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भारत पर मंडरा रहा बिटकौयन का खतरा, ई पोजी जैसी घटनाओं की आशंका

आभासी मुद्रा बिटकौयन का मूल्य 10 लाख रुपये प्रति बिटकौयन तक की उंचाई छूने के बीच नियामकों को आशंका है कि इस तरह की मुद्राओं के नियमन के लिये किसी ढांचे के अभाव के बीच ई पोंजी जैसे घोटाले सामने आ सकते हैं.

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि रिजर्व बैंक व सेबी सहित विभिन्न सरकारी एजेंसियां शीघ्र ही बैठक करेंगी ताकि निवेशकों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपायों पर​ विचार किया जा सके. एजेंसियों को आशंका है कि नियामकीय कमियों का फायदा धोखाधड़ी करने वाले उठा सकते हैं.

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि इस बारे में कई प्रस्ताव सामने हैं जिनमें एक यह है कि धन संग्रहण की अवैध योजनाओं पर लगाम लगाने के मौजूदा नियमों, मनी लौंड्रिंग व कालेधन से जुड़े कानूनों को इस तरह की मुद्राओं पर भी लागू किया जाए.

अधिकारियों के अनुसार आशंका इस बात की है कि इस तरह की मुद्राओं में अप्रत्याशित उछाल भारत में नब्बे के दशक में सामने आए प्लांटेशन घोटाले व 1920 के दशक में अमेरिका में सामने आए पोंजी घोटालों जैसे नये घपलों की नींव पड़ सकती है.

अधिकारियों के अनुसार इस तरह के मुद्दों पर उच्च स्तर पर विचार विमर्श किए जाने की जरूरत है. इस तरह के मामले पर पहले वित्तीय स्थिरता व विकास परिषद में विचार किया जा चुका है. अधिकारियों का कहना है कि लोगों को इस बारे में आगाह करने के लिए विशेष प्रचार अभियान शुरू करने पर भी चर्चा की जा सकती है.

इस मुद्रा का इस्तेमाल करने वाले इससे आइसक्रीम से लेकर बीयर तक खरीदते हैं. डौलर के मुकाबले इसकी विनिमय दर एक सप्ताह में 50 प्रतिशत से अधिक चढ़ चुकी है. इसका चलन 2009 में शुरू हुआ. इसे किसी देश के बैंकिंग विनियामक ने अभी मान्यता नहीं दी है और न ही इसकी कोई कानूनी तौर पर मान्य विनिमय दर ही है. अभी इस साल जनवरी के मध्य में इसकी विनिमय दर 752 डौलर के आस पास थी.

उल्लेखनीय है कि कूट लिखावट पर चलने वाली डिजिटल मुद्रा बिटकौयन इस समय सातवें आसामन पर है. ब्लूमबर्ग एजेंसी के अनुसार इसका भाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बीते 7 दिसंबर को भारतीय समयानुसार शाम चार बजे 15,242.99 डौलर पर चल रहा था जो इसका नया रिकौर्ड है.

इस अंधाधुध तेजी को देखते हुए यह चेतावनी दी जा रही है कि यह आभासी मुद्रा ‘एक सरपट भागती रेलगाड़ी जैसी बढ़ रही है जिसमें ब्रेक नहीं है.’ इस तेजी के कारण इस मुद्रा को मुख्य विनिमय बाजारों में निकट भविष्य में मान्यता देने की संभावना पर फिर आशंकाएं प्रकट होने लगी हैं.

क्या है पोंजी स्कीम

पिरामिड जैसी संरचना वाली इन स्कीमों में निवेशकों को भारी रिटर्न का वादा किया जाता है. इनमें पुराने निवेशकों को नए निवेशकों से जुटाई गई रकम रिटर्न के रूप में दी जाती है.

सीधी भाषा में कहें तो पोंजी स्कीम का मतलब है आपको बंपर रिटर्न के नाम पर ऐसे कारोबार में निवेश करने के लिए कहना जो वास्तव में है ही नहीं. इसलिए इनकी पहचान का सबसे अच्छा तरीका है वैसे रिटर्न के औफर जो पहली नजर में विश्वास करने लायक ही ना लगें.

विश्व भर में बढ़ रहा बौलीवुड का दबदबा, अब ये विदेशी महिला बौलीवुड से जुड़ी

इन दिनों पूरे विश्व में बौलीवुड का डंका बज रहा है. अब सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के कलाकार व फिल्म तकनीशियन बौलीवुड से जुड़ रहे हैं. अब इसमे एक नया जुड़ा है स्वीडन निवासी और 2016 में ‘‘मिस ग्लोबल स्वीडन’’ चुनी जा चुकी लीनिया जोहान्सन का.

लीनिया जोहान्सन इन दिनों निर्माता सुनील यादव व प्रदीप कुमार यादव की ‘‘निर्मल क्रिएशंस’’ के बैनर तले बन रही फिल्म ‘‘लव टर्न’’ से बौलीवुड में अभिनेत्री व डांसर के तौर पर कदम रख रही हैं. श्रीनिवास निर्देर्शित रोमांटिक, हौरर व रोमांचक फिल्म ‘‘लव टर्न’’ में लीनिया जोहान्सन पर एक पार्टी डांस नंबर के साथ कुछ दृश्य फिल्माए जाने हैं. फिल्म की शूटिंग बहुत जल्द लखनउ में शुरू होनी है. मगर लीनिया जोहान्सन काफी उत्साहित हैं.

लीनिया जोहान्सन का बौलीवुड से जुड़ने का कोई ईरादा नहीं था. वह कहती हैं-‘‘सच तो यही है कि मैने बौलीवुड का हिस्सा बनने के बारे में कभी सोचा ही नहीं था. मैं तो इसी साल भारत घूमने के मकसद से आयी थी. पूरे दो माह के प्रवास के दौरान मैने भारतीय सभ्यता व संस्कृति के साथ साथ यहां की मौडलिंग और फिल्म इंडस्ट्री के संबंध में जानकारी हासिल की.उसके बाद मेरे अंदर बौलीवुड से जुड़ने की इच्छा पैदा हुई.

मेरे दिमाग में आया कि मुझे भी बौलीवुड में अपना एक मुकाम बनाना चाहिए. मैने महसूस किया कि मुझे भारतीय पोशाकों और भारतीय ज्वेलरी पसंद आने लगी हैं. मैने कई बड़े बड़े आइटम नंबर देखे, जो कि मुझे परियों की कहानी समान लगे. आखिर कौन नहीं चाहेगा परियों की कहानी का हिस्सा बनना.’’

वह आगे कहती हैं-‘‘वास्तव में मैं स्वीडन से हूं. 2016 में मेरे दिमाग में सौंदर्य प्रतियोगिताओं में प्रतिभागी बनने का मन हुआ. तो मैने 2016 में सबसे पहले फिलीपींस के मनीला शहर में 10 से 26 सितंबर के बीच संपन्न ‘‘ब्यूटी पीजेंट मिस ग्लोबल’’ में हिस्सा लेते हुए अपने वतन स्वीडन का प्रतिनिधित्व किया था. यह मेरे लिए सबसे बड़ा तजुर्बेकार अनुभव रहा. इस प्रतियोगिता का हिस्सा बनकर मैने सीखा कि अपनी सभ्यता व संस्कृति को बरकरार रखते हुए नारी शक्ति को कैसे बढ़ाया जा सकता है. उसके बाद मुझे ‘मिस ग्लोबल 2016’ में मुझे ‘मिस नजेरथ’ के शीर्षक से नवाजा गया. उसके बाद 2016 में ही ‘मिस ग्लोबल स्वीडन’ और ‘मिस स्कैडीवानिया’ चुनी गयी. फिर 2017 के जून माह में भारत आने का अवसर मिला. ’’

लीनिया जोहान्सन का मानना है कि फिल्म ‘‘लव टर्न’’  उनकी तकदीर में लिखी हुई थी. वह बताती हैं-‘‘मैं  बौलीवुड से प्रभावित होकर कुछ काम करने की सोच रही थी. इसी सिलसिले में मेरा सूरत के एक स्टूडियों में जाना हुआ. जहां फिल्म ‘लव टर्न’ के निर्देशक श्रीनिवास अपनी इस फिल्म के लिए कलाकारों का औडीशन ले रहे थे. उन्होने मुझसे भी औडीशन देने के लिए कहा. उसके बाद मुझे डांस की ट्रेनिंग दिलायी गयी. अब मैं लखनउ में इस फिल्म की शूटिंग के लिए जा रही हूं.’’

बौलीवुड से जुड़ने के लिए फिल्म ‘‘लव टर्न’’ से ही जुड़ने की वजह बताते हुए वह कहती हैं-‘‘हकीकत में फिल्म ‘लव टर्न’ ने मुझे चुना. जब मैने बौलीवुड से जुड़ने का मन बनाया, तभी इस फिल्म का औफर मिल गया, तो भला मैं इसे कैसे ठुकरा देती. दूसरी बात इस फिल्म में ‘बेटी पढ़ाओ,बेटी बचाओ’का संदेश भी है, इस बात ने भी मुझे इस फिल्म से जुड़ने के लिए प्रेरित किया.’’

लखनउ में फिल्मायी जाने वाली फिल्म ‘‘लव टर्न’’ के गीतकार व संगीतकार राज हंस, कथा व पटकथा लेखक राज हंस व श्रीनिवास हैं. फिल्म के सभी गीत पावनी पांडेय, शाहिद माल्या व गार्गी रूप सिंह की आवाज में रिकार्ड किए जा चुके हैं.

ममता का कातिल : ड्रग्स के आदी बेटे ने की मां की हत्या

50 वर्षीय इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे महानगर मुंबई के उपनगर सांताकु्रज (पूर्व) की प्रभात कालोनी की ए.जी. पार्क इमारत की तीसरी मंजिल पर स्थित फ्लैट नंबर 303 में परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी दीपाली के अलावा 20 साल का बेटा सिद्धांत गणोरे था. इस समय वह मुंबई उपनगर के थाना खार में तैनात थे.

थाना खार में तैनाती होते ही उन्हें महानगर मुंबई के हाईप्रोफाइल शीना बोरा हत्याकांड जैसे मामले की जांच से जूझना पड़ा था. इस मामले की सूचना सब से पहले उन्हें ही मिली थी. इस के बाद थानाप्रभारी दिनेश कदम के साथ मिल कर उन्होंने इस हत्याकांड की तह तक पहुंच कर शीना बोरा के गुनहगार पीटर मुखर्जी और उन की पत्नी इंद्राणी मुखर्जी के साथ उन के ड्राइवर को सलाखों के पीछे पहुंचाया था. इस के बाद इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी.

यही इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे 16 मई, 2017 की सुबह 11 बजे पत्नी दीपाली और बेटे सिद्धांत के साथ नाश्ता कर के अपनी ड्यूटी पर चले गए थे. दरअसल, उन्हें एक अतिमहत्त्वपूर्ण केस की तैयारी करनी थी. उस दिन वह काफी व्यस्त रहे. शाम 6 बजे के करीब घर का हालचाल लेने के लिए उन्होंने फोन किया तो फोन बेटे सिद्धांत ने उठाया. उन्होंने पत्नी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मां सिनेमा देखने गई हैं, देर रात तक लौटेंगी. मैं भी अपने दोस्त के यहां जा रहा हूं.’’

घर का हालचाल ले कर ज्ञानेश्वर गणोरे फिर उसी केस की फाइलों में व्यस्त हो गए थे. सारा काम निपटा कर रात 11 बजे के करीब वह घर पहुंचे तो घर का दरवाजा बंद था. कई बार डोरबेल बजाने और दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो उन्होंने पत्नी और बेटे को फोन किया. लेकिन दोनों का फोन बंद होने से बात नहीं हो सकी.

फोन बंद होने से ज्ञानेश्वर गणोरे को चिंता हुई. उन्होंने पड़ोसियों से पूछा कि बाहर जाते समय सिद्धांत घर की चाबी तो नहीं दे गया? लेकिन वह किसी को चाबी नहीं दे गया था, इसलिए अब उन के पास इंतजार करने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं था. वह इंतजार करने लगे. रात के एक बज गए, अब तक न उन की पत्नी आईं और न ही बेटा. उन का कोई फोन भी नहीं आया.

ज्ञानेश्वर गणोरे को चिंता हुई. उन के मन में तरहतरह के बुरे खयाल आने लगे. चिंता बेचैनी में बदली तो वह पुलिसिया अंदाज में फ्लैट की चाबी ढूंढने लगे. काफी मेहनत के बाद आखिर उन्हें चप्पलों की रैक में फ्लैट की चाबी मिल गई. फ्लैट का दरवाजा खोल कर वह अंदर पहुंचे तो जिस बात को ले कर उन्हें बुरे खयाल आ रहे थे, वही हुआ था.

उन की आंखों के सामने जो मंजर था, उस ने उन के होश उड़ा दिए थे. सामने ही हाल के फर्श पर उन की पत्नी दीपाली का लहूलुहान शव पड़ा था. लाश के आसपास फर्श पर खून ही खून फैला था.

कुछ समय तक तो वह पत्नी का शव देखते रहे. उस के बाद एक अनुभवी पुलिस अधिकारी होने के नाते उन्होंने खुद को संभाला और सावधानीपूर्वक फ्लैट का जायजा लिया. पत्नी की हत्या हो चुकी थी और बेटा गायब था. मामला काफी गंभीर था, इसलिए उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम और थाना वाकोला पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही थाना वाकोला के थानाप्रभारी महादेव बावले ने तुरंत डायरी बनवाई और 10-15 मिनट में ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. इस बीच यह खबर सोसायटी में फैल गई थी, जिस से रात 2 बजे भी इमारत के कंपाउंड में काफी लोगों की भीड़ जमा हो गई थी.

पुलिस टीम भीड़ के बीच से होते हुए लिफ्ट द्वारा फ्लैट नंबर 303 के सामने पहुंची तो फ्लैट के बाहर ही गैलरी में इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे खड़े मिल गए. पड़ोसी उन्हें धीरज बंधा रहे थे. महादेव बावले उन से औपचारिक बातचीत कर सहायकों के साथ फ्लैट में दाखिल हुए तो उन के साथ ज्ञानेश्वर गणोरे भी अंदर आ गए.

फ्लैट के अंदर का दृश्य काफी मार्मिक  था. इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे की पत्नी दीपाली की हत्या बड़ी ही बेरहमी से की गई थी. हत्या जिस चाकू से की गई थी, वह लाश के पास ही पड़ा था. मृतका के शरीर पर 10-11 घाव थे, जो काफी गहरे थे. इस से लग रहा था कि हत्यारे ने पूरी ताकत से वार किए थे.

इस के अलावा पुलिस को जो खास बात देखने को मिली, वह मृतका के खून से दीवार पर लिखा एक संदेश था. संदेश के नीचे एक स्माइली भी बना था. निश्चित ही वह हत्यारे का लिखा था. संदेश में लिखा था, ‘टायर्ड औफ हर. कैच मी एंड हैंग मी’ यानी इस से थक गया था. मुझे पकड़ो और फांसी पर लटका दो. यह संदेश सभी को अटपटा और रहस्यमय लगा.

महादेव बावले सहायकों के साथ घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि मुंबई के सीपी दत्तात्रय पड़सलगीकर, जौइंट सीपी देवेन भारती, एसीपी चेरिंग दोरजे, एडीशनल सीपी अनिल कुंभारे भी आ गए. इन्हीं अधिकारियों के साथ पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम और फोरैंसिक टीम भी आई थी.

फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. इस के बाद थानाप्रभारी महादेव बावले तथा क्राइम ब्रांच की टीम को दिशानिर्देश दे कर सभी अधिकारी चले गए.

अधिकारियों के जाने के बाद महादेव बावले और क्राइम ब्रांच पुलिस ने घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के चाकू, मृतका दीपाली तथा सिद्धांत का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया और लाश को पोस्टमार्टम के लिए विलेपार्ले कूपर अस्पताल भिजवा कर थाने आ गए.

घटनास्थल की स्थिति से स्पष्ट था कि मामला सीधासादा बिलकुल नहीं था. एक पुलिस अधिकारी की पत्नी की हत्या हो चुकी थी और बेटा गायब था. इस से यह भी अंदाजा लगाया जा रहा था कि किसी ने इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे से बदला तो नहीं लिया?

क्योंकि पुलिस अधिकारी होने के नाते उन का ऐसे तमाम अपराधियों से वास्ता पड़ा होगा, जो काफी शातिर रहे होंगे. यह काम कोई ऐसा अपराधी कर सकता था, जो उन से काफी नाराज रहा हो. उन्हें सबक सिखाने के लिए उस ने उन की पत्नी की हत्या कर बेटे का अपहरण कर लिया हो और दीवार पर संदेश लिख कर उन्हें चुनौती दी हो?

लेकिन दीवार पर लिखे संदेश के एकएक शब्द और वह स्माइली पर गंभीरता से विचार किया गया तो इस का कुछ अलग ही अर्थ निकल रहा था. यह बच्चों जैसा संदेश किसी शातिर अपराधी के दिमाग की उपज नहीं हो सकती थी. एक ओर जांच अधिकारी आपस में इस मामले को ले कर उलझे हुए थे, वहीं इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे भी अपने घर में घटी इस घटना पर गंभीरता से विचार कर रहे थे.

काफी सोचनेविचारने के बाद ज्ञानेश्वर गणोरे को अपने ही खून पर संदेह होने लगा. उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी थानाप्रभारी महादेव बावले को दे दी, क्योंकि वह अपने बेटे सिद्धांत की लिखावट से अच्छी तरह परिचित थे.

ज्ञानेश्वर गणोरे के संदेह के बाद राइटिंग एक्सपर्ट से उस संदेश की जांच कराई गई तो रिपोर्ट के अनुसार ज्ञानेश्वर गणोरे की बात सही निकली. उस के बाद सिद्धांत की तलाश शुरू हुई. इमारत और आसपास लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी निकलवा कर देखी गई. इस के बाद तो साफ हो गया कि दीपाली की हत्या किसी और ने नहीं, सिद्धांत ने ही की है. फिर तो पुलिस उस की तलाश में जीजान से जुट गई.

पुलिस को अपने सूत्रों से पता चला कि वह सूरत गया था, जहां उसे राजस्थान के जोधपुर जाने वाली गाड़ी में बैठते देखा गया है. वह कहां जा रहा था, इस बात का अंदाजा नहीं लग रहा था.

पुलिस इस कोशिश में जुट गई कि वह जोधपुर से आगे न जा सके. इस के लिए वाट्सऐप द्वारा सिद्धांत का फोटो भेज कर जोधपुर के पुलिस कमिश्नर से बात की गई. उन्होंने इस मामले को जोधपुर रेलवे स्टेशन के नजदीक स्थित थाना उदयमंदिर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर मदनलाल नवीवाल को सौंप दिया.

मदनलाल नवीवाल ने तुरंत एक टीम गठित की, जिस में एएसआई पूनाराम, जय सिंह, सिपाही पुनीत त्यागी और विनोद शर्मा को शामिल किया. अपनी इस टीम के साथ वह सिद्धांत की गिरफ्तारी के लिए स्टेशन के आसपास लग गए.

दूसरी ओर मुंबई पुलिस भी खामोश नहीं बैठी थी. वह भी मामले पर नजर गड़ाए हुए थी. इस का नतीजा यह निकला कि मुंबई पुलिस ने सिद्धांत के ईमेल को ट्रैस कर लिया और इस बात की जानकारी थाना उदयमंदिर पुलिस को दे दी. उदयमंदिर पुलिस ने तुरंत रेलवे स्टेशन के पास स्थित होटल धूम में छापा मार कर सिद्धांत गणोरे को गिरफ्तार कर लिया.

दरअसल, सिद्धांत गणोरे जोधपुर पहुंचतेपहुंचते काफी थक चुका था. वह आराम करने के लिए धूम होटल में कमरा लेने पहुंचा तो वहां उसे आईडी की जरूरत पड़ी. इस के लिए उस ने एक नया मोबाइल फोन खरीदा और जब उस में अपना मेल लौगिन किया तो मुंबई पुलिस को उस के जोधपुर में होने की जानकारी मिल गई.

इस बात की सूचना उदयमंदिर पुलिस को दी गई तो उन्होंने उसे गिरफ्तार कर लिया. इंसपेक्टर मदनलाल नवीवाल ने सिद्धांत गणोरे से पूछताछ कर उसे थाना वाकोला पुलिस के हवाले कर दिया. थाना वाकोला पुलिस सिद्धांत गणोरे को मुंबई ले आई और उस से पूछताछ की तो दीपाली गणोरे की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

यह सच है कि मांबाप कभी भी अपने बच्चों से न तो ईर्ष्या करते हैं और न दुर्व्यवहार. उन के डांटफटकार और मारपीट में भी उन का कोई स्वार्थ नहीं होता. वह मारतेपीटते भी हैं तो बच्चे की भलाई के लिए ही. क्योंकि वे हमेशा अपने बच्चों की भलाई चाहते हैं. लेकिन अब समय काफी बदल गया है. बच्चे इलैक्ट्रौनिक युग में जी रहे हैं. वे वैसा ही सोचते हैं, जैसा घर का माहौल होता है. घर के वातावरण का बच्चों के दिमाग पर गहरा असर पड़ता है. ऐसा ही सिद्धांत गणोरे के साथ भी हुआ.

इंसपेक्टर ज्ञानेश्वर गणोरे महाराष्ट्र के देवलाली कैंप के जनपद भगूर के रहने वाले थे. उन के पिता खेतीकिसानी करते थे. वह गांव में ही रह कर पढ़ेलिखे. लेकिन उन के मन में कुछ करने की तमन्ना थी, यही वजह थी कि पढ़ाई पूरी होते ही वह सबइंसपेक्टर के रूप में पुलिस विभाग में भरती हो गए. वह मेहनती तो थे ही, ईमानदार भी थे, इसलिए आज वह मुंबई पुलिस में इंसपेक्टर हैं.

पुलिस की नौकरी में आने के बाद उन की शादी दीपाली से हुई थी. दीपाली एलएलबी किए थी. पति की तरह वह भी महत्त्वाकांक्षी थी. वह एक प्रतिष्ठित वकील बनना चाहती थी. इस के लिए ज्ञानेश्वर गणोरे ने बेटे सिद्धांत के जन्म के बाद उसे एलएलएम की पढ़ाई के लिए लंदन भेज दिया था. यह अलग बात है कि लंदन से लौटने के बाद दीपाली ने कुछ दिनों ही वकालत की थी.

ज्ञानेश्वर गणोरे का बेटा सिद्धांत पहले तो पढ़ने में ठीक था, लेकिन हाईस्कूल के बाद उस का दाखिला मुंबई में करवाया गया तो पता नहीं क्या हुआ कि यहां उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा. इंटर तो उस ने किसी तरह कर लिया, लेकिन कालेज के दूसरे साल में वह फेल हो गया. इस की वजह थी, घर का माहौल.

दरअसल, घर में अकसर मातापिता में लड़ाईझगड़ा होता रहता था. दीपाली को शक था कि उस के पति का किसी महिला से अफेयर है. सिद्धांत को यह पसंद नहीं था. वह मांबाप के रोजरोज के लड़ाईझगड़े से ऊब चुका था.

लेकिन मांबाप सिद्धांत को पढ़ालिखा कर इंजीनियर बनाना चाहते थे. पर उन का यह सपना पूरा नहीं हो सका. मांबाप के प्यार से वंचित सिद्धांत की दोस्ती कालेज के कुछ आवारा युवकों से हो गई थी, जिन के साथ रह कर वह ड्रग्स लेने लगा था.

इस बात की जानकारी दीपाली और ज्ञानेश्वर गणोरे को हुई तो उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. दोनों सिद्धांत पर नजर रखने लगे. उस के फोन और लैपटौप के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई. इस से सिद्धांत परेशान रहने लगा.

दीपाली ने कोशिश कर के सिद्धांत का दाखिला बांद्रा के नेशनल कालेज में बीएससी में करवा दिया. वह खुद सिद्धांत को कालेज छोड़ने जाती थीं, लेकिन उन के वापस आते ही सिद्धांत अपने आवारा और नशेड़ी दोस्तों के साथ निकल जाता. घर में दीपाली उस के साथ मां की तरह नहीं, तानाशाह जैसा व्यवहार करती थीं. उस की किताबें, नोटबुक और लैपटौप चेक करती थीं.

काम पूरा न होने पर उस से तरहतरह के सवाल करतीं और ताना मारतीं. अगर ज्ञानेश्वर गणोरे बेटे का पक्ष लेते तो वह उन से भी उलझ जातीं. यह सब सिद्धांत को अच्छा नहीं लगता था.

घटना वाले दिन सिद्धांत ने मां से कुछ पैसे मांगे. दीपाली ने पैसे देने से साफ मना कर दिया. मांबेटे के बीच कहासुनी होने लगी तो ज्ञानेश्वर गणोरे दोनों को समझाबुझा कर अपनी ड्यूटी पर चले गए, लेकिन दीपाली शांत नहीं हुईं. वह सिद्धांत को अपनी मार्कशीट दिखाने को कह रही थीं, लेकिन सिद्धांत मार्कशीट दिखाता कैसे, उस ने तो परीक्षा ही नहीं दी थी. यह जान कर दीपाली को गुस्सा आ गया.

सिद्धांत को आड़ेहाथों लेते हुए उन्होंने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. दीपाली की बातें सिद्धांत के बरदाश्त से बाहर होती जा रही थीं. जब उस की सहनशक्ति समाप्त हो गई तो उस का मानसिक संतुलन बिगड़ गया. पहले तो उस ने अपने हाथों की नसें काट कर आत्महत्या करनी चाही. लेकिन अचानक उस का विचार बदल गया. आत्महत्या करने के बजाय उसे अपनी मां दीपाली की हत्या करना उचित लगा.

वह किचन में गया और सब्जी काटने वाला चाकू उठा लाया. दीपाली हाल में बैठी टीवी देख रही थीं. वह उन के पास पहुंचा और उन पर हमला कर दिया. अचानक हुए हमले से दीपाली संभल नहीं सकीं और फर्श पर लुढ़क गईं. वह चीखतीचिल्लाती रहीं, पर सिद्धांत को उस पर जरा भी दया नहीं आई. आखिर उस ने उन्हें मौत के घाट उतार कर ही दम लिया.

अपनी जन्म देने वाली मां की हत्या कर के सिद्धांत खड़ा ही हुआ था कि पिता का फोन आ गया. उस ने फोन रिसीव कर के बड़ी ही शांति से कहा कि मां फिल्म देखने गई हैं. वह देर रात तक आएंगी. वह भी बाहर जा रहा है. पिता से बात करने के बाद सिद्धांत ने चाकू मां की लाश के पास फेंका और भड़ास निकालने के लिए उस ने मां के खून से दीवार पर संदेश लिख कर उस के नीचे स्माइली बना दिया.

इस के बाद उस ने बैडरूम में रखी अलमारी में रखे 2 लाख रुपए निकाले और अपने तथा मां के फोन को बंद कर के सिम निकाल कर अपने पास रख लिया. पुलिस अधिकारी का बेटा होने के नाते उसे पता था कि मोबाइल रखना खतरे से खाली नहीं है. उस ने सोचा तो ठीक था, लेकिन पकड़ा मोबाइल फोन से ही गया.

अब तक रात के 8 बज चुके थे. उस के पिता कभी भी आ सकते थे, इसलिए अब वह वहां से निकल जाना चाहता था. घर से बाहर आ कर वह सांताकु्रज लोकल स्टेशन पहुंचा, जहां से बोरीवली गया. वहां से गुजरात एक्सप्रैस पकड़ कर सूरत और वहां से जोधपुर एक्सप्रैस से जोधपुर चला गया. जोधपुर से कहीं और जाता, उस के पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

पूछताछ के बाद थानाप्रभारी महादेव बावले ने सिद्धांत के खिलाफ मां की हत्या का मुकदमा दर्ज कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे आर्थर रोड जेल भेज दिया गया. सिद्धांत अपनी ही मां की हत्या के आरोप में जेल में बंद है. लेकिन उसे मां की हत्या का जरा भी अफसोस नहीं है. सोचने वाली बात यह है कि अगर बेटे इस तरह क्रूर हो जाएंगे तो मांबाप की ममता का क्या होगा

तनु की त्रासदी : जिस्म की चाहत ने पहुंचा दिया मौत के पास

24 साल की तनु का रंग हालांकि बहुत साफ नहीं था, लेकिन कुदरत ने उसे कुछ इस तरह गढ़ा था कि जो भी उसे देखता, एक ठंडी आह भरने से खुद को रोक नहीं पाता था. सांवले सौंदर्य की मालकिन तनु के जिस्म की कसावट और फिगर देख मनचले गहरी सांसें लेते हुए फिकरे कसते थे तो खुद को शरीफजादा कहलाने और दिखलाने वाले भी उस की खिलती जवानी का नेत्रपान चोरीछिपी ही सही, करते जरूर थे.

किसी भी लड़की की छवि ऐसी जैसी कि ऊपर बताई गई है, यूं ही नहीं मन जाती, बल्कि इस में खुद उस के स्वभाव का भी बड़ा हाथ होता है. तनु खुले स्वभाव की लगभग उच्छृंखल युवती थी, जो किसी बंधन में नहीं बंधतीं. लेकिन एक ऐसे मजबूत सहारे की जरूरत उसे हमेशा महसूस होती रहती थी, जो उसे दुनियाजहान की दुश्वारियों से महफूज रखे.

आमतौर पर तनु जैसी महत्त्वाकांक्षी युवतियां जो सपने देखती हैं, उन्हें किसी भी शर्त पर या कोई भी जोखिम उठा कर पूरे करना भी जानती हैं. पर इस के लिए जो कीमत उन्हें चुकानी पड़ती है, वह कभीकभी इतनी भारी पड़ जाती है कि सौदा अंतत: उनके लिए घाटे का साबित होता है. तब उन के पास हाथ मलने और अपनी नादानियों पर पछताने के सिवाय कुछ भी नहीं रह जाता. जिंदगी को कुछ इसी तरह हलके में लेने की कीमत तनु ने कैसे चुकाई, यह जानने से पहले तनु के बारे में जान लेना जरूरी है.

इंदौर के गोयलनगर स्थित अड़ोसपड़ोस अपार्टमेंट में रहने वाली तनु राजौरिया की उम्र तब महज 11 साल थी, जब उस की मां का निधन हो गया था. इस उम्र में लड़कियां शारीरिक और मानसिक बदलावों के दौर से गुजरते हुए तनाव में रहती हैं. ऐसे में मां की कमी उन्हें और असुरक्षित बना देती है. यही तनु के साथ भी हुआ.

तनु के पिता श्याम सिंह राठौर ने दूसरी शादी नहीं की. लेकिन इस बात का अंदाजा उन्हें था कि इस उम्र की बेटी की परवरिश कर पाना उन के लिए आसान नहीं है. लिहाजा उन्होंने उसे अपनी साली यानी तनु की मौसी अनीता के पास भेज दिया. अनीता श्याम सिंह की इस उम्मीद पर खरी उतरीं कि सौतेली मां से बेहतर सगी मौसी होती है.

तनु को पालनेपोसने में अनीता ने न कोई कसर रखी, न भेदभाव किया. लेकिन तनु जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे अपनी मरजी की मालकिन होती गई. अनीता ने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी कि अपनी दिवंगत बहन की बेटी को बेहतर संस्कार दें, पर जवान होती तनु के सपने आम लड़कियों से कुछ हट कर थे. मौसी के घर कौशल्यापुरी में तनु ने जवानी में कदम रखा तो उस के इर्दगिर्द लड़कों की भीड़ जमा होने लगी.

तनु हर किसी को भले घास नहीं डालती थी, लेकिन उस की खूबसूरती के चर्चे हर कहीं होने लगे थे. वजह थी एक छरहरी युवती का भरे मांसल बदन का होना, उस की लंबी नाक और बड़ीबड़ी आंखें और पतले होंठों पर पसरी एक शोख मुसकराहट किसी का भी दिल धड़का देने के लिए काफी थी.

हालत यह थी कि मोहल्ले का हर लड़का तनु की नजदीकियां पाने को बेताब रहने लगा. लेकिन कोई भी तनु के तयशुदा पैमानों पर खरा नहीं उतर रहा था. उसे जो बातें अपने सपने के हीरो में चाहिए थीं, वे आखिरकार उसे दिखीं चंदन राजौरिया में.

चंदन कांग्रेस का छोटामोटा नेता और पेशे से प्रौपर्टी ब्रोकर था. वह दबंग भी था, जिस से दूसरे लड़के उस से खौफ खाते थे. 2-4 मुलाकातों में ही तनु ने उसे और उस ने तनु को दिल दे दिया. आजकल की लड़कियों को जैसे लड़के भाते हैं, चंदन ठीक वैसा ही था. माशूका का खयाल रखने वाला, उस पर पैसे लुटाने वाला और सजसंवर कर रहने वाला. लच्छेदार बातों और वादों में भी वह माहिर था.

तनु अब हवा में उड़ने लगी थी, पर उस की शुरू होती प्रेमकथा के किस्से शायद उड़तेउड़ते पिता श्याम सिंह के कानों तक पहुंच गए थे, इसलिए उन्होंने बेटी की शादी अहमदाबाद के एक तेल, गुड़ व्यापारी से न केवल तय कर दी, बल्कि कर भी दी. तनु और चंदन प्यार के रास्ते पर अभी इतने दूर नहीं पहुंचे थे कि वापस न लौट पाएं. तनु शादी कर के अहमदाबाद चली गई तो चंदन अपनी नेतागिरी और प्रौपर्टी डीलिंग के छोटेमोटे कामों में लग गया. पर दोनों ही एकदूसरे को भूल नहीं पाए.

ससुराल में तनु का मन नहीं लगा. वजह जैसी जिंदगी और पति उसे चाहिए था, वह उसे नहीं मिला. दुकानदार पति सुबह दुकान पर चला जाता तो देर रात को लौटता था. अकेली वह खीझ उठती. तनु के लिए शादीशुदा जिंदगी के मायने होटलिंग, शौपिंग और मौजमस्ती भर थे, जो पूरे नहीं हुए तो वह पति से बातबात पर कलह करने लगी. इस से जल्दी ही दांपत्य टूटने की कगार पर आ पहुंचा. यही वह चाहती भी थी, लेकिन इस की वजह कुछ और थी.

वजह था उस का पूर्व प्रेमी चंदन राजौरिया. शादी के बाद पहली बार विदा हो कर तनु मायके इंदौर आई तो चंदन से सामना होने पर दबा प्यार जाग उठा. कहां वह बोर दुकानदार पति और कहां यह बिंदास चंदन.

चालाक चंदन ने जल्दी ही तनु की इस कशमकश भांप ली और उस की गदराई जवानी हासिल करने का उसे यह सुनहरा मौका लगा. लिहाजा पहले तो उस ने तनु की ख्वाहिशों को हवा दी और फिर उन्हें पूरा करने के लिए शादी की पेशकश कर डाली.

तनु के लिए तो यह अंधा क्या चाहे, दो आंखें जैसी बात थी. पर चंदन से शादी करने के लिए जरूरी था पति से तलाक हो, जो आजकल खासतौर से नई पत्नियों के लिए मुश्किल काम नहीं है. तनु दोबारा अहमदाबाद गई तो चंदन के प्यार में महक रही थी. उस ने पति से की जाने वाली कलह की तादाद बढ़ा दी. फलस्वरूप तलाक मांगा तो पति को भी मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई. क्योंकि वह तनु की बेहूदा हरकतों और रोजरोज की कलह से आजिज आ चुका था.

तलाक के बाबत तनु ने पति से 5 लाख रुपए मांगे तो उस ने खुशीखुशी दे कर पत्नी से छुटकारा पा लिया. तनु इंदौर वापस आई तो चंदन और उस की मां शादी के लिए तैयार बैठे थे. पति से लिए 5 लाख रुपए उस ने चंदन को दे दिए. कुछ दिनों बाद चंदन ने वादा निभाते हुए उस से शादी कर ली. चंदन की मां राजकुमारी से उस की अच्छी पटरी बैठती थी.

चंदन से शादी के बाद उस के 2 साल अच्छे से गुजरे, ठीक वैसे ही जिस तरह से वह पहली शादी के पहले सपने देखा करती थी. पर यह शादी नहीं एक सौदा था, जिस के तहत तनु ने अपने पहले पति से गुजारे के लिए लिए गए 5 लाख रुपए बतौर दहेज चंदन को दे रखे थे.

लेकिन यहां भी दोनों के बीच वादविवाद और झगड़े होने लगे. चंदन का मकसद तनु की जवानी और खूबसूरती भोगना था, जो पूरा हो गया था. एक साल बाद ही इन के यहां एक बेटी हुई, जिस का नाम विनी रखा गया. चंदन का बदलता बर्ताव और बेरुखी देख कर तनु को समझ आने लगा कि इस से अच्छा तो वह दुकानदार पति ही था, जो उस का पूरा ध्यान रखता था.

झगड़े इतने बढ़ गए कि दोनों का साथ रहना दूभर हो गया. ऐसे में सास राजकुमारी ने तनु की परेशानी हल की. उस ने उसे समझाया कि जब चंदन से नहीं पट रही है तो उसे तलाक दे दो और एवज में 10 हजार रुपए हर महीने लेती रहो.

तनु के मायके वालों का जी उस की हरकतों के चलते पहले ही उचट चुका था, लिहाजा उन्होंने उस की दूसरी शादी के विवाद में न कोई दखल दिया और न ही दिलचस्पी दिखाई. चंदन को तलाक दे कर तनु अलग गोयलनगर के अपार्टमेंट अड़ोसपड़ोस के फ्लैट नंबर 103 में बेटी के साथ रहने लगी.

रिश्तों की ऐसी सौदेबाजी टीवी धारावाहिकों में ही देखने को मिलती है. तनु ने पहले पति से एकमुश्त 5 लाख रुपए लिए थे और दूसरे से 10 हजार रुपए महीना ले रही थी. एक तरह से यह देह की या यौनसुख की कीमत वसूलने जैसी बात थी, जिस का कोई अफसोस या ग्लानि उसे नहीं थी.

अब तनु आजाद थी, पर जल्दी ही यह आजादी उसे खलने लगी. इंदौर जैसे औद्योगिक शहर में एक अकेली लड़की का बिना किसी सहारे के रहना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है. गोयलनगर में शिफ्ट होने के बाद भी चंदन उस से मिलने आया करता था.

न जाने किस जादू के जोर से दोनों के बीच के विवाद सुलझ गए थे. अड़ोसपड़ोस अपार्टमेंट के अड़ोसियोंपड़ोसियों से तनु ने चंदन का परिचय पति के रूप में ही कराया था. लिहाजा सभी यह सोचते थे कि दोनों पतिपत्नी हैं और चंदन अकसर काम के सिलसिले में बाहर रहता है.

तन की भूख फिर से दूसरे पति से बुझने लगी तो तनु चंदन के पांवों में बिछने लगी और इस तरह बिछने लगी कि जब चंदन ने अपनी दूसरी शादी की बात उसे बताई तो उस के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. शिकन तो दूर की बात, सन 2015 की इस अनूठी शादी में विचित्र किंतु सत्य जैसी बात यह हुई थी कि आमंत्रण पत्र में तनु का नाम बतौर चंदन की बहन छपा था.

जाने क्या खिचड़ी तनु, चंदन और राजकुमारी के बीच पकी, जो तनु अपने दूसरे पति की दूसरी शादी में बहन की हैसियत से शामिल हुई और बारात में जम कर नाची भी. इतना ही नहीं, चंदन की सुहाग की सेज भी उस ने अपने हाथों से सजाई. किसी भी तरह के साहित्य में शायद ही ऐसी किसी घटना का वर्णन देखने को मिले, जो इंदौर की इस शादी में घटित हुआ था.

शादी के बाद भी चंदन गोयलनगर में तनु के पास आताजाता रहा और तनु की हर तरह की जरूरत भी पूरी करता रहा. 10 हजार रुपए महीने तो वह उसे दे ही रहा था. तनु अपनी तनहाई से समझौता कर के संतुष्ट हो चली थी. लेकिन चंदन के मन में उसे ले कर कुछ और ही चल रहा था, जो अब तक उस की रगरग से वाकिफ हो चुका था. चंदन का असली धंधा क्या था, इस का अंदाजा तनु को नहीं था. वह तो उसे प्रौपर्टी ब्रोकर समझती रही थी, जिस के एक बड़े कांग्रेसी नेता से अच्छे संबंध थे.

चंदन का एक दोस्त था महिम शर्मा. वह पेशे से वैसा ही पत्रकार था, जैसा कि चंदन नेता यानी कहने भर के लिए. फिर भी दोनों में अपनेअपने धंधे की ठसक भी थी और पैसा भी अच्छाखासा था. दरअसल, चंदन और महिम दोनों मिल कर एक गिरोह चलाते थे, जिस का काम लोगों को, खासतौर से व्यापारियों को फांस कर उन्हें ब्लैकमेल करना था. इस के लिए कई खूबसूरत लड़कियां इन दोनों ने पाल रखी थीं, जिन का काम सोशल मीडिया के जरिए व्यापारियों को फंसाना होता था.

शिकार जब जाल में फंस जाता था तो ये लड़कियां किसी लौज, होटल या फ्लैट में उसे बुलाती थीं और उस के साथ वैसी ही वैरायटी वाली सैक्सी हरकतें करती थीं, जैसी ब्लू फिल्मों में दिखाई जाती हैं. नई तकनीकों से अंजान व्यापारी इन लड़कियों के साथ सैक्स का लुत्फ तो उठाते थे, पर इस बात का अहसास उन्हें नहीं होता था कि उन की हरकतें कैमरे में कैद हो रही हैं, जो एक बार अगर दुनिया के सामने आ जाएं तो उन की इज्जत धूल में मिल जाना तय थी.

इसी से बचने के लिए कितने ही व्यापारी चंदन और महिम को पैसा दे चुके थे, इस का ठीकठाक हिसाबकिताब शायद ही कोई दे पाए, क्योंकि अधिकांश क्या, सभी व्यापारी अपनी ब्लू फिल्में देख कर पसीनेपसीने हो उठते थे और डरते भी थे कि अगर ये वायरल हो गईं तो वे कहीं के नहीं रहेंगे. घरगृहस्थी तो चौपट होगी ही, समाज और रिश्तेदारारी में भी छीछालेदर होगी. इसलिए वे चुपचाप इन दोनों को मुंहमांगा पैसा दे देते थे.

इस काम में एकलौती दिक्कत इन दोनों को यह थी कि जिस लड़की को ये चारे के रूप में इस्तेमाल करते थे, उसे खासी रकम देनी पड़ती थी और एक नया राजदार भी बनाना पड़ता था,जो एक तरह का खतरा ही था. चंदन और महिम ब्लैकमेलिंग के इस धंधे के खासे विशेषज्ञ हो चुके थे और मन ही मन उन अधेड़, जवान और बूढ़ों की हालत पर हंसते भी थे, जो कमसिन लड़कियों के जिस्म की चाहत में आ कर गाढ़ी कमाई उन्हें दे जाते थे.

चंदन का ध्यान जब इस तरफ गया कि अगर तनु उन के गिरोह में शामिल हो कर काम करने को तैयार हो जाए तो बात सोने पे सुहागा वाली होगी. उस पर बुरी तरह मरने वाली तनु न केवल भरोसेमंद थी, बल्कि उस का मांसल सैक्सी जिस्म उस की दूसरी खूबी थी, जिस की ब्लैकमेलिंग के धंधे में खासी अहमियत होती है.

चंदन को यह तो समझ में आ गया था कि पैसों के बाबत तनु ज्यादा मुंह नहीं फाड़ेगी, लेकिन अपनी पूर्वपत्नी को इतना तो वह जानने ही लगा था कि वह इस काम के लिए कभी तैयार नहीं होगी. वह जैसी भी थी, पर उस के अपने कुछ उसूल थे, जिन से ब्लैकमेलिंग की बात मेल नहीं खाती थी. बिस्तर में चंदन के मुताबिक कुलाटियां खाने वाली तनु इस काम के लिए आसानी से तैयार होगी, इस में उसे शक था.

इस के बाद भी उसे कोशिश करने में हर्ज महसूस नहीं हुआ. उस के खुराफाती दिमाग में आइडिया यह आया कि तनु को एक मर्द की जरूरत तो है ही, इसलिए क्यों न महिम का चक्कर उस से चलवा दिया जाए. इस से होगा यह कि अगर महिम और तनु के बीच जिस्मानी ताल्लुक कायम हो गए तो आसानी से तनु को शीशे में उतारा जा सकता है. इस बाबत उस ने पहले महिम का परिचय तनु से करवाया और फिर खुद धीरेधीरे उस से किनारा करने लगा.

अब अड़ोसपड़ोस अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 103 में महिम लगभग रोज आने लगा. वह सधा हुआ खिलाड़ी था, जिस से उसे देख कर औरों की तरह जीभ लपलपाने के बजाय मुकम्मल सब्र से काम लेते हुए उसे फंसाया. चंदन का अंदाजा सही निकला, जल्दी ही तनु और महिम में शारीरिक संबंध बन गए. तनु की मर्द की जरूरत अब महिम पूरी करने लगा.

जब इन दोनों को यकीन हो गया कि तनु अब न नहीं करेगी तो एक दिन उन्होंने उस के सामने अपना ब्लैकमेलिंग वाला राज खोल कर उसे भी इस धंधे में शामिल होने का न्यौता दिया. इस पर तनु भड़क उठी और सीधेसीधे मना कर दिया. जोशजोश में दोनों ने अपने सारे राज उस पर खोल दिए थे कि वे कैसे शिकार को फंसा कर उसे ब्लैकमेल करते हैं.

चूंकि तनु से न की उम्मीद नहीं थी, इसलिए दोनों दिक्कत में पड़ गए. डर इस बात का था कि कहीं ऐसा न हो कि यह नादान लड़की कभी उन का राज दुनिया के सामने उजागर कर दे. फिर भी हिम्मत न हारते हुए चंदन और महिम उसे पटाने की कोशिशें करते रहे और ढेर सारी दौलत का सब्जबाग दिखाते रहे.

लाख मनाने के बाद भी तनु राजी न हुई तो चंदन और महिम ने उसे हमेशा के लिए रास्ते से हटाने का खतरनाक फैसला न केवल ले डाला, बल्कि उस पर इस तरह अमल भी कर डाला कि अगर अनीता सजगता न दिखातीं तो तनु की मौत हमेशा के लिए एक राज बन कर रह जाती.

इंदौर में होली के पांचवें दिन रंगपंचमी का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. सारे शहर की दुकानें बंद रहती हैं और जगहजगह रंगपंचमी के जुलूस निकलते हैं और लोग तबीयत से रंग का यह त्यौहार मनाते हैं.

17 मार्च को महिम, चंदन और तनु ने रंगपंचमी की पार्टी रखी, जिस में तनु ने छक कर भांग पी. नशा ज्यादा हो जाने से उस की तबीयत बिगड़ने लगी तो चंदन उसे अपने साथ ले गया. अगले 3-4 दिनों तक वह लगातार तनु के फ्लैट पर आता रहा तो एक दिन किसी पड़ोसन ने तनु के बारे में पूछ लिया. चंदन ने उसे बताया कि तनु का इलाज उस के पिता के घर चल रहा है. वह तो यहां दीपक रखने आता है.

सभी की निगाह में चूंकि चंदन तनु का पति था, इसलिए उस की बात पर किसी ने किसी तरह का शक नहीं किया. 25 मार्च को तनु का जन्मदिन था. उस दिन मौसी अनीता उसे बधाई देने के लिए फोन लगाती रहीं, पर उस का फोन लगातार स्विच्ड औफ जा रहा था. लिहाजा उन्होंने खुद उस के घर जा कर उसे बधाई देने का फैसला किया.

25 मार्च की सुबह जब वह तनु के फ्लैट पर पहुंची तो वहां झूलता ताला देख कर हैरान रह गईं, क्योंकि तनु बगैर बताए गायब थी. इस पर उन्होंने पड़ोस में पूछताछ की तो पता चला कि तनु ने ज्यादा भांग पी ली थी, इसलिए उस का पति चंदन उसे पिता के घर ले गया था.

अनीता ने श्याम सिंह को फोन किया तो जवाब मिला कि तनु तो उन के यहां नहीं आई है. वह किसी अनहोनी की आशंका से घबरा गए, साथ ही अनीता के माथे पर भी बल पड़ गए. उन्होंने चंदन को फोन किया तो उस का भी फोन नहीं लगा.

श्याम सिंह भागेभागे अनीता के पास आए और तनु की खोजबीन की. लेकिन वह कहीं नहीं मिली तो उन्होंने थाना तिलकनगर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. तलाक होने के बाद भी चंदन तनु के पास आताजाता रहता था, यही बात पुलिस को चौंकाने वाली भी थी और सुराग देने वाली भी.

इंदौर के डीआईजी हरिनारायणचारी मिश्र ने तनु की खोज के लिए एएसपी अमरेंद्र सिंह को नियुक्त कर दिया. उन्होंने पहले उन दोनों की जन्म कुंडलियां खंगाली तो जल्द ही सारा सच सामने आ गया.

पता चला कि चंदन और महिम अव्वल दरजे के ब्लैकमेलर हैं, पर अभी तक किसी ने उन के खिलाफ रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई है. अलबत्ता दोनों अन्नपूर्णा इलाके में सन 2012 में हुई गोलीबारी में भी शामिल थे. इन पर एक और दूसरा आपराधिक मामला इसी साल फरवरी में दर्ज हुआ था.

शक के आधार पर क्राइम ब्रांच ने चंदन और महिम को गिरफ्तार किया, पर पूछताछ में कुछ हासिल नहीं हुआ. दोनों ही पुलिस को गुमराह करने वाले बयान देते रहे. दरअसल, इस में दिक्कत यह थी कि एक पत्रकार था और दूसरा बड़े कांग्रेसी नेता का चेला. ऐसे में अगर इन के साथ जोरजबरदस्ती की जाती तो खासा बवाल मच सकता था.

सब कुछ साफ समझ में आ रहा था, इसलिए अमरेंद्र सिंह ने जोखिम उठाया और चंदन तथा महिम से सख्ती की तो वे टूट गए और सारा सच उगल दिया. सच बड़ा वीभत्स था. दोनों ने 17 मार्च को ही तनु की हत्या उस के फ्लैट में कर दी थी. भांग के नशे में चूर तनु को शायद पता भी नहीं चला था कि उसे किस ने और कैसे मार डाला. चूंकि त्यौहारी सन्नाटा था, इसलिए तनु की हत्या कर उस की लाश ज्यों की त्यों छोड़ कर दोनों अपनेअपने घर चले गए थे.

अगले दिन दोनों फिर फ्लैट पर आए और तनु की लाश के 16 टुकड़े कर उन्हें फ्रिज में ठूंस दिया, जिस से बदबू न आए. 3-4 दिन चंदन अपना डर मिटाने फ्लैट पर आताजाता रहा. चौथे दिन फ्लैट में दाखिल होते ही उसे मांस के टुकड़ों से गंध आती महसूस हुई तो दोनों ने मिल कर लाश के उन टुकड़ों को अलगअलग थैलियों में पैक कर के उन्हें कार में रख कर बड़वाह के जंगल में फेंक आए.

चंदन और महिम के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने के लिए जरूरी था कि तनु की लाश का कोई टुकड़ा मिले. इस बाबत पुलिस वाले लगातार भागादौड़ी करते रहे. पुलिस की आधा दर्जन टीमें जंगलों की खाक छानती रहीं, पर तनु की लाश का कोई टुकड़ा उन्हें नहीं मिला. नदियों में भी तलाशी ली गई, पर उस से भी कुछ हासिल नहीं हुआ. बस एक गुदड़ी ही बरामद हो पाई.

इस बिना पर आईपीसी की धाराओं 302 व 201 के तहत हत्या का मामला दर्ज कर पुलिस ने चंदन राजौरिया और पत्रकार महिम शर्मा को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. इन के बयानों से जो कहानी सामने आई, उसे आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.

दोनों मुजरिमों ने अपने बयान में जुर्म जरूर स्वीकार कर लिया है, पर अदालत में उसे साबित कर पाना टेढ़ी खीर होगी, क्योंकि तनु की हत्या का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, उस की लाश भी बरामद नहीं हुई है. इस के अलावा हत्या में प्रयुक्त हथियार भी नहीं मिले हैं. ऐसे में संदेह का लाभ उन्हें मिल सकता है. तय है, बचाव पक्ष का वकील यह दलील भी देगा कि इस से तो यह भी साबित नहीं होता कि वाकई तनु की हत्या हुई है. पुलिस ने जोरजबरदस्ती कर उस के मुवक्किलों से झूठ बुलवा लिया है.

अंजाम कुछ भी हो, पर अपनी इस हालत की एक बड़ी जिम्मेदार तनु खुद भी थी, जो 2 में से एक पति की भी न हुई और एक ऐसे ब्लैकमेलर पर अपना सब कुछ लुटा बैठी, जिस ने अंतत: उस की सांसें छीन लीं. क्योंकि वह गुनाह में उस का साथ देने को तैयार नहीं हो रही थी.

प्रेम के 11 टुकड़े : पति और सास ससुर ने की बहू की हत्या

6 मई, 2017 की बात है. दिन के यही कोई 9 बज रहे थे. नवी मुंबई के उपनगर रबाले के शिलफाटा रोड स्थित एमआईडीसी के बीच से बहने वाले नाले पर एक सुनसान जगह पर काफी लोग इकट्ठा थे. इस की वजह यह थी कि नाले की घनी झाडि़यों के बीच प्लास्टिक का एक बैग पड़ा था. उस में एक मानव धड़ भर कर फेंका गया था. उस का सिर, दोनों हाथ और पैर गायब थे.

यह हत्या का मामला था. इसलिए किसी जागरूक नागरिक ने इस की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी थी.

चूंकि घटनास्थल नवी मुंबई के थाना एमआईडीसी के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिलते ही थानाप्रभारी चंद्रकांत काटकर ने चार्जरूम में ड्यूटी पर तैनात सहायक इंसपेक्टर अमर जगदाले को बुला कर डायरी बनवाई और तुरंत सहायक इंसपेक्टर प्रमोद जाधव, अमर जगदाले और कुछ सिपाहियों को ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

घटनास्थल पर पहुंच कर थानाप्रभारी चंद्रकांत काटकर ने वहां एकत्र भीड़ को हटा कर उस प्लास्टिक के बैग को झाडि़यों से बाहर निकलवाया. बैग में भरा धड़ बाहर निकलवाया गया. वह धड़ किसी महिला का था. हत्या के बाद लाश को ठिकाने लगाने के लिए उस का सिर और हाथपैर काट कर केवल धड़ वहां फेंका गया था. घटनास्थल की काररवाई निपटा कर चंद्रकांत काटकर ने धड़ को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. लेकिन पोस्टमार्टम के लिए भेजने से पहले उन्होंने डीएनए जांच के लिए सैंपल सुरक्षित करवा लिया था.

मृतका के बाकी अंग न मिलने से पुलिस समझ गई कि हत्यारा कोई ऐरागैरा नहीं, काफी होशियार और शातिर था. खुद को बचाने के लिए उस ने सबूतों को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

धड़ के साथ ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की शिनाख्त हो सकती. धड़ के निरीक्षण में पुलिस को उस की बची बांह पर सिर्फ गणेश भगवान का एक टैटू दिखाई दिया था. इस से यह तो स्पष्ट हो गया था कि मृतका हिंदू थी, लेकिन सिर्फ एक टैटू से शिनाख्त होना संभव नहीं था. फिर भी पुलिस को उम्मीद की एक किरण तो मिल ही गई थी.

घटनास्थल की काररवाई निपटा कर थानाप्रभारी थाने लौटे और सहायकों के साथ बैठ कर विचारविमर्श के बाद इस मामले को सुलझाने की जिम्मेदारी इंसपेक्टर प्रमोद जाधव को सौंप दी थी.

मामले की जांच की जिम्मेदारी मिलते ही प्रमोद जाधव ने तुरंत मुंबई और उस के आसपास के सभी छोटेबड़े थानों को वायरलैस संदेश भिजवा कर यह पता लगाने की कोशिश की कि किसी थाने में किसी महिला की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. इसी के साथ उन्होंने मृतका की बाजू पर बने गणेश भगवान के टैटू को हाईलाइट करते हुए महानगर के सभी प्रमुख दैनिक अखबारों में फोटो छपवा कर उस धड़ की शिनाख्त की अपील की.

अखबार में छपी इस अपील का पुलिस को फायदा यह मिला कि धड़ की शिनाख्त हो गई. वह धड़ प्रियंका गुरव का था. उस की गुमशुदगी मुंबई के पौश इलाके के थाना वरली में दर्ज थी. ठाणे के डोंबिवली कल्याण की रहने वाली कविता दूधे और उन के भाई गणेश दूधे ने उस धड़ को अपनी छोटी बहन प्रियंका का धड़ बताया था.

अखबार में खबर छपने के अगले दिन सवेरे कविता दूधे अपने भाई गणेश दूधे के साथ थाना एमआईडीसी पहुंची और चंद्रकांत काटकर से मिल कर बांह पर बने गणेश भगवान के टैटू से आशंका व्यक्त की थी कि वह धड़ उन की बहन प्रियंका का हो सकता है. क्योंकि 5 मई, 2017 से वह गायब है.

ससुराल वालों के अनुसार, वह सुबह किसी नौकरी के लिए इंटरव्यू देने घर से निकली थी तो लौट कर नहीं आई थी. कविता ने बरामद धड़ देखने की इच्छा जाहिर की, क्योंकि वह उस टैटू को पहचान सकती थी. प्रियंका ने अपनी बांह पर वह टैटू उसी के सामने बनवाया था.

चंद्रकांत काटकर ने कविता और गणेश को धड़ दिखाने के लिए इंसपेक्टर प्रमोद जाधव के साथ अस्पताल के मोर्चरी भिजवा दिया. धड़ देखते ही कविता और गणेश फूटफूट कर रो पड़े थे. इस से साफ हो गया था कि वह धड़ प्रियंका का ही था. इस तरह धड़ की शिनाख्त हो गई तो जांच आगे बढ़ाने का रास्ता मिल गया.अब पुलिस को यह पता लगाना था कि प्रियंका की हत्या क्यों और किस ने की? पूछताछ में प्रियंका की बहन कविता और भाई गणेश ने बताया था कि प्रियंका ने वर्ली स्थित पीडब्ल्यूडी के सरकारी आवास में अपने परिवार के साथ रहने वाले सिद्धेश गुरव से 30 अप्रैल, 2017 को प्रेम विवाह किया था.

भाईबहन ने प्रियंका को इस विवाह से मना किया था. इस की वजह यह थी कि न सिद्धेश उस से विवाह करना चाहता था और न ही उस के घर वाले चाहते थे कि सिद्धेश प्रियंका से विवाह करे. आखिर वही हुआ, जिस की उन्हें आशंका थी. प्रियंका के हाथों की मेहंदी का रंग फीका होता, उस से पहले ही उस की जिंदगी का रंग फीका हो गया.

इस के बाद पुलिस ने मृतका के पति सिद्धेश और उस के घर वालों को थाने बुला कर पूछताछ की तो उन्होंने भी वही सब बताया, जो कविता और गणेश बता चुके थे. उन का कहना था कि 5 मई की सुबह इंटरव्यू के लिए गई प्रियंका रात को भी घर लौट कर नहीं आई तो उन्हें चिंता हुई. सभी पूरी रात उस की तलाश करते रहे. जब कहीं से भी उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्होंने अगले दिन यानी 6 मई को थाना वर्ली में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

थाना एमआईडीसी पुलिस तो इस मामले की जांच कर ही रही थी, क्राइम ब्रांच के सीनियर इंसपेक्टर जगदीश कुलकर्णी भी इस मामले की जांच कर रहे थे. प्रियंका की ससुराल वालों ने जो बयान दिया था, उस में उन्हें दाल में कुछ काला नजर आ रहा था. जब उन्होंने प्रियंका के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई तो उन्हें पूरी दाल ही काली नजर आई.

ससुराल वालों ने जिस दिन प्रियंका के बाहर जाने की बात बताई थी, मोबाइल फोन की लोकेशन के अनुसार उस दिन पूरे दिन प्रियंका घर पर ही थी. वह घर से बाहर गई ही नहीं थी. इस के अलावा किसी संपन्न परिपवार की बहू विवाह के मात्र 5 दिनों बाद ही नौकरी के लिए किसी कंपनी में इंटरव्यू देने जाएगी, यह भी विश्वास करने वाली बात नहीं थी. उस समय तो वह पति के साथ खुशियां मनाएगी.

मामला संदिग्ध लग रहा था. लेकिन परिवार सम्मनित था, इसलिए उन पर हाथ डालने से पहले इंसपेक्टर जगदीश कुलकर्णी ने अधिकारियों से राय ली. अधिकारियों ने आदेश दे दिया तो वह प्रियंका के पति सिद्धेश, ससुर मनोहर गुरव और मां माधुरी गुरव को क्राइम ब्रांच के औफिस ले आए.

सभी से अलगअलग पूछताछ की गई तो आखिर में प्रियंका की हत्या का खुलासा हो गया. पता चला कि इन्हीं लोगों ने प्रियंका की हत्या की थी. इस पूछताछ में प्रियंका की हत्या से ले कर उस की लाश को ठिकाने लगाने तक की जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी.

25 वर्षीय सिद्धेश गुरव का परिवार मुंबई से सटे ठाणे के उपनगर कल्याण बासिंद में रहता था. उस के पिता का नाम मनोहर गुरव और मां का माधुरी गुरव था. परिवार छोटा और सुखी था. मनोहर गुरव सरकारी नौकरी में थे. रहने के लिए सरकारी आवास मिला था. सिद्धेश गुरव उन का एकलौता बेटा था, जिसे पढ़ालिखा कर वह सीए बनाना चाहते थे.

सिद्धेश पढ़ाईलिखाई में तो ठीकठाक था ही, महत्त्वाकांक्षी भी था. वह सीए तो नहीं बन सका, लेकिन पढ़ाई पूरी होते ही उसे मुंबई के विक्रोली स्थित टीसीएस कंपनी में उसे अच्छी नौकरी मिल गई थी. बेटे को नौकरी मिलते ही मनोहर गुरव का भी प्रमोशन हो गया था. इस के बाद उन्हें रहने के लिए मुंबई के वर्ली स्थित पीडब्ल्यूडी कालोनी में बढि़या सरकारी आवास मिल गया. इस के बाद वह अपना बासिंद का घर छोड़ कर वर्ली स्थित सरकारी आवास में रहने आ गए.

22 साल की प्रियंका सिद्धेश के साथ ही पढ़ती थी. खूबसूरत प्रियंका की पहले सिद्धेश से दोस्ती हुई, उस के बाद दोनों में प्यार हो गया. आकर्षक शक्लसूरत और शांत स्वभाव का सिद्धेश प्रियंका को भा गया था. ऐसा ही कुछ सिद्धेश के साथ भी था.

प्रियंका अपनी बड़ी बहन कविता दूधे, भाई गणेश दूधे और बूढ़ी मां के साथ कल्याण के उपनगर दिवा गांव में रहती थी. पिता की बहुत पहले मौत हो चुकी थी. मां ने किसी तरह दोनों बेटियों और बेटे को पालपोस कर बड़ा किया था. कविता सयानी हुई तो मां की सारी जिम्मेदारी उस ने अपने कंधों पर ले ली. उस ने प्रियंका और भाई को पढ़ाया-लिखाया, जबकि वह खुद ज्यादा पढ़लिख नहीं पाई थी. लेकिन वह प्रियंका और गणेश को पढ़ालिखा कर उन्हें अच्छी जिंदगी देने का सपना जरूर देख रही थी.

प्रियंका और सिद्धेश की प्रेमकहानी की शुरुआत 3 साल पहले सन 2014 में हुई थी. उस समय डोंबिवली कालेज में दोनों एक साथ पढ़ रहे थे. दोनों में प्यार हुआ तो साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खाई गईं. इस के बाद दोनों में शारीरिक संबंध भी बन गए.

लेकिन जब सिद्धेश को नौकरी मिल गई और उस के पिता का प्रमोशन हो गया तो वह परिवार के साथ वर्ली रहने चला गया. इस के बाद कुछ दिनों तक तो वह प्रियंका से मिलता रहा और शादी करने की बात करता रहा, लेकिन धीरेधीरे उस ने प्रियंका से मिलनाजुलना कम कर दिया.

इस के बाद वह सिर्फ फोन पर ही प्रियंका से बातें कर के रह जाता था. प्रियंका जब भी उस से मिलने की बात करती, कोई न कोई बहाना बना कर वह टाल देता था. वह शादी की बात करती तो कहता कि अभी शादी की इतनी जल्दी क्या है, जब समय आएगा, शादी भी कर लेंगे.

अचानक प्रियंका को जो जानकारी मिली, उस से उस का सारा अस्तित्व ही हिल उठा. उसे कहीं से पता चला कि सिद्धेश के जीवन में कोई और लड़की आ गई है, जिस में उस के मांबाप की भी सहमति है. इस से वह परेशान हो उठी. जब इस बात की जानकारी उस के घर वालों को हुई तो उन्होंने उसे समझाया कि ऐसे में उस का सिद्धेश से विवाह करना ठीक नहीं है.

लेकिन प्रियंका ने तो ठान लिया था कि वह विवाह सिद्धेश से ही करेगी. क्योंकि वह मर्यादाओं की सारी सीमाएं तोड़ चुकी थी, इसलिए उस ने अपने घर वालों की बात भी नहीं मानी.

निश्चय कर के एक दिन प्रियंका सिद्धेश से मिली और विवाह के बारे में पूछा. सिद्धेश ने यह कह कर टालना चाहा कि वह उस के मांबाप को पसंद नहीं है, इसलिए वह उस से शादी नहीं कर सकता. इस पर प्रियंका ने कहा, ‘‘मुझे तुम्हारे मांबाप पसंद नहीं करते तो न करें, तुम तो मुझे पसंद करते हो. शादी के बाद हम मांबाप को राजी कर लेंगे.’’

प्रियंका की इस बात का सिद्धेश के पास कोई जवाब नहीं था. कुछ देर तक चुप बैठा वह सोचता रहा, उस के बाद बोला, ‘‘मैं मजबूर हूं. मैं अपने मांबाप के खिलाफ नहीं जा सकता. तुम मुझे भूल जाओ.’’

‘‘तुम मुझे भूल सकते हो, लेकिन मैं तुम्हें नहीं भूल सकती. तुम ने मुझे खिलौना समझ रखा है क्या कि जब तक मन में आया खेला और जब मन भर गया तो फेंक दिया? शादी का वादा कर के मेरे मन और तन से खेलते रहे. देखा जाए तो एक तरह से मेरा यौनशोषण करते रहे. अब तुम्हें कोई दूसरी लड़की मिल गई है तो मुझ से पीछा छुड़ा रहे हो. अगर तुम ने शादी नहीं की तो मैं तुम्हारे खिलाफ शादी का झांसा दे कर यौनशोषण का मुकदमा दर्ज कराऊंगी.’’

प्रियंका की इस धमकी से सिद्धेश और उस के घर वाले घबरा गए. समाज और नातेरिश्तेदारों में बदनामी से बचने के लिए सिद्धेश ने प्रियंका से शादी कर ली. इस में घर वालों ने भी रजामंदी दे दी. इस तरह सिद्धेश और प्रियंका ने प्रेम विवाह कर लिया.

सिद्धेश ने विवाह तो कर लिया, लेकिन यह एक तरह की जबरदस्ती की शादी थी. इसलिए प्रियंका को ससुराल में जो प्यार और सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला. सम्मान देने की कौन कहे, उस के पति और सासससुर तो किसी तरह उस से पीछा छुड़ाने की सोच रहे थे.

इस के लिए सिद्धेश और उस के मांबाप ने साजिश रच कर 4-5 मई, 2017 की रात प्रियंका जब गहरी नींद में सो रही थी, तब सिद्धेश ने उस के मुंह पर तकिया रख कर उसे हमेशा के लिए सुला दिया.

प्रियंका की हत्या के बाद जब उस की लाश को ठिकाने लगाने की बात आई तो सिद्धेश और उस के मांबाप ने डोंबिवली के रहने वाले अपने परिचित अपराधी प्रवृत्ति के दुर्गेश कुमार पटवा से संपर्क किया. प्रियंका की लाश को ठिकाने लगाने के लिए उस ने एक लाख रुपए मांगे.

सौदा तय हो गया तो दुर्गेश ने मदद के लिए डोंबिवली के ही रहने वाले अपने मित्र विशाल सोनी को सैंट्रो कार सहित बुला लिया. विशाल के आने पर दुर्गेश ने प्रियंका की लाश को बाथरूम में ले जा कर उस के 11 टुकड़े किए. लाश के टुकड़े करने के लिए हथियार वे अपने साथ लाए थे.

लाश के टुकड़ों को अलगअलग प्लास्टिक के बैग में अच्छी तरह से पैक कर विशाल ने उन्हें कार में रखा और 5-6 मई, 2017 की रात धड़ को रबाले के नाले में तो सिर को ले जा कर शाहपुर के जंगल में फेंका. कमर के नीचे के हिस्से और हाथों को अमरनाथ-बदलापुर रोड के बीच स्थित खारीगांव की खाड़ी में ले जा कर पैट्रोल डाल कर जला दिया.

लाश ठिकाने लग गई तो 6 मई को सिद्धेश अपने मांबाप के साथ थाना वर्ली पहुंचा और प्रियंका की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने तो सोचा था कि सब ठीक हो गया है, लेकिन 3 दिनों बाद ही सब गड़बड़ हो गया, जब क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर जगदीश कुलकर्णी ने पूछताछ के लिए उन्हें अपने औफिस बुला लिया. मामले का खुलासा होने के बाद उन्होंने सभी को थाना एमआईडीसी पुलिस के हवाले कर दिया.

सिद्धेश, उस के पिता मनोहर तथा मां माधुरी से पूछताछ कर मामले की जांच कर रहे प्रमोद जाधव ने 12 मई, 2017 को दुर्गेश पटवा को डोंबिवली से तो 14 मई को विशाल सोनी को भी उस के घर से सैंट्रो कार सहित गिरफ्तार कर लिया. इन की निशानदेही पर पुलिस ने प्रियंका के सिर तथा बाकी अंगों की राख बरामद कर ली थी.

सबूत जुटा कर पुलिस ने सिद्धेश गुरव, उस के पिता मनोहर गुरव, मां माधुरी गुरव, दुर्गेश कुमार पटवा और विशाल सोनी को अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

  • कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

‘पद्मावती’ : फिल्म के बहाने कट्टरपन को हवा

नारी अस्मिता और राजपूती गौरव का बहाना ले कर संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ पर मचाया जा रहा शोर असल में हमारी सोच के कट्टरपन की पूरी पोल खोल रहा है. 21वीं सदी में जीते हुए और एटम बम बनाने या चंद्रयान, मंगलयान भेजने वाला यह देश असल में आज भी 16वीं सदी से आगे नहीं बढ़ पाया है जब सुनीसुनाई बातों पर विश्वास करने में भारत और यूरोप में कोई फर्क नहीं था.

हम ने कहने को तो लोकतंत्र अपना लिया है, जिस में विचारों की स्वतंत्रता को महत्त्व दे दिया है पर असल में हम आज भी पौराणिक युग में ही जी रहे हैं जब औरतों को लगभग सभी समाजों में, उन समाजों में भी जिन से हमारा सीधा संबंध न के बराबर था, दबा कर, गुलामों से भी बदतर तरीके से रखा गया था.

‘पद्मावती’ में ऐसा क्या है, जिस से राजपूत कहे जाने वाले लोग बौखला रहे हैं का पता तो फिल्म के प्रदर्शन के बाद ही चलेगा पर इस में नैतिक, ऐतिहासिक और प्रस्तुतिकरण के बारे में कुछ आपत्तिजनक नहीं है, यह सुप्रीम कोर्ट के रुख से स्पष्ट है.

मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित पुस्तक ‘पद्मावत’ पर आधारित राजस्थानी पृष्ठभूमि की कथा में अगर कुछ बुरा लगने वाला है तो वह यह है कि उस युग में एक पुरुष अपनी पत्नी को बचाने के लिए उस पर सौदा करता था, उसे राजगद्दी बचाने के लिए इस्तेमाल करता था. उस की पत्नी हमलावर के पास जाना चाहती थी या नहीं यह छोडि़ए पर उस युग की औरतें संपत्ति ही थीं यह जरूर कहानी में स्पष्ट है. इस कहानी पर बनी फिल्म यदि उस काल की याद दिलाए तो इस में क्या हरज है खासतौर पर तब जब आज भी जमाना कुछ वैसा ही सा है.

कहने को तो हमारे विश्वविद्यालय लड़कियों से भरे हैं, महिलाएं मंत्री हैं, अफसर हैं, प्रबंधक हैं पर जरा सी परत कुरेदेंगे तो पता चल जाएगा कि औरतें आज भी सौदे की चीज हैं. इसे दर्शाना और पृष्ठभूमि के लिए किसी प्राचीन रचना का इस्तेमाल करना कतई गलत नहीं है. कट्टरपंथियों को यह हक नहीं कि वे इस का विरोध कर समाज में पुराने व सड़ेगले मूल्यों को फिर से स्थापित करने की कोशिश करें.

अगर हम हर जगह शिवाजी, महाराणाप्रताप, देवीदेवताओं की मूर्तियां लगाएंगे कि ये सब हमारे आदर्श हैं, तो हमें यह अवसर भी मिलना चाहिए कि इन आदर्श ऐतिहासिक, पौराणिक या धार्मिक मूर्तियों के पीछे का सच क्या है, बता सकें. असल में इन आदर्शों की गलत बातें समाज भूलता नहीं है और राम का सीता को निकालना, विष्णु का मोहिनी अवतार बनना, शिव का जहर पीना, देवताओं का अमृत छीनना, शिवाजी का जाति विशेष से होना, राजपूतों का मुगलों से समझौता कर लेना न न करते भी उदाहरण देने के काम आता है.

परदा प्रथा, घर के लिए महिलाओं की बलि देना, कन्या भू्रण हत्या, बेटी को घर में बंद रखना आदि उसी कट्टर सोच का हिस्सा हैं जिस में समाज सदियों तक जीता रहा है और आज की नई वैचारिक क्रांति के बावजूद देश भर की औरतों पर जुल्मों की कमी नहीं है. महिला आयोग के पास आने वाली  सैकड़ों शिकायतें यह स्पष्ट करती हैं कि भारतीय समाज में औरतों के साथ मारपीट, बलात्कार, छेड़खानी, संपत्ति में हिस्सा देने में आनाकानी करना अभी भी बंद नहीं हुआ है.

फिल्म ‘पद्मावती’ का विरोध करने वाले लोग वे ही हैं, जो नहीं चाहते कि पौराणिक सोच में कोई परिवर्तन हो, लोग नई चेतना, नए प्रकाश में जिएं.

ये लोग पुरोहित, पंडे, मौलवी, पादरी का तंत्र बनाए रखना चाहते हैं. अब इन्होंने राष्ट्रवाद और देशभक्ति का बहाना भी लेना शुरू कर दिया है और धार्मिक कट्टरता को देश की अस्मिता का नाम देना शुरू कर दिया है. हिंदू समाज बड़ी चतुराई से मुसलिम या ईसाई कट्टरपन की भी रक्षा करने लग गया है ताकि धर्म के हर सुधार को देशभक्ति पर उठाए सवाल के बराबर मान लिया जाए.

अरे जनाब क्यों कह रही हैं आप निटिंग कला को बायबाय

एक समय था जब कढ़ाईबुनाई करना महिलाओं के व्यक्तित्व का एक जरूरी हिस्सा हुआ करता था. महिलाएं अपना चूल्हाचौका समेटने के बाद दोपहर में कुनकुनी धूप का सेवन करते हुए स्वैटर बुनने बैठ जाती थीं. गपशप तो होती ही थी, साथ ही एकदूसरे से डिजाइनों का भी आदानप्रदान हो जाता था. तब घर के हर सदस्य के लिए स्वैटर बुनना हर महिला का प्रिय शगल होता था.

मगर आज की युवा पीढ़ी ने तो निटिंग जैसी कला को गुडबाय ही कह दिया है. कौन पहनता है हाथ से बुने स्वैटर’, ‘यह ओल्ड फैशन ऐक्टिविटी है’ जैसे जुमलों ने महिलाओं को हाथ से बनाने की कला को दूर कर दिया है. पर इन सब जुमलों के बावजूद मैं ने निटिंग के प्रति अपना दीवानापन नहीं छोड़ा. उस दुनिया से छिपा कर बुनती रही, जो इस कला को ओल्ड फैशन मानती है.

आश्चर्य तो तब हुआ जब मैं ने जरमनी की यात्रा के दौरान अपनी हवाईयात्रा में एक जरमन महिला को मोव कलर के दस्ताने बुनते देखा. फिर वहां मैट्रो में कुछ महिलाओं को निटिंग करते देखा. वहां एक स्टोर में जाने का मौका मिला तो पाया कि लोग किस कदर हाथ से बुने स्वैटर पहनने के इच्छुक हैं. वे स्टोर में रखी किताबों में से स्वैटर की डिजाइनें ढूंढ़ कर वहां बैठी महिलाओं को और्डर दे रहे थे. मुझे यह जान कर अच्छा लगा कि इस भौतिकवादी देश में भी लोग हैंडमेड चीजों के प्रति आकर्षित हैं.

विदेशों में है निटिंग का क्रेज

हाल ही में मैं ने अमेरिका की यात्रा की तो निटिंग संबंधी स्टोर देखना मेरे पर्यटन में शामिल था. बोस्टन शहर की ब्रौड वे गली में ‘गैदर हेयर’ नामक एक स्टोर है. जैसा नाम वैसा ही पाया मैं ने. अंदर का नजारा कलापूर्ण तो था ही गैदर हेयर जैसा भी था. एक बड़ी गोल टेबल के पास घेरे में 8 महिलाएं सलाइयां ले कर जुटी थीं. सब सीखने के मकसद से आई थीं. सोफिया ने बताया कि वह अपने भाई के लिए टोपी बुन रही है. लारा अपने बेटे के लिए जुर्राबें बुन रही थी. उन महिलाओं में एक मांबेटी का भी जोड़ा था. उन से संवाद करने पर पता चला कि वे महीने के दूसरे मंगलवार और चौथे बृहस्पतिवार को यहां इकट्ठा होती हैं. यहां वे एकदूसरे से डिजाइन सीखतीसिखाती हैं और अपनी कला को निखारती हैं.

उसी हाल के दूसरे कोने में 2 पुरुष और 1 महिला बैठे थे, जो अपने तैयार स्वैटरों पर बटन लगाने की तैयारी कर रहे थे. एक कोने में चायकौफी और स्नैक्स का सामान रखा था, जो उन महिलाओं के लिए ही था. स्टोर ढेर सारे कच्चे सामान के साथ सुंदर तरीके से सजा था.

मैं हैरान थी यह सब देख कर. मुझे अपने देश में बिताए वे दिन याद आ रहे थे जब मैं ने अपनी दादी, नानी, बूआ, मौसी को घर में कुनकुनी धूपी सेंकते हुए यह सब करते देखा था. पर अब मेरे देश से सब नजारे करीबकरीब गायब हैं.

युवतियों और महिलाओं के हाथों में मोबाइल हैं और कानों में स्पीकर. नैट यूजर लड़कियां यह भी नहीं जानतीं कि नैट सर्च कर के भी हैंडमेड चीजों का खजाना ढूंढ़ा जा सकता है और उन्हें बनाने की कला भी सीखी जा सकती है.

निटिंग जैसी कलाएं न तो आप को बोर होने देती हैं और न ही आप को अकेलेपन का एहसास कराती हैं. इतना ही नहीं आप के दिमाग के संतुलन को बनाए रखने में भी ये कलाएं बहुत कारगर सिद्ध होती हैं.

विदेशों में हाइपरटैंशन के मरीजों की परची पर डाक्टर द्वारा इलाज की सूची में दवा के साथ निटिंग भी लिखा जाता है यानी डाक्टर द्वारा सलाह दी जाती है कि यदि आप निटिंग करेंगे तो आप का बीपी संतुलित रहेगा.

दिमाग रहे तरोताजा

अमेरिका जैसे देश में जहां लोग भौतिक सुखसुविधाओं से पूरी तरह संपन्न हैं, फिर भी निटिंग कला को खूबसूरती से बचाए हुए हैं. बोस्टन स्थित विश्व की नंबर वन यूनिवर्सिटी में भी एक कक्ष ऐसा है जहां ऊन, सलाइयां, क्रोशिया, धागा, सूई, बटन आदि सब रखे हैं. जब विद्यार्थी पढ़ाई करतेकरते थक जाएं तो इस कक्ष में आ कर अपनी मनपसंद क्रिएटिविटी कर सकते हैं और अपने दिमाग को फिर से तरोताजा कर सकते हैं.

एक बार मेरी बेटी जो बोस्टन में एमआईटी में पढ़ाई कर रही है, ने बेहद उत्साहित हो कर बताया, ‘‘मां, मैं एक सेमिनार में समय से कुछ पहले पहुंच गई, तो वहां देखा कि लैक्चर देने वाली प्रोफैसर निटिंग कर रही है.’’

मगर हमारे देश में अब निटिंग कला लुप्तप्राय: हो रही है. बड़ा स्वैटर या जर्सी नहीं तो कुछ छोटा ही बुनिए जैसे टोपी, जुराबें आदि. एक बार मेरी मां थोड़ी बीमार हो गईं, तब मैं ने उन के सामने ऊन, सलाइयां ला कर रख दीं. मां ने न जाने कितनी जोड़ी जुर्राबें बुन दीं. फिर तो जो भी उन की कुशलमंगल पूछने आता उसे जुर्राबों का एक जोड़ा उपहार में मिल जाता. मां के चेहरे की संतुष्टि और उपहार पाने वाले की खुशी देखते ही बनती थी. सच, निटिंग करने का सुख अलग ही है. एक बार निटिंग कर के तो देखिए इस सर्दी में.

ट्रंप का यरुशलम को मान्यता देना है एक खतरनाक शुरुआत

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का इजरायल की राजधानी के रूप में यरुशलम को मान्यता देना एक खतरनाक शुरुआत है. यह सबको दुखी करने वाला है. इससे वे लोग हताश और निराश हुए हैं, जो पश्चिम एशिया में शांति की आकांक्षा पाले हुए थे और इसके समर्थक हैं.

ट्रंप प्रशासन की यह कारस्तानी फलस्तीन मामले के समाधान की दिशा में बड़ी और नए तरह की बाधा साबित होगी. कहने की जरूरत नहीं कि ट्रंप के इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है. अमेरिका ने फलस्तीन संकट में खुद को एक पार्टी बना लिया है, जिसका खामियाजा उसे ही नहीं, अन्य पक्षों को भी भुगतना होगा.

ट्रंप के इस कदम से इजरायल और फलस्तीन को लेकर अमेरिका का दोहरा चरित्र भी सामने आ गया है. अतीत में अमेरिका जो काम बिना बोले, खामोशी से करता रहा है, अनेक राष्ट्रपतियों ने जिस मामले को ठंडे बस्ते में डाल रखा था, ट्रंप ने उस मामले में मुखर होकर पूरी शांति प्रक्रिया को ही खतरे में डाल दिया है. अरब देशों को यह सच समझना और स्वीकार करना होगा और इसी के अनुरूप रणनीति बनानी होगी.

विभाजित यरुशलम को इजरायल की राजधानी मानकर और अपना दूतावास वहां ले जाने की घोषणा कर ट्रंप ने अब तक विभाजित अरब दुनिया को एकजुट होने की ऐसी घंटी बजा दी है, जिसका अंदाजा शायद खुद उन्हें भी न हो. इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि यरुशलम को मान्यता देना किसी भी तरह से पूर्वी यरुशलम पर इजरायली कब्जे को वैधता नहीं देता, न ही इससे इस बात के संकेत निकाले जाने चाहिए कि इजरायल को विवादित क्षेत्र पर फिर से काबिज होने की अपनी पुरानी मंशा पर आगे बढ़ने का हक मिल गया है.

दरअसल, अधर में लटकी पश्चिम एशिया की शांति में यरुशलम एक ऐसा प्रमुख बिंदु रहा है, जिसमें द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के तहत पूर्वी यरुशलम को भविष्य में फलस्तीन की राजधानी बनना है. अमेरिकी घोषणा इस प्रक्रिया के ताबूत में अंतिम कील की तरह है. इससे अल्पकालिक हित में अमेरिका के साथ गलबहियां करने वाले अरब देशों की आंखें भी खुल जानी चाहिए.

मुश्किल वक्त में राहुल गांधी को नई जिम्मेदारी

लंबे अरसे के बाद कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिलने जा रहा है. राहुल गांधी के नाम की आज होने वाली आधिकारिक घोषणा दरअसल देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के मुखिया के तौर पर उनकी हैसियत को औपचारिक जामा पहनाना है. राहुल गांधी के लिए बतौर कांग्रेस अध्यक्ष चयन तो आसान है, पर व्यावहारिक तौर पर पार्टी का नेतृत्व करना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर दे सकने वाले एक भरोसेमंद नेता के रूप में स्वीकार्य होना कहीं ज्यादा कठिन. इसीलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी अध्यक्ष बनकर कांग्रेस में किस तरह का बदलाव ला पाते हैं?

कांग्रेस 2014 के आम चुनाव में मिली करारी शिकस्त से हलकान है और लोकसभा में इसके महज 44 सदस्य हैं, जो अपने इतिहास में इसकी अब तक की सबसे कम संख्या है. इतना ही नहीं, बाद में राज्य विधानसभा चुनावों में भी इसे एक के बाद दूसरी हार मिली है, जिसने पार्टी के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. स्पष्ट है, मौजूदा संकट पार्टी के 132 वर्षों के इतिहास के किसी भी दौर से कहीं अधिक बदतर है.

राहुल युग की शुरुआत तो हो रही है, पर उनके सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं. पहली, खुद की नेतृत्व-शैली में बदलाव लाना और दूसरी, पार्टी ढांचे में सुधार करना व यह संदेश देना कि पार्टी एक प्रमुख राजनीतिक आवाज बनने जा रही है.

सबसे पहले राहुल को वंशवाद के सवाल से टकराना होगा, जिसके खिलाफ चारों तरफ एक माहौल बन गया है. जिस लोकतांत्रिक आग्रह व आकांक्षा के साथ नए भारत को परिभाषित किया जाता है, उसमें वंशवाद पर ही भरोसा कारगर नहीं माना जाता. मगर कांग्रेस के लिए मां से बेटे को मिला उत्तराधिकार पार्टी की प्रकृति से जुड़ा है. यह वही पार्टी है, जिसे 1970 के दशक के शुरुआती दौर में इंदिरा गांधी ने एक केंद्रीय संस्था में बदल दिया था. परिवार के बिना पार्टी कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि नेहरू-गांधी परिवार का ही कोई सदस्य पार्टी में परस्पर विरोधी दिशाओं में चलने वाले तत्वों को एकजुट रख सकता है.

फिर भी, लोकतंत्र में वंशवादी अधिकार की कोई जगह नहीं होती. और इसीलिए यह कहीं ज्यादा मुश्किल स्थिति है, क्योंकि परिवार का महत्व मुख्य रूप से पार्टी की चुनावी सफलता से जुड़ा रहा है. हालांकि बाद में वंशवाद के बूते उस तरह सफलता नहीं मिली. बावजूद इसके यह विडंबना है कि परिवार पर पार्टी की निर्भरता व उसका प्रभाव कम नहीं हुआ है.

राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को फिर से खड़ा करना है. पार्टी राज्यों में कमजोर पड़ रही है. केरल जैसे चंद सूबों को छोड़ दें, तो उसके पास कहीं भी प्रभावी संगठन नहीं है. जमीनी स्तर पर इसके पास ऐसे कैडर नहीं हैं, जो भाजपा के चुनावी तंत्र से लड़ सकें. भाजपा की सबसे बड़ी ताकत ‘पेज प्रमुख’ और बूथ प्रबंधन का उसका कौशल है, पर कांग्रेस के पास दूर-दूर तक चुनाव प्रबंधन का ऐसा कोई ढांचा नहीं है.

राहुल को निश्चय ही इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव के लिए अपनी मां से कहीं अधिक उत्साह दिखाया है. सोनिया गांधी ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के 10 वर्षों के शासन में कभी भी प्रत्यक्ष तौर पर ऐसा साहस नहीं दिखाया कि वह पार्टी के काम-काज की केंद्रीय शैली को बदलने जा रही हैं. इस मॉडल पर टिके रहने का ही नतीजा रहा कि पार्टी में ऐसा मजबूत व भरोसेमंद नेतृत्व नहीं उभर सका, जो राज्यों में लोगों को प्रभावी तौर पर पार्टी से जोड़ सके.

मगर अब तक, राहुल गांधी को ऐसा मौका नहीं मिल पाया है कि वह पार्टी मे उन बदलावों की शुरुआत कर सकें, जिसकी वह वकालत करते रहे हैं. तीन वर्ष पहले, जब उन्होंने पार्टी उपाध्यक्ष का पद संभाला, तब से कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव के लिए शायद ही कुछ किया गया है. लिहाजा संगठन को लोकतांत्रिक बनाना जरूरी हो गया है, पर ऐसा तभी होगा, जब शीर्ष नेतृत्व पार्टी को आंतरिक चुनावों द्वारा नए सिरे से गढ़े. इससे पार्टी में नए नेतृत्व व कार्यकर्ता उभर सकते हैं.

राहुल गांधी की राजनीति की विशेषता यह है कि भाजपा द्वारा लगातार किए जा रहे सियासी हमले के बाद भी वह मोदी के मुखर विरोध को उत्सुक रहते हैं. मेरा तो मानना है कि मोदी पर उनके तीखे हमले ने भाजपा को बैकफुट पर ला दिया है और उन्हें देश का प्रमुख विपक्षी नेता बनाने में मदद की है. आर्थिक मंदी और बढ़ती बेरोजगारी को लेकर बढ़ रहे आक्रोश को उन्होंने सफलतापूर्वक उठाया है.

नोटबंदी व जीएसटी से पैदा हुई निराशा को मुखर आवाज देने और गुजरात के आक्रामक चुनावी अभियान से लगता है कि उनके सियासी करियर में नई जान आ गई है. वह बताते रहते हैं कि मोदी ने हद से अधिक वादा किया है और उसे पूरा करने में वह काफी कमजोर साबित हो रहे हैं. मगर इसके लिए सरकार की आर्थिक विफलता की तरफ ही लोगों का ध्यान दिलाना काफी नहीं है. जरूरी यह भी है कि ऐसा कहते हुए पार्टी अपना सामाजिक व राजनीतिक एजेंडा बताए.

केवल ठोस राजनीतिक नजरिया ही राहुल गांधी को मोदी से टकराने में मदद करेगा. असंतोष के मौजूदा माहौल को देखते हुए जरूरत विकास के ऐसे वैकल्पिक एजेंडे को सामने रखने की है, जो बेरोजगारी बढ़ाते विकास मॉडल के खिलाफ रोजगारपरक विकास का एक मॉडल हो. एनडीए मॉडल की मुखालफत के लिए कांग्रेस के पास ऐसा मॉडल होना ही चाहिए, जिसके मूल में सामाजिक कल्याण व आर्थिक अधिकार हो.

इसके अलावा, राहुल गांधी को ठीक उसी तरह दूसरी तमाम पार्टियों तक अपनी पहुंच बढ़ाकर एक गठबंधन बनाना होगा, जैसा 2004 में उनकी मां ने यूपीए बनाकर किया था. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 31 फीसदी मत मिले थे, जबकि कांग्रेस को 19.3 फीसदी. ऐसे में, अगर गठबंधन नहीं भी बनता है, तब भी यदि सीटों पर गणित बिठा लिया जाए, तो 2019 के चुनाव में विपक्ष भाजपा को चुनौती दे सकता है. 2014 के मत-प्रतिशत का यही संदेश है.

(साभार : जोया हसन, प्रोफेसर, जेएनयू)

स्पाइसजेट दे रहा आपको फ्री में यात्रा करने का मौका, जानिए कैसे

स्पाइसजेट फ्री में हवाई सफर करने का औफर दे रही है, विश्वास तो नहीं होता, लेकिन यह सही है. इसके लिये सबसे पहले आपको जहां जाना है उस जगह की स्पाइसजेट की टिकट बुक करनी होगी. बाद में स्पाइसजेट आपके पूरे पैसे वापस कर देगी. नए औफर के तहत एयरलाइंस यात्रियों को अपने पूरे किराए को रिडीम करने का औफर दे रही है. स्पाइसजेट का यह औफर 1 दिसंबर से शुरू हो चुका है और 31 दिसंबर 2017 तक चलेगा. इस औफर के तहत खरीदे गए टिकट पर 1 दिसंबर 2017 से लेकर 31 मार्च 2018 तक यात्रा की जा सकती है.

ये है स्पाइसजेट का Fly for Free offer

इस औफर का फायदा उठाने के लिए स्पाइसजेट की वेबसाइट (www.spicejet.com) से सबसे पहले टिकट बुक करना होगा. टिकट बुक करते समय टिकट का पूरा पैसा देना होगा. टिकट बुक करने के बाद www.spicestyle.com पर जाना होगा.

अगर यहां आपका पहले से अकाउंट है तो लौगिन कर लें अन्यथा नया अकाउंट बनाकर लौगिन करना होगा. यहा आपको अपनी टिकट की पूरी डिटेल्स डालनी होंगी. डिटेल्स डालने के बाद ईमेल और मोबाइल पर एक कोड आएगा. इसके बाद स्पाइस स्टाइल पर माय अकाउंट में आ रहे स्टाइलकैश पर जाएं. यहां जाकर मोबाइल और मेल पर आए कोड को डाल दें.

इसमें आपके टिकट के अमाउंट के बराबर ही पैसे आ जाएंगे, यहां से आप वाउचर्स ले सकते हैं. इस पैसे को अपने बैंक अकाउंट में ट्रांसफर नहीं कर सकते हैं.

स्टाइलकैश स्पाइस स्टाइल का ई वौलेट है, स्पाइस स्टाइल से कुछ भी खरीदने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. शौपिंग करते वक्त ध्यान रखें की एक ट्रांजैक्शन में केवल 30 फीसदी तक ही वौलेट में आए पैसे का इस्तेमाल कर सकते हैं. बाकी के पैसे अपने बैंक अकाउंट से देने होंगें.

स्पाइसजेट की वेबसाइट के मुताबिक एक पीएनआर पर एक ही वाउचर मिलेगा. इस वाउचर से 31 मार्च 2018 तक शौपिंग कर सकते हैं. इसके बाद यह एक्सपायर हो जाएगा, एक और खास बात कि इसे किसी दूसरे स्पेशल औफर के साथ नहीं लगाया जा सकता है.

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