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सलमान खान करेंगे नूतन की पोती को लौन्च

सुपरस्टार सलमान खान नए टैलेंट को बौलीवुड में लौन्च करते हैं. सोनाक्षी सिन्हा, जरीन खान, आयुष शर्मा, सूरज पंचोली, अथिया शेट्टी से लेकर कई नए टैलेंट को सलमान खान ने इंडस्ट्री में लौन्च किया है. अब सलमान एक और स्टार डोटर को लौन्च करने जा रहे हैं.

ये कोई और नहीं बल्कि दिग्गज अभिनेत्री नूतन की पोती प्रनूतन है. सलमान ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी है कि नूतन की पोती प्रनूतन को लॉन्च करना उनके लिए गौरव की बात है.

सलमान ने प्रनूतन के लॉन्च की जानकारी इंस्टाग्राम पर दी. सलमान ने प्रनूतन की तस्वीर ट्वीट करते हुए कहा,”ये लो! जहीरो (जहीर इकबाल) की हीरोइन मिल गई. स्वागत करो प्रनूतन बहल का. नूतन जी की पोती और मोन्या की बेटी को बड़े पर्दे पर पेश कर गौरवान्वित हूं.”

प्रनूतन पेशे से वकील हैं. प्रनूतन ने अपनी शुरुआत पढ़ाई मुंबई से की है. उन्होंने मुंबई यूनिवर्सिटी से लौ की डिग्री हासिल की है.

सलमान की नाराज़गी के बाद बदला गया बिग बॉस का टाइम?

पिछले साल बिग बॉस को 9 बजे के प्राइम स्लॉट से हटा कर 10.30 बजे कर दिया गया था जिससे शो की टीआरपी पर असर पड़ा था. ऐसा माना गया था कि शो में फैमिली कंटेंट न होने से समय बढ़ाया गया है.

शो के होस्ट सलमान खान ने इसे लेकर अपनी नाराज़गी भी जाहिर की थी. इस शो को सिर्फ वीकेंड यानी शुक्रवार और शनिवार को ही प्रसारित किया जाता था. इस बदलाव के चलते बिग बॉस को खासा नुकसान हुआ. हालात ये थे कि कलर्स के ही शो नागिन की टीआरपी बिग बॉस से ज्यादा हो गई.

एक रिपोर्ट के अनुसार वीकेंड पर सलमान खान के होने के बावजूद सोनी पर चल रहे ‘द कपिल शर्मा शो’ को ज्यादा लोग देखने लगे. टीआरपी में हुए इस नुकसान को सलमान ने भी महसूस किया.

पिछली गलतियों से सबक लेते हुए इस बार शो के प्रसारण के समय को बदल दिया गया है. अब इसके प्रसारण का समय 9:00 से 10:00 तक कर दिया गया है. हालांकि टीआरपी पर इसका कितना असर पड़ेगा ये तो इस हफ्ते की टीआरपी आने के बाद ही मालूम पड़ेगा. लेकिन इस बदलाव से शो को पहले दिन काफी दर्शक मिले और सोशल मीडिया पर अच्छा ट्रैफिक भी मिला.

प्रैगनैंसी : कैसे बदले समाज की मानसिकता

जिस ऐक्ट्रैस की एक झलक पाने को उस के फैंस बेताब रहते थे वही फैंस अब उस ऐक्ट्रैस के मां बनने के बाद उस के फूले गालों, थुलथुल शरीर को देख भौंहें सिकोड़ने लगे यानी ऐक्ट्रैस की बदली शारीरिक बनावट उन्हें सुहा नहीं रही. अपनी फेवरेट ऐक्ट्रैस की बिगड़ी फिगर को ले कर वे उस की इतनी आलोचना कर रहे हैं मानो मां बन कर उस ने कोई अपराध कर दिया हो. फैंस के इस आलोचनात्मक व्यवहार ने उस ऐक्ट्रैस को इतना डिप्रैस कर दिया है कि वह तमिल अदाकारा अब इंडस्ट्री में दोबारा कैमरे को फेस करने तक का आत्मविश्वास खो चुकी है.

हर महिला की यही कहानी

यह कहानी इस महिला कलाकार की ही नहीं वरन हर आम महिला की भी है. दरअसल, महिलाओं को प्रकृति की सब से खूबसूरत रचना का खिताब प्राप्त है. उन की खूबसूरती का आकलन उन की शारीरिक बनावट और रूपसौंदर्य से किया जाता है. लेकिन मां बनने के बाद उन की बदली शारीरिक बनावट  उन से खूबसूरत होने का यह खिताब छीन लेती है

इस बात का और भी अधिक एहसास उन के घर वालों और रिश्तेदारों की तीखी नजरें और उन की फिगर को ले कर दी गई हिदायतें कराती हैं. ऐसे में वे खुद को साधारण महिला महसूस करने लगती हैं. इस से सब से ज्यादा नुकसान उन के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को होता है. उन्हें खुद में कमियां नजर आने लगती हैं. वे खुद को शर्मसार सा महसूस करने लगती हैं खासतौर पर तब जब सार्वजनिक स्थल पर अपने शिशु को स्तनपान कराना पड़ता है. हालांकि इस स्थिति का सामना हर महिला को मां बनने के बाद करना पड़ता है, लेकिन उन्हें ऐसा करने में झिझक महसूस होती है. झिझक होना जाहिर भी है, क्योंकि हर महिला को इस बात का डर सताने लगता है कि कहीं कोई उसे स्तनपान कराते हुए देख तो नहीं रहा.

नहीं बदली सोच

दरअसल, सामाजिक रीतिरिवाजों की बेडि़यों मेें जकड़ी महिला को आज भी सार्वजनिक स्थल पर स्तनपान कराते कोई पराया मर्द देख ले तो वह आत्मग्लानि से भर जाती है. उस का मन उसे कचोटने लगता है कि उफ, उसे पराए मर्द ने स्तनपान कराते देख लिया. वैसे आधुनिक युग में पुरुषों में भी कोई खास बदलाव नहीं आया. आधुनिक युग में भी पुरुषों की सोच पुरातन ही है. आज भी महिला की ब्रैस्ट उन्हें  सैक्स्युलाइज मैटीरियल लगती है और यदि कोई स्तनपान कराती महिला दिख जाए तो उसे ऐसे टकटकी लगाए देखते हैं मानो पोर्न फिल्म देख रहे हों.

पुरुष ही नहीं, यदि दिल्ली मैट्रो के महिला कोच की बात की जाए तो आप को यह जान कर हैरानी होगी कि इस कोच में भी यदि कोई महिला अपने शिशु को स्तनपान करा रही होती है, तो कोच में मौजूद लड़कियों और महिलाओं की नजरें उसे घूर रही होती हैं. ये घूरती नजरें ही स्तनपान कराने वाली महिला को अपमानित महसूस कराती हैं. उस के मन में यह डर बैठ जाता है कि पब्लिक प्लेस में ब्रैस्टफीडिंग कराने पर सब उसे ही देखेंगे. ब्रैस्टफीडिंग मां के लिए अपने प्राइवेट बौडी पार्ट्स को पब्लिकली ऐक्सपोज करने की मजबूरी होती है. मगर लोगों की तीखी नजरें उस के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती हैं. अब यहां यह तय कर पाना मुश्किल नहीं कि बदसूरती लोगों की सोच में है या एक मां की शारीरिक बनावट में. मां बनना किसी भी महिला के लिए संपूर्ण होने का अनुभव है और अपने शिशु को स्तनपान कराना उस का हक. गर्भधारण करने के बाद से ही महिला के शरीर में बदलाव शुरू हो जाते हैं और शिशु के जन्म के बाद तक  सिलसिला जारी रहता है.

मां बनने पर अपने शिशु की देखभाल में वह इतनी खो जाती है कि अपने स्वास्थ्य पर ध्यान न दे पाना, नींद पूरी न होना और अपनी सोशल लाइफ से मुंह फेर लेना उसे मानसिक और शारीरिक तौर पर पूरी तरह बदल देता है. लेकिन समाज इस बात के लिए मां की सराहना करने की जगह उस की शारीरिक बनावट का मखौल उड़ाता है. उसे बदसूरत होने का एहसास कराता है. इन्हीं कारणों से आज ब्रैस्टफीडिंग महिलाओं के लिए हौआ बन चुकी है.

कस्तूरी का साहसी कदम

इतना ही नहीं कुछ महिलाएं तो कभी गर्भधारण न करने तक का मन बना लेती हैं ताकि उन की फिगर न बिगड़े. लेकिन महिलाओं की इस मानसिकता को गलत साबित किया पिछले दिनों इंटरनैट पर वायरल हुए साउथ इंडियन ऐक्ट्रैस कस्तूरी के सेमीन्यूड फोटोशूट ने. इस फोटोशूट में कस्तूरी अपने बच्चे को ब्रैस्टफीडिंग कराते दिख रही हैं. यह फोटोशूट कुछ समय पहले विश्वप्रसिद्ध फोटोग्राफर जेड बैल द्वारा अपनी बुक सीरीज ‘ए ब्यूटीफुल बौडी प्रोजैक्ट: द बौडीज औफ मदर्स’ के लिए किया गया था. इस बुक सीरीज में विश्व भर से चुनी गईं 80 मांओं की गर्भधारण के समय और उस के बाद की शारीरिक खूबसूरती पर चर्चा की गई है.

फोटोशूट को सोशल मीडिया में अपलोड करने और उस के वायरल होने के बाद लोगों की मिल रही प्रतिक्रियाओं से हैरान कस्तूरी कहती हैं, ‘‘मुझे आश्चर्य है कि लोगों ने मेरे इस फोटोशूट को इतना पसंद किया और अच्छी प्रतिक्रियाएं दीं. वाकई मां बनना एक खूबसूरत एहसास है. इस से भी ज्यादा गर्व की बात एक मां के लिए अपने शिशु को ब्रैस्टफीड कराना है. लेकिन आज भी गर्भधारण और मां बनने के बाद महिलाओं को ब्रैस्टफीडिंग को ले कर हिचक महसूस होती है खासतौर पर किसी के सामने ब्रैस्टफीडिंग कराना उन्हें अपमानजनक लगता है. लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. एक मां अपने शिशु को कहीं भी, कभी भी ब्रैस्टफीडिंग करा सकती है और मेरा फोटोशूट भी मांओं को इस के लिए प्रोत्साहित करता है.’’

मानसिकता बदलना जरूरी

कस्तूरी के इस कदम को लोगों ने भले ही प्रोत्साहित किया हो, लेकिन प्रोत्साहन के साथ ही लोगों को अब पब्लिक प्लेस पर ब्रैस्टफीडिंग को ले कर अपनी मानसिकता बदलने की भी जरूरत है ताकि सार्वजनिक स्थलों पर जरूरत पड़ने पर यदि किसी मां को अपने शिशु की भूख शांत करने के लिए स्तनपान कराना पड़े, तो उसे झिझक महसूस न हो. इस के अतिरिक्त इस फोटोशूट को देखने के बाद लोगों के लिए यह समझ पाना और आसान होगा कि एक स्त्री को जिंदगी के कई मोड़ों पर चुनौतियों का सामना कर नए रिश्तों को निभाना पड़ता है. इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने में शारीरिक और मानसिक तौर पर स्त्री में कई बदलाव भी आते हैं. कस्तूरी अकेली नहीं हैं, जिन्होंने अपनी झिझक को दूर कर इस फोटोशूट में भाग लिया, उन की ही तरह विश्व भर के अलगअलग देशों से 80 मांएं और हैं, जो ओपनली ब्रैस्टफीडिंग और प्रैगनैंसी के बाद अपनी शारीरिक बनावट में आए बदलाव को कोसती नहीं, बल्कि उन्होंने इस खूबसूरत बदलाव को स्वीकार किया है.

इस फोटोशूट को अंजाम देने वाली फोटोग्राफर जेड बैल, जो खुद भी एक मां हैं, कहती हैं, ‘‘मां बनने के बाद अपनी बिगड़ी शारीरिक बनावट को देख मैं डर गई थी. मुझे अवसाद ने घेर लिया था. लेकिन मैं खुद को किसी तरह से स्टूडियो तक लाई और अपनी कुछ तसवीरें खिंचवाईं. कुछ समय बाद मुझे ऐसी महिलाओं के फोन आने लगे, जो प्रैगनैंसी के बाद अपनी खराब हो चुकी फिगर की तसवीरें खिंचवाने के लिए उत्सुक थीं. इस घटना के बाद ही मुझे इस प्रोजैक्ट का खयाल आया.’’

फोटोग्राफर अरुण पुनालुर का कहना है, ‘‘जेड बैल के लिए शूट करने वाली कस्तूरी पहली भारतीय महिला हैं. उन के इस कार्य की बहुत लोगों ने आलोचना की, लेकिन यह एक शूट है और वे एक मौडल. कस्तूरी ने जो किया वह उन का हक है. वैसे भी कौन सी महिला ऐसा करने के लिए तैयार होगी, जो कस्तूरी ने किया. बौडी ऐक्सपोज तो छोडि़ए कुछ लोग तो सार्वजनिक तौर पर किसी सामाजिक मुद्दे पर अपनी राय तक देने से कतराते हैं. ऐसे में एक महिला हो कर कस्तूरी ने जो फोटोशूट कराया वह सराहनीय है.’’

प्रैगनैंसी के बाद शारीरिक बदलाव

महिलाओं की प्रैगनैंसी के बाद शारीरिक बनावट बिगड़ना आम है. लेकिन बहुत सी महिलाएं इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पातीं. मसलन, वजन का बढ़ना, नींद पूरी न हो पाना, अपने लिए समय न निकाल पाना उन्हें अवसाद से ग्रस्त करता है. इन बातों को अकसर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इन पर जागरूकता महिलाओं को सही वक्त पर मदद के लिए आवाज उठाने के लिए प्रेरित करती है. इस बाबत ट्रैवल ब्लौगर इंद्रा थुरावुर कहती हैं, ‘‘यह फोटो एलबम मातृत्व एवं मां द्वारा अपने शिशु की भूख को शांत करने के लिए स्तनपान कराए जाने की महानता का प्रदर्शन करता है. लेकिन सोशल मीडिया में यह आज भी एक संवेदनशील मुद्दा है. लोगों को पता ही नहीं कि इस मुद्दे पर कैसे बात की जानी चाहिए. स्तनपान मां और शिशु के रिश्ते का सब से अहम पहलू है. फिर भी कुछ महिलाएं अपने शिशु को सिर्फ स्तन का आकार खराब हो जाने के डर से स्तनपान नहीं करातीं. लेकिन कभी उन मांओं के बारे में सोचा है, जो खराब जीवनशैली की वजह से अपने शिशु को स्तनपान नहीं करा पातीं और तड़पती रह जाती हैं. मां के दूध से अच्छा एक शिशु के लिए और कुछ भी नहीं है.

करें नई शुरुआत

शिशु के जन्म के बाद मां के लिए उस का बच्चा पहली प्राथमिकता बन जाता है. ऐसे में खुद पर ध्यान देना एक मां के लिए मुमकिन नहीं हो पाता. निम्न टिप्स को अपनाकर आप अपनी खोई हुई खूबसूरती को फिर से हासिल कर सकती हैं: द्य शिशु के पालनपोषण की बड़ी जिम्मेदारी मां को ही निभानी पड़ती है. लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि पिता का शिशु की देखभाल में हाथ बंटाना मना है. शिशु के छोटेमोटे काम कराने के लिए पति की मदद लें. इस से आप को अपने लिए अतिरिक्त समय मिलेगा.

मां बनने से पहले जिस तरह आप सजीसंवरी रहती थीं उसी तरह अब भी अपने रूपसौंदर्य को संवारने के लिए समय निकालें. अपने बालों और चेहरे को साफसुथरे तरीके से संवारें. खुद को सजासंवरा देख कर आप का खोया आत्मविश्वास फिर से लौट आएगा.

शरीर को फिट रखने के लिए व्यायाम करना बहुत जरूरी है. लेकिन व्यायाम करने से पहले एक बार डाक्टर की सलाह जरूर लें.

शिशु के कामकाज को सफलतापूर्वक अंजाम देतेदेते मां के पास इतना समय नहीं होता की वह चैन की नींद ले सके, इसलिए जब भी मौका मिले सो जाना चाहिए.

अपने खानेपीने का विशेष ध्यान रखें. पतला होने के चक्कर में खानेपीने में कमी न करें, क्योंकि इस का असर आप के स्वास्थ्य के साथसाथ ब्रैस्टफीडिंग पर भी पड़ेगा.

अपने ड्रैसिंग सैंस पर भी ध्यान दें. आउटफिट बहुत हद तक शारीरिक बनावट को संवार देते हैं, इसलिए न तो बहुत अधिक चुस्त और न ही बहुत अधिक ढीले कपड़े पहनें.

खुद को पैंपर करें. जाहिर है मां बनने के बाद आप की जिंदगी बदल जाती है. ऐसे में अपने लुक्स में भी आप बदलाव कर सकती हैं. इस के लिए नया हेयरकट एक अच्छा विकल्प है. साथ ही मेकअप का अंदाज बदल कर भी खुद को नया लुक दे सकती हैं.

40 के बाद भी दिखें जवां

बेशक महिला हमेशा खूबसूरत और जवां दिखना चाहती हैं, लेकिन उम्र बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसे रोका नहीं जा सकता. हालांकि मेकअप ऐसा विकल्प है, जो चेहरे से कुछ साल तक की उम्र छिपा सकता है, लेकिन चेहरे पर हमेशा मेकअप लगा कर रखना भी संभव नहीं है. 40 की उम्र पार होते ही चेहरे पर बढ़ती उम्र की लकीरें नजर आनी शुरू हो जाती हैं, जो 50 तक पहुंचतेपहुंचते गहरी होती जाती हैं. लेकिन उम्र बढ़ने के बावजूद चमकती और कसी हुई त्वचा सभी की चाहत होती है.

आमतौर पर लोग सुंदरता को कायम रखने के लिए घरेलू उपाय अपनाते हैं, लेकिन अगर घरेलू उपायों के साथ ही आज के नए जमाने की ब्यूटी टैक्नीक का भी सहारा लिया जाए तो लंबे समय तक सैलिब्रिटीज जैसी खूबसूरती बरकरार रह सकती है, जो उम्रदराज होने पर भी अपनी उम्र से छोटी नजर आती हैं. इतना ही नहीं, इस तरह की तकनीक से त्वचा की रंगत भी उजली की जा सकती है, जिसे कई बौलीवुड ऐक्ट्रैस अपना चुकी हैं. इस के लिए आप को किसी ऐक्सपर्ट और ऐक्सपीरियंस्ड डर्मैटोलौजिस्ट और कौस्मैटोलौजिस्ट का चयन करना होता है, जो आप की त्वचा और उम्र के हिसाब से उचित तकनीक का प्रयोग करे.

आइए, जानते हैं कि 40 के पार की महिलाओं के लिए कौनकौन सी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं:

त्वचा की कसावट के लिए बोटोक्स: बोटोक्स का इंजैक्शन मसल्स में लगाया जाता है. यह त्वचा पर उभरी झुर्रियों और लकीरों को मिटान का काम करता है, इसलिए इस से उम्र कम लगने लगती है. हालांकि इस इंजैक्शन का असर स्थाई नहीं रहता. समयसमय पर इसे लगवाते रहना पड़ता है. 30 से 60 साल तक की उम्र के लोग इस का इस्तेमाल कर रहे हैं और 40 से अधिक उम्र के लोगों में इस का प्रचलन अधिक है. इस में एक सिटिंग में क्व8 हजार से क्व12 हजार तक का खर्च आता है.

फिलर्स: त्वचा में कसाव लाने व झुर्रियों को मिटाने के लिए फिलर्स का प्रयोग किया जाता है. यह भी एक तरह का इंजैक्शन होता है और त्वचा की ऊपरी सतह को ही छूता है. यह बोटोक्स की तरह त्वचा के अंदर नहीं जाता. इस की सहायता से चेहरे को आकर्षक शेप में लाया जा सकता है.

लेजर थेरैपी: उम्र के हिसाब से बनने वाले त्वचा के दागधब्बे व गड्ढे मिटाने में यह लेजर थेरैपी कारगर साबित होती है. चेहरे के अनचाहे बालों को हटाने के लिए भी इस थेरैपी का प्रयोग किया जाता है.

लाइपोसक्शन: आमतौर पर 40 की उम्र के बाद से शरीर पर चरबी बढ़ने लगती है, जिस की वजह से शरीर का आकार बेडौल नजर आता है. लाइपोसक्शन ट्रीटमैंट चरबी की समस्या से मुक्ति दिलाता है, इसलिए मोटापा से परेशान लोग इस तकनीक का सहारा लेते हैं. इस के तहत एक छोटी सी सर्जरी के जरीए पेट या शरीर के दूसरे हिस्सों से फैट को गलाया जाता है. यह काम कई बार कुछ इंजैक्शनों की मदद से भी किया जाता है. इस ट्रीटमैंट में ज्यादा कष्ट नहीं होता.

स्किन पौलिशिंग: 40 की उम्र तक आतेआते हमारी त्वचा तमाम तरह के पर्यावरण और शारीरिक बदलाव संबंधी असर झेल चुकी होती है. धूप, टैनिंग, पिगमैंटेशन, दागधब्बे, झांइयां, मुंहासे, हर रोज का प्रदूषण और धूलमिट्टी हमारी त्वचा को धूमिल, अस्वस्थ, रूखी और बेजान बना देती है. धूमिल व बेजान हो चुकी त्वचा की ऊपरी परत को हटा कर इसे दोबारा जवां और निखरी बनाने में माइक्रोडर्माऐब्रोजन के जरीए स्किन पौलिशिंग की प्रक्रिया बेहद कारगर साबित होती है. इस प्रक्रिया में त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने के लिए उस में छोटेछोटे क्रिस्टल डाले जाते हैं और उन्हें तकनीकी तरीके से बेहद सौम्यता से त्वचा पर घुमाया जाता है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो आप की त्वचा को ऐक्फोलिएट और पौलिश करती है और त्वचा की अशुद्धियां निकालने की प्राकृतिक क्षमता को बढ़ाती है. आमतौर पर इसे चेहरे, गरदन, पीठ और हाथों को खूबसूरत, मुलायम और दागरहित बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

औक्सीजन इन्फ्यूजन स्किन थेरैपी: औक्सीजन न सिर्फ हमारे जीवन बल्कि शरीर के सभी अंगों की जीवनरेखा होता है. रक्तसंचार के माध्यम से शरीर के सभी हिस्सों, जिस में त्वचा भी शामिल है, तक औक्सीजन पहुंचता है. यह त्वचा की रिपेयरिंग और नवीनीकरण प्रक्रिया को बढ़ाता है और उसे फ्री रैडिकल्स से मुक्त करने में सहायक होता है. पर्यावरण संबंधी कारणों जैसे कि यूवी रेडिएशन और प्रदूषण का हमारी त्वचा और इस के रिपेयर होने एवं नवीनीकरण की प्राकृतिक क्षमता पर असर पड़ता है. औक्सीजन इन्फ्यूजन थेरैपी में त्वचा के भीतर औक्सीजन की डोज दी जाती है, जिस से इस की रिपेयरिंग और नवीनीकरण की क्षमता बढ़ती है. परिणामस्वरूप त्वचा पर से झांइयां, दागधब्बे हटते हैं और यह जवां और निखरी हुई दिखती है. इस में माइक्रोनीडलिंग जैट का इस्तेमाल करते हुए, त्वचा की अंदरूनी परत में औक्सीजन की डोज दी जाती है. यह प्रक्रिया ठीक उसी तरह से काम करती है, जैसे त्वचा के ऊपर लगाया गया कोई नमी बढ़ाने वाला तत्त्व अथवा सीरम करता है.

ब्रोलिफ्ट: ब्रोलिफ्ट यानी भौंहों को तीखापन देने के लिए भी बोटोक्स का इस्तेमाल किया जाता है. बोटोक्स जब किसी मांसपेशी में लगाया जाता है, तब यह मांसपेशी को आराम पहुंचाता है और वहां की बारीक रेखाएं और झुर्रियां हटाता है. आईब्रोज का आकार ठीक करने के लिए जब इस का इस्तेमाल होता है तब डाक्टर उन मांसपेशियों में बोटोक्स लगाते हैं, जिन के चलते भौंहें नीचे की ओर झुकी होती हैं. इस से भौंहों को ऊपर खींचने वाली मांसपेशी फांटेलिस सही ढंग से काम करती है. इस प्रक्रिया में सिर्फ कुछ मिनटों का ही समय लगता है और बेहद आसानी से भौंहों को आर्च शेप दे कर चेहरे को आकर्षक बना दिया जाता है.

त्वचा की चमक के लिए फिलर्स: उम्र बढ़ने पर प्रतिदिन के काम और औफिस व परिवार की जिम्मेदारी निभाना काफी थका देने वाला होता है. साथ ही मौसम की मार, नींद पूरी न होने और खराब खानपान से भी त्वचा पर खराब असर पड़ता है. परिणामस्वरूप त्वचा अपनी प्राकृतिक चमक खो देती है और उस पर बारीक रेखाएं नजर आने लगती हैं. ह्यालुरौनिक ऐसिड बेस्ड फिलर जैसे कि जुवेडर्म रिफाइन का एक सैशन त्वचा की खोई रंगत और चमक लौटा सकता है. अगर त्वचा का उभार कम हो गया है, तो जुवेडर्म वौल्यूमा अपने हाइड्रेटिंग और फिलिंग ह्यालुरौनिक ऐसिड जैल के गुणों से इसे वापस जवां बना देता है. यह प्रक्रिया आंखों के नीचे से काले घेरे व बारीक लाइनें हटाने और आप के होंठों को दिलकश बनाने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है.

स्किन लाइटनिंग: स्किन लाइटनिंग के जरीए फ्रैश और ग्लोइंग लुक आसानी से मिल सकता है. त्वचा के प्रकार के अनुसार डाक्टर यह सुनिश्चित करता है कि स्किन लाइटिंग के लिए किस प्रकार की प्रक्रिया जैसे टौपिकल कौस्मैटिक, कैमिकल पील या लेजर का प्रयोग किया जाएगा. स्किन लाइटनिंग ट्रीटमैंट की शुरुआत से पहले उस के फायदे और साइट इफैक्ट की जानकारी भी ले लेनी जरूरी होती है. ऐडवांस स्किन लाइटिंग ट्रीटमैंट के लिए स्किन टाइप के अनुसार 5-6 सैशन की आवश्यकता होती है. ट्रीटमैंट के कुछ दिनों बाद ही आप को अपनी त्वचा हलकी और उजली नजर आने लगेगी. इस के साथ ही अगर किसी को ऐक्ने, ओपन पोर्स, झुर्रियों या फोटो डैमेज जैसी समस्या है, तो लाइनिंग इफैक्ट के कारण इस में काफी फायदा नजर आएगा. ऐडवांस लेजर में विभिन्न प्रकार के पील्स और कौमेलन ट्रीटमैंट का प्रयोग किया जाता है.

ऐंटीऐजिंग: ऐंटीऐजिंग थेरैपी ओवरऔल फिजिकल कंडीशन को इंपू्रव करती है. परिणामस्वरूप थकान कम महसूस होती है. चाल और पोस्चर में परिवर्तन आता है और कार्यक्षमता बढ़ती है. ऐंटीऐजिंग ट्रीटमैंट के अंतर्गत चेहरे और शरीर के कुछ लक्षणों जैसे फाइन लाइंस, झुर्रियां, ऐज स्पौट, अनईवन स्किन टोन आदि का उपचार किया जाता है.

इलैक्ट्रोलिसिस: इस विधि के जरीए अनचाहे बालों को पूरी तरह जड़ से निकाल दिया जाता है. इस में एक बहुत महीन इलैक्ट्रिक सूई को बालों के रोम में डाल देते हैं, जो बालों को जला कर बाहर निकाल देती है. यह प्रक्रिया महंगी है और इसे विशेषज्ञ से ही करवाएं. जरा सी गलती आप की त्वचा खराब कर सकती है.

लेजर तकनीक: अनचाहे बालों को लेजर द्वारा स्थाई तौर पर हटाया जा सकता है. इस में लगभग 7 से 8 सिटिंग्स लगती हैं. लेजर हेयर रिमूवल की प्रक्रिया में हेयर फौलिकल्स को स्थाई रूप से हटा दिया जाता है. हेयर फौलिकल या बालों की जड़ ही वह जगह होती है जहां से बाल दोबारा उग जाते हैं. यही कारण है कि शेविंग या वैक्सिंग के बाद दोबारा बाल आ जाते हैं. इस प्रक्रिया में हाई ऐनर्जी वाले लेजर का इस्तेमाल कर के हेयर फौलिकल्स को स्थाई रूप से खत्म कर दिया जाता है. ऐसे में बाल वापस नहीं आते हैं. यह प्रक्रिया कई सिटिंग्स में पूरी होती है.

अनचाहे बालों के लिए: अनचाहे बाल महिलाओं की एक आम समस्या हैं. इन को हटाने के तमाम उपाय किए जाते हैं, लेकिन ये दोबारा आ जाते हैं. अनचाहे बालों से छुटकारा पाने के लिए ऐसे उपाय अपनाने चाहिए, जिस से आप की त्वचा को भी कोई नुकसान न पहुंचे और आप की खूबसूरती भी बरकरार रहे. अनचाहे बालों को हटाने का एक बहुत ही लाभकारी और सब से ज्यादा इस्तेमाल में आने वाला तरीका है वैक्सिंग. वैक्सिंग से अनचाहे बाल पूरी तरह साफ हो जाते हैं और त्वचा मुलायम हो जाती है. चेहरे के बाल हटाने के लिए कटोरी वैक्सिंग की जाती है. वैक्सिंग के बाद बाल लंबे समय तक दोबारा नहीं आते, क्योंकि इस में बालों को त्वचा के अंदर से जड़ों से निकाला जाता है.

-डा. रोहित बतरा, डर्मैटोलौजिस्ट, सर गंगाराम हौस्पिटल

हार्दिक पटेल की भूख हड़ताल को अनदेखा करती भाजपा

भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से गुजरात के पाटीदार के हार्दिक पटेल की भूख हड़ताल को अनदेखा किया और कोई भी मंत्री या नेता उन के पास नहीं फटका, साफ करता है कि भाजपा के लिए पाटीदार जैसे किसान, कामगार, मजदूर, छोटे व्यापारी केवल सेवा के लिए हैं, मेवा के लिए नहीं. सदियों से पौराणिक कहानियां सुनासुना कर गांवगांव में पिछड़ों यानी अदर बैकवर्ड कास्टों का धर्म और धंधों में जम कर इस्तेमाल किया गया और उन्हें हमेशा ही गरीबी व गुरबत में रख कर नेतागीरी भी चमकाई गई और पंडागीरी भी.

पिछड़े अलगअलग राज्यों में अलगअलग नाम से जाने जाते हैं. कहींकहीं उन का रुतबा ऊंचा हो गया है और वे अपने को सवर्णों के बराबर मानते हैं. उन्हीं में से कुछ भगवा चोला पहन कर पंडों का सा काम करने लगे हैं. जमीन की खाने वाले ये लोग आज फिर भी मोहताज हैं, बेहाल हैं. इन्हें न पहले मेहनत का फल मिला और न आज लोकतंत्रवोटतंत्र के जमाने में मिल रहा है.

इस की वजह यह भी रही है कि ये लोग आमतौर पर इस बात पर खुश रहते हैं कि इन के आसपास बसे दलितों से ये बहुत ऊंचे हैं. जो फटकार इन्हें पंडों, ठाकुरों और सेठों से मिलती है उस का गुस्सा दलितों पर निकाल कर दिल ठंडा कर लेते हैं. इसी में इन की बदहाली की वजह छिपी है.

देश की आज की जरूरत भरपेट खाना, अच्छा कपड़ा और पक्का मकान है जो पिछड़े और दलित साथ मिल कर मुहैया करा सकते हैं. अकेले किसी के बस का नहीं है. सरकारें इन्हें तो पत्तल पर रख कर परोस देंगी, यह खामखयाली है, सपना है. नेताओं के भाषण चाहे कुछ हों रोटी, कपड़ा और मकान मेहनत से आएंगे और जब तक गांवकसबों में सब काम नहीं करेंगे, कुछ नहीं होगा. लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, कांशीराम, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी जैसे नेताओं की पहले और अब भी इन लोगों को साथ लाने की कोशिशें हो रही हैं पर यह आसान नहीं है क्योंकि ऊंचनीच का भेदभाव पीढि़यों पुराना है और कुछ भाषणों से दूर नहीं हो सकता.

हार्दिक पटेल को भारतीय जनता पार्टी ने भुलाने की कोशिश की है. पहले उन्हें जेल में बंद रखा गया, फिर उन की पार्टी में फूट डाली गई. गुजरात चुनावों में उन पर बहुत सी रोक लगवाई गईं. यह सब उन जैसे लोगों को सारे देश में जागने न देने के लिए किया जा रहा है.

देश की खुशहाली इन मेहनती लोगों के हाथों में है. एयरकंडीशंड कमरों में बैठे लोगों या मंदिरों में पूजापाठ करने वालों के हाथों में नहीं. देश जो बिखराबिखरा?है, हर काम अधूरा?है, हर जगह गंदी है, हर चीज टूटीफूटी है तो इसीलिए कि इस बहुत बड़े वर्ग को वह इज्जत नहीं मिल रही जिस का वह हकदार है. अन्ना हजारे की भूख हड़ताल पर कांग्रेस सरकार ने घुटने टेक दिए पर हार्दिक पटेल की नहीं क्योंकि सरकार नहीं चाहती कि कामगार लोगों के हाथों में सत्ता की डोर आ जाए. उन्हें रोकने के लिए हर तरकीब लगानी पड़ेगी ही, तभी भाजपा और कांग्रेस कामयाब हो पाएंगी.

अब भारतीय रिजर्व बैंक ने भी मान लिया है कि नरेंद्र मोदी के नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के तुगलकी फैसलों से छोटे और मझोले उद्योगों पर बेहद उलटा असर पड़ा है. आज लाखों किसान, व्यापारी परेशान हैं और हर समय चिंतित और तनाव में रहते हैं. इन दोनों बेवकूफी भरे फैसलों से व्यापारों की रेलगाडि़यों को पटरियों से उतरना पड़ गया. सैकड़ों तरह के व्यापार ही बंद हो गए हैं और सैकड़ों को अपने व्यापार के सारे गुर अपने ही कर्मचारियों या टैक्स कंसल्टैंटों को बताने पड़े हैं. बाजार में पूंजी की कमी हो गई है और बहुतों पर टैक्स इकट्ठा करने का बोझ भी आ गया है. सरकार के लिए काम करो और सजा भी पाओ.

हिंदू धर्म की सुरक्षा के नाम पर जमा किए गए वोटों से बनी सरकार ने अपने ही मानने वालों को एक छोटे से दौर में बारबार चोट कर इतना कमजोर कर दिया कि लाखों लोगों का जोश उन किसानों की तरह हो गया जो कभी सूखे की मार सहते हैं, तो कभी बाढ़. अगर व्यापार ठीक न चले सभी के लिए आफत होता है क्योंकि बाजार का रंगढंग महीनों में बदल जाता है.

इस सरकार का मानना है कि हर जना टैक्स चोर है. ठीक वैसे ही जैसे हर धर्म मानता है कि उस का हर अनुयायी पापी है. धर्म के पाप के प्रायश्चित्त के लिए व्रत, त्याग, दान, कष्ट की बात करता है तो धार्मिक सरकार भी ऐसे ही कानून बना रही है कि चोरों को पकड़ने के लिए सभी पर मुकदमा कर दो. हरेक अपनी सफाई देता रहे कि माईबाप मैं ने कुछ नहीं किया, लेदे कर मुझे बख्श दो. चूंकि धर्म ने

उसे यह आदत डाल रखी है, उसे यह करने में कुछ अजीब भी नहीं लगता. 6.3 करोड़ इकाइयों में लगे 11 करोड़ लोगों के इस सरकारी धर्म टैक्स और पापबंदी से बेहद नुकसान हुआ है.

हल्ला इसलिए नहीं मच रहा कि लोग जानते और समझते हैं कि उन्होंने ही तो आगे बढ़चढ़ कर धर्म की रक्षा के नाम पर सरकार को भरभर जीत दिलाई थी कि एक बार राम राज आया नहीं कि उन का उद्धार होगा. उन्हें शायद मालूम नहीं कि राम राज के बाद सीता को बेघर होना पड़ा था. लक्ष्मण को आत्महत्या करनी पड़ी थी. महाभारत युद्ध के बाद कौरव तो मरे ही पांडव भी खुश नहीं रह पाए थे.

सदियों तक सभी समाजों में धर्म पर आधारित सरकारें रही हैं और इन सभी में आम नागरिकों को गुलामी सी सहनी पड़ी थी. यह केवल पिछले 500 सालों में हुआ कि सरकार और धर्म अलग हुए थे. यूरोप, अमेरिका, जापान, कोरिया, चीन ने इस का लाभ उठाया और वहां सभी बराबर का स्थान पा सके हैं और व्यापार भी चमके हैं.

इसलामी देशों में सब से बुरी हालत है क्योंकि वहां धर्म लोगों को 7वीं सदी से आगे निकलने ही नहीं दे रहा है. नोटबंदी और जीएसटी हमारे यहां सरकारी यज्ञों में मेहनत और सूझबूझ की आहुतियों के लिए बनाए गए. मौज तो या तो सरकारी पुरोहितों की है या फिर पुरोहितों को पालने वाले राजानुमा सेठों की.

‘बिग बौस’फेम सपना चौधरी चली फिल्मों की ओर

‘बिग बौस ’फेम सपना चौधरी तथा टीवी सीरियल ‘‘कसौटी जिंदगी के’’ फेम अभिनेता जुबेर खान अब बौलीवुड का हिस्सा बनने जा रहे हैं.bollywood news hindi

यह दोनों कलाकार निर्माता जोनल डैनियल और निर्देशक हादी अली अबरार की ‘‘शेयर हैप्पीनेस फिल्मस’’ के बैनर तले बन रही फिल्म ‘‘दोस्ती के साइड इफेक्ट्स’’ मेंं अभिनय कर रहे हैं. इस फिल्म में इन दो कलाकारों के अलावा विक्रांत आनंद और अंजू जाधव भी हैं.

‘‘मैं इस भ्रम में नही जीता कि सिनेमा से क्रांति आ जाएगी.’’ – श्री नारायण सिंह

‘‘सिनेमा से क्रांति नहीं आ सकती’’ ऐसा मानने वाले फिल्मकार श्री नारायण सिंह मूलतः एडीटर हैं.मगर बतौर निर्देशक उनकी पहान बनी शौचालय के मुद्दे पर आधारित फिल्म ‘‘ट्वायलेटःएक प्रेम कथा’’ से. अब वह इलेक्ट्रिसिटी के मुद्दे पर फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ लेकर आ रहे हैं. 21 सितंबर को प्रदर्शित होने वाली इस फिल्म में शाहिद कपूर, श्रृद्धा कपूर, यामी गौतम और दिव्येंदु शर्मा की मुख्य भूमिकाएं हैं.

फिल्मों से जुड़ने का निर्णय कब और कैसे लिया?

मैं उत्तर प्रदेश में बलरामपुर जिले का रहने वाला हूं. 8 किलोमीटर दूर मेरा गांव हैं बेतार महादेव. मेरे पिताजी वकील हैं. उनकी उम्र 71 साल है वह लखनउ में रहते हैं. मैं पढ़ाई में ठीकठाक था. मैंने स्नातक तक की पढ़ाई की. परीक्षा दे दी,पर रिजल्ट देखने नहीं गया. उसके बाद एक दिन शाम को मैंने घर वालों से कह दिया कि अब मैं पढ़ना नहीं चाहता.

उन लोगों को लगा कि मैं कभी कहीं घूमने नहीं जाता हूं. मैं हमेशा घर में ही रहता था. मेरे यहां अनुशासन बहुत था. बंदिशें काफी थी. आखिर मैं अपने खानदान का सबसे बड़ा लड़का था. तो मेरे पिता ने कहा कि मर्जी हो कहीं आठ दस दिन के लिए घूम कर आ जाओ. पर मैं कहीं गया नही और एक सप्ताह बाद मैंने फिर से कहा कि हकीकत में मैं पढ़ना नहीं चाहता. तो मेरे पिताजी ने गुस्से में कहा कि ठाकुर साहब फिर तुम करना क्या चाहते हो? तो मैंने कहा कि मैं वह काम करना चाहता हूं, जो मेरे खानदान में किसी ने ना किया हो. इस पर मेरे पिता ने कहा कि, ‘मेरे खानदान में किसी ने चोरी डकैती नहीं की है. तुम वही कर लो.’

हकीकत में मुझे बचपन से ही गाने का शौक था. मैं यह नहीं कह रहा कि मैं उस समय बहुत अच्छे सुर में गाता था. इसलिए मैंने पिताजी से कहा कि,‘मैं संगीत व गायन के क्षेत्र में कुछ करना चाहता हूं.’ मेरे पिताजी ने कहा कि उसके लिए उम्र चली गयी. इस उम्र में यह सब नही किया जाता. उन्होंने बहुत समझाया. पर मैंने कहा कि मैं कोशिश करना चाहता हूं. उसके बाद लखनउ आकर मैंने ‘भातखंडे’ में प्रवेश पाने की कोशिश की. पर वहां प्रवेश मिला नहीं. किसी ने कहा कि जब संगीत में करियर बनाना है,तो मुंबई जाओ. मैं मुंबई चला आया. मैंने यहां ‘संगीत महाभारती’ में प्रवेश लिया. पर मुझे एक साल इंतजार करने के लिए कहा गया. मैं वापस घर नहीं गया कि फिर वापस आने नही मिलेगा. मुंबई में ही मेरी मुलाकात मदन कुमार से हुई. उनके साथ बतौर सहायक निर्देशक काम करते हुए मैंने सीरियल ‘‘परंपरा’ के 63 एपीसोड किए. मैं मदन कुमार के साथ इस कदर जुड़ा हुआ था कि उनके निधन के बाद मैंने भी खुद को ‘परंपरा’से  अलग कर लिया. ‘परंपरा’ में सहायक निर्देशक काम करते हुए मेरा परिचय इसके एडीटर आनंद शर्मा से हो गया था. उनके साथ मैंने एडीटिंग सीखी थी. तो आनंद शर्मा ने मुझे दीप्ति नवल के यहां लगवा दिया. उस वक्त वह एक सीरियल ‘थोड़ा सा आसमान’ बना रही थीं और उनके एसोसिएट अश्विनी धीर थे. वहां से मेरा एडीटिंग में करियर शुरू हुआ. मैंने तमाम सीरियल एडिट किए.

टीवी सीरियलों की एडीटिंग करने के दौरान नीरज पांडे से मेरी अच्छी दोस्ती हो गयी थी. हम हर दिन मिलने लगे थे. जब उन्होने फिल्म ‘ए वेडनेस्डे’ शुरू की, तो मुझे अपने साथ एसोसिएट निर्देशक के अलावा फिल्म के एडीटर के रूप में काम करने का अवसर दिया. सही मायने में देखा जाए तो मेरी फिल्मों की यात्रा ‘ए वेडनेस्डे’से शुरू हुई. उसके बाद मैंने नीरज पांडे की हर फिल्म की एडीटिंग करने के अलावा उनके साथ एसोसिएट निर्देशक भी रहा. फिर चाहे ‘स्पेशल 26’ हो या ‘बेबी’ हो. नीरज पांडे की कंपनी की दो फिल्मों ‘नाम शबाना’और ‘अय्यारी’ के अलावा हर फिल्म एडिट की है. इन फिल्मों के वक्त मैं फिल्म ‘ट्वॉयलेट एक प्रेम कथा’ के निर्देशन में व्यस्त था.

2012 में आपने फिल्म ‘ये जो मोहब्बत है’ निर्देशित की थी. उसके पांच साल बाद आपने ‘ट्वॉयलेट एक प्रेम कथा’ निर्देशित की. यह पांच साल का अंतराल?

हां! मैंने असीम सामंत के लिए ‘ये जो मोहब्बत है’ को निर्देशित किया था, जो कि बुरी तरह से असफल हुई थी. ऐसे में निर्देशक के तौर पर मुझे फिल्म नहीं मिलनी थी, यह बात आप भी जानते हैं. इसलिए मैं फिर से एडीटिंग में व्यस्त हो गया था. यहां पर इस तरह का संघर्ष बहुत होता है.

फिल्म ‘‘ये जो मोहब्बत है’’ की असफलता की वजहें क्या रहीं?

वास्तव में इस फिल्म को सही ढंग से रिलीज नही किया गया. इस फिल्म का जो बाक्स आफिस पर हाल हुआ था, उसकी मैंने बिलकुल उम्मीद नही की थी.पर गलत लोगों के साथ गलत समय रिलीज हुई. असीम दा अभी भी पुराने ख्यालात वाले हैं. फिल्म की कहानी व पटकथा भी गड़बड़ थी. मेरी बात को अनसुना करते हुए फिल्म ‘जिस्म’ के सामने इस फिल्म को रिलीज करवाया. फिल्म के प्रमोशन का बजट 3 करोड़ था, जिसमें 15 दिन ढंग से प्रमोशन हो सकता था. पर उन्होंने उसे डेढ़ माह बढ़ा दिया. तो प्रमोशन भी गड़बड़ हो गया. यानी कि इस फिल्म के साथ कई चीजें ऐसी हुई, जिसकी वजह से फिल्म कब आयी व कब गयी, पता ही नहीं चला.

इस फिल्म से पहले यानी कि 2008 में असीम सामंत ने मुझे बुलाया था. लेकिन तब भी मुझे उनकी उस फिल्म की कहानी समझ नही आयी थी. तो मैंने करने से मना कर दिया था. असीम सामंत के साथ मेरे घर जैसे रिशते हैं. इसलिए ‘ये जो मोहब्बतें हैं’ की कहानी पसंद ना आने पर भी मैंने निर्देशिन किया और अपनी तरफ से सेट पर कुछ बदलाव भी किए थे.

तो फिर पांच साल बाद ‘‘ट्वॉयलेटः एक प्रेम कथा’’कैसे मिली थी?

नीरज पांडे को पता था कि मुझे फिल्म निर्देशित करनी है. तो एक दिन उन्होने कहा कि लेखक जोड़ी गरिमा सिद्धार्थ आ रहे है, आप भी इस बैठक में कहानी सुनें. कहानी सुनकर मैं तो कनेक्ट हो गया. क्योंकि मैं तो ऐसी जगह पैदा हुआ हूं, जहां हर दिन सुबह लोटा लेकर बाहर जाना पड़ता है. नीरज ने पूछा कि क्या मैं इसका निर्देशन करना चाहूंगा. मैंने हामी भर दी. फिर हमने ‘ट्वॉयलेट एक प्रेम कथा’ पर काम शुरू किया. लेकिन शुरूआत में मैं इसका निर्देशक था. फिर मैं अलग हो गया. उसके बाद तीन दूसरे निर्देशक आए, पर अंत में ईश्वर की अनुकंपा से यह फिल्म मेरे ही पास आयी थी. इस बीच अक्षय कुमार को इसकी कहानी के बारे में पता चला.उ न्होने गरिमा सिद्धार्थ से कहानी सुनी. फिर वह इस फिल्म के साथ बतौर निर्माता भी जुड़ गए.

आपकी फिल्म ‘‘ट्वॉयलेट एक प्रेम कथा’ उस वक्त आयी, जब सरकार ने ट्वॉयलेट बनाने की मुहीम चला रखी थी. इसका फायदा आपकी फिल्म को मिला?

यह महज एक संयोग है. हकीकत में हमारी फिल्म की योजना 2013 में बनी थी. तब ना तो भाजपा की सरकार थी और ना ही स्वच्छता अभियान. पर ईश्वर की मर्जी की हमारी फिल्म बनने में देर हो गयी. तब तक स्वच्छता अभियान भी आ गया.

फिल्म की रिलीज के बाद किस तरह के कमेंट मिले थे?

बहुत सारे कमेंट मिले. मैं लखनउ में अपने पिता के साथ खाना खा रहा था. उसी वक्त राकेश रोशन का फोन आया. उन्होंने कहा कि, ‘आपने बड़ी स्मार्टली फिल्म को निर्देशित किया है, अन्यथा यह डॉक्यूमेंट्री बन जाती.’ सूरज बड़जात्या ने भी एसएमएस भेजा. आर बालकी सहित कईयों के संदेश आए. पर मैं गंभीरता से कहता हूं कि मुझे कुछ नहीं आता. मुझसे सब कुछ हो गया. ईश्वर की दया और माता पिता के आशिर्वाद से सब कुछ कर लेता हूं.

फिल्म‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’को लेकर क्या कहेंगे?

पहले इस फिल्म के कई निर्माताआें में से एक निर्माता प्रेरणा अरोड़ा थी. एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और मेरे हाथ में सफलतम फिल्म ‘रूस्तम’ के लेखक विपुल रावल की ‘रोशनी’ नामक पटकथा पढ़ने को दी. उन्होने बताया कि यह स्क्रिप्ट शाहिद कपूर को पसंद है और वह इसमें काम करने को तैयार हैं. मैं इसका निर्देशन कर सकता हूं. मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी. कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी. पर बाकी चीजें बदलने की मुझे जरूरत महसूस हुई. मैंने अपनी राय प्रेरणा को बता दी. उनके कहने पर मैं शाहिद कपूर से मिला और उन्हें अपनी राय बतायी. शाहिद ने कह दिया कि मैं बदलाव कर सकता हूं. उसके बाद मैं विपुल रावल से मिला. विपुल ने मेरी बात सुनी और कहा कि उनकी पटकथा पश्चिम है तो मेरी सोच पूर्व की है. पर बाद में विपुल रावल ने कहा कि मैं जिस ढंग से चाहूं, उस ढंग से काम कर सकता हूं. तब मैंने गरिमा सिद्धार्थ से इसी आइडिया पर पटकथा लिखवायी. क्योंकि गरिमा सिद्धार्थ से मेरे इक्वेशन बहुत अच्छे बन चुके हैं. पर पटकथा को अंतिम रूप देने से पहले हमने उत्तराखंड मेंं टेहरी गढ़वाल, देहरादून, ऋषिकेश व अन्य जगहों पर शोधकार्य किया. अब यह फिल्म रिलीज होने जा रही है.

‘‘रोशनी’ को ‘बत्ती गुल मीटर चाल’’ में परिवर्तित करते समय किस तरह के बदलाव किए?

रोशनी की कहानी मुंबई पर आधारित थी. पर मैं अपनी फिल्म की कहानी को छोटे शहर लेकर गया, जिससे कहानी के साथ ज्यादा लोग जुड़ सकें. मैंने स्वयं बहुत कुछ देखा है. मैं बलरामुपर कस्बे से आता हूं जहां मेरी याद में कभी भी चार घंटे से ज्यादा समय तक इलेक्ट्रीसिटी नहीं रही. हमने कहानी में कुछ नए किरदार, परिवार,रिशतों को जोड़ते हुए कहानी में कई लेअर बढ़ाए. ‘रोशनी’ में पूरी कहानी शाहिद के एंगल से चल रही थी. पर मैंने दोस्त वगैरह जोड़ दिए. पर अभी भी ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ शाहिद कपूर के किरदार संतोश बल्लभ पंटोला की ही यात्रा है.

फिल्म में सरकार निशाने पर है या प्रायवेट बिजली कंपवनी?

हमने यह फिल्म किसी को भी कटघरे में खडा करने के लिए नही बनाया. मेरा सिर्फ इतना मानना है कि गलती इंसान से ही होती है. मीटर रीडिंग लेने वाला आदमी कागज पर कुछ लिखकर लाया, जिसे बिल बनाने वाले ने कुछ और समझा. पर इस मानवीय भूल की वजह से जो इंसान प्रताड़ित हो रहा है, उसकी पेरशानी का जिक्र है. एक इंसान की गलती को सुधारने के लिए उसे कहां कहां तक दौड़ना पड़ता है और उसके साथ क्या होता है, इसका जिक्र है. इसके अलावा हमने आम लोगों को कुछ जानकारियां भी दी हैं. मेरा मानना है कि मेरे कहने से कुछ बदलाव नहीं आएगा. मैं इस भ्रम में नही जीता कि सिनेमा से क्रांति आ जाएगी. मेरा मानना है कि फिल्म से ना तो क्रांति आती है, ना ही कोई बदलाव. हमारे दिल में जो बात आयी, हमने उसे कहानी के रूप में पेश कर दिया.

आप कहते है कि सिनेमा से क्रांति नहीं आती है. तो फिर सामाजिक मुद्दे पर बनी फिल्म का असर नही होता?

देखिए, क्रांति नहीं आती है. पर फिल्मों का असर होता है. इतिहास गवाह हैं मीडिया का हमारे समाज पर बहुत असर पड़ता है. वर्तमान में क्या हो रहा है, उस पर मैं चर्चा नहीं कर सकता. पर जब बेलपत्र चलते थे तब तो क्रांति आ आयी थी. फिल्म में जो सामाजिक मुद्दे उठाए जाते हैं उनका असर होता है.

आपने बहुत सारी अगूंठिया व कई तरह की मालाएं पहन रखी हैं.लगता है आप ज्योतिष में बहुत यकीन करते हैं?

यह मसला ज्योतिष का नहीं है. में ज्योतिष की बजाय ऊपर वाले पर यकीन करता हूं. हम जिस परिवार से आते हैं, वहां बहुत पूजा पाठ की जाती है. मेरे पिताजी सुबह चार घंटे व रात को दो घंटे पूजा करते हैं. तो उसका असर मुझ पर है.

सोशल मीडिया से फिल्म को कितना फायदा कितना नुकसान होता है?

सोशल मीडिया की वजह से हम अपनी चीज लोगों तक जल्दी पहुंचा देते हैं. पर उसे दर्शक मिलते हैं या नहीं, इसका जवाब मेरे पास नहीं है. आप दर्शक को बहका नहीं सकते.

एडीटर के डायरेक्टर बनने पर क्या फायदा होता है?

काम आसान हो जाता हैं.क्योंकि उसे पता होता है कि उसे कहां क्या चाहिए. कहां कट करना है. मुझे थोड़ी बहुत तकनीक की जानकारी है.

 

बनें स्मार्ट गृहणी अपनाएं यह किचन टिप्स

यह जरूरी है कि आप अपनी किचन को किस तरह मैनेज करती हैं. क्योंकि किचन से परिवार का स्वास्थ्य जुड़ा है. इसलिए आज हम आपको बतायेंगे कुछ उपयोगी किचन टिप्स. जिनसे आप भी बन सकती हैं किचन क्वीन.

  • जिस प्लास्टिक के डिब्बे में खाने-पीने की चीजें हों, उसके बाहर थोड़ा सरसों का तेल लगा दें. इससे चीटियां उस डिब्बे से दूर रहेंगी.
  • चीटियों ज्यादा हों तो किचन में सीएफल के पास एक-दो प्याज लटका दें. ऐसा करने से भी किचन में चीटियां कम हो जाएंगी.
  • यदि फ्रिज में से महक आ रही हो तो एक नींबू को दो भागों में काटकर फ्रिज की अलग-अलग ट्रे में रख दें. बदबू गायब हो जाएगी.
  • काले चनों को जल्द पकाने के लिए उबलते समय कुकर में एक चुटकी खाने वाला सोडा डाल दें. चने जल्दी पकेंगे.
  • बर्तन के जलने पर उसमें चाय की पत्ती व पानी डालकर कुछ देर के लिए छोड़ दें. इसके बाद साफ करने पर बर्तन चमक जाएगा.
  • अंडों को उबालने से पहले पानी में आधा चम्मच नमक डाल लें. इससे अंडों को उबालने पर ये साबुत रहेंगे टूटेंगे नहीं.
  • कीड़ों से बचाने के लिए दालों को रखते समय जार में कुछ बूंदे कैस्टर ऑयल की डाल दें.
  •  महीने में एक बार मिक्सर के ग्लास में नमक डालकर तक चला दें. मिक्सर के घिसे ब्लेड तेज हो जाएंगे.
  • दाल बनाते समय कुकर में दो-तीन टुकड़े सुपारी के डाल दें. ऐसा करने से दाल आराम से गल जाएगी.
  • इडली का घोल तैयार करते समय उसमें थोड़े उबले चावल पीस दें. साथ ही इनो या बेकिंग सोडा मिला दें. ऐसा करने से इडली अच्छे से फूल जाएगी और मुलायम भी बनेगी.

फिसलन भरे रास्तों की नायिका : भाग 3

जिस से मेरा सारा दिन खराब हो जाता है. अगर तुम मुझे इतना ही प्यार करते हो तो कुछ ऐसा करो कि उस की टेंशन ही खत्म हो जाए. भूपेंद्र शशि का इशारा समझ गया था.

इसी दौरान उस के दिमाग में एक आइडिया आया. उसी आइडिया के तहत उस ने एक दिन मौका पाते ही अपने गांव के एक किसान की हैरो चुरा ली. भूपेंद्र ने वह हैरो ला कर अपने खेत के एक कोने में डाल दी. जब उस किसान को पता चला कि उस की हैरो चोरी हो गई है तो उस ने पहले तो आसपास ही इधरउधर तलाशने की कोशिश की.

तभी उसे पता चला कि उस की हैरो भूपेंद्र के खेत में कोने में पड़ी हुई है. इस की जानकारी मिलते ही वह सीधे भूपेंद्र के पास गया और अपनी चोरी हुई हैरो की बात बताते हुए पूछा कि उस के खेत में वह हैरो कैसे पहुंची. भूपेंद्र ने उस से साफ शब्दों में कहा कि मेरा ट्रैक्टर पप्पू ही चलाता है. यह बात उसे ही पता होगी. मेरे पास तो पहले से ही मेरी अपनी हैरो है, फिर मैं तुम्हारी हैरो किसलिए चोरी करूंगा. तुम्हें जो भी पूछना है पप्पू से पूछो.

अपने ही घर में पप्पू हो गया बेगाना

यही बात उस किसान ने पप्पू से पूछी तो उस ने भी साफ शब्दों में कहा कि मुझे आप की हैरो से कोई लेनादेना नहीं. मैं भूपेंद्र के यहां केवल नौकरी करता हूं. मेरे पास तो अपना ट्रैक्टर तक नहीं है, मैं आप की हैरो चुरा कर क्या करूंगा.

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया तो किसान ने पुलिस चौकी जा कर दोनों के नाम हैरो चोरी की एफआईआर दर्ज करा दी. पुलिस चौकी में पहले से ही शशि की अच्छी बात थी. उस ने वहां जा कर भूपेंद्र को बचाते हुए अपने पति पप्पू को ही हैरो चोरी के इलजाम में जेल भिजवा दिया.

पप्पू के जेल चले जाने के बाद भूपेंद्र और उस के बीच मिलने का रास्ता बिलकुल साफ हो गया. इस के बाद शशि पूरी तरह से निडर हो कर उस के साथ जिंदगी के मजे लेने लगी. उस ने पप्पू को जमानत पर छुड़वाने के लिए पैरवी भी नहीं की.

यह सब देख कर पप्पू के बड़े भाई राजपाल को बहुत दुख हुआ. उस ने पप्पू को छुड़ाने के लिए काफी हाथपांव मारे तो शशि ने उस के परिवार को भी जेल भिजवाने की धमकी दे डाली. इस के बाद भी राजपाल ने जैसेतैसे पप्पू के केस की पैरवी की. पप्पू पर कोई ज्यादा बड़ा केस तो था नहीं. एक महीना जेल में रह कर वह घर आ गया.

भूपेंद्र ने खेला खेल

जेल से आते ही उस ने शशि की पिटाई की और उसे घर से निकल जाने को कह दिया. शशि ने फिर से अपने साथ पति द्वारा मारपीट की शिकायत चौकी में कर दी. इस मामले में पुलिस ने पप्पू पर कोई खास काररवाई तो नहीं की बल्कि उसे समझाते हुए पत्नी के साथ भविष्य में मारपीट न करने की चेतावनी दे कर छोड़ दिया. जेल से वापस आने के बाद पप्पू ने भूपेंद्र की नौकरी छोड़ दी. उस के बाद भूपेंद्र ने पप्पू के घर आनाजाना भी कम कर दिया.

इस पर भूपेंद्र ने शशि से मिलने का दूसरा रास्ता निकाला. जब कभी पप्पू किसी काम से बाहर जाता तो वह भूपेंद्र को फोन कर के गांव से बाहर बुला लेती और फिर उस के साथ मौजमस्ती करने निकल जाती. बाद में उस ने अपने बच्चों तक की परवाह करनी बंद कर दी. कभीकभी तो जब बच्चे ज्यादा भूखे होते तो पप्पू ही उन्हें कच्चापक्का खाना बना कर खिलाता.

शशि सुबह ही बनठन कर निकलती और देर रात घर लौटती. पति कुछ कहता तो वह उस पर ही चढ़ बैठती थी. हर रोज की चिकचिकबाजी से पप्पू परेशान हो गया तो उस ने शशि को तलाक देने की योजना बनाई. उस ने एक दिन उस से कोरे स्टांप पेपर पर अंगूठा भी लगवा लिया.

यह बात शशि ने भूपेंद्र को बताई तो उस ने शशि के कान भरते हुए उसे पति के खिलाफ ही भड़का दिया. भूपेंद्र ने शशि से कहा कि पप्पू तुम्हारी हत्या करने की साजिश रच रहा है. अगर अपनी खैर चाहती हो तो तुम पहले ही उसे मौत के घाट उतार दो.

भूपेंद्र की बात सुनते ही शशि भड़क उठी. उस ने कहा कि पति को मारना मेरे बस की बात नहीं है. अगर तुम मुझे दिल से चाहते हो तो यह काम तुम ही क्यों नहीं कर देते. अपने प्यार की खातिर इतना काम तो तुम ही कर सकते हो.

शशि के मन की बात सामने आते ही भूपेंद्र समझ गया कि अगर वह पप्पू को अपने रास्ते से हटा दे तो शशि पूरी तरह से उसी की रखैल बन कर रह जाएगी. इस के बाद उस ने पप्पू को मौत की नींद सुलाने के लिए तानेबाने बुनने शुरू कर दिए.

भूपेंद्र अगर शशि के लिए कुछ भी करने को तैयार था, तो इस का भी एक बड़ा कारण था. भूपेंद्र की शादी को कई साल बीत चुके थे, लेकिन उस की बीवी को कोई औलाद नहीं हुई थी. जिस के लिए उस की बीवी और वह परेशान रहते थे. शशि की ओर से पप्पू को अपने बीच से हटाने के लिए छूट मिलते ही उस ने सोच लिया था कि पप्पू को मौत की नींद सुलाने के बाद वह कोर्टमैरिज कर के उसे अपने घर ले आएगा.
लिखी गई हत्या की पटकथा

भूपेंद्र के गांव में ही उस का एक जिगरी दोस्त था मंजीत सिंह. मंजीत सिंह भूपेंद्र के हर सुखदुख में काम आता था. भूपेंद्र ने अपने मन की बात मंजीत के सामने रखी तो मंजीत उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद भूपेंद्र ने अगला तानाबुना बुना. वह जानता था कि पप्पू इस वक्त उस से बहुत खफा है और उस की किसी भी चाल में फंसने वाला नहीं है.

भूपेंद्र के दिखावे के लिए शशि से मिलनाजुलना बंद कर दिया ताकि पप्पू के दिल में उस के प्रति नफरत की आग शांत हो सके. जब पप्पू ने देखा कि भूपेंद्र ने शशि से मिलना लगभग बंद कर दिया है तो पप्पू का व्यवहार भी पत्नी के प्रति नरम हो गया. फिर एक दिन शशि ने भूपेंद्र को फोन कर के अपने घर बुला लिया. उस वक्त पप्पू भी घर पर ही था.

पप्पू के घर पहुंचते ही भूपेंद्र ने उस के सामने अपनी गलती मानते हुए क्षमा मांगी. उस ने भविष्य में ऐसी कोई भी गलती न करने की कसम भी खाई. यह सब नाटक करने के बाद उस ने पप्पू से कहा कि उस के बिना उस का सारा कामधंधा चौपट हो गया है. वह आज ही उस के साथ चल कर ट्रैक्टर संभाल ले.
पप्पू उस की चिकनीचुपड़ी बातों में आ गया और फिर से उस का ट्रैक्टर चलाने लगा. उसे भूपेंद्र पर फिर से विश्वास हो गया था. उसी विश्वास के सहारे 26 जुलाई, 2018 को किसी काम के बहाने भूपेंद्र ने पप्पू को अपने साथ लिया और बाइक पर बैठा कर भोगपुर डैम की ओर ले गया. उस के साथ मंजीत भी था.

डैम के किनारे सुनसान जंगल में पहुंचते ही तीनों एक जगह बैठ गए. मौका पाते ही मंजीत ने गरमी का बहना कर के अपने सिर से पगड़ी उतार ली. फिर मौका पा कर दोनों ने पप्पू को दबोच लिया. पप्पू को कब्जे में कर के दोनों ने पगड़ी के कपड़े से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई. कहीं वह जीवित न रह जाए, इस के लिए भूपेंद्र ने अपनी बेल्ट खोली और फिर से उस के गले में डाल कर खींच दी.

पप्पू की हत्या करने के बाद दोनों ने उस की लाश उठा कर 20 मीटर दूर पानी में फेंक दी. पप्पू को मौत की नींद सुलाने के बाद दोनों बाइक से अपने घर पहुंच गए. पप्पू की हत्या करने वाली बात भूपेंद्र ने मोबाइल पर शशि को भी बता दी थी. उस की हत्या की बात सुनने के बाद शशि घर से बाहर नहीं निकली. उस के बच्चों ने पापा के बारे में पूछा तो उस ने कह दिया कि उस के पापा किसी काम से बाहर गए हुए हैं, वह आज रात नहीं आएंगे. बच्चों को खाना खिला कर उस ने सुला दिया.

इस केस के खुलते ही अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त पगड़ी, बेल्ट, बाइक, मोबाइल फोन, मृतक की चप्पलें आदि भी बरामद कर लीं. पुलिस ने मृतक की पत्नी शशि, भूपेंद्र सिंह और मंजीत सिंह के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया.

पप्पू के दोनों मासूम बच्चे अपने ताऊ राजपाल सिंह के पास थे. राजपाल सिंह ने बताया कि शशि जाते हुए भी अपने बेटे राज को जेल से छूट कर आने के बाद देख लेने की धमकी दे कर गई थी, उस की जान को खतरा हो सकता है.

जेल जाने के दौरान भी शशि के चेहरे पर न तो पति की मौत का कोई गम था और न ही अपने दोनों बच्चों के भविष्य को ले कर किसी तरह की चिंता. शशि ने जातेजाते भी पत्रकारों से कहा कि उसे अपने पति की हत्या का कोई अफसोस नहीं.

रोबोट के साथ सेक्स, क्या संभव हो पाएगा?

रोबोट की परिकल्पना दशकों पुरानी है, लेकिन यह अभी भी मानवीय अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा नहीं उतरा ह. चलने में सक्षम व मशीनी कार्यों में पारंगत रोबोट का भी अभी बहुत ज्यादा व्यावसायिक उपयोग नहीं है.

इन सबके बीच परिकल्पना उजागर हुई है सेक्स के लिए रोबोट की . ब्रिटेन के कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विशेषज्ञ डेविड लेवी ने साल 2005 में अपनी किताब ‘लव एंड सेक्स विद रोबोट’ में लिखा था कि रोबोट के साथ सेक्स करना संभव हो जाएगा और 40 सालों में इंसान उससे प्यार करने लगेगा.

उनका यह तर्क रोबोटिक इंजीनियरिंग में हो रहे सुधारों और पॉर्न उद्योग से हो रही आय पर निर्भर था. उनका मानना था कि ऐसे रोबोट मानव के लिए बहुत उपयोगी होंगे.

इलेक्ट्रिक इंजीनियर और कम्प्यूटर वैज्ञानिक हाइंस के दिमाग की उपज है पहला सेक्स रोबोट रॉक्सी जो उनके अनुसार सेक्स रोबोट हेल्थकेयर रोबोट से आगे की कड़ी है उन्होंने कहा कि सेक्स रोबोट को विकसित करने के पीछे उनका मकसद इस समय उपलब्ध साधनों से आगे जाकर एक साथी का अहसास देना है.

रॉक्सी रोबोट की कीमत $9,000 है. इसका पुरुष रूप भी उपलब्ध है जिसे रॉकी नाम दिया गया है. कंपनी की योजना इस साल के अंत में रॉक्सी का और अपडेटेड वर्जन लाने की है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या ये रोबोट इंसानी एहसास की जगह ले पाएंगे?

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