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इन बातों का रखेंगे ख्याल तो आपका स्मार्टफोन होगा मिनटों में फुल चार्ज

आपको कहीं बाहर जाना होता हैं और ऐसे में आपके पास फोन चार्ज करने का बिल्कुल भी समय नहीं है. लेकिन आप चाहते हैं कि आपका स्मार्टफोन फटाफट चार्ज हो जाए तो आप इन टिप्स को अपनाकर अपने स्मार्टफोन को तेजी से चार्ज कर सकते हैं. आइए बताते हैं, इसके लिए हम आपको कुछ आसान से टिप्स:

  • पीसी या लैपटॉप से चार्ज न करें

अगर आप अपने स्मार्टफोन को तेजी से चार्ज करना चाहते हैं तो आप इसे सीधे वॉल आउटलेट (चार्जिंग प्वाइंट) पर चार्ज के लिए लगाएं. कई बार हम अपने लैपटॉप या पीसी से ही अपना फोन चार्ज करने लगते हैं. लेकिन ऐसे में आपका स्मार्टफोन बहुत स्लो चार्ज होगा.

  • स्मार्टफोन के औरिजिनल चार्जर से ही चार्ज करें

हम अपने स्मार्टफोन को किसी भी चार्जर से चार्ज कर लेते हैं. दरअसल हमें  ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहिए. स्मार्टफोन को चार्ज करने से पहले उसके चार्जर के एम्पियर और वोल्ट को जरूर जांच लें .अगर सही एम्पियर या वोल्ट का चार्जर नहीं होगा तो फोन बहुत स्लो चार्ज होगा. इसके अलावा बैटरी के खराब होने की संभावना बनी रहती है.

  • बैटरी की कैपेसिटी के हिसाब से पावर बैंक चुनें

कई स्मार्टफोन में अलग-अलग कैपेसिटी की बैटरी लगी होती है. ऐसे में इन स्मार्टफोन्स को चार्ज करने के लिए 10,000 एमएएच की क्षमता वाले पावर बैंक का ही आपको इस्तेमाल करना चाहिए.

  • फास्ट चार्जर का इस्तेमाल करें

आप अपने स्मार्टफोन को तेजी से चार्ज करने के लिए फास्ट चार्जर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. ये तेजी से चार्जिंग के लिए वोल्टेज और एम्पियर को बढ़ा देता है. लेकिन यह तभी संभव है जब आपका फोन इसे सपोर्ट करे.

#MeToo : अनु मलिक पर गायिका ने लगाया आरोप, उसने कहा किस करो फिर दूंगा काम

अब MeToo की लपट अनु मलिक तक पहुंच चुकी है. आपको याद होगा कि सोना महापात्रा ने कुछ ही दिनों पहले #MeToo के तहत कैलाश खैर पर यौन शोषण के आरोप लगाए थे. इस दौरान उन्होंने अनु मलिक के बारे में भी बात करते हुए उनके महिला सिंगर्स के प्रति अजीब व्यवहार के बारे में जिक्र किया था. उन्होंने इस ओर भी इशारा किया था कि अनु मलिक महिलाओं से सेक्शुअल फेवर पाने की कोशिश करते हैं. अब अनु मलिक पर एक महिला सिंगर श्वेता पंडित ने आरोप लगाते हुए एक चौका देने वाला खुलासा किया है.

बता दें कि सिंगर श्वेता पंडित ने ट्विटर पर अपनी मीटू स्टोरी शेयर करते हुए अनु मलिक पर यौन शोषण का आरोप लगाया है. उन्होंने बताया कि कैसे अनु मलिक ने उनसे काम देने के बदले ‘किस’ की मांग की थी.

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श्वेता ने अपनी पोस्ट में बताया कि यह सब साल 2001 में हुआ था, जब वह सिर्फ 15 साल की थीं. इतनी कम उम्र में उन्हें इस तरह के शाकिंग एक्सपीरियंस से गुजरना पड़ा. उन्होंने कहानी शेयर करते हुए लिखा, ‘यह मेरा मीटू है. मैं यंग लड़कियों को अनु मलिक से आगाह रहने की हिदायत देती हूं. अनु मलिक आपका समय पूरा हो चुका है.’ इसके बाद उन्होंने सोना महापात्रा का नाम लेते हुए उन्हें उनकी कहानी शेयर करने के लिए धन्यवाद दिया.

क्या लिखा है पोस्ट में

श्वेता ने बताया कि साल 2000 में उन्हें मोहब्बतें के लीड सिंगर के रूप में लौन्च किया गया था. उस समय वह सबसे यंग सिंगर थीं. उनके गाने हिट हुए तो उन्हें इंडस्ट्री से कई औफर्स आने लगे. एक दिन अनु मलिक के उस समय मैनेजर रहे मुस्तफा ने उन्हें कौल किया और गाने का औफर दिया. इसके लिए श्वेता को एंपायर स्टूडियो आने के लिए कहा गया. वह अपनी मां के साथ वहां पहुंची, उस समय अनु मलिक फिल्म ‘आवारा पागल दीवाना’ के लिए गाना रिकौर्ड कर रहे थे. श्वेता को छोटे केबिन में रुकने के लिए कहा गया. केबिन में दोनों अकेले थे. अनु मलिक ने श्वेता से बिना म्यूजिक के गाना गाने को कहा. श्वेता ने गाना गाया और अनु मलिक उनसे इंप्रेस हुए.

श्वेता ने आगे बताया, ‘उन्होंने मुझसे कहा कि मैंने बहुत अच्छे से गाना गाया है. इसके बाद अनु मलिक ने मुझे कहा मैं सुनिधि चौहान और शान के साथ तुम्हें यह गाना दूंगा लेकिन पहले मुझे किस दो. उसके बाद वह मुस्कुरा दिए. वह सबसे डरावनी मुस्कान थी. उनकी बात सुनते ही मैं डर गई. मेरा चेहरा पीला पड़ गया.’

उन्होंने आगे कहा कि उस समय वह सिर्फ 15 साल की थीं और स्कूल में पढ़ती थीं. ऐसे में उन पर क्या असर हुआ होगा यह कोई सोच भी नहीं सकता. श्वेता ने बताया कि अनु मलिक सालों से उनके परिवार को जानते थे यहां तक कि वह उनके पिता को मंधीर भाई कहकर बुलाते थे. बावजूद इसके अनु मलिक ने उनके साथ ऐसी हरकत की.

एक वालेट से दूसरे वालेट में भेज सकेंगे पैसे, आरबीआई ने उठाया बड़ा कदम

भारतीय रिजर्व बैंक ने डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग मोबाइल वालेट के बीच लेनदेन को आसान बनाने के लिए दिशा निर्देश जारी किए हैं. वर्ष 2017 में डिजिटल भुगतान के लिए तैयार की गई रूपरेखा में ‘अपने ग्राहक को जानो’ (केवाईसी) नियम का अनुपालन करने वाले सभी प्रीपेड भुगतान मंचो (पीपीआई) के बीच अंतरपरिचालन को तीन चरणों में लागू करने की बात कही गई थी. मोबाइल वालेटों के बीच यूपीआई के माध्यम से अंतरपरिचालन किया जा सकता है. वालेट और बैंक खातों के बीच भी अंतरपरिचालन ‘यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस’ (यूपीआई) के माध्यम से किया जा सकता है. रिजर्व बैंक ने एकीकृत दिशानिर्देश जारी कर सभी चरणों के अंतरपरिचालन को लागू करने की तैयारी करने के आदेश दिए हैं.

बता दें कि हमारे यहां मोबीक्विक, आक्‍सीजन, पेटीएम, इट्जकैश और ओला मनी जैसे ऐप हैं जिनका लोग रोजाना उपयोग करते हैं. रिजर्व बैंक के निर्णय के बाद अब इस तरह के ऐप प्रयोग कर रहे यूजर्स की राह और भी आसान हो गई है. मौजूदा समय में एक मोबाइल वालेट से ग्राहक दूसरी कंपनी द्वारा संचालित वालेट में न तो पैसे भेज सकता है और न ही उससे हासिल कर सकते हैं. लेकिन आरबीआई की नई गाइडलाइन के बाद आब पेटीएम से आप मूवीक्विक के वालेट में पैसे भेज सकेंगे और मूवीक्विक से पेटीएम में. यह आरबीआई का बड़ा कदम है जो मोबाइल वालेट यूजर्स के लिए कारगर होगा.

पेटीएम के CEO किरण वासीरेड्डी ने भारत में पेमेंट ईकोसिस्‍टम को एक बेहद ही सराहनीय कदम बताया है. इस नई गाइडलाइंस के साथ पीपीआई ईकोसिस्‍टम अब और भी मजबूत बनेगा. इसके अलावा पेटीएम और मूवीक्वीक के यूजर्स के लिए भी आसानी होगी.

फैजाबाद का नाम नरेंद्र मोदी पुर रखा जाये

यह सुझाव देने की हिम्मत देश में अगर कोई शख्स कर कर सकता है तो ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं कि उसका नाम मार्कन्डेय काटजू है, जो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस और प्रेस काउंसिल के मुखिया रहे हैं. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने अपने हिंदूवादी एजेंडे को बढ़ाते हुए इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया तो उनकी आलोचना का धर्म भी सपा और कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने निभाते हुए तरह तरह की दलीलें दीं. लेकिन बड़बोले कहे जाने बाले काटजू ने तो उनका मजाक बनाते हुए उन्हें उत्तरप्रदेश के 20 शहरों की लिस्ट ही थमा दी कि अब किस शहर का नाम क्या होना चाहिए.

इसमें कोई शक नहीं कि मार्कन्डेय काटजू कभी कभी अतिरेक उत्साह में बोलने की हदें पार कर जाते हैं, लेकिन उनकी साफगोई में एक पीड़ा भी होती है कि देश में धर्म और जाति के नाम पर यह क्या हो क्या रहा है. कट्टरवाद के खिलाफ काटजू खुद को बोलने से रोक नहीं पाते तो यह  खास एतराज की बात नहीं क्योकि गलत कुछ होता दिखे तो उसके खिलाफ बोलना  जरूर चाहिए. जिससे बेलगाम होते कट्टरवादियों को यह इल्म रहे कि देश में ऐसे बुद्धिजीवी और जानकार मौजूद हैं जो उनके गलत फैसलों का विरोध करेंगे ही और वे जस्टिस काटजू जैसे लोग हों तो हर कोई जानता है कि उन पर खुद उनका भी जोर नहीं चलता.

इलाहाबाद का भी नाम बदलना बिलाशक एक बेतुकी और गैर जरूरी बात थी. जिसका मकसद हिंदूवादियों को खुश करना था क्योंकि मोदी योगी सरकारें कुछ और हिंदुओं तो क्या किसी और के लिए भी नहीं कर पा रहीं.  ऐसे में हिन्दुत्व का एहसास कराने से उनकी नाकामियों पर कुछ दिनों के लिए पर्दा डल जाता है. योगी सरकार के इस ताजे फैसले की चर्चा विदेशी मीडिया भी चिंताजनक तरीके से कर रही है. जिससे देश की बिगड़ती छवि देख काटजू इतने खिन्न हो उठे कि उन्होने आने वाले कल की तस्वीर ही खींच कर रख दी कि अब किस शहर का नाम क्या होगा.

बकौल मार्कन्डेय काटजू अब अलीगढ़ का नाम अश्वत्थामा नगर, आगरा का अगस्त्य नगर, गाजीपुर का गणेशपुर, शाहजहांपुर का सुग्रीवनगर, मुजफ्फरनगर का मुरलीमनोहर नगर, आजमगढ़ का अलकनंदापुर, हमीरपुर का हस्तिनापुर, लखनऊ का लक्ष्मणपुर, बुलंदशहर का बजरंगबलीपुर, फैजाबाद का नरेंद्र मोदी नगर, फ़तेहपुर का अमितशाह नगर, गाजियाबाद का गजेंद्र नगर, फिरोजाबाद का द्रोणाचार्य नगर, फर्रुखाबाद का अंगदपुर, गाजियाबाद का घटोत्कच नगर, सुल्तानपुर का सरस्वती नगर, मिर्जापुर का मीराबाई नगर और मुरादाबाद का नाम मन की बात नगर रख देना चाहिए.

इससे होगा यह कि मुगलकाल के नाम खत्म हो जाएंगे और त्रेता और द्वापर सतयुग की गंध महकने लगेगी. कलयुग के मौजूदा प्रमुख देवी देवताओं के नाम भी उन्होने सुझाए हैं. आगे दूसरे राज्यों के शहरों के नाम भी इसी तर्ज पर बदले जा सकते हैं.

दरअसल में मार्कन्डेय काटजू हमेशा से ही धार्मिक कट्टरवाद के विरोधी रहे हैं, उनकी नजर में इससे किसी को कुछ हासिल नहीं होता. अब से कोई छह साल पहले दिल्ली के एक कार्यक्रम में उन्होने 90 फीसदी भारतीयों को बेवकूफ करार देते हुए कहा था कि इन्हें धर्म के नाम पर लड़ाना बड़ा आसान काम है. धार्मिक मसलों पर भारतीय विवेक और तर्क का इस्तेमाल नहीं करते.

ऐसे कोई दर्जन भर से भी ज्यादा मसले हैं जिन पर काटजू खुल कर बिना किसी डर या हिचक के इतना बोले हैं कि उसे अगर संग्रहीत किया जाये तो एक गैर धार्मिक मार्कन्डेय पुराण पार्ट – 2 तैयार हो सकता है. कुछ मे वे गलत भी रहे तो कहा जा सकता है कि परफेक्टनेस की उम्मीद उनसे ही क्यों योगी मोदी से क्यों नहीं जो सत्ता का इस्तेमाल धर्म के लिए कर रहे हैं.

अपने नए सुझाव में उन्होने बड़े सलीके से आदित्यनाथ का मखौल उड़ाया है जिस पर किसी के मुंह से बोल नहीं फूट रहे और फूटेंगे भी नहीं क्योंकि उनकी मंशा काटजू जैसे बुद्धिजीवियों को अलगथलग कर देने की है. लेकिन इससे भगवा खेमा कामयाब हो पाएगा ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि अब खुद हिन्दू दबी आवाज में कहने लगे हैं कि शहरों के नामों के हिंदुकरण के एवज में हम सौ रु प्रति लीटर का पेट्रोल नहीं खरीद सकते, फिर मंहगाई भ्रष्टाचार और बेरोजगारी तो और भी विस्फोटक कगार पर हैं सरकार को इन पर ध्यान देना चाहिए.

इस शर्त के साथ कोहली की मांग पूरी, विदेशी दौरे पर साथ रह सकेंगी पत्नियां

गौरतलब है कि कुछ समय पहले ही भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने विदेशी दौरे पर खिलाड़ियों को अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड को साथ लेकर जाने की मंजूरी देने की मांग की थी. अब बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) ने कोहली की मांग को थोड़े संशोधन के साथ मान लिया है. बीसीसीआई की प्रशासकों की समिति (सीओए) के ताजा फैसले के मुताबिक, बोर्ड ने पहले 10 दिन को छोड़कर बाकी पूरे टूर के लिए पत्‍नी और गर्लफ्रेंड्स के साथ रहने की इजाजत दे दी है. पहले के नियम के मुताबिक, खिलाड़ी विदेशी दौरे पर केवल दो हफ्ते के लिए ही अपनी पत्नियों को साथ रख सकते थे. इसे लागू करने के पीछे सीओए की दलील थी कि परिवार से दूर रहने पर खिलाड़ी अपने प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान दे पाएंगे.

सीओए का कहना है कि विदेशी दौरे पर क्रिकेटरों के साथ उनकी पत्नियों या गर्लफ्रेंड्स के होने से कोई नुकसान नहीं है. उनका कहना है कि ऐसा दौरा शुरू होने के दस दिन बाद ही होगा.

सीओए के मुताबिक, विदेशी दौरे पर खिलाड़ी लंबे समय तक घर से बाहर रहते हैं. यदि उनकी पत्नी या गर्लफ्रेंड उनके साथ रहेंगी तो इससे खिलाड़ियों में सकारात्मक माहौल तैयार होने में मदद मिलेगी.

सीओए ने कोहली, रोहित, शास्त्री से की थी चर्चा

सीओए ने इस संबंध में हैदराबाद में दूसरे टेस्ट की शुरुआत से पहले विराट कोहली, कोच रवि शास्त्री और एशिया कप में टीम इंडिया की अगुआई करने वाले रोहित शर्मा के साथ चर्चा भी की थी.

क्रिकेट औस्ट्रेलिया भी ले चुका है ऐसा फैसला

साल 2015 में क्रिकेट औस्ट्रेलिया (सीए) के तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जेम्स सदरलैंड ने भी इसी तरह का फैसला लिया था. हालांकि, तब उनके इस फैसले की बहुत आलोचना हुई थी.

उस साल इंग्लैंड ने एशेज में औस्ट्रेलिया को 3-2 से हराया था. औस्ट्रेलिया के इस खराब प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों के साथ उनकी पत्नियों या गर्लफ्रेंड्स के होने को जिम्मेदार ठहराया गया था. हालांकि, 2017/18 में औस्ट्रेलिया ने 4-0 से एशेज सीरीज जीत ली थी. सीरीज का एक टेस्ट ड्रॉ रहा था.

2007 में 5-0 से एशेज सीरीज हारने के बाद इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने एक स्वतंत्र औडिटर को नियुक्त किया. औडिटर ने खिलाड़ियों की प्रेमिकाओं और पत्नियों को टीम के खराब प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार ठहराया. इसे पूर्व इंग्लिश क्रिकेटर केविन पीटरसन ने बकवास बताया था.

सलमान खान अब इस विदेशी हीरोइन से करेंगे शादी..!

50 पार कर चुके सलमान खान अब परमानैंट लाइफ पार्टनर की चाह रखने लगे हैं. खबरों का बाजार गरम है कि वे लूलिया वंतूर से शादी रचा सकते हैं. 38 वर्षीया लूलिया ऐक्ट्रेस व सिंगर हैं और रोमानिया की रहने वाली हैं. सलमान और लूलिया काफी समय से एकदूसरे को डेट कर रहे हैं.

बात में कितनी सचाई

बात में सचाई भी है शायद तभी सलमान खान की कथित गर्लफ्रैंड  लूलिया वंतूर अब बौलीवुड में डैब्यू करने जा रही हैं. लूलिया की पहली फिल्म ‘राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला’ का पोस्टर रीलीज भी किया जा चुका है, जिसमें लुलिया बतौर ऐक्ट्रैस बौलीवुड में ऐंट्री मारेंगी.

फिल्म का पोस्टर रीलीज

रोमानियन ऐक्ट्रैस लूलिया ने फिल्म के पोस्टर को सोशल मीडिया पर भी साझा किया है. इस फिल्म में लूलिया मीराबाई के किरदार में नजर आएंगी. पोस्टर में लूलिया पीले रंग की साड़ी में काफी खूबसूरत लग रही हैं.

फिल्म की शूटिंग कुछ पूरी हो चुकी है और कुछ की दिल्ली, मथुरा, आगरा के साथसाथ उत्तर भारत के कुछ और जगहों पर होनी है. फिल्म अगले साल मई में रीलीज हो सकती है. इस फिल्म से पहले लुलिया को सलमान ने अपनी फिल्म ‘रेस 3’ में एक गाना गाने का मौका भी दिया था.

देखने वाली बात तो यह होगी कि बौलीवुड में ऐंट्री के बाद लुलिया बाद में सलमान खान को कितना भाव देती हैं.

इन हीरोइनों से भी चल चुका है अफेयर्स

मालूम हो कि बौलीवुड में मशहूर हुईं ऐक्ट्रैस ऐश्वर्या राय और बाद में कैटरीना कैफ के साथ सलमान खान की खूब ईलूईलू हुई थी. इससे पहले भी कई फिल्मी हीरोइनें सलमान के साथ डेट पर रह चुकी हैं पर एकएक कर सभी या तो फुर्र हो गईं या फिर किसी और के साथ गुटरगूं में बिजी रह गईं.

अब लुलिया को बौलीवुड में ऐंट्री दिलाने वाले सलमान खान पचासा के बाद किस तरह पर्मानैंट घर बसाएंगे यह तो आने वाले वक्त में ही पता चलेगा. पर खबरों के बाजार में सभी खबरीलाल इस जोड़ी को रील लाइफ से अलग रीयल लाइफ में ऐंट्री मारने की सौ फीसदी दावा करते दिख रहे हैं.

दहेज कानून में बदलाव, खतरे में पति व परिवार

18लखनऊ निवासी प्रभाकर की शादी प्रीति के साथ हुई थी. शादी के 4 दिनों बाद चौथी की विदाई में प्रीति अपने घर गई. फिर कुछ दिनों बाद हनीमून पर जाने के लिए वापस ससुराल आ गई. हनीमून से वापस आने के बाद फिर वह वापस अपने मायके चली गई. जब पति प्रभाकर विदाई के लिए गया तो उस ने ससुराल आने से इनकार कर दिया. सो, झगड़ा हो गया. मामला पुलिस थाने तक गया. प्रभाकर पर घरेलू हिंसा

का केस दर्ज हो गया. परामर्श केंद्र में सुलहसमझौता हुआ. इस के बाद भी पतिपत्नी के बीच संबंध सामान्य नहीं हो सके. 6 माह भी नहीं बीते कि प्रीति ने धारा 498ए के साथसाथ रेप और अप्राकृतिक सैक्स का आरोप लगाते हुए पति के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. अब पुलिस प्रभाकर को पूछताछ के लिए थाने बुलाने लगी. प्रभाकर मानसिक रूप से परेशान रहने लगा. वह बेरोजगार हो गया.

पुलिस और कचहरी की भागदौड़ के चलते उस की प्राइवेट जौब छूट गई. जो पैसा था वह भी खर्च हो गया. पत्नी प्रीति अपने वकीलों के जरिए समझौते के लिए 25 लाख रुपए की मांग करने लगी. प्रभाकर के पास इतने पैसे हैं नहीं. वह पुलिस के पास गया. वहां फाइनल रिपोर्ट लगाने के नाम पर 2 लाख रुपए की मांग की गई. कचहरी में प्रभाकर को अपने वकील को फीस के तौर पर अलग से पैसे देने पड़ रहे हैं.

हालात यह है कि प्रभाकर न तो पत्नी को साथ रख पा रहा है और न ही उसे तलाक मिल पा रहा है. दहेज कानून के चक्कर में उस का उत्पीड़न हो रहा है. वह कहता है, ‘‘शादी करना मेरे लिए मुसीबत बन गया है. मुझे समझ नहीं आता कि क्या करूं?’’ प्रभाकर जैसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. ऐसे में विवाह संस्था से लोगों का भरोसा उठ रहा है.

सरल हो कानून

इस बात की लगातार जरूरत महसूस की जा रही थी कि दहेज और हिंदू तलाक कानून को सरल किया जाए. सरकार और कोर्ट इस के बाद भी कानून को सरल करने के बजाय उसे और जटिल बना रहे हैं. इस से लोगों में गुस्सा है. दहेज प्रताड़ना कानून में सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से परिवारों में रोष फैल

रहा है. सब से बड़ा रोष तो इस बात को ले कर है कि अब दहेज प्रताड़ना केस में पुलिस पहले के मुकाबले अधिक मनमाना काम करेगी. इस से भ्रष्टाचार को भी और बढ़ावा मिलेगा.

पति परिवार कल्याण समिति के नाम से संस्था चलाने वाली इंदू सुभाष कहती हैं, ‘‘दहेज प्रताड़ना कानून के दुरुपयोग की बात को हर कोई मान रहा है. ज्यादातर मामलों में लड़की केवल पति ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को फंसाना चाहती है. यह एक तरह का कानूनी आतंकवाद माना जा सकता है. यह विवाह संस्था को तोड़ने वाला काम साबित हो सकता है.’’

दहेज कानून में दर्ज मुकदमों की विवेचना से पता चलता है कि सालदरसाल मुकदमों के दुरुपयोग के मामले बढ़ते जा रहे हैं. ऐसे में नए बदलाव से पति के परिवार पर पुलिस की प्रताड़ना भी बढ़ सकती है.

साल 2003 में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जस्टिस जे डी कपूर ने दहेज प्रताड़ना कानून में बढ़ रही ऐसी प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की थी. जस्टिस कपूर ने कहा था, ‘‘रिश्तेदारों और पति परिवार के सदस्यों को बेवजह परेशान किए जाने से शादी की बुनियाद हिल रही है. यह समाज और परिवार दोनों के हित में नहीं है.’’ जस्टिस कैलाश गंभीर ने तो कहा, ‘‘दहेज प्रताड़ना के मामले में पुलिस लापरवाही में केस दर्ज नहीं करती.’’

दहेज के मुकदमे लगातार बढ़ते जा रहे हैं. साल 2004 में 58 हजार के करीब मुकदमे दर्ज हुए थे. 2015 में यह संख्या बढ़ कर 1 लाख 13 हजार के पार पहुंच गई. ऐसे में यह समझा जा सकता है कि दहेज के मुकदमों से लोग कितने परेशान होते हैं. दहेज के मुकदमों में राहत हाईकोर्ट से ही मिलती है. हाईकोर्ट में मुकदमा लड़ने के लिए खर्च का दबाव अलग होता है. साधारण परिवार ऐसे मुकदमों में आर्थिक व मानसिक रूप से टूट जाते हैं.

कानून पर उठे सवाल

2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा था कि 7 साल तक की सजा वाले मामलों में बिना समुचित आधार के गिरफ्तारी नहीं होगी. पुलिस केवल मुकदमा दर्ज होने पर ही गिरफ्तारी नहीं करेगी. इस में दहेज प्रताड़ना कानून भी शामिल था. कोर्ट ने कहा था कि दहेज प्रताड़ना मामले में अगर पुलिस बिना पर्याप्त आधार के गिरफ्तारी करेगी तो पुलिस के खिलाफ भी कार्यवाही हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सी के प्रसाद और पी सी घोष ने कहा था कि किसी की गिरफ्तारी सिर्फ इसलिए नहीं हो सकती कि मामला गैर जमानती और संज्ञेय है तथा पुलिस को ऐसा करने का अधिकार है.

27 जुलाई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए के गोयल और जस्टिस यू यू ललित ने राजेश शर्मा बनाम स्टेट औफ यूपी के केस में दहेज प्रताड़ना मामले में छानबीन को ले कर गाइडलाइंस जारी की. इस में कहा गया कि देशभर में परिवार कल्याण समिति बनाई जाएं.

जिला लीगल अथौरिटी को ऐसी कमेटी बनाने को कहा गया, जिस में सिविल सोसाइटी के लोगों को भी शामिल किया गया हो. इस में कहा गया कि अगर दहेज प्रताड़ना की शिकायत पुलिस और मजिस्ट्रेट के पास आती है तो वे मामले को कमेटी के पास भेजेंगे. कमेटी दोनों पक्षों की शिकायतें सुनेगी. शिकायत के आधार को देखेगी. कमेटी पहले मामले को सुलझाने का प्रयास करेगी. लेकिन जब मामला नहीं सुलझेगा तो वह अपनी रिपोर्ट पुलिस या मजिस्टे्रट को देगी. इस के बाद ही आगे की कार्यवाही होगी. जब तक रिपोर्ट नहीं आएगी तब तक गिरफ्तारी नहीं होगी.

नए फैसले से बढ़ गया खतरा

सितंबर 2018 में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली बैंच ने परिवार कल्याण कमेटी और गिरफ्तारी पर रोक के प्रावधान को खत्म कर दिया. इस फैसले में कहा गया है कि परिवार कल्याण कमेटी सीआरपीसी के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है. अब 7 साल से कम की सजा के मामले में गिरफ्तारी के कारण बताने होंगे. पुलिस को यदि संदेह हो कि क्राइम हुआ है और मामले की छानबीन जरूरी है तो वह वैसा कर सकती है. लेकिन पुलिस को धारा 41 और 41ए का ध्यान रखना होगा. इस में पुलिस आरोपी को नोटिस देगी. अगर नोटिस पर अमल हो रहा है तो आरोपी को पुलिस गिरफ्तार नहीं करेगी. अगर नोटिस का जवाब नहीं दिया जा रहा है तो गिरफ्तारी हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने परिवार कल्याण कमेटी को कानून के तहत नहीं माना है. वह समझौते के आधार पर केस को खत्म नहीं करा सकती. कानून की यह सही व्याख्या नहीं है. अगर बिना समझौते वाले केस में ऐसा होता भी है तो हाईकोर्ट केस को खत्म कर सकता है. परिवार कल्याण कमेटी के खारिज होने के बाद दहेज प्रताड़ना कानून के मामले में पुलिस का दखल बढ़ गया है. ऐसे में पुलिस उत्पीड़न और भ्रष्टाचार दोनों के बढ़ने की आशंका प्रबल हो जाती है.

इस फैसले के बाद दहेज प्रताड़ना कानून 2017 के पहले की तरह हो गया है. 27 जुलाई, 2017 से पहले दहेज प्रताड़ना कानून में जो प्रक्रिया अपनाई जाती थी वही अब अपनाई जाएगी. दहेज प्रताड़ना कानून गैर जमानती और गैर समझौतावादी है.

धारा 498 में अग्रिम जमानत का प्रावधान है. ऐसे में आरोपी को जमानत मिल सकती है. अब मामले परिवार कल्याण कमेटी के पास नहीं भेजे जाएंगे बल्कि पुलिस के अफसरों के संज्ञान में आने के बाद मामला दर्ज हो जाएगा.

बढ़ गया पुलिस का दखल

धारा 498ए के तहत पुलिस पति परिवार को बेवजह ही परेशान करती है. इस से समाज में बिखराव बढे़गा. ऐसे मामलों में जरूरी है कि पहले मामले के सच को परखा जाए, जिस से यह तय हो सके कि आरोपी को जेल भेजा जाए या बेल दी जाए.

हालांकि कोर्ट भी यह देखता है कि धारा 498ए के तहत होने वाली गिरफ्तारी गलत तो नहीं है. अगर ऐसा होता है तो संसद इस से बचाव के कानून बनाए. ऐसे में बेवजह पतियों को फंसाने वाले मामलों में शिकायत वाली कोर्ट को ही जमानत देने का अधिकार हो, जिस से उसे ऊपरी कोर्ट में न जाना पडे़. इस के लिए कोर्ट विचार कर रहा है.

कुछ मामलों में कोर्ट ने कहा है कि संज्ञेय मामलों में पुलिस मामला पता करने के बाद ही दर्ज करे. शुरुआती जांच को जरूरी बताया गया है. कोर्ट ने कहा है कि जब शिकायत वैवाहिक विवाद की हो, लेनदेन की हो, मैडिकल लापरवाही की हो तो पुलिस शिकायत मिलते ही जांच शुरू कर सकती है. उसे जांच में यह पता लगाना है कि संज्ञेय अपराध हुआ है या नहीं. अपराध संज्ञेय है, तो मुकदमा दर्ज किया जा सकता है.

कोर्ट ने गिरफ्तारी के मामले में कहा है कि पुलिस की ड्यूटी है कि आरोपी को वकील से मिलने दे. अरैस्ट मैमो में आरोपी के रिश्तेदार या दोस्त के हस्ताक्षर लेना जरूरी है. उस को पूरी जानकारी देनी पडे़गी. आरोपी का मैडिकल कराना होगा. अगर वह कस्टडी में है तो हर 48 घंटे के बाद उस का मैडिकल जरूरी है. जघन्य अपराध को छोड़ कर पुलिस रूटीन तरह से गिरफ्तारी नहीं कर सकती. आरोपी के भागने की स्थिति अगर बनती है या बनने वाली है तो ही गिरफ्तारी हो सकती है. अगर कोर्ट को यह लगता है कि आरोपी कानून का आदर कर रहा है तो उसे गिरफ्तार न किया जाए.

आधार कार्ड पर आधी अधूरी राहत

‘‘आधार अपने मकसद में फेल हो चुका है, आज आधार के बिना भारत में रहना असंभव हो गया है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.’’

‘‘आधार का डेटा संवदेनशील है. किसी थर्ड पार्टी या किसी वैंडर की तरफ से इस का दुरुपयोग होने का खतरा है.’’

‘‘निजी कंपनियों को आप आधार के डेटा का इस्तेमाल नहीं करने देंगे तो वे नागरिकों को प्रोफाइल करेंगी और उन के राजनीतिक विचार जानने की कोशिश करेंगी यह निजता का उल्लंघन है.’’

‘‘क्या आप यह मान कर चल रहे हैं कि बैंक में खाता खुलवाने वाला हर शख्स संभावित आतंकी या मनी लौंडरर है.’’

‘‘आधार एक्ट को मनी बिल के तौर पर संसद से पारित कराना संविधान के साथ धोखा है.’’

उपरोक्त टिप्पणियां जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की हैं जो 5 जजों की उस संविधान पीठ में से एक हैं जिस ने बीती 26 सितंबर को आधार की वैधता पर अदालत की मुहर लगाई. जस्टिस चंद्रचूड़ की इन टिप्पणियों के हालफिलहाल भले ही कोई माने न रह गए हों लेकिन आने वाले दिनों में इन की गूंज सुनाई देगी जिस की अपनी वजहें भी हैं.

क्या है फैसला

सुप्रीम कोर्ट का फैसला राहत कम आफत ज्यादा है जिस के तहत लगता है कि आम लोगों की पीठ पर अब 100 नहीं, 98 कोड़े बरसाए जाएंगे जबकि मुद्दा या मांग यह थी कि बेगुनाहों को कोड़ों की सजा न दी जाए.

मुद्दा यह नहीं था कि आधार कार्ड कहां अनिवार्य है और कहां नहीं, बल्कि यह था कि आधार संवैधानिक रूप से अनिवार्य क्यों. इस से बचते सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड कहांकहां जरूरी और कहांकहां जरूरी नहीं की तख्ती लगा दी. इस से लोगों का ध्यान मुद्दे की बात से हटा रहा. दोटूक कहा जाए तो सुप्रीम कोर्ट सरकार पर नकेल कसने में नाकाम रहा है. उलटे, उस ने आधार के नाम पर उसे मनमानी करने की शह दे दी है.

संविधान पीठ के 5 जजों में से 4 जज चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, ए के सीकरी, ए एम खानविलकर और जस्टिस अशोक भूषण ने आधार कानून को संवैधानिक ठहराया जबकि जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने रत्तीभर भी इत्तफाक आधार की संवैधानिक अनिवार्यता से नहीं रखा. इन जजों के अपने अलगअलग नजरिए थे. लेकिन आखिरकार फैसला 4-1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में गया.

लंबे समय से चल रहे आधार संबंधी मुकदमों में हर किसी की दिलचस्पी थी क्योंकि आधार को ले कर कई विवाद सामने आ रहे थे. सब से बड़ा सवाल निजता का था जो आधार के जरिए भंग हो रही थी. लेकिन अदालत ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था यह दी कि अब आधार आयकर रिटर्न भरने, पैन कार्ड बनवाने और सरकारी सब्सिडी वाली योजनाओं के लिए ही अनिवार्य होगा, बाकी जगहों पर यह अनिवार्य नहीं होगा.

इस फैसले से जानकार हतप्रभ हैं, क्योंकि आधार को ले कर भ्रम की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है. वजह, आधार तो लोगों को जेब में रखना ही पड़ेगा. जहांजहां इस की अनिवार्यता खत्म की गई है वहांवहां दूसरे पहचानपत्र लोगों को दिखाने होंगे. जाहिर है मुसीबत से छुटकारा नहीं मिला है, बल्कि मुसीबत का विकल्प लोगों को दे दिया गया है.

कम कहां हुई परेशानियां

ये परेशानियां कैसीकैसी हैं जो आम लोगों की जिंदगी को दुश्वार बनाती हैं, इसे समझने से पहले हालिया फैसले के प्रभाव समझने जरूरी हैं कि यह आधाअधूरा फैसला है और आशंकाओं के बादल छटे नहीं हैं. फैसले के बाद बडे़ पैमाने पर प्रचारित यह किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने आधार के अनावश्यक उपयोग या दुरुपयोग पर रोक लगाई है. इन्हीं लोगों की मानें तो उपयोग या दुरुपयोग का रकबा छोटा कर दिया गया है.

इस फैसले को गरीबों की पहचान और ताकत बताया जा रहा है जो सिरे से त्रुटिपूर्ण है. बात साधारण ढंग से समझने के लिए गहराई में जाएं तो हालात भयावह हैं. सरकारी सब्सिडी वाली योजनाओं में आधार की अनिवार्यता का मतलब यह नहीं है कि इस से किसी तरह की पारर्दिशता आएगी या बेईमानी, भेदभाव व भ्रष्टाचार खत्म हो जाएंगे.

एक गरीब आदमी जब राशन की दुकान पर आधार कार्ड ले कर जाएगा तो दुकानदार उठ कर उस का स्वागत करते उसे राशन नहीं थमा देगा, बल्कि वह हमेशा की तरह कहेगा कि तेल, अनाज और चीनी अभी स्टौक में नहीं हैं, कल या परसों आना. अदालत ने सरकार के कान इस बाबत नहीं उमेठे हैं कि वह वक्त पर देश के हर वार्ड में राशन की उपलब्धता तय करे. फिर इस लिहाज से आधार कार्ड की तुक समझ से परे है जो लोगों को सरकारी योजनाओं की पात्रता भर प्रदान करती है. आधार कार्ड योजनाओं का लाभ मिलने की गारंटी नहीं है.

संभव है, यह बात छोटी और महत्त्वहीन लगे. वजह, सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने आधार कार्ड पर एक आवरण भर चढ़ाया है. उस की उपयोगिता और अनिवार्यता पर गौर नहीं किया है कि जब गरीब के पास राशन लेने के लिए राशन कार्ड पहले से ही मौजूद है तो आधार कार्ड क्यों और इस के जरिए सरकार को क्या हासिल होगा. क्या इस से सरकारी राशन की दुकानों पर मनमानी और भ्रष्टाचार रुक जाएगा. यही बात दूसरी उन तमाम सरकारी योजनाओं पर लागू होती है जो आम लोेगों के लिए चल रही हैं.

बड़े पैमाने पर देखें तो आधार कार्ड को ले कर बड़ा बवंडर उस से जुड़ी जानकारियों के लीक होने का हुआ था. आधार के नियमन का जिम्मा संभालने वाले यूआईडीएआई यानी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने साल 2017 में ही 50 से भी ज्यादा एफआईआर दर्ज कराई थीं जो आधार की जानकारियों के चलते साइबर सुरक्षा के लिए पैदा हुए खतरे से ताल्लुक रखती थीं.

बात चिंताजनक इस लिहाज से है कि पिछले 5 सालों में अधिकतर लोग कानूनी दबाव के चलते अपनी निजी जानकारियां प्राइवेट सैक्टर और बैंकों को सौंप चुके हैं. इन का दुरुपयोग अब नहीं होगा, इस की गारंटी न तो सरकार ले रही है और न ही फैसला देने वाला सुप्रीम कोर्ट ले रहा है. इस की चिंता करते हुए जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने जरूर कहा था कि प्राइवेट कंपनियों को यह डाटा नष्ट कर देना चाहिए लेकिन फैसले में इस का न तो जिक्र है और न ही प्रावधान है.

डिजिटल सेंधमारी

डिजिटल इंडिया का राग अलापती रहने वाली केंद्र सरकार के पास ऐसा कोई कानून या जरिया नहीं है जो डिजिटल सेंधमारी को रोकने में समर्थ हो. हालांकि फैसले के बाद वह इस बाबत कानून लाने की बात कर रही है लेकिन यह बात ठीक वैसी है कि पहले बड़े पैमाने पर जुर्म होने दो, फिर कानून बनाया जाएगा.

सरकार ही नहीं, बल्कि आम लोग भी जानने व समझने लगे हैं कि आजकल ऐसे शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर वजूद में आ चुके हैं जो सरकारी दलील पर भारी पड़ते हैं कि आधार डाटा 64 बिट फौर्मेट में इन्स्क्रिप्ट है और सुरक्षित है.

धड़ल्ले से बढ़ते साइबर क्राइम के मद्देनजर आशंका इस बात की है कि अब चोरी करने के लिए मकान का ताला तोड़ने की जहमत भी हैकरों को नहीं उठानी पड़ेगी. साइबर अपराधी अफ्रीका और यूरोप से भी देश में सेंधमारी कर सकते हैं. निजी जानकारियां बेहद कीमती होती हैं, खासतौर से लोकतंत्र में उन की अपनी अलग अहमियत व उपयोगिता होती है, जिन का चोरी होना एक बड़ा खतरा है. लेकिन इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इत्तफाक रखा है. उस ने तकनीकी सवाल नहीं किए हैं और न ही डेटा सुरक्षा की गारंटी चाही है.

जिस देश में हर रोज हर किसी के खाते से पासवर्ड के जरिए पैसे निकाल लिए जाते हों, एटीएम में सेंधमारी होती हो, और तो और उन के क्लोन भी बन जाते हों, उस में अदालत ने सरकार के कहने भर से उस के सुरक्षा के दावे पर भरोसा कर लिया है, तो फैसले की सार्थकता पर शक होना लाजिमी बात है.

राष्ट्रीय पहचान की अनिवार्यता लोगों की जिंदगी मुश्किल भी बनाती है वह भी तरहतरह से. इन खतरों से सरकार वाकिफ है लेकिन उसे अपनी जिद के चलते आम लोगों की फिक्र नहीं है. यहां कुछ उदाहरण प्रसंगवश ही दिए गए हैं वरना परेशानियों और गड़बड़झालों का अंबार लोगों का इंतजार कर रहा है. आधार जैसी परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश ने हाल ही में इसे खत्म किया है जबकि ब्रिटेन 10 वर्षों पहले ही राष्ट्रीय पहचान अभियान को खत्म कर चुका है.

भारत जैसे विकासशील देश में हर कोई सरकारी योजनाओं का फायदा लेना चाहता है जिन्हें पाने के लिए अब आधार कार्ड अनिवार्य हो गया है. ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि पहचान के लिए आधार कार्ड ही क्यों, जबकि पहचान साबित करने के लिए दूसरे विकल्प या कागजात पहले से ही मौजूद हैं. यह बात वाकई लोेकतंत्र के मूलभाव से मेल खाती नहीं लगती कि अगर आप अपनी ही चुनी गई सरकार से कुछ चाहते हैं तो सरकार के इशारे पर नाचें. राशन लेने के लिए सिर्फ राशन कार्ड ही पर्याप्त क्यों नहीं जिस में घर के मुखिया का फोटो भी चस्पां होता है और पूरे परिवार की जानकारी दर्ज होती है.

अब जिन गरीबों के पास, वजहें कुछ भी हों, अगर आधार कार्ड नहीं है तो क्या सरकार उन्हें राशन न दे कर भूखों मरने को छोड़ देगी. यह कौन सी संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक बात होगी. यह बात हर योजना पर लागू होती है. अगर एक भी जरूतमंद आधार कार्ड न होने के चलते सरकारी योजनाओं का फायदा नहीं उठा पाता है, तो यह उस के साथ ज्यादती नहीं तो क्या है?

पहचान की मार

आजकल हर आदमी के पास दर्जनों पहचानपत्र हैं और यह उस की मजबूरी हो गई है कि वह इन्हें संभाल कर रखे.

पहचानपत्रों को ले कर एक हास्यास्पद बात यह है कि इन की जरूरत घर से बाहर निकलते ही पड़ने लगती है. ड्राइविंग लाइसैंस इन में से पहला है. वोट डालने जाएं तो वोटर आईडी कार्ड जरूरी है. बैंक में लेनदेन करने के लिए पैन कार्ड चाहिए और सरकारी योजनाआें के लिए आधार कार्ड. रेल में सफर करने के लिए भी कोई न कोई पहचानपत्र जरूरी है.

यदि बैंक खाता खुलवाने जाएं तो वहां भी राशन कार्ड मांगा जाता है जबकि बैंक राशन नहीं बांटते, फिर राशन कार्ड क्यों, जिस का इस्तेमाल सिर्फ राशन के लिए होना चाहिए. यह बड़ी अजीब बात है कि फिर क्यों राशन की दुकान पर पैन कार्ड या डैबिट कार्ड दिखाने से राशन नहीं मिलता.

यहां जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ का कथन उल्लेखनीय है कि बैंक में खाता खुलवाने जाने वाला हर शख्स कोई मनी लौंडरर या आतंकी नहीं होता, लेकिन उस के साथ बरताव ऐसा ही किया जाता है कि पते का सुबूत लाओ, फोटो आईडी लाओ, 2 गवाहों की सिफारिश लाओ. तब कहीं जा कर खाता खुलेगा.

पासपोर्ट बनवाने में तो लोगों को रोना आ जाता है. जन्मतिथि से ले कर शरीर के तिल तक पासपोर्ट महकमा गिनवा लेता है. दर्जनों कागजी खानापूर्तियों के बाद शुरू होता है पुलिस वैरिफिकेशन का दौर जो कहने को ही सरल हुआ है, लेकिन व्यवहार में अब भी कठिन है. अब आप औनलाइन आवेदन भर सकते हैं पर सत्यापन के लिए पुलिसवाला घर जरूर आएगा और पड़ोसियों से भी आप के चरित्र का प्रमाणपत्र लेगा.

ऐसी तमाम बंदिशों के बाद भी धोखाधड़ी और अपराध रुक नहीं रहे हैं. उलटे, बढ़ रहे हैं. इस की बड़ी वजह भ्रष्टाचार है, घूसखोरी और बेईमानी है जिस का किसी फैसले में कोई जिक्र नहीं होता क्योंकि मंशा सरकार की हां में हां मिलाने की रहती है.

एक पहचान साबित करना कैसेकैसे लोगों का जीना दुश्वार कर रहा है, इस से किसी को कोई वास्ता नहीं. आप होटल में कहीं ठहरें तो वहां भी फोटो आईडी दिखानी होती है जिस का कोई औचित्य नहीं. इस व्यवस्था की मंशा यह थी कि अपराधी या गलत लोग होटल में ठहरें तो अपराध होने पर उन की पहचान हो जाए, लेकिन यह किसी ने नहीं सोचा कि जिसे अपराध करने के लिए होटल में ठहरना होगा वह असली पहचानपत्र क्यों देगा, अपराधियों के पास ही नकली और फर्जी पहचानपत्र होते हैं. आम शरीफ लोग तो इन्हें बनवा ही नहीं सकते.

आधार का फर्जीवाड़ा

आधार संबंधी फैसले में अदालत ने फर्जी आधार कार्डों पर गौर नहीं किया है. आएदिन फर्जी आधार कार्ड बरामद किए जाते हैं. इसी साल अप्रैल में एक न्यूज चैनल ने जयपुर में स्टिंग औपरेशन करते हुए खुलासा किया था कि कैसे 200 से 500 रुपए में कोई भी नकली आधार कार्ड बनवा सकता है. ऐसी खबरें देशभर से आएदिन आती रहती हैं.

आदमी तो आदमी, इस देश में कुत्तों और बंदरों तक के फर्जी आधार कार्ड बनते हैं. मध्य प्रदेश के भिंड जिले में एक कुत्ते का आधार कार्ड बनने का मामला सुर्खियों में रहा था. यह कार्ड भिंड के कियोस्क सैंटर के औपरेटर आजम खान ने बनाया था. इस औपरेटर ने आधार कार्ड बनाने की एक खामी यह उजागर की थी कि आधार के रजिस्ट्रेशन के लिए 4 साल से कम उम्र के बच्चों की आंखों की रेटिना और फिंगर प्रिंट नहीं लिए जाते, जिस का फायदा उठाते उस ने अपने पालतू कुत्ते टफी, पिता शेरू खान का आधार कार्ड बना डाला और उस की जन्मतिथि 26-11-2009 दर्ज की. एक और दिलचस्प मामला मध्य प्रदेश के धार जिले से सामने आया था जिस में एक व्यक्ति कुत्ते के नाम से भी राशन ले रहा था.

आधार कार्ड को सरकारी महकमा कितने हलके में लेता है, इस के भी उदाहरण अकसर सामने आते रहते हैं. साल 2013 से ले कर अब तक लाखों आधार कार्ड कूड़े के ढेरोें पर अलगअलग जगह पड़े मिले हैं.

यह जानकर भी हैरानी व चिंता होती है कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में तो एक ऐसा गिरोह जून 2017 में पकड़ा गया था जिस ने आधार कार्ड के आधिकारिक सौफ्टवेयर को क्रैक कर ऐसे बदलाव कर डाले थे कि आधार कार्ड बनवाने के लिए न तो फिंगर प्रिंट की जररूत पड़ती थी न ही लोकेशन की. इस गिरोह के पकड़े जाने से एकलौती अहम बात यह उजागर हुई थी कि तकनीकी तौर पर कुछ भी मुमकिन है जिस पर सरकार या अदालत का कोई जोर नहीं चलता.

ऐसे में किस का आधार कार्ड नकली है, किस का असली, यह कौन तय करेगा. बिलाशक, इस की जिम्मेदारी सरकार की बनती है जो अकसर आधार कार्ड को ले कर सुरक्षा व गोपनीयता की गारंटी देती रहती है जबकि हकीकत में ऐसा है नहीं.

यह है हल अगर दस्तावेजों की अनिवार्यता खत्म कर उन्हें ऐच्छिक बना दिया जाए तो जरूर फर्जीवाड़ा रुक सकता है और कागजों की मार से कराहते लोगों को राहत मिल सकती है. लेकिन सरकार नहीं चाहती कि लोग सहूलियत से रहें, इसलिए उस ने शर्तों और अनिवार्यताओं से लोगों की पीठ पर इतना वजन रख दिया है कि लोग लड़खड़ाने लगे हैं.

ऐसा सिर्फ इसलिए कि सरकार की नजर में हर कोई चोरउचक्का, घोटालेबाज और बेईमान है. इस मानसिकता के चलते आधार को संवैधानिक करार देता ताजा फैसला लोगों को कोई राहत नहीं दे रहा, बल्कि भ्रम ही पैदा कर रहा है. हां, सरकार जरूर जीत गई है, जबकि आम लोग हार गए हैं.

तमाम तरह के पहचानपत्र आम

लोगों की निजता का हनन करते हैं और सरकार इसी निजता को अपनी मुट्ठी में रखना चाहती है. पैन कार्ड, वोटर कार्ड, ड्राइविंग लाइसैंस वगैरह निजता का हनन करते हैं पर आंशिक रूप से, आधार कार्ड को संवैधानिक दर्जा मिलने से सरकार की मुराद पूरी हो गई है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सरकार को छूट दे दी है कि वह जितनी चाहे, जैसी चाहे मनमरजी करे, उस पर कोई रोक नहीं. आम लोगों की निजता भंग हो, कोई बात नहीं. उन की रोजमर्रा जिंदगी दुश्वार हो, यह कोई बड़ी बात नहीं. राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़े, चलेगा. लोगों को पहचानपत्र देने के एवज में उन से क्या छीना जा रहा है, यह जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की टिप्पणियों से उजागर होता है. लेकिन अफसोस यह है कि तर्क और व्यावहारिकता की बात करने वाले हमेशा अल्पमत में रहते हैं और वे इस का अपवाद साबित नहीं हुए.

सवालों के घेरे में डिजिटल मीडिया?

जिस सोशल मीडिया को प्रिंट मीडिया का पर्याय बताया जा रहा था, असल में वह अफवाहें फैलाने का माध्यम बन कर रह गया है. दरअसल, यह सोशल मीडिया नहीं, डिजिटल मीडिया है, जिस को सोशल साइट्स के जरिए फैलाया जाता है. डिजिटल मीडिया में ज्यादातर भ्रामक, तथ्यहीन और गालियों से भरे संदेशों का आदानप्रदान किया जाता है. जातीय द्वेषभावना से भरे संदेश सब से ज्यादा प्रचारित किए जाते हैं. यही वजह है कि अब समाज में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस पर नजर रखने के उपाय सोचे जा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एसएसपी कलानिधि नैथानी ने सोशल साइट्स पर नजर रखने के लिए एक अलग टीम तैयार की है. यह टीम साइबर क्राइम सैल के साथ मिल कर काम करेगी. यह टीम कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सोशल साइट्स पर चल रहे आपत्तिजनक औडियोवीडियो और संदेशों पर नजर रखेगी.

लखनऊ के एसएसपी कलानिधि नैथानी ने बताया, ‘‘लोग व्हाट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर पर आपत्तिजनक मैसेज पोस्ट कर उलटेसीधे कमैंट करते हैं, जिस से कानून व्यवस्था बिगड़ने का खतरा रहता है. ऐसी पोस्ट पर नजर रखने के लिए पुलिस की एक टीम बनाई गई है. इसे पहले से बने साइबर क्राइम सैल के साथ अटैच किया गया है. यह 24 घंटे सोशल साइट्स पर नजर रखेगी.

‘‘कुछ लोग दूसरे शहरों और प्रदेशों के पुराने वीडियो पोस्ट करते हैं, जिस से समाज का माहौल बिगड़ने का खतरा बना रहता है. ग्रुप ऐडमिन पर भी कार्यवाही की जा सकती है. ग्रुप ऐडमिन को चाहिए कि वह अपने ग्रुप से ऐसे लोगों को तत्काल निकाल दे जो भड़काऊ पोस्ट भेजते हैं. ऐसे मैसेजेज को आगे न बढ़ाएं, न ही उन पर कमैंट करें, बल्कि इस बारे में पुलिस को सूचित करें.’’

विचार नहीं गालियां

समाज में मीडिया की प्रमुख भूमिका है. डिजिटल मीडिया, जिसे सोशल मीडिया कहा जाने लगा है, पर विचारों की जगह गालियां दी जाती हैं. भड़काऊ संदेश बिना किसी तथ्य के एकदूसरे को फौरवर्ड किए जा रहे हैं. कई शहरों में हुई हिंसक वारदातों में डिजिटल मीडिया की भूमिका संदिग्ध पाई गई. वहां समयसमय पर इंटरनैट की सेवाओं पर रोक लगानी पड़ती है. इस की सब से बड़ी वजह है डिजिटल मीडिया, जहां भड़काऊ मैसेज बिना किसी आधार के आगे बढ़ाए जाते हैं.

मोबाइल की जानकारी पर निर्भरता ने लोगों को अधकचरा ज्ञान देना शुरू किया है. किसी का विरोध करना हो तो उस के खिलाफ मोबाइल के जरिए झूठी बातें फैलाना सरल हो गया है. घर के झगड़े चौराहों तक पहुंचने लगे हैं. पतिपत्नी के रिश्तों में दरार का बड़ा कारण भी यही डिजिटल मीडिया बनता जा रहा है.

मनमुटाव की छोटीछोटी बातों को भी खबरों की तरह परोसा जाने लगा है. लोग इन्हें चटखारे ले कर पढ़ते और बेसिरपैर के कमैंट करते हैं. असल में इस प्लेटफौर्म पर मैसेज फौरवर्ड करने वालों को पता ही नहीं होता कि वे खुद की जानकारी नहीं, बल्कि दूसरों के द्वारा फैलाई जा रही भ्रांतियों को फैलाने का काम कर रहे हैं. जो रिश्ते आपसी बातचीत के बाद शायद टूटने से बच जाते, वे अब टूटने लगे हैं.

3 तलाक की परेशानी को देखें तो यह तब से और भयावह हो गई है जब से डिजिटल मीडिया का दौर आया. अब फोन, व्हाट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर तक पर 3 बार तलाक कह कर तलाक देने की प्रक्रिया शुरू हो गई, जो औरतों को हलाला जैसी कुप्रथा से गुजरने को मजबूर करती है. डिजिटल मीडिया अपना वजूद खोने की वजह से सवालों के घेरे में है.

सच के लिए पृष्ठ चाहिए

डिजिटल मीडिया में मीडिया जैसी गंभीरता, सोच और विचार का पूरा अभाव है. यहां सही जानकारी देने वाली सामग्री नहीं होती. डिजिटल मीडिया पर जो सामग्री मौजूद होती है उस पर आंख बंद कर के भरोसा नहीं किया जा सकता. आज भी लोगों को सच का पता अखबार व पत्रिकाओं के छपे हुए पृष्ठों को पढ़ कर ही लाता है. यहां जो सामग्री है उस के गलत होने की आशंका नहीं होती. इस की वजह है कि छपे हुए पृष्ठों की जिम्मेदारी लेने वाले होते हैं.

डिजिटल मीडिया पर जो संदेश या सामग्री फैलाई जा रही है उस की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं है. इस वजह से इस की प्रामाणिकता संदेह के घेरे में रहती है. भेजने वाला व्यक्ति भी इस की जिम्मेदारी नहीं लेता है. कानून भी इन को सुबूत के तौर पर नहीं मानता है.

भरोसा खोता डिजिटल मीडिया

प्रामाणिकता संदेह के घेरे में होने के कारण डिजिटल मीडिया हाशिए पर है. इस का प्रयोग केवल अफवाहों के लिए ही नहीं होता बल्कि कई बार ऐसी बातों को फैला कर राजनीतिक लाभ भी खूब उठाए जाते हैं. प्रिंट मीडिया कभी भी ऐसे भ्रामक संदेशों का प्रचार नहीं कर सकता है. प्रिंट मीडिया की अपनी विश्वसनीयता इसलिए है क्योंकि वहां पर संपादकीय स्तर पर सहीगलत को तय करने के बाद ही आगे भेजा जाता है.

फैमली कोर्ट में आने वाले विवादों में डिजिटल मीडिया आने के बाद तेजी से बढ़ोतरी हुई है. इस में ज्यादातर शिकायतें सोशल मीडिया को ले कर होती हैं. केवल 3 तलाक पर ही नहीं, अलगाव के मुकदमों में भी इस की भूमिका बढ़ गई है.

यह बात जरूर है कि विरोधी दलों को जवाब देने और अपनी कहीअनकही बातों के प्रचार में राजनीतिक पार्टियों ने अपनी आईटी सैल को ऐक्टिवेट कर रखा है. अब आईटी सैल में काम करने वाले को भी ऐसे देखा जाता है जैसे वह भ्रामक प्रचार करने वाला हो.

इमेज कंसल्टैंट सौम्या चतुर्वेदी कहती हैं, ‘‘डिजिटल मीडिया का प्रयोग इमेज बनाने के लिए होता था. अब इस के जरिए इमेज बिगाड़ने का काम होने लगा है.

‘‘कम योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी डिजिटल मीडिया के  जरिए खुद के विषय में बढ़ाचढ़ा कर बताने लगता है. लोग उसे सच मान कर अपना नुकसान कर रहे होते हैं. कम जानकारी रखने वाले भी खुद को ट्रैंड समझ कर अपना प्रचार करते हैं. ऐसे में डिजिटल मीडिया खुद भरोसा खो बैठा है. अब लोगों ने इस के संदेशों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है. एक बार फिर से लोग यह सोचने को मजबूर हो रहे हैं कि लिखीपढ़ी बातें ही भरोसेमंद होती हैं.’’

हमें सुरक्षित रखने को तैनात बुद्धिमान कुत्ते

स्निफर डौग उन कुत्तों को कहते हैं जिन्हें बुद्धिमत्तापूर्ण गतिविधियों को अंजाम देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. इन कुत्तों में यह सैंस या इंद्रिय ज्ञान उन की घ्राणेंद्रिय यानी सूंघने की शक्ति की बदौलत होता है. कुत्तों में सूंघने की जबरदस्त क्षमता होती है. इंसान के मुकाबले ये 2 हजार फीसदी ज्यादा सूंघ सकते हैं. इसलिए ये स्निफर डौग यानी बुद्धिमान कुत्ते आज की इस दहशतभरी दुनिया में हमें सुरक्षित रखने की भरपूर कोशिश करते हैं.

आतंकवादी कहीं भी और कभी भी हमें नुकसान पहुंचा सकते हैं. ये कुत्ते छिपा कर रखे गए विस्फोटकों का पता लगाने, अवैध मादक पदार्थों को ढूंढ़ने तथा हत्या व हत्यारे का पता लगाने में हमारी भरपूर मदद करते हैं.

कुत्ते खोजबीन के हमारे सब से बड़े उपकरण हैं. अगर कुत्ते न हों तो हत्यारे, चोरडकैत आदि को पकड़ने में काफी मुश्किल आए. यदि ये कुत्ते न हों तो मादक द्रव्यों की तस्करी को रोकना कभी भी इतना आसान न हो. आमतौर पर हम कुत्तों को छिपना और ढूंढ़ना खुद ही सिखाते हैं या कहा जाए इन के प्रशिक्षण की शुरुआत ऐसे ही खेलखेल में शुरू होती है.

कई लोगों का मानना है कि हत्यारों और छिपाए गए विस्फोटकों को ढूंढ़ना एकजैसा काम है. मगर ऐसा है नहीं. खोए हुए इंसानों को ढूंढ़ना और छिपाए गए मादक पदार्थों को ढूंढ़ना दोनों अलग तरह के काम हैं.

काम अलग, कुत्ते अलग

यही वजह है कि दोनों कामों को अंजाम देने के लिए अलगअलग तरह के कुत्तों का इस्तेमाल होता है.

मादक पदार्थों का पता लगाने के लिए आमतौर पर डिटैक्शन डौग्स का इस्तेमाल होता है, जबकि इंसानों को ढूंढ़ने या किसी चीज को उठा कर लाने के लिए सर्च डौग्स ज्यादा कारगर होते हैं. उन्हें कभीकभार काडेवर डौग्स भी कहते हैं. इन का इस्तेमाल अवैध दवाइयों को पकड़ने के दौरान मारे गए छा?पों में होता है. यदि कोई वीआईपी आ रहा हो तो सुरक्षा व्यवस्था चाकचौबंद करने के लिए आगमन से पहले डिटैक्शन डौग्स को घुमाया जाता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि दुश्मन ने कहीं अपने शरीर पर कोई विस्फोटक तो नहीं बांध रखा है.

दुनियाभर में कुत्तों को प्रशिक्षित किया जाता है, क्योंकि पूरी दुनिया में सुरक्षा व्यवस्था संकट में है. हर तरफ आतंकियों ने दहशत का जाल बिछा रखा है. उन की साजिश का शिकार होने से बचने के लिए इन कुत्तों की मदद ली जाती है.

पक्की गारंटी नहीं

यह नहीं कहा जा सकता कि कुत्ते सौ फीसदी छानबीन की गारंटी देते हैं. यह भी कहा जा सकता है कि यदि कुत्ते न हों तो यह एक मुश्किलभरा और असुरक्षित मामला बन जाता है. घ्राणेंद्रिय के साथसाथ कुत्ते की श्रवणेंद्रिय भी बहुत तेज होती है. वह मामूली खुसुरफुसर भी आराम से सुन लेते हैं. लेकिन इस बातचीत को जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचा पाते, क्योंकि उन्हें यह पता नहीं होता कि इसे कैसे व्यक्त किया जाए. तमाम जेलों में भी कुछ ऐसे कुत्ते होते हैं जो यह पता लगाते हैं कि कैदी ने अपने पास अवैध रूप में मोबाइल फोन तो नहीं रखा है और जेल के बाहर अपने साथियों से संपर्क स्थापित तो नहीं कर रहा है.

कुत्तों के सूंघने की इस अद्भुत क्षमता का इस्तेमाल काफी सारे कामों के लिए होता है. सरहद पर तैनात सैनिक भी इन कुत्तों का फायदा उठाते हैं. वे इन प्रशिक्षित कुत्तों का इस्तेमाल सरहद पार चल रही दुश्मन की गतिविधियों को जाननेसमझने के लिए करते हैं. सेना और अर्धसैनिक बलों में इन कुत्तों का इस्तेमाल इतना बढ़ गया है कि बाकायदा इन के प्रशिक्षण के लिए सेना में इन के विभाग तक होते हैं.

पुलिस के पास भी अपना डौग स्क्वैड होता है. देश में सेना और अर्धसैनिक बलों के लिए कुत्तों को ग्वालियर और झांसी के बीच एक बड़े डौग फार्म में ट्रेन किया जाता है.

गौरतलब है कि देश में कुत्तों को प्रशिक्षण देने के लिए कई बड़बड़े फार्म हैं. आजकल बड़े पैमाने पर जिस तरह सीडी, डीवीडी, नकली मुद्रा आदि का संकट गहरा रहा है, इन सब की रोकथाम में भी कुत्तों का इस्तेमाल होता है.

इस तरह देखा जाए तो कुत्ते न सिर्फ पारंपरिक आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं बल्कि जरूरत के हिसाब से वे आपराधिक गतिविधियों को रोकने में भी मदद पहुंचाते हैं. इस से यह पता चलता है कि कुत्ते वक्त के हिसाब से अपनी प्राथमिकताओं और अपनी बुद्धिमत्ता को भी विकसित करते हैं.

सुरक्षा के मापदंड

एक तरफ जहां कुत्तों का प्राचीनकाल में इंसान अपने पारंपरिक कामों में सुरक्षा के लिहाज से इस्तेमाल करता था, वहीं आज जब सुरक्षा के माने बदल गए हैं तब भी कुत्तों की उपयोगिता बची हुई है, लेकिन हमेशा कुत्तों के इस्तेमाल को जायज नहीं ठहराया जाता. कई बार यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता पर हस्तक्षेप जैसा होता है.

दुनिया की तरह भारत में भी तमाम तरह की आपराधिक व आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए स्निफर डौग्स का इस्तेमाल किया जाता है जो अपनी सूंघने की क्षमता से तमाम अपराधों को रोकने में मदद करते हैं. कुत्तों की इस संबंध में उपयोगिता कई बार तो आधुनिक मशीनी उपकरणों से भी ज्यादा सटीक होती है.

यही कारण है कि रेलवे स्टेशनों, हवाई अड्डों, राज्य व केंद्र सरकारों के महत्त्वपूर्ण दफ्तरों आदि में आतंकवादी गतिविधियों से बचने के लिए सीसीटीवी कैमरे से कहीं ज्यादा भरोसा इन कुत्तों पर किया जाता है.

कई चीजें सीसीटीवी कैमरे, डोरफ्रेम और मैटल डिटैक्टर से पकड़ने में छूट जाती हैं, वहां प्रशिक्षित कुत्ते काम आते हैं. इस में कोई शक नहीं कि हाल के वर्षों में विभिन्न तरह के विस्फोटकों का पता लगाने में तमाम संवेदनशील उपकरण विकसित किए गए हैं, लेकिन ये तमाम उपकरण उपयोगिता के नजरिए से जासूस कुत्तों या कहें प्रशिक्षित कुत्तों के मुकाबले कुछ भी नहीं हैं. इसलिए तमाम उपकरणों के विकास के बावजूद कुत्तों की उपयोगिता घटी नहीं, बल्कि बढ़ी है.

आज देश के सभी संवेदनशील क्षेत्रों में खासकर उन सभी जगहों पर जहां बड़े पैमाने पर भीड़ इकट्ठी होती है, ऐसे कुत्तों की जरूरत कहीं ज्यादा बढ़ गई है.

अब सुरक्षा समस्याएं इतनी जटिल और विशिष्ट हो गई हैं कि सभी महकमे चाहते हैं कि कुत्ते उन की खास जरूरतों को ध्यान में रख कर ही प्रशिक्षित किए जाएं. यही कारण है कि आज डौग प्रशिक्षण केंद्रों से विभिन्न महकमे अपनी खास जरूरतों को ध्यान में रख कर कुत्तों को प्रशिक्षित किए जाने की मांग करते हैं. इस के लिए वे अतिरिक्त भुगतान करने को भी तैयार हैं.

तमिलनाडु के पोडुनूर तथा राजधानी दिल्ली के दयाबस्ती इलाके में स्थित डौग ब्रीडिंग ऐंड ट्रेनिंग सैंटर में खास जरूरतों के लिए मांगे जाने वाले कुत्तों की अच्छीखासी फेहरिस्त तैयार हो गई है.

यही कारण है कि अब गंभीरता से सोचा जा रहा है कि तमाम शहरों व महकमों की खास जरूरतों और भूगोल को ध्यान में रखते हुए ऐसा ट्रेनिंग सैंटर खोला जाए.

इसी तरह रेलवे की जरूरतों को ध्यान में रख कर उस के 8 जोनल कार्यालयों वाले शहरों में भी खास उसी के लिए डौग ट्रेनिंग ऐंड ब्रीडिंग सैंटर शुरू किए जाएंगे.

कुत्तों के प्रशिक्षण, उन के रखरखाव और इस्तेमाल में 100 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की रकम खर्च हो रही है. अनुमान है कि 2020 तक यह राशि बढ़ कर 2,500 करोड़ रुपए से ले कर 3,000 करोड़ रुपए तक हो जाएगी, जो इस बात का सुबूत है कि आने वाले दिन सुरक्षा के लिहाज से कितने संवेदनशील और आतंकी गतिविधियों के नजरिए से कितने खौफनाक होंगे.

रिटायर्ड कुत्तों को पैंशन

वर्ष 2020 तक देश में अनुमान है कि प्रशिक्षित कुत्तों की फौज बढ़ कर 2,500 तक हो जाएगी, जिस में कुछ तो रिटायर्ड हो जाएंगे. मालूम हो कि पुलिस या फौज में स्निफर डौग्स को उसी तरह से रिटायरमैंट दी जाती है जैसे फौजियों और पुलिस वालों की होती है. यही नहीं, इन्हें भी बाकायदा पैंशन दी जाती है और वह पैंशन 5,000 रुपए महीने से कम नहीं होती. यह सब इसलिए किया जाता है ताकि रिटायर्ड होने के बाद कोई स्निफर डौग लाचार जिंदगी जीने को मजबूर न हो.

रिटायर्ड होने के बाद इन की हालत पहले काफी खराब हो जाती थी. मसलन, ये अपनी रूटीन लाइफ से कट कर बेचैनी महसूस करते थे. साथ ही, इन की ठीक से देखरेख के लिए भी कोई नहीं होता था. अगर किसी ने सहज मानवीयता के चलते इन की देखरेख की भी तो उस के पास उतने संसाधन नहीं होते थे, जितने संसाधनों की जरूरत पड़ती थी. यही वजह है कि सरकार ने इस तरफ ध्यान दिया और इन के रिटायर्ड होने पर इन की पैंशन को एक अच्छे अमाउंट में तबदील किया.

इस तरह इन्हें ड्यूटी के दौरान खूब तवज्जुह मिलती है, क्योंकि इन के कंधों पर ही सुरक्षा का भार होता है.

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