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विवाहेतर संबंध

इंडियन पीनल कोड यानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विवाहिता स्त्री के साथ सहमति से बनाए संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है. 1860 के इस कानून में यह बड़ा बदलाव माना जा रहा है और समलैंगिक कानून के बाद इसे सामाजिक मील का पत्थर कहा जा रहा है. कोर्ट के इस निर्णय के आलोचकों का कहना है कि इस से औरतों में व्यभिचार बढ़ जाएगा, भारतीय संस्कृति नष्ट हो जाएगी, नैतिकता समाप्त हो जाएगी, स्त्रीपुरुष सड़कों पर संभोग करते नजर आएंगे. प्रशंसक खुश हैं कि औरतों को पति की संपत्ति मानने वाला यह कानून समाज के चेहरे पर बड़ा काला धब्बा था जिस पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी गई है.

समलैंगिकता और व्यभिचार यानी एडल्ट्री के कानूनों को दशकों पहले समाप्त कर देना चाहिए था और यह काम संसद का था. संसद और उस में बैठी पार्टियों की रीढ़ की हड्डी इतनी कमजोर है कि वे सामाजिक हितों को बराबरी देने वाले कानूनों को छूने से ही डरती हैं, वे उन पर विचार तक करने को तैयार नहीं होतीं. भारत के कानून में एडल्ट्री के अपराध होते हुए भी इस से जुड़े मामले बहुत कम दर्ज होते थे. इस में इक्कादुक्का ही सजा हुई होगी. यह अधिकार भी केवल पति को था, पत्नी को नहीं. शिकायत पति ही कर सकता था. इस का इस्तेमाल तभी होता था जब पत्नी खुल्लमखुल्ला घर छोड़ कर चली जाए और किसी के साथ रहने लगे. उस के किसी से यौन संबंध हैं, यह साबित करना कठिन होता था पर मुकदमा चल सकता था.

वैसे हमारी संस्कृति में ऐसे मामलों पर परपुरुष नहीं, स्त्री दोषी होती थी. परशुराम ने इसी आरोप में पिता के कहने पर मां को भी मार डाला था और उन 4 बड़े भाइयों को भी जिन्होंने दोषी मां को मारने से इनकार कर दिया था. अहल्या का इंद्र से संबंध बना तो सजा इंद्र को नहीं, अहल्या को मिली थी. एक तरह से 1860 का कानून तो महान सुधारक ही था. वह भारतीय संस्कृति की रीढ़ पर हमला करने वाला था कि पत्नी इस मामले में अपराधी नहीं. 1860 से पहले तो शायद औरतों को मृत्युदंड दे दिया जाता होगा जो स्मृतियों का कानून था. कोर्ट के ताजा कदम से अब कोई फर्क पड़ेगा, जरूरी नहीं. परपुरुष से प्रेम हो, तो भी शारीरिक संबंध बनाना हंसीखेल नहीं. न तो सही जगह मिलती है, न लोग पड़ोसियों की आंखों से बच पाते हैं. तलाक का हक तो पति के पास इस फैसले के पहले से ही है और बाद में भी.

शारीरिक संबंधों को सहज लेना आसान नहीं. हम वे हैं जो हर समय गालियों में यौन संबंधों की बात करते हैं और जहां कोई कमजोर मिली, उसे दबोच लेते हैं. पर कानूनों में और भाषणों में महानता की बात करते रहते हैं.

बहू आई सास बुढ़ाई : बहुओं के सामने हैं कैसी मुश्किलें

जब कोई युवती मां बनती है तो बेटे की शिक्षा, नौकरी आदि के साथसाथ उस के विवाह की कल्पनाओं के सपने संजोने लग जाती है. ‘बड़ा होगा चांद सी सुंदर बहू लाएगा, पोता होगा और वो राज करेगी.’ समय बीतता है, बेटा शिक्षित होता है, नौकरी या व्यवसाय करता है, मां की या अपनी पसंद की पत्नी भी ले आता है. मां प्रौढ़ हो चुकी है. इस उम्र में जीवन का बहुत सा अनुभव, घरगृहस्थी के प्रबंध में महारत भी हासिल हो जाती है.

रमा ने जब अपने बेटे रवि के लिए खूबसूरत, स्मार्ट, पढ़ाई में टौपर काम्या को चुना तो सब रिश्तेदार और परिचित सराहना से भर उठे, ‘वाह, क्या लड़की है हजारों में एक.’ रवि भी मां के चुनाव पर खुश था कि इस से अधिक की कल्पना उस ने भी नहीं की थी. धूमधाम के साथ शादी हो गई.

शादी के 10 दिनों बाद रमा ने काम्या की चौकचढ़ाई की रस्म की. रमा ने कहा, ‘‘बहू कुछ मीठा बनाना है तुम्हें.’’ ‘काम्या ने पूछा, ‘‘मम्मी, खीर बना दूं?’’ ‘‘नहीं,’’ रमा बोली, ‘‘सूजी का हलवा बनाओ.’’ ‘‘जी,’’ काम्या ने कहा और रमा की तरफ सहायता के लिए देखा. रमा ने सूजी का जार, घी व शक्कर के डब्बे और मेवा, इलायची निकाल कर दे दिया. और बोली, ‘‘बरतन नीचे की अलमारी में हैं, निकाल लेना.’’

‘‘जी,’’ कह तो दिया लेकिन काम्या सोच में थी. ‘‘कितना बनाना है,’’ उस ने पूछा. ‘‘घर में 7-8 लोग तो होंगे ही?’’ रमा ने कहा और किचन से बाहर चली गई.

असमंजस में काम्या खड़ी ही रह गई. उसे खाना बनाने का बिलकुल भी अनुभव नहीं था, फिर इतने लोगों के लिए, वह भी हलवा. उस ने तो अपनी मम्मी से खीर बनानी सीखी थी. दोचार बार घर पर बना कर खुश भी हो गई थी. ‘अब क्या करूं’ काम्या परेशान थी.

बाथरूम में जा कर काम्या ने मम्मी को फोन लगाया और हलवे की विधि पूछी. जैसा मम्मी ने समझाया था उसी तरह से करने का प्रयास करने लगी. नापतोल कर घी व सूजी कड़ाही में डाल कर भूनना शुरू किया. तेज आंच पर सूजी भूनी, मेवे काट कर, नाप के हिसाब से शक्कर व पानी डाल दिया. काम्या को हलवे की शक्ल देख कर लगा कि ठीक ही है. डोंगे में डाल कर मेवे से सजा कर खाने की मेज पर ले आई.

सब से पहले रमा के पति सुरेश ने कहा, ‘‘वाह, भई वाह, बहुत अच्छा लग रहा है. महक तो बहुत ही बढि़या आ रही है. मैं तो रुक नहीं सकता.’’ उन्होंने अपनी प्लेट में हलवा लिया और खाने लगे. काम्या उन का चेहरा देख रही थी. पलभर को तो वे चुप रहे, फिर बोले, ‘‘बेटा, बहुत अच्छा बना है.’’ फिर शगुन का लिफाफा उस की ओर बढ़ाया, ‘‘तुम्हारा इनाम.’’

काम्या ने लिफाफा लिया और उन के पांव छू लिए. घर के अन्य सदस्यों ने भी हलवा खाया और प्रशंसा की. रमा ने हलवा चखा और बरबस बोल उठी, ‘काम्या, यह कैसा हलवा बनाया है, सूजी जल्दी तेज आंच पर भून दी.’ रमा से अधिक उस के चेहरे का भाव मुखर था.

‘‘क्यों मम्मीजी, ठीक नहीं बना?’’ काम्या ने सहमते हुए कहा, ‘‘मुझे कुकिंग ठीक से नहीं आती.’’

‘‘वह तो दिख ही रहा है,’’ रमा थोड़ी उपेक्षा से बोली.

काम्या का मन बुझ गया. उसे समझ नहीं आ रहा था, कमी कहां रह गई. सुरेश ने उस के भावों को समझा और बोले, ‘‘बेटा, ठीक है, थोड़े दिनों में और भी अच्छा बनाना सीख जाओगी.’’

रवि हलवा खाते हुए बोला, ‘मां जैसा नहीं है. उस का तो स्वाद ही अलग होता है.’ सुन कर रमा के मुंह पर गर्व की चमक आ गई.

यह पहला अनुभव काम्या के लिए आखिरी हो गया. उस ने फैसला कर लिया कि वह बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी नहीं छोड़ेगी. खाना बनाने के लिए शैफ रख सकने की सामर्थ्य है उस की सैलरी में. शायद रमा ने मार्गदर्शन किया होता तो काम्या के मन में यों कटुता नहीं आती.

एकदूसरे को सहयोग करें

आजकल युवतियां युवकों की तरह ही पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों में चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं जरूरी नहीं कि घरगृहस्थी के कामों में भी वे अपनी सास के समान कुशल हों. स्वाभाविक है सास के समय अधिकांश महिलाएं नौकरीपेशा नहीं थीं. साथ ही साथ, घर के कामों में मां को सहयोग भी देती थीं. तब पढ़ाई में प्रतियोगिता का तनाव भी नहीं झेलना पड़ता था.

सो, घर आने वाली बहू के लिए गलतियों व कमियों के लिए जगह रखें. सास के अनुभव व मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होगी उसे. केवल आलोचनाओं के तराजू पर न रख कर प्रशंसा का ठंडा झोंका भी देना जरूरी है अच्छे रिश्ते के लिए.

मीना ने बहू के आते ही ऐलान कर दिया कि अब उन की उम्र हो गई है. घर की जिम्मेदारियों की चाबी उन्होंने बहू के पल्ले में बांध दी. बड़ी बहू बन कर आई नीरू ने भी खुलेमन से अपनी ननद, देवरों की जिम्मेदारी स्वीकार कर लिया. किंतु धीरेधीरे उसे एहसास होने लगा कि वह बिना वेतन के घर की कर्मचारी मात्र है. आएदिन उसे यह जताया जाता कि यह काम ऐसे नहीं ऐसे किया जाता है. रसोई में नीरू विशेषरूप से जो कुछ बनाती उसी खाने को मीना दोचार दिनों बाद, जब नीरू किचन में नहीं होगी तब, बनाती, यह साबित करने के लिए कि नीरू को खाना बनाना अच्छी तरह नहीं आता.

हर घर के खाना बनाने की विधि व स्वाद अलग होता है. आप अपने तरीके से बहू को सिखाने की कोशिश करें. थोड़ा धीरज व मार्गदर्शन आवश्यक है. बहू के घर आते ही सास में बुढ़ापा कैसे चला आता है?

हर जगह सास एकजैसी नहीं होतीं. कुछ आधुनिक सास बहुत सुलझी हुई भी मिलीं. उदाहरण के रूप में उषा 2 विवाहित बेटों की मां हैं. उन्होंने बताया कि बहुएं पढ़ीलिखी और समझदार हैं आजकल. उन्हें उपदेश देने की मैं जरूरत महसूस नहीं करती हूं. बेटे बाहर थे तो विवाह के बाद थोड़ा ही अवसर मिला हमें साथ रहने का.

विवाह के बाद मैं ने अपनी बहुओं से किचन का काम नहीं करवाया, उन की पसंद के व्यंजन मैं सुबह ही बना लेती थी. जिस से हमें अधिक से अधिक समय साथ बिताने का अवसर मिलता था. नतीजा यह रहा कि अब मेरी दोनों बहुएं घर की कोई समस्या हो या किसी विशेष पार्टी आदि का आयोजन कर रही हों, वे फोन कर के सलाह लेती हैं, मार्गदर्शन चाहती हैं. इस से हमारे बीच बहुत अच्छे संबंध हैं. बहुतकुछ है जो मैं ने बहुओं से सीखा है, इस बात को मैं अपनी बहुओं के आगे स्वीकार करने में संकोच नहीं करती.

बहू के संग आप के घर एक नया व्यक्तित्व आ रहा है. आप के वर्तमान में यह एक सुखद बदलाव है, उस का खुलेमन से स्वागत करें. आप के बेटे के जीवन को शेयर करने के साथसाथ वह आप के अनुभव, आप के मार्गदर्शन के लिए भी तैयार है. ऐसी स्थिति में अनायास ही बहू के आते ही खुद रिटायर होेने की घोषणा न करें. अभी तो आप के आगे खुद को दादी के रूप में स्थापित करने के अवसर आने हैं. कितना सुखद होता है अपने पोतेपोतियों के साथ का अनुभव.

आप ने अपने बच्चों को जब पाला, तो समय का अभाव था. घर के सौ कामों में उलझी मां बच्चों के बचपने का पूरी तरह से आनंद नहीं उठा पाती. लेकिन अब घर के कामकाज का दायित्व बहू उठाने लग जाती है. आप पूरी तरह से अपने पोतेपोतियों के संग आनंद उठाएं. उन्हें भी बूढ़ी, थकी दादी के रूप में आप अच्छी नहीं लगेंगी. तो बस, बहू आई सास बुढ़ाई वाली स्थिति न आने दें.

भगवाई राह पर कांग्रेस

कांग्रेस में इस समय हिंदू धर्म और सवर्णों का जो महिमामंडन चल रहा है वह उस के अब तक के किसी भी दौर को मात देने वाला है. कांग्रेस और उस के नेताओं में इस बात की होड़ लगी हुई है कि उन्हें आरएसएस और उस के संगठनों से इस मामले में आगे निकल जाना है. राहुल गांधी मानसरोवर यात्रा पर गए. भला इस से किसी को क्या एतराज हो सकता है. यह उन की व्यक्तिगत आस्था का भी एक विषय हो सकता है. हालांकि ऐसा कुछ है नहीं, फिर भी उसे मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए. लेकिन उस के साथ ही देश के हर कोने में पार्टी की हर इकाई अगर इसी तरह से धर्म और आस्था से जुडे़ मुद्दों का अलगअलग तरीके से राग अलापती नजर आ रही हो तो मामला जरूर गंभीर हो जाता है.

मध्य प्रदेश में चुनाव जीतने का दावा कर रही कांग्रेस के चुनाव अभियान के प्रभारी कमलनाथ चुनाव जीतने पर हर पंचायत में गौशाला खुलवाने का वादा करते नजर आ रहे हैं. अब वहां आरएसएस को भाजपा की जगह कांग्रेस की पीठ पर हाथ रखने में भला क्या एतराज हो सकता है, जो उस का हर एजेंडा पूरा करने के लिए तैयार है. पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला हरियाणा में कांग्रेस के डीएनए में ब्राह्मण खोजते पाए गए और उन्होंने एक ब्राह्मण सम्मेलन में ऐलानिया तौर पर इस बात की घोषणा की. इस सम्मेलन में बताया जा रहा है कि जनेऊ और चोटी से ले कर हर ब्राह्मणवादी कर्मकांड की चर्चा हुई. जिस ब्राह्मणवादी वर्चस्व के चलते देश में दलितों और वंचितों को एक इंसानी जिंदगी तक मयस्सर नहीं हो सकी, उस का महिमामंडन कर के आखिर पार्टी क्या हासिल करना चाहती है?

पंजाब में कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तो सारी सीमाएं ही लांघ दीं. उन्होंने धर्म का अपमान करने पर ईशनिंदा कानून तक लाने की घोषणा कर डाली है. जो चीज अभी तक सिर्फ इसलामिक राष्ट्रों या धर्म आधारित देशों तक सीमित थी, उसे भारत में लाने की कवायद शुरू हो गई है और यह काम संघ या उस का कोई संगठन नहीं, बल्कि विपक्षी पार्टी कांग्रेस कर रही है. इस के जरिए कांग्रेस ने एक बार फिर इस बात को साबित कर दिया है कि हर मामले, वह चाहे लिबरलाइजेशन के रास्ते कौर्पोरेट गुलामी का हो या फिर मंदिर में मूर्ति रखने व ताला खुलवाने के जरिए राम मंदिर अभियान शुरू करने का या कौर्पोरेट के इशारे पर नक्सलियों के सफाए का अभियान हो, देश को ये सभी रास्ते कांग्रेस ने ही दिखाए और सुझाए हैं. अब कांग्रेस ईशनिंदा जैसा एक खतरनाक हथियार संघ को दे रही है जो आने वाले दिनों में अगर उस का इस्तेमाल शुरू कर दे तो किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए.

दरअसल, भारतीय राजनीति एक ऐसे उग्र दक्षिणपंथी दौर में पहुंच गई है जिस में संघ का पूरा अभियान एक फासीवादी रूप ग्रहण कर चुका है. उस में कांग्रेस की ये सब कवायदें अपनी तरह की तुष्टीकरण हैं. लेकिन इस से संघ का पक्ष कमजोर होने के बजाय और मजबूत होगा. यह कुछ उसी तरह का दृश्य है जब हिटलर की मांगों के सामने यूरोप के सारे देश बारीबारी से झुकते जा रहे थे, क्योंकि उन को लग रहा था कि उस से हिटलर को शांत कर लिया जाएगा और मानवता के ऊपर से विश्वयुद्ध का खतरा टल जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. और पहले बढ़ाने, फिर आखिर में संतुष्ट करने के क्रम में पूरा विश्व युद्ध की आग में ढकेल दिया गया.

असली मुद्दे की बात नहीं लिहाजा, इस समय कांग्रेस को संघ की बी टीम बन कर तमाम धार्मिक व सांस्कृतिक मुद्दों पर जयकारा लगाने की जगह उसे जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों को उठाना चाहिए था, जिस मोरचे पर भाजपा निहत्थी हो चुकी है. और उसे एक आखिरी धक्के की जरूरत है. पैट्रोल से ले कर डौलर के मुकाबले रुपए की कीमत और महंगाई से ले कर बेरोजगारी देश के चरम मुद्दे बने हुए हैं, लेकिन इन सवालों पर न तो किसी राजनीतिक पार्टी की तरफ से कोई जुंबिश दिख रही है और न ही कोई दूसरा दूरदूर तक उस को आगे बढ़ाने वाला दिख रहा है.

लेकिन एक बात दावे के साथ कही जा सकती है कि इस पूरे प्रकरण में संघ विजयी साबित हो रहा है. उस का एजेंडा पूरे देश का एजेंडा बन गया है. आज भाजपा उस को आगे बढ़ा रही है और सत्ता में आने के बाद कल कांग्रेस उस को आगे ले जाने के लिए वादा कर रही है. इसलिए संघ के दोनों हाथों में लड्डू हैं. एक बात राहुल गांधी को जरूर समझनी होगी कि संघ के खिलाफ लड़ाई संघियों को साथ ले कर नहीं लड़ी जा सकती है. उस के लिए आप को अपने विचारों से ले कर आधार तक सब को बदलना होगा. लेकिन जिस कांग्रेस के दिए खादपानी पर संघ खड़ा हुआ है, उस से उस के खिलाफ लड़ाई की उम्मीद करना ही बेमानी है.

शिक्षा के क्षेत्र में फैली असमानता और अपराध में उलझते बच्चे

देश का एक बड़ा वर्ग इस बात की मांग कर रहा है कि देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू की जाए. इस वर्ग के लोग कहते हैं कि देश में एक ओर अच्छे व महंगे स्कूल हैं जहां अंगरेजी माध्यम से पढ़ाई होती है और वहां के बच्चे पढ़लिख कर आगे बढ़ रहे हैं, दूसरी ओर गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और पिछड़ रहे हैं.

यह सही है कि अच्छी शिक्षा बच्चे को काबिल बनाने के लिए बेहद जरूरी होती है. वहीं, यह जरूरी नहीं कि महंगे स्कूलों में पढ़ने के बाद ही बच्चे अच्छे बनें. ऐसे स्कूलों में पढ़ने वाले कुछ बच्चे महंगे शौक और गलत सोहबत में

पड़ कर बिगड़ भी रहे हैं, जिस से यह नहीं कहा जा सकता कि महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अच्छे व काबिल ही बनते हैं.

पुलिस के पास ऐसे मामले रोज आ रहे हैं जिन में अपराधी ऐसे बच्चे हैं जो होस्टल में पढ़ने आते हैं. ऐसे बिगड़ैल बच्चे अपने शौक पूरे करने के लिए लूटपाट व चोरी सहित तमाम तरह के अपराध करते हैं. इन में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं. ज्यादातर परिवार घर की लड़कियों पर ज्यादा सख्ती रखते हैं. ऐसे में उन का लड़कों पर ध्यान नहीं जाता जिस से वे ज्यादा बिगड़ने लगते हैं.

लखनऊ का ही उदाहरण लें. शहर के गोमतीनगर और गाजीपुर थानों की पुलिस ने ऐसे युवकों को पकड़ा जो इंजीनियरिंग, मैनेजमैंट और दूसरे विषयों की पढ़ाई करने छोटे शहरों से लखनऊ आते हैं. जब से साइबर क्राइम और डिजिटल अपराध बढे़ हैं, ये युवक सामने आने लगे हैं. दूसरों के क्रैडिट कार्ड से पैसा निकाल कर अपराध करने वालों में युवकों की तादाद ज्यादा है.

गलती नहीं मानते परिवार

पकडे़ गए युवाओं के परिजन किसी भी कीमत पर यह मानने को तैयार नहीं होते कि उन के बच्चों ने लूटपाट की है. 2 बच्चों के परिजनों ने तो थाने में काफी हंगामा किया. जब पुलिस ने लूट का शिकार हुई महिला को बुलाया और सभी के सामने इन युवाओं को उन के सामने पहचान के लिए पेश किया तो लूट का शिकार होने वाली महिला ने सभी को पहचान लिया. इस के बाद बिगडै़ल बच्चों के घर वालों का हंगामा शांत हुआ.

पुलिस ने बताया कि गैंग में पकड़े गए 5 बच्चे थे. इन सभी ने पर्स और चेन झपटमारी की 14 घटनाओं में शामिल होने की बात स्वीकारी. पुलिस ने इन से 4 मोबाइल फोन, कुछ एटीएम कार्ड, 2 बाइक और नकदी बरामद की.

पुलिस ने बताया कि ये सभी युवक बालिग हैं. अंकुर इंटर का छात्र है. अनिमेष इंजीनियरिंग का दूसरे साल का छात्र है जबकि फरहान, सौरभ और अनिमेष 11वीं में पढ़ते हैं. इन सभी के घर वाले संभ्रात हैं. अंकुर के पिता एक निजी कंपनी में प्रोजैक्ट मैनेजर हैं. अनिमेष के पिता एक निजी कंपनी में डीजीएम है. फरहान के पिता जिला पंचायत सदस्य हैं. अनिमेष के पिता एग्रीकल्चर वैज्ञानिक हैं और सौरभ के पिता माइनिंग के एक बड़े कारोबारी हैं.

पुलिस के मुताबिक, अंकुर इस गिरोह का सरगना है. इस गिरोह ने गोमतीनगर थाने में 10, गाजीपुर और हजरतगंज इलाके में 2-2 वारदातों को अंजाम दिया है. ये सभी चेन और पर्स लूटने की वारदातें हैं.

इस घटना के खुलासे से चिंता वाली बात यह है कि बच्चों पर अच्छी पढ़ाई का प्रभाव नहीं पड़ रहा है. लखनऊ के एक स्कूल में 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले लड़के ने बाथरूम गई कक्षा 3 की लड़की की स्कर्ट इसलिए उठा दी क्योंकि दोस्तों के बीच स्कर्ट उठाने की शर्त लगी थी.

लड़के के परिजनों ने बजाय अपने लड़के की गलती मानने के थाने में हंगामा कर दिया. ऐसे मामले में परिवार की भूमिका सब से अहम होती है. उसे अपने बच्चे की गलती मान लेनी चाहिए. उस में सुधार करना चाहिए. ऐसे प्रयास करने चाहिए जिस से बच्चे की हरकत में सुधार हो.

शाहखर्ची के लिए लूट

शाहखर्ची के शौक को पूरा करने के लिए पढ़ने वाले बच्चों द्वारा यह पहली बार नहीं किया गया. लखनऊ पुलिस ने 2 और गिरोहों को पकड़ा जिन में अधिकतर छात्र हैं.

इन से 10 सोने की चेन और मोबाइल फोन बरामद किए. पुलिस ने बताया कि पकडे़ जाने वालों में बीए का छात्र गौरव, बीएड का छात्र विकास, लवकुश और कन्हैया है.

कन्हैया ने लूटा गया मोबाइल अपने टीचर को दे दिया था. उस ने मोबाइल अपने एक साथी को बेच दिया जो लखीमपुर खीरी का रहने वाला था.

यह मोबाइल पुलिस की सर्विलांस पर पहले से ही था जिस से पुलिस उस आदमी तक पहुंच गई जिस ने मोबाइल का प्रयोग किया. कड़ी दर कड़ी खोलते हुए पुलिस कन्हैया तक पंहुच गई.

चेन लूटने के बारे में पुलिस ने बताया कि कन्हैया ही तय करता था कि कहां से चेन लूटनी है. जो लड़का सब से ज्यादा वजन की चेन लूटता था उस का हिस्सा ज्यादा होता था. चेन लूट के बाद ये उसे सोना गलाने वालों को बेच देते थे.

आमतौर पर मांबाप यह समझते हैं कि उन का बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है और वे उस की सभी इच्छाएं पूरी कर रहे हैं. ऐसे में उन के बिगड़ने के आसार खत्म हो जाते है. वे बच्चों पर पूरी तरह से ध्यान नहीं देते हैं. वे सोचते हैं कि खराब स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे ही बिगड़ते हैं.

पहले मैनेजमैंट स्कूल अपने यहां पढ़ने वाले बच्चों पर निगाह रखता था. उन को इस तरह की शिक्षा देता था कि वे गलत रास्ते पर जाने से हिचकते थे. लेकिन आज शिक्षा के बाजारीकरण ने स्कूलों को एक कारोबार स्थल बना दिया है जहां केवल महंगी फीस ली जाती है. यह ध्यान नहीं दिया जाता कि उन के यहां पढ़ने वाला बच्चा कैसे संस्कार सीख रहा है. यही नहीं, एकदूसरे की देखादेखी बच्चे महंगे शौक पाल लेते हैं. जब ये शौक पूरे नहीं होते तो वे लूटपाट का सहारा लेने लगते हैं.

एनपीए रोकने का हल बैंकों के विषय में नहीं

एनपीए यानी नौन परफौर्मिंग एसेट की राशि के बढ़ कर भारीभरकम होने से देश की बैंकिंग प्रणाली चरमरा गई है. सार्वजनिक बैंकों से हजारों करोड़ रुपए डकार कर कर्जदार विदेशों में मौज कर रहे हैं और भारतीय बैंकों पर कर्ज के कारण एनपीए में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इस समय सरकारी बैंकों का औसत एनपीए 12.13 प्रतिशत है. सरकार चरमराती बैंकिंग व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए फंसा हुआ कर्ज वापस लेने के सख्त प्रयास नहीं कर रही है बल्कि वह बैंकों के विलय का सस्ता रास्ता निकाल कर इस की भरपाई का प्रयास कर रही है.

कुछ समय पहले देश के सब से बड़े बैंक स्टेट बैंक औफ इंडिया के साथ उस के सहयोगी 5 बैंकों का विलय किया गया और अब सरकार ने बैंक औफ बड़ौदा के साथ देना बैंक व विजया बैंक के विलय की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

वित्तमंत्री अरुण जेटली का कहना है विलय के बाद यह बैंक देश का दूसरा सब से बड़ा बैंक बन जाएगा. यह बैंक दक्षिण भारत में अच्छा काम करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि विलय के बाद बैंक का नाम बदल सकता है लेकिन इस बारे में अभी कोई फैसला नहीं किया गया है.

फंसे कर्ज के कारण खस्ताहाल हो चुके बैंकों में विलय की छटपटाहट कैसी है, इस का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बैंकों के विलय की घोषणा के एक सप्ताह के भीतर ही देना बैंक के निदेशकमंडल ने इस के विलय को मंजूरी दे दी.

बहरहाल, इस विलय से इन बैंकों का एनपीए बैंकों के 12.13 फीसदी के औसत एनपीए की तुलना में 5.71 फीसदी रह जाएगा. सरकार के इस कदम से बैंकों की हालत सुधरती है तो किसी को गुरेज नहीं लेकिन यदि ढाक के तीन ही पात रहे यानी बैंकों का कर्ज डूबने की प्रक्रिया नहीं रुकी और न बैंकिंग सेवा अच्छी हुई तो यह प्रयास बेकार साबित होगा.

धर्मेंद्र ने कैसे किया था ड्रीम गर्ल को प्रपोज, हेमा मालिनी ने बताया

बौलीवुड की ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी और एक्टर धर्मेंद्र के प्यार भरे किस्से मशहूर हैं. इन दोनों की लव स्टोरी शूटिंग के दौरान शुरू हुई थी. इनका प्यार आज भी अटूट है. हेमा मालिनी ने धर्मेंद्र के साथ अपने रिश्ते पर खुलकर बात की. उन्होंने एक इंटरव्यू में धर्मेंद्र के लिए अपनी फीलिंग्स जाहिर की. उन्होंने कहा, प्यार एक खूबसूरत एहसास है और मैंने अपने पति धर्मेंद्र की वजह से प्यार का अनुभव जाहिर करना सीखा है.

हेमा मालिनी ने एक यादगार फोन कौल का जिक्र करते हुए कहा,  धर्मेंद्र जी ने मुझे फोन कर प्रपोज किया और आई लव यू बोला था. वे उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि बहुत मुश्किल होता था उन दिनों फोन पे बात करना क्योंकि लैंडलाइन फोन होते थे और हमें फोन पर बात करने के लिए सही जगह देखनी पड़ती थी.

उन्होंने अपने प्यार के सबसे खूबसूरत एहसास को बताते हुए कहा कि रोमांस बहुत ही खूबसूरत चीज है. मैं केवल धर्मजी की वजह से इस भावना को व्यक्त कर पाई हूं. बकौल उनके ऐसा नहीं है कि हम इसे किसी के साथ भी व्यक्त कर सकें. बहुत से लोग हमें प्रेम कर सकते हैं, लेकिन हम केवल उस व्यक्ति को प्रेम करते हैं, जो हमें सच्चा प्रेम करता है. इसी तरह का प्यार मेरे और धरम जी के बीच है. यह किसी और के साथ कभी नहीं हुआ.

आपको बता दें, दोनों प्रेमीयुगल ‘सीता और गीता’, ‘शोले’ और ‘ड्रीम गर्ल’ जैसी फिल्मों में साथ काम कर चुके हैं. उनकी जोड़ी सिल्वर स्क्रीन पर काफी पसंद की जाती थी.

यूथ ओलंपिक: किसान के बेटे ने तीरंदाजी में देश को दिलाया सिल्वर

यूथ ओलंपिक में भारत के 15 साल के आकाश मलिक ने देश को आर्चरी में पहला सिल्वर मेडल दिलवाया है. यूथ ओलिंपिक के खिताबी मुकाबले में मेंस रिकर्व में आकाश को यूएस के ट्रेनटौन कोल्स के हाथों से 60 से हार का सामना करना पड़ा और इसके बाद ही उन्हें सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा.

आपको बता दे कि सीनियर और जूनियर दोनों ही लेवल पर भारत का आर्चरी में यह पहला ओलिंपिक सिल्वर मेडल है. इससे पहले 2014 नानजिंग यूथ ओलिंपिक में अतुल वर्मा को आर्चरी में ब्रौन्ज मेडल दिलवाया था.

पुणे के आर्मी खेलों में अभ्यास करने वाले किसान के बेटे आकाश ने पहली कोशिश में एक टेन के साथ शुरुआत अच्छी की थी, लेकिन दूसरी कोशिश में उन्होंने 6 पर शौट लगाया और इससे उन्होंने सेट जीतने का मौका गंवा दिया. इसके बाद आकाश अपनी लय हासिल नहीं कर पाए और खिताबी मुकाबले में उन्हें हार का सामना करनी पड़ा.

इससे पहले आकाश क्वालिफिकेशन राउंड में पांचवें और कोल्स 15वें स्थान पर थे, लेकिन फाइनल में अमेरिकी खिलाड़ी ने बेहतरीन खेल दिखाया और पहले सेट में आकाश के 26 के मुकाबले 28, दूसरे सेट में आकाश के 27 के मुकाबले 29 और तीसरे सेट में भारतीय खिलाड़ी के 26 के मुकाबले 28 अंक बनाए. इससे पहले सेमीफाइनल में आकाश ने बेल्जिय के सेना रोस को 6-0 से हराया था.

फाइनल के बाद आकाश ने कहा कि उन्होंने तेज हवाओं के लिए तैयारी की थी, लेकिन यहां उससे भी तेज हवाएं चल रही थी. अपनी जीत पर आकाश ने कहा कि सिल्वर मेडल जीतकर मुझे अच्छ लग रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि गोल्ड मेडल से चूक गया.  आकाश ने कहा कि अब वो 2020 टोक्यो ओलिंपिक की तैयारियों में लगेंगे.

जिंदगी

जख्म भरे नहीं,
दर्द का नया दौर आना अभी बाकी है,
आंधियों ने करवट ली है,
तूफान का आना अभी बाकी है.
दो निवाला तक हलक में उतरता नहीं,
फिक्रे जिंदगी में,
बेजान ठठरियों का,
बिना आग का जलना अभी बाकी है.
समय बदला है,
नवयौवन सा नव शृंगार कर,
दिन सुहाना तो बीत गया,
अंधेरी रात का आना अभी बाकी है.
उन हसीन लम्हों की,
सुनहरी यादें भी बड़ी कातिल हैं,
मैं गलफत में था,
यादों का कर्ज चुकाना अभी बाकी है.
ये न समझो कि बीमार का
हाल अच्छा है मेरे यारों,
मौत ने दी है दस्तक,
जिंदगी का खत्म होना अभी बाकी है.

– नवल किशोर कुमार

सबरीमाला मंदिर प्रवेश के फैसले को नकारती अंधभक्ति

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को ले कर संघर्ष के हालात बन गए हैं. हाल में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को कई संगठन खुल कर नकारते हुए विरोध में आ खड़े हुए हैं. सबरीमाला मंदिर आज खुलने जा रहा है पर अयप्पा के हजारों भक्तों ने मंदिर जाने वाले सभी रास्तों पर पहरा लगा दिया है.

मंदिर जाने वाले सभी रास्तों पर 15-20 किलोमीटर पहले भक्तों ने बेरिकेड्स लगा रखे हैं. महिलाओं को रोकने के लिए किए जा रहे प्रदर्शनों में महिलाएं भी शामिल हैं. भक्तों का कहना है कि सरकार ने एक भी महिला को मंदिर में प्रवेश के लिए दबाव बनाया तो वे खुदकुशी करना शुरू कर देंगे.

सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट के 28 सितंबर के फैसले के खिलाफ लगभग तीस संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है. संगठन पिछले 15 दिन से जगहजगह प्रदर्शन कर रहे हैं. ये संगठन मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ हैं. विरोध कर रहे लोगों द्वारा गाडि़यां रोक कर महिलाओं को वापस भेजा जा रहा है.

उधर महिलाओं के समूह मंदिर में प्रवेश करने के लिए अड़े हुए हैं पर वह मंदिर के आसपास भी नहीं पहुंच पाए हैं. इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है. महिलाओं को रोक रहे प्रदर्शनकारियों पर बलप्रयोग के आदेश नहीं है.

उधर केरल सरकार ने साफ कर दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने पर कृत संकल्प है. मुख्यमंत्री पी. विजयन कहते हैं कि किसी भी श्रृद्धालु को मंदिर पहुंचने से न रोका जाए. चाहे वह महिला ही क्यों न हो. किसी को भी कानून व्यवस्था को हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी. जो कानून तोड़ेगा उस के खिलाफ काररवाई की जाएगी.

कोर्ट के फैसले के खिलाफ शिवसेना और भाजपा ने भी 5 दिन की यात्रा निकाली और कार्यकर्ता मंदिर के आसपास जमे हुए हैं.

मंदिर के मुख्य पुजारी, मंदिर से जुड़े राजपरिवार और हिंदू संगठनों ने कहा था कि आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की जाए पर मंदिर बोर्ड ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानेगा.

मंदिर प्रबंधन देखने वाले त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की बैठक के बाद पंडालम शाही परिवार के सदस्य शशिकुमार वर्मा ने कहा कि हम चाहते हैं कि पुनर्विचार याचिका दाखिल हो, पर नहीं हो सकी. 19 अक्तूबर को अगली बैठक में ही इस पर फैसला होगा.

मालूम हो कि मंदिर को इस महीने पांच दिन की मासिक पूजा के लिए खोला जा रहा है. मंदिर की परंपरा के अनुसार 10 से 50 साल तक की महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती थीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बराबरी के हक का हवाला देते हुए सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश का आदेश दिया था.

असल में महिलाएं जिस धार्मिक सामाजिक व्यवस्था में भेदभाव और शोषण का दंश हजारों सालों से भोगती आ रही है, वह खुद ही फिर उसी दलदल में फंस रही हैं. मंदिर प्रवेश से महिलाओं को कोई फायदा नहीं है फिर भी वे जिद पर अड़ी हुई हैं. उधर परंपरावादियों ने भी सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश ने देने की ठान ली है.

यह संघर्ष किसी के लिए भी सही नहीं है. दोनों पक्ष एक ही रास्ते की ओर जा रहे हैं और वह है अंधभक्ति के नाम पर अंधेरे का रास्ता.

एयर एशिया और सिंगापुर एयरलाइंस के बाद अब इस एयरलाइन को खरीदेगी टाटा

औटोमोबाइल और ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर की देश की सबसे बड़ी कंपनी टाटा ग्रुप ने जेट एयरवेज में बड़ी हिस्सेदारी खरीदने के लिए शुरुआती बातचीत की है. खबरों की माने तो नरेश गोयल की जेट एयरवेज पायलटों को सैलरी देने में देर कर चुकी है. उसके लिए अन्य कर्मचारियों के लिए वेतन देना भी मुश्किल हो रहा है. ऐसे में जेट एयरवेज अपनी हिस्सेदारी बेचने की फिराक में है. टाटा संस चाहती है कि जेट का प्रबंधकीय नियंत्रण उसके हाथ में आ जाए.

आपको बता दें कि टाटा दो जौइंट वेंचर्स के साथ एविएशन सेक्टर में पहले से ही मैजूद है. उसने पहले सिंगापुर एयरलाइंस के साथ करार किया था, यही कंपनी विस्तारा एयरलाइंस का संचालन करती है. जबकि दूसरे वेंचर से एयर एशिया का संचालन होता है. विस्तारा और जेट एयरवेज फुल सर्विसेज कैरियर हैं, जिस नाते ये दोनो एक दुसरे के प्रतिद्वंदी हैं. अगर ये डील होती है तो टाटा को ज्यादा रूटों, ज्यादा जहाजों और ज्यादा मार्केट शेयर के जरिए अपना एविएशन बिजनस मजबूत करने में मदद मिलेगी. हालांकि, इस खबर पर किसी भी तरह की टिप्पणी से टाटा संस ने इनकार कर दिया है, वहीं जेट एयरवेज के प्रवक्ता ने इस रिपोर्ट को ‘पूरी तरह अटकलबाजी’ करार दिया.

सूत्रों कि माने तो दोनों ही पक्ष इस बातचीत को आगे बढ़ाने के इच्छुक हैं. जेट एयरवेज के मौजूदा चेयरमैन नरेश गोयल और उनकी पत्नी अनिता के पास जेट का 51 प्रतिशत शेयर हैं. उन्होंने टीपीजी के साथ एक दौर की बात की थी, लेकिन कंट्रोलिंग राइट्स के मुद्दे पर यह डील आगे नहीं बढ़ पाई.

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