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किसी राजा से कम नहीं सुनील शेट्टी का रुतबा, हर साल कमाते हैं करोड़ों

फिल्म इंडस्ट्री में फिटनेस और लग्जरी लाइफस्टाइल के लिए मशहूर सुनील शेट्टी आज अपना 57वां जन्मदिन मना रहे हैं. वह लंबे समय से लाइमलाइट से दूर हैं. पर अब उनकी बेटी अथिया और बेटा अहान बौलीवुड में एंट्री करने जा रहे हैं. बताते चले कि सुनील शेट्टी का लाइफस्टाइल किसी राजा से कम नहीं है. सुनील शेट्टी अभिनेता के साथ-साथ एक रेस्ट्रोरेंट, नाइट क्लब “पोपकौर्न” आदि के मालिक हैं. सुनील ने फिल्म ‘खेल’, ‘रक्त’ और ‘भागम भाग’ जैसी फिल्में प्रोड्यूस भी की हैं. सुनील का FTC  नाम से एक औनलाइन वेंचर भी है. यह बौलीवुड को नए टैलेंट खोजकर देता है. मुंबई में सुनील का Mischief Dining Bar और Club H20 नाम से क्लब भी हैं. जिससे आप खुद ही उनकी संपत्ति का अंदाजा लगा सकते हैं. अपने इन बिजनेस से सुनील हर साल 100 करोड़ रुपए कमाते हैं.

सुनील शेट्टी ने फिल्मों में आने से पहले ही 1991 में माना शेट्टी से शादी कर ली थी. सुनील और माना का करीब 8 साल तक अफेयर चला था. आपकों बता दें कि सुनील की पत्नी माना की भी इंटीरियर डिजाइनिंग और आर्किटेक्चर कंपनी है. इसके अलावा माना एक एनजीओ भी चलाती हैं. साथ ही उनका एक होम डिकोर स्टोर भी है. माना अपने पति सुनील की बिजनेस मैनेजर भी हैं.

गौरतलब है कि सुनील शेट्टी ने अपने करियर की शुरुआत 1992 में फिल्म ‘बलवान’ से की थी. सुनील की पहली फिल्म कुछ खास नहीं चल पाई थी. उन्हें पहचान 1994 में आई फिल्म ‘दिलवाले’ से मिली. इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवार्ड भी मिला. सुनील ने ‘हेरा-फेरी’, ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’, ‘गोपी-किशन’ और ‘वेलकम’ जैसी कई कौमेडी फिल्मों में भी काम किया. साल 2001 में आई फिल्म ‘धड़कन’ के लिए सुनील को बेस्ट विलेन का फिल्म फेयर अवार्ड मिला.

सुनील ने उस समय अजय देवगन और अक्षय कुमार जैसे स्टार्स को कड़ी टक्कर दी और एक जबरदस्त एक्‍शन हीरो बनकर उभरे. उन्होंने 90 के दशक से लेकर अबतक लगभग 110 फिल्मों में काम किया है. हिंदी के अलावा सुनील ने मलयालम, तमिल और इंग्लिश फिल्मों में भी काम किया है. उनके फिल्मी करियर में में तो कई उतार चढ़ाव आएं लेकिन उनका साइड बिजनेस दिनों-दिन तरक्की करता रहा और इसी की बदौलत वह आज अपना बहुत बड़ा बिजनेस खड़ा करने में कामयाब रहे.

आर्थिक अपराधों में लिप्त होती महिलाएं

हाल ही में अपने पति व देवर की कंपनी को कर्ज देने के मामले में निशाने पर आईं आईसीआईसीआई बैंक की एमडी व सीईओ चंदा कोचर के पद पर बने रहने को ले कर काफी सवाल उठे.

एक तरफ जहां देश के दूसरे सब से बड़े बैंक के कुछ शेयरधारकों ने चंदा की भूमिका पर सवाल उठाए, वहीं अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने भी स्पष्ट कहा कि बैंक में गवर्नैंस को ले कर संशय है. जिस तरह के आरोप बैंक के ऊपर लगे उन्हें देखते हुए बैंक की साख को ले कर सवाल उठने लाजिम थे. फिच ने सीधे तौर पर चंदा कोचर को भी सवालों के घेरे में लिया. वैसे चंदा का सीईओ के तौर पर कार्यकाल 31 मार्च, 2019 को समाप्त होगा.

प्रभाव का गलत इस्तेमाल

चंदा कोचर पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने पति दीपक कोचर और वीडियोकौन समूह के वेणुगोपाल धूत द्वारा गठित कंपनी न्यू पावर को कर्ज दिलाने में अपने प्रभाव का गलत इस्तेमाल किया. आरोप है कि धूत ने पहले दीपक कोचर के साथ मिल कर एक कंपनी स्थापित की. फिर इस कंपनी को धूत की एक दूसरी कंपनी से क्व64 करोड़ कर्ज दिया गया. बाद में इस कंपनी को दीपक की अध्यक्षता वाले एक न्यास को महज क्व9 लाख में सौंप दिया गया. कोचर के न्यास को इस कंपनी को सौंपने से ठीक 6 माह पहले आईसीआईसीआई बैंक ने वीडियोकौन समूह को क्व3,250 करोड़ का कर्ज दिया था. कंपनी ने इस कर्ज को चुकाया नहीं जो बाद में एनपीए यानी बेकार कर्ज में तबदील हो गया.

बच न सकीं गुनाह से

कुछ इसी तरह का मसला इंद्राणी मुखर्जी के केस में नजर आया जहां महिला होने के बावजूद इंद्राणी ने पैसों के लिए बेहद हैवानियत का परिचय दिया.

गौरतलब है कि अपनी ही बेटी की हत्या के आरोप में इंद्राणी को 24 अप्रैल, 2012 को गिरफ्तार किया गया था. उन के पति पीटर भी इस मामले में आरोपी हैं और फिलहाल जेल में हैं. शीना बोरा को बेहद क्रूरता के साथ मौत के घाट उतार दिया गया था. आरोप है कि इस हत्या को इंद्राणी ने ही अंजाम दिया था.

सीबीआई इन्वैस्टिगेशन में यह बात सामने आई थी कि पीटर के बेटे राहुत के साथ शादी के बाद शीना पीटर की सारी जायदाद की हकदार बन जाती. इसी भय से इंद्राणी ने बेटी की हत्या कराई.

रिश्वतखोरी का आरोप

पिछले साल मार्च में दक्षिण कोरिया की पूर्व राष्ट्रपति पार्क ग्री हाय को पुलिस ने पावर के गलत प्रयोग और रिश्वतखोरी जैसे आरोपों के तहत गिरफ्तार किया था. पार्क पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने अपनी सत्ता का दुरुपयोग किया और अपने पुराने साथी चोई सून सिल के साथ मिल कर साउथ कोरिया की कई बड़ी कंपनियों जैसे सैमसंग पर बहुत बड़ी रकम रिश्वत के रूप में अदा करने का दबाव डाला जिस के एवज में इन कंपनियों को बिजनैस फेवर देने का वादा किया गया था.

पार्क के इस तरह के भ्रष्ट आचरण और चोई के साथ भ्रष्ट रिश्ते की वजह से उन्हें पद से हटा दिया गया और बाद में गिरफ्तार कर लिया गया. दक्षिण कोरिया की अदालत ने उन्हें 24 साल की सजा सुनाई. पार्क पर 18 आरोप लगे, जिन में से 16 आरोपों को सही मानते हुए उन्हें यह सजा दी गई. उन पर 17 मिलियन डौलर का जुर्माना भी लगाया गया.

इसी तरह विवादास्पद चावल सब्सिडी योजना में अनियमितता का दोषी पाते हुए 27 सितंबर, 2017 को थाईलैंड की शीर्ष अदालत ने वहां की पूर्व प्रधानमंत्री चिंगलिक शिनवात्रा को 5 साल जेल की सजा सुनाई. कोर्ट का फैसला आने से पहले ही शिनवात्रा देश छोड़ कर भाग गईं.

चावल घोटाले समेत भ्रष्टाचार के कई आरोपों में घिरीं शिनवात्रा को 2014 में सैन्य तख्तापलट के जरीए सत्ता से बेदखल कर दिया गया था.

गौरतलब है कि महत्त्वाकांक्षी चावल सब्सिडी योजना के जरीए ही शिनवात्रा की फ्यू थाई पार्टी ने 2011 में आम चुनाव में जीत हासिल की थी. सत्ता में आने के बाद उन्होंने किसानों को चावल के लिए विश्व बाजार की कीमतों के मुकाबले 50% ज्यादा भुगतान किया था.

लेकिन अन्य देशों ने प्रतिस्पर्द्धा मूल्यों पर चावल बेच कर बाजार में अपना कब्जा कर लिया, जिस से थाईलैंड को पीछे कर वियतनाम दुनिया में चावल का सब से बड़ा निर्यातक बन गया. आरोप है कि शिनवात्रा ने किसानों के वोट पाने के लिए सब्सिडी योजना में भ्रष्टाचार को नजरअंदाज किया.

ये कुछ उदाहरण हैं जिन में महिलाएं भ्रष्टाचार, घोटालों और षड्यंत्रों की आरोपी पाई गईं. सामान्य तौर पर महिलाओं को कोमल और साफ हृदय का माना जाता है. आंकडे़ भी इस बात पर सहमति देते हैं कि महिलाएं ज्यादा संवेदनशील होती हैं.

सिर्फ धन की लालसा

हाल ही में 10 हजार लोगों पर किए गए एक सर्वे में पाया गया कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में संवेदनशीलता, गर्मजोशी और भय जैसी भावनाएं ज्यादा पाई जाती हैं. इस के विपरीत भावनात्मक स्थिरता, प्रभुता और जागरूकता जैसी विशेषताएं पुरुषों के व्यक्तित्व का हिस्सा होती हैं.

‘पब्लिक लाईब्रेरी औफ साइंस’ नामक जर्नल में छपे एक नए विश्लेषण के मुताबिक महिला हो या पुरुष दोनों के व्यक्तित्व में लिंग आधारित कुछ विशेष गुण होते हैं. केवल 18% व्यक्ति ही इस के अपवाद हो सकते हैं.

जाहिर है, अपवादस्वरूप ही ऐसी कुछ महिलाएं इतने बड़ेबड़े घोटाले कर जाती हैं कि हम अचरज में पड़ जाते हैं. वैसे भी जैसेजैसे महिलाओं की भागीदारी आर्थिक क्षेत्रों में बढ़ रही है, वैसेवैसे वे ऊंचे ओहदों पर पहुंच रही हैं और उन्हें भी घोटाले करने का मौका मिलने लगा है. पुरुषों और महिलाओं का इस तरह के घोटालों में लिप्त होने की एक कौमन वजह है अधिक से अधिक धन की लालसा.

महिलाओं के आर्थिक घोटालों में संलिप्तता के संदर्भ में क्रिमिनल साइकोलौजिस्ट अनुजा कपूर कुछ खास कारणों का जिक्र करती हैं:

सुरक्षा और प्रतिष्ठा: बहुत सी महिलाएं अपना भविष्य/बुढ़ापा सुरक्षित करने के लिए यह रास्ता चुनती हैं. उन्हें लगता है कि जिन के पास खूब सारा पैसा है, समाज में प्रतिष्ठा है उन का भविष्य सुरक्षित है. वे पैसे से अपनी ब्रैंडिंग कर पाती हैं. उन्हें शोहरत मिलती है और वे अपना जीवन वैसा बना पाती है जिस की उन्होंने कभी कल्पना की थी.

स्टेटस सिंबल: आप के पास जितना ज्यादा पैसा होगा समाज में आप की उतनी ही अधिक पूछ होगी, ऐसी सोच रखने वाली महिलाएं भी अकसर पैसों के पीछे भागती हैं. किसी भी तरह उन्हें अधिक से अधिक धन हासिल करना होता है ताकि वे अपना लाइफस्टाइल बदल सकें. ऐशोआराम, बंगलागाड़ी, हाई स्टेटस आदि का सुख भोग सकें. इसी सोच से प्रेरित कुछ महिलाएं गोल्ड डिगर के रूप में सामने आती हैं. अपने से दोगुनी उम्र के व्यक्ति से शादी कर अपना स्टेटस बढ़ाती हैं.

पैसों की लत: कुछ महिलाओं को पैसे और शोहरत की लत लग जाती है और फिर ड्रग्स की तरह वे इस लत के शिकंजे में जकड़ती चली जाती हैं. जितना भी मिले उन्हें कम ही लगता है. फिर और अधिक की चाह उन्हें अपराध की तरफ धकेलती है. इस लत के वशीभूत वे षड्यंत्रों और घोटालों की पटकथा लिखती हैं और उन्हें अंजाम तक पहुंचाती हैं.

भारतीय कानून: भारतीय कानून महिलाओं की फेवर करते हैं. हिंदू मैरिज एक्ट हो, तलाक कानून हो या हिंदू सक्सैशन एक्ट, सभी में महिलाओं को सुविधाएं दी गई हैं. महिलाओं के लिए स्त्रीधन है, मैंटीनैंस और ऐलीमनी है. संविधान में भी उन्हें माइनौरिटी में रखा गया है. उन्हें कमजोर मान कर उन्हें सपोर्ट किए जाने की वकालत की गई है ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हों. पर कई औरतें इन कानूनों व सुविधाओं का अपने लाभ के लिए गलत प्रयोग करती हैं.

खूबसूरत दिखने की चाह: आज बाजार में हर चीज महंगी होती जा रही है. जो व्यक्ति जितना अमीर होता है उस की जरूरतें भी उतनी ही बढ़ती जाती हैं. खूबसूरत दिखने की चाह में कुछ महिलाएं महंगे से महंगे ब्यूटी ट्रीटमैंट्स का सहारा लेती हैं. लाइपोसक्शन, फेसलिफ्टिंग जैसे ट्रीटमैंट कराती हैं, जिन के लिए काफी रुपयों की जरूरत पड़ती है. जब वे इतना नहीं कमा पातीं, तो अपनी इन जरूरतों को पूरा करने के लिए इधरउधर का रास्ता अपनाती हैं यानी अधेड़ों, वृद्धों से शादी करती हैं, ब्लैकमेलिंग, धोखाधड़ी आदि करती हैं, अमीरों से रिश्ते बढ़ाती हैं. हां, सभी औरतें गलत नहीं होतीं. कुछ ही गलत होती हैं पर इस का गलत मैसेज ही जाता है.

नतीजा

यदि महिलाएं इस तरह के भ्रष्टाचार और घोटालों में लिप्त रहती हैं, तो उस का नतीजा कभी अच्छा नहीं निकलता. कभी न कभी वे कानून के शिकंजे में आ ही जाती हैं और फिर उन की जिंदगी किसी जेल या अस्पताल में ही गुजरती है. शोहरत लोगों की नफरत के रूप में बदल जाती है. घरपरिवार बरबाद हो जाते हैं. मन की शांति छिन जाती है.

महिलाएं दिल से कोमल होती हैं. वे बदनामी और लोगों की नफरत का सामना नहीं कर पातीं. कानून द्वारा दी गई कठोर सजा रहीसही कसर पूरी कर देती है. कुल मिला कर जिंदगी के कुछ महीने खुशहाल गुजारने के बाद सदा के लिए अंधेरे के गर्त में गुम हो जाती हैं. इन हालात में कुछ महिलाएं भावनात्मक जंग हार जाती हैं, तो कुछ बड़ीबड़ी बीमारियों की शिकार हो कर दम तोड़ देती हैं.

ऐसे में जरूरी है कि महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों, ऊंचेऊंचे पदों पर काबिज हों, खूब धन और शोहरत कमाएं, मगर गलत रास्ता अपना कर नहीं. अपने बल पर, सचाई की राह पर चल कर ताकि वे कोमलता और उदारता जैसे अपने स्त्रीसुलभ गुणों को छोड़ कर पत्थर दिल न बनें. उन पर किया जाने वाला भरोसा न टूटे.

सोनाक्षी सिन्हा भी जुड़ी यूनेस्को के संग

सोनाक्षी सिन्हा इन दिनों एक तरफ अपनी नई फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ के प्रमोशन में व्यस्त हैं, तो दूसरी तरफ वह अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘यूनेस्को’ के साथ जुड़कर काफी खुश हैं.

हाल ही में जब सोनाक्षी सिन्हा से हमारी एक्सक्लूसिव बातचीत हुई, तो सोनाक्षी सिन्हा ने ‘यूनेस्को’ का जिक्र करते हुए कहा-‘‘एक कलाकार के तौर पर जब हमारी एक पहचान बन जाती है, तो हमारी आवाज बहुत सारे लोगों तक पहुंचती है. यूनेस्को तमाम क्षेत्रों में बहुत बेहतरीन काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था है. मेरा मानना है कि यदि हम कलाकार के तौर पर अपनी आवाज का सही तौर पर इस्तेमाल ना करें, तो वह गलत है.

यदि आपने अपनी जिंदगी में, अपनी शोहरत की वजह से कोई अच्छा या दूसरों के हित का काम नहीं किया, तो जब आप 80 साल के हो जाएंगे, तब आपको लगेगा कि आपकी जिंदगी कितनी बेकार रही. लेकिन यदि आपने शुरू से ही लोगों के हित के लिए कुछ काम किया है, तो 80 साल की उम्र में आपको लगेगा कि आपकी जिंदगी सही गुजरी है.

मैं शुरू से लोगों के हित के लिए तमाम काम करते आ रही हूं. जिनकी चर्चा मैं मीडिया या सोशल मीडिया पर नहीं करती हूं. क्योंकि मेरे माता पिता ने सिखाया है कि, ‘नेकी कर दरिया में डाल.’ पर वक्त बदला है. अब लोगों को भी पता चले कि आप क्या कर रही हैं? जिससे दूसरे भी अच्छा काम करने के लिए प्रेरित हों.

यूनेस्को एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जो कि कई वर्षों से लोगों के हित के बहुत से काम करती आ रही है. मैं अपने आपको भाग्यशाली मानती हूं कि उन्होंने मुझे अपनी संस्था के साथ जोड़ा है. यह संस्था चाहती है कि मैं उनकी आवाज बनूं. तो मैं यूनेस्को के साथ जुड़कर वूमन इम्पावरमेंट, एज्यूकेशन आफ चिल्ड्रेन सहित तमाम क्षेत्रों में कुछ काम करने वाली हूं. इससे मैं बहुत खुश हूं.

फेसबुक पर लोगों को ये है सबसे ज्यादा पसंद..!

एक शोध में पाया गया है कि सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर दिखने वाले विज्ञापन किसी फिल्म के ट्रेलर जितना ही काम करते हैं. फेसबुक पर दिखने वाले विज्ञापनों से लोग टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की तुलना में बेहतर तौर पर ब्रैंड से जुड़ पाते हैं.

फेसबुक और विपणन एजेंसी न्यूरो-इनसाइट द्वारा किए गए शोध में सामने आया है कि कैसे उपभोक्ता फेसबुक या टेलीविजन पर पहले से देखे गए विज्ञापनों पर प्रतिक्रिया देते हैं. इस परिणाम में पता चला है कि फेसबुक पर दिखने वाले विज्ञापन से ब्रांड का प्रभाव लोगों पर अधिक पड़ता है और वह तुरंत इस पर प्रतिक्रिया देते हैं. इसके उलट जो लोग टेलीविजन पर विज्ञापन देखते हैं वह उसी विज्ञापन को दूसरे दिन देखने के बाद इसे खरीदने का निर्णय लेते हैं.

इस शोध के लिए न्यूरो-इनसाइट ने अमेरिका में 100 फेसबुक उपयोगकर्ताओं के एक समूह को 21 और 54 आयुवर्ग के दो समूहों में विभाजित किया. परीक्षण के दौरान एजेंसी ने दो तरह के वीडियो विज्ञापनों का इस्तेमाल किया, जिसमें फेसबुक के लिए बनाया गया एक विज्ञापन और टेलीविजन के लिए बनाया गया विज्ञापन शामिल है.

पहले दिन एक समूह ने एक टेलीविजन शो देखा, जिसके बीच विज्ञापनों को दर्शाया गया, जबकि दूसरे समूह को फेसबुक खबरें देखने के लिए कहा गया. दूसरे दिन दोनों समूहों को टेलीविजन शो के दौरान वहीं विज्ञापन फिर से दिखाए गए.

इस परीक्षण के दौरान प्रत्येक समूह ने ईईजी की टोपियां पहनी हुई थीं, जिससे उनके दिमाग के विभिन्न हिस्सों की प्रतिक्रियाओं को मापा जा सके. इस अध्ययन में पता चला कि जिन प्रतिभागियों ने टेलीविजन पर विज्ञापन देखे, उनकी याददाश्त ने उन विज्ञापनों को याद रखने की प्रक्रिया में 50 प्रतिशत कम प्रदर्शन किया, जबकि फेसबुक पर विज्ञापन देखने वाले लोगों की यादाश्त ने बेहतर प्रदर्शन किया.

फेसबुक पर वीडियो विज्ञापन देखने वाले प्रतिभागी टेलीविजन पर देखे गए विज्ञापनों की तुलना में विज्ञापन के ब्रांड से बेहतर तौर पर जुड़ पाए.

मेजर का खूनी इश्क : शादीशुदा के पीछे पड़ा एक मेजर

मेजर अमित द्विवेदी की पोस्टिंग दिल्ली में आर्मी की इंजीनियरिंग विंग में थी. वहां से करीब 3 किलोमीटर दूर उन्हें दिल्ली कैंट की औफिसर्स कालोनी में सरकारी आवास मिला हुआ था. उन का घर से औफिस आनाजाना सरकारी जिप्सी से होता था. घर से औफिस का रास्ता केवल 20 मिनट का था. 23 जून, 2018 को अमित द्विवेदी अपने औफिस से दोपहर करीब 2 बजे घर पहुंचे.

मेजर द्विवेदी घर पहुंचे तो उन की पत्नी शैलजा दिखाई नहीं दी. उन्होंने अपने 6 वर्षीय बेटे अयान से शैलजा के बारे में पूछा. अयान ने बताया कि मौम अभी अस्पताल से नहीं लौटी हैं. शैलजा को अस्पताल में इतनी देर नहीं लगनी चाहिए थी, इसलिए मेजर अमित को थोड़ी चिंता हुई.

दरअसल, शैलजा की एड़ी में दर्द रहता था, जिस का इलाज आर्मी के बेस अस्पताल में चल रहा था. दर्द की वजह से वह कई दिनों तक अस्पताल में भरती भी रही थीं. बाद में उन्हें फिजियोथेरैपी के लिए रोजाना अस्पताल जाना पड़ता था. हर रोज वह पति के औफिस जाते समय उन की जिप्सी से अस्पताल चली जाती थीं. फिजियोथेरैपी के बाद वह पति के ड्राइवर पवन को फोन कर देती थीं. पवन जिप्सी ले कर अस्पताल पहुंच जाता था और वहां से शैलजा को घर छोड़ने के बाद औफिस लौट जाता था.

उस दिन शैलजा को अस्पताल में अपना एमआरआई कराना था, जिस के लिए उन्हें देर से अस्पताल जाना था. उस दिन वह पति के साथ नहीं गई थीं. बाद में उन्होंने ड्राइवर पवन को बुला लिया था. रोजाना की तरह उस दिन वह जिप्सी को अस्पताल के अंदर न ले जा कर अस्पताल के गेट पर ही उतर गई थीं. ड्राइवर वहीं से वापस चला गया था.crime story in hindi major ka khooni ishq

मेजर अमित बेटे अयान से पत्नी के बारे में पूछ ही रहे थे कि तभी घर के अर्दली ने बताया, ‘‘सर, मेमसाहब ने घर पर फोन कर के बताया था कि उन्हें लौटने में देर हो सकती है. साहब और अयान को लंच सर्व कर देना.’’

मेजर अमित ने सोचा कि हो सकता है, शैलजा के एमआरआई की रिपोर्ट मिलने में देर हो रही हो, इसलिए घर फोन कर के देर से लौटने को कहा है. मेजर द्विवेदी ने बेटे के साथ लंच कर के पत्नी का मोबाइल नंबर मिलाया. शैलजा का फोन स्विच्ड औफ था. उन्होंने सोचा कि वह डाक्टर के रूम में होगी, कोई डिस्टर्ब न हो, इसलिए फोन बंद कर लिया होगा. वैसे भी शैलजा तेजतर्रार और सुलझी हुई महिला थीं.

लापता हुईं शैलजा

आधे घंटे बाद मेजर अमित द्विवेदी ने फिर से पत्नी का नंबर मिलाया. शैलजा का फोन अब भी स्विच्ड औफ था. तब तक दोपहर के 3 बज चुके थे. अस्पताल के सभी डाक्टर 3 बजे से पहले ही ओपीडी के सभी मरीजों को देख चुके होते हैं. एक बार अमित द्विवेदी ने सोचा कि शैलजा कहीं और चली गई होगी, लेकिन ऐसा होता तो वह घर फोन जरूर करतीं.

मेजर अमित का मन नहीं माना तो उन्होंने आर्मी अस्पताल में फोन कर के शैलजा के बारे में पूछा. वहां से पता चला कि जो डाक्टर शैलजा का इलाज कर रहे थे, शैलजा उन के पास पहुंची ही नहीं थी. यह जान कर मेजर अमित का चिंतित होना स्वाभाविक था. वैसे भी उस दिन ड्राइवर पवन ने शैलजा को अस्पताल के गेट पर उतारा था.

इस से मेजर अमित की परेशानी बढ़ गई. वह सेना की जिस इंजीनियरिंग विंग में थे, उस विंग को उन्होंने पत्नी की गुमशुदगी की सूचना दे दी. शैलजा के गायब होने की बात सुन कर मेजर अमित के साथ काम करने वाले सेना के कई अधिकारी उन के घर पहुंच गए. अमित ने उन्हें पूरी बात बता दी. इस बीच अमित ने कई बार पत्नी का फोन भी मिलाया, लेकिन वह स्विच्ड औफ ही था.

मेजर अमित के साथियों ने इस संबंध में पुलिस को सूचना देने की सलाह दी. उसी दिन यानी 23 जून को पश्चिमी दिल्ली के थाना नारायणा को पुलिस कंट्रोल रूम से दोपहर करीब डेढ़ बजे सूचना मिली थी कि बरार स्क्वायर की मुख्य सड़क पर किसी महिला का एक्सीडेंट हो गया है.

पुलिस कंट्रोल रूम को यह जानकारी एक औटो चालक दीपक ने दी थी. एक्सीडेंट की खबर मिलते ही थानाप्रभारी सुनील चौहान पुलिस टीम के साथ बरार स्क्वायर पहुंच गए.

एक्सीडेंट की जगह बरार स्क्वायर मैट्रो स्टेशन से करीब 400 मीटर दूर थी. पुलिस ने देखा वहां सड़क पर 30-35 साल की एक महिला कुचली पड़ी थी. सड़क पर दूर तक खून फैला था. उस जगह किसी कार के टायरों के निशान भी थे.

थानाप्रभारी सुनील चौहान ने टायरों के निशानों को गौर से देखा तो उन्हें मामला संदिग्ध लगा. टायरों के निशान से साफ पता चल रहा था कि उस महिला पर जानबूझ कर कई बार कार चढ़ाई गई थी.

मृतका कौन है और कहां की रहने वाली है, जानने के लिए महिला कांस्टेबल ने तलाशी ली तो मृ़तका के पास ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से उसे पहचाना जाता. पहनावे से मृतका किसी उच्च परिवार की लग रही थी.

थानाप्रभारी ने लाश का निरीक्षण किया तो मृतका के गले पर किसी पतले और तेजधार हथियार से काटने का घाव मिला. गले का घाव देख कर पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि मामला दुर्घटना का नहीं, बल्कि हत्या का है. हत्यारा संभवत: शातिर दिमाग था, जिस ने हत्या को एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की थी. चौहान ने इस की जानकारी उच्च अधिकारियों को दे दी.

कुछ ही देर में एसीपी सोमेंद्र पाल त्यागी भी वहां आ गए. उन्होंने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. वहां मौजूद लोगों में से कोई भी मृतका को नहीं पहचान सका. मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन और फोरैंसिक टीमों को भी बुलवा लिया गया था. दोनों टीमों ने घटनास्थल से सबूत जुटाए. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश को हरिनगर स्थित दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया.

अस्पताल की काररवाई निपटा कर थानाप्रभारी सुनील चौहान थाने लौटे ही थे, तभी मेजर अमित द्विवेदी अपने साथियों के साथ नारायणा थाने पहुंच गए. सेना के अधिकारियों को एक साथ आया देख सुनील चौहान समझ गए कि मामला गंभीर है.

शैलजा मिली तो पर लाश के रूप में

मेजर अमित द्विवेदी ने थानाप्रभारी को अपनी पत्नी शैलजा के गायब होने की बात बताई. उन्होंने बताया कि वह सुबह बेस अस्पताल गई थी, उस के बाद घर नहीं लौटी. अमित द्विवेदी ने उन्हें पत्नी का हुलिया आदि भी बता दिया. उन की बात सुन कर थानाप्रभारी के दिमाग में उस युवती की लाश का चित्र घूम गया, जिसे वह कुछ देर पहले ही दीनदयाल उपाध्याय की मोर्चरी में रखवा कर आए थे.

वजह यह थी कि मेजर द्विवेदी ने अपनी पत्नी का जो हुलिया बताया था, वह लाश से मिलताजुलता था. इत्मीनान से मेजर की बात सुन कर थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘आज ही बरार स्क्वायर के पास एक महिला की लाश मिली है. मृतका का गला काटने के बाद किसी ने लाश को कार से कुचला था. उस की डैडबौडी दीनदयान उपाध्याय अस्पताल की मोर्चरी में रखी है.’’

सुनील चौहान ने मेजर द्विवेदी को लाश के फोटो भी दिखाए, जिन्हें मेजर द्विवेदी ने गौर से देखा. वह उन की पत्नी शैलजा ही थी. मेजर अमित की आंखों से आंसू टपकने लगे. उन्होंने इंसपेक्टर चौहान से डेडबौडी देखने को कहा.

थानाप्रभारी मेजर अमित द्विवेदी और उन के साथियों को दीनदयाल अस्पताल ले गए, वहां उन्होंने मेजर को वह लाश दिखाई जो बरार स्क्वायर की मुख्य सड़क पर मिली थी. लाश देखते ही मेजर द्विवेदी रोने लगे. उन्होंने लाश की शिनाख्त अपनी पत्नी शैलजा द्विवेदी के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद थानाप्रभारी ने राहत की सांस ली. मेजर द्विवेदी जब अस्पताल से निकल कर पार्किंग की ओर जा रहे थे तो उन्होंने पार्किंग में मेजर निखिल हांडा को अपनी कार के पास खड़े देखा.

मेजर हांडा वैसे तो अमित द्विवेदी का दोस्त था, लेकिन किसी वजह से अब उन के बीच पहले जैसे संबंध नहीं रहे थे. हांडा ने मेजर द्विवेदी और उन के साथियों को देख लिया था, इस के बावजूद उन के पास नहीं आया, बल्कि नजरें चुराने लगा. मेजर द्विवेदी ने मन ही मन सोचा जरूर कि हांडा यहां क्यों आया है? लेकिन इस बात को महत्त्व नहीं दिया.

मेजर अमित ने उस से बात नहीं की और सुनील चौहान के साथ थाने लौट आए. पुलिस पहले ही अज्ञात हत्यारे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर चुकी थी. थानाप्रभारी ने मेजर द्विवेदी से पूछा कि क्या उन्हें इस हत्या को ले कर किसी पर कोई शक है. लेकिन मेजर ने इस बात से इनकार कर दिया.

मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए डीसीपी विजय कुमार ने इसे सुलझाने के लिए एसीपी (विकासपुरी) सोमेंद्र पाल त्यागी एसीपी (पंजाबी बाग) सुरेंद्र कुमार, आनंद सागर, थानाप्रभारी (नारायणा) सुनील चौहान, थानाप्रभारी (पंजाबी बाग) राजीव भारद्वाज, थानाप्रभारी (कीर्तिनगर) अनिल शर्मा, थानाप्रभारी (इंद्रपुरी) राममेहर, स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर जयप्रकाश और साइबर सैल के इंसपेक्टर मनोज कुमार को अपने औफिस बुलवा कर उन के साथ मीटिंग की.

मीटिंग में उन्होंने यह भी कहा कि जिस जगह शैलजा की लाश मिली है, वहां पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों को बुला कर सीन औफ क्राइम रिक्रिएट किया जाए. साथ ही हत्या की हर पहलू से जांच की जाए. डीसीपी ने अलगअलग पुलिस अधिकारियों के नेतृत्व में 6 पुलिस टीमें बना कर उन्हें अलगअलग काम सौंप दिए.

पुलिस आई पूरे ऐक्शन में

इंसपेक्टर मनोज कुमार ने शैलजा के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच शुरू कर दी. पता चला कि शैलजा की एक फोन नंबर पर बहुत बात होती थी. पिछले 3 महीने में उस नंबर से शैलजा के मोबाइल पर 6 हजार काल्स आई थीं. जाहिर है इतनी काल्स वही कर सकता था जो शैलजा का ज्यादा नजदीकी हो.

घटना वाले दिन सुबह भी करीब साढ़े 8 बजे उसी नंबर से शैलजा के फोन पर काल आई थी. उस फोन नंबर के बारे में पुलिस ने मेजर अमित द्विवेदी से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह नंबर मेजर निखिल हांडा का है.

पुलिस ने उन से मेजर निखिल हांडा के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि काफी पहले वह उन का दोस्त था, लेकिन अब उस से बोलचाल नहीं है. इंसपेक्टर मनोज कुमार ने बोलचाल न होने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि मेजर निखिल हांडा दोस्ती कर के उन की पत्नी शैलजा को परेशान करता था, इसलिए उन्होंने उस से संबंध खत्म कर दिए थे.

मेजर अमित की बात सुन कर इंसपेक्टर मनोज कुमार को स्थिति कुछकुछ साफ होती दिखी. यह जानकारी उन्होंने डीसीपी को दे दी. जांच के लिए थानाप्रभारी सुनील चौहान के नेतृत्व में एक टीम आर्मी के बेस अस्पताल भेजी गई. टीम के साथ मेजर द्विवेदी भी थे. पुलिस ने उस डाक्टर से भी पूछताछ की, जो शैलजा का उपचार कर रहा था.

डाक्टर ने बताया कि शैलजा द्विवेदी आई तो थीं, लेकिन फिजियोथेरैपी कराए बिना ही चली गई थीं. सुनील चौहान के दिमाग में यह बात घर कर गई कि जब शैलजा ने अस्पताल जा कर फिजियोथेरैपी नहीं कराई तो अस्पताल आने का उन का मकसद क्या था.

पुलिस ने अस्पताल के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि शैलजा पूर्वाह्न 11 बजे अस्पताल के बाहर रुकी सफेद रंग की होंडा सिटी कार में बैठ कर चली गई थीं. गाड़ी कौन चला रहा था, यह तो पता नहीं चल सका लेकिन पुलिस को उस कार का नंबर जरूर मिल गया. नंबर था डीएल3सी सीके7882. जांच करने पर पता चला कि यह होंडा सिटी दक्षिणी दिल्ली के साकेत के जी-96 में रहने वाले ए.आर. हांडा के नाम पर रजिस्टर्ड थी.

यह पता चलते ही तुरंत एक पुलिस टीम साकेत के पते पर भेजी गई. वहां जा कर पता चला कि ए.आर. हांडा रिटायर्ड कर्नल थे. उन्होंने बताया कि होंडा सिटी कार उन के नाम पर रजिस्टर्ड जरूर है, लेकिन उसे ज्यादातर उन का बेटा मेजर निखिल राय हांडा इस्तेमाल करता है.

उन्होंने यह भी बताया कि उन का पोता यानी निखिल का बेटा आयुष्मान सेना के बेस अस्पताल में भरती है. उस की मां नलिनी (परिवर्तित नाम) अस्पताल में उस के पास रहती है. बेटे को देखने निखिल अस्पताल के चक्कर लगाता रहता है.

इस के बाद मेजर निखिल हांडा पर पुलिस का शक बढ़ गया. पुलिस ने अस्पताल में हांडा की पत्नी नलिनी से मुलाकात की. नलिनी ने बताया कि उस दिन वह सुबह 10 बजे बेटे को देखने आए थे और कुछ देर बाद चले गए थे. दोपहर डेढ़ पौने 2 बजे वह फिर अस्पताल आए. लेकिन आधा घंटा रुकने के बाद लौट गए. इस के बाद न वह आए और न ही उन्होंने फोन किया.

अब तक की जांच में जो जानकारी पुलिस को मिली थी, उस से यह बात पुख्ता हो रही थी कि शैलजा द्विवेदी की हत्या मेजर निखिल हांडा ने की होगी. पुलिस टीमों ने जांच रिपोर्ट डीसीपी विजय कुमार के सामने रख दी. टीमों का काम देखने के बाद डीसीपी इस बात से संतुष्ट हो गए कि जांच टीमें सही दिशा में काम कर रही हैं.

मेजर निखिल हांडा की तलाश

अब मेजर निखिल हांडा का पुलिस के सामने मौजूद होना आवश्यक था ताकि उस से पूछताछ के बाद स्थिति साफ हो सके. इसलिए डीसीपी ने पुलिस टीमों को मेजर निखिल हांडा को तलाश करने के निर्देश दिए.

सर्विलांस टीम निखिल के मोबाइल नंबर पर नजर रखे हुई थी. निखिल अपने मोबाइल को स्विच्ड औफ किए हुए था. 23-24 जून की रात को उस ने 58 सैकेंड के लिए फोन औन कर के किसी से बात की थी. उस समय उस की लोकेशन दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर के पास थी.

फिर सुबह होने पर उस ने कुछ देर के लिए मोबाइल खोला. उस लोकेशन के आधार पर पता चला कि वह दिल्ली से मेरठ की तरफ गया है. लिहाजा पुलिस की टीमें मेरठ के लिए रवाना कर दी गईं.

दिल्ली में बैठी सर्विलांस टीम को मेजर निखिल हांडा की जो भी लोकेशन पता चलती, वह उसे मेरठ में मौजूद टीमों को बता देती थी. इस तरह दिल्ली पुलिस मेजर निखिल का पीछा करती रही. आखिर 24 जून की दोपहर को उसे दौराला के पास टोल प्लाजा से हिरासत में ले लिया. पुलिस उसे ले कर दिल्ली लौट आई.

पुलिस ने उस की होंडा सिटी कार की तलाशी ली तो उस में एक चाकू मिला. इस के अलावा उस के टायरों पर भी खून के निशान थे. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि शैलजा का हत्यारा वही है. मेजर निखिल हांडा को गिरफ्तारी की बात सुन कर डीसीपी विजय कुमार भी नारायणा थाने पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में थानाप्रभारी सुनील चौहान ने मेजर निखिल हांडा से शैलजा द्विवेदी की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने अनभिज्ञता जाहिर की. उस से जब उस के टायरों पर लगे खून के निशान के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उस की कार से सड़क पार कर रहे एक कुत्ते का एक्सीडेंट हो गया था.

चूंकि निखिल हांडा सेना का अधिकारी था, इसलिए पुलिस उस के साथ सख्ती भी नहीं कर सकती थी. लिहाजा पुलिस अधिकारियों ने सेना के बेस अस्पताल के सीसीटीवी से मिली फुटेज और शैलजा की काल डिटेल्स दिखाते हुए उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो वह पुलिस के सवालों में उलझ गया.

आखिर उस ने हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने बताया कि काफी समझाने के बाद भी शैलजा ने उस की बात नहीं मानी तो उस के सामने ऐसे हालात बन गए कि उसे शैलजा की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस से पूछताछ के बाद शैलजा द्विवेदी की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली.

शैलजा मूलरूप से अमृतसर, पंजाब के पुतलीघर की रहने वाली थी. उस का सरनेम कालिया था. शैलजा के परिवार में मातापिता के अलावा एक भाई सुकर्ण कालिया हैं, जो अमृतसर में वकालत करते हैं. शैलजा कालिया की पढ़ाई अमृतसर में ही हुई थी. डीएवी कालेज से ट्रैवल ऐंड टूरिज्म में ग्रैजुएशन करने के बाद शैलजा ने गुरु नानकदेव विश्वविद्यालय से भूगोल और टाउन प्लानिंग में पोस्टग्रैजुएशन किया. शिक्षा पूरी करने के बाद उस का रुझान अध्यापन की तरफ हुआ. उस ने एक संस्थान में 5 साल तक लेक्चरर के पद पर नौकरी की.

पढ़ाई पूरी कर के शैलजा कालिया अपने पैरों पर खड़ी हो गई थी. मातापिता उस की शादी के लिए उपयुक्त लड़का देखने लगे ताकि उस की शादी कर के अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकें.

किसी परिचित ने कालिया दंपति को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के रहने वाले मेजर अमित द्विवेदी के बारे में बताया. उन्होंने छानबीन की तो अमित उन की बेटी शैलजा के लिए उपयुक्त लगे. दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत के बाद यह रिश्ता तय हो गया और सन 2009 में शैलजा और अमित की शादी हो गई.

पति ही नहीं घरपरिवार भी अच्छा मिला शैलजा को

अमित स्वभाव से सीधे और शरीफ इंसान थे. खूबसूरत शैलजा से शादी कर के वह बहुत खुश थे. शैलजा भी अमित से शादी कर के खुद को खुशनसीब समझती थी. उच्चशिक्षित शैलजा ने शादी के बाद लेक्चरर की नौकरी छोड़ दी थी. उन्हें डांसिंग, कुकिंग, सिंगिंग आदि का शौक था. इस के अलावा वह बातें इतनी प्रभावशाली करती थीं कि उन के साथ रहने वाला कोई भी बोर नहीं होता था. अपनी बातों और चुटकुलों से वह सभी को प्रभावित कर देती थीं. कुल मिला कर शैलजा बहुमुखी प्रतिभा वाली थी.

एक दिन पति के ड्यूटी पर जाने के बाद शैलजा अपने ड्राइंगरूम में अकेली बैठी थी. तभी उस के दिमाग में एक बात घूमी कि शादी से पहले जब वह अपने घर पर थी तो उस की पहचान उस के मांबाप से होती थी और शादी के बाद वह पति के नाम से जानी जाती है. यानी उच्चशिक्षा हासिल करने के बाद भी समाज में उस की अपनी कोई पहचान नहीं है. वह कुछ ऐसा करना चाहती थीं जिस से उन की अलग पहचान बन सके.

अपने मन की बात उन्होंने पति को बताई तो मेजर अमित द्विवेदी ने कह दिया कि वह जो करना चाहती हैं, करें. उन्होंने पत्नी का हरसंभव सहयोग करने का भरोसा दिया. पति की यह बात सुन कर शैलजा बहुत खुश हुईं. इस के बाद उन्होंने पुणे में रह कर एक इंस्टीट्यूट से मौडलिंग और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट का कोर्स किया.

कोर्स करने के दौरान वह कैच ऐंड केयर नाम के एनजीओ से जुड़ कर समाजसेवा करने लगीं. वह एनजीओ के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाती थीं. इंस्टीट्यूट से जब भी समय मिलता, वह पति के पास जाती रहती थीं.

इसी दौरान शैलजा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अयान रखा गया. बेटे के जन्म के बाद घर में खुशियां और बढ़ गईं. शैलजा अपनी पहचान के लिए जो उड़ान भरना चाह रही थीं, बेटा पैदा होने पर वह रुक गई. उन्होंने सोचा कि जब बेटा कुछ बड़ा हो जाएगा तो वह फिर से अपने कैरियर के लिए जुट जाएंगी. वह पूरी तरह से बेटे की परवरिश में लगी रहीं.

अयान जब मां के बगैर रहने लायक हो गया तो शैलजा ने फिर से अपने बारे में सोचना शुरू किया. बेटा पैदा होने के बाद शैलजा की फिगर खराब हो गई थी, लिहाजा वह उसे मेंटेन करने में जुट गईं. उन्होंने जिम जाना शुरू कर दिया. इस के अलावा वह योगा भी करती थीं. अपनी मेहनत से उन्होंने शरीर को फिट कर के आकर्षक बना लिया.

चूंकि शैलजा ने मौडलिंग का कोर्स किया था, इसलिए उन का झुकाव भी उसी क्षेत्र की ओर हो गया. धीरेधीरे उन्होंने ग्लैमर वर्ल्ड की तरफ कदम बढ़ाए. उन्होंने कई उत्पादों के लिए मौडलिंग भी की. सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भी वह हिस्सा लेती रहीं. इस के बाद शैलजा की ऐसी पहचान बढ़ी कि जुलाई 2017 में ‘मिसेज इंडिया अर्थ’ पत्रिका ने शैलजा को कवर पेज पर छापा.

इस पत्रिका में फोटो छपने के बाद शैलजा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन के पति मेजर अमित द्विवेदी की पोस्टिंग उस समय दीमापुर में थी. मौडलिंग आदि के काम से वह कभीकभी दिल्ली आती रहती थीं. शैलजा सोशल साइट्स पर काफी सक्रिय रहती थीं. फेसबुक पर अच्छे लोगों से दोस्ती करना उन का शौक था.

फेसबुक के जरिए सन 2015 में उन की दोस्ती निखिल राय हांडा से हुई. निखिल ने खुद को दिल्ली का व्यापारी बताया तो शैलजा ने भी झूठ बोलते हुए खुद को एक बैंक औफिसर की पत्नी बताया.

फेसबुक पर झूठ से शुरू हुई दोस्ती

जबकि सच्चाई यह थी कि निखिल सेना में मेजर था और उस समय उस की पोस्टिंग जम्मूकश्मीर में थी. निखिल वैसे मूलरूप से दिल्ली का रहने वाला था. उस की परवरिश फौजी परिवेश में हुई थी. उस के पिता ए.आर. हांडा सेना में कर्नल थे.

पिता की तरह निखिल भी सैन्य अधिकारी बनना चाहता था. इस के लिए उस के पिता उस का मार्गदर्शन करते रहे. ग्रैजुएशन के बाद पिता ने निखिल का विवाह नलिनी से कर दिया था. नलिनी एक सीधीसादी युवती थी जबकि तेजतर्रार निखिल को अल्ट्रा मौडर्न लड़कियां पसंद थीं.

विवाह के बाद निखिल ने नैशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) की परीक्षा दी. उस परीक्षा में वह पास हो गया. एनडीए की पढ़ाई करने के बाद उसे अशोक की लाट के साथ सेना की वरदी मिली. उस की पहली पोस्टिंग मेरठ इन्फ्रैंट्री में हुई. इस के बाद उस का तबादला जम्मूकश्मीर हो गया था.

मेजर निखिल राय हांडा की शादी नलिनी से हो जरूर गई थी, लेकिन वह उसे दिल से नहीं चाहता था. उस ने फेसबुक पर 2 एकाउंट बनाए. एक में उस ने खुद को दिल्ली का बिजनैसमैन बताया तो दूसरे में सेना का मेजर. उसे मौडर्न लड़कियों से दोस्ती करने का शौक था.

निखिल और शैलजा द्विवेदी के बीच करीब 6 महीने तक फेसबुक और वाट्सऐप के जरिए बात होती रही. कभीकभी वे फोन पर भी बातें कर लेते थे. दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं तो दोनों ही मुलाकात के लिए बेचैन होने लगे. शैलजा मौडलिंग के सिलसिले में दीमापुर से दिल्ली आती रहती थी. एक बार मेजर निखिल हांडा भी छुट्टी ले कर दिल्ली आ गया.

दोनों की मुलाकात एक रेस्टोरेंट में हुई. पहली मुलाकात में ही निखिल हांडा शैलजा को दिल दे बैठा. उस ने शैलजा की खूबसूरत छवि को अपने दिल में बसा लिया. उसी दिन निखिल ने उन्हें बता दिया कि वह वास्तव में सेना में मेजर है. शैलजा ने भी अपनी सच्चाई बता दी कि उस के पति भी सेना में मेजर हैं और इस समय उन की पोस्टिंग दीमापुर में है. यह बात सुन कर निखिल खुश हुआ. बाद में दोनों की फोन के जरिए बातचीत जारी रही. निखिल अपने साथ पत्नी को नहीं रखता था पर समयसमय पर अपने परिवार से मिलने दिल्ली आता रहता था.

मेजर निखिल हांडा की शैलजा के प्रति दीवानगी बढ़ती जा रही थी. वह चाहता था कि वह शैलजा के नजदीक रहेगा तो उस से रोजाना मुलाकात हो सकेगी. यही सोच कर उस ने सेना के अधिकारियों से अनुरोध कर के अपना तबादला दीमापुर करवा लिया.

अब तक वह 2 बच्चों का पिता बन चुका था. उस ने कोशिश कर के दीमापुर में शैलजा के घर के पास ही आवास ले लिया. एक दिन अपने घर आयोजित जन्मदिन की पार्टी में शैलजा ने मेजर निखिल को भी आमंत्रित किया. उसी दौरान उस की मेजर अमित द्विवेदी से मुलाकात हुई.

शैलजा अमित को केवल दोस्त समझती थी, जबकि अमित उसे चाहने लगा था. दीमापुर में रहते ही मेजर अमित का संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान पर सूडान जाने के लिए चयन हो गया. उन्हें प्रतिनियुक्ति पर सूडान जाना था. वहां जाने से पहले उन्हें दिल्ली में 2 महीने की ट्रेनिंग करनी थी. अमित ने उसी समय शैलजा के साथ प्लान बना लिया था कि वह पूरे परिवार को भी सूडान व अन्य देशों की यात्रा कराएंगे. चूंकि अमित को ट्रेनिंग करनी थी, इसलिए वह परिवार सहित दिल्ली आ गए.

उधर शैलजा की निखिल से फोन पर बातचीत होती रहती थी. अकसर शैलजा के फोन पर लगे रहने पर अमित ने शैलजा को समझाया कि यह स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. एक दिन अमित ने पत्नी को निखिल से वीडियो काल करते देख लिया तो उन्हें अच्छा नहीं लगा. उन्होंने पत्नी से कहा कि निखिल उन्हें पसंद नहीं है, इसलिए वह उस से बात न किया करें.

बढ़ती गई निखिल की दीवानगी

इस के बाद शैलजा ने निखिल से दूरी बनानी शुरू कर दी. निखिल को यह जानकारी मिल चुकी थी कि मेजर अमित सूडान जा रहे हैं. वह इसी का फायदा उठाते हुए शैलजा से नजदीकियां बढ़ाना चाहता था. लेकिन शैलजा के रुख को वह समझ नहीं पाया. निखिल छुट्टी ले कर 2 जून को शैलजा से मिलने दिल्ली आ गया. दिल्ली आ कर उसे पता चला कि शैलजा अमृतसर में अपने मायके में है तो वह अमृतसर पहुंच गया. अचानक निखिल को देख कर शैलजा चौंक गईं.

निखिल के अनुरोध पर शैलजा उस के साथ एक रेस्टोरेंट चली गई. तभी मेजर निखिल ने उस के सामने अपना प्यार जाहिर कर दिया. लेकिन शैलजा ने साफ कह दिया कि वह उसे केवल अपना दोस्त समझती है, इस के आगे कुछ नहीं.

निखिल ने यहां तक कह दिया कि वह अपनी पत्नी को तलाक दे देगा. शैलजा ने उसे समझाया कि वह अपने दिल से गलतफहमी निकाल दे और अपने बीवीबच्चों को देखें, यही ठीक रहेगा. तब निखिल मुंह लटका कर घर आ गया.

2-4 दिन बाद शैलजा भी दिल्ली आ गई. एक दिन शैलजा की एड़ी में दर्द हुआ तो वह सेना के बेस अस्पताल पहुंचीं, जहां उन्हें भरती कर लिया गया. यह बात मेजर निखिल को पता लगी तो वह भी उसी अस्पताल में माइग्रेन का दर्द होने का बहाना बना कर अस्पताल में भरती हो गया.

उस दौरान वह शैलजा से भी मिला पर उस ने निखिल को लिफ्ट नहीं दी. शैलजा ने अपनी छुट्टी कराई तो निखिल भी घर आ गया. बाद में वह फिजियोथेरैपी कराने के लिए अस्पताल जाती रहती थी.

निखिल शैलजा के प्यार में पागल हो चुका था. उस ने शैलजा को मनाने की कोशिश जारी रखी. उसे पता चला कि शैलजा अभी भी बेस अस्पताल जाती रहती हैं तो उस ने अपने बेटे को पेट दर्द की बात बता कर अस्पताल में भरती करा दिया. वह अस्पताल में शैलजा से मिलने की कोशिश करता रहता था.

उस की सनक को देखते हुए शैलजा ने उस से दूरी बना ली. बेटे की तीमारदारी के लिए निखिल ने अपनी पत्नी नलिनी को अस्पताल में छोड़ दिया था. 22 जून, 2018 को भी मेजर निखिल हांडा ने शैलजा से मिलने की इच्छा जाहिर की. उन्होंने मना कर दिया तो वह विनती करने लगा कि आखिरी बार मिल लो. इस के बाद मैं परेशान नहीं करूंगा.

आखिर दीवानगी में बन गया हत्यारा

शैलजा मान गई और उन्होंने 23 जून को अस्पताल में मिलने के लिए कह दिया. निखिल अब एक दिलजला आशिक बन गया था. उस ने तय कर लिया था कि यदि इस बार भी शैलजा ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा. इस के लिए उस ने सर्जिकल ब्लेड भी खरीद लिया था.

23 जून को सुबह करीब साढ़े 8 बजे निखिल ने शैलजा को फोन किया तो उस ने कह दिया कि वह कुछ देर में अस्पताल पहुंच रही है. रोजाना मेजर अमित ही औफिस जाते समय पत्नी को अस्पताल छोड़ देते थे लेकिन उस दिन शैलजा ने उन के साथ जाने से यह कह कर मना कर दिया कि वह आज अस्पताल देर से जाएगी. बाद में उस ने पति के सरकारी ड्राइवर को फोन कर के बुला लिया और ड्राइवर ने शैलजा को अस्पताल के गेट पर उतार दिया.

मेजर निखिल को उस दिन शैलजा से मिलने का बेसब्री से इंतजार था. अस्पताल में भरती बेटे को देखने के बाद वह अस्पताल के गेट पर पहुंचा और वहां से शैलजा को अपनी कार में बैठा लिया. इस के बाद वह अस्पताल कैंपस से बाहर निकल गया. निखिल ने फिर से शैलजा को समझाने की कोशिश की. उधर शैलजा भी उसे समझा रही थी कि वह फालतू की बातें न करे. तबाही के अलावा इन से कुछ हासिल नहीं होगा.

उधर मेजर निखिल की पत्नी नलिनी को भी शक हो गया था कि उस का पति शैलजा के पीछे दीवाना बन गया है. उसी समय नलिनी का निखिल के मोबाइल पर फोन आया. निखिल ने फोन का स्पीकर औन कर उस से बात की. नलिनी उस के और शैलजा के बारे में बात कर रही थी. निखिल ने पत्नी को डांटते हुए काल डिसकनेक्ट कर दी. फिर वह शैलजा से बोला, ‘‘तुम्हारे लिए मैं पत्नी से लड़ रहा हूं और उसे तलाक देने को तैयार हूं लेकिन तुम बात समझने की कोशिश ही नहीं कर रहीं.’’

‘‘निखिल, यह तुम्हारी बेकार की जिद है. तुम अस्पताल में अपनी बीवीबच्चे के पास जाओ.’’ शैलजा ने सलाह दी.

निखिल को लगा कि अब यह नहीं मानेगी तो उस ने गाड़ी के डैशबोर्ड से सर्जिकल ब्लेड निकाला. उस समय कार बरार स्क्वायर में थी और सड़क सुनसान थी. इस से पहले कि शैलजा कुछ समझ पाती, उस ने सर्जिकल ब्लेड बराबर की सीट पर बैठी शैलजा के गले पर चला दिया. कार में खून फैलने लगा तो उस ने साइड का दरवाजा खोल कर शैलजा को धक्का दे कर सड़क पर गिरा दिया. इस के बाद उस ने तड़पती हुई शैलजा के ऊपर

2-3 बार कार चढ़ा दी, जिस से उस की मौके पर ही मौत हो गई. यह उस ने इसलिए किया ताकि मामला दुर्घटना का लगे.

शैलजा का फोन कार में ही गिर गया था, जिस का सिम निकाल कर उस ने तोड़ दिया और फोन भी पत्थर से कुचल दिया. उस की गाड़ी के अंदर और टायरों पर खून लगा था जो उस ने एक जगह धुलवा दिया लेकिन टायरों का खून पूरी तरह साफ नहीं हुआ था.

इस के बाद वह अस्पताल में अपने बेटे को देखने गया. वहां से चितरंजन पार्क में रहने वाले अपने चाचा राघवेंद्र के पास गया और उन से 20 हजार रुपए लिए. फिर उस ने भाई रजत के साथ बीयर पी.

गाड़ी में कोई सबूत न रहे, इस के लिए वह उस के टायर बदलवाना चाहता था या उस की अच्छी तरह धुलाई करवाना चाहता था. मेरठ में पोस्टिंग के दौरान उस की कुछ गैराज वालों से पहचान हो गई थी, इसलिए वह दिल्ली से मेरठ चला गया, जहां पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

मेजर निखिल से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे 25 जून को पटियाला हाउस कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी मनीषा त्रिपाठी की अदालत में पेश कर के 96 घंटे के लिए पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस की निशानदेही पर एक कूड़ेदान से शैलजा का कुचला हुआ मोबाइल बरामद किया गया. लेकिन पुलिस हत्या में प्रयुक्त सर्जिकल ब्लेड, आरोपी के खून सने कपड़े, शैलजा का पर्स, छाता, कार से खून साफ करने वाला तौलिया बरामद नहीं कर सकी.

आरोपी मेजर निखिल राय हांडा से विस्तार से पूछताछ के बाद उसे फिर से न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

मर्द हो या औरत, जरूरी है अंदरूनी अंगों की सफाई

मर्द हो या औरत अंदरूनी अंगों की सफाई सभी के लिए बेहद जरूरी होती है. ऐसा करना सैक्स के लिए ही नहीं, बल्कि सेहत के हिसाब से भी बेहद जरूरी होता है.

मर्दों के मुकाबले औरतों के लिए यह बेहद जरूरी होता है. इस की वजह यह है कि औरत के अंदरूनी अंगों की बनावट ऐसी होती है जिन में इंफैक्शन होने का डर ज्यादा होता है. उन के अंग से स्राव, पसीना या फिर पेशाब के बाद अंग को साफ नहीं करने के चलते जांघें गीली हो जाती हैं.

लंबे समय तक गीले रहने के चलते उन में बैक्टीरिया पनपने का खतरा रहता है. इतना ही नहीं, इंफैक्शन या फि र बदबू की समस्या का भी खतरा रहता है, इसलिए अंग की सफाई करने के साथ ही इस जगह को सूखा रखना भी बेहद जरूरी है.

सैनेटरी नैपकिन बदलती रहें 

माहवारी के समय ज्यादातर औरतें सैनेटरी नैपकिन को काफी लंबे समय तक नहीं बदलती हैं, जबकि उसे हर 5 से 7 घंटे में बदलना चाहिए. अगर एक ही सैनेटरी नैपकिन को लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है तो वह बदन पर लाल चकत्ते या फिर बदबू के साथ इंफैक्शन की वजह बन सकता है.

पीएच लैवल को बनाए रखें

औरत का अंग खुद को बैक्टीरिया और इंफैक्शन से बचाने के लिए एक उचित तापमान, पीएच लैवल और नमी को बनाए रखने में मदद करता है.

आमतौर पर अंग का पीएच लैवल तकरीबन 3.8 से 4.5 होता है, जो कठोर साबुन या कैमिकल वगैरह के इस्तेमाल से काफी बदल सकता है जिस से अंग को नुकसान पहुंच सकता है.

पीएच लैवल को बनाए रखने के लिए कोमल साबुन इस्तेमाल करना चाहिए. कभी भी कठोर साबुन का इस्तेमाल न करें. बाजार में अंग की सफाई के लिए भी कई साबुन मौजूद हैं. उन का इस्तेमाल किया जा सकता है.

सैक्स के बाद सफाई

इंफैक्शन से बचना है तो सैक्स के बाद अंग की सफाई करना बहुत जरूरी है. इस्तेमाल किए गए कंडोम के कुछ अंश अंग में रहने से इंफैक्शन की वजह बन सकते हैं, इसलिए अंग को इंफैक्शन और बैक्टीरिया से दूर रखने के लिए कोमल साबुन और पानी के साथ साफ करना बहुत अहम है. सैक्स के बाद पेशाब करना भी जरूरी होता है.

बालों की सफाई करें

अंग के बालों को प्यूबिक हेयर भी कहते हैं. इन की सफाई समयसमय पर करते रहें. कोशिश करें कि प्राइवेट एरिया में बाल छोटे हों या फिर न हों जिस से पसीने से होने वाली खुजली से नजात मिल सके. अंग के बालों को साफ करने के कई तरीके होते हैं, जैसे:

हेयर रिमूवर क्रीम

हेयर रिमूवर क्रीम बैस्ट तरीका है बाल हटाने का. औरतें इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल करती हैं. इस का सब से बड़ा फायदा यह है कि इस में किसी तरह का दर्द नहीं होता और न ही इस में ज्यादा समय लगता है.

कोई भी क्रीम इस्तेमाल करने से पहले उस पर लिखे सभी सुझावों को अच्छी तरह से पढ़ लें, फिर इस्तेमाल करें. अगर इस क्रीम से किसी तरह की जलन या खुजली होती है तो तुरंत पानी से साफ कर दें.

वैक्सिंग

हेयर रिमूव करने का सब से पुराना उपाय है वैक्सिंग. वैक्सिंग में दर्द होता है.  इस उपाय को केवल वे ही अपनाएं जो दर्द को सहन करने की ताकत रखते हैं.

वैक्सिंग का एक फायदा यह होता है कि इस से थोड़ा लंबे समय तक बालों से छुटकारा मिल जाता है.

वैक्सिंग करते समय थोड़ी सावधानी रखने की भी जरूरत होती है, तो इसे थोड़ा ध्यान से करें. यह खुद करना आसान नहीं होता है. औरतें ब्यूटीपार्लर में इस को करा सकती हैं.

लेजर ट्रीटमैंट

लेजर ट्रीटमैंट हेयर रिमूव करने का एक ऐसा उपाय है जिस में एक लेजर डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है. इस से निकलने वाली लेजर के जरीए हेयर फाइलिइस को खत्म कर दिया जाता है.

यह ट्रीटमैंट घातक नहीं है. बस, इतना जरूर है कि इस में बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है. इसे किसी अच्छे डाक्टर की मदद से ही कराएं.

यह ट्रीटमैंट थोड़ा महंगा होता है लेकिन इस से हमेशा के लिए राहत मिल जाती है. यह ट्रीटमैंट कराने के लिए कुछ समय तक सिटिंग्स लेनी पड़ती हैं और साथ ही लोशन और आइस पैक्स भी इस्तेमाल करना होता है.

शेविंग

हेयर रिमूव करने का सब से सस्ता और आसान उपाय है शेविंग करना. शेविंग करते समय थोड़ी सावधानी बरतें ताकि आप को कोई कट या निशान न पड़ जाए.

शेविंग के लिए जो रेजर और ब्लेड का आप इस्तेमाल करें वह अच्छी क्वालिटी का होना चाहिए.

यह भी हो सकता है कि शेविंग करने के कुछ समय बाद आप को खुजली या जलन होने लगे. ऐसा होने पर किसी लोशन का इस्तेमाल करें और लापरवाही न बरतें. अब औरतों के लिए रेजर भी आने लगे हैं.

मर्द भी रखें सावधानी

अंदरूनी अंगों का इंफैक्शन मर्दों को भी हो सकता है. ऐसे में उन को भी अपने अंग के बाल छोटे या फिर न के बराबर ही रखने चाहिए. बालों को हलका मतलब ट्रिम कर सकते हैं. ट्रिम करने का काम कैंची से भी हो सकता है. बालों को शेव भी कर सकते हैं. इस में सावधानी रखनी पड़ेगी. नहाते समय अंगों को साफ रखें. कठोर साबुन का इस्तेमाल न करें. अंग में नीचे सफेद रंग का पदार्थ जमा हो जाता है. इस को साफ पानी से अच्छी तरह धो लें नहीं तो यह बदबू की वजह बन जाता है. इस से इंफैक्शन भी हो सकता है. साफ अंडरवियर पहनें.

बाल करें डाई लगें जवान

आप ने कई लोगों के मुंह से सुना होगा कि ये बाल धूप में ऐसे ही सफेद नहीं हुए हैं. दरअसल, यह कह कर वे अपने तजरबे की अहमियत समझा रहे होते हैं. लेकिन आजकल कोई नहीं चाहता कि उस के बाल सफेद हों और लोग उसे बूढ़ा समझें, इसलिए बालों में डाई लगा कर जवान दिखना अब मजबूरी कम और फैशन ज्यादा है.

धूल, प्रदूषण, अनियमित खानपान, कौस्टमैटिक चीजों का इस्तेमाल वगैरह वजहों से कम उम्र में ही लोगों के बाल सफेद हो रहे हैं. दरअसल, बालों में मैलानिन नाम का पिगमैंट पाया जाता है. यह उम्र के साथ बनना कम हो जाता है और बाल सफेद होने लग जाते हैं. कई लोगों में मैलानिन का बनना कम उम्र में ही तकरीबन रुक सा जाता है. ऐसे हालात में बाल सफेद होना शुरू हो जाते हैं.

इसे देखते हुए बाजार में अलगअलग कंपनियों ने कई तरह के ब्रांड के हेयर डाई व कलर्स उतारे हैं. हालांकि कुछ लोग सैलून जा कर बालों को डाई कराते हैं लेकिन आप चाहें तो यह काम घर पर भी कर सकते हैं. यह समय और पैसा दोनों बचाता है. कुछ खास बातों को ध्यान में रख कर आप अपने बालों को पार्लर में डाई किए गए बालों जैसा लुक दे सकते हैं.

आमतौर पर हेयर डाई या हेयर कलर 3 तरह के होते हैं, जैसे टैंपरेरी कलर, सैमीपरमानैंट डाई और परमानैंट डाई.

टैंपररी कलर जहां सिर्फ एक शैंपू तक ही टिकते हैं वहीं सैमीपरमानैंट 5 से 6 हफ्ते और परमानैंट डाई का असर लंबे समय तक बरकरार रहता है.

भारत में सब से ज्यादा सैमीपरमानैंट डाई का चलन है. हेयर कलर और हेयर डाई में यही फर्क है कि बाल की सिर्फ बाहरी परतों को कलर करने के लिए हेयर कलर लगाया जाता है जबकि डाई बाल में अंदर की सतह तक जा कर बालों को लंबे समय तक रंग देता है.

बालों को डाई करने से पहले बालों के रंग के हिसाब से डाई के रंग को चुनें. बाजार में सैकड़ों शेड्स आपको मिल जाएंगे. इन्हें चुनने में अपनी हेयरस्टाइल और लेटेस्ट फैशन का ध्यान रखें. डाई खरीदने के साथसाथ हेयर डाई का दूसरा सामान भी खरीद लें, जैसे तौलिया, कंघी, हेयर ब्रश, बाउल वगैरह.

डाई करने से पहले अच्छे ब्रांड के शैंपू से बालों को धो लें, फिर सूखने पर कलर करें और उतनी देर तक कलर लगाएं जितना समय निर्देश में लिखा हो. फिर बालों को धो कर कंडीशनर का इस्तेमाल करें ताकि बालों की चमक बरकरार रहे.

प्लास्टिक, कांच या चीनी मिट्टी के बरतन में ही हेयर कलर डालें. किसी धातु के बरतन का इस्तेमाल न करें. बालों पर दोबारा डाई लगाते समय भी कंपनी के दिशानिर्देशों का पालन करें वरना जरूरत से ज्यादा गहरा काला रंग बालों को अजीब सा लुक दे देता है.

डाई करने से कई लोगों को सिर में एलर्जी हो जाती है इसलिए हर बार डाई के इस्तेमाल से पहले चमड़ी की एलर्जी की जांच जरूर करें. भौंहों पर डाई भूल कर भी न लगाएं, इस से अंधेपन का खतरा रहता है. अगर कलर लगा रहे हैं तो अमोनिया फ्री कलर ही खरीदें.

आजकल ब्यूटीपार्लर, सैलून या ब्यूटी ऐक्सपर्ट भी अमोनिया फ्री कलर इस्तेमाल करने की ही सलाह देते हैं. अमोनिया एक कठोर क्लीनिंग कैमिकल है जो बालों और चमड़ी के लिए अच्छा नहीं होता है.

अगर डाई लगाना झंझट भरा काम लगता?है या आप को इस का तजरबा नहीं है तो किसी की मदद से बालों पर कलर करें, नहीं तो ब्यूटीपार्लर में ऐक्सपर्ट से करवाएं. बाजार में ऐसे डाई भी मौजूद हैं जो सीधा बालों पर लगा सकते हैं.

आजकल जो दिखता है वही बिकता है का जमाना है. आप भी डाई लगा कर जवान दिखेंगे तो हमेशा एक ऊर्जा से लैस रहेंगे. आज बाल केवल इसलिए डाई नहीं किए जाते कि वे सफेद हो गए हैं, बल्कि ऐसा करना फैशन का सिंबल भी बन गया है.

अफसाना एक दीपा का : भाग 1

34 वर्षीय दीपा वर्मा का भरापूरा गदराया बदन किसी भी मर्द की नीयत बिगाड़ने के लिए काफी था. वजह यह कि दीपा की आंखों में पुरुषों के लिए एक आमंत्रण सा होता था. जो पुरुष इस आमंत्रण को समझ स्वीकार कर लेता था, वह फिर उस के हुस्न और अदाओं से खुद को आजाद नहीं कर पाता था.

ऐसा ही कुछ उस से उम्र में 8-10 साल छोटे धर्मेंद्र गहलोत के साथ हुआ था. धर्मेंद्र प्रसिद्ध धर्मनगरी उज्जैन के देवास रोड पर अपनी पत्नी के साथ रहता था. पेशे से मांस व्यापारी इस युवक की जिंदगी सुकून से गुजर रही थी. अब से कोई 3 साल पहले वह दीपा से मिला था तो पहली नजर में ही उस पर फिदा हो गया था.

दीपा को देख कर धर्मेंद्र को यह तो समझ आ गया था कि वह शादीशुदा है. उस के गले में लटका मंगलसूत्र और मांग का सिंदूर उस के शादीशुदा होने की गवाही दे रहे थे.

उज्जैन का फ्रीगंज इलाका रिहायशी भी है और व्यावसायिक भी, इसलिए जो भी पहली दफा उज्जैन जाता है वह महाकाल और दूसरे मंदिरों के नामों के साथसाथ फ्रीगंज नाम के मोहल्ले से भी वाकिफ हो जाता है. शहर के लगभग बीचोंबीच बसे इस इलाके की रौनक देखते ही बनती है.

इसी इलाके में दीपा की साडि़यों पर फाल लगाने और पीको करने की छोटी सी दुकान थी, जिस से उसे ठीकठाक आमदनी हो जाती थी. करीब 3 साल पहले एक दिन धर्मेंद्र की पत्नी दीपा को अपनी साड़ी में फाल लगाने और पीको करने के लिए दे आई थी. उसे वहां से साड़ी लाने का टाइम नहीं मिल पा रहा था, इसलिए उस ने साड़ी लाने के लिए अपने पति धर्मेंद्र को भेज दिया. जब धर्मेंद्र दीपा की दुकान पर पहुंचा तो बेइंतहा खूबसूरत दीपा को देखता ही रह गया.

दीपा में कुछ बात तो थी, जो उसे देख धर्मेंद्र का दिल जोर से धड़कने लगा था. सामान्यत: बातचीत के बाद साड़ी ले कर जब उस ने दीपा को पैसे दिए तो उस की हथेली एक खास अंदाज में दबाने से वह खुद को रोक नहीं पाया.

धर्मेंद्र ने उस की हथेली दबा तो दी थी, लेकिन उसे इस बात का डर भी था कि कहीं दीपा इस बात का बुरा मान कर उसे झिड़क न दे.

दीपा ने इस हरकत पर कोई ऐतराज तो नहीं जताया बल्कि हंसते हुए यह जरूर कह दिया, ‘‘बड़े हिम्मत वाले हो जो पहली ही मुलाकात में हाथ दबा दिया.’’

इस जवाब से धर्मेंद्र का डर तो दूर हो गया पर दीपा के इस अप्रत्याशित जवाब से वह झेंप सा गया था. उसे यह समझ आ गया था कि अगर थोड़ी सी कोशिश की जाए तो यह खूबसूरत महिला जल्द ही उस के पहलू में आ जाएगी. कहने भर की बात है कि औरतें पहली नजर में मर्द की नीयत ताड़ जाती हैं पर यहां उलटा हुआ था. पहली ही नजर में धर्मेंद्र दीपा की नीयत ताड़ गया था.

धर्मेंद्र आया दीपा की जिंदगी में

दुकान से जातेजाते उस ने दीपा का मोबाइल नंबर ले लिया और उसे भी अपना नंबर दे दिया था. दीपा के हुस्न में खोए धर्मेंद्र को इस वक्त यह समझाने वाला कोई नहीं था कि वह कितनी बड़ी आफत को न्यौता दे रहा है. यही बात दीपा पर भी लागू हो रही थी, जो धर्मेंद्र के आकर्षक चेहरे और गठीले कसरती बदन पर मर मिटी थी.

जल्द ही दोनों के बीच मोबाइल पर लंबीलंबी बातें होने लगीं. ये बातें निहायत ही रोमांटिक होती थीं. जिस में यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन किस को बहका और उकसा रहा है. दोनों शादीशुदा और खेलेखाए थे, इसलिए जल्द ही एकदूसरे से इतने खुल गए कि मिलने के लिए बेचैन रहने लगे.

सैक्सी बातें करतेकरते दोनों का सब्र जवाब देने लगा था. लेकिन पहल कौन करे, इस पर दोनों ही संकोच कर रहे थे. धर्मेंद्र ने पहल नहीं की तो एक दिन दीपा ने ही उसे फोन पर आमंत्रण भरा ताना मारा, ‘‘फोन पर ही सब कुछ करते रहोगे या फिर कभी मिलोगे भी.’’

बात अंधा क्या चाहे दो आंखें वाली थी. सो धर्मेंद्र ने मौका न गंवाते हुए कहा, ‘‘आ जाओ, आज ही मिलते हैं महाकाल मंदिर के पास.’’

इस मासूमियत पर दीपा जोर से हंस कर बोली, ‘‘मंदिर में क्या मुझ से भजन करवाना है. एक काम करो, तुम मेरे घर आ जाओ.’’ दीपा ने सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि उसे अपने घर का पता भी दे दिया.

अब कहनेसुनने और सोचने को कुछ नहीं बचा था. धर्मेंद्र के तो मानो पर उग आए थे. वह बिना वक्त गंवाए दीपा के घर पहुंच गया, जहां वह सजसंवर कर उस का इंतजार कर रही थी. दरवाजा खुलते ही उस ने दीपा को देखा तो अपने होश खो बैठा. एक निहायत खूबसूरत महिला उस पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थी. वह भी बगैर किसी मांग या खुदगर्जी के. यह खयाल ही धर्मेंद्र को और मर्द बनाए दे रहा था.

दरवाजा बंद होते ही दोनों एकदूसरे से कुछ इस तरह लिपटे कि लंबे वक्त तक अलग नहीं हुए और जब अलग हुए तो एक अलग दुनिया में थे, जहां भलाबुरा, नैतिकअनैतिक, जायजनाजायज कुछ नहीं होता. होती है तो बस एक जरूरत जो रहरह कर सिर उठाती है.

चोरीछिपे बनाए गए नाजायज संबंधों का लुत्फ ही कुछ अलग होता है, यह बात दीपा और धर्मेंद्र की हालत देख कर समझी जा सकती थी. जब भी दीपा का मन होता, वह धर्मेंद्र को फोन कर के बुला लेती थी.

कुछ महीनों बाद धर्मेंद्र ने दीपा की निजी जिंदगी में भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. उसे हैरानी इस बात की थी कि कोई शादीशुदा औरत कैसे अपने पति के होते हुए उस की आंखों में धूल झोंक कर संबंध बना लेती है. इस दौरान धर्मेंद्र ने दीपा पर काफी पैसा लुटाया था.

दीपा का झूठ आया सामने

अपनी निजी जिंदगी से ताल्लुक रखते सवालों पर दीपा ज्यादा दिन खामोश नहीं रह पाई और उस ने आधी सच्ची और आधी झूठी कहानी धर्मेंद्र को यह बताई कि उस के पति का नाम दिलीप शर्मा है, जो नजदीक के गांव में खेती करते हैं और कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं. जाने क्यों धर्मेंद्र को दीपा झूठ बोलती लगी. अब उस के सामने दिक्कत यह थी कि वह अपनी मरजी या जरूरत के मुताबिक दीपा के पास नहीं जा सकता था क्योंकि उस का पति दिलीप कभी भी आ सकता था.

दीपा का बोला हुआ जो झूठ धर्मेंद्र के दिलोदिमाग में खटक रहा था, वह जल्द ही सामने आ गया. पता चला कि दिलीप शर्मा उस का असली पति नहीं है, बल्कि वह दिलीप की रखैल है, जिसे आजकल की भाषा में लिवइन कहा जाता है. यह खुलासा धर्मेंद्र के लिए एक तरह का झटका ही था, लेकिन जल्द ही इस का भी तोड़ निकल आया.

इस दिलचस्प तोड़ या समाधान को समझने के पहले दीपा की गुजरी जिंदगी जानना जरूरी है, जिसे देख कर कहा जा सकता है कि वह एक बदकिस्मत औरत थी. हालांकि इस बदकिस्मती की एक हद तक जिम्मेदार भी वही खुद थी.

उज्जैन के मशहूर काल भैरव मंदिर से हर कोई वाकिफ है क्योंकि वहां शराब का प्रसाद चढ़ता है. काल भैरव जाने वाला एक रास्ता जेल रोड कहलाता है, जहां जेल बनी हुई है. जेल अफसर भी यहां बनी कालोनी में रहते हैं. दीपा इसी जेल रोड की ज्ञान टेकरी के एक मामूली से परिवार में पैदा हुई थी.

कुदरत ने दीपा पर मेहरबान होते हुए उसे गजब की खूबसूरती बख्शी थी. उसे एक ऐसा रंगरूप मिला था, जिसे पाने के लिए तमाम महिलाएं तरसती हैं.

बच्चों में तेजी से बढ़ता कुपोषण और टौनिक

बच्चों को तंदुरुस्त बनाने के ख्वाहिशमंद न हों, लेकिन बच्चों की अच्छी सेहत के लिए उन्हें खानेपीने के अलावा कौन से ऐसे टौनिक दिए जाने चाहिए जो बच्चों को कोई नुकसान न पहुंचाते हों, यह सभी को नहीं मालूम होता है.

सरकारी इश्तिहार बताते हैं कि इन दिनों बच्चों में कुपोषण तेजी से बढ़ रहा है. दुनियाभर की एजेंसियां अपनेअपने सर्वे में बच्चों की गिरती सेहत को ले कर आंकड़ों के जरीए चिंता जता रही हैं. तमाम आंकड़ों से एक बात उजागर होती है कि बच्चों की बेहतर सेहत के लिए उन्हें जरूरी विटामिन, प्रोटीन और दूसरे जरूरी तत्त्व नहीं मिल पा रहे हैं.

पर क्या बिना डाक्टरी सलाह के टौनिक दिए जाने चाहिए? इस सवाल पर मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के रिटायर्ड सर्जन और सीनियर डाक्टर कौशल किशोर श्रीवास्तव कहते हैं कि बिलकुल दिए जा सकते हैं और दिए जाने भी चाहिए. मल्टीविटामिन और विटामिन बी कौंप्लैक्स के टौनिक तो बच्चों के लिए बहुत जरूरी होते हैं जो अलगअलग कंपनियां अलगअलग नामों से बनाती हैं.

बी कौंप्लैक्स की कमी आम है, यह कई विटामिनों का ग्रुप है. अकसर रोजाना की खुराक से इन विटामिनों की भरपाई नहीं हो पाती जिस से बच्चे को भूख कम लगती है और वह कमजोर और चिड़चिड़ा होने लगता है. किसी भी कैमिस्ट की दुकान से ये टौनिक खरीद कर बच्चे को दिए जा सकते हैं लेकिन इन्हें लगातार ज्यादा वक्त तक नहीं देना चाहिए.

इसी तरह बढ़ते बच्चों में कैल्शियम की कमी की शिकायतें भी आम हैं. मजबूत हड्डियों के लिए कैल्शियम बेहद जरूरी है इसलिए बच्चों को कैल्शियम की गोली देना हर्ज की बात नहीं, क्योंकि हड्डियां बनती ही कैल्शियम से हैं.

दांतों और मसूढ़ों के लिए भी कैल्शियम जरूरी है. छोटे बच्चों को चूसने वाली गोलियां और बड़े बच्चों को पानी से खाने वाली गोलियां दी जा सकती हैं. कुदरती तौर पर दूध कैल्शियम का बड़ा जरीया है.

खून यानी आयरन की कमी से भी बच्चे कमजोर होते हैं इसलिए वक्तवक्त पर उन्हें आयरन के टौनिक दिए जाने चाहिए. ये टौनिक भी कई नामों से दवा की दुकान पर मिलते हैं. कैल्शियम के साथ विटामिन डी वाले टौनिक दिए जाएं तो बच्चे को और फायदा होता है. कैल्शियम और विटामिन डी के टौनिक एक महीने तक दिए जा सकते हैं.

विटामिनों में विटामिन ए और विटामिन सी के टौनिक भी बच्चों को देने चाहिए. ये दोनों विटामिन भी सेहत के लिए अहम हैं.

विटामिन की तरह प्रोटीन भी बच्चों के लिए जरूरी तत्त्व है जो दालों में खूब पाया जाता है, फिर भी इस की पूरी खुराक बच्चों को नहीं मिल पाती है. कई कंपनियां इन्हें पाउडर की शक्ल में बेचती हैं.

हालांकि बाजार में मिलने वाले प्रोटीन के पाउडर थोड़े महंगे होते हैं लेकिन इन्हें वक्तवक्त पर बच्चों को देते रहना चाहिए जिस से उन के शरीर में प्रोटीन की कमी न रहे.

मांबाप को चाहिए कि वे बच्चों को दूध, मौसमी फल, हरी सब्जियां और दालें खाने में ज्यादा से ज्यादा दें. इन में कुदरती तौर पर विटामिन, प्रोटीन, आयरन और कैल्शियम जैसी जरूरी चीजें रहती हैं.

टौनिक खरीदते वक्त ध्यान रखना चाहिए कि वह किसी बड़ी नामी कंपनी और अच्छे ब्रांड का हो. उस की ऐक्सपायरी डेट भी जरूर देख लें.

मैं हूं एक वर्किंग वूमन…

जैसे ही सूरज आकाश में अपनी लालिमा बिखरेता है, शुरू हो जाता है मेरे भी पुराने दिन वाले अंतहीन कामों का सिलसिला,

सपनों की दुनिया से निकल मेरा वजूद खुद को समेटता है. जिंदगी की दौड़ में बस भागती ही जाती हूं,

मैं हूं एक वर्किंग वूमन मैं पैसे कमाती हूं.

किया था कब सुकून से स्नान पिछली बार, कामों को निबटाने में ही वक्त दौड़ता चला जाता है.

कभी तो सुकून से अपने बदन को पोंछ लिया करो, कहते हुए मेरा तौलिया अकसर मुझ से रूठ जाता है.

सोलह शृंगार के लिए फुरसत कहां, 2 कंघी से भी सिर्फ बाल छुआती हूं. मैं हूं एक वर्किंग वूमन मैं पैसे कमाती हूं.

अखबार पढ़ते चाय पीने की ख्वाहिश अधूरी ही रही,

आपाधापी में चाय वाला कप भी अकसर आधा ही रह जाता है. कामवाली के समय पर आने के लिए दुआएं करती हूं,

मैं हूं एक वर्किंग वूमन मैं पैसे कमाती हूं.

गुडि़या हमेशा शिकायत करती है, मुझे स्कूल क्यों नहीं छोड़ने आती हो.

प्यारी सी झिड़की दे कर स्कूल आने का झूठा वादा कर आती हूं, मैं हूं एक वर्किंग वूमन मैं पैसे कमाती हूं.

पलपल बदलती जा रही है दुनिया मगर,

मेरा वही प्रैजैंट, फ्यूचर और पास्ट है. कभी शेयर आटो की लंबी कतार में खड़ी हूं,

कभी भागतेभागते पकड़नी डोंबिवली सीएसटी फास्ट है. फर्स्ट क्लास का किराया दे कर भी रोज खड़ेखड़े ही आतीजाती हूं,

मैं वर्किंग वूमन अनजाने मुंबई शहर की भीड़ का हिस्सा बन जाती हूं.

औफिस पहुंच कर झट से काम में लग जाती हूं, फिर शाम होते ही रात की चिंता सताती है.

बच्ची को पालनाघर से और सब्जीकिराना लाना, सोच कर चाल बढ़ती जाती है.

सोसायटी की अपडेट लिफ्ट में ही तो पाती हूं, मैं वर्किंग वूमन पैसे कमाने के साथ अपने सारे रिश्ते भी बखूबी निभाती हूं.

शाम को पति महोदय बैग सोफे पर रख बैठ जाते हैं टीवी की ओर,

मैं झट से रसोई के कामों में लग जाती सब कुछ छोड़, बेटी के होमवर्क के साथ कढ़ाई भी चलती रहती है,

सासबहू वाले सीरियल देख सकूं इतनी फुरसत कहां, मैं हूं एक वर्किंग वूमन मैं पैसे कमाती हूं.

यह माना पढ़लिख कर काम करने का निर्णय भले हमारा है,

किंतु थोड़ीबहुत मदद कर के पुरुष अब भी बना बेचारा है. नारी होती है सहनशील यह कह कर हमें अच्छा उल्लू बनाया है,

मल्टीटास्किंग का तमगा दे कर घर और बाहर दोनों का काम टिकाया है. पति, तुम्हारे कहने से पहले ही मैं खुद को होम मिनिस्टर मानती हूं,

मैं वर्किंग वूमन हूं जनाब, ये सब चालाकियां बहुत अच्छे से जानती हूं.

शनिवारइतवार भी लगता है मानो सिर्फ मुंह दिखा कर चले जाते हैं, हफ्ते भर के रुके हुए कई काम फिर भी अधूरे रह जाते हैं.

सुबह मेरी गुडि़या जब हाथ पकड़ कर कहती है ममा आज औफिस मत जाओ, तब उस मासूम का हाथ छुड़ाते वक्त आंसू आंखों में ही रह जाते हैं.

फिर उदास हो सोचती हूं आखिर इसी की खुशियों के लिए तो मैं कमाती हूं, हाय, मैं कैसी वर्किंग वूमन हूं, जो अपनी बच्ची की भी न हो पाती हूं.

जीवन के सभी संघर्षों का सामना करते हुए मैं स्मार्ट वूमन कहलाती हूं,

आखिर में इस बात की खुशी है मुझे कि मैं वर्किंग वूमन की श्रेणी में आती हूं.

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