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रुपया हुआ कमजोर, जानिए आम आदमी पर इसका कैसे पड़ेगा असर

सोमवार के कारोबार में रुपये ने कमजोर शुरुआत की. आज रुपया दिन में डौलर के मुकाबले 68.80 के स्तर पर कारोबार करता देखा गया, हालांकि कुछ मिनटों बाद इसमें थोड़ा सुधार देखने को मिला. रुपए में यह गिरावट आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की बैठक से ठीक पहले देखने को मिली है. दिन के 11 बजकर 45 मिनट पर रुपया डौलर के मुकाबले 68.74 पर कारोबार करता देखा गया. गौरतलब है कि शुक्रवार को रुपया डौलर के मुकाबले 68.65 पर बंद हुआ था.

रुपये की कमजोरी से आम आदमी को नुकसान: रुपये का कमजोर होना सीधे तौर पर आम आदमी से सरोकार रखता है क्योंकि इससे आम आदमी को 4 बड़े नुकसान होते हैं. रुपये के कमजोर से होते हैं ये 4 नुकसान.

महंगा होगा विदेश घूमना: रुपये के कमजोर होने से अब विदेश की यात्रा आपको थोड़ी महंगी पड़ेगी क्योंकि आपको डौलर का भुगतान करने के लिए ज्यादा भारतीय रुपये खर्च करने होंगे. फर्ज कीजिए अगर आप न्यूयौर्क की हवाई सैर के लिए 3000 डौलर की टिकट भारत में खरीद रहे हैं तो अब आपको पहले के मुकाबले ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे.

विदेश में बच्चों की पढ़ाई होगी महंगी: अगर आपका बच्चा विदेश में पढ़ाई कर रहा है तो अब यह भी महंगा हो जाएगा. अब आपको पहले के मुकाबले थोड़े ज्यादा पैसे भेजने होंगे. यानी अगर डौलर मजबूत है तो आपको ज्यादा रुपये भेजने होंगे. तो इस तरह से विदेश में पढ़ रहे बच्चों की पढ़ाई भारतीय अभिभावकों को परेशान कर सकती है.

डौलर होगा मजबूत तो बढ़ेगी महंगाई: डौलर के मजबूत होने से क्रूड औयल भी महंगा हो जाएगा. यानि जो देश कच्चे तेल का आयात करते हैं, उन्हें अब पहले के मुकाबले (डौलर के मुकाबले) ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे. भारत जैसे देश के लिहाज से देखा जाए तो अगर क्रूड आयल महंगा होगा तो सीधे तौर पर महंगाई बढ़ने की संभावना बढ़ेगी.

डौलर में होने वाले सभी पेमेंट महंगे हो जाएंगे: वहीं अगर डौलर कमजोर होता है तो डौलर के मुकाबले भारत जिन भी मदों में पेमेंट करता है वह भी महंगा हो जाएगा. यानी उपभोक्ताओं के लिहाज से भी यह राहत भरी खबर नहीं है. यानी आसान शब्दों में भारत का इंपोर्ट बिल (आयात बिल) बढ़ जाएगा.

रुपये की कमजोरी से फायदे भी: ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि रुपये की कमजोरी से सिर्फ नुकसान ही होते हैं, रुपया का कमजोर होना कई मायनों में देश के लिए फायदेमंद भी है. रुपये की कमजोरी यानी डौलर के मजबूत होने से आईटी और फार्मा के साथ औटोमोबाइल सेक्टर को फायदा होता है. इन सेक्टर से जुड़ी कंपनियों की ज्यादा कमाई एक्सपोर्ट बेस्ड होती है. ऐसे में डौलर की मजबूती से टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो जैसी आईटी कंपनियों को फायदा होता है. वहीं डौलर की मजबूती से ओएनजीसी, रिलायंस इंडस्ट्रीज, औयल इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों को भी फायदा होता है क्योंकि ये डौलर में फ्यूल बेचती हैं.

हिंदी सिनेमा की सबसे महंगी फिल्म साबित हो सकती है यह फिल्म

जिस फिल्म में बौलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और आमिर खान जैसे बेहतरीन कलाकार हों ऐसी फिल्म का दर्शकों को बड़ा बेसब्री से इंतजार रहता है. अमिताभ बच्चन और आमिर खान स्टारर ‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ के निर्माता विजय कृष्ण आचार्य ऊर्फ विक्टर फिल्म में आलीशान काफी बड़े सेटों और अद्भुत शौट्स को फिल्माने के लिए चर्चा का केंद्र बने हुए हैं.

‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ पहली फिल्म है जिसमें अमिताभ बच्चन और आमिर खान साथ में काम कर रहे हैं. यशराज फिल्म के बैनर तले बन रही इस फिल्म को साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनाने का प्रयास किया जा रहा है. निर्माताओं का प्रयास है कि फिल्म पर्दे पर आते ही धमाल मचा दे. इसके लिए हर बाधा को मिनटों में दूर किया जा रहा है. इस फिल्म में कैटरीना कैफ और दंगल फिल्म में काम कर चुकी फातिमा सना शेख भी मुख्य भूमिका में नजर आएंगी.

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फिल्म में दो बड़े जहाजों का होगा इस्तेमाल

‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ में 2 बड़े जहाजों का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके लिए दो बड़े जहाज का निर्माण कराया जा रहा है. ऐसा माना जा रहा है कि इन जहाजों का कुल वजन करीब 2 लाख किलो होगा. इन जहाजों को तैयार करने के लिए अंतरराष्ट्रीय डिजाइनरों की मदद ली जा रही है. इन जहाजों को बनाने में 1000 से ज्यादा कारीगर काम कर रहे हैं. ठग्स औफ हिन्दोस्तान यश राज बैनर की अब तक की सबसे बड़ी फिल्म हो सकती है.

भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी फिल्म हो सकती है ये

‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ फिल्म का बजट 250 करोड़ रुपए से ज्यादा बताया जा रहा है. फिल्म का डायरेक्शन विजय कृष्ण आचार्य कर रहे हैं, जिन्होंने आमिर के साथ ‘धूम 3’ बनाई थी. ये फिल्म समुद्री लुटेरों की कहानी पर आधारित है. इस फिल्म की शूटिंग के लिए फिल्म की टीम 45 दिनों के लिए आइसलैंड में रहने वाली है. इस दौरान वहां विभिन्न लोकेशनों की शूटिंग की जाएगी. जानकारों की मानें तो ये आउटडोर शूटिंग के लिहाज से ये फिल्म भारतीय सिनेमा में अब तक सबसे महंगी फिल्म हो सकती है.

अब ट्विटर पर गलती से भी ना करें अभद्र भाषा का प्रयोग, जानें क्यों

माइक्रोब्लौगिंग साइट ट्विटर 10 अगस्त से लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान अभद्र टिप्पणी करने वाले व्यक्तियों के अकाउंट ब्लौक कर सकता है. टेकक्रंच के अनुसार, कंपनी लगातार अभद्र भाषा का उपयोग करने वाले व्यक्तियों के आकउंट की समीक्षा कर और उसे बंद करके अपने पेरिस्कोप समुदाय के दिशानिर्देशों को अधिक आक्रामक रूप से लागू करेगी.

पेरिस्कोप ब्लौगपोस्ट के अनुसार, “एक सुरक्षित सेवा बनाने के हमारे लगातार प्रयास के हिस्से के रूप में हम लाइव प्रसारण के दौरान भेजे गए चैट से संबंधित हमारे दिशानिर्देशों के अधिक आक्रामक प्रवर्तन को शुरू कर रहे हैं. ” पोस्ट में यह भी कहा गया कि पेरिस्कोप समुदाय के दिशानिर्देश पेरिस्कोप और ट्विटर के सभी प्रसारण पर लागू होगा.

जब भी कोई व्यक्ति अभद्र टिप्पणी की रिपोर्ट करता है, तो पेरिस्कोप कुछ अन्य यूजर्स को चुनेगा जो टिप्पणी की समीक्षा करके बताएंगे कि टिप्पणी अभद्र है या नहीं. पेरिस्कोप ब्लौगपोस्ट ने कहा, “हम 10 अगस्त से ब्लौक आकउंट का रिव्यू करके यह देखेंगे कि क्या वे लगातर हमारे दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर रहे. अगर आप ऐसा चैट देखते हैं, जो हमारे दिशानिर्देशों का उल्लंघन करता हो तो कृपया करके रिपोर्ट करें. ”

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Twitter ने यूजर्स के लिए जारी की जरूरी सूचना

अगर आप भी ट्विटर (Twitter) यूजर हैं तो आपके लिए जरूरी सूचना है. ट्विटर ने अपने 33 करोड़ (330 मिलियन) यूजर्स से पासवर्ड बदलने को कहा है. दरअसल, ट्विटर के इंटरनल लौग में एक एक बग मिला है, जिसे ठीक कर दिया गया है. ट्विटर (Twitter) ने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी है. ट्विटर की ओर से आश्वासन दिया गया है कि बग की वजह से किसी भी यूजर्स के डेटा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. ना ही किसी तरह की सुरक्षा प्रभावित हुई है.

ट्विटर (Twitter) ने ट्वीट में लिखा है, ‘हमने हाल ही में एक बग पाया है, इस वजह से इंटरनल लौग में संरक्षित पासवर्ड का खुलासा हो गया है. बग को ठीक कर दिया गया है, साथ ही किसी भी तरह से डेटा में सेंध नहीं लगी है.’ कंपनी ने यूजर्स को भरोसा दिया है कि वे ऐसी कोशिश में जुटे हैं कि आगे से ऐसी समस्या का पैदा न हो सके.

कोहली ब्रिटिश लोगों को सामने खुद को बेहतर साबित करना चाहते हैं : रवि शास्त्री

भारतीय क्रिकेट टीम के कोच रवि शास्त्री के मुताबिक पिछले चार साल की सफलता ने कप्तान विराट कोहली की मानसिकता पूरी तरह बदल दी है और आगामी टेस्ट श्रृंखला में वह ब्रिटेन की जनता को दिखाना चाहेगा कि उसे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में क्यों गिना जाता है. आगामी श्रृंखला में सबकी नजरें कोहली पर लगी हैं क्योंकि पिछले चार साल में वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में एक बन कर उभरे हैं.

शास्त्री ने ईएसपीएनक्रिकइंफो से कहा, ‘‘उनके (कोहली के) रिकार्ड को देखे. मुझे ये बताने की जरूरत नहीं कि पिछले चार साल में उन्होंने कैसा प्रदर्शन किया है. जब आप इस तरह का प्रदर्शन करते हैं तो आप मानसिक तौर पर दूसरे स्तर पर पहुंच जाते है. आप किसी भी चुनौती से निपटने के लिए तैयार रहते हैं.’’उन्होंने कहा, ‘‘हां, चार साल पहले जब वह यहां आया था तब उसने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था लेकिन चार साल बाद वह दुनिया के सबसे अच्छे खिलाड़ियों में से एक हैं. वह ब्रिटिश जनता को दिखाना चाहता है कि वह दुनिया का सबसे अच्छा खिलाड़ी क्यों है.’’

बता दें कि कोहली का पिछला इंग्लैंड दौरा (2014) बेहद ही निराशाजनक रहा था जहां उन्होंने पांच टेस्ट मैचों में 13.50 की औसत से 1, 8, 25, 0, 39, 28, 0,7, 6 और 20 रन की पारी खेली थी.

शास्त्री ने कहा कि वह आक्रामक क्रिकेट खेलने में विश्वास करता है जो इंग्लैंड जैसे कठिन दौरे पर शीर्ष पर आने के लिए जरूरी है. उन्होंने कहा, ‘‘ हम यहां मैच ड्रौ करने और संख्या बढ़ाने नहीं आए हैं. हम हर मैच को जीतने के लिए खेलते हैं. अगर जीतने की कोशिश में हार गये तो यह खराब किस्मत होगी. हमें खुशी होगी, अगर हम हारने से ज्यादा जीत अपने नाम कर सकें.’’

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उन्होंने कहा, ‘‘ हमारा मानना है कि हमारे पास दौरा करने वाली सबसे अच्छी टीमों में से एक बनने की क्षमता है. फिलहाल, दुनिया में कोई भी टीम ऐसी नहीं है जो दौरे पर अच्छा प्रदर्शन कर रही हो. आप देख सकते हैं कि दक्षिण अफ्रीका का श्रीलंका में क्या हाल हुआ. हम इस दौरे से पहले इंग्लैंड में हमारी स्कोरलाइन जानते हैं (2011 में 4-0), और 2014 में 3-1) हम उससे बेहतर करना चाहते हैं.’’

शास्त्री ने फार्म से बाहर चल रहे चेतेश्वर पुजारा का बचाव करते हुए कहा कि इस भारतीय टीम में उन्हें अहम भूमिका निभानी है. उन्होंने कहा, ‘‘ मेरे लिए यह चिंता की बात नहीं है. उसे (पुजारा) अपनी भूमिका निभानी है. वह इसके बारे में जानता है क्योंकि नंबर तीन की भूमिका काफी अहम होती है. वह काफी अनुभवी खिलाड़ी हैं. वह बड़े स्कोर से एक पारी दूर है. उसे क्रीज पर समय बिताने की जरूरत है. अगर वह 60-70 रन बना लेता है तो उसका मिजाज पूरी तरह बदल जाएगा. मेरा काम यह सुनिश्चित करना है कि उसकी सोच इस दिशा में आगे बढ़े.’’

लोकेश राहुल की भूमिका पर शास्त्री ने कहा कि वे टेस्ट श्रृंखला में हैरानी भरे फैसले कर सकते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘राहुल का चयन तीसरे सलामी बल्लेबाज के तौर पर हुआ है. हमारा बल्लेबाजी क्रम हमेशा लचीला होगा. तीसरा सलामी बल्लेबाज शीर्ष चार में कहीं भी खेल सकता है. हम आपको कई बार आश्चर्यचकित करेंगे.’’

भुवनेश्वर कुमार और जसप्रीत बुमराह की गैरमौजूदगी में भारतीय आक्रमण की धार थोड़ी कमजोर हुई है लेकिन शास्त्री को लगता है कि टीम के गेंदबाजों में 20 विकेट लेने का माद्दा है. उन्होंने कहा, ‘‘हमारे पास ऐसा गेंदबाजी आक्रमण है जो 20 विकेट ले सकता है. आपको अन्य खिलाड़ियों को आजमाने की जरूरत है. अगर बुमराह और भुवनेश्वर एकदिवसीय श्रृंखला में पूरी तरह फिट होते तो नतीजे अलग होते. अगर दोनों पूरी तरह फिट होते तो टीम चयन में मेरी परेशानी बढ़ जाती.’’

क्राइम पेट्रोल देख कर घिनौना अपराध

बुधवार 2 मई की रात के लगभग 9 बजे कोटा के पुलिस अधिकारियों की बैठक चल रही थी. मुख्य मुद्दा था मार्बल व्यवसाई परिवार के बेटे विशाल मेवाड़ा के अपहरण और फिरौती का. कोटा में नित नए अपराधों से सकपकाई पुलिस के लिए यह गंभीर चुनौती थी.

दरअसल, वाकया कुछ ऐसा था जो ढाई साल पहले घटित रुद्राक्ष हांडा कांड के अंदेशों को बल दे रहा था, जिस में फिरौती के लिए किए गए अपहरण में बच्चे की हत्या भी कर दी गई थी. पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया ने एक पल अपने अधीनस्थ अफसरों पर सरसरी नजर दौड़ाने के बाद कहना शुरू किया, ‘‘आप के सामने फिर एक नया इम्तिहान है. हमें एकएक कदम बहुत सोचसमझ कर उठाना होगा.’’

बुधवार 2 मई की शाम करीब 7 बजे बोरखेड़ा के थानाप्रभारी महावीर सिंह जिस समय अपने थाने में बैठे थे, तभी लगभग 45-46 साल की रुआंसी औरत कमरे में दाखिल हुई. कुलीन और संपन्न परिवार की लगने वाली उस महिला के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. महावीर सिंह ने उसे सांत्वना देते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, आप कौन हैं और इस तरह परेशान और घबराई हुई क्यों हैं?’’

‘‘परेशानी की तो बात यह है थानेदार साहब, मेरा बेटा गायब है, उस का अपहरण कर लिया गया है.’’ महिला ने अपनी बात सिलसिलेवार बतानी शुरू की, ‘‘साहब, मेरा नाम भूलीबाई है. मैं मार्बल कारोबारी बनवारी लाल मेवाड़ा की पत्नी हूं. मेरा 19 साल का बेटा विशाल मेवाड़ा कोटा के योगीराज पौलीटेक्निक कालेज में पढ़ रहा था. वह वहां से गायब हो गया.’’

महावीर सिंह ने उन्हें पानी का गिलास थमाते हुए कहा, ‘‘आप निश्चिंत हो कर पूरी बात बताइए.’’

एक ही बार में पानी का गिलास खाली कर के महिला ने कहना शुरू किया, ‘‘हम खैराबाद कस्बे में रहते हैं. मेरा बेटा विशाल कोटा में रह कर पौलीटेक्निक कालेज में पढ़ रहा था. पति बनवारीलाल कारोबार के सिलसिले में सूरत गए हुए हैं. अपहर्त्ताओं ने मंगलवार पहली मई को मेरे पति को मोबाइल पर फोन कर के 15 लाख की फिरौती मांगी है.’’

पलभर रुकने के बाद भूलीबाई ने कहना शुरू किया, ‘‘पति को मोबाइल पर पहला फोन दोपहर बाद 4 बजे आया, जिस में एक आदमी ने विशाल के अपहरण करने की इत्तिला देते हुए 15 लाख की रकम का इंतजाम करने को कहा और इस के साथ ही फोन काट दिया. करीब 15 मिनट बाद फिर उसी आवाज में धमकी भरा फोन आया कि पुलिस को खबर की तो विशाल को जान से मार दिया जाएगा. इस के साथ ही फोन बंद हो गया.’’

‘‘फिर उस के बाद कोई फोन आया?’’ थानाप्रभारी महावीर सिंह के स्वर में हैरानी का भाव स्पष्ट था.

‘‘रात 11 सवा 11 बजे मेरे पति का फोन आया. उन्होंने बताया कि 11 बज कर 1 मिनट पर उन के पास आए फोन काल में कहा गया था कि रकम कहां ले कर आना है, इस बाबत अगले दिन शाम 4 बजे बताएंगे और इस के साथ ही फोन बंद कर दिया.’’

‘‘आप के पति ने उन्हें क्या जवाब दिया?’’

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‘‘क्या कहते,’’ भूलीबाई ने सुबकते हुए कहा, ‘‘मेरे पति ने तो बड़ी आजिजी के साथ कहा कि तुम को जो रकम चाहिए, हम देंगे. बस हमारे बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए.’’

लेकिन अगले ही पल भूलीबाई ने जो कहा, वह चौंकाने वाला था. उन्होंने बताया, ‘‘मेरे पति इस बात को ले कर हैरान थे कि फोन करने वाला जो कोई भी था, हमारे बेटे के मोबाइल से ही फोन कर रहा था.’’ इस के साथ ही भूलीबाई फूटफूट कर रोने लगी.

गहरी सांस लेते हुए महावीर सिंह ने कहा, ‘‘कोई और बात जो आप कहना चाहें.’’

‘‘हां साहब,’’ भूलीबाई ने जैसे याद करते हुए कहा, ‘‘साहब, मुझे फोन करने से पहले मेरे पति ने विशाल के मामा को फोन कर के विशाल के अपहरण की खबर देने के साथ उस के कमरे पर जा कर उसे तलाश करने को कहा था. उस का मामा दिनेश कोटा में ही रहता है. दिनेश ने विशाल के कमरे पर जा कर देखा तो वह वहां नहीं मिला. दिनेश ने मेरे पति को तो यह बात बताई ही, मुझे भी फोन कर के कोटा आने को कहा.’’

बोरखेड़ा थानाप्रभारी ने रिपोर्ट दर्ज करने के साथ ही फौरन इस घटना और घटनाक्रम के बारे में पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया को जानकारी दी. इस के बाद तत्काल पुलिस सक्रिय हो गई. आननफानन में पुलिस अधिकारियों की बुलाई गई बैठक की वजह यही थी.

भोमिया साहब को मालूम था कि इतने संपन्न परिवार के बेटे के अपहरण की बाबत जब लोगों को पता चलेगा तो लोग पुलिस को आड़े हाथों लेने से पीछे नहीं हटेंगे.

अपहरण के इस मामले में किसी बड़े गिरोह का हाथ हो सकता है, यह सोच कर पुलिस अधीक्षक अंशुमान भोमिया ने क्षेत्राधिकारी नरसीलाल मीणा और राजेश मेश्राम के अलावा सर्किल इंसपेक्टर श्रीचंद सिंह, महावीर सिंह, आनंद यादव, मुनींद्र सिंह, लोकेंद्र पालीवाल, विजय शंकर शर्मा और एसआई महेश कुमार, एएसआई दिनेश त्यागी, कमल सिंह और प्रताप सिंह के नेतृत्व में 7 टीमों का गठन किया और विशाल के अपहर्त्ताओं का पता लगाने की जिम्मेदारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार को सौंप दी.

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार के निर्देश पर स्पैशल स्टाफ ने बड़ी संख्या में लोगों से गहनता से पूछताछ की. करीब 100 से अधिक टीवी फुटेज निकाले, लेकिन कोई काम की बात मालूम नहीं हो सकी.

पुलिस को तब हैरानी हुई, जब विशाल के कुछ दोस्तों ने बताया कि उन के पास विशाल का फोन आया था. उस ने हम से 2-3 सौ रुपए की जरूरत बताते हुए पैसों की मांग की थी. लेकिन इस से पहले कि उस से इतनी छोटी रकम मांगने की वजह पूछते, उस का फोन संपर्क टूट गया.

पुलिस ने अंडरवर्ल्ड को भी खंगाला लेकिन लाख सिर पटकने के बावजूद पुलिस ऐसे किसी शातिर गिरोह का पता नहीं लगा सकी, जिस से इस मामले में कोई जानकारी मिल पाती. इस मामले में पुलिस ने फिरौती के लिए कुख्यात गिरोहों का पुलिस रिकौर्ड भी टटोला.

तमाम पुलिस रिकौर्ड जांचने के बाद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार इस नतीजे पर पहुंचे कि विशाल के अपहरण में कम से कम किसी नामी गिरोह का हाथ नहीं है.

पौलीटेक्निक की पढ़ाई करते हुए विशाल बोरखेड़ा के इलाके की आकाश नगर कालोनी में उसी कालेज में पढ़ने वाले मनोज मीणा के साथ किराए के कमरे में रहता था. पुलिस ने मनोज की गतिविधियों को पूरी तरह टटोला, लेकिन कहीं कोई संदिग्ध बात नजर नहीं आई.

जिस समय पुलिस विशाल के रूम पार्टनर मनोज मीणा समेत अन्य दोस्तों से गहनता से पूछताछ कर रही थी, तभी इस बात का पता चला कि विशाल के दोस्ताना रिश्ते विक्रांत उर्फ हिमांशु, प्रदीप और विजेंद्र भाटी उर्फ लकी से कुछ ज्यादा ही गहरे थे.

विशाल के मकान मालिक के मुताबिक इन तीनों लड़कों का विशाल के पास वक्तबेवक्त कुछ ज्यादा ही आनाजाना था. यह सूचना मिलते ही पुलिस ने उन्हें पूछताछ के घेरे में ले लिया, लेकिन हर सवाल पर तीनों पुलिस को छकाते रहे. पुलिस को लगा भी कि कहीं यह उस का भ्रम तो नहीं, फिर भी पुलिस ने अपनी जांच की दिशा नहीं बदली.

अब तक विशाल के पिता बनवारी लाल मेवाड़ा सूरत से कोटा लौट आए थे. उन्होंने पुलिस की जानकारी में इजाफा करते हुए बताया कि उन्हें मंगलवार को दोपहर बाद 4 बजे, फिर सवा 4 बजे तथा बाद में रात को 11 बज कर एक मिनट पर फोन आए थे.

रात को आने वाले फोन काल में अपहर्त्ताओं का कहना था कि फिरौती की रकम ले कर उन्हें दरा के निकट रेलवे क्रौसिंग पर पहुंचना होगा. कब, यह बाद में बताएंगे. अपहर्त्ता का यह भी कहना था कि रकम मिलने के एक घंटे बाद ही विशाल को छोड़ दिया जाएगा.

बनवारी लाल ने यह सब बताते हुए पुलिस से यह शंका भी जाहिर की कि फोन काल जब विशाल के मोबाइल से की जा रही थीं तो क्या उसे सुरक्षित मान लिया जाना चाहिए.

गुरुवार 3 मई की सुबह जब पुलिस इसी मुद्दे पर मंथन कर रही थी, तभी एक ग्रामीण की सूचना ने अधिकारियों को स्तब्ध कर दिया. सूचना बोरखेड़ा से करीब 20 किलोमीटर दूर नोताड़ा और मानस गांव के वन क्षेत्र के बीच बहने वाली नदी की कराइयों में एक लाश पड़ी होने की थी.

हजार अंदेशों में घिरी पुलिस के लिए यह सूचना चौंकाने वाली थी. पुलिस टीम तुरंत वहां के लिए रवाना हो गई. पुलिस के साथ विशाल के पिता बनवारीलाल भी थे. चंद्रलोई नदी का यह तटीय क्षेत्र हालांकि कुदरती रूप से मनोहारी था, जहां शहरी कोलाहल से ऊबे लोगों या फिर सैलानियों का आनाजाना था.

क्षेत्राधिकारी राजेश मेश्राम चंद्रलोई नदी की कराइयों के पास जीप रुकवा कर अपनी टीम के साथ नीचे उतर गए. तभी उन की नजर 3-4 फुट ऊंची झाडि़यों की कतार की तरफ चली गई. वहां पर एक युवक औंधा पड़ा नजर आया.

पुलिस के जवानों ने शव को सीधा किया तो बनवारीलाल वहीं पछाड़ खा कर गिर गए. शव विशाल का ही था. उस का चेहरा कुचल दिया गया था. लाश नमक की परत में लिपटी हुई थी. राजेश मेश्राम लाश पड़ी होने की स्थिति देख कर एक पल में ही भांप गए कि हत्या कहीं और की गई थी, लेकिन पुलिस को भटकाने के लिए लाश को यहां ला कर फेंका गया होगा.

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विशाल की हत्या बहुत ही निर्ममतापूर्वक की गई थी. उस की गरदन किसी तेजधार हथियार से रेती गई थी. संघर्ष का कोई चिह्न नहीं था. घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद राजेश मेश्राम ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. उसी दिन पोस्टमार्टम के बाद लाश मृतक के पिता को सौंप दी गई.

यह अजीब इत्तफाक था कि अभी शव के पंचनामे की काररवाई हो ही रही थी कि राजेश मेश्राम को एएसपी से सूचना मिली कि पूछताछ में अपराधी टूट गए हैं और उन्होंने अपना जुर्म कबूल कर लिया है.

अपराध का यह तानाबाना 3 सनकी और खुराफाती लड़कों ने बुना था. आईटीआई डिप्लोमा कर चुका विक्रांत उर्फ हिमांशु बोरखेड़ा का ही रहने वाला था. आईटीआई में डिप्लोमा कर चुका विक्रांत इस हद तक सनकी था कि सनक में वह अपनी कलाइयों में ब्लेड मार कर खुद ही कई जगह अपने हाथों को जख्मी कर चुका था.

बृजेंद्र सिंह भाटी उर्फ लकी कोटा के नजदीकी कस्बे कैथून का रहने वाला था. वह औटोमोबाइल से जुड़ी एक कंपनी में काम करता था और बोरखेड़ा में ही किराए पर कमरा ले कर रह रहा था.

तीसरा साथी प्रदीप उर्फ बिन्नी रोजीरोजगार के लिए गोलगप्पों का ठेला लगाता था. बिन्नी भिंड का बाशिंदा था और कोटा की मन्ना कालोनी में रह रहा था. सनक में तीनों एक से बढ़ कर एक थे. तीनों लगभग 18 से 20 साल की उम्र के थे.

पूछताछ में पता चला कि तीनों की हसरतों के पखेरू आसमानी उड़ान भरते रहे, नतीजतन मौजमस्ती और अय्याशी के शौक के लिए जितना भी कमाते थे, पूरा नहीं पड़ता था. तीनों की इस मंडली में विशाल शामिल हुआ तो बोरखेड़ा में ही रहने वाले विक्रांत उर्फ हिमांशु की बदौलत.

दारूबाजी के महंगे शौक में संपन्न बाप का बेटा विशाल उन के लिए काफी काम का था. विक्रांत, बृजेंद्र और प्रदीप की साझा ख्वाहिश थी तो एक ही कि कोई ऐसा शख्स हाथ चढ़ जाए, जिस से इतना पैसा मिल सके कि मौजममस्ती के लिए तरसना न पड़े.

नशे के सुरूर में एक दिन विशाल का काल ही उस की जुबान पर बैठ गया और वह कह बैठा, ‘‘आज की पार्टी मेरी तरफ से.’’

‘‘किस खुशी में?’’ पूछने पर विशाल ने कह दिया, ‘‘आज ही मेरे पिता को एक बड़े सौदे में भारीभरकम रकम मिली है. इसलिए जश्न होना चाहिए.’’

फिर क्या था, तीनों की आंखों में लालच चमक उठा. पार्टी खत्म होने के बाद तीनों सनकी सिर जोड़ कर बैठे तो बदनीयती जुबान पर आ गई. तीनों की जुबान पर एक ही बात थी, ‘अगर यह बड़ी रकम हमारे हाथ आ जाए तो मजे ही मजे हैं.’ लेकिन सवाल था कि कैसे?

कैसे का आइडिया भी अनायास ही मिल गया. उन के लिए संयोग था और विशाल के लिए दुर्भाग्य कि इत्तफाक से तीनों आपराधिक घटना पर आधारित क्राइम पैट्रोल सीरियल देखते थे. एक कहानी ऐसी ही एक घटना पर आधारित थी, जिस में पैसों की खातिर 3 सिरफिरे अपने दोस्त से ही दगा करते हैं और उस की हत्या कर देते हैं.

फिरौती की घटना पर बुनी गई इस कहानी ने इन तीन तिलंगों को भी दगाबाजी की राह दिखा दी. योजना बनाई गई कि शराब की पार्टी में विशाल को इतनी पिला दी जाए कि वह होश खो बैठे. फिर उसे काबू में कर के उस के पिता से 15 लाख की फिरौती मांगी जाए.

तीनों का मानना था कि एकलौती औलाद के लिए एक दौलतमंद बाप 15 लाख क्या 15 करोड़ भी दे सकता है.

सवाल था कि विशाल बुलाने पर तयशुदा ठिकाने पर आ भी जाए और अपना मोबाइल भी इस्तेमाल न करना पड़े. यह योजना मंगलवार को कामयाब भी हो गई.  इन लोगों ने सुबह 10 बजे बोरखेड़ा पहुंच कर एक सब्जी वाले के मोबाइल से फोन कर के विशाल को बुलाया और वहां से उसे बृजेंद्र के रामराजपुरा स्थित खेत पर ले गए.

सब्जी वाले को यह कह कर विश्वास में लिया कि भैया, हमारे मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई है, इसलिए एक जरूरी फोन कर लेने दो. सब्जी वाला झांसे में आ गया. दोपहर 12 बजे रामराजपुरा पहुंच कर दारू का दौर चला तो विशाल को जम कर दारू पिलाई गई, ताकि वह होश खो बैठे. ऐसा ही हुआ भी.

नशे में बेसुध विशाल के मोबाइल से बृजेंद्र ने पहले विशाल को अपने कब्जे में होने की बात की, फिर 15 लाख की मांग करते हुए धमकी दी कि पुलिस को इत्तला दी तो बेटा जिंदा नहीं बचेगा. असहाय पिता बनवारीलाल ने सहमति जता दी तो उसे पैसे पहुंचाने का निर्धारित स्थान भी बता दिया गया.

एसपी भोमिया साहब ने पूछा, ‘‘जब बाप ने फिरौती की रकम देने का भरोसा दे दिया था तो बेटे को क्यों मारा?’’

एसपी ने आंखें तरेरते हुए हड़काया तो विक्रांत ने उगल दिया, ‘‘हमें डर था कि रकम देने के बाद विशाल हमारा भेद खोलने से नहीं चूकेगा. इसलिए उसे मारना पड़ा.’’

‘‘कैसे और कब?’’ एसपी ने पूछा, ‘‘दरिंदे बन गए तुम लोग? कैसे मारा?’’

‘‘हत्या तो हम ने चाकुओं से कर दी थी. बाद में पहचान मिटाने के लिए उस पर नमक भी लपेट दिया. लेकिन…’’ उस ने बिन्नी और लक्की की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘ये दोनों संतुष्ट नहीं थे, इसलिए लोहे की रौड से उस के चेहरे पर इतने वार किए कि लाश पहचान में न आ सके. साहब, विशाल की हत्या तो हम ने 2 बजे ही कर दी थी.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर…’’ अटकते हुए विक्रांत ने बताया, ‘‘इस के बाद लाश को बोरे में भरा और बाइक पर लाद कर नार्दर्न बाईपास के पास चंद्रलोई नदी की कराइयों में डाल आए और घर आ कर सो गए.’’

‘‘नींद आ गई तुम्हें?’’ एसपी भोमिया उन्हें नफरत भरी नजर से देखते हुए बुरी तरह बरस पड़े, ‘‘तुम ने तो शैतान को भी मात दे दी. लानत है तुम पर.’’

एसपी भोमिया ने मामले का रहस्योद्घाटन करते हुए मीडिया से कहा, ‘‘कैसी विचित्र बात है, ऐसे सीरियल से लोग जागरूक कम होते हैं लेकिन अपराधियों को अपराध के नए तरीके सीखने का मौका मिल जाता है.’’

कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी न्यायिक अभिरक्षा में थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पत्नी की अनोखी शर्त : दोहरे हत्याकांड में आखिर क्या हुआ

18 मार्च, 2018 को सुबह के यही कोई 10 बजे थे. चिमियावली गांव के निकट गेहूं के खेत में गांव वालों ने एक महिला व उस के 100 मीटर दूर एक बच्चे की नग्न अवस्था में सिर कटी लाश पड़ी देखीं. यह गांव उत्तर प्रदेश के जिला संभल के थाना कोतवाली के अंतर्गत आता है.

गांव वालों ने यह बात गांव के चौकीदार रामरतन को बताई. चौकीदार रामरतन तुरंत उस खेत में पहुंच गया जहां लाशें पड़ी थीं. 2-2 लाशें देख कर वह भी चौंक गया. उस ने फोन द्वारा इस की सूचना थानाप्रभारी अनिल समानिया को दे दी. 2 लाशों की खबर मिलते ही अनिल समानिया पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए.

उन्होंने दोनों लाशों का निरीक्षण किया तो वहां पड़े खून से लग रहा था कि उन की हत्याएं वहीं पर ही की गई थीं. दोनों के सिर धड़ से गायब थे. साथ में उन के ऊपर कोई कपड़ा भी नहीं था. मृत महिला के एक हाथ की खाल भी कुछ जगह से गायब थी.

इस से यह अनुमान लगाया कि उस महिला के हाथ पर उस का नाम या पहचान की कोई चीज गुदी हुई होगी. महिला की पहचान न हो सके, इसलिए हत्यारे ने हाथ के उतने हिस्से की खाल ही काट दी थी. अपने उच्चाधिकारियों को इस लोमहर्षक मामले की जानकारी देने के बाद थानाप्रभारी आसपास के क्षेत्र में दोनों मृतकों के सिर तलाशने लगे.

इस काम में गांव वाले भी उन का साथ दे रहे थे. काफी खोजबीन के बाद भी उन के सिर नहीं मिल सके. लेकिन वहां पर मृतकों के कपड़े और चप्पलें जरूर मिल गईं, 2 जोड़ी चप्पलों के अलावा वहां छोटे बच्चे की एक जोड़ी चप्पलें और मिली. जब मरने वाले 2 लोग हैं तो यह तीसरी जोड़ी चप्पल किस बच्चे की है, यह बात पुलिस नहीं समझ सकी.

बिना सिर के लाशों की शिनाख्त करना आसान नहीं था. थानाप्रभारी द्वारा सिरविहीन 2 लाशों की सूचना एसपी रविशंकर छवि और एएसपी पंकज कुमार पांडे को दे दी गई. कुछ देर में दोनों पुलिस अधिकारी भी चिमियावली गांव के उस गेहूं के खेत में पहुंच गए, जहां दोनों लाशें पड़ी थीं.

अधिकारियों ने मौका मुआयना करने के बाद गांवों वालों से लाशों की शिनाख्त के लिए बात की उन्हें मृतकों के कपड़े दिखाए. लेकिन कोई भी उन्हें नहीं पहचान सका.

मौके पर फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया गया. घटनास्थल पर मिले सारे सबूतों को पुलिस ने जब्त कर लिया. घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने दोनों लाशों को सुरक्षित रखवाने के लिए जिला चिकित्सालय भेज दिया और चौकीदार रामरतन की तरफ से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

सिर विहीन 2 लाशें मिलने की खबर कुछ ही देर में पूरे शहर में फैल गई. सभी लोग आपस में यही चर्चा कर रहे थे कि पता नहीं शव किस के हैं. न मालूम मृतक कहां के रहने वाले थे. उधर थानाप्रभारी भी इस बात को ले कर परेशान थे कि इन लाशों की शिनाख्त कैसे कराई जाए. शिनाख्त के बाद ही हत्यारों तक पहुंचा जा सकता था.

लिहाजा शिनाख्त के लिए जिले के समस्त थानों में वायरलैस द्वारा इन अज्ञात लाशों के मिलने की सूचना प्रसारित कर यह जानकारी जाननी चाही कि कहीं किसी थाने में एक महिला और बच्चे की गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है. पर पुलिस की इन कोशिशों से भी कोई सफलता नहीं मिली. आखिर पुलिस ने दोनों शवों का पोस्टमार्टम करा कर  उन का अंतिम संस्कार करा दिया.

8-10 दिन बीत गए लेकिन मृतकों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी. थानाप्रभारी के दिमाग में यह बात भी आई कि कहीं दोनों मृतक किसी दूसरे जिले के रहने वाले तो नहीं हैं. इस के बाद एसपी के माध्यम से सिरविहीन 2 लाशों के बरामद करने की सूचना सीमावर्ती जिलों के थानों में भी भेज दी गई.

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इसी बीच पहली अप्रैल, 2018 को थानाप्रभारी को चिमियावली गांव के पास बहने वाली सोन नदी के किनारे एक महिला का सिर पड़े होने की जानकारी मिली तो वह वहां पहुंच गए और सिर को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. वह सिर 18 मार्च को बरामद हुई सिरविहीन महिला की लाश का है या नहीं, इस की पुष्टि डीएनए जांच के बाद ही हो सकती थी.

इस के 8 दिन बाद यानी 8 अप्रैल को पुलिस ने मोहम्मदपुर मालनी गांव के जंगल से एक बच्चे का सिर बरामद कर लिया. उस का मांस जंगली जानवर खा चुके थे. अब इस बात की आशंका प्रबल हो गई कि यह दोनों सिर पूर्व में बरामद की गई दोनों लाशों के ही होंगे.

मुरादाबाद बरेली परिक्षेत्र के एडीजी प्रेमप्रकाश को जब यह जानकारी मिली तो उन्होंने मुरादाबाद रेंज के आईजी विनोद कुमार से बात कर इस मामले को गंभीरता से लेने को कहा.

एडीजी प्रेमप्रकाश बहुत सुलझे हुए अफसर थे. जब वह मुरादाबाद के एसएसपी थे तो उन्होंने चर्चित किडनी कांड को सुलझा कर डा. अमित को सलाखों के पीछे पहुंचाया था. इस के अलावा उन्होंने बावन खेड़ी में एक ही परिवार के 7 लोगों की निर्मम तरीके से की गई हत्या के मामले को सुलझा कर शबनम और उस के प्रेमी को जेल भिजवाया था. एडीजी की इस दोहरे मर्डर पर भी निगाह बनी हुई थी.

एडीजी प्रेमप्रकाश का निर्देश मिलते ही आईजी विनोद कुमार ने संभल के एसपी रविशंकर छवि और एएसपी पंकज कुमार पांडे के साथ मीटिंग कर इस केस को जल्द से जल्द खोलने के लिए कहा. इस के बाद तो थानाप्रभारी अनिल समानिया के नेतृत्व में गठित पुलिस टीम इस केस को खोलने में जुट गई. उन्होंने मुखबिरों को भी लगा दिया.

14 अप्रैल को चिमियावली गांव के चौकीदार रामरतन ने थानाप्रभारी अनिल समानिया को सटीक सूचना देते हुए कहा कि गांव के हिस्ट्रीशीटर कलुआ के घर 3-4 साल की एक लड़की आई हुई है. वह लड़की बारबार रोरो कर कहती है कि मुझे मेरी मम्मी से मिलवाओ. यह बात मुझे गांव की औरतों ने बताई है. उन औरतों में भी इस बात की चर्चा है कि कलुआ के परिवार में यह लड़की पता नहीं कहां से आ गई.

इतना सुनते ही थानाप्रभारी का माथा ठनका. उन के दिमाग में एक बात घूम गई कि उन दोनों के शवों के पास भी पुलिस को 1 छोटे बच्चे की एक जोड़ी चप्पलें मिली थीं. अनिल समानिया ने बगैर देर किए गांव चिमियावली का रुख किया. वह कलुआ के घर पहुंच गए. उन्हें वहां 4 साल की बच्ची दिखी. बच्ची के बारे में उन्होंने पूछा तो कलुआ ने बताया, ‘‘यह बच्ची मेरी खाला की लड़की है.’’

‘‘यह तुम्हारे पास क्यों है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, यह मेरी लड़की अरमाना के साथ आ गई है. कुछ दिन यहां रह कर अपने घर चली जाएगी.’’

कलुआ पहले बदमाश था. अब वह करीब 80 साल का बुजुर्ग था. उन्होंने सोचा कि शायद यह सच बोल रहा होगा. क्योंकि जवानी में चाहे कितना भी बड़ा अपराधी रहा हो, उम्र की इस ढलान पर आदमी सीधा व सच ही चलता है.

 

थानाप्रभारी ने घटनास्थल से जो छोटे बच्चे की चप्पलें बरामद की थीं उन्हें वह अपने साथ लाए थे. वह कार में रखी थीं. एसआई वीरेंद्र सिंह से उन्होंने चप्पलें मंगा कर उस बच्ची को दिखाईं तो वह उन चप्पलों को देख कर खुश हो गई. उस ने कहा, ‘‘यह चप्पलें तो मेरी है.’’ बच्ची फिर बोली, ‘‘मेरी मम्मी कहां हैं.’’

‘‘मम्मी आ गई, बाहर है.’’ अनिल समानिया ने कहा तो वह बच्ची अपनी मां को देखने के लिए बाहर की तरफ भागी. इस के बाद अनिल समानिया का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. वह कलुआ से बोले, ‘‘मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि इस उम्र में भी…’’ इतना सुनते ही कलुआ ने नजरें नीची कर लीं.

वह बोला, ‘‘साहब, मजबूरी ऐसी आ गई थी कि मैं बेबस हो गया था. क्या बताऊं साहब यह सब करतूत मेरे दामाद वाहिद की है. यदि उस ने मेरी बेटी को धोखा न दिया होता तो मुझे इस उम्र में यह सब करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता.’’

उस ने इस दोहरे हत्याकांड का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने बताया मरने वाली महिला का नाम ममता था और दूसरा उस का 10 साल का बेटा करनपाल था. ममता उस के दामाद वाहिद की पहली पत्नी थी. इस बहुचर्चित केस के खुलने पर अनिल समानिया ने राहत की सांस ली और इस की जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दे दी.

केस खुलने की सूचना मिलते ही एसपी रविशंकर छवि थाने पहुंच गए. उन के सामने कलुआ से पूछताछ की गई तो पता चला कि ममता और उस के बेटे की हत्या में कलुआ के अलावा उस की पत्नी सूफिया, बेटी अरमाना, दामाद वाहिद और दामाद का भाई गुड्डू शामिल थे.

पुलिस ने दबिश दी तो गुड्डू के अलावा सारे आरोपी गिरफ्त में आ गए. इन सभी से पूछताछ करने के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई वह दिल दहला देने वाली थी.

ममता मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर के गांव लहराबल की मूल निवासी थी. उस के पिता अखबारों के हौकर थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा ममता एकलौती बेटी थी. उन की घरगृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. लेकिन उसी दौरान वह हत्या के एक मामले में जेल चले गए. उसी दौरान उन की पत्नी का भी देहांत हो गया. ऐसे में ममता बेसहारा हो गई तब नातेरिश्तेदारों ने उस की देखभाल की.

ममता के पिता जब जमानत पर जेल से बाहर आए तो वह शाहजहांपुर से बेटी के साथ गाजियाबाद आ गए. यह बात करीब 12 साल पहले की है. पिता ने किराए का मकान ले कर मेहनतमजदूरी की. ममता भी जवान हो चुकी थी. इसी दौरान सुनील नाम के एक युवक से ममता की आंखें लड़ गईं.

वक्त के साथ दोनों के प्यार के दरिया में बहुत आगे तक तैर चुके थे. बाद में उन्होंने शादी कर ली. सुनील टैक्सी ड्राइवर था. ममता के पिता इस शादी के खिलाफ थे. पर ममता ने उन की भावनाओं की कद्र नहीं की. सुनील के साथ गृहस्थी बसा कर वह खुश थी. वह 2 बच्चों की मां भी बन गई. जिस में बड़ा बेटा करनपाल था और छोटी बेटी मंजू.

बेटी के फैसले से पिता इतने आहत हुए कि उन का भी देहांत हो गया. ममता के पति सुनील में भी बदलाव आ गया. वह शराब पीने लगा. ममता उसे पीने से मना करती तो वह उस से झगड़ा करता और पिटाई भी कर देता था. अब वह ममता पर शक करने लगा कि उस का किसी के साथ चक्कर चल रहा है.

पति के इस व्यवहार पर ममता भी तनाव में रहने लगी. फिर एक दिन ममता पर ऐसी विपत्ति आन पड़ी, जिस की उस ने कल्पना तक नहीं की थी. जिस सुनील के लिए ममता ने अपने पिता तक को त्याग दिया था, एक दिन वही सुनील ममता और उस के दोनों बच्चों को छोड़ कर कहीं चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया.

ममता बेसहारा हो गई थी. अकेली औरत का वैसे भी लोग जीना मुश्किल कर देते हैं. ममता के पास तो 2 बच्चे भी थे. वह घर का खर्चा कहां से और कैसे चलाती. इस मोड़ पर फंस कर वह कई लोगों द्वारा छली गई. ममता ने भी हालात से समझौता कर लिया था. इसी बीच वह मेरठ में रहने वाले कलुआ नाम के औटो ड्राइवर के संपर्क में आई.

कलुआ के बराबर वाले मकान में वाहिद नाम का युवक रहता था. वाहिद भी आटो चलाता था. वह अविवाहित था इसलिए ममता ने उस के साथ ही गृहस्थी बसाने की सोच ली. वाहिद भी ममता को प्यार करता था. वह उस के साथ निकाह करने को तैयार हो गया.

वाहिद ममता और उस के दोनों बच्चों को ले कर मेरठ से नोएडा आ गया. वहीं पर इसलाम धर्म के रीतिरिवाज से वाहिद ने ममता से निकाह कर लिया. इस से पहले ममता का नाम बदल कर शाहीन रख दिया गया था. बड़े बेटे करनपाल का नाम बदल कर समीर व लड़की मंजू का नाम जैनब रख दिया था.

वाहिद का भाई गुड्डू ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में रहता था, जो वेल्डिंग का काम करता था. वाहिद, ममता और उस के बच्चे को ले कर वहीं पर पहुंच गया. वह सब रहने लगे. वाहिद आटो चलाने गाजियाबाद चला जाता था, जबकि ममता ग्रेटर नोएडा के फ्लैटों में साफसफाई का काम करने निकल जाती थी. दोनों की कमाई से घर ठीकठाक चल रहा था.

वाहिद और ममता की शादी की बात सिर्फ गुड्डू ही जानता था. इस के अलावा वाहिद के घर के किसी भी सदस्य को पता नहीं था कि वाहिद ने 2 बच्चों की मां से शादी कर ली है.

वाहिद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की तहसील बिसौली के गांव भमौरी का रहने वाला था. वाहिद  ने उस का नाम शाहीन जरूर रख दिया था, लेकिन वह उसे ममता के नाम से ही बुलाता था.

एक दिन वाहिद ने ममता उर्फ शाहीन से कहा, ‘‘ममता यहां ग्रेटर नोएडा में महंगाई ज्यादा है. ऐसा करते हैं कि हम लोग उधर ही चलते हैं. वहां गांव में मेरा अपना घर है, जमीनजायदाद भी है, मैं वहीं आटो चला लूंगा.’’

ममता उर्फ शाहीन ने पति वाहिद की बात पर कोई एतराज नहीं किया. इस पर वाहिद ममता और दोनों बच्चों को ले कर बिसौली के नजदीक चंदौसी शहर पहुंच गया. चंदौसी के मोहल्ला वारिश नगर में उस ने एक मकान किराए पर ले लिया. यह करीब 6 महीने पहले की बात है. चूंकि चंदौसी से उस का गांव भी नजदीक ही था, इसलिए वह अकेला अपने मांबाप से मिलने गांव भी जाता रहता था.

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उसी दौरान वाहिद के घर वालों ने संभल जिले के गांव चिमियावली के रहने वाले कलुआ की बेटी अरमाना से उस का रिश्ता तय कर दिया. उस समय वाहिद ने घर वालों को यह तक बताने की हिम्मत नहीं की थी कि उस ने शादी कर रखी है. रिश्ता तय होने के बाद वह कईकई दिन अपने गांव में रुक कर आता.

ममता ने इस बात पर कभी चर्चा तक नहीं की कि वह इतने दिन गांव में क्यों रुकता है. न ही उसे उस की शादी तय होने की कोई भनक लगी. वह तो उस पर अटूट विश्वास करती थी. आननफानन में वाहिद का अरमाना से निकाह भी हो गया. इस के बावजूद ममता अनभिज्ञ बनी रही.

जब वाहिद हफ्ता दो हफ्ता बाद ममता के पास लौटता तो वह कह देता कि वह मुरादाबाद में रह कर आटो चला रहा है, इसलिए वहीं रुक जाता है. वह ममता को खर्च के पैसे देता रहता था.

एक दिन ममता अचानक ही अपने दोनों बच्चों को ले कर वाहिद के गांव भमौरी पहुंच गई. भमौरी गांव चंदौसी के पास ही थी. वहां पर ममता को पता चला कि उस के पति ने उसे धोखे में रख कर संभल की एक लड़की से निकाह कर लिया है.

यह जानकारी मिलते ही ममता आगबबूला हो गई. उस ने गांव में हंगामा करना शुरू कर दिया. उस ने पूरे गांव वालों को बताया कि मैं वाहिद की निकाह की हुई बीवी हूं. ससुराल में पहला हक मेरा बनता है. मुझ से तलाक लिए बगैर उस ने दूसरी शादी कैसे कर ली. इतना ही नहीं ममता ने पुलिस से शिकायत करने की धमकी भी दी.

उस के हंगामे से पूरा गांव जमा हो गया. इस मामले में गलती वाहिद की ही थी पर ममता के थाने जाने के बाद बात बढ़ने की संभावना थी. इसलिए परिवार वालों ने गांव वालों के सहयोग से ममता को समझाना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि वाहिद की दूसरी पत्नी के साथ वह भी रह सकती है. उसे घर में रहने के लिए जगह दे दी जाएगी.

गांवदेहात में जानवरों के बांधने और उन का चारा रखने की जगह को घेर कहते हैं. ममता को अपना और बच्चों का पेट भरना था, इसलिए वह घेर में रहने के लिए तैयार हो गई. वह वहीं रहने लगी पर वाहिद की दूसरी पत्नी अरमाना को ममता का वहां रहना नागवार लगता था. वह ममता को एक पल भी देखना पसंद नहीं करती थी. जिस की वजह से वाहिद और अरमाना में झगड़ा रहने लगा.

रोजाना के झगड़ों से तंग आ कर अरमाना अपने मायके चिमियावली चली गई. वाहिद कई बार अरमाना को लाने के लिए अपनी ससुराल गया लेकिन अरमाना व उस के घर वालों ने साफ मना कर दिया था कि जब तक ममता वहां रहेगी अरमाना यहां से नहीं जाएगी.

वाहिद ने कहा कि ठीक है, वह ममता को चंदौसी में किराए पर लिए कमरे पर पहुंचा देगा. वैसे भी ममता उस से कह भी रही थी कि उसे यहां तबेले में रहना अच्छा नहीं लगता. लेकिन अरमाना इस के लिए भी तैयार नहीं हुई.

उस ने पति वाहिद से साफ कह दिया था कि जब तक ममता और उस के बच्चे जीवित रहेंगे वह ससुराल नहीं जाएगी. उसे उन तीनों के मरने का सबूत भी चाहिए. यानी जिस दिन वह उन के कटे हुए सिर उसे दिखा देगा वह उस के साथ चली चलेगी.

पत्नी की इस जिद पर वाहिद परेशान हो गया. तब उस के ससुर कलुआ और सास सूफिया ने उसे समझाते हुए कहा कि यह कोई बहुत बड़ा काम नहीं है. थोड़े दिमाग से काम लोगे तो बड़ी आसानी से हो जाएगा. तुम किसी तरह ममता और उस के बच्चों को यहां लाओ, बाकी काम हम देख लेंगे.

उस के बाद वाहिद अपने गांव भमौरी लौट आया. वह ममता को ठिकाने लगाने का प्लान बनाने लगा. अपने प्लान में उस ने अपने भाई गुड्डू को भी शामिल कर लिया था. अपनी योजना से उस ने अपने ससुर कलुआ को भी  अवगत करा दिया. वाहिद की सास सूफिया ने इस के लिए बड़े छुरे का इंतजाम कर लिया.

योजना के मुताबिक 17 मार्च, 2018 की शाम वाहिद ममता और उस के बच्चों को ले कर भमौरी से बस द्वारा संभल पहुंच गया. गुड्डू भी उस के साथ था. वाहिद ने ममता को बताया था कि उस के दोस्त के यहां दावत है.

संभल से वह लोग आटो में चिमियावली गांव के लिए बैठे. रास्ते में वाहिद ममता और बच्चों के साथ आटो से उतर गया और कहा कि अब शौर्टकट से पैदल चलते हैं, जल्दी पहुंच जाएंगे. ममता उस की साजिश से अनजान थी. वह गेहूं के खेत के किनारे के संकरे रास्ते से चलने लगा.

पैदल चलने पर ममता के पेट में दर्द हुआ तो वाहिद ने पहले से अपने साथ लाई नशे की गोलियों में से एक गोली ममता को खिला दी. कुछ देर में जब ममता बेहोशी की हालत में आ गई तो वाहिद ने अपने ससुर कलुआ को आवाज दे कर बुला लिया. कलुआ खेत में छिपा बैठा था.

जब ममता निढाल हो कर जमीन पर गिर गई तो गुड्डू, कलुआ और वाहिद ने मिल कर ममता का गला काट कर धड़ से सिर अलग कर दिया. उस समय उस का 10 वर्षीय बेटा करन वहीं खड़ा था. वह डर की वजह से वहां से भागा तो वाहिद ने उसे पकड़ लिया.

उन लोगों ने उस बच्चे का भी गला काट कर सिर धड़ से अलग कर दिया. ममता के हाथ पर उस का नाम गुदा हुआ था. पहचान मिटाने के लिए वाहिद ने हाथ की वह खाल ही काट कर अलग कर दी जहां नाम लिखा था.

उसी दौरान ममता की 4 वर्षीय बेटी मंजू वाहिद की टांगों से चिपकी खड़ी थी. वह कह रही थी कि पापा चलो भूख लग रही है. पापा मुझे टौफी दिलवाओ. वैसे भी वाहिद रोजाना मंजू के लिए टौफी ले कर आता था. वाहिद सब से ज्यादा प्यार मंजू को ही करता था.

वाहिद जब मंजू को भी मारने चला तो कलुआ ने कहा, नहीं यह नासमझ है. इस को हम लोग पाल लेंगे. इस ने क्या बिगाड़ा है.

वाहिद ने जेब से बड़ी पालिथिन थैली निकाल कर दोनों के सिर उस में रख लिए और अपनी ससुराल चिमियावली आ गया. वहां पर वाहिद ने अपनी सास सूफिया व पत्नी अरमाना को कटे सिर दिखाए. सिर देखने पर उन्हें उन के मरने का यकीन हुआ. इस के बाद वह उन दोनों सिरों को गांव के नजदीक बहने वाली सोत नदी के किनारे रेत में अलगअलग दबा आया.

पुलिस ने वाहिद, कलुआ, अरमाना, सूफिया को गिरफ्तार कर लिया. अभियुक्तों की गिरफ्तारी की सूचना पर एडीजी प्रेमप्रकाश भी बरेली से संभल पहुंच गए.

प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित कर उन्होंने इस सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड का खुलासा कर पत्रकारों को जानकारी दी. बाद में पुलिस ने सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक गुड्डू की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों आधारित

राइस पुलर : मोटी ठगी का नया तरीका

नरेंद्र कुमार बड़े बिजनैसमैन थे. अप्रैल 2015 में उन्हें एक शख्स ने फोन कर के बताया कि उस के पास राइस पुलर है, जिसे वह बेचना चाहता है. नरेंद्र कुमार ने राइस पुलर के बारे में सुन रखा था कि इस के अंदर अद्भुत शक्ति होती है. जिस के पास भी यह होता है, वह दुनिया का शक्तिशाली इंसान बन जाता है. फिर भी नरेंद्र कुमार ने इस जानकारी से अनभिज्ञ बनते हुए उस आदमी से पूछा, ‘‘ये राइस पुलर क्या होता है?’’

‘‘सर, आप राइस पुलर के बारे में नहीं जानते, यकीन नहीं हो रहा. दुनिया के अधिकांश बड़े बिजनैसमैन इस के बारे में अच्छी तरह जानते हैं. इतना ही नहीं, वे इसे हासिल करने की चाहत भी रखते हैं. क्योंकि यह होता ही इतना प्रभावी है.’’ उस शख्स ने कहा.

‘‘मुझे इस के बारे में नहीं मालूम. यह भी बता दीजिए कि इस का उपयोग क्या है?’’ नरेंद्र कुमार ने पूछा.

‘‘सर, इस के चमत्कार के बारे में आप गूगल पर या यूट्यूब पर सर्च कर सकते हैं. राइस पुलर कोई भी बरतन, बोल या सिक्का आदि के रूप में हो सकता है. पर मेरे पास राइस पुलर बौल है.

‘‘दरअसल राइस पुलर एक खास तरह की धातु इरीडियम का बना होता है, इस पर आसमानी बिजली गिरने के बाद एक विशेष चमत्कारिक ऊर्जा पैदा होती है, जो इसे अलौकिक बनाती है.

‘‘राइस पुलर की ऊर्जा का इस्तेमाल सैटेलाइट जैसी चीजें बनाने में होता है. इस के अंदर इतनी जबरदस्त चुंबकीय पावर होती है कि यह चावलों को भी अपनी तरफ खींच लेता है.’’ उस शख्स ने जानकारी दी, ‘‘सर, इस की एक और पावर के बारे में जब बताऊंगा तो आप चौंके बिना नहीं रहेंगे. यह जिस के पास भी आ जाता है, उस व्यक्ति की किस्मत ही चमक जाती है.’’

नरेंद्र कुमार को उस की बातों पर विश्वास हो गया कि वह जो कुछ कह रहा है, सही कह रहा है. क्योंकि उन्होंने राइस पुलर के बारे में काफी कुछ सुन रखा था. अब वह यह जानना चाहते थे कि यह है कितने का. उन्होंने उस शख्स से पूछा, ‘‘आप के पास जो राइस पुलर गेंद है, वो है कितने की?’’

‘‘सरजी, वैसे तो इंटरनैशनल मार्केट में इस की कीमत 10 करोड़ रुपए है, पर आप मुझे कम दे देना. मुझे अचानक पैसों की जरूरत पड़ गई, जिस की वजह से मुझे यह बेचनी पड़ रही है. यदि आप इसे अब ले लेंगे तो कुछ दिनों बाद मैं 10 करोड़ में इंटरनैशनल मार्केट में बिकवा दूंगा.

‘‘सर, एक बात और बताता हूं कि इस का इस्तेमाल नासा वाले सैटेलाइट बनाने में करते हैं. इसलिए इस बहुमूल्य चीज को पाने के लिए तमाम देश भी लगे रहते हैं. तभी तो इस की मोटी बोली लगती है. जो मोटी बोली लगाता है, वही इसे हासिल कर लेता है, बाकी लोग तो हाथ मलते रह जाते हैं.’’

अब नरेंद्र कुमार की दिलचस्पी इस राइस पुलर को खरीदने में बढ़ने लगी. उन्होंने कहा, ‘‘भई, 10 करोड़ तो बहुत ज्यादा हैं.’’

‘‘सर, पैसे की बात तो बाद में फाइनल हो जाएगी, उस से पहले आप उस की असलियत की जांच कर लें. यदि वह असली हो तभी उस के सौदे की बात करें.’’ उस शख्स ने कहा.

उस की यह बात नरेंद्र कुमार को ठीक लगी. वह इस के लिए तैयार हो गए. अब उन के सामने समस्या यह थी कि वह राइस पुलर का परीक्षण कैसे कराएं. उन्हें ऐसी किसी लैब या चैक करने वाले स्पैशलिस्ट के बारे में जानकारी नहीं थी.

नरेंद्र कुमार ने उस व्यक्ति से फिर बात की जो उन्हें राइस पुलर बेचने की बात कर रहा था. उस व्यक्ति ने नरेंद्र कुमार से कहा कि वह ऐसे वैज्ञानिक को जानता है जो नासा वगैरह को राइस पुलर उपलब्ध कराते हैं. उन का दिल्ली के मोतीनगर इलाके में औफिस है. लेकिन इस की टेस्टिंग का सारा खर्च आप को ही उठाना पड़ेगा.

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‘‘टेस्टिंग में कितना खर्च आ जाएगा?’’ नरेंद्र कुमार ने पूछा.

‘‘मैं आप की उन से मुलाकात करा दूंगा. इस बारे में आप उन से सीधे ही बात कर लेना.’’ उस शख्स ने कहा.

फिर एक दिन वह शख्स नरेंद्र कुमार को पश्चिमी दिल्ली के मोतीनगर स्थित एक कंपनी रेहान मेटल यूएसए में ले गया. उस ने उस कंपनी के एमडी वीरेंद्र मोहन बरार से उन की मुलाकात कराई. वहां पर कंपनी के एमडी का बेटा नितिन मोहन बरार भी मौजूद था.

दोनों बापबेटों ने खुद को वैज्ञानिक बताते हुए कहा कि वह राइस पुलर के काम से बहुत दिनों से जुड़े हुए हैं. उन की कंपनी नासा को राइस पुलर उपलब्ध कराती है. जब कीमत की बात आई तो उन्होंने यह भी बताया कि इस की कीमत निश्चित नहीं है. मांग के अनुसार इस की कीमत बढ़ भी जाती है और 37,500 करोड़ रुपए तक भी हो सकती है.

वीरेंद्र मोहन की बात से नरेंद्र इतना तो समझ ही गए कि राइस पुलर वास्तव में अद्भुत चीज है, जिस की कीमत करोड़ों में होती है. यानी उन से राइस पुलर के जो 10 करोड़ रुपए मांगे जा रहे थे, वह इस की विशेषता को देखते हुए कोई ज्यादा नहीं थे.

नरेंद्र कुमार ने उन से राइस पुलर की जांच के बारे में बात की तो उन्होंने बताया कि राइस पुलर बहुत ही पौवरफुल होता है. इस की जांच के लिए बाहर से कैमिकल और किट मंगानी होती है, जिसे पहन कर वैज्ञानिक इसे अपनी तरह से चैक करते हैं और यह सब बहुत ज्यादा महंगी होती है.

उन्होंने कहा कि इस की कई स्तर की टेस्टिंग होगी. इस के बाद ही पता लग सकेगा कि वह राइस पुलर कितना पावरफुल है. इस में रेडिएशन इतना जबरदस्त होता है कि इसे कार्बन में रखा जाता है.

‘‘यह सब मिला कर कुल कितना खर्च आएगा?’’ नरेंद्र कुमार ने पूछा.

‘‘देखो, खर्चे के बारे में सटीक तो नहीं बता सकते, लेकिन आप 20 से 70 लाख रुपए के बीच मान कर चलें.’’ वीरेंद्र मोहन बरार ने कहा.

कुछ सोचने के बाद नरेंद्र कुमार ने कहा, ‘‘ठीक है, आप उस की टेस्टिंग की तैयारी कीजिए, तब तक मैं भी पैसों का इंतजाम करता हूं.’’

‘‘ठीक है, आप कुछ पैसे जमा करा दीजिए.’’

तब 2 दिन बाद नरेंद्र ने वीरेंद्र मोहन बरार को 5-6 लाख रुपए दे दिए. पैसे लेने के बाद बरार ने कहा कि इस की पहली  टेस्टिंग दिल्ली से दूर हापुड़ इलाके में करेंगे. तब एक दिन वीरेंद्र मोहन बरार और नितिन मोहन बरार अपनी औडी कार से नरेंद्र कुमार के साथ हापुड़ पहुंच गए.

जो शख्स नरेंद्र कुमार को राइस पुलर बौल बेच रहा था, वह भी उन के साथ गया. हापुड़ में उन्होंने एंटी रेडिएशन सूट पहन कर उस राइस पुलर बौल की जांच शुरू कर दी.

इस के लिए उन्होंने एक जगह पर वह राइस पुलर बौल रख दी और उस बौल से कुछ दूरी पर चावल के कुछ दाने रख दिए. कोई भी चुंबक लोहे को ही अपनी तरफ खींचती है, लेकिन तांबे जैसी दिखने वाली वह गेंद उन चावलों को अपनी तरफ खींच रही थी.

खुद को वैज्ञानिक बताने वाले वीरेंद्र मोहन बरार और नितिन मोहन बरार ने नरेंद्र कुमार से कहा कि प्रारंभिक जांच में यह राइस पुलर खरा उतरा है. क्योंकि इस ने इन चावलों को अपने गुण की वजह से ही अपनी तरफ खींचा है.

नरेंद्र कुमार खुश हो गए कि इस की जो 2-3 जांच होनी हैं, वह भी सही निकलें तो बहुत अच्छा होगा. पहली जांच पूरी होने के बाद वीरेंद्र मोहन बरार ने नरेंद्र कुमार से 81.6 लाख रुपए मांगे. नरेंद्र के पास उस समय इतने पैसे नहीं थे तो उन्होंने बरार को किस्तों में 19 लाख, 24.6 लाख और 38 लाख रुपए दे दिए. पैसे लेने के बाद बरार ने उन से कहा कि क्वालिटी की जांच के लिए इस राइस पुलर बौल की 2 जांच होनी और जरूरी हैं. जब आप को यह जांच करानी हों तो मुझे एक दिन पहले बता देना.

नरेंद्र कुमार 85 लाख से ज्यादा खर्च कर चुके थे. इसलिए वह दूसरी टेस्टिंग के लिए भी तैयार हो गए. उस राइस पुलर की दूसरी टेस्टिंग उन्होंने दिल्ली के ईस्ट औफ कैलाश में की. इस टेस्टिंग के बाद नरेंद्र कुमार ने वीरेंद्र मोहन बरार को किस्तों में क्रमश: 5.6 लाख, 3.5 लाख और 42 लाख रुपए दिए. इस टेस्टिंग में भी वह राइस पुलर गेंद खरी उतरी.

अब उस की आखिरी टेस्टिंग होनी बाकी थी. तीसरी जांच के लिए हिमाचल प्रदेश का धर्मशाला क्षेत्र निश्चित किया गया. ये सभी लोग धर्मशाला पहुंचे लेकिन उस दिन मौसम खराब होने की वजह से जांच नहीं की जा सकी, जिस से सभी लोग वापस आ गए.

घर लौटने के बाद नरेंद्र कुमार ने अपने एक दोस्त से राइस पुलर के बारे में बात की तो उस दोस्त ने बताया कि आजकल राइस पुलर के नाम पर कुछ लोग ठगी भी कर रहे हैं.

तुम ऐसे लोगों से संभल कर रहना. इतना ही नहीं, उस दोस्त ने यूट्यूब पर कुछ वीडियो भी दिखाए, जिस में लोगों ने राइस पुलर सिक्के, बरतनों आदि के नाम पर करोड़ों रुपए की ठगी की थी.

दोस्त की बात सुन कर नरेंद्र कुमार का दिमाग घूम गया. उन्होंने उस शख्स से संपर्क किया जो उन्हें राइस पुलर बेच रहा था. उस से उन्होंने कहा कि वह अब इसे नहीं खरीद रहे, उन के जो पैसे खर्च हुए हैं, वह वापस दिलवा दें. उस शख्स ने कह दिया कि जो पैसे टेस्टिंग में खर्च हुए हैं, वे तो वैज्ञानिकों ने लिए हैं.

वापस करने के बारे में उन्हीं से बात करो. तब नरेंद्र कुमार ने वीरेंद्र मोहन बरार से बात की. बरार ने कहा कि जांच के लिए जो कैमिकल आया था, वह बहुत महंगा था, इसलिए किसी भी हालत में पैसे वापस नहीं हो सकते.

इन लोगों से बात करने के बाद नरेंद्र कुमार को अपने ठगे जाने का अहसास हुआ. उन्होंने दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के डीसीपी भीष्म सिंह से मुलाकात कर इस मामले में कानूनी काररवाई करने की मांग की.

डीसीपी ने इस मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के इंटर बौर्डर गैंग इंट्रोगेशन स्क्वायड के एसीपी आदित्य गौतम की देखरेख में एक टीम बनाई. इस टीम में इंसपेक्टर सुनील जैन आदि को शामिल किया गया.

टीम ने इस मामले की जांच शुरू कर दी और ठगी करने वाले वीरेंद्र मोहन बरार, उस के बेटे नितिन मोहन बरार को 8 मई, 2018 को गिरफ्तार कर लिया.

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जांच में पता चला कि ये दोनों फरजी वैज्ञानिक बन कर लोगों को ठगते थे. इन की निशानदेही पर पुलिस ने वैज्ञानिकों द्वारा पहने जाने वाला एंटी रेडिएशन सूट, एंटी रेडिएशन स्टीकर, लैपटौप, प्रिंटर, ब्लैंक लैटरहैड, फरजी आईडी कार्ड व औडी कार बरामद की.

आरोपियों ने बताया कि इन्होंने तांबे की गेंद पर मैग्नेट की कोटिंग करा ली थी. चावलों को भी खास तरह से तैयार किया गया था. चावलों पर इन्होंने लोहे की कोटिंग करा रखी थी. जब खरीदार को कौपर की बौल चावलों को अपनी तरफ खींचते दिखती तो उन्हें यकीन हो जाता कि यह असली राइस पुलर है. इस से लोग आसानी से जाल में फंस जाते थे.

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के अलावा उत्तराखंड पुलिस ने भी राइस पुलर सिक्के बेचने वाले 12 लोगों को हरिद्वार के एक होटल से गिरफ्तार किया था. गैंग के सदस्यों ने मुंबई के व्यापारी परवेज को फोन कर के जादुई सिक्का बेचने की बात कही थी.

गैंग के सदस्य ने उन से कहा था कि इस जादुई सिक्के में इतनी शक्ति है कि इस के प्रभाव से चलती ट्रेन, बस भी रुक जाएगी. हवाईजहाज को भी इमरजेंसी लैंडिंग को बाध्य होना पड़ेगा. इतना ही नहीं, इस सिक्के में मौसम बदलने तक की शक्ति है. यह राइस पुलर कौइन जिस किसी के पास होगा, वह विश्व का शक्तिशाली व्यक्ति बन जाएगा.

परवेज नाम के उस व्यापारी ने जब उस राइस पुलर कौइन की कीमत पूछी तो उस जालसाज ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस की कीमत 21 सौ करोड़ रुपए है. लेकिन वह उन्हें सस्ते में ही दे देगा.

जालसाज ने यह भी बताया कि उसे यह सिक्का हरिद्वार के एक साधु ने बेचा था. जालसाज ने व्यापारी को भरोसा दिया कि पहले वह हरिद्वार आ कर उस सिक्के की जादुई शक्ति को देखे, इस के बाद ही पसंद आने पर सौदा करें.

व्यापारी को यह बात पसंद आ गई और वह अपने एक साथी के साथ मुंबई से फ्लाइट द्वारा दिल्ली पहुंच गया और दिल्ली से टैक्सी कर के हरिद्वार के उस होटल में पहुंच गया, जहां जालसाज ने बुलाया था. होटल में व्यापारियों को जालसाज ने वह तथाकथित जादुई सिक्का दिखाया और फिर एक करोड़ रुपए में उस का सौदा तय हो गया.

इसी बीच उस होटल के मैनेजर को किसी तरह यह बात पता चल गई कि होटल में किसी जादुई सिक्के की डील हो रही है. फिर क्या था, उस ने उसी समय पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस ने दबिश दे कर वहां से 12 लोगों को गिरफ्तार कर उन के पास से तांबे का एक सिक्का, 11 मोबाइल फोन और 2 कारें बरामद कीं.

इसी तरह महाराष्ट्र के नासिक में एक रिटायर्ड आर्मी अफसर को भी चमत्कारिक बरतन (राइस पुलर) के नाम पर 70 लाख का चूना लगाया था. हैदराबाद पुलिस ने भी राइस पुलर लोटा के नाम पर मोटी रकम ठगने वाले 4 ठगों को गिरफ्तार किया था. इस के पास से 4 तांबे के लोटों के अलावा 38 लाख रुपए भी बरामद किए थे. मुंबई में ऐसे अनेक लोग हैं जो राइस पुलर (सिक्के, बरतन, बौल इत्यादि) बेचने के धंधे से जुड़े हुए हैं.

कहा जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन 1835 से 1845 के बीच किंग विलियम चतुर्थ के कार्यकाल में हाफ आना के सिक्के जारी किए थे. ये सिक्के बौंबे, कलकत्ता और मद्रास में बने थे. तांबे के बने इस सिक्के का वजन 12.35 ग्राम था.

इन सिक्कों में कुछ चुंबकीय शक्ति बताई जाती थी. सन 1835 में बने वह हाफ आना सिक्के बाजार में 5 से 8 हजार रुपए में बेचे जा रहे हैं, लेकिन सन 1845 में मद्रास में बने सिक्के रेयर हैं. यदि किसी के पास वह सिक्का है तो बाजार में उस की कीमत 15-20 हजार रुपए है.

अब बात करते हैं राइस पुलर की. कहा जाता है कि आसमान से उल्का पिंड गिरे थे. एक उल्का पिंड राजस्थान में भी गिरा था, जो इतना शक्तिशाली था कि जमीन में धंस गया. जिस जगह पर वह गिरा था, बाद में वह जगह सरकार ने अपने कब्जे में ले ली थी. जांच में पता चला कि उल्का पिंड के साथ वह इरीडियम धातु थी. वैज्ञानिकों ने इरीडियम की जांच की तो पता चला कि वह बहुत कठोर धातु है, जिस में परमाणु संख्या 77 है और यह 2,04,500 डिग्री सेल्यिस पर पिघलती है.

इस धातु में यदि तांबे को पिघला कर इरीडियम कौपर बनाया जाए तो उस में विशेष प्रकार का चुंबकीय गुण आ जाता है. राइस पुलर बेचने वालों का दावा है कि राइस पुलर बनाने के लिए तांबे से बनी वस्तु को किसी ऐसे ऊंचे पहाड़ की चोटी पर रखा जाता है, जहां पर बादल नीचे हों.

फिर जब आसमानी बिजली उस पात्र या सिक्के पर गिरती है तो उस पात्र या सिक्के में अद्भुत शक्ति आ जाती है. वह राइस पुलर बन जाता है. धंधेबाज लोग ऐसे पहाड़ों पर अनेक जगह तांबे के पात्र या सिक्के रख देते हैं और वहीं आसपास रुक कर निगाह रखते हैं कि उस पहाड़ पर बिजली गिरी है या नहीं.

अब कुछ लोगों ने राइस पुलर बेचने का एक तरह का धंधा बना रखा है. ये लोग सन 1616, 1717, 1816, 1818 आदि के पुराने तांबे के सिक्के बाजार से तलाश कर उस पर मैग्नेट की कोटिंग करा लेते हैं. फिर वे इन सिक्कों को राइस पुलर का नाम दे कर करोड़ों रुपए की ठगी करते हैं.

दिल्ली के वीरेंद्र मोहन बरार ने अपने बेटे नितिन मोहन बरार के साथ मिल कर यही धंधा शुरू किया था. उन्होंने नरेंद्र से करीब डेढ़ करोड़ रुपए की ठगी की थी. राइस पुलर के नाम पर मोटी ठगी का धंधा अनूठा है. लोगों को ऐसे ठगों से सतर्क रहना होगा.

घर पर बनाएं ड्राई वैजिटेबल मंचूरियन

 

सामग्री

– 1 कप कद्दूकस की पत्तागोभी

– 1 गाजर कद्दूकस की

– 1/4 कप हरा प्याज कटा

– 1/4 कप शिमलामिर्च बारीक कटी

– 1/4 कप फ्रैंचबींस बारीक कटी

– 1 हरीमिर्च बारीक कटी

– 1 छोटा चम्मच अदरक कद्दूकस किया

– 3 बड़े चम्मच कौर्नफ्लोर

– 2 बड़े चम्मच मैदा

– 1 बड़ा चम्मच सोया सौस

– 2 छोटे चम्मच रैड चिली सौस

– 1/4 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर

– 2 बड़े चम्मच टोमैटो सौस

– 2 छोटे चम्मच अदरक व लहसुन पेस्ट

– 2 छोटे चम्मच सिरका

– 1 बड़ा चम्मच प्याज बारीक कटा

– थोड़ा सा हरा प्याज बारीक कटा

– वैजिटेबल बौल्स फ्राई करने के लिए रिफाइंड औयल

– नमक स्वादानुसार.

विधि

पत्तागोभी में सभी सब्जियां हरीमिर्च, अदरक, 2 बड़े चम्मच कौर्नफ्लोर, 2 बड़े चम्मच मैदा व थोड़ा सा नमक मिलाएं.

इस में 1 छोटा चम्मच सोया सौस, कालीमिर्च चूर्ण मिला कर छोटीछोटी बौल्स बना कर डीप फ्राई कर लें.

पुन: एक नौनस्टिक कड़ाही में 1 बड़ा चम्मच तेल गरम कर के प्याज, अदरक, लहसुन पेस्ट सौते करें. टोमैटो सौस, चिली सौस, सोया सौस व सिरका डालें.

1 कप पानी में बचा मैदा व कौर्नफ्लोर घोल कर मिश्रण में डालें. उबाल आने पर वैजिटेबल बौल्स डालें और मिश्रण के सूखने तक धीमी आंच पर पकाएं. हरे प्याज से सजा कर सर्व करें.

हरी सब्जियों के अनूठे जायके : स्टफ्ड भिंडी

स्टफ्ड भिंडी

सामग्री

– 250 ग्राम ताजी मुलायम भिंडी

– 2 बड़े चम्मच प्याज का पेस्ट

– 1 छोटा चम्मच अदरक व लहसुन पेस्ट

– 2 बड़े चम्मच भुने चने का आटा

– लालमिर्च पाउडर

– 2 छोटे चम्मच धनिया पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

– 1 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर

– 2 बड़े चम्मच मस्टर्ड औयल

– नमक स्वादानुसार.

विधि

भिंडी को धो व पोंछ कर ऊपर व नीचे का हिस्सा थोड़ा सा काट दें. प्रत्येक भिंडी में लंबाई में चीरा लगाएं व हलके हाथों से अंदर के सारे बीज निकाल दें. 1 चम्मच तेल गरम कर के प्याज, लहसुन व अदरक भूनें और फिर सभी सूखे मसाले मिला कर 1 मिनट और भूनें. भुने चने का आटा मिलाएं व नमक डालें. मसाले को ठंडा कर के प्रत्येक भिंडी में भर दें. नौनस्टिक तवे पर बचा तेल गरम कर के भिंडियों को गलने और लाल होने तक पकाएं.

इमरान के आने से क्या बदलेगा पाकिस्तान

पाकिस्तान में पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी के नए नेता ने सत्ता संभाल ली है. 1992 में विश्वकप जीतने वाले इमरान खान ने 22 साल का लंबा सफर राजनीति में अपनी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा को पूरा करने के लिए तय किया. इस दौरान कई से शादियों का सेहरा पहना और कितनी औरों के साथ संबंध बनाए पता नहीं पर फिर भी पाकिस्तान की कट्टरपंथी जनता ने इस बार उन्हें जिता दिया है और पुराने नवाज शरीफ व जुल्फीकार भुट्टो के वारिसों को नकार दिया है.

भारत में कहा जा रहा है कि यह वहां की सेना की कृपा से हुआ और सेना ने असल में अपने मुखौटे को सत्ता में बैठाया पर यह निरर्थक सा आरोप है. पाकिस्तान में किसी की भी सरकार बने, सेना को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह तो वही करेगी जो चाहती है. देश की असली कमान तो वहां सेना के पास ही है.

भारत के लिए इमरान खान कुछ खास साबित होंगे इस की उम्मीद नहीं है. बस फर्क इतना है कि उन के चेहरे से भारत के वे करोड़ों परिचित हैं जो 1992 में उन के दीवाने थे जब उन्होंने क्रिकेट कप जीता था. खेल के मैदान में जीतने वाले से उम्मीद की जा सकती है कि वह राजनीति को खेलों की सी योग्यता की प्लेट पर रख कर देखेगा और अति करने से बचेगा.

पाकिस्तान की स्थिरता भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यदि किसी गृहयुद्घ में पाकिस्तान फंसता है तो उस का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ सकता है. पाकिस्तान का आर्थिक पिछड़ापन भारत के लिए परेशानी भी बन सकता है हालांकि अब तो पाकिस्तान ने सिर्फ अपनी जनता का ध्यान बंटाने के लिए भारत पर आक्रमण नहीं किया है. 1971 के बाद पाकिस्तान को अपनी हैसियत मालूम है.

अब तो वैसे उलटा होता नजर आ रहा है. जो कट्टरता पहले पाकिस्तान में दिखती थी उस पर भारत में खिल्ली उड़ाई जाती है, अब भारत में दिखने लगी है. पाकिस्तान ने पहले एटम बम बना कर अपनी शक्ति दिखा ही दी है और अब चीन के साथ वन रोड योजना का अहम पार्टनर बन कर वह अपने विकास के नए रास्ते भी खोज रहा है. पाकिस्तान में गरीबी है पर फिर भी बहुत गरीब भारत के गरीबों से अच्छे हैं क्योंकि वहां दलित नहीं हैं.

धार्मिक कट्टरपन में भारत पाकिस्तान से अब 2 हाथ आगे जा रहा है और ऐसे में यदि इमरान खान के 2-4 काम भी सही बैठ गए तो काफी कुछ नया हो सकता है. इमरान खान पश्चिम से काफी प्रभावित हैं और भारत विरोधी होते हुए भी उन्हें मालूम है कि पश्चिमी देशों की तरह एक साथ बैठ कर ही समस्याएं सुलझाई जा सकती हैं.

इमरान और सेना के संबंधों के पूर्वाग्रह को छोड़ कर ही भारत को पाकिस्तान से व्यवहार करना होगा और कम से कम नागरिकों के मिलनेजुलने पर लगी बीसियों रोकटोकें समाप्त कर देनी होंगी. उम्मीद करें कि दो कट्टरप्राय देश अब कुछ समझेंगे.

 

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