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नाकाम साजिश : बहू ने बनाई सास की हत्या की योजना

कुलदीप कौर पिछले कई महीनों से परेशान थी, लेकिन परेशानी की वजह उस की समझ में नहीं आ रही थी. उस का मन हर समय बेचैन रहता था. अजीबोगरीब विचार मन को उलझाए रखते थे. वह कितना भी अच्छा सोचने की कोशिश करती, मन सकारात्मक सोच की ओर न जा कर नकारात्मक सोच में ही डेरा जमाए रहता था.

बुरे विचारों से जैसे कुलदीप का नाता जुड़ गया था. मन को समझाने और बुरे विचारों से दूर रहने के लिए वह अपना अधिकांश समय गुरुद्वारे में व्यतीत करने लगी थी.

कुलदीप कौर की चिंता का विषय सात समंदर पार पंजाब में बैठी अपनी मां राजविंदर कौर थीं. हालांकि 57 वर्षीय राजविंदर कौर की देखभाल के लिए गांव के घर में उस की भाभी शगुनप्रीत कौर थी, लेकिन भाभी पर उसे भरोसा नहीं था.

कुलदीप के पति मनमोहन सिंह ने उसे कई बार समझाया भी था कि बेकार में चिंता करने से कोई फायदा नहीं है. अगर मन इतना ही परेशान है तो इंडिया का चक्कर लगा आओ. वहां अपनी मां से मिल लेना. लेकिन समस्या यह थी कि उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी. डाक्टरों ने ऐसी हालत में हवाई यात्रा करने से मना कर रखा था. बहरहाल, इसी उधेड़बुन में कुलदीप कौर के दिन गुजर रहे थे.

भरापूरा परिवार था बलदेव सिंह का

कुलदीप कौर मूलत: गांव बुट्टर सिविया, थाना मेहता, जिला अमृतसर, पंजाब की रहने वाली थी. उस के जीवन के 16 बसंत भी अपने गांव बुट्टर में ही गुजरे थे. गांव में रहते ही उस ने जवानी की दहलीज पर पांव रखे थे. कुलदीप का छोटा सा परिवार था.

पिता बलदेव सिंह और मां राजविंदर कौर के अलावा उस के 2 भाई थे गगनदीप सिंह और सरबजीत सिंह. तीनों भाईबहनों का आपस में बहुत प्यार था. वे तीनों बहनभाई कम दोस्त ज्यादा लगते थे. आपस में इन की कोई बात एकदूसरे से छिपी नहीं रहती थी.

बलदेव सिंह जाट सिख किसान थे. उन के पास खेती की ज्यादा जमीन तो नहीं थी, पर जितनी थी वह परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए काफी थी. इसीलिए बलदेव सिंह ने अपने तीनों बच्चों को सिर उठा कर आजादी से जीना सिखाया था.

उन्होंने तीनों बच्चों को अपनी हैसियत के हिसाब से पढ़ाया था. बच्चों के लिए अभी वह और भी बहुत कुछ करना चाहते थे, पर साल 2002 में उन की मौत हो गई.

बलदेव सिंह की मौत के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारियां राजविंदर कौर के कंधे पर आ गई थीं. उस वक्त उन का बड़ा बेटा गगनदीप जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका था. वह मां का हाथ बंटा कर उस का सहारा बन गया. घर की गाड़ी फिर से अपनी स्पीड से दौड़ने लगी थी.

साल 2008 इस परिवार के लिए अच्छा साबित हुआ. इसी साल कुलदीप कौर के लिए एक अच्छे परिवार का रिश्ता आया, लड़के का नाम मनमोहन सिंह था. वह अच्छे घर का पढ़ालिखा गबरू जाट था और आस्ट्रेलिया में अपना कारोबार करता था. राजविंदर कौर को मनमोहन और उस का परिवार कुलदीप के लिए पसंद आया. कुलदीप को भी मनमोहन सिंह पसंद था. दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद सन 2008 में कुलदीप कौर और मनमोहन सिंह की शादी धूमधाम से संपन्न हो गई. इस शादी से सभी लोग खुश थे.

अचानक हो गई गगनदीप की मौत

खुशी का माहौल था, पर कहीं अनहोनी मुंह पसारे इस परिवार की खुशियों को लीलने के लिए घात लगाए बैठी थी. कुलदीप की शादी के कुछ दिनों बाद ही इस परिवार को तब बड़ा झटका लगा, जब अचानक गगनदीप की मौत हो गई.

गगनदीप की मौत का सदमा उस की मां राजविंदर कौर और उस के छोटे भाईबहन को भीतर तक तोड़ गया. कुलदीप की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे नाजुक मौके पर वह अपनी मां और छोटे भाई सरबजीत को अकेला छोड़ कर पति के साथ आस्ट्रेलिया जाए या यहीं रह कर उन का साथ दे.
संसार का नियम है, यहां लोग आतेजाते हैं, सब कुछ समय की गति से चलता रहता है. जबकि समय का चक्र और संसार के कामकाज कभी नहीं रुकते. वक्त का मरहम बड़े से बड़ा घाव भर देता है. बहरहाल, अपनी मां और भाई को दिलासा दे कर कुलदीप कौर अपने पति मनमोहन सिंह के साथ आस्ट्रेलिया चली गई. कुलदीप को आस्ट्रेलिया गए 10 साल बीत गए थे.

इस बीच वह सरताज सिंह और सम्राट सिंह 2 बच्चों की मां बन गई थी. उस के पीछे मायके में छोटे भाई सरबजीत सिंह की भी शगुनप्रीत कौर के साथ शादी हो गई थी. सरबजीत भी 2 बच्चों बेटी मनतलब कौर और बेटे वारिसदीप सिंह का बाप बन गया था.

कुलदीप की अपनी मां और भाई से हर हफ्ते फोन पर बातें होती रहती थीं. सभी अपनीअपनी जिंदगी में मशगूल थे कि साल 2015 की एक मनहूस खबर ने कुलदीप को अंदर तक तोड़ कर रख दिया. इस घटना से राजविंदर कौर की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई थी. उसे अपने पति और बड़े बेटे गगनदीप की मौत का इतना दुख नहीं हुआ था, जितना दुख सरबजीत की मौत का हुआ.

सरबजीत की मौत बड़े रहस्यमय तरीके से हुई थी. वह रात को खाना खा कर ऐसा सोया कि सोता ही रह गया. सरबजीत अपने परिवार का एकमात्र सहारा था. उस की मौत से परिवार की गाड़ी पूरी तरह लड़खड़ा गई.

वक्त ने ताजा जख्मों पर एक बार फिर से मरहम लगाया. राजविंदर कौर ने अपने आप को पूरी तरह से अकेला मान कर जीना सीख लिया था. समय का चक्र फिर से अपनी रफ्तार से चलने लगा. कुलदीप मां को फोन करकर के सांत्वना देती रहती थी. सैकड़ों मील दूर बैठी कुलदीप और कर भी क्या सकती थी. इसी तरह दिन गुजरते गए थे और साल 2016 आ गया.
दूसरे बेटे की मौत से टूट गई मां

कुलदीप कौर ने महसूस किया कि सरबजीत सिंह की मौत के बाद गांव से उस की मां के जो फोन आते थे, वह काफी मायूसी भरे होते थे. सुन कर कुलदीप को ऐसा लगता था, जैसे उस की मां बहुत परेशान और दुखी हैं. उस ने बहुत बार मां से इस बारे में पूछा भी था, पर मां ने उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था. वह बहुत दुखी लग रही थीं. ज्यादा कुरेद कर पूछने पर राजविंदर ने सिर्फ इतना ही बताया कि पिछले कुछ समय से शगुन का चालचलन ठीक नहीं है.

कुलदीप कौर ने जब शगुन से इस बारे में बात की तो उस ने बताया, ‘‘दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है. बीजी को एक तो बेटे की मौत का सदमा है, ऊपर से अकेलापन परेशान करता है. कभीकभी शुगर की बीमारी की वजह से भी उन्हें घबराहट होने लगती है. आप चिंता न करें, मैं सब संभाल लूंगी.’’

शगुन की गोलमोल बातें कुलदीप की समझ से बाहर थीं. वह अच्छी तरह जानती थी कि शगुन बहुत चालाक है. वह सच्ची बात कभी नहीं बताएगी. इसीलिए कुलदीप ने अपने गांव के कुछ खास लोगों को फोन कर के विनती की कि वे उस के घर हो रहे क्रियाकलापों पर नजर रखें. गांव के जानकार लोगों ने कुलदीप कौर की बात मान कर राजविंदर के घर पर नजर रखनी शुरू कर दी.

बाद में उन्होंने कुलदीप को बताया कि उस की मां के घर में सामने से तो सब कुछ ठीक नजर आता है. शगुन लोगों के सामने तो राजविंदर कौर का बहुत खयाल रखती है. बाकी उन की पीठ पीछे घर में सासबहू का आपस में कैसा बर्ताव है, कुछ कहा नहीं जा सकता. बहरहाल, ऐसा जवाब सुन कर कुलदीप कौर मन मसोस कर रह जाती थी और अपनी मां की सलामती की दुआ करती थी.

29 अक्तूबर, 2016 को शगुन ने कुलदीप कौर को आस्ट्रेलिया फोन कर के खबर दी कि बीजी का देहांत हो गया है. शगुन ने मौत की वजह राजविंदर का शुगर लेवल कम हो जाना बताया था. उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी, डाक्टरों ने उसे यात्रा के लिए मना कर रखा था सो अपने घर के एकांत में कुलदीप ने छाती पीट कर मां की मौत का मातम मना लिया. अब उस के मायके के परिवार में सिवाय उस के कोई और नहीं बचा था.

राजविंदर की मौत के बाद 2-4 बार शगुन के फोन उसे आए थे, पर वह बिना सिरपैर की बातें ही किया करती थी. एक बात थी जो हर समय कुलदीप को परेशान कर रही थी. उसे हर समय ऐसा लगता था जैसे उस की मां की मौत स्वाभाविक नहीं थी. जरूर उस के साथ कोई अनहोनी घटी थी, पर क्या हुआ और कैसे यह बात उस की समझ में नहीं आती थी.

मां सरबजीत की मौत के बाद शगुन गांव की कोठी और सारी जमीन की मालकिन बन गई थी. कुलदीप अकसर यह भी सोचा करती थी कि कहीं उस की मां की मौत किसी षडयंत्र की वजह से तो नहीं हुई.
बहरहाल, कुलदीप ने एक बार फिर से अपने गांव के भरोसेमंद लोगों से अपनी मां की मौत से परदा उठाने के लिए विनती की. इस बात का पता लगाने में गांव के कुछ खास लोगों को पौने 2 साल का समय लग गया.

जुलाई 2018 में कुलदीप कौर को सूचना मिली थी कि उस की मां राजविंदर कौर की मौत में उस की भाभी शगुन का हाथ था. यह सुन कर वह ज्यादा हैरान नहीं हुई, क्योंकि उसे शगुन पर शुरू से ही शक था. यह तो दूर का मामला था, अगर वह कहीं पास होती तो कब की अपनी मां की मौत से परदा उठा देती.
खैर, अब भी देर नहीं हुई थी और अब वह पूरी तरह से यात्रा करने लायक थी. बीती जुलाई के दूसरे सप्ताह में वह आस्ट्रेलिया से भारत अपने गांव पंजाब पहुंच गई. जब अपने मायके के घर पहुंच कर उस ने वहां का नजारा देखा तो हैरान रह गई. उस की मां के घर 2 अनजान आदमी बैठे शगुन के साथ हंसीमजाक कर रहे थे.

गुस्से से बिफरते हुए जब कुलदीप कौर ने पूछा, ‘‘भाभी, ये लोग कौन हैं?’’ तो शगुन ने मिमियाते हुए जवाब दिया, ‘‘दीदी, तुम्हारे भाई की मौत के बाद ये दोनों खेतों में काम करने में मदद करते हैं.’’

कुलदीप को शक हुआ भाभी पर

कुलदीप अच्छी तरह जानती थी कि शगुन जो बता रही है, बात वह नहीं है. पर उस वक्त उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा. कुलदीप के आने की वजह से वे दोनों व्यक्ति वहां से चले गए. अगले दिन सुबह उठ कर कुलदीप नहाईधोई और गुरुद्वारे चली गई.

अरदास के बाद वह अपने मौसा हरदयाल सिंह को साथ ले कर सीधे एसएसपी (देहात) अमृतसर परमपाल सिंह के पास जा पहुंची. कुलदीप ने अपनी मां की हत्या का शक जताते हुए उन्हें बताया कि मां की मौत में उस की भाभी और कुछ अन्य लोगों का हाथ है.

एसएसपी परमपाल सिंह ने कुलदीप द्वारा दिए प्रार्थनापत्र पर नोट लिख कर उसे संबंधित थाना मेहता भेज दिया. साथ ही उन्होंने थानाप्रभारी अमनदीप सिंह को फोन कर आदेश दिया कि इस मामले की गुत्थी जल्द से जल्द सुलझाएं. कुलदीप कौर ने उसी दिन थानाप्रभारी अमनदीप से मिल कर आस्ट्रेलिया जाने से ले कर अपनी गैरहाजिरी में अपने भाई और मां की मौत का सारा हाल विस्तार से कह सुनाया.

कुलदीप कौर की पूरी बात सुनने के बाद अमनदीप सिंह ने तत्काल अपने खास मुखबिरों को शगुन और उस के साथियों की कुंडली खंगालने के काम पर लगा दिया. जल्दी ही उन्हें रिपोर्ट भी मिल गई.

एसएसपी के आदेश पर उन्होंने कुलदीप कौर की शिकायत को आधार बना कर उसी दिन यानी 30 जुलाई, 2018 को राजविंदर कौर की हत्या का मुकदमा भादंसं की धारा 302, 201, 120बी और 34 पर दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी.

अमनदीप सिंह ने उसी दिन एएसआई कमलबीर सिंह, हवलदार जतिंदर सिंह, महिंदरपाल सिंह, कांस्टेबल महकप्रीत सिंह और लेडी हवलदार हरजिंदर कौर को साथ ले कर बुट्टर गांव पहुंचे और देर शाम शगुनप्रीत कौर और उस के आशिक सतनाम सिंह को हिरासत में ले लिया.

हत्या के इस मामले का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह भाग निकला था. संभवत: उसे पुलिस काररवाई की भनक लग गई थी. जसबीर की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही थी, पर वह पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस ने की काररवाई

थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने जब शगुनप्रीत और सतनाम सिंह से पूछताछ की तो दोनों आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. इस के बाद उसी दिन राजविंदर कौर की हत्या के आरोप में शगुन और सतनाम सिंह को अदालत में पेश कर आगामी पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान पूछताछ में राजविंदर की मौत की जो कहानी पता चली, वह कुछ इस तरह थी—
शगुनप्रीत कौर बचपन से ही दिलफेंक और महत्त्वाकांक्षी थी. शादी से पहले अपने गांव में उस के कई युवकों के साथ नाजायज संबंध थे. अपने पति सरबजीत की मौत से पहले भी उस का गांव के कई युवकों के साथ नैनमटक्का चल रहा था, पर परदे के पीछे. क्योंकि तब उसे अपने पति का डर था.
लेकिन पति की मौत के बाद उस ने सरेआम यारियां जोड़नी शुरू कर दी थीं. अब उसे रोकनेटोकने वाला नहीं था. शगुन के अपने गांव के ही एक युवक सतनाम सिंह के साथ नाजायज संबंध बन गए थे. सतनाम आवारा आदमी था और नशीली वस्तुएं बेचता था.

शगुन ने प्रेमी के साथ बनाई योजना

जसबीर सिंह सतनाम के नशे के धंधे में उस का भागीदार था. उसे जब शगुन और सतनाम के संबंधों का पता चला तो बहती गंगा में हाथ धोने के लिए वह भी मचलने लगा. शगुन को इस बात से कोई ऐतराज नहीं था, बल्कि वह खुश थी कि उस के 2-2 चाहने वाले हैं. सरबजीत की मौत के बाद सतनाम सिंह शगुन के ही घर पर रहने लगा था.

यह बात राजविंदर को मंजूर नहीं थी. सतनाम के वहां रहने का वह विरोध करती थी. शगुन अपनी मनमानी पर उतर आई थी. उसे न तो सास का कोई डर था और न शरम. वह तो बस हवा में उड़ी चली जा रही थी.
जब राजविंदर कौर का विरोध बढ़ गया तो शगुन ने उसे रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. इस के 2 फायदे थे, एक तो राजविंदर की मौत के बाद उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं रहता और दूसरे सारी जमीनजायदाद उस के नाम हो जाती.

यह अलग बात थी कि राजविंदर की मौत के बाद सब कुछ उसे ही मिलने वाला था, पर उसे सब्र नहीं था. दूसरे उसे यह भी डर था कि मरने से पहले राजविंदर जायदाद किसी और के नाम न कर जाएं.
शगुनप्रीत और उस के आशिक सतनाम सिंह ने मिल कर राजविंदर कौर की हत्या की योजना बनाई. इस के लिए उन्होंने गांव के ही जसबीर सिंह को चुना और उसे ढाई लाख रुपए देने का वादा कर के तैयार कर लिया.

अपनी योजना के अनुसार, 28 अक्तूबर 2016 की आधी रात को तीनों ने मिल कर सोते समय राजविंदर कौर को गला दबा कर मार डाला. अगली सुबह योजना के तहत शगुन ने कुछ देर गांव वालों के सामने राजविंदर की बीमारी का नाटक रचा और बाद में शोर मचा कर यह खबर फैला दी कि शुगर लेवल कम होने की वजह से राजविंदर की मौत हो गई है.

इतना ही नहीं, वह इतनी शातिर निकली कि रिश्तेदारों को बताए बिना ही जल्दबाजी में गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर सास का अंतिम संस्कार भी करा दिया. बाद में उस ने कुलदीप कौर को भी फोन कर के इस की खबर दे दी थी.

राजविंदर कौर की हत्या की योजना में शगुन और सतनाम सिंह ने ढाई लाख रुपए की सुपारी दे कर जसबीर को अपने साथ शामिल तो कर लिया था, पर हत्या के बाद उन्होंने उसे पैसे देने से इनकार कर दिया था.

जसबीर काफी समय तक उन से पैसे मांगता रहा, जब उन्होंने पैसे देने से बिलकुल इनकार कर दिया तो गुस्से में आ कर उस ने गांव के कुछ लोगों के सामने इस बात का खुलासा कर दिया. गांव वाले पहले से ही तीनों पर नजर रखे हुए थे, सो उन्होंने यह खबर फोन द्वारा कुलदीप को दे दी.

रिमांड की अवधि समाप्त होने पर थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने शगुनप्रीत कौर और उस के प्रेमी सतनाम सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. इस अपराध का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह फरार था.
– पुलिस सूत्रों पर आधारित

खतरनाक औरत : गांव की गलियों से निकली माया के सपने

27 जून, 2018 की सुबह काशीपुर स्टेशन के अधीक्षक ने थाना आईटीआई को फोन कर के
बताया कि बाजपुर ट्रैक पर किसी की लाश पड़ी है. यह सूचना मिलते ही आईटीआई थानाप्रभारी कुलदीप सिंह अधिकारी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. जब पुलिस वहां पहुंची, तब वहां कोई भी मौजूद नहीं था. वजह यह थी कि न तो वहां कोई आम रास्ता था और न ही कोई वहां से गुजरा था.
घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस ने लाश और घटनास्थल का मुआयना किया. साथ ही जरूरी काररवाई भी की. मृतक के गले और छाती पर चोट के निशान थे. उस की एक पैर की एड़ी भी कटी हुई थी, जो शायद ट्रेन की चपेट में आने से कट गई थी.

लेकिन लाश देख कर ही पता चल रहा था कि उस की मौत ट्रेन से कट कर नहीं हुई थी. इस का मतलब यह था कि उस की हत्या कर के डैडबौडी वहां फेंकी गई थी, जिस से यह मामला दुर्घटना का लगे.
रेलवे ट्रैक पर लाश मिलने की सूचना मिलते ही आसपास के गांवों के लोग एकत्र होने लगे. घटनास्थल पर काफी लोग जुट गए थे, उन में राजपुरम निवासी छत्तर ने मृतक की पहचान करते हुए पुलिस की बड़ी सिरदर्दी खत्म कर दी.

छत्तर ने मृतक की पहचान अपने जीजा राकेश उर्फ हरकेश के रूप में की. राकेश की हत्या की बात सुन कर उस के घर वाले तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पहुंचे उस के घर वालों से पुलिस ने राकेश के बारे में पूछताछ की और लाश पोस्टमार्टम के लिए राजकीय चिकित्सालय भिजवा दी.

राकेश की लाश के पोस्टमार्टम के समय एक बात चौंकाने वाली पता चली. मृतक के पैरों पर जला हुआ इंजन औयल लगा मिला था. वैसा ही तेल वहां मौजूद मृतक राकेश के मौसेरे भाई इंद्रपाल के कपड़ों पर भी लगा हुआ था. यह पता चलते ही राकेश के घर वालों ने इंद्रपाल को अपने कब्जे में ले कर उसे मारनापीटना शुरू कर दिया.

वैसे भी राकेश के घर वालों को शक था कि उस की हत्या इंद्रपाल ने ही की है. पोस्टमार्टम के दौरान यह बात सामने आते ही उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि राकेश का हत्यारा वही है.

राकेश के घर वालों ने इंद्रपाल को ठोकपीट कर पुलिस के हवाले कर दिया. इंद्रपाल को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने उस से कड़ी पूछताछ की तो पहले तो उस ने साफ इनकार कर दिया कि राकेश की हत्या से उस का कोई लेनादेना नहीं है. लेकिन जब पुलिस ने उस के कपड़ों पर लगे काले औयल का राज पूछा तो वह पुलिस को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया.

आखिरकार उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया. पूछताछ में इंद्रपाल ने बताया कि राकेश की हत्या उस की बीवी माया ने कराई है. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस इंद्रपाल को थाना ले आई. थाने में उस से कड़ी पूछताछ की गई.

पुलिस पूछताछ के दौरान पता चला कि राकेश की हत्या में मृतक की बीवी माया, इंद्रपाल निवासी मोहनतखतपुर, थाना कुंदरकी जिला मुरादाबाद, गुड्डू निवासी नगला थाना भगतपुर, जिला मुरादाबाद, रेखा निवासी खड़कपुर काशीपुर, जमुना निवासी खड़कपुर शामिल थे.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने आरोपियों की धरपकड़ शुरू की तो सभी आरोपी पकड़ में आ गए. गिरफ्तारी के बाद उन से पूछताछ की गई तो राकेश की हत्या की पूरी सच्चाई सामने आ गई.

मेहनतकश राकेश पहुंच गया शहर की ड्योढ़ी पर

बाजपुर, उत्तराखंड के गांव कनौरा निवासी हरकेश उर्फ राकेश की शादी करीब 17 साल पहले गांव परमानंदपुर (गौशाला) निवासी खानचंद्र की बेटी माया से हुई थी. माया देखने में खूबसूरत ही नहीं, तेजतर्रार भी थी.

राकेश के पास जुतासे की थोड़ी सी जमीन थी, जिस में इतनी पैदावार नहीं होती थी कि परिवार की गुजरबसर हो सके. राकेश फैक्ट्रियों में काम कर के परिवार का भरणपोषण करता था. बाद में एक फैक्ट्री में उसे लेबर का ठेका मिल गया तो उस की मेहनत कम हो गई और आमदनी ज्यादा.

शादी के कुछ समय बाद तक राकेश की घरगृहस्थी ठीक से चलती रही. इस बीच पतिपत्नी का तालमेल भी ठीक बैठ गया था. राकेश शुरू से ही अपनी बीवी माया को बहुत प्यार करता था. वह सुबह काम पर चला जाता और देर शाम घर लौटता था. घर आने के बाद वह दिन भर की थकान की वजह से खाना खापी कर जल्दी सो जाता था. उस की बीवी माया को यह पसंद नहीं था. वह चाहती थी कि जब तक वह जागे, पति उस का साथ दे. लेकिन राकेश की अपनी मजबूरी थी, जो माया के अरमानों पर भारी पड़ती थी.

माया ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. लेकिन उस की हसरतों की उड़ान ऊंची थी. वह शुरू से ही शरारती थी, बनठन कर रहने वाली. राकेश के साथ शादी के बंधन में बंध कर वह ससुराल तो आ गई थी, लेकिन वह अपनी शादी से खुश नहीं थी.

शादी के बाद अनचाहे ही सही, राकेश के साथ रहना उस की मजबूरी थी. जबकि राकेश उसे पा कर खुश था. शादी के बाद वह उसे जी जान से चाहने भी लगा था.

गुजरते समय के साथ माया 3 बच्चों की मां बन गई. उस की बड़ी बेटी का नाम मधु था, उस से छोटा बेटा था आकाश और सब से छोटी थी बेटी प्रीति. राकेश काम के लिए गांव से शहर आता था. जब बच्चे थोड़े बड़े हो गए तो माया का मन शहर में रहने का होने लगा. यह बात मन में आते ही उस ने राकेश से कहा, ‘‘जब तुम्हें शहर में ही काम करना है तो क्यों न हम शहर में थोड़ी सी जमीन खरीद कर छोटा सा मकान बना लें.’’

राकेश अपने घर की स्थिति अच्छी तरह जानता था. उस के सामने पैसे की मजबूरी थी. उस ने इनकार कर दिया तो माया को मन मार कर गांव में ही रहने को मजबूर होना पड़ा.

शादी के कुछ सालों के बाद तक तो माया पत्नी का धर्म निभाती रही, लेकिन जब उस के दिमाग से राकेश की छवि धूमिल होने लगी तो उस का मन और निगाहें इधरउधर भटकने लगीं. जल्द ही उस ने अपने रंगढंग दिखाने शुरू कर दिए. उस ने चोरीछिपे ससुराल में कई लोगों से अवैध संबंध बना लिए. राकेश को इस बात की जानकारी कानोंकान नहीं हुई. हालांकि माया 3 बच्चों की मां बन चुकी थी, फिर भी उस के शरीर की कशिश बरकरार थी.

बदनाम है खड़कपुर

माया की एक बहन की शादी काशीपुर के गांव खड़कपुर निवासी सत्यभान से हुई थी. माया जब भी बहन से मिलने आती तो उस के बच्चे साथ आते थे और मौसी के घर रहने की जिद करते थे. राकेश ने कई बार अपने बच्चों को समझाने की कोशिश की, लेकिन बच्चे जिद करते कि उन्हें भी मौसी की तरह शहर में ही रहना है.

आखिर बच्चों की जिद के आगे राकेश को झुकना पड़ा. करीब 6 साल पहले राकेश ने अपनी जुतासे की जमीन बेच दी. उस पैसे से उस ने खड़कपुर में 25 गज का प्लौट ले कर मकान बनवा लिया. इस के बाद राकेश अपने बीवीबच्चों के साथ खड़कपुर आ कर रहने लगा.

काशीपुर से लगे गांव खड़कपुर में शुरू से ही मजदूर और छोटामोटा काम करने वाले लोग रहते हैं. इसी वजह से यह इलाका हर मामले में चर्चित है. चाहे कच्ची शराब की बिक्री हो, जुआ हो या फिर देह व्यापार, खड़कपुर में सब मिलता है.

खड़कपुर आने के बाद माया की संगत कुछ ऐसी औरतों के साथ हो गई, जो देह व्यापार से जुड़ी थीं. नतीजतन उस के रहनसहन में काफी बदलाव आ गया. वह बनठन कर घर से निकलती थी. गलत औरतों के साथ माया की संगत देख कर राकेश का दिमाग घूमने लगा. उस ने माया को कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस ने पति की एक नहीं मानी. फलस्वरूप घर में कलह और विवाद रहने लगा, जिस के चलते पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ने लगीं.

उधर माया ने खड़कपुर निवासी रेखा, जानकी और कई ऐसी ही औरतों की टोली बना ली, जो देह व्यापार से जुड़ी हुई थीं. उन का सहयोग मिलते ही माया पूरी तरह देह व्यापार में उतर गई.
यह बात राकेश की बरदाश्त के बाहर थी. उस ने इस की शिकायत माया के मायके वालों से की, लेकिन उन लोगों ने माया का साथ देते हुए कहा कि वह बिना वजह उन की बेटी को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. माया ऐसी कतई नहीं है.

मायके वालों का साथ मिलने से माया के हौसले और बुलंद हो गए. राकेश के काम पर निकलते ही वह बच्चों को स्कूल भेज देती और फिर वह अपने धंधे में लग जाती. इस मामले में रेखा और जानकी उस का साथ दे रही थीं.

उन के सहयोग से उस का धंधा जोरों से चल निकला था. आसपास के लोग खड़कपुर में कच्ची शराब पीने आते तो वह अपने दलालों के माध्यम से उन्हें फंसाती और पैसा ले कर उन के साथ मौजमस्ती करती.
करीब 6 महीने पहले गांव तख्तपुर, कुंदरकी, जिला मुरादाबाद का रहने वाला राकेश का मौसेरा भाई इंद्रपाल भी काम की तलाश में खड़कपुर आया और राकेश के घर में रह कर एक फैक्ट्री में काम करने लगा.

राकेश के घर पर रह कर इंद्रपाल कुछ ही दिनों में अपनी भाभी के कर्मों से पूरी तरह से वाकिफ हो गया. जब इंद्रपाल को पता चला कि माया राकेश की गैरमौजूदगी में देह व्यापार करती है तो उस ने माया की दुखती रग पकड़ कर उस के साथ अवैध संबंध बना लिए.

हकीकत जान कर राकेश हुआ खफा

माया के साथ शारीरिक संबंध बनते ही इंद्रपाल ने नौकरी छोड़ दी और माया के लिए ग्राहक लाने लगा. इस के बदले माया उसे कमीशन देती थी, जो उस की मेहनत की कमाई से ज्यादा होता था.
देवरभाभी के बीच यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा, लेकिन जब राकेश को इस की जानकारी मिली तो उस ने इंद्रपाल को खरीखोटी सुना कर घर से भगाने की कोशिश की.

लेकिन इस मामले में माया इंद्रपाल का पक्ष ले कर उस के सामने खड़ी हो गई. जब राकेश को लगा कि देवरभाभी के सामने उस की नहीं चलने वाली तो उस ने बीवी से किनारा कर लिया. साथ ही माया से साफसाफ कह दिया कि आज के बाद वह अपना घर का खर्च भी खुद ही चलाए.

उस दिन के बाद माया राकेश से नफरत करने लगी. वह देह व्यापार की आदी हो चुकी थी, जिसे वह किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं थी. जिस दिन माया और राकेश के बीच तकरार हुई थी, उसी दिन माया ने सोच लिया था कि वह उसे अपने रास्ते से हटा कर रहेगी.

माया ने इंद्रपाल को भी राकेश के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया था. उस ने इंद्रपाल से साफ कहा कि हमारे घर में जो भी फसाद हो रहा है, वह सब तुम्हारी वजह से है. राकेश को हम दोनों पर शक हो गया है. इसीलिए वह आए दिन मुझे मारतापीटता है. अगर तुम ने समय रहते उस का कोई इलाज नहीं किया तो तुम्हें यह घर छोड़ कर जाना पड़ेगा. माया की बात सुनते ही इंद्रपाल का पौरुष जाग उठा.

माया ने अपने धंधे में आड़े आ रहे पति को मौत की नींद सुलाने के लिए षडयंत्र रचना शुरू कर दिया था. वह राकेश की गैरमौजूदगी में अपनी पूरी मंडली को अपने घर बुला कर शराब पिलाती थी. जब सब शराब के नशे में हो जाते तो माया उन्हें अय्याशी की राह पर ले जाती. इस का नतीजा यह निकला कि माया का घर उस इलाके में चर्चित हो गया, जहां पर लोग शराब और शवाब दोनों का आनंद लेने के लिए आने लगे.
धीरेधीरे माया की करतूत राकेश के सामने आई तो उस ने फिर से माया को मारापीटा. इस के बाद माया ने राकेश से साफ कह दिया कि अगर उसे घर में मुंह बंद कर के रहना है तो रहे वरना रहने के लिए कहीं दूसरी जगह कमरा ले ले. माया ने यह भी कहा कि वह चाहे तो उसे तलाक दे सकता है.
माया ने बदल दिया पति

जब राकेश को लगने लगा कि माया किसी भी तरह सुधरने वाली नहीं है तो उस ने अपने बच्चों की खातिर अपने घर की तरफ से पूरी तरह से आंखें बंद कर लीं. इस के बाद भी माया के दिल को तसल्ली नहीं हुई.
उस के बाद वह इंद्रपाल के साथ उस की बीवी बन कर रहने लगी. इंद्रपाल उस का घर खर्च चलाने के साथसाथ उस की दिली तमन्ना भी पूरी करने लगा था.

इंद्रपाल की पहले से ही गुड्डू से अच्छी दोस्ती थी. उस ने अपने इस धंधे में गुड्डू को भी शामिल कर लिया. उस के बाद इंद्रपाल और गुड्डू दोनों माया, रेखा और जमुना के लिए ग्राहक ढूंढ कर लाते और अपना कमीशन ले कर मौजमस्ती करते. जब इन लोगों की हरकतें हद पार करने लगीं तो राकेश एक दिन जमुना के पति धर्म सिंह से मिला.

उस ने अपनी बीवी और उस की बीवी जमुना की पोल खोलते हुए बताया कि दोनों ने कई औरतों के साथ मिल कर उस के घर को अय्याशी का अड्डा बना रखा है. यह पता चलने पर धर्म सिंह अपनी बीवी जमुना पर चढ़ बैठा.

उस ने जमुना से मारपिटाई भी की. जब ग्रुप की सभी मेंबरों को पता चला कि फसाद की असली जड़ राकेश है तो सब ने मिल कर उसे मौत के घाट उतारने में माया का साथ देने के लिए रास्ता खोजना शुरू कर दिया.

शराब के सुरूर में एक दिन जब इस मुद्दे पर बात हुई तो सब ने तय किया कि राकेश को ठिकाने लगाने से पहले किसी आरोप में धर्म सिंह को जेल भिजवाया जाए. इस गिरोह से जुड़ी सभी औरतों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. सभी के एकदूसरे के परिवार से घर जैसे संबंध बन गए थे.

इसी का लाभ उठाते हुए पहले से तैयार योजना के तहत रेखा ने किसी काम के बहाने धर्म सिंह को अपने घर बुलाया. रेखा को पता था कि धर्म सिंह शराब पीने का आदी है. इसी का लाभ उठा कर उस ने धर्म सिंह को पहले से घर में रखी कच्ची शराब पिलाई. जब धर्म सिंह नशे में डूब गया तो उस ने घर से बाहर आ कर शोर मचा दिया. रेखा के रोनेचीखने की आवाज सुन कर आसपास के लोग एकत्र हुए तो उस ने बताया कि धर्म सिंह उसे अकेला देख कर घर में घुस आया और उस की इज्जत लूटने की कोशिश करने लगा.

योजना रह गई धरी की धरी

रेखा की बात मान कर उस के पड़ोसी उस के घर के अंदर गए तो धर्म सिंह नशे की हालत में बेसुध सा पड़ा था. उस के कपड़े भी शरीर से उतरे हुए थे. यह देख कर पड़ोसियों ने समझा कि रेखा जो भी कह रही है, वह सच है.

बाद में रेखा अपनी मंडली की सभी सदस्यों और पड़ोसियों को साथ ले कर थाना आईटीआई पहुंची और धर्म सिंह के खिलाफ दुष्कर्म के प्रयास का आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज कराने की कोशिश की. लेकिन जब पुलिस ने जांच की तो मामला फरजी पाया गया.

फलस्वरूप धर्म सिंह बच गया. जब यह गिरोह धर्म सिंह को फंसाने में फेल हो गया तो गिरोह के सदस्यों ने राकेश को मौत की नींद सुलाने की योजना पर ध्यान केंद्रित कर दिया. आखिरकार माया और उस के मौसेरे देवर इंद्रपाल ने अपने साथियों के साथ मिल कर राकेश की हत्या की साजिश रच डाली.

माया ने अपने पति राकेश से छुटकारा पाने के लिए सभी साथियों को 50 हजार रुपए देने की बात कही, जबकि इंद्रपाल को राकेश की बाइक देने का वादा किया. योजना बनने के बाद 26 जून को देर रात गुड्डू राकेश को शराब पिलाने के बहाने साथ ले कर रामनगर रोड स्थित गांव रमपुरा पहुंचा. वहां पहुंच कर गुड्डू ने उसे जम कर शराब पिलाई.

राकेश जब नशे में डूब गया तो गुड्डू ने मोबाइल से रेखा को फोन कर दिया. रेखा पहले से ही उस के फोन का इंतजार कर रही थी. रात के लगभग 10 बजे गुड्डू रेखा की मदद से राकेश को बाइक पर बिठा कर कचनाल गाजी गुसाईं स्थित अपने कमरे पर पहुंचा.

माया का देवर इंद्रपाल और जमुना वहां पहले ही पहुंच गए थे और इन लोगों का इंतजार कर रहे थे. ज्यादा नशा होने की वजह से राकेश गुड्डू के कमरे पर पहुंचते ही अर्द्धबेहोशी की हालत में फैल गया.

षडयंत्र हो गया कामयाब

जब सब लोगों को लगा कि राकेश को हमेशा के लिए मौत की नींद सुलाने का इस से बढि़या मौका नहीं मिलेगा तो इंद्रपाल और रेखा ने राकेश के हाथ पकड़े और गुड्डू ने उस का गला दबा दिया. जमुना ने इस काम में गुड्डू की मदद की. कुछ देर छटपटाने के बाद राकेश की मौत हो गई.

राकेश को मौत की नींद तो सुला दिया गया, अब बारी थी उस की लाश को ठिकाने लगाने की. पहले से बनी आगे की योजना के अनुसार राकेश की लाश को रेलवे ट्रैक पर डालना था ताकि मामला रेल से कटने का लगे.

परेशानी यह थी कि जिस जगह गुड्डू का कमरा था, वहां से रेलवे लाइन तक जाने के लिए न तो कोई पगडंडी थी और न कोई रास्ता.

कोई और रास्ता न देख गुड्डू और इंद्रपाल ने राकेश की लाश कंधे पर रखी और रेलवे ट्रैक तक ले गए. वहां जा कर दोनों ने उस की लाश रेलवे ट्रैक के किनारे डाल दी.

रात के अंधेरे में राकेश की लाश को रेलवे लाइन पर डालने के लिए ले जाते वक्त इंद्रपाल का पैर रास्ते में पड़े जले हुए इंजन औयल पर पड़ गया था. बाद में राकेश की लाश को संभालते वक्त वह औयल मृतक राकेश के पैर पर लग गया था.

इंद्रपाल ने अपने कपड़ों पर लगे औयल को गंभीरता से नहीं लिया था. बाद में वही औयल इस केस को खोलने में सहायक बना. राकेश की लाश का एक पैर रेलवे लाइन से लगा हुआ था, इसीलिए ट्रेन आने पर उस के एक पैर की एड़ी कट गई थी.

राकेश की लाश को रेलवे ट्रैक पर डालने के बाद सभी अपनेअपने कमरे पर चले गए. उन्हें पता था कि कल को दिन निकलते ही रेल हादसे में राकेश की मौत की खबर फैल जाएगी.

अगले दिन सुबह इंद्रपाल ने मृतक के भाई कमल के मोबाइल पर फोन कर के बताया कि राकेश कल 2 बजे ड्यूटी पर गया था, लेकिन घर वापस नहीं आया. यह सूचना मिलते ही कमल अपने घर वालों के साथ खड़कपुर पहुंचा. इसी दौरान उसे सूचना मिली कि रेलवे लाइन पर एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. कमल ने रेलवे लाइन पर जा कर देखा तो वह लाश उस के भाई राकेश की थी.

केस के खुल जाने के बाद आईटीआई पुलिस ने राकेश के भाई कमल की तहरीर के आधार पर इंद्रपाल, रामकिशोर, रेखा और जमुना के खिलाफ भादंवि की धारा 147, 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. सभी आरोपी पकड़े जा चुके थे. इन सब को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया. राकेश की मौत और माया के जेल चले जाने के बाद उस के तीनों बच्चे बेसहारा हो गए. पुलिस ने बच्च राकेश के साढ़ू सत्यभान को सौंप दिए. इस मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी कुलदीप सिंह स्वयं ही कर रहे हैं.

इन आरोपियों को पकड़ने वाली टीम में थानाप्रभारी कुलदीप सिंह, एसआई कैलाश चंद, कांस्टेबल विनय कुमार, कांस्टेबल प्रकाश सिंह, कांस्टेबल कुंदन सिंह तथा गंगा सिंह शामिल थे.

उस की बात

उस की बात पेड़ छांवदार

जिस से उठने का मन न करे

मन करे तो तन न करे.

उस की बात खिला फूल

जो कभी न मुरझाए

वक्त के साथ खिलता जाए.

उस की बात इत्र की बोतल

न खुले तब भी महक आए

और खुले तो जहां महक जाए.

उस की बात मोती का खजाना

हर मोती दूसरे से बढ़ कर

जिन्हें रखा है सोने में मढ़ कर.

उस की बात चांदनी रात

जो ठंडा उजाला भर दे

हर एक जलन को दूर कर दे.

उस की बात बहता झरना

मन में संगीत जगा दे

हर एक दुख को भगा दे.

उस की बात बच्चे की हंसी

जिस को सुनते ही रहो

प्रेम के तागे में बुनते ही रहो.

– शाहिद प्रहरी वारसी

नाना पाटेकर के बाद तनुश्री ने लगाया गणेश आचार्य पर आरोप

‘आशिक बनाया आपने’ फेम एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता नाना पाटेकर पर एक के बाद एक आरोप लगाने के बाद से खूब चर्चाएं बटोर रही हैं. मी टू कैंपेन के तहत तनुश्री दत्ता ने नाना पर आरोप लगाए थे कि फिल्म के सेट पर उनका व्यवहार ठीक नहीं है. तनुश्री के इन आरोपों के बाद गणेश आचार्य ने नाना का बचाव किया. अब इसके बाद तनुश्री ने फिर से नए खुलासे किए हैं.

तनुश्री दत्ता ने ताजा आरोपों में कहा कि गणेश आचार्य झूठे और दोगले हैं. मेरी ही बदौलत गणेश आचार्य को फिल्म में काम मिला था. अब वो मेरे खिलाफ बात कर रहे हैं. जाहिर है वो नाना पाटेकर का सपोर्ट करेंगे क्योंकि वो भी शोषण करने में बराबर शामिल रहे हैं.

बता दें कि इससे पहले कोरियोग्राफर गणेश आचार्य ने पूरे मामले पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा था, उन्हें इतनी पुरानी बात पूरी तरह से याद नहीं है लेकिन एक ड्यूट सान्ग था और सेट पर कुछ ऐसा हुआ कि शूटिंग कई घंटे तक बीच में रोकनी पड़ी, शायद किसी गलतफहमी की वजह से ऐसा करना पड़ा. मगर तनुश्री जैसा बता रही हैं ऐसा कुछ भी नहीं है क्योंकि नाना ने शूटिंग सेट पर कभी राजनीतिक दलों के लोगों को नहीं बुलाया.’

बता दें कि तनुश्री ने आरोप लगाया कि साल 2008 में फिल्म ‘हौर्न ओके प्लीज’ के आइटम सौन्ग के दौरान नाना पाटेकर ने उनके साथ बदतमीजी करने की कोशिश की थी. उन्होंने यहां तक कहा कि गाने की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर उन्हें गलत तरीके से छूने की कोशिश कर रहे थे. नाना को जरूरत से ज्यादा करीबी होता देख तनुश्री डर गईं और वहां से भागकर वैनिटी वैन में चली गईं.

इस दौरान तनुश्री ने फिल्म कोरियोग्राफर गणेश आचार्य, फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर पर भी इस मुद्दे पर एकजुट होने का आरोप लगाया था. तनुश्री ने बताया था कि इन सभी के सब कुछ जानने के बाद भी इन्होंने मामले पर चुप्पी बनाए रखी.

मायावती : 2019 के चुनावों में बड़ी ताकत

दलित तबका सामाजिक तौर पर भले ही हाशिए पर हो, पर राजनीतिक रूप से वह सत्ता हासिल करने का जरीया बन सकता है. यही वजह है कि हर राजनीतिक दल दलितों का करीबी दिखने की होड़ में लगा है. लोकसभा की 544 सीटों में से 131 सीटें दलित तबके के लिए रिजर्व्ड हैं. साल 2014 में भाजपा को मिली कामयाबी में भी दलित तबके का खास हाथ था. तब लोकसभा की 131 रिजर्व्ड सीटों में से 65 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी. 2019 के आगामी लोकसभा चुनाव में ये सीटें काफी खास हैं. भाजपा का इन रिजर्व्ड सीटों पर प्रदर्शन दोहरा पाना मुश्किल है. भाजपा का साथ दे कर दलित नेता उदित राज, सावित्री बाई फुले, रामदास अठावले और रामविलास पासवान काफी हद तक अपनी पुरानी इमेज को खो चुके हैं. अब दलित तबके में उन की पुरानी साख नहीं रह गई है.

लिहाजा, दलित नेताओं में मायावती खुद को मजबूत विकल्प के रूप में सामने रख कर दलित वोट बैंक को दोबारा खुद से जोड़ने की कवायद में जुट गई हैं. दलित तबके को एक मजबूत नेता के साथ जुड़ कर ही अपना भला होता दिखता है. ऐसे में बसपा ने मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन कर इस बात को समझाया गया. इस सम्मेलन में बसपा प्रमुख मायावती शामिल नहीं थीं. वहां पार्टी के महासचिव और कोऔर्डिनेटर वीर सिंह समेत कई बड़े नेताओं ने मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही.

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और जोनल कोऔर्डिनेटर जय प्रकाश सिंह ने भीम आर्मी जैसे दूसरे दलित संगठनों को मायावती का साथ देने की बात कही. जय प्रकाश सिंह ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘गब्बर’ कह दिया. कांग्रेस के नेता राहुल गांधी पर भी टिप्पणी कर दी. सम्मेलन के बाद मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया गया. लोकसभा चुनावों को ले कर बसपा बूथ लैवल पर अपनी रणनीति तैयार कर चुकी है. वह चाहती है कि नेताकार्यकर्ता बिना किसी प्रचार के काम करते रहें. प्रमोशन में रिजर्वेशन और दलित ऐक्ट के सहारे बसपा दलितों को एकजुट करने का काम कर रही है.

बसपा का कैडर अपने वोट बैंक को यह समझाने का काम कर रहा है कि रिजर्वेशन तब तक है, जब तक मायावती और बसपा मजबूत रहेगी, इसलिए बसपा के लोग मायावती को देवी तक बताने का काम कर रहे हैं. लेकिन मायावती को लगता है कि इन बातों का विरोधी दुष्प्रचार न करने लगें इसलिए वे इन बातों को मीडिया से दूर रखने की बात कर रही हैं. वे नहीं चाहती हैं कि उन के प्रचार की बातें मीडिया और विपक्षी लोगों में जाएं.

भाजपा का दुष्प्रचार कार्यकर्ता सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ टिप्पणी करने वाले राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और जोनल कोऔर्डिनेटर जय प्रकाश सिंह को मायावती ने बसपा से बाहर कर दिया. बसपा ने रामजी गौतम को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया.

बसपा प्रमुख मायावती को सोशल मीडिया पर हुआ प्रचार भी पसंद नहीं आया. बसपा ने इसे अपनी पार्टी के खिलाफ दुष्प्रचार मानते हुए गलत बताया. यही नहीं, बसपा ने साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया पर वे सक्रिय नहीं हैं. मायावती ने पार्टी कार्यकर्ताओं को बताया कि उन को किसी तरह के दुष्प्रचार का हिस्सा नहीं बनना है. इस वजह से मीडिया में किसी भी तरह की बयानबाजी पर भी रोक लगा दी गई.

मायावती ने कहा कि चुनावी तालमेल जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पार्टी पदाधिकारी कुछ न बोलें. इस तरह की किसी भी टिप्पणी को अनुशासनहीनता माना जाएगा. पार्टी हाईकमान ही इस बारे में आखिरी फैसला करेगा. दरअसल, मायावती की असली चिंता भाजपा का काम करने का तरीका है. भाजपा के पास किसी भी बयानबाजी पर पलटवार करने की ताकत है. भाजपा का प्रचारतंत्र केवल अपनी पार्टी के नेताओं की इमेज को निखारने का काम ही नहीं करता है, बल्कि वह दूसरे दलों का दुष्प्रचार भी करता है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘पप्पू इमेज’ इस का बेहतर उदाहरण है. सपा नेता अखिलेश यादव को ‘टोंटी चोर’ प्रचारित किया गया. मायावती खुद और बसपा को इस तरह के दुष्प्रचार का मौका नहीं देना चाहतीं. इस वजह से उन्होंने अपने नेताओं को चुप रहने की सीख दे

दी है. मायावती ने कार्यकर्ताओं से कहा है कि भाजपा ने राजनीतिक वातावरण को काफी खराब कर दिया है. यह पार्टी लांछन वाली राजनीति करने पर उतारू है. ऐसे में जरूरी है कि बसपा के नेता और कार्यकर्ता बोलने में संयम बरतें. बसपा की पहचान सेना की तरह अनुशासन में बने रहने की है. इस के जरीए ही बाबा साहब के सपनों को पूरा किया जा सकता है.

प्रधानमंत्री बनने का सपना मायावती के मन में प्रधानमंत्री बनने का सपना साल 2009 के लोकसभा चुनाव से पल रहा है. तब बसपा के महासचिव सतीश मिश्रा ने इस की कोशिश भी शुरू की थी. पर तब लोकसभा में बसपा को मनचाही कामयाबी नहीं मिली थी. तब कांग्रेस ने बसपासपा को साथ ले कर डाक्टर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया था और 2014 तक सरकार चलाई थी.

साल 2019 के आगामी लोकसभा चुनाव में जब बसपा नेताओं ने मायावती को प्रधानमंत्री बनने का सपना दिखाया तो वे सचेत हो गईं. उन को लगा कि कहीं भाजपा इस को आधार बना कर दूसरे दलों से दूरियां न बना दे. ऐसे में मायावती ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को कहा है कि वे इस तरह का प्रचार न करें.

दरअसल, मायावती को यह पता है कि चुनाव से पहले इस तरह की बातोेंसे कोई फायदा नहीं होगा, उलटे नुकसान होने का डर ज्यादा है. साल 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए बहुत अहम है. उत्तर भारत के राज्यों में उस को अपना पुराना प्रदर्शन दोहरा पाना मुमकिन नहीं दिख रहा है. ऐसे में बहुमत की सरकार बनाने की उम्मीद कम है.

कांग्रेस भी तालमेल की राजनीति पर जोर दे रही है. ऐसे में प्रधानमंत्री बनने का सपना दल के सांसदों की तादाद के बल पर निर्भर करेगा. इस के अलावा 2 बड़े दलों के रूप में भाजपा और कांग्रेस उभरेंगी. ऐसे में प्रधानमंत्री पद पर मुख्य रूप से दावा इन दलों का ही रहेगा.

यह भी मुमकिन है कि बड़े दलों का खेल बिगाड़ने के नाम पर तीसरे दल के नेता को प्रधानमंत्री बना दिया जाए. चौधरी चरण सिंह, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल और देवगौड़ा इस तरह के समीकरण से ही देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं. मायावती को लगता है कि अगर अभी से कार्यकर्ता उन को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार कहेंगे तो विरोधी सचेत हो जाएंगे और उन के खिलाफ रणनीति बनाने में कामयाब हो जाएंगे.

यह बात जरूर है कि 2009 के लोकसभा चुनाव से 2019 का लोकसभा चुनाव अलग होगा. मायावती इस बार पहले वाली गलती नहीं करना चाहती हैं. वे उत्तर प्रदेश से बाहर भी अपना जनाधार बढ़ाना चाहती हैं. ऐसे में वे कांग्रेस के साथ तालमेल का फैसला भी कर सकती हैं. मायावती उत्तर प्रदेश में भले ही मजबूत हों पर मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में बसपा का जनाधार नहीं है. यह बात जरूर है कि इन राज्यों में दलित वोट बैंक है. अब बसपा इस जनाधार को अपने कब्जे में कर संसद में अपनी तादाद को बढ़ाना चाहती है. संसद में संख्या बल ही प्रधानमंत्री बनने का उन का सपना पूरा कर सकता है.

दलित वोट बैंक का गणित लोकसभा के पिछले चुनाव के आंकड़ों को देखें तो रिजर्व्ड सीटों पर सब से बेहतर प्रदर्शन भाजपा का रहा है. उत्तर प्रदेश में 17 रिजर्व्ड सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया था. देशभर की 131 सीटों में से 65 सीटें भाजपा ने जीती थीं. बसपा को अब भाजपा से दलित वोट बैंक को वापस लेना है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दलित वोट निर्णायक हैं. ऐसे में अगर बसपा ने इन 3 राज्यों के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर लिया तो लोकसभा चुनाव में उस का भाव बढ़ जाएगा.

मध्य प्रदेश की 35 फीसदी आबादी दलित व आदिवासी है. यहां लोकसभा की 10 सीटें रिजर्व्ड हैं. छत्तीसगढ़ में 43 फीसदी आबादी दलित और आदिवासी है. यहां लोकसभा की 5 सीटें रिजर्व्ड हैं. राजस्थान में 29.8 फीसदी दलित व आदिवासी आबादी और 7 सीटें रिजर्व्ड हैं. ऐसे में इन 3 राज्यों में

22 सीटें रिजर्व्ड हैं. अगर कांग्रेस और बसपा यहां तालमेल कर बेहतर प्रदर्शन कर लेती हैं तो भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सकती है. पत्रकार पारस अमरोही कहते हैं, ‘‘भाजपा गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में

72 लोकसभा की सीटें जीती थीं जो अब घट कर 69 रह गई हैं. लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में ही सब से ज्यादा 80 सीटें हैं. मोदीयोगी की खोती चमक और सपाबसपा गठबंधन की राजनीति से भाजपा को 30 से ज्यादा सीटें मिलना मुश्किल है. ऐसे में केवल उत्तर प्रदेश में भाजपा से 40 सीटों का सीधा नुकसान दिख रहा है.

‘‘उत्तर भारत के हिंदीं बोली वाले राज्यों में ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र और गुजरात में भी भाजपा को नुकसान होना तय है. इन राज्यों के नुकसान को पूरा करने के लिए किसी भी प्रदेश में कमी पूरी होती नहीं दिख रही है. ‘‘भाजपा कांग्रेस का मुकाबला तो भले ही कर ले पर क्षेत्रीय दलों को टक्कर देने में वह पीछे दिख रही है. यहीं से यह संभावना बनती है कि कर्नाटक की तरह कांग्रेस भाजपा केंद्र में सरकार बनाने से रोकने के लिए क्षेत्रीय नेता को प्रधानमंत्री बनाने में आगे आ सकती है. इस में मायावती की संभावना ज्यादा प्रबल दिखती है.’’

भारत में भी महामारी बनती जा रही है नशे की लत

नशे की लत भारत में भी महामारी बनती जा रही है. पंजाब तो इस का बुरी तरह शिकार है. पंजाब में 4 दशकों पहले जब बिहारी मजदूर आने लगे थे तो उन्हें काम पर लगाए रखने के लिए किसानों ने उन्हें नशा कराना शुरू किया था ताकि उन्हें दर्द महसूस न हो और वे 12-14 घंटे काम कर सकें. पंजाब में अफगानिस्तान से आने वाली अफीम आसानी से मिलती थी. इसीलिए मजदूरों के लिए ड्रग जमा करना कोई मुश्किल काम न था.

अब यह आदत मजदूरों से किसानों के बच्चों में घुस गई है. पूरा पंजाब ड्रग की मंडी बन गया है. हर दूसरा घर नशेड़ी का है. नशे के चलते सब नष्ट हो रहा है. नशे से ज्यादा पैसा उगाहने के लिए अब पंजाब से उस की तस्करी दूसरे राज्यों में की जा रही है और दिल्ली नशे का बड़ा केंद्र बन रहा है. यहां विदेशी भी आ कर धंधा कर रहे हैं.

दिल्ली में हर दूसरे रोज एक जघन्य अपराध होता है जिस में मर्डर तक होता है केवल इसलिए कि अपराधियों को नशे की आदत थी. जेलें नशेडि़यों से भरने लगी हैं और अमेरिका जैसा हाल होने लगा है जहां कोकीन और हेरोइन घरघर में मिलने लगी है और दक्षिण अमेरिका का ड्रग माफिया कितने ही इलाकों में पैर फैलाए हुए है.

ड्रग्स का चलन अभी तक या तो बहुत गरीबों में है या फिर बहुत अमीर घरों के बिगड़ैलों में. लेकिन इस को फैलते देर न लगेगी. जिन्हें सिगरेट और शराब पीने का चस्का लगा हुआ है उन में ड्रग्स लेने की आदत डलवाना आसान है. फिल्मों और पार्टियों से शराब का जिस तरह प्रचार हो रहा है वह चौंकाने वाला है. आजकल छोटे बच्चों की बर्थडे पार्टियों में भी जाम छलकने लगे हैं. ये बच्चे लिमिट जानते ही नहीं हैं लिमिट का पता हो, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

बिहेवियोरल ऐक्सपर्ट यानी व्यवहार के विशेषज्ञ कहते हैं कि शराब पीने, नशा करने में लिमिट जैसी कोई बात नहीं होती. शराब के समर्थक अकसर कहते हैं कि वे सिर्फ सोशल ड्रिंकिंग करते हैं यानी लिमिट में शराब पीते हैं. वहीं विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि लिमिट का कोई पैमाना नहीं होता और यह बदली जाती रहती है. ड्रग्स भी इसी तरह आदत में शामिल हो जाती है. बस, टेस्ट करने से शुरू हो कर नशेड़ी बनने में समय नहीं लगता.

ड्रग्स पर कंट्रोल करना है तो शराब पर कंट्रोल आवश्यक है. यह अगली पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए जरूरी है. इस बारे में ढीलढाल देश को महंगी पड़ेगी. चीन एक बार 17वीं सदी में अफीम की गिरफ्त में आया था और उस को 150-200 साल गुरबत में बिताने पड़े. हमारे यहां धर्म व जाति का नशा तो है ही, भांग, अफीम, कोकीन, मेरीजुआना का नशा ज्यादा चढ़ा तो हम 16वीं सदी में लौट जाएंगे.

कील मुंहासों से निबटने में ये घरेलू उपाय बेहद काम आएंगे

मुंहासे यानी ऐक्ने 2 प्रकार के होते हैं-नौनइनफ्लैमेटरी यानी जिन में सूजन नहीं आती और इनफ्लैमेटरी यानी जिन में सूजन आ जाती है. व्हाइटहैड और ब्लैकहैड आमतौर पर नौनइनफ्लैमेटरी होते हैं, जबकि पैप्यूल, नोड्यूल्स, सिस्ट आदि इनफ्लैमेटरी होते हैं.

इनफ्लैमेटरी अकसर त्वचा पर निशान छोड़ जाते हैं, क्योंकि इन के कारण त्वचा पर ऐक्स्ट्रा तेल, डैड सैल्स और बैक्टीरिया जमा हो जाते हैं, जिस से छिद्रों में सूजन आ जाती है और फौलिकल की दीवारें फैल कर टूट जाती हैं.

मुहासों के प्रकार

– हाइपरट्रोफिक निशान यानी गांठ जैसा मोटा निशान.

– बौक्स आकार का निशान यानी चौड़ा निशान जिस के किनारे तीखे हों.

– आइस पिक निशान यानी संकरा, गहरा, गड्ढे जैसा निशान.

– एट्रोपिक निशान यानी चपटा, पतला और दबा हुआ सा निशान.

– रोलिंग निशान यानी चौड़ा, दबा हुआ और संकरे किनारों वाला निशान.

मुंहासों के निशान ठीक करने के घरेलू उपाय

बेसन: बेसन ऐक्सफोलिएशन के लिए बेहतरीन है और त्वचा पर मौजूद दागधब्बों को दूर करता है. 1 बड़ा चम्मच बेसन में गुलाबजल और नीबू का रस मिला कर पेस्ट बना कर चेहरे और गरदन पर लगाएं.

ग्रीन टी: इस्तेमाल किए गए ग्रीन टी बैग को प्रभावित हिस्सों पर रखें. आप इस्तेमाल की गई चायपत्ती का भी फेस पैक बना सकती हैं. इस के अलावा रोजाना ग्रीन टी का सेवन करना भी फायदेमंद रहता है. इस पैक का इस्तेमाल रोज किया जा सकता है.

गुलाबजल: गुलाबजल एक अच्छा मौइश्चराइजर है, यह मुंहासों के टिशूज को सौफ्ट कर उन्हें जल्दी ठीक होने में मदद करता है और त्वचा के दागधब्बे भी हलके करता है. कौटन पैड को गुलाबजल में भिगो कर इस से त्वचा को साफ करें. इसे दिन में 2 बार इस्तेमाल कर सकती हैं.

हलदी: हलदी में ऐंटी औक्सीडैंट और ऐंटी इनफ्लैमेटरी गुण होते हैं. यह मुंहासों के निशान दूर कर त्वचा की रंगत में निखार लाती है.

1-2 चम्मच हलदी में नीबू का रस मिला कर पेस्ट बनाएं और पूरे चेहरे पर लगाएं.

30 मिनट बाद पानी से धो लें. इसे 1 दिन छोड़ कर इस्तेमाल कर सकती हैं.

ऐलोवेरा: ऐलोवेरा मुंहासों के घावों को जल्दी भर कर इन के निशान दूर करता है और त्वचा को जल्दी रिपेयर करता है.

ऐलोवेरा की पत्तियों से ऐलोवेरा जैल निकाल कर इस की एक परत त्वचा पर लगाएं खासतौर पर मुंहासों पर. पूरी रात लगा रहने दें. इस का इस्तेमाल रोज कर सकती हैं.

ऐप्पल साइडर विनेगर: सेब के सिरके में ऐंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं, जो त्वचा को कीलमुंहासों से सुरक्षित रखते हैं. इस में ऐंटीइनफ्लैमेटरी गुण भी होते हैं, जो मुंहासों की सूजन कम करते हैं और उन के निशान दूर करने में मदद करते हैं. इसे रोजाना या 1 दिन छोड़ कर इस्तेमाल कर सकते हैं.

बेकिंग सोडा: बेकिंग सोडा अच्छा ऐक्सफोलिएटर है, जो त्वचा से डैड सैल्स को निकालता है. यह हलका सा क्षारीय होता है इसलिए त्वचा का पीएच सामान्य बनाए रखता है. यह मुंहासों और उन के निशान दूर करता है.

2 बड़े चम्मच बेकिंग सोडा में 1 चम्मच पानी मिला कर पेस्ट बनाएं और मुंहासों के निशानों पर लगाएं. सूखने पर पानी से धो लें. इसे रोज इस्तेमाल कर सकती हैं.

ओटमील मास्क: ओटमील का मास्क मुंहासों वाली त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद होता है. यह त्वचा से ऐक्स्ट्रा तेल सोख लेता है. यह अच्छा ऐक्सफौलिएटर भी है. मुंहासों के निशान दूर कर त्वचा के टिशूज की मरम्मत करता है.

2 बड़े चम्मच ओटमील में 1 चम्मच नीबू का रस और 1 चम्मच शहद मिलाएं. इस मिश्रण को चेहरे और गरदन पर लगाएं. 30 मिनट बाद धो लें. इसे सप्ताह में 3-4 बार इस्तेमाल कर सकती हैं.

आलू: आलू त्वचा की रंगत हलकी करता है, दागधब्बे और पिगमैंटेशन दूर करता है. कच्चे आलू का रस निकाल कौटन पैड को उस में डुबो कर चेहरे पर लगाएं. सिर्फ मुंहासों के निशानों पर भी लगा सकती हैं. 20-30 मिनट बाद धो लें. इसे रोज इस्तेमाल कर सकती हैं.

नीम: नीम की पत्तियों में ऐंटीसैप्टिक गुण होते हैं. ये संक्रमण दूर कर घाव को जल्दी भरने में मदद करती हैं और इन के इस्तेमाल से मुंहासों के धब्बे भी चले जाते हैं.

एक मुट्ठी नीम की पत्तियों को पीस कर गाढ़ा पेस्ट बना कर उसे प्रभावित हिस्सों पर लगाएं. 20-30 मिनट बाद धो लें. इस का इस्तेमाल रोज किया जा सकता है.

– डा. साक्षी श्रीवास्तव, कंसलटैंट डर्मेटोलौजिस्ट, जेपी हौस्पिटल, नोएडा

इन बेहतरीन टिप्स को अपना कर बालों को झड़ने से बचाएं

बालों के कमजोर होने के बहुत कारण होते हैं. उम्र, हारमोनल गड़बड़, तनाव, थिन ब्लड, दवा, अचानक कम होता वजन, पर्यावरण में बदलाव हीट जैनरेटिंग उत्पादों का इस्तेमाल इत्यादि से बाल रूखे और कमजोर हो जाते हैं.

बालों को खराब न होने दें. इन की परेशानियों के लिए पेश हैं आसान से समाधान:

गुलाबजल: गुलाब के पानी का पीएच बालों के पीएच के करीब होता है. इस का मतलब है कि यह बालों के तेल को कम कर सकता है और उन की नैचुरल चमक को भी निखार सकता है. गुलाबजल बालों के लिए बहुत ही अच्छा मौइश्चराइजर है. पानी में गुलाबजल मिला कर बालों को धोएं.

आंवला: बालों को झड़ने से बचाने का एक बेहतर इलाज आंवला भी है. अपने बालों की आंवले के तेल से मालिश करने से खोपड़ी के रोम मजबूत होते हैं, जिस से बालों को ताकत और चमक मिलती है.

आंवले में विटामिन सी होता है. इसलिए यह न केवल समय से पहले बालों को सफेद होने से रोकने में मदद करता है, बल्कि खुजली वाली खोपड़ी के लिए भी सब से अच्छा उपचार है. यह एक आला दर्जे का हेयर कंडीशनर है, जो खोपड़ी के अंदर तक पोषण देने की क्षमता रखता है.

अमला और शिकाकाई का पेस्ट बना कर 30 मिनट तक बालों में लगा कर रखें फिर धो लें.

आलू: आलू में विटामिन बी, विटामिन सी, जिंक और आयरन होता है, जो स्कैल्प को पोषण देता है और बालों की ग्रोथ को बढ़ाता है.

शैंपू के बाद बालों में आलू का रस लगाएं और थोड़ी देर तक लगा रहने दें. फिर साफ पानी से अच्छी तरह धो लें. बड़े बालों के लिए 1 कप और छोटे बालों के 1/2 कप आलू का रस पर्याप्त रहेगा.

करीपत्ता: करीपत्ते बालों की ग्रोथ के लिए फायदेमंद हैं और उन्हें समय से पहले सफेद होने से भी रोकते हैं. करीपत्ता फास्फोरस, आयरन, कैल्सियम, विटामिन ए और विटामिन सी से भरपूर होता है, ये तत्व बालों को मजबूत बनाते हैं. करीपत्तों में मौजूद पोषण से खोपड़ी में डैड स्किन सैल्स को नष्ट करने में मदद मिलती है और ये नए और हैल्दी बाल उगाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं.

करीपत्तों को नारियल के तेल के साथ तब तक गरम करें जब तक वे काले न पड़ जाएं. फिर इस मिश्रण को ठंडा कर खोपड़ी और बालों पर अच्छी तरह लगाते हुए कुछ मिनट तक खोपड़ी की मालिश करें. इसे कम से कम 1 घंटे तक लगा रहने दें. फिर बालों को धो लें.

प्याज: औलिव औयल और प्याज के रस को अच्छी तरह मिला कर इसे खोपड़ी पर धीरेधीरे गोलाकार में मालिश करें. लगभग 2 घंटे तक लगा रहने दें. फिर किसी सौम्य शैंपू से धो लें.

प्याज के रस में बहुत से ऐंटीऔक्सीडैंट ऐंजाइम्स होते हैं, जो बालों की ग्रोथ में सुधार करने में मदद करते हैं. प्याज के जीवाणुरोधी गुण स्कैल्प को स्वस्थ और संक्रमण से मुक्त रखने में मदद करते हैं.

– डा. अरविंद पोसवाल, हेयर ऐक्सपर्ट, डा. ऐज क्लीनिक

फीफा अवॉर्ड : मेसी और रोनाल्डो पर भारी पड़े लुका मॉडिक

लुका मॉडिक ने करीब एक दशक से फीफा अवॉर्डस में चले आ रहे क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोन मेसी के दबदबे को खत्म करके साल के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खिलाड़ी बने.

रीयल मैडिड और क्रोएशिया के मिडफील्डर मॉडिक पिछले सत्र में अपने क्लब और देश के लिए खासे सफल हुए जिसकी वजह से उन्हें इस सम्मान से सम्मानित किया गया. उन्होंने अपने स्पेनिश क्लब रीयल मैड्रिड को लगातार तीसरी बार यूएफा चैंपियंस लीग का खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई. इसके अलावा मॉडिक की कुशल कप्तानी में क्रोएशिया पहली बार रूस में खत्म हुए फीफा विश्व कप में फाइनल तक पहुंचा.

साल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी की दौड़ में मॉडिक ने लिवरपूल के स्टार स्ट्राइकर मोहम्मद सलाह और जुवेंटस के रोनाल्डो को पछाड़ा. रोनाल्डो के साथ बार्सिलोना के मेसी अपने क्लब के व्यस्त कार्यक्रम की वजह से लंदन में आयोजित अवॉर्ड समारोह में नहीं भाग ले सके. अब तक मेसी और रोनाल्डो ने फीफा अवॉर्ड को पांच-पांच बार अपने नाम किया है.

33 वर्षीय मॉडिक ने अपने करियर की शानदार झलक पेश की और रूस विश्व कप में क्रोएशिया को फाइनल तक पहुंचाया जिनकी क्लब स्तर पर चमक रोनाल्डो की उपस्थिति में कभी रीयल में उभरकर सामने नहीं आ पाई. उन्होंने डेनमार्क और रूस के खिलाफ विश्व कप में दो गोल किए और एक बार पेनाल्टी शूटआउट में भी गोल दागा. हालांकि गोल के मौके तैयार करने की उनकी प्रतिभा की वजह से उन्हें फीफा विश्व कप के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के तौर पर गोल्डन बॉल दिया गया.

लगातार छठे साल रोनाल्डो पिछले सत्र में 15 गोल के साथ चैंपियंस लीग में सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी थे. इसके अलावा उन्होंने विश्व कप में कुल चार गोल किए जिसमें उन्होंने स्पेन के खिलाफ हैट्रिक भी लगाई. हालांकि पुर्तगाल के विश्व कप में अंतिम-16 से उरुग्वे के खिलाफ हारकर बाहर होने और चैंपियंस लीग के सेमीफाइनल और फाइनल में रोनाल्डो द्वारा गोल नहीं कर पाने की वजह से मॉडिक की दावेदारी मजबूत हो गई.

सलाह को सर्वश्रेष्ठ गोल का अवॉर्ड

पिछले 12 वर्षो में पहली बार मेसी फाइनलिस्ट में शामिल नहीं थे लेकिन लिवरपूल के सलाह ने अपने पहले ही सत्र में क्लब के लिए 44 गोल करके सबका ध्यान खींचा. सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का सम्मान नहीं हासिल होने के बावजूद वह खाली हाथ नहीं लौटे. सलाह को सर्वश्रेष्ठ गोल के लिए पुष्कास अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. यह गोल उन्होंने पिछले दिसंबर में एवर्टन के खिलाफ किया था.

डेसचैंप्स चुने गए सर्वश्रेष्ठ कोच

फ्रांस की विश्व विजेता टीम के कोच दिदिएर डेसचैंप्स को साल का सर्वश्रेष्ठ कोच चुना गया. डेसचैंप्स ऐसे तीसरे शख्स हैं जिन्होंने बतौर खिलाड़ी और कोच विश्व कप जीते हैं. उन्होंने क्रोएशिया के कोच ज्लाटिको डालिक और रीयल के पूर्व मैनेजर जिदान को पछाड़ा.

मनीषा मंदिर के खुले राज, सिसकियों ने सुनाई दर्द की दास्तां

आंखों में आंसू और सिसकियों के बीच मनीषा मंदिर से मुक्त कराईं गईं बच्चियों ने जब अपने दर्द की दास्तां सुनाई तो विवेचक भी भावुक हो गए. बच्चियों ने बताया कि संचालिका सरोजिनी अग्रवाल ने जुल्म की इंतिहा कर दी थी.

बच्चियों ने विवेचक पंकज सिंह को बताया कि उन्हें छोटी-छोटी बात पर पतली छड़ी से संचालिका पीटती थीं. चीखने पर मुंह दबाकर थप्पड़ मारे जाते थे. मम्मी-पापा से मिलने नहीं दिया जाता था. सुबह सड़ा नाश्ता दिया जाता था. दोपहर में कीड़े वाली दाल के साथ कच्चा आटा पानी में घोलकर जबरन पिलाया जाता था. सड़ा खाना जबरन खिलाने पर उल्टी हो जाती तो बच्चियों को सड़ा पुदीना पिला दिया जाता था. बीमार होने पर इलाज भी नहीं कराया जाता था. संचालिका बच्चियों से नौकरों की तरह झाड़ू-पोछा कराती, नाली में हाथ डलवाकर कीड़े और सिल्ट निकलवातीं, कूड़ा उठवातीं.

खराब खाने के विरोध पर रहना पड़ता था भूखे

बच्चियों ने विवेचक को बताया कि उन्हें सड़ा और खराब खाना दिया जाता था और विरोध करने पर भूखा रखा जाता था, भूख के चलते जब बच्चे रोने लगते तो उन्हें फिर सड़ा खाना खाने पर मजबूर किया जाता था.

संचालिका पी जाती थी बच्चियों का दूध

एक बच्ची ने अपने बयान में बताया कि संचालिका और मनीषा मंदिर में आने वाले उसके परिचित बच्चियों का सारा दूध पी जाते थे. इसीलिए बच्चियों को दूध भी नहीं मिल पाता था.

बच्चों के गिफ्ट व सामान भी छीन लेती थी

बच्चियों के मुताबिक, कोई भी जब उनसे मिलने आता तो संचालिका उनसे बच्चियों को गिफ्ट व खाने-पीने का सामान देने की डिमांड करती. जब कोई गिफ्ट व सामान लेकर आता तो उसके सामने तो उन्हें दे दिया जाता, लेकिन बाद में संचालिका छीन लेती थी. बच्चियों को कमरे में लगी टीवी भी नहीं देखने दिया जाता था और लोगों से कहा जाता था कि बच्चे दिनभर टीवी देखते हैं.

बर्तन तो छोड़िए शौचालय भी कराते थे साफ

बच्चियों ने बताया कि उनसे बर्तन के साथ शौचालय जबरन साफ कराया जाता था. जब बच्चियां नहाने के लिए साबुन मांगती तो उन्हें नीम वाले साबुन में कालिख पोतकर दी जाती थी, जिससे वह साबुन न लगा पाएं.

ढ़ने आई थी अंग्रेजी कर रही थी सफाई

लखीमपुर निवासी बारह वर्षीय बच्ची के किसान पिता मंगलवार शाम प्राग नारायण रोड स्थित राजकीय बाल गृह (शिशु) पहुंचे. उन्होंने बताया कि पहले मनीषा मंदिर में उनकी बहन रहकर पढ़ाई करती थी. संचालिका सरोजिनी अग्रवाल ने उनके गांव जाकर संपर्क किया और बताया कि यहां आपके बच्चे हिंदी मीडियम में पढ़ रहे हैं हम इन्हें अंग्रेजी मीडियम की पढ़ाई करवाएंगे.

प्रत्येक वर्ष चार हजार रुपये में पढ़ाई के साथ अच्छा रहन-सहन और पौष्टिक खाना भी मिलेगा. उन्होंने अपनी चार बच्चियों को मनीषा मंदिर में भेज दिया. किसान पिता ने बताया कि उन्होंने अपनी 12 वर्षीय बच्ची को इसी वर्ष जून महीने में संचालिका के हवाले किया था, अभी बच्ची से मुलाकात नहीं हो सकी है. उसे मोतीनगर स्थित राजकीय बाल गृह (बालिका) में रखा गया है.

जांच में पहले भी मिली थीं खामियां, नहीं हुई कार्रवाई

देवरिया कांड के बाद उप्र के मुख्यमंत्री के निर्देश पर राजधानी में भी शरणालयों की जांच कराई गई थी. उस वक्त मनीषा मंदिर में कई खामियां सामने आई थीं. इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियो ने कार्रवाई नहीं करके महज सुधार करने का अल्टीमेटम दिया.

बीते छह अगस्त को जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा के निर्देश पर प्रशासनिक टीमों ने राजधानी के 23 बालक-बालिका गृहों की जांच की थी. इसके बाद सात सितंबर को मनीषा मंदिर में टीम ने जाकर बच्चों को मिल रही सुविधाओं का जायजा लिया. इस दौरान जांच टीम वहां बच्चियों को मिल रही सुविधाओं से खुश नहीं थी. टीम ने किसी ठोस कार्रवाई के बजाए केवल हिदायत देना मुनासिब समझा.

पूरे मामले में घिरता देखकर संचालिका सरोजिनी अग्रवाल ने मंगलवार को डीएम के सामने अपना पक्ष रखने का प्रयास किया. डीएम का कहना है कि चूंकि न्यायालय बाल कल्याण समिति इस मामले को देख रहा है इसलिए उनके आदेश का इंतजार है. अगर वहां से कोई आदेश मिलेगा तो तत्काल कार्रवाई होगी.

द्द होगा मनीषा मंदिर का पंजीयन

गोमतीनगर के मनीषा मंदिर में छोटी बालिकाओं को रखने की अनुमति ही नहीं थी. महिला एवं बाल कल्याण मंत्री डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने न्यायालय बाल कल्याण समिति से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है. रिपोर्ट के परीक्षण के बाद संस्था का पंजीयन रद किया जाएगा. बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष कुलदीप रंजन ने बताया कि जांच रिपोर्ट के बाद मामले की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है.

तीन दशक से अधिक समय से नियमों को दरकिनार कर चल रहे मनीषा मंदिर बाल संरक्षण गृह का संचालन होता रहा और अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी. 10 साल से कम उम्र की आठ बालिकाएं यहां नियमों के विरुद्ध रखी गईं तो छह बालिकाओं को न्यायालय बाल कल्याण समिति के आदेश के बगैर कैसे रखा गया? ऐसे सवालों के जवाब मनीषा मंदिर की संस्थापिका डॉ.सरोजिनी अग्रवाल को अब पुलिस की जांच में देना होगा.

परीक्षण के साथ इलाज शुरू

प्राग नारायण रोड स्थित राजकीय बालगृह (शिशु) में और मोतीनगर के राजकीय बालगृह (बालिका) में रेस्क्यू कर लाई गईं बालिकाओं का मेडिकल परीक्षण के साथ ही इलाज शुरू हो गया है. समिति की सदस्य डॉ. संगीता शर्मा ने बताया कि शरीर में दाने निकले थे और कई को बुखार भी था. बालगृह के चिकित्सक डॉ.सुदर्शन के साथ ही मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा नियुक्त चिकित्सकों की ओर से 22 सितंबर को ही सभी 14 बालिकाओं की चिकित्सीय जांच की गई.

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