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पराली प्रबंधन की दिशा में बढ़ने लगे हैं कदम

अक्तूबर नवंबर 2017 में दिल्ली व आसपास के इलाकों में जैसे ही गुलाबी ठंड का आगाज हुआ वैसे ही हरियाणा व पंजाब की तरफ से आने वाली धूल और प्रदूषण भरे धुएं के गुबार ने हवा में जहर घोल दिया. वातावरण में फैले इस स्माग ने लोगों को नाक पर रूमाल बांधने पर मजबूर कर दिया. अस्थमा की बीमारी वाले लोगों के लिए यह ज्यादा परेशानी का सबब बनने लगा.

क्या जनता क्या नेता, सभी की उंगली हरियाणा और पंजाब की ओर उठने लगी कि यह जहरीला धुआं इन्हीं राज्यों से किसानों द्वारा धान की पराली जलाने से आ रहा है जिस ने लोगों का जीना दूभर कर दिया.

दिल्ली, हरियाणा व पंजाब की सरकारों में मुंहजबानी जंग शुरू हो गई और वे एकदूसरे के ऊपर इस का ठीकरा फोड़ने लगे. जब इस से कुछ हासिल होता नहीं दिखा तो गरीब की लुगाई सब की भौजाई वाली कहावत सच होने लगी. सब का निशाना किसान बनने लगे कि इस के जिम्मेदार वे ही हैं. ऐसे किसानों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए, उन किसानों पर केस दर्ज करो और जुर्माना लगाओ, जो पराली जला रहे हैं. इस के तहत हजारों किसानों को निशाना भी बनाया गया.

प्रदूषण के खिलाफ होहल्ला करने में दिल्ली की केजरीवाल सरकार सब से आगे रही और दूसरे प्रदेशों की सरकारों पर आरोप लगाती रही. लेकिन जब एक आरटीआई से खुलासा हुआ तो हकीकत कुछ और ही नजर आई. दरअसल दिल्ली सरकार ने पर्यावरण सेस के तहत साल 2015 से साल 2017 के बीच 787 करोड़ रुपए की वसूली की, लेकिन दिल्ली का प्रदूषण कम करने के नाम पर मात्र 93 लाख रुपए ही खर्च किए. हाल में वर्ष 2017 में तो केजरीवाल सरकार ने एक पैसा भी प्रदूषण के नाम पर खर्च नहीं किया. इसलिए दूसरे पर आरोप लगाने से पहले अपने गिरेबान में झांक लेना भी जरूरी है.

कुछ दशक पहले तक पारंपरिक तरीके से खेती होती थी, जिस में पशुओं का भी खासा योगदान था. उन के लिए भी चारा चाहिए होता था. उस समय गेहूं व धान के अवशेष चारे के रूप में इस्तेमाल होते थे. आज खेती में कृषि मशीनों का चलन बढ़ गया है. नएनए हार्वेस्टर, रीपर जैसी फसल काटने की मशीनें आ गई हैं, जो फसल में फल वाले ऊपरी हिस्से को काट देती हैं और बाकी नीचे फसल का पूरा तना बच जाता है, जिसे फसल अवशेष मान कर जलाया जाता है.

किसान फसल अवशेष इसलिए जलाता है जिस से वह समय से अगली फसल उगाने की तैयारी कर सके. भारत में साल में 2 बार फसल अवशेषों को जलाया जाता है. गेहूं और धान दोनों ही बंपर पैदावार वाली फसलें हैं. अप्रैल में गेहूं की फसल और सितंबरअक्तूबर में धान की फसल तैयार होती है. इसी दौरान फसल अवशेषों को जलाया जाता है. धान की फसल कटने के बाद तुरंत गेहूं की फसल भी बोनी होती है, इसलिए अगली फसल बोने के लिए खेत भी तैयार चाहिए. हालांकि पराली को खेत में जोत कर गलाने के बाद बेहतर खाद बनती है, लेकिन हर किसान के लिए यह काम संभव नहीं है. हर किसान की माली हालत इतनी अच्छी नहीं होती कि वह पराली का प्रबंधन कर सके. न चाहते हुए भी उसे यह कदम उठाना पड़ता है.

पंजाब सरकार की सफाई

एक अनुमान के मुताबिक केवल पंजाब में ही 19.7 मिलियन टन पराली होती है, जिस का ज्यादातर हिस्सा जला कर खत्म किया जाता है. पंजाब सरकार भी किसानों पर ज्यादा सख्ती नहीं करना चाहती. पिछले दिनों पंजाब सरकार ने पराली प्रबंधन के काम आने वाली मशीनों के लिए 1109 करोड़ रुपए सब्सिडी की योजना केंद्र के पास भेजी, लेकिन वह फाइल भी कृषि मंत्रालय में ही अटक गई. इस के बाबत अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने कृषि मंत्रालय से जवाब मांगा है.

वायु प्रदूषण को देखते हुए जब चारों तरफ से पंजाब सरकार पर दबाव पड़ा तो पंजाब सरकार के वित्त मंत्री मनप्रीत बरार ने कुछ अलग ही रास्ते सुझाए. उन्होंने कहा कि हम पंजाब में धान उगाना बंद कर उस की जगह सब्जी की खेती करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि मनरेगा के तहत किसानों को 5-6 दिनों के लिए काम दिया जाए जिस से वे पराली हटा सकें. साथ ही केंद्र सरकार डीजल पर कुछ सेस लगाए और इस को पराली जलाने से रोकने के लिए किसानों को मुआवजे के तौर पर दिया जाए. वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि पराली प्रबंधन के लिए उन की सरकार किसानों को 4 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से धन मुहैया कराएगी. इस के लिए पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान राज्यों के लिए रकम का आवंटन भी किया है.

मशीन खरीदने की सलाह

‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की तर्ज पर किसानों को सलाह बहुत दी जाती है. सरकारें भी इस में पीछे नहीं हैं. सरकार भी फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए किसानों को मशीनें खरीदने की सलाह देती रही हैं, जबकि ज्यादातर किसान कृषि मशीनें खरीदने की स्थिति में नहीं होते. पहले ही किसान कर्ज के तले दबे हैं ऊपर से मशीन खरीदने का सरकारी कर्ज अलग. पंजाब सरकार मशीनों पर किसानों को सब्सिडी देने की बात करती है, लेकिन मशीनों की कीमत भी कम नहीं है. चोपर थ्रेडर मशीन की कीमत साढ़े 4 लाख से 6 लाख रुपए, कटर रैंक बेलर मशीन की कीमत 16 लाख रुपए और हैप्पी सीडर मशीन की कीमत लगभग सवा करोड़ से 1 करोड़ 40 लाख रुपए के आसपास होती है. इस के अलावा जीरो टिल, सीड ड्रिल, स्ट्रा बेलर, रोटावेटर, मल्चर आदि अनेक मशीनें हैं, जिन के इस्तेमाल से पराली प्रबंधन में सहायता होती है, लेकिन ऐसी मशीनों को खरीदना हर किसान के लिए मुमकिन नहीं है. उन की इतनी आमदनी नहीं होती कि वे यह बोझ उठा सकें.

पंजाब में सुपरस्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का भी यही कहना है कि पराली को आग लगाए बगैर निबटाने का सस्ता और आसान

ढंग कंबाइन हार्वेस्टर पर सुपर स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम लगा कर धान की कटाई करना है. फसल काटते समय ही इस मशीन के जरीए पराली के छोटेछोटे टुकड़े हो जाते हैं, जो पशुओं के चारे के रूप में भी इस्तेमाल हो सकते हैं.  इस से किसानों को अतिरिक्त आमदनी भी हो सकेगी. हालांकि इस मशीन को कंबाइन हार्वेस्टर के साथ अलग से जोड़ा जाएगा, जिस का खर्च तकरीबन सवा लाख रुपए अलग से होगा.

अभी तक पंजाब में तकरीबन 1000 कंबाइन मशीन मालिकों ने यह सिस्टम अपनी मशीनों में लगवाया है और जहां इन मशीनों से धान की कटाई हुई है, उन इलाकों में धान की पराली को जलाने की जरूरत नहीं पड़ी है. इस मशीन से कटाई के बाद किसान खेत में हैप्पी सीडर मशीन के जरीए गेहूं की सीधी बीजाई कर सकते हैं.

हरियाणा सब से आगे

चौतरफा दबाव का नतीजा अब दिखने लगा है और आने वाले समय में हमें इस समस्या से नजात मिलने की भी संभावना बन रही है. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा है कि प्रदूषण किसी एक राज्य की समस्या नहीं है और हवा व आकाश को सीमा के दायरे में नहीं बांधा जा सकता. यह हम सब की समस्या है. हरियाणा इस मामले में सब से पहले काम कर रहा है.

हमारी सरकार ने पराली के डिस्पोजल के लिए कुछ नियम बनाए हैं. इस में कृषि यंत्रों का खासा योगदान है. हम ऐसे कृषि यंत्र तैयार करवा रहे हैं, जो पराली का प्रबंधन खेत में ही कर सकेंगे. इन कृषि यंत्रों को किसानों के लिए कम कीमत पर दिया जाएगा, जो किसान इन्हें नहीं खरीद सकते उन किसानों को ये कृषि यंत्र किराए पर दिए जाएंगे.

पराली को ले कर एक अन्य प्रोजेक्ट पर भी काम चल रहा है, जिस में फसल कटाई के दौरान ही पराली में बचे अवशेषों को छोटेछोटे टुकड़ों में बदल कर खेत की जुताई कर दी जाएगी.

इसलिए मौजूदा हार्वेस्टिंग मशीन के लिए एक अलग से मशीन तैयार की जा रही है, जो एकसाथ सारे काम करेगी जिस से फसल काटते समय ही पराली खेत की मिट्टी में मिल जाएगी और पानी देने के बाद कुछ ही दिनों में पराली गल कर खाद में बदल जाएगी.

सरकार ने जारी की रकम

एनजीटी के आदेश के बाद केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने राज्य सरकारों से कहा कि जीरो टिल, सीड ड्रिल, हैप्पी सीडर, स्ट्रा बेलर, रोटावेटर जैसी मशीनों को फार्म मशीनरी बैंकों के जरीए किसानों को मुहैया कराया जाए. इन मशीनों से फसल अवशेषों का सही प्रबंधन हो सकेगा और किसानों को पराली जलाने की जरूरत नहीं होगी.

केंद्र सरकार ने वर्ष 2017-18 के लिए पंजाब के लिए 48.50 करोड़, हरियाणा के लिए 45 करोड़, राजस्थान के लिए 9 करोड़ और उत्तर प्रदेश के लिए 30 करोड़ रुपए जारी किए. कहने का मतलब है कि होहल्ला तो बहुत हो रहा है, पर किसानों तक कितनी स्कीमें पहुंच पाती हैं, यह देखने की बात है.

वर्षों से नहीं जलाई पराली

कई किसान अब भी इस तकनीक को अपनेअपने खेतों में अपना रहे हैं. ऐसे ही हरियाणा के एक किसान हैं, जो फतेहाबाद में रहते हैं. वे धान की खेती करते हैं. उन्होंने पिछले 6 सालों से पराली को जलाया नहीं है, बल्कि वे इसे रोटावेटर के जरीए खेत में जोत कर खाद बनाते हैं.

सुखविंदर सिंह कहते हैं कि पराली को खेत में जोतने का काम सुबह के समय करना चाहिए, क्योंकि उस समय खेतों में ओस का है, गीलापन रहता है.

उस समय पराली से मिट्टी अच्छी तरह चिपक जाती है, जिस का अच्छा नतीजा मिलता है. उस के बाद खेत में पानी दे कर छोड़ देना चाहिए. 20-25 दिनों में पराली खेत में सड़ जाती है, जिस से उम्दा किस्म की खाद बन जाती है. खेत में अलग से खाद डालने की जरूरत भी नहीं होती.

हालांकि समयसमय पर कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को सलाह भी दी जाती है कि वे फसल अवशेषों को न जलाएं, बल्कि उन्हें खेत में जोत कर खाद बनाएं जिस से किसान का खाद का खर्च भी बचेगा और जमीन की पैदावार कूवत भी बढ़ेगी.

फसल अवशेष जलाने से खेती की जमीन में फायदा पहुंचाने वाले मित्र कीट केंचुए आदि भी खत्म हो जाते हैं.

इन सब तरीकों को जमीन पर उतारने के लिए सरकार को किसानों के साथ खड़ा होना होगा. उसे किसानों की मदद करनी होगी. उन्हें फसल की सही कीमत दिलानी होगी तभी हर किसान आज के मशीनी दौर में अपनी खेती करने के तौरतरीकों में बदलाव कर सकेगा.

जनवरी में किए जाने वाले खेती के खास काम

जनवरी का महीना पूरी दुनिया में जश्न का महीना माना जाता है. वाकई नए साल की कशिश कुछ खास ही होती है. 31 दिसंबर की रात से 1 जनवरी तक हर जगह जश्न का आलम रहता है. पूरे साल खेती के कामों में जूझते रहने वाले किसान भी नए साल का त्योहार पूरी शिद्दत यानी लगन से मनाते हैं.

मेहनतकश किसान भी जनवरी को जश्न का महीना मानते हैं, मगर इस का मतलब यह नहीं कि वे खेती के कामों से एकदम तोबा ही कर लेते हों. मौजमस्ती एक तरफ और काम दूसरी तरफ, यही सच्चे किसानों का दस्तूर होता है.

इनसान होने के नाते वे बेशक खानेपीने या नाचनेगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते, लेकिन खेती के कामों की कीमत पर कतई नहीं. मौसम व वक्त से जुड़े काम बदस्तूर चलते रहते हैं.

पहली जनवरी को होने वाले नए साल के जश्न के अलावा किसान 13 जनवरी को लोहड़ी का पर्व भी जोरशोर से मनाते?हैं और 14 जनवरी को मनाया जाने वाला खिचड़ी का त्योहार भी उन्हें बहुत सुहाता?है. खिचड़ी यानी मकर संक्रांति वाकई किसानों का पसंदीदा पर्व होता है.

फिर 26 जनवरी के दिन वे गणतंत्र दिवस भी पूरी शिद्दत से मनाते हैं और खुद को मनोज कुमार की तरह भारत कुमार के रंग में रंगा पाते हैं. मगर इस ठंडेठंडे महीने में वे तैयार हो रही रबी की फसलों से बेजार कतई नहीं होते. आइए डालते?हैं एक नजर जनवरी के दौरान किए जाने वाले खेती के कामों पर :

* जनवरी में गेहूं के खेतों पर खास ध्यान देने की जरूरत होती है. इस दौरान करीब 3 हफ्ते के अंतराल पर गेहूं के खेतों की सिंचाई करते रहें.

* गेहूं के खेतों में अगर खरपतवार या अन्य फालतू पौधे पनपते नजर आएं, तो उन्हें फौरन उखाड़ दें. चौड़े पत्ते वाले खरपतवार ज्यादा हों, तो 2-4 डी सोडियम साल्ट दवा का इस्तेमाल करें. यह दवा काफी कारगर होती है.

* अगर गेहूं की बालियों में अनावृत कंडुआ रोग का असर नजर आए, तो उन पौधों को देखते ही उखाड़ कर नष्ट कर दें. इस के अलावा अगर खेत में काली गेरुई रोग का प्रकोप दिखाई दे, तो मैंकोजेब दवा की?ढाई किलोग्राम मात्रा को करीब 700 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

* यदि चने के खेतों में फलीछेदक कीड़े का का हमला दिखाई पड़े, तो फलियां बनना शुरू होते ही इंडोसल्फान 35 ईसी दवा की 2 लीटर मात्रा को करीब 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

* यदि चने के खेतों में फलीछेदक कीड़े का हमला दिखाई पड़े, तो फलियां बनना शुरू होते ही इंडोसल्फान 35 ईसी दवा की 2 लीटर मात्रा को करीब 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. छिड़काव के असर से फलियां बेहतरीन होंगी.

* मटर व मसूर के खेतों में उगे खरपतवारों को खरपतवारनाशी दवा का इस्तेमाल कर के नष्ट करें.

* चना, मटर व मसूर के खेतों में इस दौरान निराईगुड़ाई जरूर करें. इस से पौधों को खुराक ढंग से मिल सकेगी और खरपतवार भी नहीं पनपेंगे.

* चने और मटर के खेतों में फूल आने से पहले सिंचाई करें, मगर फूल बनने के दौरान सिंचाई न करें. फूल बनने के बाद फिर सिंचाई करें.

* मटर व चने की फसलों में अगर रतुआ बीमारी का प्रकोप नजर आए, तो रोकथाम के लिए जिंक मैंगनीज कार्बानेट दवा की ढाई किलोग्राम मात्रा करीब 700 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

* नए साल का यह पहला महीना ताजे गुड़ व गन्ने के लिए खास माना जाता है. इस दौरान गन्ने की पेड़ी फसल की कटाई का काम करें. कटाई का काम फसल की हालत व हालात के मुताबिक करें.

* कटाई के दौरान निकली गन्ने की पत्तियों को हरगिज नहीं जलाएं, क्योंकि फसल अवशेष जलाना न सिर्फ गुनाह?है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी घातक है. गन्ने की सूखी पत्तियों को जमा कर के कंपोस्ट खाद बनाने में इस्तेमाल करें.

* गन्ने की सूखी पत्तियों को मवेशियों के बेड के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता?है, इन पत्तियों को अगली पेड़ी फसल में पलवार के लिए भी इस्तेमाल कर सकते?हैं, इस से खेत में काफी समय तक नमी बनी रहती है. ऐसा करने से खरपतवार भी कम निकलते हैं.

* जौर की फसल को बोए हुए अगर 4-5 हफ्ते हो रहे हों तो खेत की सिंचाई करें. सिंचाई के बाद हलकी निराईगुड़ाई भी करें ताकि खरपतवार न पनप सकें.

* अगर राई व सरसों की फसलों में फूल व फलियां निकल रही हों, तो खेत की सिंचाई करें. सिंचाई के बाद निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकालें.

* अगर सरसों में तनासड़न बीमारी का प्रकोप दिखाई दे, तो रोकथाम के लिए बिनोमाइल दवा की आधा किलोग्राम मात्रा या थाइरम की डेढ़ किलोग्राम मात्रा करीब 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

* अगर सरसों या राई की फसल पर बालदार सूंडी़ का हमला नजर आए, तो बचाव के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी दवा की 1.25 लीटर मात्रा करीब 700 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

* तोरिया के खेतों का मुआयना करें. अगर करीब 75 फीसदी फलियां गोल्डन रंग की हो चुकी हों, तो फसल की कटाई करें. कटाई के बाद फसल को अच्छी तरह सुखा कर मड़ाई करें.

* नए साल के पहले महीने यानी जनवरी में सोंधे व स्वादिष्ठ लगने वाले नए आलू का इंतजार सभी को होता?है. आलू की अगेती फसल जनवरी में खुदाई लायक हो जाती?है, लिहाजा यह काम निबटाएं. खुदाई के लिए आलू खोदने वाली मशीन का इस्तेमाल भी कर सकते?हैं. मशीन से आलू की खुदाई तेजी से होती है और आलू नष्ट भी नहीं होते.

* अगर आलू की मध्यम व पछेती फसलों पर झुलसा बीमारी के लक्षण नजर आएं, तो रोकथाम के लिए मैंकोजेब दवा का इस्तेमाल करें.

* प्याज की रोपाई का काम भी जनवरी में ही निबटा देना चाहिए. प्याज की रोपाई करने से पहले खेत में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश जरूर डालें और रोपाई के बाद हलकी सिंचाई करें.

* जनवरी में तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी, करेला और भिंडी आदि की बोआई के लिए ढंग से जुताई कर के खेत तैया करें. खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खद भरपूर मात्रा में डालें.

* जनवरी के ठंडे महीने में पाले का खतरा बहुत ज्यादा रहता?है, लिहाजा पाले से बचाव के लिए छोटे फलों वाले पौधों व सब्जियों की नर्सरियों को टाट या घासफूस के छप्परों से अच्छी तरह ढक दें.

* पाला गिरने वाली रात में बाग या खेत की सिंचाई करना न भूलें. इस से पाले का असर घट जाता है.

* जनवरी महीने के दौरान अकसर आंवले में फलीविगलन रोग लग जाता है. ऐसी हालत में बचाव के लिए ब्लाइटाक्स 58 दवा का इस्तेमाल करें.

* माल्टा, किन्नू, संतरा व नीबू आदि के पेड़ों में गमोसिस बीमारी से बचाव के लिए पेड़ों के रोगग्रस्त भागों को काट कर जला दें, पेड़ों के काटे गए हिस्सों पर रिटोमिल व अलसी के तेल का पेस्ट तैयार कर के लगाएं. यह पेस्ट तैयार करने के लिए 1 लीटर अलसी के तेल में 20 ग्राम रिडोमिल दवा अच्छी तरह मिलाएं.

* इस महीने आड़ू, नीबू, संतरा, किन्नू और माल्टा आदि पेड़ों की छंटाई का काम भी करें. इन पेड़ों में कृषि वैज्ञानिक से सलाह ले कर जरूरी खादें भी डालें.

* इसी तरह अंगूर की बेलों की काटछांट का काम भी महीने के अंत तक जरूर निबटा लें. इसी दौरान नई बेलें भी लगाई जा सकती हैं. अगर नई बेले लगाएं, तो लगाने के फौरन बाद सिंचाई जरूर करें.

* आमतौर पर आम के पेड़ों की देखभाल की याद आम के मौसम में ज्यादा आती?है, मगर यह अच्छी बात नहीं है. इन पेड़ों की नियमित देखभाल करना जरूरी?है. अमूमन दिसंबर में आम के पेड़ों के तनों पर अल्काथीन शीट लगाई जाती है. जनवरी में इस शीट की कायदे से सफाई करें, क्योंकि बगैर सफाई के शीट का पूरा फायदा नहीं मिलता.

* आम के पेड़ों में भुनगा व मित्र कीड़ों के बचाव के लिए मोनोक्रोटोफास 50 ईसी दवा की डेढ़ मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में घोल कर पेड़ों में बौर आने के तुरंत बाद छिड़कें. अगर जरूरी लगे तो 2-3 हफ्ते बाद दोबारा छिड़काव करें.

* अपने महंगे मवेशियों यानी गायभैंसों वगैरह को जनवरी की कड़ाके की ठंड से बचाने के पूरे इंतजाम करें, क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही से लाखें रुपए के मवेशी ठंड के शिकार हो सकते हैं.

* पशुओं को दिन के दौरान धूप में बांधें और रात के वक्त आग जला कर गरमी का बंदोबस्त करें. गौशाला के दरवाजे बंद रखें या टाट के मोटे परदे लगाएं. रोशनी का भी पूरा इंतजाम करें.

* जनवरी की सर्दी मुरगेमुरगियों के लिए भी खतरनाक साबित होती?है, लिहाजा उन के बचाव का भी पूरा खयाल रखें. जब मुरगियां स्वस्थ होंगी तभी महंगे अंडों का उत्पादन होगा.

* जब घना कोहरा पड़ रहा हो, उस दौरान गौशाला की चौकसी बढ़ा दें, क्योंकि कोहरे का फायदा उठा कर चोरउचक्के अपना कारनामा दिखा देते हैं.

* अपने इलाके के पशुचिकित्सकों के मोबाइल नंबर डायरी में लिखने के साथसाथ अपने मोबाइल में भी दर्ज कर के रखें ताकि आड़े वक्त पर यानी पशुओं के बीमार होने पर उन से फौरन बात की जा सके.

क्या एक ही दिन रिलीज हो रही है ‘पैडमैन’ और ‘पद्मावती’

संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी फिल्म ‘पद्मावती’ पहले 1 दिसंबर को रिलीज होने वाली थी. लेकिन करणी सेना और कई राजनीतिक दलों के विरोध के चलते फिल्म की रिलीज टाल दी गई थी. उसके बाद से ही फैन्स लगातार इस फिल्म के आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी चर्चा जोरो पर है कि दीपिका पादुकोण, रनबीर सिंह और शाहिद कपूर स्टारर फिल्म ‘पद्मावती’ अब ‘पद्मावत’ के नाम से 25 जनवरी को रिलीज होगी. आपको बता दें कि इसी दिन अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘पैडमैन’ भी रिलीज होनी है.

हालांकि, निर्माताओं ने कहा कि उन्हें ‘पद्मावती’ की रिलीज, या इन दोनों फिल्मों के बीच बौक्स औफिस पर संभावित टक्कर के बारे में कोई अंदाजा नहीं है.

फिल्म पद्मावती और पैडमैन को लेकर जो चर्चाएं हो रही हैं उसपर इसकी आधिकारिक घोषणा करते हुए अक्षय कुमार ने कहा, “फिल्मों की टक्कर के बारे में जो कुछ हो रहा है उसका मुझे कतई अंदाजा नहीं है… मुझे इसके बारे में कोई अनुमान नहीं है. हां, हमने इसके बारे में सुना जरूर है. हालांकि इसके बारें अभी कोई आधिकारिक तौर पर पुष्टी नहीं हुई है तो हम सभी यह जानते हैं कि ‘पैडमैन’ 25 जनवरी को रिलीज हो रही है.”

‘पैडमैन’ की निर्माताओं में शामिल प्रेरणा अरोड़ा ने बताया, “पद्मावती बेहद अहम फिल्म है. यह बेहद खूबसूरत फिल्म है और इसे जल्द रिलीज होना चाहिए. मैं भी इसे देखना चाहती हूं. इसकी रिलीज की तारीख पर फैसला करना वायकौम 18 मोशन पिक्चर्स और संजय लीला भंसाली प्रोडक्शंस के ऊपर है.” यह पूछे जाने पर कि क्या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित बड़े बजट की इस फिल्म से बौक्स औफिस पर संभावित टक्कर के अंदेशे से वे ‘पैडमैन’ की रिलीज की तारीख आगे बढ़ाएंगे? इस सवाल का जवाब देते हुए प्रेरणा ने कहा, “यह बात बिल्कुल तय है कि हम लोग 25 जनवरी को ही आ रहे हैं.”

जहां एक ओर पद्मावती के 25 तारिख को रिलाज किये जाने की खबर है तो वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि ‘पद्मावती’ 9 फरवरी को रिलीज हो सकती है. आपको बता दें कि अनुष्का शर्मा की अगली होम प्रोडक्शन फिल्म ‘परी’ और कार्तिक आर्यन अभिनीत निर्देशक लव रंजन की फिल्म ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ भी 9 फरवरी को ही रिलीज होने वाली है. अगर ऐसा होता है तो फिल्म ‘परी’ और ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ पर भारी असर पडं सकता है. अब देखना ये है कि पद्मावती किस दिन रिलीज होता है और उसके रिलीज होने पर किस फिल्म पर कितना असर पड़ता है.

रिचा चड्डा को ‘सरबजीत’ के लिए किस स्टार ने किया था फोन?

रणदीप हुड्डा, ऐश्वर्या राय बच्चन, दर्शन कुमार और रिचा चड्डा के अभिनय से सजी निर्देशक उमंग कुमार की फिल्म ‘सरबजीत’की बौक्स आफिस पर बड़ी दुर्गति हुई थी. इस बात को डेढ़ वर्ष से अधिक बीत चुका है. तब से इस फिल्म की असफलता का दर्द झेल रही अभिनेत्री रिचा चड्डा अंततः अपने इस दर्द को हाल ही में बयां कर ही डाला.

हाल ही में रिचा चड्डा ने इस फिल्म में अभिनय करने को अपनी गलती बताते हुए कहा है-‘‘फिल्म ‘सरबजीत’ को करना तो मुझे मेरी गलती लगती है. लेकिन अब किसी पर भी इल्जाम लगाने से कोई फायदा नहीं, आप भी जानते हैं कि बौलीवुड में लोग कैसे होते हैं. लेकिन अब मेरा करियर सही हो जाएगा.

आप जानते हैं कि कौन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत फिल्म‘मसान’में मैने मुख्य भूमिका निभायी थी. पूरी दुनिया में मेरा नाम हुआ, तो उसके तुरंत बाद मैं ‘सरबजीत’में इतना छोटा व महत्वहीन किरदार को क्यों करने लगी? क्या मैं इतनी पागल हूं कि इतनी बड़ी शोहरत पाने के बाद मैं एक सीन वाली फिल्म का हिस्सा बनने के लिए खुशी खुशी तैयार हो जाउंगी. सच यही है कि ‘सरबजीत’के वक्त मेरे साथ बहुत बुरा हुआ था. पर अब मैं इसे एकदम भूलकर आगे बढ़ चुकी हूं. और अब मेरा करियर एक बार फिर पटरी पर आ गया है.’’

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रिचा चड्डा ने जो कुछ कहा, उससे कई तरह के सवाल बौलीवुड में गर्म हुए हैं और बौलीवुड के बिचौलियों के बीच कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गयी हैं. बौलीवुड के साथ साथ फिल्म‘सरबजीत’से जुड़े रहे सूत्र का दावा है कि ‘सरबजीत’की जो स्क्रिप्ट रिचा चड्डा को दी गयी थी, वह अलग थी. निर्देशक उमंग कुमार ने जिस स्क्रिप्ट पर ‘सरबजीत’ को शूट किया था, वह स्क्रिप्ट अलग थी.

एक सूत्र का दावा है कि यदि उमंग कुमार ने स्क्रिप्ट को बदलने की बजाय रिचा चड्डा को जो स्क्रिप्ट दी थी, उसी पर यह फिल्म बनती, तो फिल्म को हर हाल में बौक्स औफिस पर सफलता मिलती. पर उमंग कुमार ने अपनी फिल्म के साथ एक बड़े स्टार को जोड़ने के लिए उस स्टार के एक रिश्तेदार की सलाह पर स्क्रिप्ट में जो बदलाव किए, उसी ने उनके लिए भी बर्बादी के गड्ढे खोद दिए. पर उमंग कुमार या किसी की हिम्मत नही है कि वह इस सच को खुलकर स्वीकार कर लें.

उधर बौलीवुड से जुड़ा एक सूत्र रिचा चड्डा की इस बात का समर्थन करता है कि उन्होने ‘सरबजीत’करके गलती की थी. इस सूत्र की माने तो रिचा चड्डा के पास इस फिल्म में अभिनय करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं था. क्योंकि रिचा को एक स्टार कलाकार ने फोन करके इस फिल्म को करने के लिए कहा था. और उस कलाकार की आज्ञा का उल्लंघन करना तब भी रिचा के वश में नहीं था और आज भी नही है.

हमने इस सूत्र से उस स्टार का नाम जानने का काफी प्रयास किया, पर सूत्र ने रिचा को फोन करने वाले स्टार कलाकार का नाम नहीं बताया.

सूत्रों से हमें जो जानकारी मिली, उसकी जांच परख करने के लिए हमने रिचा से संपर्क करने की कोशिश की पर प्रयास विफल रहे. अब देखना है कि ‘सरबजीत’ को लेकर जो कुछ धीरे धीरे सामने आ रहा है, उसकी असलियत कब खुलकर सामने आती है.

‘हमारा मकसद जैविक खेती को बढ़ावा देना है’

भारत सरकार हमेशा से खेती को बढ़ावा देती आ रही  है. ‘जय जवान जय किसान’ जैसे नारे और हलधर किसान जैसे चुनाव चिन्ह भी इसी बात की तरफ इशारा करते  हैं कि किसी भी देश की तरक्की में खेती की कितनी ज्यादा अहमियत  है.

हमारी मौजूदा सरकार भी खेती की खैरख्वाह बनी हुई  है. कम से कम दिखाया तो यही जा रहा  है कि खेतीकिसानी के लिए सरकार हरमुमकिन कोशिशें कर रही है.

कृषि एवं किसन कल्याण मंत्रालय भारत सरकार से जुड़ा ‘राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र’ किसानों को जैविक खेती को जोड़ने के लिए ही बनाया गया है.

हाल ही में विश्व मृदा दिवस के मौके पर कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद में लगे कृषि मेले में ‘राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र’ की वैज्ञानिक अधिकारी  डा. पूजा कनौजिया भी तशरीफ लाई थीं. उसी दौरान मैं ने जैविक खेती व खेती के अन्य मुद्दों पर उन से तफसील से बातचीत की. पेश हैं उसी बातचीत के कुछ खास हिस्से:

* पूजा, आप अपनी संस्था के कामों व इरादों के बारे में पूरी जानकारी दें

हमारी इस संस्था का नाम ही ‘राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र’ है, लिहाजा जाहिर है कि संस्था का खास मकसद किसानों को जैविक खेती के लिए बढ़ावा देना है. देशी किस्म के किसान महज कहने भर से तो हमारी बात मान नहीं लेंगे, लिहाजा उन्हें जैविक खेती की अहमियत पूरी तरह से समझानी पड़ती है.

अच्छी बात यह है कि किसान हमारी बात तसल्ली से सुनते व समझते  हैं और उन्हें पूरी लगन से अपनाते भी हैं. इतना जरूर है कि किसान बगैर ठीक से समझे किसी भी नसीहत को आंखें मूंद कर नहीं मानते.

वैज्ञानिक किसानों को जैविक खेती से होने वाले फायदों के बारे में विस्तार से समझाते  हैं और किसानों को उस के लिए पूरी तरह से मना भी लेते  हैं. एक बार बात किसानों की समझ में आने के बाद कोई दिक्कत नहीं होती.

* आप लोग किसानों को रासायनिक दवाओं व खादों का इस्तेमाल करने से कैसे रोक पाते  हैं

जब किसानों को एहसास हो जाता है कि रासायनिक खादों, रासायनिक कीटनाशकों और रासायनिक रोगनाशकों का खेत की मिट्टी पर कितना घातक असर होता  है, तो वे एकदम इस के खिलाफ हो जाते  हैं. वे यह बात सोच कर ही कांप जाते  हैं कि रसायनों के असर से उन के खेत बंजर भी हो सकते हैं.

यानी सही तरीके से समझाने के बाद किसान जैविक खेती अपनाने और रसायनों का इस्तेमाल छोड़ने के लिए राजी हो जाते  हैं.

* किसान जैविक खादें व दवाएं कहां से हासिल कर सकते हैं

जहां तक  जैविक खादों की बात  है, तो गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल तो भारतीय किसान सदियों से करते आ रहे  हैं और यही सब से खास और जरूरी जैविक खाद  है. कंपोस्ट खाद व केंचुआ खाद का इस्तेमाल भी पहले से ही होता आ रहा  है. मिट्टी में पाए जाने वाले केंचुओं के जरीए किसानों को केंचुआ खाद तो कुदरती तौर पर मिलती ही रही है.

वैसे बाकायदा कंपोस्ट खाद बनाने या वर्मी कंपोस्ट बनाने की ट्रेनिंग हमारे संस्थान से हासिल की जा सकती है.

अगर कीटनाशक और रोगनाशक दवाओं की बात की जाए, तो कई कंपनियां आजकल कीड़ों व रोगों की रोकथाम के लिए जैविक दवाएं बना रही  हैं. इन दवाओं को आसानी से हासिल किया जा सकता है.

वैसे हमारी संस्था की कोशिश रहती  है कि ज्यादा से  ज्यादा किसान खुद ही जैविक दवाएं बना कर इस्तेमाल करें.

* जैविक उत्पाद बनाने में किसानों की कितनी दिलचस्पी रहती है  मौजूदा दौर के जागरूक किसान जैविक उत्पाद बनाने में पूरी दिलचस्पी लेते  हैं. इस बारे में हमारी संस्था द्वारा किसानों को पूरी जानकारी मुहैया कराई जाती  है.

* जैविक दवाएं बनाने में आमतौर पर किन चीज चीजों की जरूरत होती  है  आमतौर पर पंचगव्य यानी गोबर, गोमूत्र, दूध, घी व दही का देशी यानी जैविक दवाओं में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता  है. ये चीजें ज्यादातर किसानों के पास मौजूद होती  हैं,  क्योंकि आमतौर पर वे खेती के साथसाथ पशुपालन भी करते हैं.

पंचगव्य के अलावा जैविक उत्पादों में नीम की पत्तियों, नीम के फलों व गुड़ जैसी चीजों का भी इस्तेमाल किया जाता  है और ये तमाम चीजें सभी किसानों को बहुत आसानी से हासिल हो जाती हैं.

* राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र और किन तरीकों से किसानों की मदद करता है  हम किसानों को मौजूदा सरकारी योजनाओं की जानकारी मुहैया कराते  रहते  हैं, मसलन परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) मोदी सरकार की खास योजना है, जो किसानों के लिए बेहद लाभकारी है.

इस के अलावा जो किसान जैविक उत्पाद बड़े पैमाने पर बना कर उन का कारोबार करना चाहते  हैं, संस्था उन की पूरी मदद करती है.

* क्या आप के यहां किसानों को  ट्रेनिंग दिए जाने की भी सहूलियत  है

हमारी संस्था ट्रेनिंग की योजनाएं भी चलाती है. कुछ एनजीओ बीएससी एग्रीकल्चर की डिगरी वाले किसानों के ग्रुप ले कर  ट्रेनिंग के लिए आते  हैं.

हम लोग 30-30 के ग्रुप में 1 साल में  ट्रेनिंग के 3 बैच चलाते  हैं. इस 1 महीने की ट्रेनिंग के दौरान रहने व खानेपीने की सुविधा मुफ्त मुहैया कराई जाती है.

– डा. पूजा कनौजिया
(वैज्ञानिक अधिकारी, राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय)

गन्ने की घटती खेती किसानों की बदहाली

गन्ना देश की पुरानी व अहम फसलों में से एक है. देश में 526 चीनी मिलें गन्ने की भरपूर पैदावार की बदौलत ही चल रही?हैं. देश के 20 राज्यों में गन्ने की काफी खेती की जाती है. साल 2016 के दौरान भारत में गन्ने का कुल रकबा 49.53 लाख हेक्टेयर था, जबकि गन्ने की पैदावार 3521 लाख टन व प्रति हेक्टेयर औसत उपज 71 टन थी.

गौरतलब है कि केंद्र व राज्य सरकारें गन्ना विकास स्कीमों में काफी पैसा लगा रही हैं, लेकिन खेतों में हरियाली व गांवों में खुशहाली बढ़ने के बजाय घट रही है. अत: गन्ना विकास का नतीजा ढाक के तीन पात ही नजर आ रहा है. मसलन, साल 2014-15 में देश में गन्ने का कुल क्षेत्रफल 49.93 हजार हेक्टेयर था, लेकिन साल 2015-16 में वह 40 हजार हेक्टेयर घट कर 49.53 हेक्टेयर ही रह गया था.

इस के अलावा ज्यादातर राज्यों में गन्ने का प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन भी गिर रहा है. मसलन, साल 2014-15 के दौरान आंध्र प्रदेश में गन्ने का कुल उत्पादन 9987 हजार टन था जो साल 2015-16 के दौरान घट कर सिर्फ  9312 हजार टन रह गया.

इसी तरह महाराष्ट्र में साल 2015 के दौरान गन्ने का उत्पादन 84199 हजार टन था जो अगले साल 2016 में घट कर 73790 हजार टन व कर्नाटक में 43776 हजार टन से घट कर सिर्फ 38475 हजार टन ही रह गया.

पैदावार में गिरावट

हैरत की बात यह है कि कमी सिर्फ गन्ने के रकबे व पैदावार में ही नहीं आई. कई राज्यों में तो गन्ने की औसत उपज भी बढ़ने के बजाय घटी है. साल 2015 में बिहार में प्रति हेक्टेयर गन्ने की औसत उपज 55179 किलोग्राम, महाराष्ट्र में 82232 व कर्नाटक में 91200 किलोग्राम थी. लेकिन 2016 के दौरान तीनों राज्यों में गन्ने की औसत उपज घट कर क्रमश: सिर्फ 54120, 74762 व 85500 किलोग्राम ही रह गई. सवाल उठता है कि आखिर यह कैसा गन्ना विकास है?

देश में गन्ने की खेती के लिए उत्तर प्रदेश का पहला स्थान है. देश के कुल गन्ना क्षेत्रफल का करीब 40 फीसदी हिस्सा अकेले इसी राज्य में आता है. उत्तर प्रदेश में गन्ना विकास के लिए कृषि से अलग महकमा है. गन्ना किसानों की यहां 169 व सहकारी चीनी मिलों की 28 सहकारी समितियां हैं.

सहकारी गन्ना समितियां अपने सदस्य किसानों का गन्ना चीनी मिलों को सप्लाई कराने, उन्हें गन्ना मूल्य का भुगतान कराने, किसानों को कर्ज व अनुदान पर खाद, बीज, दवा, मशीन आदि की सहूलियतें देने का काम करती हैं.

सहकारी गन्ना समितियों के अलावा कुल 152 गन्ना विकास परिषद भी उत्तर प्रदेश में चल रही हैं. ये परिषदें गन्ने की फसल को कीड़ों व बीमारी से बचाने, नर्सरी के जरीए गन्ने की बेहतर खेती को बढ़ावा देने व गन्ने की खेती वाले इलाकों में ढुलाई के लिए ग्रामीण इलाकों में सड़कें व पुलिया आदि बनवाने का काम करती हैं.

कैसा विकास

उत्तर प्रदेश में इतने बड़े सरकारी व सहकारी तामझाम और गन्ना विकास के लिए चल रही दर्जनों स्कीमों में सरकारी खजाने से हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं. मसलन, राष्ट्रीय किसान योजना में साल 2017-18 के दौरान 10 मदों के तहत खर्च करने के लिए 20 करोड़ 61 लाख रुपए मंजूर किए गए हैं. इस के अलावा जिला योजना व राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत भी गन्ना विकास की 8 योजनाएं उत्तर प्रदेश में चल रही हैं.

इस के बावजूद उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती बढ़ने के बजाय पिछड़ रही है. यदि बीते 10 साल के सरकारी आंकड़े देखें तो तसवीर बेहद खराब दिखाई देती है, लेकिन हैरत की बात है कि इन अहम बातों पर किसी उच्च अधिकारी ने गौर नहीं किया. परेशान बहुत से किसान अब गन्ने की खेती से मुंह मोड़ कर सब्जी व मसाले जैसी दूसरी फसलें उगाने लगे हैं. इसलिए गन्ने का ग्राफ  अब नीचे गिर रहा है.

एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में साल 2006-07 के दौरान गन्ने का कुल रकबा 26 लाख 62 हजार हेक्टेयर था. बीते 10 सालों में इस में 6 लाख 8 हजार हेक्टेयर की कमी आने से साल 2016-17 में गन्ने का क्षेत्रफल घट कर सिर्फ 20 लाख 54 हजार हेक्टेयर ही रह गया है.

गन्ने का रकबा घटने का सीधा असर गन्ने से तैयार होने वाले माल पर पड़ा. गन्ने की सालाना पैदावार में पूरे 1 करोड़ टन की कमी आई है.

उत्तर प्रदेश में गन्ने का उत्पादन बीते 10 सालों में 1586 लाख टन से घट कर 1486 लाख टन व चीनी मिलों में गन्ने की पेराई 894 लाख टन से घट कर 827 लाख टन रह गई है. जाहिर है कि अब उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती में काफी कमी आई?है.

किसानों का शोषण

कटाई के बाद गन्ने की उपज रोक कर नहीं रखी जा सकती. बेचने के बाद तुरंत पैसा मिलने से इसे  नकदी फसल भी कहा जाता है, लेकिन असलियत में ऐसा नहीं है. हर साल गन्ना किसानों के अरबोंखरबों रुपए चीनी मिल मालिक दबा लेते हैं और गन्ना किसान अपनी उपज बेच कर इधरउधर धक्के खाते हैं.

हालांकि चीनी मिलों को गन्ना सप्लाई करने के 14 दिन बाद देर से भुगतान करने पर उत्तर प्रदेश में 15 फीसदी ब्याज देने का नियम है, लेकिन ज्यादातर चीनी मिलों के मालिक किसानों का शोषण करते हैं. वे उन्हें एकमुश्त पैसा न दे कर किश्तों में देते हैं. ब्याज न देने पर जब किसान होहल्ला मचाते हैं तो मामले को कोर्टकचहरी तक जा कर उलझा देते हैं.

किसानों को 14 दिनों में गन्ने की कीमत दिलाने के लिए चीनी मिलों को नोटिस देने, चीनी का स्टाक जब्त करने, सरकारी राजस्व की तरह पैसा वसूल करने, मिल मालिकों व मैनेजरों को गिरफ्तार करने जैसी रस्मअदायगी होती है, लेकिन इस कार्यवाही के बावजूद हालात काबू में नहीं रहते. अत: इस का खमियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है.

भारी बकाया

नेता या अफसर भले ही खुद की पीठ थपथपाते हों, लेकिन बीती 27 नवंबर, 2017 को उत्तर प्रदेश में गन्ने के करीब 8 अरब 27 करोड़ रुपए बकाया थे. इस में से 765 करोड़ 32 लाख रुपए साल 2017 के चालू सीजन के हैं, जिस पर 3 अरब 64 करोड़ 17 लाख रुपए का ब्याज बनता है, लेकिन ब्याज मिलना तो दूर मूल कीमत भी पूरी नहीं मिलती. इस के अलावा 39 करोड़ 71 लाख रुपए पिछले सीजन 2016 के व 22 करोड़ 92 लाख रुपए उस से भी पिछले सीजन 2015 के अभी तक बकाया हैं.

चीनी मिल मालिक गन्ना किसानों को सरकार द्वारा तय कीमत देते हैं, जो बेशक कोल्हू क्रेशरों के मुकाबले ज्यादा होती है, लेकिन चीनी मिलों में गन्ना सप्लाई करना भी आसान नहीं है. पहले तो गन्ना सप्लाई करने की पर्चियां व बाद में गन्ने का भुगतान जल्दी नहीं मिलता. अत: छोटे किसान इस बदइंतजामी से काफी परेशान हैं. मसलन, उत्तर प्रदेश में चीनी मिल गेट के अलावा 7 हजार बाहरी सेंटरों पर भी गन्ने की खरीद की जाती है. इन में से ज्यादातर पर घटतौली होती है.

गन्ने की तौल में प्राय: 2 से 20 फीसदी तक की गड़बड़ी की जाती है. साल 2016 में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों ने 8366 लाख क्विंटल गन्ने की खरीद की थी. यदि सब से कम 2 फीसदी घटतौली भी मानी जाए तो 167 लाख 32 हजार क्विंटल गन्ने की घटतौली की जाती है. 315 रुपए प्रति क्विंटल की दर से इस की कीमत 5 अरब 27 करोड़ रुपए होती है, जिस से किसानों को नुकसान होता है.

मजबूरी का फायदा

गन्ना किसान अपनी उपज बेच कर तुरंत पैसा चाहते हैं, लेकिन चीनी मिल मालिक गन्ने के भुगतान में आनाकानी करते?हैं. गन्ना माफिया किसानों की इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं. वे नाजायज तौर से कम दाम पर गन्ने की नकद खरीद कर के चीनी मिलों को बेच कर अच्छा मुनाफा कमाते हैं. कई मिल मालिक अपने एजेंटों के जरीए दूसरे इलाकों का गन्ना खरीदते हैं. इस से गन्ना किसानों को तो नुकसान होता?है, लेकिन गन्ना माफियाओं को खूब फायदा होता है.

उपाय जरूरी

देश के ज्यादातर राज्यों में गन्ने की बोआई का क्षेत्रफल गन्ने की कुल पैदावार व प्रति हेक्टेयर औसत उपज घटने से कम जमीन में गन्ने की ज्यादा पैदावार लेने की उम्मीद टूटी है. साथ ही गन्ने के मुकाबले दूसरी अहम फसलों का संतुलन बनाए रखने का मकसद भी अधूरा रह गया है. अत: गन्ना किसानों की दिक्कतों को जल्द सुलझाना लाजिमी है.

मसलन, किसानों को गन्ने की कीमत का पूरा भुगतान तुरंत हो. कम जमीन में ज्यादा उपज देने वाली रोग रोधी किस्मों का गन्ना बीज मुहैया कराया जाए.

गन्ना खरीद में घटतौली करने वालों पर नकेल कसी जाए. खेतों की मिट्टी की जांच मुफ्त हो व रिपोर्ट के मुताबिक जरूरी पोषक तत्त्व किसानों को मुहैया कराए जाएं ताकि जमीन को ताकत मिले.

गन्ने की खेती में काम आने वाली महंगी मशीनें सहकारी सोसाइटी या चीनी मिलों से किराए या छूट पर दिलाई जाएं. किसानों को गन्ने की खेती सही तरीके से करने व कचरे का बेहतर इस्तेमाल करने की नई तकनीक सिखाई जाए. गन्ने के साथ इंटरक्रौपिंग को बढ़ावा दिया जाए ताकि किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी हो.

आपके गैस सिलेंडर से होती है छेड़छाड़, क्या आपको पता है

रसोई गैस के लिए इस्तेमाल होने वाले सिलेंडर में एक फायदे की बात छुपी होती है. लेकिन, ये फायदे की बात डिस्ट्रीब्यूटर कंज्यूमर्स को नहीं बताते. दरअसल, सिलेंडर खरीदते वक्त ही उपभोक्ता का बीमा यानी इंश्योरेंस हो जाता है. 50 लाख रुपए तक होने वाले इस इंश्योरेंस की जानकारी लोगों को नहीं होती. सिलेंडर का इंश्योरेंस इसकी एक्सपायरी से जुड़ा होता है.

अक्सर लोग सिलेंडर की एक्सपायरी डेट की जांच किए बिना ही इसे खरीद लेते हैं. लेकिन सिलेंडर की एक्सपायरी भी होती है, इस बात जानकारी भी डिस्ट्रीब्यूटर्स नहीं देते. दिलचस्प है कि तकरीबन पांच फीसदी सिलेंडर एक्सपायर्ड या एक्सपायरी डेट के करीब होते हैं. कई बार इनकी सिलेंडर की एक्सपायरी से छेड़छाड़ भी की जाती है. एक्सपायरी डेट औसतन छह से आठ महीने एडवांस रखी जाती है.

सिलेंडर पर बदली जाती है एक्सपायरी

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एक्सपायरी डेट पेंट द्वारा प्रिंट की जाती है, इसलिए इसमें हेर-फेर संभव है, क्योंकि कई बार जर्जर हालत में जंग लगे सिलेंडर पर भी एक्सपायरी डेट डेढ़-दो साल आगे की होती है. एजेंसी वाले तर्क देते हैं कि यहां से वहां लाते ले जाते वक्त उठा-पटक से कुछ सिलेंडर पुराने दिखते हैं.

ऐसे करें एक्सपायरी डेट की पहचान

  • सिलेंडर की पट्टी पर ए, बी, सी, डी में से एक लेटर के साथ नंबर होते हैं.
  • गैस कंपनियां 12 महीनों को चार हिस्सों में बांटकर सिलेंडर्स का ग्रुप बनाती हैं.
  • ‘ए’ ग्रुप में जनवरी, फरवरी, मार्च और ‘बी’ ग्रुप में अप्रैल मई जून होते हैं. ऐसे ही ‘सी’ ग्रुप में जुलाई, अगस्त, सितंबर और ‘डी’ ग्रुप में अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर होते हैं.
  • सिलेंडर्स पर इन ग्रुप लेटर के साथ लिखे नंबर एक्सपायरी या टेस्टिंग ईयर दर्शाते हैं. जैसे- ‘बी-12’ का मतलब सिलेंडर की एक्सपायरी डेट जून, 2012 है. ऐसे ही, ‘सी-12’ का मतलब सितंबर, 2012 के बाद सिलेंडर का इस्तेमाल खतरनाक है.

हो सकता है बड़ा हादसा

एक्सपायर्ड या टेस्टिंग ड्यू डेट क्रौस कर चुके सिलेंडरों के वौल्व से लीकेज का खतरा ज्यादा होता है, जो विस्फोट का कारण बन सकता है.

सिलेंडर डिलिवरी व्हीकल्स पर भी ऐसे सिलेंडरों से हादसे की आशंका रहती है और गोदाम में ये ब्लास्ट करें, तो बड़ी दुर्घटना हो सकती है.

ले सकते हैं ऐक्शन

  • एक्सपायर्ड सिलेंडर मिलने पर उपभोक्ता एजेंसी को सूचना देकर सिलेंडर रिप्लेस करा सकते हैं.
  • गैस एजेंसी के रिप्लेसमेंट से मना करने पर खाद्य या प्रशासनिक अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं.
  • इसे सेवा में कमी मानते हुए उपभोक्ता फोरम में मामला दायर कर सकते हैं.

गैस कनेक्शन के साथ लाखों का बीमा

आरटीआई से खुलासा हुआ था कि गैस कनेक्शन लेते ही उपभोक्ता का 10 से 25 लाख रुपए तक का दुर्घटना बीमा हो जाता है. इसके तहत गैस सिलेंडर से हादसा होने पर पीड़ित बीमा का क्लेम कर सकता है. साथ ही, सामूहिक दुर्घटना होने पर 50 लाख रुपए तक देने का प्रावधान है. इसके लिए दुर्घटना होने के 24 घंटे के भीतर संबंधित एजेंसी व लोकल थाने को सूचना देनी होगी और दुर्घटना में मृत्यु या घायल होने पर जरूरी प्रमाण पत्र उपलब्ध कराना होगा.

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एजेंसी अपने क्षेत्रीय कार्यालय और फिर क्षेत्रीय कार्यालय बीमा कंपनी को मामला सौंप देता है, लेकिन इस क्लेम के लिए कुछ शर्तों को पूरा करना जरूरी है. जो इस प्रकार हैं.

  • गैस कनेक्शन वैध होना चाहिए.
  • एजेंसी से मिली पाइप-रेग्युलेटर ही इस्तेमाल हो.
  • आईएसआई मार्का गैस चूल्हे का उपयोग हो.
  • लापरवाही से गैस के इस्तेमाल पर क्षतिपूर्ति नहीं.
  • गैस इस्तेमाल की जगह पर बिजली का खुला तार न हो.
  • चूल्हे का स्थान, सिलेंडर रखने के स्थान से ऊंचा हो.

जियो ग्राहकों को बड़ा झटका, बंद होने वाले हैं सारे फ्री प्लान्स

जियो ग्राहकों के लिए जहां कंपनी नए-नए प्लान लौन्च कर रही है. वहीं, प्राइम यूजर्स के लिए बुरी खबर है. 31 मार्च के बाद जियो की फ्री सर्विसेज बंद हो जाएगी. ऐसा इसलिए होगा क्योंकि 31 मार्च 2018 को जियो की प्राइम मेंबरशिप खत्म हो रही है. आपको याद दिला दें कि 21 फरवरी 2017 को मुकेश अंबानी ने जियो प्राइम मेंबरशिप लौन्च की थी. जिसे लेने की अंतिम तारीख 31 मार्च थी. हालांकि, कंपनी ने बाद में इसे बढ़ाकर 15 अप्रैल 2017 कर दिया था. प्राइम मेंबरशिप की वैधता 1 साल की थी. अगर आपने 14 अप्रैल 2017 को भी यह मेंबरशिप ली थी तो भी ये 31 मार्च 2018 आपकी मेंबरशिप खत्म हो जाएगी.

फ्री ऐप्स भी नहीं कर पाएंगे इस्तेमाल

जियो प्राइम मेंबरशिप के साथ जियो ऐप्स जैसे जियो टीवी, जियो म्यूजिक, जियो सिनेमा जैसी 10,000 रुपए की ऐप्स फ्री मिली थी. इसके लिए यूजर्स ने 99 रुपए देकर ये प्राइम मेंबरशिप ली हैं. मेंबरशिप के अलावा उन्हें अलग से जियो का बेस्ट प्लान लेना पड़ा था. हालांकि, अभी तक कंपनी की ओर से मेंबरशिप खत्म होने के बाद यूजर्स को क्या करना है इसकी जानकारी नहीं दी गई है. सूत्रों के मुताबिक, यूजर्स को इस मेंबरशिप को चालू रखने के लिए फिर से प्लान लेना होगा. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कंपनी जियो प्राइम मेंबरशिप का अमाउंट बढ़ा सकती है.

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ये है प्राइम मेंबरशिप की शर्त

जियो प्राइम मेंबरशिप की शर्त थी कि ये 31 मार्च 2018 को खत्म हो जाएगी. अब इसके लिए यूजर्स कभी भी मेंबरशिप ली हो वह 31 मार्च को ही खत्म होगी. कंपनी इस मेंबरशिप को 31 मार्च के बाद  बढ़ा सकती है. लेकिन, इसके लिए कोई बयान नहीं आया है. साथ ही इसकी कीमत को लेकर भी संशय है कि यह बढ़ सकती है. अगर ऐसा होता है तो मौजूदा यूजर्स को नए औफर के लिए तैयार रहना होगा और थोड़े ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं.

जियो ने कम की कीमतें

जियो ने अपने करोड़ों यूजर्स को नए साल में लगातार दूसरी खुशी दी है. जियो हैप्पी न्यू ईयर प्लान के तहत 1 GB डाटा प्रतिदिन इस्तेमाल करने वाले सभी यूजर्स के लिए दो तरह के औफर आए हैं. नए औफर के तहत जियो ने अपने 1 GB डाटा प्रतिदिन वाले प्लान की कीमत में 50-60 रुपए तक की कमी की है. यानी अब यदि आप डेली 1 GB डाटा वाला प्लान लेते हैं तो आपको तीन अलग-अलग प्लान पर 50-60 रुपए का रिचार्ज कम कराना होगा. यानी अब आपको 199 रुपए की जगह 149 रुपए देने होंगे. 399 रुपए की जगह 349 रुपए का भुगतान करना होगा. इसी तरह 459 रुपए की बजाय 399 रुपए का भुगतान करना होगा.

तरक्की के रास्ते पर महती की ढाणी गांव

झुंझुनू जिले की चिढ़ावा पंचायत समिति का एक गांव है महती की ढाणी. इस गांव में ज्यादातर परिवारों के पास रोजीरोटी के साधन न होने की वजह से वे गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने के लिए मजबूर थे.

इस गांव की सब से बड़ी समस्या पीने के पानी की थी. वहां जब कोई शादी या कोई दूसरा आयोजन होता, तो परिवार वालों को कई दिनों तक पानी के इंतजाम में जुटना पड़ता था.

रामकृष्ण जयदयाल डालमिया सेवा संस्थान ने इस अनुसूचित जाति वाले गांव को पीने के पानी की समस्या से नजात दिलाने के लिए गांव के सरकारी स्कूल की जमीन में बारिश के पानी के संरक्षण के लिए करीब 1 लाख लीटर कूवत का भूमिगत कुंड बनवाया. इस कुंड के बनने के बाद से ग्रामीणों को पीने या शादी समारोहों के लिए दूसरे गांवों से पानी नहीं लाना पड़ता. पहले गांव की महिलाएं पानी के इंतजाम में अपना पूरा दिन लगा देती थीं.

महती की ढाणी गांव में पानी की समस्या काफी पुरानी है. कई पीढि़यां इस समस्या से जूझती आ रही थीं.

जब संस्थान ने इस गांव को विकास के लिए गोद लिया, तो सब से पहले बारिश के पानी का संरक्षण कर के शुद्ध पानी गांव वालों को मुहैया कराया. वैसे जमीन से निकलने वाला पानी गांव में मौजूद है, लेकिन उस पानी में लवणीय व क्षारीय तत्त्व मिले होने के कारण उस का इस्तेमाल पीने के लिए नहीं किया जा सकता. जो लोग इस पानी को खानेपीने में इस्तेमाल कर रहे थे, वे तमाम बीमारियों की चपेट में आ जाते और गरीबी के कारण अपना इलाज भी नहीं करा पाते थे. ऐसे में उन की जिंदगी खतरे में पड़ जाती थी.

संस्थान ने गांव वालों को बारिश का पानी जमा करने का बढ़ावा देने के लिए सभी घरों में जमीन के अंदर टंकियां बनवाईं. संस्थान ने रोजाना के इस्तेमाल के बाद रास्तों पर फैलने वाले पानी की रोकथाम के लिए कच्चे कुएं बनवाए ताकि वह जमीन के पानी में मिल सके. इस काम में संस्थान को ग्रामीणों का पूरा सहयोग मिला. आज इस गांव में पीने के पानी की कोई दिक्कत नहीं है.

हती की ढाणी गांव में गरीबी इतनी थी कि लोग मेहनतमजदूरी या बकरीपालन कर के मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पा रहे थे. गांव के 87 परिवारों में से करीब 80 परिवार गरीबी की रेखा से नीचे थे. खेती के लिए जरूरी साधन नहीं होने की वजह से लोग ढंग से खेती भी नहीं कर पा रहे थे. ऐसे में संस्थान ने ग्रामीणों के हालात के मुताबिक आमदनी बढ़ाने की योजना तैयार की.

पहले लवणीय व क्षाररोधी फसलों की बोआई करने और बकरीपालन जैसे कार्यक्रम योजना में शामिल किए गए. चूंकि यह गांव भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से चलने वाली समन्वित कृषि प्रणाली परियोजना में शामिल था, लिहाजा ग्रामीणों को खरीफ व रबी की फसलों के लिए रोगरोधी व खारे पानी को सहन करने वाले उच्च गुणवत्ता वाले बीज मुफ्त में मुहैया कराए गए.

साथ ही गांव वालों को सिंचाई के लिए फव्वारा सिंचाई प्रणाली के इस्तेमाल की सलाह दी गई. संस्थान की इन कोशिशों से किसानों का उत्पादन बढ़ कर डेढ़ से दोगुना हो गया.

महती की ढाणी के गरीब किसानों को कम क्षेत्र व लागत में ज्यादा आमदनी हासिल करने के लिए कृषि के साथसाथ बागबानी शुरू करने की सलाह दी गई. उन्हें नीबू, मौसमी, किन्नू व बेर आदि फलदार पेड़ों के पौधे मुहैया कराए गए. किसानों ने संस्थान द्वारा मुहैया कराए गए इन पौधों को रोप कर नियमित सिंचाई शुरू की. सिंचाई के लिए बूंदबूंद सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल किया गया. संस्थान द्वारा फलदार पौधों के रखरखाव व उन में लगने वाले रोगों की रोकथाम की जानकारी दी गई और कीटनाशक दवाएं भी मुहैया कराई गईं. इन कोशिशों से गांव में फलदार पौधों के बाग दिखाई देने लगे हैं. 1-2 साल बाद जब इन बागों में फल आने लगेंगे, तो किसानों को इन से अतिरिक्त आमदनी मिलने लगेगी.

संस्थान ने ग्रामीणों को ज्यादा लाभकारी मानी जाने वाली जमुनापारी व सिरोही नस्ल की बकरियों का पालन करने का सुझाव दिया. संस्थान द्वारा बकरियों में फैलने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए समयसमय पर टीकाकरण कराने की व्यवस्था भी की गई. आज महती की ढाणी गांव खुशहाली के रास्ते पर तेजी से बढ़ने लगा है.

नई तकनीक से उगाया हरा चारा बढ़ गया दूध उत्पादन

भारत में किसानों की आमदनी का मुख्य जरीया खेती के अलावा दूध उत्पादन भी है. भारत दूध के उत्पादन में दुनिया में पहले स्थान पर है. किसान दूध पैदा करने के लिए गाय, भैंस और बकरियां पालते हैं. इन से उन्हें भरपूर लाभ होता है.

पशुपालन के लिए सरकार किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. इतना सब होने के बावजूद देश में पशुओं के लिए पौष्टिक चारा मुहैया नहीं हो पा रहा है, जिस से उन की दूध देने की कूवत पर असर पड़ रहा है. जनसंख्या के मुकाबले खेतों का दायरा कम होता जा रहा है, जिस की वजह से पशुओं के लिए हरा चारा मिलना काफी कठिन हो गया है.

किसानों के पास इतनी जमीन नहीं है कि वे खेतों में पशुओं के लिए चारा उगा सकें. इस समस्या से किसान परेशान हैं. कुछ ऐसी ही कहानी मध्य प्रदेश के होशंगाबाद रोड स्थित दीपड़ी गांव के आकाश पाटीदार की है, जिन का डेरी का कारोबार  है.

आकाश कहते हैं कि उन्हें पशुओं को हरा चारा खिलाना काफी महंगा पड़ रहा था, इसलिए वे परेशान रहते थे. लेकिन एक दिन उन्होंने यूट्यूब पर एक वीडियो देखा, जिस में कम लागत से हरा चारा उगाने की जानकारी थी. इस तकनीक का नाम हाइड्रोपोनिक्स ग्रास ट्रे है.

क्या है हाइड्रोपोनिक्स तकनीक : पानी, बालू या कंकड़ों के बीच बिना मिट्टी के चारा उगाए जाने की तकनीक को हाइड्रोपोनिक तकनीक कहते हैं.

इस विधि से चारे वाली फसल को 15 से 30 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान पर करीब 80 से 85 फीसदी नमी में उगाया जाता है और 8 से 10 दिनों में चारा तैयार हो जाता है. यह तकनीक काफी सस्ती भी पड़ती है. इस तकनीक से किसान चारे की समस्या पर काबू पा सकते हैं.

घर में कैसे तैयार करें हाइड्रोपोनिक्स चारा : हाइड्रोपोनिक्स ट्रे बनाने के लिए 8×2 फुट की टीन की चादर या प्लास्टिक ट्रे का इस्तेमाल किया जा सकता है. हाइड्रोपोनिक्स चारा 10 दिनों में पशुओं को खिलाने लायक हो जाता है, इसलिए आप को कम से कम 10 ट्रे की जरूरत होगी.

इस से आप को रोजाना हरा चारा हासिल होगा. एक ट्रे में करीब 10 किलोग्राम चारा हो जाता है.

बीज : हाइड्रोपोनिक्स ग्रास ट्रे के लिए करीब 1किलोग्राम मक्के के बीज लें. उन बीजों को 10 से 12 घंटे तक किसी बालटी में भीगने के लिए रख दें. अब इन भीगे हुए बीजों को 24 घंटे के लिए जूट के बोरे में लपेट कर रख दें. अगले दिन बीज अंकुरित हो जाएंगे, फिर इन अंकुरित बीजों को किसी ट्रे में रख दें.

पशुओं को रोजाना ताजा हरा चारा मिले, इस के लिए रोजाना बीजों को 12 घंटे के लिए भिगाएं और फिर उन्हें अगले 24 घंटे तक जूट के बोरे में लपेट कर रखें, जिस से बीजों में अंकुर आ जाएं. इस बात पर खास ध्यान दें कि हर दिन इसी तरह काम करना होगा. आप मक्के के बीजों के अलावा ज्वार, बाजरा और बरसीम के बीजों से भी पशुओं के लिए हरा चारा उगा सकते हैं.

मिट्टीपानी की जरूरत नहीं : हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से चारा उगाने के लिए पानी और मिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन गरमियों में 10 दिनों में 1 या 2 बार पानी का हलका सा छिड़काव किया जा सकता है, क्योंकि अंकुरित बीजों में पहले से ही नमी रहती है.

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से लाभ : इस तकनीक का सब से बड़ा लाभ यह है कि इस से काफी कम जगह में पोषणयुक्त हरा चारा आसानी से मुहैया हो जाता है.

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से आम किसान सालभर दुधारू पशुओं के लिए कम जगह में हरा चारा उगा सकते हैं, जिन्हें आमतौर पर कई एकड़ में चारा उगाना पड़ता है. इस विधि से लागत भी काफी कम आती है और मिट्टी के उपजाऊ न होने का फर्क भी नहीं पड़ता.

* रिसर्च में पाया गया कि परंपरागत हरे चारे में क्रूड प्रोटीन 10.7 फीसदी होता है, जबकि मक्के से तैयार हाइड्रोपोनिक्स चारे में कू्रड प्रोटीन 13.6 फीसदी होता है, परंपरागत हरे चारे में कू्रड फाइबर भी कम होता है. हाइड्रोपोनिक्स चारे में अधिक ऊर्जा और विटामिन होते हैं. इस से पशुओं में दूध का उत्पादन अधिक होने लगता है.

* हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में मिट्टी की जरा भी जरूरत नहीं होती और पानी भी बहुत कम देना पड़ता है.

इस वजह से पौधों के साथ न तो अनावश्यक खरपतवार उगते हैं और न ही इन पर कीड़ेमकोड़े लगने का डर रहता है. इसलिए कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता और न ही खाद का. इस तकनीक से हरा चारा उगाने में मौसम का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता. इसे किसी भी मौसम में उगाया जा सकता है.

* हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से हरा चारा 8 से 10 दिनों में पशुओं को खिलाने के लायक हो जाता है. परंपरागत तकनीक में चारा तैयार होने में 40 से 45 दिन लगते हैं. 100 पशुओं के लिए परंपरागत विधि से चारा उगाने के लिए करीब 15 एकड़ जमीन की जरूरत पड़ती है, लेकिन हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से 1000 वर्गफुट में 15 एकड़ के बराबर चारा आसानी से कम लागत में उगाया जा सकता है.

इस चारे को मशीन से काट कर खिलाया जाता है और चारे की जड़ को भी पशुओं को खिलाया जाता है, क्योंकि उस में मिट्टी नहीं होती है.

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से दूध उत्पादन में बढ़ोतरी : इस तकनीक से उगाया गया चारा अंकुरित होने के कारण अधिक प्रोटीन और मिनरल से भरपूर होता है. इस से दूध में फैट की मात्रा बढ़ जाती है.

दूध देने वाले पशुओं को अतिरिक्त प्रोटीन व मिनिरल्स की जरूरत होती है, जिसे पूरा करने के लिए बाजार से अधिक कीमत में खरीद कर तरल प्रोटीन दिया जाता है.

बाजार से खरीदा गया प्रोटीन काफी मंहगा पड़ता है. इस की पूर्ति के लिए डेरी वाले ग्राहकों से ज्यादा कीमत वसूलते हैं.

प्रति पशु 40 रुपए की बचत : आकाश पाटीदार बताते हैं कि यूट्यूब पर सीखी गई इस तकनीक ने उन की हरे चारे की दिक्कत दूर कर दी है. आकाश बताते हैं कि उन्होंने पहले एक रैक में चारा उगाया और फिर इस की सफलता के बाद 1000 वर्गफुट में 100 पशुओं के लिए प्रोटीनयुक्त हरा चारा उगा रहे हैं.

पहले 1 पशु को दोनों समय मिला कर 8 किलोग्राम पशुआहार देना होता था, जिस के लिए बाजार से 20 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से पशुआहार खरीदना पड़ता था. वे अब सिर्फ 6 किलोग्राम चारा दे रहे हैं. हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से प्रति पशु 40 रुपए की बचत होने लगी.

डाक्टर एसआर नागर कहते हैं कि मिट्टी जनित चारे के मुकाबले अंकुरित चारा हर लिहाज से बेहतर है. इस में विटामिन ‘ए’ समेत भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है. इस से दूध का उत्पादन बढ़ेगा, साथ में उस की गुणवत्ता भी बेहतर होगी.

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