भी लगाई है.

डीजीपी ने कहा कि पुलिस स्थानीय अदालत से युवकों के 10 दिनों की हिरासत की मांग करेगी.

गरीब और पिछड़ा होना बुरा नहीं : डा. वर्षा शिंदे राणे

कुछ करगुजरने की इच्छा हो तो परिस्थिति कितनी भी कठिन हो, आप उसे कर ही लेते हैं, क्योंकि उस में होता है आप का आत्मविश्वास जो आप को आगे बढ़ने में मदद करता है. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है मुंबई की ‘मिसेस मोस्ट ब्यूटीफुल बौडी’ की विनर डा. वर्षा श्ंिदे राणे ने, जो पिछड़े किसान परिवार की होने के बावजूद अपनी मंजिल पाने में समर्थ हुईं.

महाराष्ट्र के नांदेड़ की रहने वाली वर्षा 4 भाईबहनों में एक हैं. उन के लिए अवार्ड को पाना आसान नहीं था. 2 हजार प्रतिभागियों में से केवल 635 प्रतियोगी ही चुने गए थे. इस प्रतियोगिता का उद्देश्य फ्रैश टैलेंट को ग्लैमरवर्ल्ड में लाना था. प्रतियोगिता बहुत कठिन थी. वर्षा को तो यकीन नहीं हो रहा था कि उन्हें यह खिताब मिला है. टौप 10 में पहुंचने के बाद उन की चुनौती और अधिक बढ़ गई थी. अपने बारे में वे बताती हैं, ‘‘मैं और मेरी बहन बचपन से ही फैशन टीवी देखती थी. मैं छोटे से गांव नांदेड़ की हूं, पर मुझे फैशन बहुत पसंद था. मैं फिल्में बहुत देखती थी. हर शुक्रवार को जो भी नई फिल्म रिलीज होती थी, उसे देखती थी. मेरे अंदर बहुत पैशन था. 8वीं कक्षा में रहते हुए मुझे ‘बैस्ट स्माइल’ और ‘बैस्ट टीथ’ के पुरस्कार मिल चुके हैं.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘मेरे गांव में सिड्को की तरफ से बच्चों की हैल्थ जांच का एक अभियान चला था. सब से अच्छी हैल्थ वाले बच्चे को पुरस्कार दिया जाना था. उस दिन मैं स्कूल नहीं गई थी. मेरी एक सहेली ने मेरे नाम का एक पास ले लिया. यह जांच रविवार को होने वाली थी. मैं वहां गई और फर्स्ट चुन ली गई. इस के बाद मुझे मुंबई के सभी शहरों में से ‘बैस्ट टीथ’ के लिए चुना गया. ऐसा करतेकरते मेरा झुकाव इस ओर होने लगा. फिर मैं ने ‘डेलीवुड मिसेज इंडिया 2017’ की प्रतियोगिता के लिए औनलाइन फौर्म भरा और इस में शामिल हुई व खिताब जीता.’’

किसान परिवार से होने की वजह से वर्षा को कई प्रकार की बातों का सामना करना पड़ा. वे बताती हैं, ‘‘मेरी क्लास की कुछ लड़कियां कहती थीं कि उन के मातापिता तो इंजीनियर, डाक्टर और बड़ी पोस्ट पर काम करते हैं, जबकि मैं एक किसान की लड़की होने पर भी अच्छेअच्छे कपड़े कैसे पहनती हूं. लेकिन, मैं ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया. क्योंकि मेरे मातापिता ने कभी भी मुझे एहसास नहीं होने दिया कि मैं साधारण हूं. उन्होंने मुझे हर तरह की आजादी दी और मैं अपने रंगरूप के हिसाब से अच्छेअच्छे कपड़े पहना करती थी.

‘‘मैं सोचती थी कि मैं कुछ अच्छा कर उन्हें खुशी दूंगी. 12वीं कक्षा पास करने के बाद मैं ने महाराष्ट्र के उद्रीर से आयुर्वेद में अपनी पढ़ाई पूरी की. उस दौरान तो केवल पढ़ाई में ही ध्यान दिया, लेकिन फिल्म देखने का शौक चलता रहा, क्योंकि मुझे फिल्मों से ही पहनावा, मेकअप, स्टाइल आदि का पता चलता था.’’

परिवार का सहयोग वर्षा को शुरू में नहीं मिला, क्योंकि परिवार वाले चाहते थे कि पढ़ाई पूरी कर वह अच्छी नौकरी करे. इसलिए उस ने कभी किसी से कुछ नहीं कहा. उसे डर था कि उस के मातापिता मौडलिंग के क्षेत्र में जाने से कहीं मना न कर दें. इसलिए पहली बार जिस दिन वे इवैंट में जाने वाली थीं, उस से एक दिन पहले उन्होंने मां को बताया कि उन्हें इवैंट में जाना है. मां ने थोड़े गुस्से के बाद, हां कर दी. लेकिन जब पुरस्कार मिला तो मातापिता दोनों खुश हो गए.

मौडलिंग की दुनिया के बारे में वर्षा का कहना है, ‘‘यहां काम मिलना मुश्किल होता है. साथ ही, महिलाओं के साथ इस इंडस्ट्री में शोषण भी अधिक होता है. हर विज्ञापन में महिला को दिखाया जाना बुरा नहीं है, लेकिन महिलाओं के बारे में लोगों की जो धारणा है, उसे बदलने की जरूरत है. डेलीवुड मिसेज इंडिया 2017 का खिताब जीतना मेरे लिए आसान नहीं था. बड़ेबड़े शहरों से कई महिलाएं आई थीं और वे काफी स्मार्ट भी थीं, लेकिन जब मेरा नाम आया तो मुझे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था.’’

वर्षा 4 साल के बच्चे की मां हैं. डिलीवरी के बाद उन्होंने स्वयं को फिट रखने के लिए काफी मेहनत की है. नियमित वर्कआउट करना, सही डाइट लेना आदि उन्होंने 1 साल तक किया है. वर्षा खुद एक डाक्टर हैं, इसलिए कब क्या खाना है, उन्हें पता है.

वे कहती हैं, ‘‘प्रैग्नैंसी के समय और डिलीवरी के बाद शरीर में कई बदलाव आते हैं. मैं ने डिलीवरी के बाद जिम जौइन किया, अपने लिए डाइट प्लान किया, इस से मैं अपने वजन को कंट्रोल कर पाई. इस के अलावा मैं ग्रीन टी, कम तेल वाला खाना खाती हूं.’’

मौडलिंग का अपना काम वर्षा अपने बच्चे के हिसाब से करती हैं. बच्चे की देखभाल उन की प्राथमिकता है. वर्षा का मानना है कि परिवार साथ हो तो महिला हर काम कर सकती है. वे एक नामचीन मौडल और ऐक्टर बनने की इच्छा रखती हैं.

डाक्टरी की पढ़ाई करने के बावजूद वर्षा का मौडल बनने का सपना कभी कम नहीं हुआ. वे प्रियंका चोपड़ा, ट्ंिवकल खन्ना, अक्षय कुमार को बहुत पसंद करती हैं. ट्ंिवकल खन्ना के ट्वीट्स वे रोज पढ़ती हैं. वे मौडलिंग के अलावा मराठी और हिंदी फिल्मों में काम करने की भी इच्छा रखती हैं.

वर्षा ने 21 दिसंबर, 2011 को डा. तुषार राणे से शादी की. उन की शादी अरेंज्ड थी. उन के पति कभी उन्हें किसी काम के लिए मना नहीं करते हैं, बल्कि हर काम में उन का साथ देते हैं.

वर्षा फैशनेबल हैं और हमेशा ब्रैंडेड कपड़े पहनना पसंद करती हैं. वे कहती हैं, ‘‘फैशन तो मैं ने स्कूल से ही शुरू कर दिया था. मुझे जो भी कपड़े पसंद आते थे, मैं बाजार से खरीद लाती थी. अब तो और भी नएनए फैशन को फौलो करती हूं. शौपिंग करने का मुझे बहुत शौक है. टैं्रडी चीजें बहुत खरीदती हूं. मैं फूडी हूं और हर तरह के फूड ट्राई करती हूं. समय मिले तो खाना भी बनाती हूं.’’

मौडलिंग के अलावा वर्षा को ट्रैवलिंग का शौक है. वे वर्ल्ड टूर कर हर जगह की संस्कृति से परिचित होना चाहती हैं. मराठी फिल्मों में वर्षा श्रेयस तलपडे़ और हिंदी में अक्षय कुमार के साथ अभिनय करने की इच्छा रखती हैं.

महिलाओं से उन का कहना है कि महिलाएं हर काम को शादी के बाद भी कर सकती हैं. उन्हें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि शादी के बाद सब खत्म हो गया है. अपने जीवन को अपने हिसाब से जीने में ही मजा है.

हेमा मालिनी : फिल्म अभिनेत्री से ड्रीम गर्ल बनने तक का सफर

बौलीवुड की ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी ने अपने करियर में कई हिट फिल्में दीं हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं हेमा की जिंदगी में एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी और उनके पास कोई फिल्म नहीं थी. ऐसे में हेमा मालिनी ने बी ग्रेड फिल्मों में काम कर पैसा कमाया था. बात तब की है जब पहली डिलिवरी होने के बाद वह फिल्में ढूढ़ रही थीं.

उस समय हेमा को पैसों की जरूरत थी क्योंकि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने उन्हें नोटिस भेजा हुआ था. इस नोटिस के तहत उन्हें जल्द से जल्द इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को जुर्माने के तौर पर भरना था. इस किस्से का जिक्र बौलीवुड एक्टर अन्नू कपूर ने अपने एक रेडियो शो में किया था. शो के मुताबिक हेमा इस काम में धर्मेंद्र की मदद नहीं लेना चाहती थीं. वह चाहती थी कि वो अपनी कमाई हुई पैसों से इस पेनल्टी को अदा करें.

उसी दौरान हेमा के पिता भी चल बसे हेमा के लिए वह दौर काफी कठिनाइयों से भरा हुआ था. ऐसे में उन्होंने फैसला किया कि उन्हें जिस तरह की फिल्में भी मिलेगी वो उन्हें करेंगी. इसी सोच के साथ उन्होंने बी ग्रेड फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया. हेमा ने ‘रामकली’ नाम की बी ग्रेड फिल्म में काम किया. इस फिल्म से उन्हें काफी सफलता मिली और इसके बाद कई बी ग्रेड के डायरेक्टर उनके पास फिल्मों के औफर लेकर जाने लगे.

हेमा को उनका अपने घर पर आना पसंद नहीं था लेकिन पैसों की जरूरत की वजह से वह उन्हें मना भी नहीं कर पा रही थीं. इसके बाद उन्होंने कई और बी ग्रेड की फिल्मों में काम किया और साथ ही डांस शो भी किए. लगभग दस साल की कड़ी मेहनत के बाद वह इस पेनल्टी को भरने में कामयाब हुई.

बौलीवुड की यह अभिनेत्री भरतनाट्यम की एक बेहतरीन नृत्यांगना भी हैं. वह उन गिनी चुनी अभिनेत्रियों में से हैं, जिनमें खूबसूरती और अभिनय का अनूठा संगम देखने को मिलता है. हेमा मालिनी का जन्म तमिलनाडु के अम्मानकुडी नामक स्थान में 16 अक्टूबर, 1948 को हुआ था.

उनकी शिक्षा दीक्षा चेन्नई के आंध्र महिला सभा में हुई. उनका बचपन तमिलनाडु के विभिन्न शहरों में बीता, उनके पिता वी.एस.आर. चक्रवर्ती तमिल फिल्मों के निर्माता थे. उन्होंने अपने करियर में कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया, लेकिन करियर के शुरुआती दौर में उन्हें वह दिन भी देखना पड़ा, जब एक निर्माता-निर्देशक ने उन्हें यहां तक कह दिया था कि उनमें स्टार अपील नहीं है.

हेमा को तमिल फिल्मों के निर्देशक श्रीधर ने वर्ष 1964 में यह कहकर उन्हें काम देने से इनकार कर दिया था कि उनके चेहरे में कोई स्टार अपील नहीं है, लेकिन बाद में बौलीवुड में वह ‘ड्रीम गर्ल’ कहलाने वाली एकमात्र अभिनेत्री बनीं. उन्हें पहला ब्रेक अनंत स्वामी ने दिया. उन्होंने हिंदी फिल्मों में ‘सपनों का सौदागर’ (1968) के साथ करियर की शुरुआत की. इस फिल्म में वह राज कपूर के साथ दिखाई दी थीं. उस समय वह महज 16 वर्ष की थीं.

राज कपूर ने उनका पहला स्क्रीन टेस्ट लिया. खुद हेमा मालिनी का भी मानना है कि आज वह जो भी है राज कपूर की बदौलत है. राज कपूर के साथ काम करने के बाद हेमा मालिनी को देवानंद के साथ फिल्म ‘जौनी मेरा नाम’ में काम करने का मौका मिला. यह फिल्म बहुत बड़ी हिट साबित हुई.

उन्हें पहली सफलता ‘जौनी मेरा नाम’ (1970) के साथ ही मिली. उन्हें पहला बड़ा ब्रेक रमेश सिप्पी की फिल्म ‘अंदाज'(1971)में मिला. सत्तर के दशक में माना जा रहा था कि हेमा मालिनी केवल ग्लैमर वाले किरदार ही निभा सकती हैं, लेकिन उन्होंने 1975 की ‘खुशबू’ 1977 की ‘किनारा’ और 1979 की ‘मीरा’ जैसी फिल्मों में संजीदा किरदार निभाकर अपने आलोचकों को गलत साबित कर दिया.

हमारी बेड़ियां

हमारे पड़ोसी के 9 व 11 वर्ष के दोनों बच्चे बहुत उद्दंडी हैं. हर बार दीवाली पर अपनी शान दिखाने के लिए वे बच्चों को 2-3 हजार रुपए के पटाखे दिलाते हैं. बच्चों सहित वे रात के 12 बजे तक पटाखे छुड़ाते रहते हैं. खूब धूमधड़ाका होता है जिस से हम सभी व हमारे 2 पालतू जानवरों को काफी परेशानी होती है.

इस वर्ष दीवाली से पूर्व मैं ने उन से अनुरोध किया था कि वे पटाखे कम ही छुड़ाएं. इस पर उन्होंने मेरा यह कह कर मजाक उड़ाया था कि मैं पटाखों पर पैसे खर्च नहीं करता हूं तो उन्हें तो खर्च करने दूं. आखिर दीवाली पर्व का औचित्य तब तक पूरा नहीं होता है जब तक बड़ेबड़े बम जैसे पटाखे न छुड़ाए जाएं.

मैं ने उन्हें समझाने की कोशिश की, कि दीवाली रोशनी, सौहार्द का त्योहार है. जरूरी तो नहीं कि पटाखों से शोरशराबा किया जाए. लेकिन वे नहीं माने.

दीवाली से 2 दिनों पहले उन का 9 वर्षीय बेटा पटाखे छुड़ा रहा था जिस से उस की आंखों में बारूद के कुछ कण चले गए और आंखों में जलन होने लगी.

बच्चे को अस्पताल में दिखाया गया. दीवाली वाले दिन उन का वह बेटा बिस्तर पर ही रहा.

प्रदीप गुप्ता

*

मैं छठ पर्व मनाने के लिए अपने पैतृक घर गई हुई थी. मेरा घर बिहार की राजधानी पटना से करीब 30 किलोमीटर एक ऐसे गांव में है जहां गंगा नदी की पतली सी धारा प्रवाहित होती है. इसी धारा के कछार पर आ कर लोग छठी मैया और सूर्य देवता को अर्घ्य देते हैं. मैं भी इस पर्व में प्रति वर्ष शामिल होती हूं. मैं गांव पहुंची तो मेरी भांजी अपने 3 वर्षीय पुत्र को ले कर पहले से वहां मौजूद थी.

अर्घ्य देने के लिए शाम को हम सब हंसतेगाते हुए गंगाघाट पर पहुंच गए. फिर कार्य संपन्न कर के 7 बजे घर वापस आ गए. अब सुबह केअर्घ्य की तैयारी होने लगी और इस के लिए घर के हर सदस्य को 3 बजे भोर में उठ कर ही नहाधो लेना था.

हमारी भांजी ढाई बजे रात में ही जाग गई और अपने साथसाथ 3 वर्षीय बच्चे को भी स्नान करा दिया. फलस्वरूप, उसे ठंड लग गई और निमोनिया बुखार हो गया. फिर सांस लेने में इतनी दिक्कत होने लगी कि रोतेचीखते उसे पटना के अस्पताल में भरती कराना पड़ा. एक महीने बाद कहीं जा कर वह बच्चा ठीक हो सका.

प्रेमशीला गुप्ता

 

जियो फोन के दूसरे चरण की बुकिंग दीवाली के बाद होगी शुरू

रिलायंस रिटेल अपने 4जी फीचर फोन जियोफोन की बुकिंग का दूसरा चरण दीवाली के बाद शुरू करेगी. कंपनी पहले चरण में मिली लगभग 60 लाख बुकिंग की आपूर्ति फिलहाल कर रही है. रिलायंस रिटेल के चैनल पार्टनर ने यह जानकारी एक न्यूज एजेंसी को दी.

इसके अनुसार, ‘जियोफोन बुकिंग का दूसरा चरण दीवाली के बाद शुरू होगा. यह अक्टूबर के आखिर में यह नवंबर के पहले हफ्ते में शुरू हो सकता है.’उल्लेखनीय है कि जियोफोन की बुकिंग 24 अगस्त को शुरू हुई थी और जानकारों के अनुसार पहले तीन दिन में ही लगभग 60 लाख लोगों ने 500 रुपये का भुगतान करते हुए प्रीबुकिंग करवाई.

कंपनी के अनुसार जियोफोन की प्रभावी कीमत शून्य होगी लेकिन इसे खरीदने के लिए 1500 रुपये की जमानती राशि देनी होगी जो कि बाद में वापस रिफंड कर दी जाएगी. यानी जब प्री बुकिंग के बाद आप इसे खरीदेंगे तो 1,000 रुपये देने होंगे. हालांकि कंपनी 1,500 रुपये को सिक्योरिटी डिपौजिट बता रही है जिसे तीन साल के बाद फोन को वापस करके ले सकते हैं.

फिलहाल आधिकारिक तौर पर इसके स्पेसिफिकेशन्स नहीं आए हैं, लेकिन हाल में ही इसके फीचर्स लीक हुए हैं. लीक्ड रिपोर्ट के मुताबिक इस फोन में 4जीबी की इंटरनल मेमोरी होगी जिसे माइक्रो एसडी कार्ड के जरिए बढ़ा कर 128GB तक किया जा सकता है.

इसके रियर में 2MP कैमरा होगा इसके अलावा इसमें जियो टीवी समेत कंपनी के दूसरे ऐप्स भी होंगे. यह फोन 15 भाषाओं को सपोर्ट करता है. कंपनी ने इसके साथ एक खास केबल का ऐलान किया था, लेकिन अभी साफ नहीं है कि इसे कब खरीद सकेंगे.

इस केबल के जरिए मोबाइल को केबल और आम टीवी से कनेक्ट करके इसके कौन्टेंट टीवी पर देख सकते हैं. हालांकि केबल के लिए कस्टमर्स को दूसरा प्लान लेना होगा.

इन्हें आजमाइए

– सीडी से फोटोफ्रेम का निर्माण हो सकता है. फोटो को सीडी के आकार में काट कर सीडी पर चिपका दें. इस तरह बहुत सारे फोटो सीडी पर चिपकाएं. किसी फूल या अन्य आकृति में सभी सीडी चिपका दें. कमरे की दीवार पर लगाएं, खूबसूरत लगेगा.

– कारोबार करते हुए एक इमरजैंसी फंड रखिए और इस इमरजैंसी फंड में हर दिन या हर महीने कुछ पैसे जमा करते जाइए. यदि कारोबार घाटे या कम मुनाफे में चले तो आप के हाथ में कुछ पैसे बचे रहेंगे.

– बच्चों को क्राफ्ट सिखाने के लिए अखबार को अलगअलग आकार में काटिए और उन में रंग भरने के लिए बोलिए. इसे आप बच्चों के कमरे में सजा दें. अपने पहले प्रोजैक्ट को देख कर बच्चे खुश हो जाएंगे.

– पढ़ाई करते वक्त यदि आप विषय को रटेंगे तो कुछ समय बाद भूल जाएंगे. लेकिन उसे समझ लेंगे तो कभी भूलेंगे नहीं. फिर उस के महत्त्वपूर्ण पौइंट्स को याद कर लें.

– जब भी आप कड़ी धूप में बाहर जाएं तो सनस्क्रीन हमेशा साथ में रखें. सूरज की कठोर किरणें त्वचा की रंगत को खराब कर देती हैं.

– सेब को छिलके सहित खाने से कब्ज नहीं होता.

बच्चों के मुख से

बात पुरानी है मगर आज भी जब शनिवार के दिन बाजार से गुजरती हूं तो किस्सा ताजा हो जाता है. गरमी की छुट्टियों में हम सपरिवार मनाली घूमने गए हुए थे कि कारगिल युद्ध शुरू हो गया. वापसी में सैनिकों से भरी गाडि़यों को जाते देख मेरा 6 वर्षीय बेटा उन के बारे में पूछने लगा तो मैं ने उसे पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के बारे में बताया. इस के बाद वह अकसर पाकिस्तान के बारे में मुझ से सवाल करता.

एक दिन वह मेरे पास आया और पूछने लगा, ‘‘मम्मी, लोग अपनी गाडि़यों और दुकानों में नीबूमिर्ची क्यों बांधते हैं?’’ इस पर मैं ने जवाब दिया, ‘‘बेटा, इस से नजर नहीं लगती और दुश्मन भी परास्त होते हैं.’’

यह सुन कर वह सोच में पड़ गया. मुझे लगा, मेरी बात उसे समझ नहीं आई. मगर वह अचानक चहक उठा और बोला, ‘‘तो मम्मी, जब पाकिस्तान हमारे साथ लड़ाई करेगा तो हम अपने सैनिकों को हथियार के बदले नीबूमिर्ची दे देंगे और हमारे सैनिक पाकिस्तानी सैनिकों को मारेंगे नीबूमिर्ची, ठांयठांय. इस से सारे दुश्मन चित हो जाएंगे. क्यों, ठीक है न मेरा आइडिया.’’

यह सुन कर मेरा हंसतेहंसते बुरा हाल हो गया. वर्षों बाद भी शनिवार के दिन दुकानों में नीबूमिर्ची देख कर बेटे की ठांयठांय की आवाज कानों में गूंजने लगती है और मैं मुसकरा कर आगे निकल जाती हूं.

विमला ठाकुर

*

हमारे सासससुर और ननद हमारे साथ रहने के लिए आए हुए थे. मेरा 4 साल का बेटा है जो अपने दादादादी का काफी लाड़ला है.

रात में सब लोगों के खाना खा लेने के बाद मैं किचन में साफसफाई कर रही थी, तभी ससुरजी मेरे बेटे से बोले, ‘‘चलो बिट्टू, आज तुम हमारे साथ सोने चलो, रोज तो मम्मीपापा के साथ ही सोते हो.’’

तभी मेरा शरारती बेटा झट से बोला, ‘‘नहीं, मैं तो रोज रात को मम्मीपापा के बीच में सोता हूं लेकिन सुबह पता नहीं कैसे मैं दोनों के बीच में से किनारे पहुंच जाता हूं.’’ मेरे बेटे की बात सुन कर कमरे में बैठे सभी लोग हंसने लगे और मेरा शर्म से बुरा हाल हो गया.

निधि अग्रवाल

काश तुम पर फिदा न होते

हमें फूलकांटों की पहचान होती

कभी दिल न तुम से लगाते

तुम्हारे ही कारण हमें रंग भाए

बहुत बोझ थे, हम ने उठाए

जो मालूम होता, तुम बेवफा हो

जख्मों को अपने यों न दिखाते

न खबर थी न खत ही मिला था

नहीं जान पाए तुम्हें क्या गिला था

पत्थर के तुम हो, अगर जान जाते

तुम्हारी हंसी पर फिदा हम न होते

बहुत दूर तुम थे बहुत दूर हम थे

नदारद थीं खुशियां बहुत पास गम थे

तुम्हें भूल जाने की हिम्मत जो होती

यों छिपछिप के आंसू बहाए न होते

हमें फूलकांटों की पहचान होती

कभी तुम से दिल यों न लगाते.

– राकेश नाजुक

धर्म के दुकानदार किस तरह हो रहे हैं उत्सवों पर भारी, आप भी जानिए

बीती 7 अगस्त को रक्षाबंधन का त्योहार देशभर में काफी असहज तरीके से मना था. भाईबहन के स्नेह, प्यार और विश्वास के प्रतीक इस पर्व पर इस साल ग्रहण का खौफ था, और इस तरह था कि कई घरों में तो बहनें अपने भाई को राखी ही नहीं बांध पाईं. रक्षाबंधन ऐसा त्योहार है जिस में धर्म और उस के दुकानदारों का कोई खास दखल नहीं रहता, न ही उन्हें किसी तरह की दानदक्षिणा मिलती है. लोग घरों में हंसीखुशी राखी का त्योहार मना लेते हैं.

अगस्त के पहले हफ्ते से ही पंडेपुजारियों ने ग्रहण का डर दिखाना शुरू कर दिया था. बड़े पैमाने पर प्रचार यह किया गया था कि भद्रा नक्षत्र में राखी बांधना अशुभ होता है. क्योंकि इसी समय में शूर्पणखा ने अपने भाई रावण को राखी बांधी थी जिस से वह राम के हाथों मारा गया था और शूर्पणखा की नाक कट गई थी.

धर्म के दुकानदार षड्यंत्रपूर्वक अच्छेखासे उत्सवों में अपनी टांग अड़ा कर घर, समाज और देश का माहौल अपनी खुदगर्जी की खातिर कसैला कर देते हैं. यह इस दिन साबित हुआ था जब भयभीत बहनों ने भाइयों को राखी नहीं बांधी थी. ऐसा भी नहीं था कि राखी बांधने पर कोई रोक लगाई गई थी बल्कि पंडितों ने एक छूट यानी मुहूर्त दे दिया था कि ग्रहणदोष से बचने के लिए इतने बजे से इतने बजे तक ही राखी बांधो, अन्यथा अशुभ होगा.

कोई भाईबहन एकदूसरे का अनिष्ट नहीं चाहते, इसलिए पंडों द्वारा जारी मुहूर्त में जो भाई किसी कारणवश राखी नहीं बंधवा पाए उन की कलाइयां सूनी रहीं और बहनें ग्रहण को कोसती नजर आईं कि इस बार यह नया शिगूफा कहां से और क्यों आ गया जो हम अपने भाई को पहले की तरह सुविधानुसार राखी नहीं बांध सकते.

उत्सवों का सामाजिक और पारिवारिक महत्त्व खत्म करते धर्म के ये दुकानदार जाने कौनकौन से लिखितअलिखित पोथे खोल कर ढिंढोरा, जिसे फतवा कहना बेहतर होगा, पीट देते हैं कि उत्सवों में खुशी ढूंढ़ रहे लोग फ्रीज हो कर रह जाते हैं. जिन पर्वों व उत्सवों पर पंडों को दानदक्षिणा नहीं मिलती, रक्षाबंधन उन में से एक है. अब आइंदा सालों में मुमकिन है कि ये दुकानदार यह कहने लगें कि पहले राखी मंदिर में कुछ नकदी के साथ चढ़ा कर बांधी जाए तो कोई दोष नहीं लगेगा. यानी उत्सव मनाने का धार्मिक शुल्क देना एक अनिवार्यता हो जाएगी.

उत्सवों पर पैसा कैसेकैसे कमाया जा सकता है, यह इन दुकानदारों से बेहतर कोई नहीं जानता और न ही समझ सकता. कहने को ही दीवाली रोशनियों और खुशियों का त्योहार है, इस की जड़ों में भी इन दुकानदारों ने धर्म की अमरबेल रोप रखी है.

दीवाली जैसे सब से बड़े त्योहार के पखवाड़ेभर पहले से तरहतरह की भविष्यवाणियां शुरू हो जाती हैं. सब से पहले मुहूर्त जारी किया जाता है कि किस चौघडि़ये में लक्ष्मीपूजन करने से लोग ज्यादा से ज्यादा पैसा सालभर कमा सकते हैं. लोग एकदम निराश और हताश हो कर पूजा मुहूर्त से भागने न लगें, इस के लिए शुभ मुहूर्त किस्तों में दिए जाने लगे हैं. मसलन, लक्ष्मीजा का वक्त शाम 5 बजे से साढ़े 6 बजे तक और फिर 8 से साढ़े 9 बजे तक का उपयुक्त है. इस के बाद फिर डेढ़ घंटा अशुभ है लेकिन साढ़े 10 से 12 बजे के बीच फिर पूजा की जा सकती है.

दीवाली के दिन दुकानदार, व्यापारी और उद्योगपति अपनी दुकानों और संस्थानों में समारोहपूर्वक बहीखातों की भी पूजा करवाते हैं. इसलिए उन का मुहूर्त अकसर दिन में ही रखा जाता है. ऐसा इसलिए कि दुकानों और संस्थानों में पूजा पंडित से कराई जाती है. इस के एवज में उसे 501 रुपए से ले कर 21 हजार रुपए तक की दक्षिणा दी जाती है.

कुछ लोग अच्छी और विधिविधान वाली पूजन के लिए घरों में भी पंडित को बुलाते हैं. धंधा मारा न जाए, इसलिए  दुकानों और संस्थानों के मुहूर्त में 4-6 घंटों का अंतर रखा जाता है. कोई तर्कशील आदमी तब यह नहीं पूछता कि जब दिन का भी मुहूर्त शुभ है तो घर की पूजा का मुहूर्त अलग क्यों, और लक्ष्मी भी यह भेदभाव क्यों करती है.

नएनए विधान

धर्म शाश्वत है, यह कहनेभर की बात है. वास्तविकता यह है कि धर्म जैसा चलायमान कुछ नहीं जो मुट्ठीभर पंडों की मुट्ठी में कैद है. लोगों से ज्यादा से ज्यादा पैसा झटकने के लिए पिछले 8-10 सालों से धर्म के धंधेबाजों ने नए तरीके आजमाने शुरू कर दिए हैं और हमेशा की तरह उन में कामयाब भी हो रहे हैं. उन में से एक है अपनी राशि के मुताबिक पूजा करना. मेष से ले कर मीन राशि वालों तक के लिए नईनई पूजा विधियां, सामग्री और मंत्र बताए जाने

लगे हैं. इस से होता यह है कि लोग आतिशबाजी, मिठाई और खानापीना भूल कर अपनी राशि के अनुसार सामग्री इकट्ठा करने की पूजनविधि के अभ्यास में लग जाते हैं.

उत्सवों में लोगों को बरगलाए रखने का काम पंडित बेफिक्री से करते हैं कि कन्या राशि वालों को पूजन में दूब भी रखना चाहिए तो 9वीं मंजिल पर रहने वाले सुमितजी घास की तलाश में मीलों दूर निकल पड़ते हैं. इसी तरह अलगअलग राशि वालों को कोई नया टोटका या शिगूफा थमा दिया जाता है जिस से लोग उत्सव उल्लासपूर्वक नहीं मना पाते. नवरात्र के दिनों में खूब तांत्रिक पूजा और शर्तेंटोटके बताए जाते हैं. दीवाली की रात को तो इन बेहूदे कामों के लिए बेहद शुभ बताया जाता है.

हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी लक्ष्मी नहीं आती, यह शिकायत हर किसी को है. इस सवाल का जवाब धर्म के दुकानदारों के पास है कि चूंकि लोग शास्त्रोक्त विधिविधान से पूजापाठ नहीं करते, इसलिए मेहनत के बाद भी पैसा कम आता है.

अब शास्त्रोक्त तरीके से पूजन करने के कौपीराइट तो पंडे के ही होते हैं, इसलिए लालच के मारे लोग उस की फीस ले कर एडवांस बुकिंग के लिए निकल पड़ते हैं. पंडे के निर्देशानुसार दिनचर्या तय होती है जो आजकल के जमाने और माहौल के लिहाज से पिछड़ेपन को ही दर्शाती है. मसलन, जातक या यजमान को इतने बजे उठना चाहिए, इतने बजे स्नानध्यान करना चाहिए, दिनभर यानी पूजा तक उपवास रखना चाहिए और पूजा के बाद इतने घंटों बाद पूजनसामग्री का विसर्जन ऐसे और वैसे करना चाहिए.

अब ऐसे में भला कौन उत्सव का आनंद ले पाएगा. यह सोचने का ठेका दुकानदारों का नहीं, उन का इकलौता मकसद लोगों को धार्मिक कृत्य में लगाए रख कर पैसे ऐंठना होता है. इस के लिए वे ग्रहण, सूतक, चौघडि़या और मुहूर्त जैसे दर्जनभर हथियार रखे बैठे होते हैं.

खुशियों पर ग्रहण

बात अकेले रक्षाबंधन या दीवाली की नहीं है. बात तमाम उत्सवों की है जहां इन दुकानदारों को लगता है कि लोग अपनी मरजी से हंसीखुशी और बिना किसी तनाव या धार्मिक वर्जनाओं के उत्सव मनाने लगे हैं तो ये नएनए तरीके से अपनी टांग फंसाने लगते हैं.

नवरात्र में गरबा अब हर कहीं आम हो चला है. गरबा में सभी वर्गों के लोग हिस्सा लेते हैं और खूब फिल्मी गानों की धुनों पर नाचतेगाते हैं. कोई मनोविज्ञानी एक दफा समझने में चूक कर जाए पर धर्म के दुकानदारों की छठी इंद्रिय उन्हें यह एहसास कराने से नहीं चूकती कि लोग अगर तुम्हारे बिना खुश रहना सीख जाएंगे तो तुम्हें कुछ नहीं देंगे. वे फिर क्यों पूजापाठ और मुहूर्त के नाम पर अपनी जेब ढीली करेंगे. इसलिए जैसे भी हो सके, इन्हें रोको.

गरबा या डांडिया से चूंकि दानदक्षिणा नहीं मिल, इसलिए गुजरात का उदाहरण देते इन पंडों ने गरबा को बदनाम किया कि लो, क्या कलियुग आ गया है. नौजवान लड़केलड़कियां पहले तो रास रचाते हैं, फिर एकांत में कहीं जा कर सहवास कर आते हैं जो व्यभिचार और धार्मिकरूप से पाप है. इन 9 दिनों में उपवास करना चाहिए, इस दौरान सहवास तो कतई वर्जित है.

बात में दम लाने के लिए मीडिया के जरिए आंकड़े पेश किए जाने लगे कि नवरात्र के गरबा के दिनों में कंडोम और गर्भनिरोधक गोलियों की बिक्री इतनी बढ़ जाती है और 2-3 महीने बाद इतनी युवतियां गर्भपात कराती हैं.

जो नया साल कल तक फिरंगियों और ईसाइयों का करार दिया जाता था अब उस में भी मंदिरों में पूजापाठ होने लगा है. साल के पहले दिन एक जनवरी को होटलों और रैस्तरांओं से ज्यादा भीड़ मंदिरों में उमड़ने लगी है. नया साल ठीकठाक गुजरे, इस बाबत लोगों की चढ़ाई दक्षिणा से धर्म के दुकानदारों में कोई परहेज या एतराज नहीं. हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर वाजिब दाम मिलें तो यही दुकानदार हर साल 14 फरवरी को मनाए जाने वाले वैलेंटाइन डे को भी वसंतोत्सव जैसा पर्व या उत्सव घोषित कर दें. शर्त इतनी होगी कि प्रेमीप्रेमिका पार्क जाने से पहले मंदिर आएं, हाथ में कलावा बंधवाएं, फीस दें और इस के बाद जो मरजी हो, सो करें. फिर इन्हें कोई एतराज नहीं होगा.

यह है समाधान

धर्म एक ऐसी जकड़न है जिस से आजादी चाहने के लिए लोग अब कीमत अदा करने तैयार हैं. पर यह हल नहीं है, न ही हल का विकल्प है. लोगों को चाहिए कि उत्सवों पर अपनी खुशियां और सुविधाएं वे खुद तय करें. वे पंडे, पुजारियों और धर्म के दुकानदारों के मुहताज न रहें जो दक्षिणा ले कर किसी भी गलत को सही और सही को गलत साबित कर देते हैं.

उत्सव मन का विषय होना चाहिए, आनंद का और मौजमस्ती का पर्याय होना चाहिए, न कि धार्मिकतौर पर गुलामी करने का. लोग ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें अपनेआप को शिक्षित, समझदार और आधुनिक कहने का कोई हक नहीं रह जाता. जब तक धर्म के दुकानदार उत्सवों पर हावी हैं तब तक लोग हैरानपरेशान रहेंगे क्योंकि वे इन्हीं दुकानदारों के बजाए डमरू पर नाच रहे होते हैं.

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