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ऐनकाउंटर के नाम पर हत्याएं…

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद 20 मार्च, 2017 से फरवरी, 2018 तक तकरीबन 11 महीने में कई ऐनकाउंटर हो चुके हैं जिन में 43 तथाकथित अपराधी मारे गए हैं और तकरीबन डेढ़ हजार घायल हुए हैं.

कानून व्यवस्था को ठीक करने के नाम पर होने वाले इन ऐनकाउंटरों पर अब सवाल उठने लगे हैं. ऐसे ऐनकाउंटरों के तौरतरीके, पुलिस की कहानी, ऐनकाउंटर पीडि़तों के जख्मों वगैरह की जांचपड़ताल करने पर ऐसे सवालों का उठना लाजिमी भी है. सब से बड़ा सवाल तो यह है कि मुठभेड़ की जाती?है या हो जाती है?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों को देखें तो इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल नहीं है कि मुठभेड़ की जाती है और ऐसा तथाकथित अपराधियों की निशानदेही कर के होता है.

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में मुठभेड़ में छन्नू सोनकर, रामजी पासी, जयहिंद यादव और मुकेश राजभर मारे गए थे. उन के परिवार वालों और गांव वालों से मिलने के बाद जो तथ्य सामने आए हैं वे चिंता बढ़ाने वाले हैं.

छन्नू सोनकर को अमरूद के बाग से पुलिस वाले ले गए और जब वह देर रात तक घर नहीं आया तो उस के परिवार वालों ने उस के मोबाइल पर फोन किया. पता चला कि वह जहानागंज थाने में है.

पिता झब्बू सोनकर और उस की बहनों ने बताया कि अगली सुबह 2 पुलिस वाले उन के घर पहुंचे और बताया कि छन्नू का जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है. वहां पहुंचने के बाद परिवार वालों को मुठभेड़ में उस के मारे जाने के बारे में पता चला.

मुकेश राजभर की मां ने बताया कि उस का बेटा कानपुर में मजदूरी करता था. 15 दिन पहले पुलिस वाले उस के घर गए थे, गालीगलौज और मारपीट की थी और मुकेश का कानपुर का पता मांगा था.

मां का आरोप है कि पुलिस वाले उस से रिश्वत में बड़ी रकम मांग रहे थे. उस ने बताया कि 26 जनवरी को 9 बजे पुलिस ने मुकेश को कानपुर से उठाया था.

दिन में 12 बजे सिपाही रामजन्म ने फोन कर के मुकेश की मां से पूछा था कि उस के पास कितने खेत हैं तो उस ने उस से कहा था कि मुकेश को ले गए हो तो उसे मारनापीटना मत, लेकिन पुलिस ने उस को ऐनकाउंटर में मार डाला.

मुकेश को सीने में एक गोली मारी गई थी. पुलिस ने उस पर बंदी रक्षक को गोली मारने का अरोप लगाया है.

जयहिंद यादव के पिता शिवपूजन यादव ने बताया कि जयहिंद उन को साथ ले कर दवा लाने जा रहा था. सादे कपड़ों में कुछ लोगों ने उसे उठा कर एक गाड़ी में बैठा लिया और चले गए. उस के बाद सूचना मिली कि उस की मुठभेड़ में मौत हो गई. उसे 21 गोलियां लगी थीं.

क्षेत्र पंचायत सदस्य रहे रामजी पासी के पिता दिनेश सरोज का कहना था कि पुलिस ने पहले उस पर फर्जी मुकदमे लगाए और फिर फर्जी मुठभेड़ कराने में उस की हत्या कर दी.

उन का कहना था कि रामजी ने 600 वोटों से क्षेत्र पंचायत चुनाव जीता था. इस के चलते कुछ सवर्ण लोग उस से जलते थे और मुठभेड़ में उन लोगों का भी हाथ है.

बाराबंकी में पुलिस ऐनकाउंटर में घायल रईस अहमद के परिवार वालों से भी मुलाकात की गई. रईस अहमद की पत्नी ने बताया कि 30 दिसंबर को अंधेरा होते ही मुखबिर आबिद के साथ सादा कपड़ों में गाड़ी में आए पुलिस वाले उसे गांव से ही उठा कर ले गए.

जिला पंचायत का चुनाव लड़ चुके रईस अहमद की पत्नी ने आगे बताया कि उस के पति की गांव के कुछ लोगों से प्रधानी के चुनाव को ले कर रंजिश थी. उस को इस से पहले नहर काटने के आरोप में फंसाया गया था.

पुलिस ने मारे गए सभी तथाकथित अपराधियों पर कई अपराधों से जुड़े होने का आरोप लगाया है और उन्हें इनामी भी बताया है. इस के अलावा इन मुठभेड़ों के बाद पुलिस की कहानी में कई चीजें ऐसी हैं जो सभी मामलों में एकजैसी हैं.

जैसे सभी मुलजिम मोटरसाइकिल से जा रहे थे और उन में से हरेक के साथ उस का एक साथी भी था. पुलिस ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो मोटरसाइकिल सवारों ने उन पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया.

पुलिस ने जवाबी फायर किया तो मुलजिमों को गोली लगी जिस में वे घायल हो गए लेकिन उन के साथी फरार होने में कामयाब रहे. मुठभेड़ के बाद मौके से मोटरसाइकिल के अलावा हर वारदात में एक हथियार भी बरामद हुआ.

सवाल है कि मोटरसाइकिल सवार से मुठभेड़ में किसी को 21 गोलियां कैसे लग सकती हैं? 21 गोलियां लगने के बाद पुलिस का यह कहना कि अस्पताल ले जाते समय मौत हुई, ऐसा स्वाभाविक नहीं लगता.

मुकेश राजभर के सीने में जिस जगह पर गोली लगी और जिस से उस की मौत भी हो गई उस जगह पर गोली लगने के बाद कुछ मिनटों तक ही जिंदा रहने की उम्मीद रह जाती है, ऐसे में पुलिस जिला अस्पताल में इलाज के दौरान उस की मौत की बात कह कर शक ही पैदा कर रही है.

उठ रहे सारे सवालों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग ने आजमगढ़ के मुकेश राजभर, जयहिंद यादव, रामजी पासी और इटावा के अमन यादव की फर्जी मुठभेड़ पर जांच बैठा दी गई है. उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भी विपक्षी दलों ने फर्जी मुठभेड़ के नाम पर की जा रही हत्याओं का सवाल उठाया.

दरअसल, मुठभेड़ों की यह मुहिम कानून व्यवस्था का मामला कम और ऐनकाउंटर पौलिटिक्स का मसला ज्यादा लगता है.

भाजपा सरकार अपराधियों के प्रति कठोर होने के दिखावे के नाम पर राजनीतिक हिसाबकिताब चुकता कर रही है. ऐनकाउंटर में मारे जाने वालों में मुसलिमों, दलितों और पिछड़ों की तादाद सब से ज्यादा है. नामी सवर्ण अपराधी या भाजपा की शरण में चले जाने वाले लोग तो निश्चिंत हो कर घूम रहे हैं.

मुठभेड़ों के बढ़ते हुए आंकड़े ही यह बताने के लिए काफी हैं कि सबकुछ ठीक नहीं है. 20 मार्च, 2017 से शुरू इस मुहिम के पहले 6 महीने में कुल 420 ऐनकाउंटर हुए थे जिन में 15 लोग मारे गए थे जबकि यह आंकड़ा 3 फरवरी, 2018 तक क्रमश: 1142 और 38 था.

योगी सरकार की दिलचस्पी किसी से छिपी हुई नहीं है और यह मामला कानून व्यवस्था को ले कर कम राजनीतिक ज्यादा है.

हेयर केयर से आप भी पा सकती हैं खास लुक

आजधूलमिट्टी व बढ़ते प्रदूषण की वजह से बाल रूखे व बेजान हो जाते हैं. ऐसे में भले ही आप अपने बालों को कैसा भी स्टाइल दें या फिर कैसी भी हेयर ऐक्सैसरीज यूज करें लेकिन उस से पहले हेयर केयर जरूरी है और उस के लिए विटामिन ई युक्त केयोकार्पिन हेयर आयल से बालों को सौफ्ट टच देना न भूलें.

बालों की कर्लिंग व स्ट्रेटनिंग

– कर्लिंग के लिए सिरैमिक कर्लिंग आयरन चुनिए यह बालों को अंदर से बाहर की तरफ हीट देता है, जिस से आसानी से कर्ल्स बनते हैं. हां, इस बात का ध्यान रखें कि इस में आसानी से तापमान नियंत्रित करने की सुविधा हो.

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– अगर आप बालों को बेहतर फिनिशिंग देना चाहती हैं, तो केयोकार्पिन तेल लगाना न भूलें. इस से आप स्मूद लुक पाएंगी.

– बालों को स्ट्रेट लुक देने के लिए प्रैसिंग की प्रक्रिया शुरू करने से पहले बालों को स्मूदिंग शैंपू से धोएं. फिर कंडीशनिंग करने के बाद सुखा लें. उस के बाद थर्मल प्रोटैक्शन फ्लुइड अप्लाई कर के प्रैसिंग की प्रक्रिया शुरू करें और प्रोसैस कंप्लीट होने के बाद केयोकार्पिन लगाना न भूलें.

स्टाइलिंग हेयर प्रोडक्ट्स

– जैसे बौडी क्रीम्स स्किन में मौइश्चर बनाए रखने का काम करती हैं वैसे ही हेयर क्रीम्स जड़ों में नमी बनाए रखती है. आप भी फ्रीजी हेयर्स को स्मूद और परफैक्ट हेयरस्टाइल बनाने के लिए हेयर क्रीम्स का चयन कर सकती हैं. इस से बालों में चिपचिपापन न लग कर नैचुरल सा लुक लगता है.

– अगर आप अपने एक जैसे लुक से बोर हो गई हैं तो हेयर जैल का यूज बैस्ट है. यह बालों में लौंग टाइम तक स्टे रहने के साथसाथ उसे डिफरैंट लुक भी देता है.

– हेयर स्प्रे एक ऐसा ग्रूमिंग प्रोडक्ट है जिस का इस्तेमाल हेयरस्टाइल को पूरे दिन अपनी जगह पर होल्ड करने के लिए किया जाता है. ये बालों का वॉल्यूम बढ़ाने का भी काम करता है.

– हेयर मूज़ बालों को एक्स्ट्रा वॉल्यूम और शाइन देने के लिए यूज किया जाता है. इस की खास बात यह है कि ये स्टाइल को हलके से होल्ड करता है जिस से बाल नैचुरल लुक देते हैं.

पोनीटेल दे यूनीक लुक

– स्लीक पोनीटेल बनाने के लिए बालों में अच्छे से कौंबिंग कर के उन्हें रबड़ बैंड से टाई करें. फिर पोनीटेल के छोटे छोटे सैक्शन ले कर उस में केयोकार्पिन आयल लगा कर पोनीटेल की परफैक्ट लुक दीजिए.

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– लो फुल पोनी बनाने के लिए मिडिल पार्टिंग करते हुए बालों को गरदन के पीछे करते हुए इस तरह कंघी करें कि किसी भी तरह बाल निकले नहीं. ध्यान रखें कि पोनीटेल गरदन के पास ही बने.

– बालों में कौंबिंग करते हुए हाई पोनीटेल बना कर रबड़ बैंड से बांधें. फिर पोनीटेल की चोटी बनाते हुए उसे नीचे से टाई करें. फिर धीरे धीरे चोटी को खोलें और उस पर स्प्रे करें.

कुछ अन्य जरूरी टिप्स प्रिसिला से जानें

– बालों को डैमेज होने से बचाने के लिए जरूरी है कि हमेशा ईकोफ्रैंडली कलर्स का ही इस्तेमाल करें.

– हेयर जैल, मूज़ लगाने से बालों में ड्राईनैस आती है तो ऐसे में इस की ड्राईनैस को कम करने के लिए उस में केयोकार्पिन लाइट हेयर आयल की 5 बूंदें डालना न भूलें.

– स्टाइल को परफैक्ट बनाने के लिए हेयर ऐक्सैसरीज का यूज करना न भूलें.

– बालों को जितना हो सके धूलमिट्टी व तेज धूप से बचाएं.

– बालों के टैक्स्चर को देखते हुए ही हेयर प्रोडक्ट का इस्तेमाल करना चाहिए.

– बालों को पोषण देने के लिए हेयर मास्क लगाना न भूलें.

कैसे पाएं दोमुंहे बालों से छुटकारा

– सनस्क्रीन लोशन को केयोकार्पिन तेल के साथ मिक्स कर के बालों की जड़ों में लगाने से दोमुंहे बालों से छुटकारा मिलता है.

– दो अंडों को संतरे के रस और केले के साथ मिला कर उस का पेस्ट हेयर मास्क की तरह भी बालों में अप्लाई करने से फायदा मिलता है.

– पके हुए पपीते में आधा कप दही मिला कर बालों में लगाने से बाल चमकदार होने के साथ साथ दोमुंहे बालों की समस्या से भी छुटकारा मिलेगा.

– एक चम्मच शहद में थोड़ा सा दही मिला कर लगाने से बाल सॉफ्ट होने के साथ साथ दोमुंहे बालों से भी राहत मिलती है.

गरमी में ये टिप्स आजमाएंगी, तो लंबे समय तक टिका रहेगा मेकअप

गरमी के मौसम में त्वचा का खास खयाल रखना पड़ता है. मेकअप करने से पहले चेहरे को अच्छी तरह साफ कर लें. इस के लिए कौटन का प्रयोग करें. आईलाइनर और आई मेकअप हटाने के लिए इयरबड का प्रयोग करें. चेहरे पर मेकअप करने से पहले लाइटर टोन का लेप लगाएं.

आंखों के आसपास के धब्बों को हटाने के लिए नारंगी टोन लगाएं. लिपलाइनर से होंठों को बेस दें. यदि आंखों का मेकअप भारी है, तो होंठों का मेकअप हलका रखें. इस मौसम में होंठों पर गुलाबी और नारंगी रंग का ज्यादा प्रयोग करें और मेकअप बहुत ही सफाई से करें.

कंसीलर: गरमी के मौसम में फाउंडेशन चेहरे को थोड़ा हैवी दिखा सकता है, इसलिए इस के प्रयोग से बचें. इस की जगह कंसीलर का प्रयोग करें. यह चेहरे से दागधब्बों को मिटाता है.

अगर सिंपल दिखना है, तो लिक्विड कंसीलर का उपयोग करें. चेहरे पर कंसीलर या फाउंडेशन किसी ठंडी जगह बैठ कर ही अप्लाई करें. इस से मेकअप करते समय पसीना नहीं आएगा और कंसीलर भी सही तरह से लगेगा.

काजल: अगर आप हलका मेकअप कर रही हैं, तो काजल भी हलका ही लगाएं. अगर रात की पार्टी में जा रही हों तो उस समय आंखों को हाईलाइट करने के लिए गाढ़ा काजल लगाएं. अगर चाहती हैं कि आईलाइनर व आईशैडो लंबे समय तक आंखों पर टिके रहें, तो काजल लगाने से पहले आंखों के नीचे कौंपैक्ट पाउडर लगाएं, फिर काजल. इस से काजल फैलेगा नहीं. आंखों में लिक्विड आईलाइनर का प्रयोग न करें.

साड़ी या सूट जैसा पारंपरिक परिधान पहनने का वक्त सब से अधिक त्योहारों के दौरान होता है. लेकिन आप वैस्टर्न कपड़े पहनती हैं तो सब से बड़ी समस्या मेकअप को ले कर होती है, क्योंकि वैस्टर्न कपड़ों के साथ दूसरी तरह का और साड़ी या सूट के साथ दूसरी तरह का मेकअप किया जाता है.

इसलिए जरूरी है कि मेकअप से पहले कुछ बातों का खयाल रखा जाए. अपनी ड्रैस के अनुसार नहीं, बल्कि अपने चेहरे के रंग के अनुसार मेकअप का चुनाव करें. अगर 2 रंग हैं, तो आईशैडो को अच्छी तरह ब्लैंड करें.

फाउंडेशन: अकसर फाउंडेशन के सही रंग का चुनाव करने में दुविधा होती है. जब भी फाउंडेशन के रंग का चुनाव करें तो यह देख लें कि आप के फेस में कौन सा रंग सब से अधिक ब्लैंड हो रहा है. लेकिन एक व्यक्ति के चेहरे पर कई तरह के शेड्स होते हैं, इसलिए यह भी जानना जरूरी है कि आप फाउंडेशन का टैस्ट किस जगह करें.

अगर एक रंग पूरे फेस को कवर नहीं कर रहा है तो 2 रंगों का चुनाव कर सकती हैं. बेस को जौ लाइन पर टैस्ट करें, क्योंकि यह जगह गरदन और चेहरे दोनों को कवर करती है. फिर आप ने जिन रंगों का चुनाव किया है उन्हें चेहरे पर लगा कर चैक कर लें.

हाफ वे आईलाइनर: इसे आंख के बीच में से शुरू कर के लगाना है. फिर इसे अच्छी तरह भर दें. नीचे की ओर से भी लगाएं. आईलाइनर अपने हिसाब से चुन सकती हैं. आईलिड्स छोटी हैं, तो आईलाइनर को सूखने दें. मसकारा भी लगाएं. नीचे की भौंहों को छोड़ें नहीं. सब से पहले आई मेकअप करें फिर बाकी मेकअप.

बालों के कलर के हिसाब से मेकअप का तरीका: अगर आप के बालों का कलर ब्राउन है, तो आप न्यूड मेकअप का औप्शन अपना सकती हैं. इस मेकअप में लिपग्लौस और मसकारा जरूर शामिल करें. लेकिन इस तरह के हलके मेकअप में अपनी आईब्रोज को डिफाइन करना न भूलें. ब्राउन हेयर टोन के साथ पीच, ब्रौंज और दूसरे न्यूट्रल कलर्स के ब्लश भी आप इस्तेमाल कर सकती हैं.

आंखों के लिए मैटेलिक क्रीम बेस्ड आईशैडो लगाएं. टाइगर आई कलर के साथ नैचुरल मेकअप परफैक्ट रहेगा. यह आप के बालों के कलर को तो हाईलाइट करेगा ही, साथ ही आप को अट्रैक्टिव लुक भी देगा.

– डा. नरेश अरोड़ा, संस्थापक, चेज ऊरोमाथेरैपी कास्मैटिक्स

फेसबुक खंडे ट्विटर द्वीपे : मौडर्न जमाने में ये हैं लड़ाई के मैदान

दिनरात मेरे जैसे जिस भी लिच्चड़ को जहां भी देखो, जब भी देखो, कोई सपने से लड़ रहा है तो कोई अपने से लड़ रहा है. कोई धर्म से लड़ रहा है तो कोई सत्कर्म से लड़ रहा है. कोई प्रेम के चलते खाप से लड़ रहा है तो कोईकोई जेबखर्च के लिए बाप से लड़ रहा है. फौजी बौर्डर पर लड़ रहा है तो मौजी संसद में लड़ रहा है. कोई ईमानदारी से लड़ रहा है तो कोई अपनी लाचारी से लड़ रहा है. कोई बीमारी से लड़ रहा है तो कोई अपनी ही खुमारी से लड़ रहा है. आप जैसा हाथ में फटा नोट लिए महंगाई से लड़ रहा है तो मोटा आदमी अपनी बीजी फसल की कटाई से लड़ रहा है. कुंआरा पराई लुगाई से लड़ रहा है तो शादीशुदा उस की वफाई से लड़ रहा है. मतलब हरेक अपने को लड़ कर व्यस्त रखे हुए है. जिस की बाजुओं में दम है वह बाजुओं से लड़ रहा है. जिस की बाजुओं में दम नहीं वह नकली बट्टेतराजुओं से लड़ रहा है.

लड़ना हर जीव का मिशन है. लड़ना हर जीव का विजन है. मेरे जैसे जीव की क्लास का वश चले तो वह मरने के बाद भी लड़ता रहे. मित्रो, हर दौर में कुछ करना हमारा धर्म रहा हो या न रहा हो, पर लड़ना हम मनुष्यों का धर्म जरूर रहा है. लड़ना हमारा कर्म रहा है. लड़ना हमारे जीवन का मर्म रहा है. लड़ना हमारे जीवन के लक्ष्य का चरम रहा है. लड़ना सब से बड़ा सत्कर्म रहा है. हम लड़तेलड़ते पैदा होते हैं और लड़तेलड़ते मर जाते हैं.

मेरे बाप के दौर की अपनी लड़ाई थी. निहायत शरीफ किस्म की. पर गया अब वह जमाना जब बंदा रोटी से लड़ता था. गया अब वह जमाना जब बंदा लंगोटी से लड़ता था. गया अब वह जमाना जब बंदा धोती से लड़ता था. गया अब वह जमाना जब बंदा खेत से लड़ता था. गया अब वह जमाना जब बंदा पेट से लड़ता था. कुल मिला कर हम सभी अपनेअपने समय में अपनेअपने साहसदुसाहस के हिसाब से लड़ते रहे हैं. हमारे हाल देख कर उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे भी हमजैसे कारणअकारण दिलोजान से लड़ते रहेंगे.

अब उन्हें ही देखिए, वे बूढ़े हो गए. पर उन का लड़ना नहीं गया. मुंह में एक असली दांत तक नहीं, पर दूसरे के जिस्म में दांतों का गड़ना नहीं गया. हम महल्ले में पानी की बाल्टी के लिए लड़े तो वे कुरसी के लिए संसद में, जिस में जितनी ताकत उस ने उतनी बड़ी कुरसी एकदूसरे पर दे मारी. जिस के बाजुओं में कम ताकत, उस ने फाइल ही उन के मुंह पर दे मारी. कुरसी लड़ाई में टूट गई बेचारी, पर उन्होंने लड़ने की हिम्मत न हारी. बंधुओ, हम सांस लिए बिना रह सकते हैं, पर लड़े बिना नहीं रह सकते. अगर हम एक मिनट को लड़ना बंद कर दें तो दूसरे ही पल हमारा दम घुट जाए. हमारा जिंदा रहने के लिए लड़ना बहुत जरूरी है. तभी तो हर आदमी अपनी हिम्मत के हिसाब से लड़ रहा है.

पर अब समय तेजी से बदल रहा है, भाईसाहब. सो, लड़ने के तरीके भी बदल रहे हैं. कुछ ज्ञानजीवी कहते हैं कि हम महामानव होने के युग में प्रवेश कर गए हैं. हम सभ्य हैं, ऐडवांस हैं, साहब. सो, अब हम लड़ते नहीं, भिड़ते हैं. लड़ने के परंपरागत तरीके, माफ कीजिएगा, अब तथाकथित सभ्यों ने छोड़ दिए हैं. आप आज भी जो परंपरागत ढंग से लड़ रहे हो तो अपने को पिछड़ा मान लीजिए, प्लीज. मन को लड़ते हुए भी शांति मिलेगी. इस से पहले कि कोई आप को आप के मुंह पर ही पिछड़ा, गंवार, जाहिल और जो भी मन में आए बक कर मदमाता चला जाए, आप अपने लड़ने के तौरतरीके को जरा मौडर्न बना लें. खुद जाहिल ही रहें तो कोई बात नहीं. आज की तारीख में बंदा इंसानियत से कम, लड़नेभिड़ने के तरीकों से अधिक जानापहचाना जाता है.

आज के तथाकथित सभ्य अपने हाथपांव की उंगलियों के नाखून हाथपांव की उंगलियों में दिखाते नहीं, उन्हें दिमाग में सजाते हैं. आज के स्वयंभू सभ्य बड़ी सफाई से लड़ते हैं, बड़ी गहराई से लड़ते हैं, बड़ी चतुराई से लड़ते हैं. किसी को दिखता नहीं. पर मत पूछो वे लड़तेलड़ते कैसेकैसे आपस में भिड़ते हैं. अपनों की रहनुमाई में अपनों से ही मौका हाथ लगते ही पूरी ईमानदारी से सारे रिश्तेनाते भुला मन की गहराइयों से भिड़ते हैं. पर आमनेसामने हो कर नहीं, छिप कर. छिप कर लड़ना संभ्रांतों की प्रिय कला हो गई है. कमबख्त तकनीक ने कुछ और सिखाया हो या न हो, पर छिपछिप कर एकदूसरे से लड़ना कम, भिड़ना बड़े सलीके से जरूर सिखाया है.

आज के लड़ने में सिद्धहस्त, धुरंधर लड़ाके फेसबुक पर लड़ते हैं, बच्चों की तरह ट्विटर पर भिड़ते हैं. फेसबुक के घोड़े, ट्विटर के रथ पर चढ़ कर एकदूसरे पर अचूक वार करते हैं. पर जब एकदूसरे के आमनेसामने होते हैं तो ऐसे गले मिलते हैं कि न ही पूछो तो भला. वे लड़ने के लिए बाजुओं, टांगों का नहीं, तकनीक का दुरुपयोग करते हैं. इधर से वे ट्विटर पर शब्दभेदी बाण चलाते हैं तो उधर से वे ट्विटर के माध्यम से ही उन के बाण को धूल चटाते हैं. इधर से वह शब्द उन के मुंह पर मारता है तो उधर से वह चार शब्दों का तमाचा ट्विटर पर रसीद कर देता है. तमाचा पढ़ने वाला तिलमिला उठता है तो तमाचा लिखने वाला खिलखिला उठता है. आज के लड़ाके ट्विटर पर एकदूसरे से भिड़े होते हैं, हालांकि ऐसे तो मेरे गांव के मेले में आपस में झोटे भी नहीं भिड़ते थे.

देखते ही देखते ट्विटर पर, फेसबुक पर बेमसला तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो जाता है. एक अपने को जीत का श्रेय ले अपने को ट्विटर का सब से बड़ा नायक बता खुद ही अपनी पीठ थपथपाता है तो दूसरा उस को कायर बता कर अपने दिमाग को खुद ही बहलाताफुसलाता है. इसलिए ज्ञान के युग में शान से जीना है तो हे दोस्त, तू भी लड़नेभिड़ने के नए तरीके अपना मौडर्न हो जा. अपनों से फेसबुक, ट्विटर पर लड़तेभिड़ते परमपद पा. चल उठ, देश के लिए नहीं, फेसबुक, ट्विटर के लिए शहीद हो जा. आने वाली पीढि़यां तेरे गुणगान गाएंगी. तुझ में अपने समय का अवतार पाएंगी.

जिन्ना पर जंग, धार्मिक उन्माद का राजनीतिक रंग

दिल्ली से 130 किलोमीटर दूर स्थित अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी का जिन्ना विवाद 1,920 किलोमीटर दूर कनार्टक के चुनावी समर का प्रमुख अस्त्र बना. जिन्ना पर जंग ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि सांप्रदायिक मुद्दों को भड़का कर लाभ उठाने में भाजपा का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है. कर्नाटक चुनाव में धार्मिक मुद्दों की राजनीति से भाजपा वहां सब से ज्यादा सीटें जीतने में सफल हो गई. जिन्ना पर जंग में खास बात यह थी कि इस में पाकिस्तान और जिन्ना का तड़का लगा हुआ था, जो सांप्रदायिक रसोई का सब से तड़केदार मसाला है. ऐसे में कट्टरपंथियों को इस का स्वाद बेहद पसंद आया. जो तसवीर 80 साल से विश्वविद्यालय की पुरानी दीवार पर लटकी थी, अचानक चर्चा के केंद्रबिंदु में आ गई. जिन्ना पर जंग का असर उत्तर प्रदेश में होने जा रहे उपचुनाव के दौरान धार्मिक धुव्रीकरण के रूप में दिखेगा. भाजपा इस बहाने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलितमुसलिम गठजोड़ को तोड़ना चाहती है, कैराना और नूरपुर के उपचुनाव इस का एसिड टैस्ट साबित होंगे.

भड़काऊ मुद्दे की तलाश किसी भी मुद्दे को कैसे धार्मिक रंग दे कर भड़काया जाता है, फिर उस के नाम पर सियासत की जाती है, अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी का जिन्ना विवाद इस का जीताजागता उदाहरण है. जिन्ना के नाम पर जंग उस समय शुरू हुई जब दक्षिणभारत में कर्नाटक विधानसभा का महत्त्वपूर्ण चुनाव चल रहा था.

कर्नाटक विधानसभा का चुनाव भाजपा के लिए कितना महत्त्वपूर्ण था, इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 41 जनसभाएं कीं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कनार्टक विधानसभा चुनाव में सब से बड़े स्टारप्रचारक बन कर उभरे. नरेंद्र मोदी ने जहां देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ले कर तमाम विवादित बयान दिए, वहीं योगी आदित्यनाथ भाजपा के धार्मिक रंग को गहरा करते रहे. कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद इसी महीने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के उपचुनाव होने हैं. भाजपा उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर जैसी महत्त्वपूर्ण लोकसभा सीटें उपचुनाव में हार चुकी है. ऐसे में कैराना और नूरपुर के लिए उसे धार्मिक धु्रवीकरण की बेहद जरूरत थी. अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी का जिन्ना विवाद इस के लिए सब से मुफीद जरिया बन सकता था. सो, भाजपा ने इस के लिए रणनीति तैयार की. सब से पहले भाजपा के सांसद सतीश गौतम ने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी यानी एएमयू के कुलपति को पत्र लिखा. पत्र में सांसद सतीश गौतम ने कहा कि अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ कार्यालय में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो को हटाया जाए. अप्रैल में लिखे गए इस पत्र पर बहुत चर्चा नहीं हो पाई.

विवाद को हवा पहली मई को उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य कानपुर में सामूहिक विवाह समारोह में हिस्सा लेने आए तो जिन्ना को ‘भारत का महापुरुष’ कह दिया. स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा के मूल वर्ग से नहीं आते हैं. भाजपा से पहले वे बहुजन समाज पार्टी में थे. स्वामी प्रसाद मौर्य डाक्टर भीमराव अंबेडकर, कांशीराम और मायावती के विचारों के पोषक रहे हैं. ऐसे में वे भाजपा के ‘कोर हिंदुत्व’ से दूर माने जाते हैं.

पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की फोटो हटाने के बयान पर अपनी राय देते उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम और सेवायोजन विभाग के कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि महापुरुषों के बारे में अनर्गल बयान देने वाले नेता चाहे उन की पार्टी के हों या दूसरे दलों के, वे उन की निंदा करते हैं. जब उन से यह पूछा गया कि क्या वे मोहम्मद अली जिन्ना को भारत का महापुरुष बता रहे हैं? तो उन्होंने ने कहा कि अंगरेजों के खिलाफ लड़ाई में जिन्ना का बड़ा योगदान रहा है. वे भारत के भी महापुरुष हैं. अगर उन पर कोई उंगली उठाता है तो हम सोचते हैं कि वह घटिया सोच है. एक तरफ भाजपा के अलीगढ़ से ही सांसद सतीश गौतम जिन्ना की तसवीर के विवाद की जड़ में हैं वहीं दूसरी तरफ भाजपा की उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिन्ना को भारत का महापुरुष बता दिया. मीडिया में चल रहे इस विवाद को हवा देने का काम हिंदू जागरण मंच ने किया. हिंदू जागरण मंच के कार्यकताओं ने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के परिसर में घुस कर कुलपति का पुतला फूंका और सुरक्षाकर्मियों के साथ मारपीट की. ये लोग विश्वविद्यालय से जिन्ना की तसवीर हटाने की मांग कर रहे थे. यहां हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं और अलीगढ़ छात्रसंघ के पदाधिकारियों का टकराव हो गया. इस के बाद बवाल, लाठीचार्ज और धरनाप्रदर्शन शुरू हो गया. अलीगढ़ के कमिश्नर अजय दीप सिंह को सोशल मीडिया और इंटरनैट सेवाओं को कुछ समय के लिए रोकना पड़ा.

राजनीतिक रंग

अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के छात्रों ने सर सैयद गेट पर धरना देना शुरू किया. यह कई दिनों तक जारी रहा. यूनिवर्सिटी में शुरू हुई जिन्ना पर जंग कर्नाटक चुनाव के संगसंग चलती रही. यह जंग फौरीतौर पर शांत भले दिख रही हो पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस घटना ने हिंदूमुसलिम के बीच फिर से दूरियां बढ़ाने का काम किया है. उत्तर प्रदेश के कैराना और नूरपुर के उपचुनावों में जिन्ना पर जंग का राजनीतिक रंग दिखाई देगा. कैराना और नूरपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जिले की प्रमुख सीटें हैं. यहां जाट, मुसलिम टकराव सियासी नफानुकसान का बड़ा जरिया होता है. सहारनपुर में दलित, सवर्ण विवाद के प्रभाव को कम करने के लिए भी जिन्ना वि?वाद का सहारा लिया जा रहा है. दलित-सवर्ण विवाद के कारण भाजपा को नूरपुर उपचुनाव जीतना कठिन है. सहारनपुर सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों की अगुआई करने वाली भीमसेना ने भाजपा से दलितों को अलग कर दिया है. अपना दल की प्रदेश अध्यक्ष पल्लवी पटेल ने जिन्ना की जंग को धार्मिक उन्माद बढ़ाने वाली घटना बताया. पल्लवी पटेल की बहन अनुप्रिया पटेल भाजपा की केंद्र सरकार में मंत्री हैं. पहले वे अपना दल में ही थीं, बाद में अपना दल के 2 हिस्से हो गए. अनुप्रिया पटेल ने अपना दल एम के नाम से अलग पार्टी बना कर भाजपा का साथ जारी रखा है. दूसरी तरफ अपना दल पल्लवी पटेल की अगुआई में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.

पल्लवी पटेल ने कहा कि भाजपा की केंद्र और प्रदेश की सरकारें जनता से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज कर सिर्फ जुमलों की राजनीति कर रही हैं. विकास के मुद्दे से जनता का ध्यान हटाने के लिए धार्मिक उन्माद को बढ़ावा दिया जा रहा है. भाजपा ने एएमयू से जिन्ना की तसवीर हटाने की मांग की है, जबकि महाराष्ट्र में जिन्ना हाउस की देखभाल भाजपा की ही सरकार कर रही है. पश्चिम उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए कमजोर कड़ी है. 2019 के लोकसभा चुनावों में यहां दलित भाजपा से हट सकते हैं. ऐसे में जिन्ना की तसवीर जैसे विवाद धार्मिक धु्रवीकरण के लिए मुफीद हो सकते हैं. राजनीतिक नफानुकसान के लिए किसी भी घटना को रस्सी से सांप कैसे बनाया जा सकता है, जिन्ना विवाद इस की मिसाल है. जिन्ना को 1938 में अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में लाइफटाइम मैंबरशिप दी गई थी तभी से वहां उन की तसवीर लगी है. औल इंडिया मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड के अध्यक्ष जफरयाब जिलानी कहते हैं, ‘‘जिन्ना की तसवीर 80 साल पुरानी है. ऐसे मेें अब इस की याद क्यों आई? यह केवल चुनावी मुद्दा है और राजनीति के लिए उठाया गया है.’’

जफरयाब जिलानी अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं. उन का कहना है कि यह उन की अपनी राय है. ऐसे मुद्दे बारबार समयसमय पर चुनावी लाभ के लिए खूब उठाए जाते हैं. सरकार का मकसद भी जिन्ना की तसवीर को हटाना नहीं, बल्कि मुद्दे को केवल हवा देना है. अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के अध्यक्ष मशकूर अहमद ने कहा, ‘‘सरकार जनता का ध्यान भटकाने के लिए जिन्ना मुद्दे को तलाश कर लाई है. पहले जेएनयू, डीयू, बीएचयू और अब एएमयू को निशाने पर लिया जा रहा है.

‘‘सरकार एक नोटिस भेजे तो हम एएमयू के यूनियन हौल में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की तसवीर को उतार कर फेंक देंगे.’’ दरअसल, सरकार केवल मुद्दे को उठाना चाहती है, उसे जिन्ना की तसवीर को हटाने या न हटाने से लेनादेना नहीं है.

मोबाइल सेवा उपभोक्ताओं की शिकायत के समाधान की नई व्यवस्था

मोबाइल आज हर हाथ का उपकरण बन गया है और हर माह इस का उपयोग करने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है. गांव से ले कर शहर तक परिवार के हर सदस्य के पास मोबाइल फोन है. बिना अक्षरज्ञान वाले लोग भी अपने विशिष्ठ कौशल का इस्तेमाल कर मोबाइल फोन का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं. मुश्किल यह है कि दूरसंचार कंपनियां मोबाइल फोन के हर हाथ में पहुंचने का जम कर फायदा उठा रही हैं, लुभावने औफर दे कर ग्राहकों का अनापशनाप पैसा काट रही हैं. इस से आम उपभोक्ता परेशान है. कंपनियां उपभोक्ताओं की शिकायतें सुनने को तैयार नहीं हैं.

कई कंपनियों के ग्राहक सेवा केंद्र पर फोन करने से पता चलता है कि उन की समस्या सुनने वाला कोई नहीं है. सिर्फ रिकौर्डेड आवाज आती है और ग्राहक सेवा के निस्तारण के लिए अधिकृत व्यक्ति तक साधारण उपभोक्ता पहुंच ही नहीं पाता. कुछ कंपनियों के ग्राहक सेवा केंद्र में यदि यह संभव होता है तो कई बार उस का ग्राहक सेवा अधिकारी बता देता है कि वह ग्राहक की सेवा का निस्तारण नहीं कर सकता है.

एक आंकड़े के अनुसार, हर तिमाही में मोबाइल ग्राहकों की 1 करोड़ शिकायतें मिल रही हैं, लेकिन संतोषजनक ढंग से उन की बात सुनने वाला कोई नहीं है. कंपनियां ग्राहकों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेती हैं, लेकिन अब इन समस्याओं को सुलझाने के लिए लोकपाल का गठन किया जा रहा है.

दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के अनुसार, इस तरह की शिकायतों के समाधान के लिए लोकपाल पद सृजित किया जा रहा है. सरकार से इस की मंजूरी मिलने का आग्रह किया गया है. मंजूरी मिलने के बाद जल्द ही जरूरी कदम उठाए जाएंगे. नियामक सेवा प्रदाताओं पर दबाव डालेगा कि उन्हें हर हाल में ग्राहकों की शिकायतें सुननी हैं.

सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट : बढ़ रही है दोनों के बीच की खाई

सरकार और उच्चतम न्यायालय के बीच खाई बढ़ती जा रही है. हालांकि कई न्यायाधीशों को सरकारी इशारे पर चलने के खुले संकेत दिए जा रहे हैं, सभी न्यायाधीशों की सामूहिक आवाज के कारण सरकारपसंद न्यायाधीश भी चुपचुप हैं और न्यायाधीशों के मामले में बहुमत का आदर करने को विवश हैं. भारतीय जनता पार्टी जानबूझ कर ऐसे न्यायाधीशों को उच्चतम न्यायालय में भेजना चाहती है जो उस की नीतियों का समर्थन करते हैं. अमेरिका में यह खुल्लमखुल्ला चर्चा होती है कि कौन सा न्यायाधीश किस राष्ट्रपति ने नियुक्त किया था और वह किस मसले पर कैसा निर्णय देगा. हमारे न्यायाधीश पिछले 3-4 दशकों से खासे स्वतंत्र रहे हैं और वे खुद ही नए न्यायाधीश नियुक्त करते रहे हैं और इस प्रक्रिया को सरकार भी मानती रही.

न्यायाधीशों की नियुक्ति यदि न्यायाधीश खुद करें तो अच्छा है, क्योंकि वे फिर किसी तरह से भी मनमानी नहीं कर सकते. न्यायाधीश दक्षिणपंथी हों या वामपंथी, उन के पास चूंकि सरकार की शक्तियां नहीं होतीं, वे गलत फैसले नहीं ले सकते. वे डाक्टरों की तरह हैं जो फैसले मरीज को देख कर करते हैं और डाक्टरों की नियुक्ति चाहे वरिष्ठ डाक्टर करें या सरकार. सरकारी नीतियों को तो इलाज में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इसी तरह न्याय सामाजिक, पारिवारिक, व्यावसायिक, सरकारी बीमारियों का इलाज है और सरकार या लिटिगैंट खुद न्यायाधीश नियुक्त करेंगे तो गलत निर्णय होंगे ही. न्याय नहीं चाहता कि मरीज बेमौत मारा जाए.

उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ से केंद्र की भाजपा सरकार चिढ़ी हुई है, क्योंकि उन्होंने कुछ वर्षों पहले भारतीय जनता पार्टी को विधायकों की खरीदफरोख्त के बल पर सत्ता में आने से रोक दिया था. सरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करने पर सहमत नहीं हो रही है और न्यायाधीश उन्हें नियुक्त करने की सिफारिश भेज चुके हैं. न्यायपालिका और कार्यपालिका का यह द्वंद्व पुराना है पर अब तक काम चल रहा था. अब डर लग रहा है कि चुनाव आयोग की तरह यह संस्था भी सरकारी नकाब न पहन ले और इंदिरा गांधी का युग वापस न आ जाए जब न्यायाधीश बनते ही प्रधानमंत्री की सिफारिश पर थे.

यह खतरनाक होगा क्योंकि आजकल फिर देश खेमों में बंटने लगा है. विकास के सपने देखने वाला देश एक रहे और गृहयुद्ध जैसी स्थिति न आ जाए, यह डर लगने लगा है. देश में उदारपंथियों के साथसाथ दलितों और मुसलिमों को निशाना बनाया जा रहा है. और ऐसे में पूर्व मुख्य न्यायाधीश मदन मोहन पुंछी की तरह न्यायाधीश कट्टर होने लगे तो देश का रंग लाल, हरे, काले की तरह भगवा हो जाएगा.

मेरी भाभी भैया को न चाह कर मेरे साथ जिस्मानी संबंध बनाती हैं. मेरे भैया को इस बारे में सब पता है. मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 26 साल का एक बीए पास नौजवान हूं और एक कौल सैंटर में काम करता हूं. मेरी भाभी भैया को न चाह कर मेरे साथ जिस्मानी संबंध बनाती हैं. 

मेरे भैया को इस बारे में सब पता है. वे कहते हैं कि तुम दोनों देवरभाभी आपस में शादी कर लो. मेरी भाभी भी मेरे साथ शादी करना चाहती हैं. मैं क्या करूं?

जवाब
कोई भी शौहर अपनी बीवी के शारीरिक संबंध भाई से तो क्या किसी भी मर्द से बरदाश्त नहीं कर पाता है, फिर आप का भाई क्यों बीवी को तोहफे की तरह दे रहा है?

मुमकिन है कि आप की भाभी के स्वभाव में कोई कमी हो या आप के भाई में ही कोई कमजोरी हो जिस के चलते भाई उस से छुटकारा पाना चाहता है.

सबकुछ ठीकठाक लगे तो आप अपनी भाभी से शादी कर सकते हैं, पर उस के पहले आप के भाई को उसे तलाक देना पड़ेगा.

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देवर पर भारी पड़ा भाभी से संबंध

‘‘अरे वाह देवरजी, तुम तो एकदम मुंबइया हीरो लग रहे हो,’’ सुशीला ने अपने चचेरे देवर शिवम को देख कर कहा.

‘‘देवर भी तो तुम्हारा ही हूं भाभी. तुम भी तो हीरोइनों से बढ़ कर लग रही हो,’’ भाभी के मजाक का जवाब देते हुए शिवम ने कहा.

‘‘जाओजाओ, तुम ऐसे ही हमारा मजाक बना रहे हो. हम तो हीरोइन के पैर की धूल के बराबर भी नहीं हैं.’’

‘‘अरे नहीं भाभी, ऐसा नहीं है. हीरोइनें तो  मेकअप कर के सुंदर दिखती हैं, तुम तो ऐसे ही सुंदर हो.’’

‘‘अच्छा तो किसी दिन अकेले में मिलते हैं,’’ कह कर सुशीला चली गई. इस बातचीत के बाद शिवम के तनमन के तार झनझना गए. वह सुशीला से अकेले में मिलने के सपने देखने लगा. नाजायज संबंध अपनी कीमत वसूल करते हैं. यह बात लखनऊ के माल थाना इलाके के नबी पनाह गांव में रहने वाले शिवम को देर से समझ आई. शिवम मुंबई में रह कर फुटकर सामान बेचने का काम करता था. उस के पिता देवेंद्र प्रताप सिंह किसान थे. गांव में साधारण सा घर होने के चलते शिवम कमाई करने मुंबई चला गया था. 4 जून, 2016 को वह घर वापस आया था.

शिवम को गांव का माहौल अपना सा लगता था. मुंबई में रहने के चलते वह गांव के दूसरे लड़कों से अलग दिखता था. पड़ोस में रहने वाली भाभी सुशीला की नजर उस पर पड़ी, तो दोनों में हंसीमजाक होने लगा. सुशीला ने एक रात को मोबाइल फोन पर मिस्ड काल दे कर शिवम को अपने पास बुला लिया. वहीं दोनों के बीच संबंध बन गए और यह सिलसिला चलने लगा. कुछ दिन बाद जब सुशीला समझ गई कि शिवम पूरी तरह से उस की गिरफ्त में आ चुका है, तो उस ने शिवम से कहा, ‘‘देखो, हम दोनों के संबंधों की बात हमारे ससुरजी को पता चल गई है. अब हमें उन को रास्ते से हटाना पड़ेगा.’’ यह बात सुन कर शिवम के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. सुशीला इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी. वह बोली, ‘‘तुम सोचो मत. इस के बदले में हम तुम को पैसा भी देंगे.’’ शिवम दबाव में आ गया और उस ने यह काम करने की रजामंदी दे दी. नबी पनाह गांव में रहने वाले मुन्ना सिंह के 2 बेटे थे. सुशीला बड़े बेटे संजय सिंह की पत्नी थी. 5 साल पहले संजय और सुशीला की शादी हुई थी.

सुशीला उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के महराजगंज थाना इलाके के मांझ गांव की रहने वाली थी. ससुराल आ कर सुशीला को पति संजय से ज्यादा देवर रणविजय अच्छा लगने लगा था. उस ने उस के साथ संबंध बना लिए थे. दरअसल, सुशीला ससुराल की जायदाद पर अकेले ही कब्जा करना चाहती थी. उस ने यही सोच कर रणविजय से संबंध बनाए थे. वह नहीं चाहती थी कि उस के देवर की शादी हो. इधर सुशीला और रणविजय के संबंधों का पता ससुर मुन्ना सिंह और पति संजय सिंह को लग चुका था. वे लोग सोच रहे थे कि अगर रणविजय की शादी हो जाए, तो सुशीला की हरकतों को रोका जा सकता है. सुशीला नहीं चाहती थी कि रणविजय की शादी हो व उस की पत्नी और बच्चे इस जायदाद में हिस्सा लें.

लखनऊ का माल थाना इलाका आम के बागों के लिए मशहूर है. यहां जमीन की कीमत बहुत ज्यादा है. सुशीला के ससुर के पास  करोड़ों की जमीन थी. सुशीला को पता था कि ससुर मुन्ना सिंह को रास्ते से हटाने के काम में देवर रणविजय उस का साथ नहीं देगा, इसलिए उस ने अपने चचेरे देवर शिवम को अपने जाल में फांस लिया. 12 जून, 2016 की रात मुन्ना सिंह आम की फसल बेच कर अपने घर आए. इस के बाद खाना खा कर वे आम के बाग में सोने चले गए. वे पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने ससुर मुन्ना सिंह के जाते ही पति संजय और देवर रणविजय को खाना खिला कर सोने भेज दिया. जब सभी सो गए, तो सुशीला ने शिवम को फोन कर के गांव के बाहर बुला लिया.

शिवम ने अपने साथ राघवेंद्र को भी ले लिया था. वे तीनों एक जगह मिले और फिर उन्होंने मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. उन तीनों ने दबे पैर पहुंच कर मुन्ना सिंह को दबोचने से पहले चेहरे पर कंबल डाल दिया. सुशीला ने उन के पैर पकड़ लिए और शिवम व राघवेंद्र ने उन को काबू में कर लिया. जान बचाते समय मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गए. वहीं पर उन दोनों ने गमछे से गला दबा कर उन की हत्या कर दी. मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार, 2 सौ रुपए मिले. शिवम ने 45 सौ रुपए राघवेंद्र को दे दिए. इस के बाद वे तीनों अपनेअपने घर चले गए. सुबह पूरे गांव में मुन्ना सिंह की हत्या की खबर फैल गई. उन के बेटे संजय और रणविजय ने माल थाने में हत्या का मुकदमा दर्ज कराया. एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहू सुशीला पुलिस को बारबार गुमराह करने की कोशिश कर रही थी. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनों बेटों संजय और रणविजय से पूछताछ की, तो वे दोनों बेकुसूर नजर आए.

इस बीच गांव में यह पता चला कि सुशीला के अपने देवर रणविजय से नाजायज संबंध हैं. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ की, तो उस की कुछ हरकतें शक जाहिर करने लगीं. एसओ माल विनय कुमार सिंह ने सीओ, मलिहाबाद मोहम्मद जावेद और एसपी ग्रामीण प्रताप गोपेंद्र यादव से बात कर पुलिस की सर्विलांस सैल और क्राइम ब्रांच की मदद ली. सर्विलांस सैल के एसआई अक्षय कुमार, अनुराग मिश्रा और योगेंद्र कुमार ने सुशीला के मोबाइल को खंगाला, तो  पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम का फोन देखा, तो उस में राघवेंद्र का नंबर मिला. इस के बाद पुलिस ने राघवेंद्र, शिवम और सुशीला से अलगअलग बात की. सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उस के देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था.

सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे, तो वह अकेली पूरी जायदाद की मालकिन बन जाएगी, पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने तीनों को साथ बिठाया, तो सब ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. 14 जून, 2016 को पुलिस ने राघवेंद्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया. वहां से उन तीनों को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ़ साला बेटे को जेल ले गई. उस की 4 साल की बेटी को पिता संजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते समय सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. वह शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि हत्या करते समय उस ने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड़ रखे थे.

शुरु करने जा रहे हैं नई वेबसाइट तो इन बातों का रखें खयाल

छोटे कौर्पोरेट हों या बड़े, सबकी वेबसाइट होती है. घर बैठे कोई काम करना हो या आनलाइन शापिंग करनी हो, इस युग में वेबसाइट हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है. आज के समय में लोगों के पास वक्त की काफी कमी है. वे चाहते हैं कि हर काम आसानी से हो जाए इसलिए वे वेबसाइट का प्रयोग करते हैं. इतना ही नहीं लोग बिजनेस को भी बढ़ाने के लिए मोबाइल एप्लीकेशन और डिजिटल मार्केटिंग का उपयोग बहुत तेजी से कर रहे हैं.

वैसे तो आज को समय में वेबसाइट बनाना बेहद आसान है पर वेबसाइट बनाते समय कई चीजें ऐसी होती है जिनमें आप गलतियां कर देते है, जो आपके सामने समस्याएं खड़ी कर देती हैं. अगर आपके बिजनेस की कोई वेबसाइट बनी हुई है या आप उसके माध्यम से बिजनेस करना चाहते हैं या वेबसाइट का उपयोग किसी भी सकारात्मक उद्देश्य से करना चाहते हैं तो आपको कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए. जानते हैं इनके बारे में-

जरूरत से ज्यादा इमेजेज

वेबसाइट पर इमेज यूजर्स को आकर्षित करती हैं, पर जब वेबसाइट पर इमेजेज और एनीमेशन अधिक हों तो वेबसाइट के ओपन होने का समय बढ़ जाता है और यूजर के दिमाग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है.

खराब नेविगेशन

एक वेबसाइट के अंदर नेविगेशन सरल होना चाहिए. यूजर्स अपनी जरूरतों की चीजों तक पहुंचने के लिए अपना रास्ता खोज सके. इन चीजों के लिए वेब डवलपर बेड कम टेक्नीक का इस्तेमाल करते हैं. आपको यह समझना जरूरी है कि नेविगेशन सहज और सुसज्जत होने से काफी फायदा होता है.

इनपुट एंट्री फौर्म

वेबसाइट के अंदर इनपुट एंट्री फौर्म का अहम रोल होता है. कुछ लोग लीड्स जनरेट करने के लिए एंट्री फौर्म भरवाते हैं, कुछ आनलाइन प्रोडक्ट सेल करने के लिए रजिस्ट्रेशन फौर्म भरवाते हैं तो कुछ सदस्य बनाने के लिए फौर्म भरवाते हैं. इस प्रकार के फौम्र्स जटिल नहीं होने चाहिए.

अनफ्रेंडली स्क्रीन रेज्योल्यूशन

आज के दौर में लोग वेबसाइट को हर तरह के डिवाइस में ओपन करने का प्रयास करते हैं. यूजर मोबाइल फोन, लेपटौप, डेस्कटौप, टैबलेट आदि में वेबसाइट ओपन करना चाहता है. इसके लिए जरूरी है कि आपकी वेबसाइट का स्क्रीन रेज्योल्यूशन रेस्पॉन्सिबल होना चाहिए.

बैकग्राउंड म्यूजिक से बचें

यूजर वेबसाइट में मनोरंजन नहीं चाहते. वे दक्षता खोजते हैं. यह बात सही है कि 99 प्रतिशत वेब डवलपर अपनी वेबसाइट में बैकग्राउंड म्यूजिक का प्रयोग नहीं करते हैं, पर इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है .

कठिन कंटेंट का संग्रह

यह वेबसाइट डिजाइन का महत्वपूर्ण अंग है. अच्छा डिजाइन इंटरफेस यूजर को आकर्षित करता है पर यूजर को जरूरत की जानकारी को समझने के लिए कंटेंट को पूरा पढऩा पड़ता है. कुछ वेबसाइट विचित्र शैलियों और आकारों का उपयोग करती हैं, जिसे समझने में समस्या आती है. इसलिए यह जरूरी है कि आपकी वेबसाइट का कंटेंट सरल और सटीक हो.

सर्च इंजन में इंडेक्सिंग

यहां पर बात सर्च इंजन आप्टिमाइजेशन की नहीं की जा रही है. आमतौर पर उपयोगकर्ता आपकी वेबसाइट का नाम याद नहीं रख पाते हैं तो वे सर्च इंजन का उपयोग करते हैं, जिसमें आपके फर्म का नाम टाइप करते हैं और अगर आपकी वेबसाइट में प्रोपर इंडेक्सिंग हो तो सर्च इंजन यूआरएल पर तुरंत आपकी वेबसाइट दिखा देता है. इससे वेबसाइट को फायदा होता है.

सर्च बौक्स का महत्व

आपकी वेबसाइट कंटेंट को इकट्ठा रखती है. अगर आपकी वेबसाइट पर बहुत ट्रैफिक आ रहा है तो उपयोगकर्ता के सामने सर्च बौक्स रखना जरूरी हो जाता है ताकि वह अपनी जरूरत की जानकारी को सर्च करके तुरंत कम समय में देख सके. अगर सर्च बौक्स नहीं होगा तो आपके रीडर्स को मैन्युअली सर्च करना पड़ेगा जिससे उसे टाइम देना पड़ेगा और वह आपकी वेबसाइट दोबारा नहीं देखना चाहेगा.

आपकी जिंदगी आसान बनाएगा गूगल का ‘नेबरली’ ऐप !

गूगल इंडिया ने कुछ ही दिन पहले देश में नेबरली (Neighbourly) नामक एक नया ऐप शुरू किया. इस ऐप के जरिए लोग अपने आसपास की जानकारी हासिल कर पाएंगे. गूगल की ओर से कहा गया कि इस ऐप से लोगों को अपने क्षेत्र की जानकारी आसानी से मिलेगी और वे यह पता कर पाएंगे कि उनके आपपास में बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित पार्क कौन सा है. इसके अलावा बच्चों के लिए निजी ट्यूशन सेंटर की तलाश भी लोग इस ऐप की मदद से कर पाएंगे. इसी प्रकार लोग इस ऐप के जरिए अपने आसपास की कई अन्य तरह सूचनाएं प्राप्त कर सकते हैं.

इस ऐप पर लोग अपने सवाल टाइप कर या बोलकर जवाब प्राप्त कर सकते हैं. गूगल ने कहा, ‘ऐप पर आप अपनी निजी जानकारी दिए बगैर सवाल कर सकते हैं. नेबरली पर आपके सवाल तुरंत आपके सही पड़ोसी के पास पहुंच जाते हैं और वे वापस संबंधित जवाब और सूचनाएं आपको ऐप के जरिए देते हैं.

गूगल इंडिया ने एक ट्वीट के जरिए कहा, “मुंबई में आज इस ऐप का बीटा वर्जन उपलब्ध है. अगर आप किसी अन्य शहर में हैं तो वेटिंग लिस्ट में शामिल हो जाइए.” गूगल के नेक्स्ट बिलियन यूजर टीम के ग्रुप प्रोडक्ट मैनेजर जोश वुडवार्ड ने एक बयान में कहा, “नेबरली के साथ हम गूगल के मिशन को आगे बढ़ाते हुए एक नई तरीके की तलाश कर रहे हैं, जिससे दुनियाभर की सूचनाओं को संगठित किया जा सके.

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