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एसबीआई खाताधारक अब एटीएम, डेबिट कार्ड को खुद कर सकेंगे कंट्रोल

देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक औफ इंडिया ने अपने यूजर्स को बड़ा तोहफा दिया है. डेबिट कार्ड के इस्तेमाल करने को लेकर जो डर रहता था अब वह नहीं रहेगा. SBI ने आपके लिए ऐसा ATM कार्ड निकाला है, जिसे यूजर्स खुद कंट्रोल कर सकते हैं. बैंक अपने अकाउंट होल्डर्स को यह एटीएम कार्ड दे रहा है. SBI की यह सुविधा SBI क्विक ऐप के जरिए देगा. SBI क्विक में ATM कार्ड के लिए अलग से कुछ सुविधाएं हैं. यह ऐप आपको ATM कार्ड को ब्‍लौक करने, औन या औफ करने और ATM पिन जनरेट करने की सुविधा उपलब्‍ध कराती है.

स्मार्टफोन के जरिए होगा कंट्रोल

SBI के नए एटीएम कार्ड को क्विक ऐप के जरिए यूजर्स अपने कार्ड की सिक्‍योरिटी का पूरा इंतजाम अपने स्‍मार्टफोन पर कर सकते हैं. हालांकि, इस ऐप को तभी इस्‍तेमाल किया जा सकेगा, जब मोबाइल नंबर पर इस ऐप को डाउनलोड किया गया हो और वही मोबाइल नंबर बैंक में रजिस्‍टर्ड हो.

कैसे करता है काम

सबसे पहले इस ऐप को शुरू करने के लिए आपको रजिस्‍ट्रेशन कराना होगा. इसके लिए आपको ऐप के रजिस्‍ट्रेशन फीचर में जाकर जिस नंबर पर ऐप डाउनलोड किया है, उसे एंटर करना है. इसके बाद आपका रजिस्‍ट्रेशन हो जाएगा.

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कैसे होगी कार्ड ब्‍लौकिंग

अगर आपका एटीएम कार्ड खो गया है और आप इसे ब्‍लौक कराना चाहते हैं तो आपको ऐप के एटीएम कम डेबिट कार्ड के फीचर में जाकर एटीएम कार्ड ब्‍लौकिंग सिलेक्‍ट करना होगा. उसके बाद अपने कार्ड के आखिरी 4 डिजिट एंटर करके कंटीन्‍यू पर सिलेक्‍ट करना होगा. इस सर्विस के लिए आपको कुछ चार्ज भी देना होगा. अगर आप एसएमएस के जरिए ऐसा करना चाहते हैं तो आपको BLOCK space डेबिट कार्ड के आखिरी 4 डिजिट लिखकर 567676 पर एसएमएस करना होगा.

एटीएम को खुद कर सकते हैं बंद

एसबीआई क्विक ऐप के जरिए यूजर्स अपने एटीएम कार्ड को किसी भी एटीएम मशीन, पीओएस मशीन, ई-कौमर्स, इंटरनेशनल और डौमेस्टिक इस्‍तेमाल के लिए स्विच औन या औफ कर सकते हैं. इसके लिए आपको ऐप के एटीएम कम डेबिट कार्ड फीचर में जाकर अपने कार्ड के आखिरी 4 डिजिट डालकर एटीएम कार्ड स्विच औन/औफ पर क्लिक करना है. उसके बाद औप्‍शन का चयन करके स्विच औन या औफ कर सकते हैं.

SMS से भी बंद हो सकता है ATM

अगर आप मैसेज से औन और औफ करना चाहते हैं तो आपको एसएमएस 09223588888 पर भेजना है. मैसेज भेजने का फौर्मेट ऐसा है. एटीएम ट्रान्‍जेक्‍शंस स्विच औन के लिए- SWONATM space कार्ड के अंतिम 4 डिजिट. स्विच औफ के लिए- SWOFFATM space कार्ड के अंतिम 4 डिजिट. POS स्विच औन के लिए- SWONPOS space कार्ड के अंतिम 4 डिजिट. स्विच औफ के लिए- SWOFFPOS space कार्ड के अंतिम 4 डिजिट.

ऐसे औन करें अपना बंद ATM कार्ड

ई-कौमर्स इस्‍तेमाल के लिए स्विच औन के लिए SWONECOM space कार्ड के अंतिम 4 डिजिट. स्विच औफ के लिए- SWOFFECOM कार्ड के अंतिम 4 डिजिट. इंटरनेशनल ट्रान्‍जेक्‍शंस स्विच औन के लिए SWONINTL कार्ड के अंतिम 4 डिजिट. स्विच औफ के लिए- SWOFFINTL space कार्ड के अंतिम 4 डिजिट. डौमेस्टिक ट्रान्‍जेक्‍शंस स्विच औन के लिए- SWONDOM space कार्ड के अंतिम 4 डिजिट. स्विच औफ के लिए- SWOFFDOM space कार्ड के अंतिम 4 डिजिट.

ये फीचर्स भी हैं मौजूद

एटीएम कंट्रोलिंग के अलावा एसबीआई क्विक में बैलेंस इन्‍क्‍वायरी, मिनी स्‍टेटमेंट, कार लोन-होम लोन की डिटेल पाने, पीएम सोशल सिक्‍योरिटी स्‍कीम्‍स में इनरौलमेंट, अकाउंट डिरजिस्‍टर करने, अकाउंट स्‍टेटमेंट, होम लोन इंट्रेस्‍ट सर्टिफिकेट और एजुकेशन लोन सर्टिफिकेट ई-मेल के जरिए पाने की भी सुविधा मौजूद हैं.

विंदू दारा सिंह बने निर्माता

मशहूर अभिनेता विंदू दारा सिंह के पिता दारा सिंह अपने समय के मशहूर कुश्तीबाज, फिल्म अभिनेता व फिल्म निर्माता थे. अब विंदू दारा सिंह भी अभिनेता के साथ साथ निर्माता बन गए हैं, मगर विंदू ने फिल्म की बजाय नाटक का निर्माण किया है. विंदू दारा सिंह निर्मित और लखबीर लेहरी व लकी हंस निर्देशित नाटक‘‘गोलमाल-द प्ले’’ भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर कटाक्ष करने वाला नाटक है, जिसका पहला शो रंग शारदा, मुंबई में 26 मई को हो चुका है और इसे काफी सराहा गया. अब इस नाटक के अगले शो सूरत, पुणे, दिल्ली, हैदराबाद, अहमदाबाद, बड़ोदा के अलावा अमरीका व दुबई में होंगे.

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नाटक‘‘गोलमाल – द प्ले’’के लेखक लकी हंस हैं. जबकि रचनात्मक निर्देशक आकाशदीप हैं. नाटक के निर्देशक लखबीर लेहरी पंजाबी के मशहूर हास्य कलाकार हैं, जिन्होंने इस नाटक में भी अहम किरदार निभाया है.

नाटक “गोलमाल- द प्ले” भारतीय शिक्षा जगत की सच्चाई को उजागर करता है. इस नाटक में इस बात को व्यंग और हास्य के माध्यम से दिखया गया है कि बच्चों के माता पिता अपने बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए किस तरह परेशान होते हैं और उन्हें किस तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं.

नाटक ‘‘गोलमाल – द प्ले’’ में आकाशदीप, शीबा, लखबीर लेहरी, विंदू दारा सिंह, राजेश पुरी, गोगा कपूर, सुरलीन कौर की अहम भूमिकांए हैं.

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इस नाटक की चर्चा करते हुए विंदू दारा सिंह कहते हैं- ‘‘आज हर इंसान परेशान व दुःखी है. इसलिए हमारा मूल मकसद लोगों का इस नाटक के माध्यम से मनोरंजन करना है. मगर साथ में हम शिक्षा जगत की सच्चाई को भी बयां कर रहे हैं. हमने कोशिश की है कि दर्शकों को उनके पैसे का भरपूर मजा मिले और वह खुश होकर जाएं.’’

वोडाफोन आइडिया मर्जर से बनेगी वोडाफोन आइडिया लिमिटेड

इंडियन टेलिकौम सेक्टर की दो दिग्गज कंपनियां वोडाफोन इंडिया और आइडिया सेल्युलर जल्द ही मर्जर के बाद एक कंपनी बन जाएंगी. मर्जर के बाद बनने वाली नई कंपनी का नाम होगा वोडाफोन इंडिया लिमिटेड. आइडिया सेल्युलर के बोर्ड ने 26 जून को एक असाधारण आम बैठक बुलाई है. इस बैठक में ही आइडिया सेल्युलर लिमिटेड का नाम बदलकर वोडाफोन इंडिया लिमिटेड किए जाने को मंजूरी दी जाएगी.

इतना ही नहीं इस बैठक में नई कंपनी की ओर से 15,000 करोड़ रुपये का फंड जुटाने के प्रस्ताव पर मंजूरी की भी मांग की जाएगी. हम अपनी इस खबर में आपको वोडाफोन और आइडिया के मर्जर से जुड़ी 10 बड़ी बातें बता रहे हैं.

  • कंपनी ने स्टौक मार्केट फाइलिंग में यह जानकारी दी है कि 20 मार्च, 2017 को एक ‘कार्यान्वयन समझौते’ के संदर्भ में, नई बनने वाली कंपनी के नाम में वोडाफोन और आइडिया के नामों को शामिल करने के लिए प्रस्ताव रखा गया था.
  • आइडिया के बोर्ड औफ डायरेक्टर्स ने फैसला किया था कि कंपनी का नाम आइडिया सेल्युलर लिमिटिड से बदलकर वोडाफोन आइडिया लिमिटेड रखा जाएगा.

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  • रजिस्ट्रार औफ कंपनीज (आरओसी) ने वांछित नाम वोडाफोन आइडिया लिमिटेड की उपलब्धता पर इसको 24 मई 2018 को मंजूरी दे दी है. कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों और नियमों के अंतर्गत कंपनी को अपने नाम में परिवर्तन के लिए विशेष प्रस्ताव के जरिए शेयरधारकों की स्वीकृति प्राप्त करने की आवश्यकता होती है.
  • नाम में बदलाव के साथ ही कंपनी विशेष प्रस्ताव के जरिए सदस्यों से यह अनुमति भी मांगेगी कि उसे नौन-कन्वर्टिबल सिक्योरिटीज के जरिए 15,000 करोड़ रुपये जुटाने की स्वीकृति भी दी जाए.
  • मर्जर के लिए कंपनी को पहले भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) से मंजूरी मांगनी होगी. 24 जुलाई को, बीते साल इन दोनों कंपनियों को मर्जर की स्वीकृति दे दी थी. वहीं मई 2017 को सेबी ने इन दोनों कंपनियों के मर्जर प्रस्ताव पर स्पष्टीकरण की मांग की थी.
  • बीते साल 13 अक्टूबर को आइडिया सेल्युलर के शेयर होल्डर्स ने कंपनी के मोबाइल बिजनेस के वोडाफोन के साथ मर्जर को मंजूरी दे दी थी. आइडिया के करीब 99 फीसद शेयरहोल्डर्स ने 12 अक्टूबर 2017 को हुई एक बैठक में इस मर्जर प्रस्ताव के समर्थन में वोट किया था. यह जानकारी स्टौक फाइलिंग में कुमार मंगलम बिड़ला ने दी है.
  • शेयरधारकों की मंजूरी के बाद कंपनी को नेशनल कंपनी लौ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की मंजूरी चाहिए होगी. एनसीएलटी की मंजूरी के बाद कंपनियां टेलिकौम डिपार्टमेंट में अंतिम मंजूरी के लिए आवेदन कर सकती हैं.
  • 22 मार्च को दोनों कंपनियों ने घोषणा की थी कि वोडाफोन के चीफ औपरेटिंग औफिसर बालेश शर्मा को मर्जर के बाद बनने वाली कंपनी का नया सीईओ नियुक्त किया जाएगा.
  • कुमार मंगलम बिड़ला मर्जर से बनने वाली कंपनी के नौन एग्जीक्यूटिव चेयरमैन होंगे.
  • वोडाफोन इंडिया और आइडिया सेल्युलर फिलहाल देश की नंबर 2 और नंबर तीन कंपनियां हैं, जबकि भारतीय एयरटेल नंबर 1 टेलिकौम कंपनी है. वोडाफोन और आइडिया के बीच मर्जर के बाद वोडाफोन के पास 45.1 फीसद की हिस्सेदारी होगी, जबकि आइडिया सेल्युलर के पास 26 फीसद की हिस्सेदारी होगी.

अमेरिका में यह सम्मान पाने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी होंगे रोहित शर्मा

भारतीय क्रिकेट टीम के सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा अमेरिका में बेसबौल क्लब सिएटल मैरिनर्स के लिए ‘फर्स्ट पिच’ करके लीग का औपचारिक शुरुआत करेंगे. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में मुंबई इंडियंस टीम के कप्तान रोहित पहले ऐसे क्रिकेटर होंगे जिन्हें अमेरिकी स्पोर्ट्स लीग में यह सम्मान प्राप्त होगा. लीग का उद्घाटन रविवार (3 जून) को किया जाएगा. रोहित इस समय अपनी पत्नी रितिका के साथ अमेरिका के तीन शहरों सेन फ्रांस्किो, सिएटल और लौस एंजेलिस के दौरे पर हैं.

मुंबई इंडियंस की ओर से जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार रोहित शर्मा भारतीय समयानुसार रविवार (3 जून) रात एक बजे बेसबौल को पिच करके लीग का उद्घाटन करेंगे. उद्घाटन के बाद सिएटल की भिड़ंत टेम्पा बे रेज से होगा. अमेरिका में यह परंपरा रही है कि लीग की शुरुआत करने के लिए किसी खास व्यक्ति या हस्ती को बेसबाल को फर्स्ट पिच करने का मौका दिया जाता है और इस बार यह मौका रोहित को दिया गया है जो इस समय अमेरिका के दौरे पर हैं. सलामी बल्लेबाल रोहित अमेरिका में अपनी यात्रा के दौरान क्रिकेट क्लीनिक सीरीज में हिस्सा लेंगे और प्रशंसकों से मिलेंगे.

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बता दें कि आर्इपीएल 2018 में मुंबई इंडियंस ने नीलामी से पहले ही कप्तान रोहित शर्मा को रिटेन कर लिया था. मुंबई इंडियंस ने रोहित को 15 करोड़ रुपए खर्च कर रिटेन कर दिया था, लेकिन आईपीएल के इस सीजन में रोहित शर्मा फ्लौप साबित हुए. रोहित शुरू से ही आईपीएल में आउट औफ फौर्म थे. बता दें कि रोहित शर्मा मुंबई इंडियंस को तीन बार खिताब जितवा चुके हैं. मौजूदा सीजन में रोहित का बल्‍ला ज्‍यादातर वक्‍त खामोश रहा. दाएं हाथ के इस बल्‍लेबाज ने 14 मैचों में सिर्फ 286 रन बनाए. उनका औसत 23.83 का रहा.

मुंबई इंडियंस ने आईपीएल 10 का खिताब अपने नाम किया. यह उसका तीसरा आईपीएल खिताब था. इससे पहले मुंबई ने 2013 और 2015 में खिताब अपने नाम किया था. मुंबई इंडियंस ने अपने तीनों खिताब रोहित शर्मा की कप्तानी में जीते हैं. रोहित शर्मा सबसे ज्यादा आईपीएल जीतने वाले कप्तान भी थे.

लेकिन इस साल चेन्नई सुपरकिंग्स ने तीसरी बार आईपीएल खिताब को जीतकर मुंबई इंडियंस की बराबरी कर ली है. इसी के साथ महेंद्र सिंह धोनी ने रोहित शर्मा की बराबरी की. चेन्नई ने भी अपने तीनों खिताब महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में जीते हैं.

असीम क्षेत्रपाल की किताब पर फिल्म ‘‘उॅं अल्लाह’’

क्रिकेट और फिल्म जगत से जुड़े रहे असीम क्षेत्रपाल अब अपनी आत्मकथा पर लिखी गयी किताब ‘‘द चोजेन वन’’ पर हौलीवुड कंपनी के साथ मिलकर फिल्म ‘‘उॅं अल्लाह’’ का निर्माण कर रहे हैं. 1999 में असीम क्षेत्रपाल की स्पोर्ट्स प्रमोटर कंपनी ‘‘रेडियंट स्पोर्ट्स मैनेजमेंट’’ पर क्रिकेट मैच फिक्सिंग से जुड़े होने के आरोप लगे थे. पर बाद में स्काटलैंड यार्ड ने इस कंपनी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था. तब असीम क्षेत्रपाल ने अपने जीवन के उतार चढ़ाव पर आत्मकथात्मक किताब ‘‘द चोजेन वन’’ लिखी थी. जिस पर अब वह एक हौलीवुड प्रोडक्शन कंपनी के साथ मिलकर ‘‘उॅं अल्लाह’’ नामक फिल्म का निर्माण करने जा रहे हैं.

खुद असीम क्षेत्रपाल कहते हैं- ‘‘मेरी आत्मकथा में मेरे जीवन के 19 वर्ष के उतार चढ़ाव हैं. इसमें मेरे  राष्ट्रीय स्तर के टेनिस खिलाड़ी बनने, खेल प्रमोटर, फिल्म व टीवी शो निर्माता से लेकर आध्यात्मिक वक्ता बनने तक की जिंदगी का चित्रण है. जब मैं एक स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी चला रहा था और प्रायोजकों के बीच मेरी कंपनी काफी लोकप्रिय हो गयी थी, तभी मेरी कंपनी को मैच फिक्सिंग के विवादों में घसीटा गया. अंततः सच की जीत हुई थी और मेरी कंपनी को निर्दोष बताया गया था. तब मैंने अपनी आत्मकथा लिखी. मेरी इस किताब की अब तक एक लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं और अब हम इस पर फिल्म बना रहे हैं.’’

हिंदी और अंग्रेजी इन दो भाषाओं में बन रही इस फिल्म की कहानी व पटकथा विकास कपूर ने लिखी है. जबकि फिल्म के गीतों को आशा भोसले, अनूप जलोटा, हमसर हयात व अलीशा चिनाय ने स्वरबद्ध किया है.

आखिर कैसे चलता है सट्टेबाजी का काला धंधा

सट्टेबाजी का भूत एक बार फिर क्रिकेट जगत में उतर आया है. आईपीएल में सट्टेबाजी के मामले में इस बार बौलीवुड अभिनेता अरबाज खान का नाम आया है. IPL में कथित तौर पर सट्टेबाजी के सिलसिले में बौलीवुड अभिनेता और फिल्म निर्माता अरबाज खान से पूछताछ भी की गई. लगातार पांच घंटे की पूछताछ में अरबाज खान ने छह बार सट्टेबाजी की बात कबूल की. आए दिन क्रिकेट मैचो के बुक्की पकड़े जाते हैं, लेकिन फिर भी मैच फिक्सिंग के मामले खत्म नहीं होते. क्रिकेट के सट्टे का बहुत बड़ा कारोबार है. इससे करोड़ों रुपयों का हेरफेर होता है. आइए जानते हैं कैसे चलता है यह गोरखधंधा.

कैसे चलता है ये ‘खेल’

सट्टे पर पैसे लगाने वाले को फंटर कहते हैं, जो पैसे का हिसाब किताब रखता है, उसे बुकी कहा जाता है. सट्टे के खेल में कोड वर्ड का इस्तेमाल होता है. सट्टा लगाने वाले फंटर 2 शब्द खाया और लगाया का इस्तेमाल करते हैं. यानी किसी टीम को फेवरेट माना जाता है तो उस पर लगे दांव को लगाया कहते हैं. ऐसे में दूसरी टीम पर दांव लगाना हो तो उसे खाना कहते हैं. इस खेल में डिब्बा अहम भूमिका निभाता है. डिब्बा मोबाइल का वह कनेक्शन है, जो मुख्य सटोरियों से फंटर को कनेक्शन देते हैं.

कोड वर्ड से करोड़ों का लेनदेन

डिब्बा पर ही हर बौल का रेट बताया जाता है. पूरे आईपीएल के दौरान डिब्बे का कनेक्शन ढाई से 3 हजार में मिलता है. डिब्बे का कनेक्शन एक खास नंबर होता है, जिसे डायल करते ही उस नंबर पर कमेंट्री शुरू हो जाती है. आईपीएल मैच में सट्टा 2 सेशन में लगता है. दोनों सेशन 10-10 ओवर के होते हैं. ‘सेशन एक पैसे का है, ‘मैने चव्वनी खा ली है ‘डिब्बे की आवाज कितनी है ‘तेरे पास कितने लाइन है, ‘आज फेवरेट कौन है, ‘लाइन को लंबी पारी चाहिए. कहने को ये सिर्फ चंद ऊटपंटाग अल्फाज लगें, लेकिन इनके बोलने में करोड़ों का लेनदेन हो रहा है.

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कैसे तय होता है रेट

डिब्बे पर अगर किसी टीम को फेवरेट मानकर डिब्बा उसका रेट 80-83 आता है तो इसका मतलब यह है कि फेवरेट टीम पर 80 लगाओगे तो 1 लाख रुपए मिलेंगे और दूसरी टीम पर 83 लगाओगे तो 1 लाख रुपए मिलेंगे. आईपीएल पर सट्टे बाजार में करोड़ों का सट्टा लगता है. सट्टे के खेल में स्टूडेंट्स को ज्यादा शामिल किया जाता है. आईपीएल मैच शुरू होने से पहले ही सभी 8 टीमों के रेट जारी कर दिए जाते हैं. साथ ही टौप टू प्लेयर भी घोषित किए जाते हैं. हालांकि, भाव लगातार बदलता रहता है.

क्या होता रेट का कोड वर्ड

मैच की पहली गेंद से लेकर टीम की जीत तक भाव चढ़ते-उतरते हैं. एक लाख को एक पैसा, 50 हजार को अठन्नी, 25 हजार को चवन्नी कहा जाता है. जीत तक भाव चढ़ते उतरते हैं. एक लाख को एक पैसा, 50 हजार को अठन्नी, 25 हजार को चवन्नी कहा जाता है. अगर किसी ने दांव लगा दिया और वह कम करना चाहता है तो फोन कर एजेंट को ‘मैंने चवन्नी खा ली कहना होता है.

कहां तय होते हैं कोड वर्ड

करोड़ों के सट्टे में बुकीज कोड वर्ड के जरिए हर गेंद पर दांव चलते हैं. हैरानी की बात है कि ये कोड नेम हिंदुस्तान से नहीं बल्कि जहां से सट्टे की लाइन शुरू होती है, वहीं इन कोड नेम का नामकरण किया जाता है. जी हां, ये कोड दुबई और कराची में रखे जाते हैं, जिनमें बहुत से कोड नेम का नाम डी कंपनी यानी अनीस इब्राहीम और छोटा शकील ने खुद रखे हैं.

इसलिए होता है कोड वर्ड का इस्तेमाल

दरअसल, कोड वर्ड का ये सारा खेल मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच से बचने के लिए किया जाता है. सट्टे की सैकड़ों टेलीफोन लाइनें टैप करते वक्त पुलिस फिक्सिंग के सच तक ना पहुंच सके इसलिए ऐसा किया जाता है. वो फिक्सिंग जिसकी शुरूआत अंडरवर्ल्ड के सबसे खतरनाक डौन दाऊद इब्राहीम ने पाकिस्तान के एक बेहद नामी खिलाड़ी के साथ शुरू की थी.

इमरान की हैट्रिक…!

पाकिस्तानी क्रिकेट को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और ख्याति दिलाने वाले हरफनमौला खिलाड़ी इमरान खान नियाजी की तीसरी शादी भी टूटने के कगार पर है. कुछ दिन पहले इमरान ने बुशरा मनेका से शादी की थी. अभी सलीके से हनीमून भी संपन्न नहीं हुआ था कि बुशरा इमरान का घर छोड़ कर चली गईं जिस की वजह बड़ी दिलचस्प यानी इमरान खान के पालतू कुत्ते थे जिन की वजह से बुशरा नमाज वगैरह ढंग से नहीं पढ़ पा रही थीं और इमरान अपने पेट्स की अनदेखी की शर्त पर बुशरा से कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे. बुशरा का प्रचलित नाम पिंकी पीर है और उन की यह दूसरी शादी है, पहले पति से उन की 5 संतानें हैं.

पहली 2 शादियों के तलाक में तबदील होने से अवसाद में डूबे इमरान अब हैरान हैं कि क्या करें, कल तक जो बुशरा उन के प्रधानमंत्री बन जाने की भविष्यवाणी किया करती थीं वे भी पहली 2 पत्नियों की तरह 65 साल की पक्की उम्र में दिल तोड़ कर और घर छोड़ कर चली गईं तो अब लोग इमरान में ही खोट ढूंढ़ रहे हैं जो कतई हैरानी की बात नहीं.

तीसरी बीवी के भी घर छोड़ कर जाने पर इमरान की दूसरी पत्नी टीवी एंकर रेहम खान ने जम कर उन पर तंज कसे. बकौल रेहम, इमरान और बुशरा का अफेयर तो तभी से चल रहा था जब वे इमरान की पत्नी थीं यानी शादी कर बीवियों को छोड़ देना इमरान की आदत में शुमार है. हालांकि एक चर्चा यह भी है कि इस अलगाव की वजह पालतू कुत्ते नहीं, बल्कि इमरान की बहनें हैं जो जरूरत से ज्यादा भाई की निजी जिंदगी में दखल देती रही हैं यानी लड़ाई ननदभौजाई की थी जिस का इलाज आज तक कोई नहीं ढूंढ़ पाया.

टैस्ट क्रिकेट में 70-80 के दशक में इमरान की तूती इंगलैंड के इयान बौथम और भारत के कपिल देव से कहीं ज्यादा बोलती थी. वे एक निहायत ही स्मार्ट, सैक्सी और स्टाइलिश खिलाड़ी हुआ करते थे. 88 टैस्ट मैचों में 3,807 रन बनाने वाले इमरान के खाते में 362 विकेट भी दर्ज हैं. क्रिकेट में कई रिकौर्ड बनाने वाले इमरान ने साल 1992 में क्रिकेट से संन्यास लिया तो उन का झुकाव राजनीति में हो गया और उन्होंने अपनी अलग पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ बना डाली. इमरान संसद तक पहुंचे पर राजनीति में उम्मीद और अपनी शोहरत के मुताबिक कामयाब नहीं हो पाए.

कामयाब तो वे 3 शादियों के बाद भी नहीं हो पाए, तो सोचना लाजिमी है कि बुढ़ापे में तीसरी शादी करने की तुक क्या थी. रेहम से उन की पटरी पूरे 1 साल भी नहीं बैठी थी. पहली पत्नी जेमिमा गोल्डस्मिथ से इमरान ने साल 2004 में तलाक ले लिया था. इस तलाक की वजह यूरोप की खुली आबोहवा की आदी जेमिमा को पाकिस्तानी माहौल में घुटन हो रही थी.

इमरान खान लंदन में पढ़े हैं और अर्थशास्त्र उन का पसंदीदा विषय रहा है. वे खेतीकिसानी के भी शौकीन हैं और मवेशी पाल कर भी पैसा कमाते रहे हैं. क्रिकेट कमैंट्री में भी वे कभीकभी नजर आ जाते हैं. इस के बाद भी एकएक कर 3 पत्नियां उन का साथ छोड़ गईं तो तय है इमरान का समय खराब नहीं बल्कि औरत को पांव की जूती समझना इस की वजह है. उन की तीनों पत्नियां खुले विचारों और आजादखयाल थीं और सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय थीं जो कट्टरवादी सोच के गुलाम इमरान को पसंद नहीं आया तो यह तो होना ही था.

अब डर इस बात का है कि शादियों और फिर तलाक के आदी हो चले इमरान बुशरा को तलाक देने के बाद कहीं चौथी शादी न कर बैठें. हालांकि अपनी गुरुपत्नी के चले जाने के बाद वे स्वीकारने लगे हैं कि बैचलर लाइफ ही बेहतर होती है. ऐसा शायद इसलिए कि शादीशुदा जिंदगी वे निभा नहीं पाए.

वाराणसी हादसा : धराशायी हो रहा क्योटो का सपना

उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के बारे में कहा जाता है कि यह भगवान शिव की नगरी है. धार्मिक कहानियों में बताया जाता है कि वाराणसी यानी काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है. धार्मिक नगरी होने के कारण यहां लोग मोक्ष प्राप्त करने के लिए आते हैं. यहां से पूरी दुनिया को आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है. यहीं पर संकटमोचक हनुमान का मंदिर है. 15 मई को जब चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिर जाने से 20 लोगों की मौत हुई तो कुछ भी पुण्यप्रताप, पूजापाठ काम नहीं आया. घरों से निकले लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि रास्ते में मौत उन का इंतजार कर रही है.

धर्म की राजनीति का लाभ लेने के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया. चुनावप्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने बारबार इस बात को अपने भाषणों में दोहराया कि वे यहां खुद नहीं आए हैं उन को मां गंगा ने बुलाया है. गंगा की सफाई से ले कर काशी को क्योटो जैसा आधुनिक शहर बनाने का वादा जनता से किया. लोकसभा चुनाव में जीत के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए पर काशी का क्योटो बनने का सपना पूरा नहीं हो सका. गंगा की सफाई को ले कर दिए गए तमाम तरह के दावे फेल हो गए. केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं. इस के बाद भी यहां विकास और भ्रष्टाचार का तानाबाना विफलता की कहानी कह रहा है.

कैसे हुआ हादसा 15 मई को शाम करीब 5 बजे का समय रहा होगा. चौकाघाट फ्लाईओवर को बनाने का काम चल रहा था. फ्लाईओवर के लहरतारा वाले छोर पर गार्डर को ऊपर रखे जाने का काम चल रहा था. 2 पिलरों के बीच करीब 28 मीटर लंबाई और 15 मीटर चौड़ाई में 5 गार्डर रखे जाने थे. दोनों पिलरों के बीच रखे जाने के बाद पांचों गार्डरों को एकदूसरे से जोड़ दिया जाना था. पिलर के शिखर पर गार्डर को तुरंत न रख कर पहले बेयरिंग पर रखा जाता है. इस के बाद धीरेधीरे बेयरिंग को हटा कर गार्डर को पिलर पर सैट कर दिया जाता है.

घटना के समय पिलर पर गार्डर यानी बीम को टिकाने के लिए बेयरिंग को हटाने का काम चल रहा था. 2 गार्डरों से बेयरिंग हटाई जा चुकी थीं. बाकी का काम चल रहा था. शाम को 5 बज कर 20 मिनट पर गार्डर का संतुलन बिगड़ गया. वह नीचे गिरने लगा. गार्डर लड़खड़ाते हुए कुछ सैकंड्स के लिए रुका, फिर नीचे सड़क पर गिर गया.

नीचे सड़क पर खड़े और चल रहे लोगों को इस का आभास नहीं हो सका. जिस से उस के नीचे तमाम गाडि़यां और लोग दब गए. बचाव काम के लिए सब से अधिक परेशानी क्रेन को यहां तक लाने और गार्डर को हटा कर नीचे दबे लोगों को निकालने की थी. गार्डर इतने भारी थे कि 3-3 क्रेन मिल कर एक गार्डर का केवल कुछ हिस्सा ही उठा कर लोगों को बचा पा रही थीं. 10 क्रेनों को इस काम में लगाया गया. सरकारी अफसरों से ले कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य रात 10 बजे से पहले वहां पहुंच गए और मदद के लिए मुआवजे का ऐलान शुरू हो गया. विपक्ष ने मुआवजा बढ़ाने की मांग शुरू कर दी. सरकार ने घटना के तुरंत बाद चीफ प्रोजैक्ट मैनेजर सहित कुछ लोगों को सस्पैंड कर दिया. मुख्यमंत्री ने 48 घंटे में घटना की रिपोर्ट मांगी. फौरीतौर पर यही हो सका.

सरकार की लापरवाही भाजपा के समर्थक और नेता इसे अपनी सरकार की नाकामी नहीं मानते. उसे कभी कांग्रेस तो कभी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की विफलता करार दे देते हैं. गोरखपुर, कुशीनगर और वाराणसी में हुई दुर्घटनाओं ने केंद्र और प्रदेश सरकार की पोल खोल दी है. वाराणसी में फ्लाईओवर बनने के दौरान बीम गिरने से 20 लोगों के मरने और 30 से अधिक लोगों के घायल होने की दुखद घटना घटी. वाराणसी में राष्ट्रीय राजमार्ग-2 पर चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर का काम बेहद धीमी गति से चल रहा है. ढाई साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद अभी तक महज 53 फीसदी काम ही हो सका है. इस काम को जून तक पूरा हो जाना था. काम समय पर पूरा न होने के कारण इस की समयावधि दिसंबर तक बढ़ा दी गई थी.

चौकाघाटलहरतारा फ्लाईओवर इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वाराणसी के कैंट स्टेशन के पास स्थित है. इस फ्लाईओवर को बनाने का काम उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम कर रहा है, जो सरकार की संस्था है. इस संस्था की लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रोडवेज से रेलवे स्टेशन के आगे तक रोड के किनारे लोहे के स्क्रैप रखे हैं. जिन से टकरा कर अकसर लोग घायल होते रहते हैं. शिकायतों के बाद भी सेतु निगम ने कोई हल नहीं निकाला. कैंट रेलवे स्टेशन के सामने तो सालों से लोहे की सीट लगा कर रास्ता बंद कर दिया गया है. यहां आने वालों के लिए सड़क पार करना बेहद मुश्किल होता है.

करीब 6 माह पहले जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी के दौरे पर आए थे तो उन्होंने फ्लाईओवर का निरीक्षण भी किया था. मुख्यमंत्री काम की धीमी प्रगति से नाराज थे. साथ ही, काम के प्रति लापरवाह अफसरों को उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि काम को समय पर पूरा किया जाए. फ्लाईओवर का निर्माण कर रही संस्था के अफसरों पर इस चेतावनी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा.

सचाई यह है कि यहां पर आधे से ज्यादा काम ठेकेदारों द्वारा कराया जा रहा है. रौ मैटरियल और लेबर का काम इस में प्रमुख है. ठेकेदार पैसा बचाने के चलते सही काम नहीं करते. कम मजदूरों से काम चलाने के कारण यह फ्लाईओवर समय पर तैयार नहीं हो सकता. केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, जिले के डीएम योगश्वर राम मिश्र भी 6 माह में कई बार फ्लाईओवर का निर्माण कार्य देखने गए थे. इस के बाद भी निर्माण मानकों और सुरक्षा मानकों पर ध्यान नहीं दिया गया. सड़क के दोनों तरफ किसी भी तरह की बैरीकेटिंग नहीं की गई, जिस से आनेजाने वालों को परेशानी होती थी. निर्माण काम कर रही संस्था अपनी मनमानी से काम कर\ रही थी. इस फ्लाईओवर का निर्माण 2015 में शुरू हुआ, जिस के तहत 1,710 मीटर का निर्माण होना था. 30 माह में इस काम को पूरा किया जाना था. इस की लागत 77.41 करोड़ रुपए रखी गई थी. फ्लाईओवर को बनाने में 63 पिलर बनने हैं. जून तक काम पूरा होना था. अभी तक 45 पिलर ही तैयार हुए. ऐसे में काम के निर्माण की तारीख को दिसंबर तक बढ़ा दिया गया था.

उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम को लखनऊ में मैट्रो का निर्माण कर रही संस्था से सीखना चाहिए था. प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मैट्रो का निर्माण कार्य बेहद भीड़भाड़ वाले इलाकों में चल रहा है. यह कार्य बहुत ही सावधानी से ट्रैफिक को रोक कर किया जा रहा है. इस का 24 घंटे काम चलता है. यही नहीं, समय से काम चल रहा है. मैट्रो निर्माण का काम निजी संस्था मिल कर कर रही है. ऐसे में सेतु निगम और पीडब्लूडी जैसी संस्थाओं को मैट्रो निर्माण करने वाली निजी संस्था से सीखना चाहिए. वाराणसी से पहले यहां से कुछ ही दूरी पर स्थित गोरखपुर और कुशीनगर में ऐसे ही लापरवाहीपूर्ण हादसे हो चुके हैं. गोरखपुर के अस्पताल में औक्सिजन की कमी से बच्चों की मौत हो गई तो कुशीनगर में स्कूली वैन रेलगाड़ी से टकरा गई.

गोरखपुर और वाराणसी में एक समानता और है कि एक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का शहर है तो दूसरा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है और कुशीनगर भगवान बुद्ध की नगरी है. ऐसे में इन जगहों पर हुए हादसे बताते हैं कि वीवीआईपी जिले भी किस हद तक भ्रष्टाचार व लापरवाही के शिकार हैं. हर घटना में निचले स्तर पर कार्यवाही की गई जबकि मंत्री स्तर पर किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया. भूल जाते हैं लोग

इन तीनों ही घटनाओं में मुख्य जिम्मेदार सरकारी महकमे हैं. कुशीनगर में रेलवे प्रशासन ने मानवरहित क्रौसिंग को सुधारा नहीं था. गोरखपुर में हादसा सरकारी अस्पताल में हुआ और अस्पताल की लापरवाही से बच्चे मरे. ऐसे में कहीं न कहीं जरूरत इस बात की थी कि मंत्री और सरकार के स्तर पर अपनी भूल को स्वीकार किया जाता. तभी सुधार की संभावना नजर आती. मौजूदा सरकार हर मुद्दे पर राजनीतिक अंदाज में बयानबाजी कर दूसरे दलों और सरकारों की नजीर दे कर खुद बचाने की कोशिश करती है. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि सरकार केवल मुआवजा दे कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागेगी, बल्कि ईमानदारी से जांच कर दोषियों को सजा भी देगी.

कुकुरमुत्तों की तरह फैलतीं शिक्षा की दुकानें

जिस तरह जंगलों में बिना देखभाल के कुकुरमुत्ते के पौधे पनपते रहते हैं, ठीक वैसे ही आजकल शहरोंकसबों में विद्यालय और महाविद्यालय देखे जा रहे हैं. कुकुरमुत्ता के पौधे हालांकि किसी काम के नहीं होते, लेकिन वे दूसरे को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाते जबकि ये विद्यालय महाविद्यालय नौनिहालों को ठगने में लिप्त हैं.

मैं ने एमए करने के लिए इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी की वैबसाइट पर अपना रजिस्ट्रेशन करवाया, लेकिन कुछ ही घंटों में मेरे पास एक मैसेज आया जिस में लिखा था, ‘हम विवेकानंद सुभारती यूनिवर्सिटी से डिस्टेंस लर्निंग कोर्स करवाते हैं. कृपया आप अपना कौंटैक्ट नंबर दें.’

मेरे कौंटैक्ट नंबर देने पर मेरे पास एक कौल आई और बताया गया कि हम आप को सभी तरह की सुविधाएं देंगे. यही नहीं, पास होने की भी गारंटी है और अगर आप चाहें तो 2 साल का कोर्स 1 ही साल में पूरा कर सकती हैं.

मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि हम आप का 2 साल का कोर्स 1 साल में ही पूरा करवा देंगे लेकिन फीस उसी हिसाब से लेंगे. 1 साल की फीस 13,800 रुपए है जबकि 2 साल के 28 हजार रुपए और प्रौस्पैक्टस के 500 रुपए. इस के बाद उन्होंने मुझ से 10वीं, 12वीं और बीए की मार्कशीट मांगी और कहा कि फीस जमा कराएं.

जब मैं ने उन्हें बताया कि प्रौस्पैक्टस तो मुझे मिला ही नहीं, फिर मैं उस के रुपए क्यों दूं? तो उन्होंने कहा कि हम आप के नंबर पर डिटेल्ड व्हाट्सऐप कर रहे हैं. यह पूरा फी स्ट्रक्चर है जो आप को देना है.

वे 10-12 दिनों तक मुझ पर फीस जमा कराने का प्रैशर बनाते रहे. मेरे बारबार यह पूछने पर कि क्या मेरे पेपर्स वैरीफाई हो गए हैं? उन्होंने जवाब दिया कि जब आप फीस जमा कराएंगे, उस के बाद ही आप के पास वैरिफिकेशन कौल आएगी. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. तब मैं ने कहा कि क्या सारी फीस एकसाथ जमा करानी जरूरी है, मैं अभी आधी फीस ही भर पाऊंगी.

इस पर काउंसलर ने कहा कि कोई बात नहीं. बाकी आप बाद में देते रहिएगा. मैं ने 5 हजार रुपए उन के अकाउंट में जमा करवा दिए. उन की तरफ से कोई भी रसीद या मेल न आने पर मैं ने एक बार फिर फोन घुमाया. इस पर काउंसलर ने मुझ से कहा कि आप के रुपए हमारे अकाउंट में आ गए हैं, अब जल्द ही आप के पास वैरिफिकेशन कौल आएगी और उस के बाद कोर्स की सौफ्टकौपी और हार्डकौपी भेजी जाएगी.

एक महीना निकलने पर भी वैरिफिकेशन कौल नहीं आई. काउंसलर को बारबार फोन करने के बाद एक दिन कौल आई और कहा गया कि हम ने पेपर वैरीफाई कर दिए हैं. हम जल्द ही आप को कोर्स मैटीरियल भिजवाते हैं. इस के बावजूद न कोई रसीद आई, न ही कोई पाठ्यसामग्री.

ऐसे ही 3 महीने निकल गए. मुझे कुछ गड़बड़ी का अंदेशा हुआ और मैं ने जब एक बार फिर संपर्क किया तो वहां से जूही नाम की लड़की ने कहा कि पहले आप 2 साल की पूरी पेमैंट करें, तभी आप को कोर्स मैटीरियल भेजा जाएगा.

मैं ने कहा कि जब तक मुझे कोर्स मैटीरियल नहीं मिलेगा, मैं रुपए नहीं दूंगी. आज तक मेरे पास कोर्स की कोई भी सौफ्ट या हार्ड कौपी नहीं आई है, न ही कोर्स से संबंधित कोई डिटेल आई है. बस, आया तो एक मेल जिस में लिखा था कि बाकी रुपए जल्दी जमा कराएं.

2 दिनों बाद मेरे पास इस यूनिवर्सिटी से मुबीन नाम के एक आदमी की कौल आई कि मैडम, आप के पेपर पूरे नहीं हैं. आप पूरे पेपर्स भेजिए वरना हम आप का ऐडमिशन कैंसिल कर देंगे.

मैं ने उसे समझाना चाहा कि पेपर्स पूरे हैं, लेकिन वह बारबार एक ही बात बोलता रहा. फिर मैं ने दोबारा इस यूनिवर्सिटी की काउंसलर रुकैया से बात की, लेकिन रुकैया ने भी बड़ी लापरवाही से मुझे जवाब दिया कि आप के पास इस नाम के व्यक्ति की कोई कौल आ ही नहीं सकती. इस नाम का व्यक्ति तो बहुत पहले ही यहां से चला गया है और आप ने अभी तक अपने पूरे पेपर्स व फोटोग्राफ हमें नहीं भेजे हैं.

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यह सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं ने कहा कि कितनी बार आप पेपर्स और फोटो झूठ बोल कर लेंगे? आप लोग मुझे सही नहीं लग रहे हैं. आज तक मेरे पास कोई कोर्स मैटीरियल नहीं आया है.

इस पर काउंसलर ने गुस्से में फोन रख दिया. तभी 2 मिनट के अंदर एक कौल आई जिस में मुझ से कहा जाता है, ‘‘आप को रुकैयाजी से इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए थी. हम फेक नहीं हैं. आप जब तक पूरे रुपए जमा नहीं कराएंगी, आप को कोई स्टडी मैटीरियल नहीं भेजा जाएगा. वैसे भी आप के पेपर्स पूरे नहीं हैं.’’

मैं ने उन पर गुस्सा करते हुए कहा कि अगर पेपर्स पूरे नहीं थे तो वैरिफिकेशन कौल कैसे आ गई? वैरिफिकेशन कौल का मतलब यह है कि आप ने मुझे ऐडमिशन देने के लिए वैरीफाई कर दिया है. फिर आप झूठ क्यों बोल रहे हैं?

इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि अगर आज शाम तक आप ने पूरे रुपए नहीं जमा कराए, तो हम ऐडमिशन कैंसिल कर देंगे. आप पूरे 28 हजार रुपए एकसाथ दीजिए. इस के अलावा 8 हजार रुपए का खर्च आप को अलग से देना है.

जिस बात की शंका थी वही हुआ. न ही मुझे दाखिला मिला न ही कोई स्टडी मैटीरियल आया. ये छोटीछोटी दुकानें खोले बैठे वे लोग हैं जो खुलेआम लोगों को बेवकूफ बनाते हैं. झूठी डिगरियां, झूठे सपने दिखाते हैं. 5 हजार रुपए का मुझे जो नुकसान हुआ सो हुआ, लेकिन उस से ज्यादा दुख इस बात का था कि मैं इन लोगों की बातों में कैसे आ गई? न जाने मेरे जैसे कितने लोग इन के जाल में फंसते होंगे.

जिधर देखो उधर इंटर व डिगरी कालेज दिखाई दे रहे हैं. ऐसा क्यों? बहुत सोचने पर जो समझ आया, वह है देश की बढ़ती आबादी तथा शिक्षा की तरफ लोगों का बढ़ रहा रुझान और आम जनता का सरकारी व वित्तपोषित कालेज से भंग हो रहा मोह.

लेकिन प्रमुख कारण है सरकार द्वारा बनाए गए नियमों की शिथिल प्रणाली, जिस का फायदा उठा कर इंटर व डिगरी कालेज अपनी जेबें भर रहे हैं. नतीजतन, पूरे क्षेत्र में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए इन विद्यालयोंमहाविद्यालयों के बोर्ड, बैनर व पोस्टर लगे दिखाई दे जाएंगे और जब इन के पास जाया जाता है तो पता चलता है कि ये 4 कमरे व 2 व्यक्तियों को बैठा कर पंजीकरण शुरू कर देने वाली दुकानें मात्र हैं.

इन के झांसे में आ कर जब कुछ छात्र व छात्राएं दाखिला लेते हैं, तो औनेपौने वेतन पर बेरोजगारों को ला कर फैकल्टी के तौर पर पढ़वाना शुरू करवा दिया जाता है. यही नहीं, किसी वित्तविहीन महाविद्यालय में छात्रों का पंजीकरण करा दिया जाता है. जहां पर उन को केवल वार्षिक परीक्षा देने जाना पड़ता है. गैरमान्यता वाले महाविद्यालय विद्यार्थियों से मोटी रकम वसूल कर, उन्हें परीक्षा में मनमुताबिक अंक दिलाने का वादा करते हैं.

दिल्ली के रहने वाले प्रकाश सिंह अपने बेटे का इंटर कालेज में ऐडमिशन कराना चाहते थे. अखबार में उन्होंने एक इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी से जुड़े इंटर कालेज का विज्ञापन देखा, जिस में लंबेचौड़े वादे किए गए थे. प्रकाश सिंह ने कालेज जा कर देखा और स्टाफ से मिले. इस के बाद उन्होंने बेटे का ऐडमिशन करा दिया. अभी एक साल भी नहीं गुजरा था कि उन्हें पता चला कि उस कालेज की तो कोई मान्यता ही नहीं है. दरअसल, झूठे विज्ञापन के जरिए यह कालेज लाखों स्टूडैंट्स के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा था.

धन उगाही का खेल

महाविद्यालयों में मानक के अनुरूप शिक्षक न होने से विद्यार्थियों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. सब से बड़ी समस्या तो संबंधित विषय की जानकारी न होने के कारण डिगरी के बावजूद विद्यार्थी बेरोजगार ही रहता है और समय को कोसने के लिए मजबूर होता है. आज शिक्षा का स्तर इतना गिर गया है कि छात्रों को शिक्षा का समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है. संस्थान तो केवल धनउगाही के कुचक्र में फंसे रहते हैं.

नवाबगंज के देवीदीन सिंह महाविद्यालय के प्रबंधन ने बीएससी प्रथम वर्ष की परीक्षा में फेल हो चुके 60 विद्यार्थियों को पास होने की नकली मार्कशीट बना कर थमा दी. मार्कशीट अवध विश्वविद्यालय की असली मार्कशीट की तरह होने के कारण छात्र भी धोखा खा गए. शक होने पर जब एक छात्रा ने विश्वविद्यालय जा कर इस की सत्यता की पड़ताल कराई तो इस फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ.

इस समय रायबरेली जनपद, मेरठ, नोएडा आदि चाहे ग्रामीण क्षेत्र हों या शहरी, सभी जगह आप को मानकविहीन विद्यालय कुकुरमुत्तों की तरह पैर फैलाए मिल जाएंगे. सब से आश्चर्यजनक बात यह है कि इन विद्यालयों में न्यूनतम मानक के अनुरूप न तो शिक्षा भवन हैं और न ही प्रयोगशाला. लेकिन वहां स्नातक स्तर के छात्र पढ़ने के लिए आते हैं. विद्यालयों का संचालन किया जा रहा है और शिक्षा विभाग इन्हें देखते हुए भी अनजान बना रहता है. आज जो विद्यालय वित्तविहीन मान्यताप्राप्त अथवा वित्तपोषित भी हैं, वहां भी मानक शिक्षक नहीं मिल पा रहे हैं.

चंद्रवलिया गांव की रहने वाली बीना देवी के मुताबिक, उस ने शैक्षिक वर्ष 2015-16 में नवाबगंज थाना क्षेत्र के कटरा शिवदयालगंज स्थित देवीदीन सिंह महाविद्यालय में बीएससी प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था. फरवरी 2016 में आयोजित परीक्षा में वह फेल हो गई थी. इस कारण नए सत्र में उस ने अपना नाम जिले के वजीरगंज थाना क्षेत्र के भागीरथी सिंह स्मारक महाविद्यालय में बीएससी प्रथम वर्ष में ही लिखा लिया.

बीना का कहना है कि प्रवेश लेने के बाद अगस्त 2016 में देवीदीन महाविद्यालय के क्लर्क चंदन सिंह उर्फ संदीप सिंह ने उस के मोबाइल पर फोन कर उसे पास होने की जानकारी दी और बीएससी द्वितीय वर्ष में प्रवेश लेने के लिए कहा. इस पर भरोसा कर के भागीरथी कालेज को छोड़ कर उस ने फिर से देवीदीन सिंह महाविद्यालय में बीएससी द्वितीय वर्ष में प्रवेश ले लिया.

कुछ दिनों बाद उसे मार्कशीट के फर्जी होने का शक हुआ तो उस ने अवध विश्वविद्यालय जा कर मार्कशीट की जांच कराने का फैसला किया. बीना ने बताया कि जब उस ने विश्वविद्यालय में मार्कशीट की जांच कराई तो पता चला कि वह फेल है और उसे जो मार्कशीट दी गई है वह जाली है. इस जानकारी के बाद वह फिर से महाविद्यालय पहुंची और मार्कशीट नकली होने की जानकारी देते हुए क्लर्क से परीक्षा की क्रौसलिस्ट दिखाने की मांग की.

बीना का आरोप है कि अपनी पोल खुलती देख क्लर्क ने पहले तो उसे चुप रहने की नसीहत दी, लेकिन जब वह नहीं मानी तो उस ने उस से अभद्रता करते हुए उसे जान से मारने की धमकी देते हुए कालेज से भगा दिया.

बीना का कहना है कि उस के अलावा, बीएससी प्रथम वर्ष में कुल 72 छात्र थे और सब के सब फेल हो गए थे. लेकिन महाविद्यालय ने छात्रा मधु गुप्ता, पूजा सिंह, धनोसरी मिश्रा, वली मोहम्मद समेत करीब 60 छात्रों को पास वाली फर्जी मार्कशीट दे कर अपने यहां बीएससी द्वितीय वर्ष में दाखिला दे दिया था.

इन फर्जी महाविद्यालयों के कारण बच्चों को आधाअधूरा ज्ञान ही मिल पा रहा है. इसी कारण शिक्षा का स्तर भी दिनप्रतिदिन गिरता जा रहा है. देखा जाए तो इन रसूखदार, लंबरदार व प्रभावशाली लोगों द्वारा संचालित किए जा रहे विद्यालयों के आगे जिलाप्रशासन, शिक्षा विभाग व विश्वविद्यालय आंख मूंदे हुए हैं और अपनी झोली भरने में मशगूल हैं.

आज हमारे बीच से जो जा रही है वह है शिक्षा, जिस का परिणाम अब धीरेधीरे दिखाई पड़ने लगा है और भविष्य में इस का परिणाम और भी भयानक हो सकता है. कुकुरमुत्तों की तरह फैले डिगरी व इंटर कालेजों पर शासनप्रशासन द्वारा शिकंजा कभी नहीं कसा जाएगा, क्योंकि पूरा तंत्र इन्हें विकसित करने में लगा है. सरकारी नीतियां ही इस तरह बन रही हैं कि शिक्षा कुछ को मिले और लोग दक्षिणा की तरह फीस दे कर भूल जाएं कि बदले में आश्वासन के अलावा कुछ मिलेगा.

मूंछों का बंटवारा : उत्तर बनाम दक्षिण

एक जमाना था जब मूंछें मर्दों की आन, बान और शान समझी जाती थीं. मूंछ की सब से पहली तसवीर एक प्राचीन ईरानी की बताई जाती है जो घोड़े पर सवार था, हालांकि उस की दाढ़ी नहीं थी. यह तसवीर ईसापूर्व 300 बीसी की है. इस के बाद अनेक देशों और संस्कृतियों में कई प्रकार की मूंछें देखी गई हैं.

पहले तो मूंछों के साथसाथ पुरुष दाढ़ी भी रखते थे, पर 19वीं सदी के अंत तक दाढ़ी का सफाया होने लगा. इस की खास वजह नई पीढ़ी की सोच थी कि दाढ़ी के लंबे बालों में बैक्टीरिया व जर्म्स होते हैं. कुछ समय तो उत्तरी अमेरिका और यूरोप में दाढ़ी रखने वालों पर होटलों में भोजन बनाने व परोसने पर प्रतिबंध था. अस्पतालों में दाढ़ी वाले रोगियों की दाढ़ी भी जबरन कटवाई जाती थी. धीरेधीरे दाढ़ी के साथ मूंछ भी गायब होने लगी.

अधिकतर भारतीय पुरुष पहले मूंछें रखते थे. कहा जाता है कि ब्रिटिश सेना को भी भारतीय सैनिकों की देखादेखी मूंछ रखनी पड़ी थी. धीरेधीरे युवा पीढ़ी में मूंछ रखने का प्रचलन समाप्त होने लगा, उन्हें क्लीनशेव्ड, चिकना चेहरा सुंदर लगता था और शायद आधुनिक लड़कियों की भी यही पसंद है.

मूंछ बनाम क्लीनशेव्ड

आजकल अधिकतर भारतीय युवाओं ने मूंछ को अलविदा कह दिया है. कुछ हद तक अब यह सैनिकों व पुलिसकर्मियों के बीच सिकुड़ कर रह गई है. भारत में आधुनिकता और फैशन के प्रतीक माने वाले ज्यादातर बौलीवुड स्टार्स भी क्लीनशेव्ड हैं. पर यहां एक अंतर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच देखने को मिलता है. उत्तर भारत और बौलीवुड में भले ही मूंछ रखना आउट औफ फैशन हो गया हो, पर दक्षिण में और दक्षिण की फिल्म इंडस्ट्री टौलीवुड व कालीवुड में अभी भी मूंछें रखने का चलन है.

दक्षिण भारत में अभी भी ज्यादातर पुरुषों और ऐक्टर्स में मूंछ अपनी जड़ें जमाए हुए है. दशकों पहले  ऐक्टर्स अशोक कुमार, देव आनंद, दिलीप कुमार से ले कर अमिताभ बच्चन और खान ब्रदर्स सभी की मूंछें गायब थीं. ‘मूछें हों तो नत्थूलाल जैसी…’ फेमस डायलौग वाले बच्चन साहब ने भी युवावस्था में खुद मूंछें नहीं रखीं. कुछ अभिनेता इस के अपवाद हैं जैसे राज कपूर, अनिल कपूर, राजकिरण, रणधीर कपूर, जैकी श्रौफ, किशोर कुमार, प्रदीप कुमार आदि. बौलीवुड में परदे पर खलनायकों को भले मूंछोें के साथ देखा गया है पर हीरोज को बहुत कम.

बौलीवुड के ठीक उलट दक्षिण भारत की फिल्म इंडस्ट्री में अधिकतर अभिनेता पहले भी मूंछें रखते थे और आज भी रखते हैं. उन्हें मूंछ रखने का शौक है. तमिल के जानेमाने शिवाजी गणेशन या फिर कन्नड़ के सुपरस्टार राजकुमार ने अपनी मूंछें नहीं कटवाईं. दक्षिण की फिल्मों में हीरो, हीरो के पिता या अन्य मुख्य पात्र अभी भी मूंछों में दिखते हैं.

भारत जैसे सिनेमाप्रेमी देश में चंद ऐक्टर्स के मूंछ रखने या न रखने का प्रभाव लोगों पर अच्छाखासा देखा जा सकता है यानी जहां बौलीवुड के प्रभाव से उत्तर की मूंछें गायब हुईं वहीं दक्षिण फिल्म इंडस्ट्री से वहां मूंछें फैशन बनीं, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम फिल्मों के ज्यादातर अभिनेता मूंछें रखते हैं. नागार्जुन, चिरंजीवी, कमल हासन, प्रभास, धनुष, रजनीकांत, विजय, सूर्या, रामचरण, पवन कल्याण, एनटीआर जूनियर, करथी, सुदीप आदि अभिनेता मूंछें रखना पसंद करते हैं.

इसी तरह का विरोधाभास हिंदी टीवी सीरियल्स और दक्षिण के सीरियल्स में भी देखा जा सकता है. उत्तर भारत या बौलीवुड से ज्यादातर मशहूर पुरुष मौडल्स बिना मूंछों वाले ही हैं.

उत्तर और दक्षिण के बीच मूंछों के फासले की कोई ठोस एक वजह नहीं हो सकती है. पर हमारा बौलीवुड पश्चिम के हौलीवुड और अन्य अंगरेजी फिल्म इंडस्ट्री से जल्दी और ज्यादा प्रभावित दिखता है. अमेरिका और यूरोप में मूंछों का जमाना लद गया है तो उस का असर उत्तर पर ज्यादा पड़ा है. दक्षिण के लोग इतनी जल्दी इस बदलाव से प्रभावित नहीं हुए हैं. उन की संस्कृति पर विदेशी प्रभाव उतना ज्यादा नहीं पड़ा है. दूसरी वजह हो सकती है दक्षिण का अधिकतर भाग समुद्रीतट पर है. इस कारण इस पर विदेशी आक्रमण बहुत कम हुए हैं, शायद इसलिए उत्तर में मूंछों पर विदेशियों का असर ज्यादा पड़ा है.

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