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हाथ में बंदूक और सरकार का भगवा कवच

जिस के हाथ में बंदूक और ऊपर से सरकार का भगवा कवच हो, उस की शक्ति तो अपरंपार है. ऐसा हमारे ग्रंथों में लिखा है, बस, फर्क यह है कि वहां बंदूक की जगह तीरकमान या चक्र होता था. उत्तर प्रदेश पुलिस चूंकि राम और कृष्ण की भूमि की है, उस के पास ग्रीन सिगनल है कि वह इन अधिकारों का निश्चिन्त हो कर उपयोग करे.

सितंबर के अंतिम दिनों में लखनऊ में जिस कौंस्टेबल ने कार न रोकने पर उस के चालक को रिवौल्वर की गोली से मार डाला, उस ने कोई गुनाह नहीं किया. वह तो मृतक विवेक तिवारी को उस के पापों का फल मिला है और कौंस्टेबल प्रशांत अपने ऊपर वाले द्वारा दिए अधिकारों का पालन कर रहा था. स्वयं ईश्वर के अवतार ने आदेश दे रखा है कि प्रदेश के सारे दस्युओं को मारमार कर समाप्त कर दो चाहे उन के अपराध साबित हुए हों या न हों. दस्युओं का उन्मूलन करना हर ऋषिमुनि और उन के इशारों पर चल रहे दासों का प्रमुख कर्तव्य है. उत्तर प्रदेश व दूसरे कई राज्यों की सरकारें इसे भलीभांति निभा भी रही हैं.

पुलिस हर देश में निरंकुश ही होती है. उम्मीद थी कि हमारा लोकतंत्र और मीडिया उस पर नकेल कसने में सफल होंगे पर लगता है यह केवल खयाली पुलाव है. जिस विवेक तिवारी को बिना अपराध किए मार डाला गया है उस पर रोष प्रकट करने से कुछ नहीं होगा. ऐसा करना, असल में, राष्ट्रद्रोहियों के हाथों में खेलना होगा. यह स्पष्ट है कि आज हर पुलिस अफसर स्वयं शक्तिपुंज है और उसे अपने मुख्यमंत्री से अभयदान मिला हुआ है.

प्रायश्चित्त के रूप में यह कौंस्टेबल कुछ दिन जेल में बने सुविधाजनक घर में रहेगा, फिर छूट जाएगा और बाद में भगवा पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ कर विधायक बन जाएगा. ऋषिमुनियों की सेवा करने वालों को मेवा मिलता है, यह आज स्पष्ट है. और जो सेवा करता है वह मां की हत्या करते हुए, अवतार परशुराम की तरह पूछता भी नहीं कि गलत क्या है और सही क्या है.

शर्मनाक : हद पर है गौरक्षकों की गुंडई

राजस्थान के अलवर में एक बार फिर तथाकथित गौरक्षकों ने एक शख्स की पीटपीट कर हत्या कर दी. हरियाणा के नूंह में रहने वाले अकबर को पीटपीट कर मार डाला गया. अलवर में गौरक्षकों के हाथों यह ऐसी तीसरी वहशी वारदात है जब भक्तों की भीड़ ने किसी को गौतस्करी के नाम पर मौत के घाट उतारा है. पिछले साल ऐसे ही पहलू खान और उमर खान की भी हत्या कर दी गई थी.

पुलिस के मुताबिक, अकबर पर शुक्रवार, 19 जुलाई, 2018 की आधी रात को उस वक्त हमला किया गया, जब वे 2 गायों के साथ पैदल हरियाणा जा रहे थे. उन के साथ असलम भी था. असलम ने भाग कर जान बचाई मगर भीड़ ने अकबर को गौतस्कर समझ कर इतना पीटा कि अस्पताल ले जाने के दौरान ही उन्होंने दम तोड़ दिया.

प्रशासन की लापरवाही

अलवर में अस्पताल के बाहर मौजूद लोगों के बीच मौलाना हनीफ ने कहा, ‘‘अगर पहलू खान के मामले में सख्त कार्यवाही की गई होती तो उमर नहीं मारा जाता. ऐसे ही अगर उमर की हत्या पर भारतीय जनता पार्टी की हुकूमत कड़ा रुख अपनाती तो अकबर की जान नहीं जाती. इन वारदातों ने लोगों में डर पैदा कर दिया है. इस दुख की घड़ी में बहुसंख्यक समाज के लोग हमारे साथ खड़े हैं, यही हमारे लिए बड़ा संबल है.’’

कोलगांव के इस्हाक अहमद कहते हैं, ‘‘अकबर की पत्नी और बच्चों की हालत देखी नहीं जाती. अकबर के 7 बच्चे हैं. उस के परिवार को हौसला देने के लिए सभी तबकों के लोग पहुंचे हैं.’’

इस्हाक अहमद के मुताबिक, पहले अकबर के पिता दूध बेचते थे और डेरी चलाते थे. पिछले कुछ समय से अकबर ने अपने पिता का काम संभाल लिया था. इसी काम के लिए वे गाय खरीद कर ला रहे थे.

मेव समुदाय के सद्दाम कहते हैं, ‘‘मेव बिरादरी के लोग पशुपालन और खेतीबारी कर के अपनी गुजरबसर करते हैं. सरकारी आंकड़ों के हिसाब से अलवर जिले में 2 लाख से ज्यादा गौधन हैं. यह क्षेत्र मेवात का हिस्सा है जो हरियाणा तक फैला हुआ है.’’

तथाकथित गौरक्षकों के हाथों पहलू खान की हत्या के बाद मानवाधिकार संगठनों ने सरकार की खूब खिंचाई की थी. पुलिस ने पहलू खान के मामले में

9 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था. मगर बाद में पुलिस ने जांच में उन में से 6 लोगों को यह कह कर क्लीन चिट दे दी थी कि उन के खिलाफ सुबूत नहीं मिले. आज तक गौरक्षक भगवा दुपट्टों के साए में छुट्टे सांड़ों की तरह घूम रहे हैं.

राजस्थान में महज 5 दिनों में ही गौरक्षकों की गुंडई की यह दूसरी वारदात थी. इस के पहले कोटा में तथाकथित गौरक्षकों ने मध्य प्रदेश में दूध की डेरी चलाने वाले प्रवीण और उस के ड्राइवर अहमद को घेर कर पीटा था.

प्रवीण अपनी डेरी के लिए जयपुर से गाय खरीद कर देवास ले जा रहे थे. प्रवीण ने खुद के ब्राह्मण होने की दुहाई भी दी, मगर गौरक्षकों ने रहम नहीं किया.

हिंसक बनते गौरक्षक

सितंबर, 2011. गुजरात के एक समारोह में मंच पर बैठे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी खेड़ा के इमाम शाही सैयद महंदी हुसैन बाबा के हाथ से मुसलिमों की गोल टोपी पहनने से इनकार कर देते हैं. राजस्थान के अलवर शहर में 13 साल का विपिन यादव अपने घर में टैलीविजन पर यह सब देख रहा?है.

मार्च, 2017. रुद्राक्ष की भारी मालाओं से लदे हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी की एक गौशाला में गायों को हरा चारा और गुड़ खिलाते हैं.

विपिन यादव अब 19 साल का जवान ‘गौरक्षक’ बन चुका है और अपने घर में टैलीविजन पर प्रधानमंत्री मोदी की गौसेवा को भी देख रहा है. अप्रैल, 2017. अलवर के पास 55 साल के पहलू खान मेले से खरीदी गायों को एक ट्रक पर लाद कर अपने साथियों के साथ जा रहे हैं. लंबी दाढ़ी से ही पता चल जाता है कि वे मुसलिम हैं.

रास्ते में गौरक्षकों का एक दल गाड़ी रोकता है, क्योंकि उसे शक है कि गायों को कसाईखाने ले जाया जा रहा है. वे लोग उस ट्रक को रोक कर पहलू खान और उस के साथियों को नीचे खींच लेते हैं और दौड़ादौड़ा कर पीटते हैं.

बाद में पुलिस कहती है कि विपिन यादव इन में सब से आगे था और पहलू खान बाद में अस्पताल में दम तोड़ देते हैं.

आप पूछ सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गाय को चारा खिलाने या फिर गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मुसलिम टोपी पहनने से इनकार करने और पहलू खान को पीटपीट कर मार डालने की घटना में क्या संबंध है?

कोई सीधा संबंध नहीं है. मुमकिन है कि विपिन यादव ने टैलीविजन पर वे सीन देखे ही न हों, लेकिन 13 साल के बच्चे से गौरक्षक बनने के सफर में जिन प्रतीकों ने उस पर असर डाला होगा, उन में वे नरेंद्र मोदी जरूर रहे होंगे जो मुख्यमंत्री होने के बावजूद मुसलिम की टोपी को खारिज करने में हिचकते नहीं हैं और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी हजार काम छोड़ कर गौसेवा के लिए तैयार रहते हैं.

कहां से मिली ताकत

जब नरेंद्र मोदी ने 2002 में गुजरात के मुसलिम विरोधी दंगों के बाद कहा था, ‘गुजरात में जो मैं ने किया है उस के लिए 56 इंच की छाती होनी चाहिए.’ तो इस बयान के पीछे का संदेश किसी से छिपा नहीं रहा था.

यानी राजनीतिक गोलबंदी के लिए भीड़ का इस्तेमाल किया जाता रहा है. खुली सड़क पर अपने दुश्मन की निशानदेही कर उसे मार देने वाले लोगों को भरोसा रहता है कि परदे के पीछे से उन्हें शासनतंत्र की मदद और समर्थन मिलेगा, इसलिए तो अब वे अपनी हिंसक हरकतों के वीडियो तैयार कर के सोशल मीडिया पर भी डालने लगे हैं.

इसे और ताकत तब मिलती है, जब कोई जज रिटायर होने से एक दिन पहले गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की सिफारिश करता है या फिर अदालत के आदेश में गाय को राष्ट्रधन बताया जाता है.

ऐसे अदालती आदेशों से भीड़ की सोच और उस का जोश बढ़ता है कि वह सड़क पर उतर कर जो चाहे कर सकती है, पुलिस उस के खिलाफ कार्यवाही नहीं करेगी और अगर करेगी भी तो अदालत में जजों की ओर से भी उस के प्रति नरम रवैया अपना लिया जाएगा.

सितंबर, 2015 में दादरी में हिंदुओं की भीड़ ने 50 साल के अखलाक को उन के घर से खींच कर बाहर निकाला और पीटपीट कर मार डाला, क्योंकि हमलावरों को शक था कि अखलाक ने अपने फ्रिज में गौमांस रखा था.

इस मामले में हमलावरों के प्रति सख्त रुख अपनाने के बजाय भाजपा नेता और मोदी कैबिनेट में संस्कृति मंत्री महेश चंद्र शर्मा का बयान आया कि इसे दुर्घटना माना जाए और इसे किसी भी तरह का सांप्रदायिक रंग न दिया जाए.

और जब एक मुलजिम की जेल में बीमारी से मौत हो गई तो उस के शव को तिरंगे में लपेटा गया और महेश चंद्र शर्मा उस के सामने दोनों हाथ जोड़ कर ऐसे खड़े हुए जैसे सीमा पर दुश्मन से लड़ते हुए मारे गए किसी शहीद को श्रद्धांजलि दे रहे हों. ऐसा समर्थन मिलने पर हिंसक गिरोह का हिस्सा बनना फख्र की बात हो जाती है.

राजस्थान यूनिवर्सिटी से जुड़े समाजशास्त्री अजय चिरानियां कहते हैं, ‘‘यह नशे की लत की तरह होती है. मैं नशे का आदी हो जाता हूं और नशा करता हूं पर आप को यह पता नहीं लगेगा कि नशीली दवाओं का सप्लायर कौन है.’’

मुंहबोले रिश्तों में शादी, आखिर क्या है इनकी असलियत

‘आप तो हिंदू लगते हो. करीबी और मुंहबोली रिश्तेदारियों में शादियां तो मुसलिमों में होती हैं…’

उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में इस तरह की सोच देखने को मिलती है, जबकि ऐसा नहीं है कि यह सब हिंदू धर्म में नहीं होता. हिंदू धर्म के भीतर भी इस तरह की कई परंपराएं हैं और इन में कुछ गलत नहीं है, लेकिन ऐसे मसलों पर यहां एक बड़ा तबका मरनेमारने को उतारू हो जाता है.

दरअसल, यह हमारी कमअक्ली का नतीजा है. इस के अलावा यह भी सच है कि आज ऐसा समय है जब हिंदू धर्म को ले कर एक खास तरह की संस्कृति थोपने की कोशिश की जा रही है और इस से अलग हर बात को पश्चिमी संस्कृति या मुसलिमों से जोड़ कर खारिज करने की कोशिश की जा रही है.

ऐसे समय में यह जानना बेहद जरूरी है कि उत्तर भारत ही पूरा देश नहीं है और वही सही नहीं है जो हम जानते या मानते हैं.

आप यह भी जान लीजिए कि उत्तर भारत में भी शादीब्याह को ले कर कोई एक तरह की मान्यता या परंपरा नहीं है.

पहला हक इन का चाय की दुकान पर महाराष्ट्र के एक नौजवान लोकेश जाधव से मुलाकात हुई. लोकेश ने बताया कि उस की शादी उस के सगे मामा की बेटी से हुई है.

यह सुन कर हमारी बगल में बैठे कुछ नौजवानों में कानाफूसी शुरू हो गई. वे नौजवान बोलचाल से हरियाणा के लग रहे थे और लोकेश की तरह ही शायद घूमने के इरादे से वे भी जयपुर आए थे.

तिलक  लगाए और शिव की तसवीर वाली टीशर्ट पहने बैठे नौजवान के मुंह से बहन के साथ शादी की बात उन्हें अजीब लगी.

आखिरकार एक नौजवान ने कहा, ‘‘आप तो हिंदू लगते हो. इस तरह की शादियां तो मुसलिमों में होती हैं.’’

लोकेश जाधव ने हैरानी जताई और कहा, ‘‘हमारे यहां यह मामूली बात है. मेरे मामा ने कहा तो इनकार करना नैतिकता भी नहीं थी. मेरी सरकारी नौकरी लगी तो मेरी मां ने ही कह दिया था कि तुझ पर पहला हक तेरे मामा की बेटी का ही बनता है.’’

मुझे कोई हैरानी नहीं हुई. कई साल पहले केरल जाते हुए रेलगाड़ी में आंध्र प्रदेश के एक नौजवान वेंकट से मेरी मुलाकात हुई थी. लंबे सफर में सीटें एकसाथ होने की वजह से हमारी थोड़ी जानपहचान हो गई थी.

वेंकट की नईनई सरकारी नौकरी लगी थी और उस की पोस्टिंग एर्नाकुलम में थी. अगले महीने उस की शादी थी.

मैं ने कहा कि दहेज बटोरेगे, तो वह बोला कि बहन की बेटी से शादी है. मैं ज्यादा दबाव नहीं दे सकता. सरकारी नौकरी लगी है तो रिश्ते खूब आ रहे हैं, लेकिन पहला हक बहन की बेटी का ही है.

मैं ने इस बात का जिक्र करते हुए अपने इलाके के नौजवानों से कहा कि हिंदू धर्म कोई एक चीज नहीं है. इस में हजार परंपराएं मौजूद हैं. अच्छाबुरा, पवित्रअपवित्र हर जगह वही नहीं होता जो हमें किसी खास दायरे में पैदा होने के साथ घुट्टी की तरह पिला दिया जाता है.

रेलगाड़ी में ही एक बार एक ईरानी नौजवान फैसल मिला था. कजन से शादी की परंपरा का जिक्र आने पर उस ने बताया था कि मौसी की बेटी से शादी नहीं की जा सकती, क्योंकि मौसी तो मां ही ठहरी.

शायद हमारे इलाके में मुसलिमों में खाला के बेटाबेटी से शादी की मनाही नहीं है.

उस ईरानी नौजवान फैसल को हिंदी में सहज हो कर बातचीत करते देख कर मैं हैरान रह गया था, जबकि वह 3 महीने से ही भारत में था.

फैसल के मुताबिक, उसे अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान की फिल्मों ने हिंदी सिखाई है. मतलब यह कि वह ईरान में कंप्यूटर पर हिंदी फिल्में जम कर देखा करता था.

आंध्र प्रदेश के मेरे एक दोस्त ने अपनी बड़ी बहन की बेटी से शादी की थी और बताया था कि वहां यह मामूली बात है.

हैरानी तब होती है, जब 5 पतियों की एक पत्नी द्रौपदी और ब्रह्मा की अपनी लड़की सरस्वती से शादी को पवित्रता और मान्यता देने वाले नखरे दिखाते हैं.

मेरे एक परिचित राजपाल दहिया के मुताबिक, ‘‘15 साल पहले परिवार के साथ केरल जाने का मौका मिला. एक महिला ने स्वागत किया. घर चलने का आदेश हुआ. एक घर में ले जा कर बैठा दिया गया. चायपकौड़े लाए गए. परिचय होने पर होस्ट महिला ने अपने मम्मीपापा से मिलाया.

‘‘थोड़ी देर में एक नौजवान आया और बोला कि चलो, घर पर खाना तैयार है.

‘‘हम ने होस्ट महिला से पूछा कि कहां?

‘‘उस ने कहा कि मेरी ससुराल में.

‘‘कितनी दूर? पूछने वह बोली कि 100 मीटर.

‘‘ये कौन हैं? पूछने पर जवाब मिला कि पति.

‘‘बूआ का बेटा, वह भी ब्राह्मण.’’

मेरे एक और परिचित कुमार सत्येंद्र बताते हैं, ‘‘भारतीय नौसेना में नौकरी करने के दौरान मैं ऐसे संबंधों का गवाह रहा हूं और बिहारी होने के चलते कुछ हैरान भी हुआ था. पर ऐसे संबंध उन राज्यों के लिए बहुत ही मामूली बात हैं.’’

मेरे मुसलिम दोस्त अनवर अली कहते हैं, ‘‘हर जगह अलगअलग परंपराएं, मान्यताएं और रिवाज हैं. सभी को अपनीअपनी तरह से रहना पसंद है. रहनसहन, खानपान अलगअलग हैं. उन्हें एक सा नहीं बनाया जा सकता.

‘‘अनेकता में एकता भारत की शान रही है, जिसे कुछ लोग खत्म करना चाहते हैं. सभी धर्मों और रिवाजों का आदर करना जरूरी है.’’

अनिरुद्ध शर्मा बताते हैं, ‘‘केरल में मामाभांजी की शादी की प्रथा तो सैकड़ों सालों से है. हमारी दिक्कतें असल में यहीं से शुरू हो जाती हैं, जब हम उत्तर भारत को ही सारा जहां मान बैठते हैं.’’

विजयशंकर चतुर्वेदी बताते हैं, ‘‘कर्नाटक में वधू के मांबाप वर के साथ रहने चले आते हैं, जबकि गायपट्टी में बेटी के घर का पानी भी पीना हराम है.’’

कौशल किशोर बताते हैं, ‘‘उन्नाव और उस के पड़ोसी हरदोई, लखनऊ, रायबरेली, कन्नौज, कानपुर वगैरह जिलों में यादवों व कई पिछड़ी जातियों और कई दलित जातियों में सगे मामा की बेटी से शादी होना आम बात है.

‘‘मेरे गांव के पुराने रिश्तों में इस की तादाद आधे से भी ज्यादा होगी. यादवों में दिशा वाली शर्त होती है, जैसे बेटी की शादी पश्चिम और बेटे की शादी पूरब में. दूसरे लोगों में यह शर्त नहीं है.’’

नरेश सैनी बताते हैं, ‘‘हरियाणा में तो इस तरह की शादियां आम बात हैं. सगी मौसी व सगी बूआ की बेटी से शादी. सामान्य वर्ग व अनुसूचित परिवारों में ऐसी बहुत सी शादियों में मुझे खुद जाने का मौका मिला है.’’

कुछ दिन पहले ही 12वीं पास कर चुकी मेरी एक छात्रा की शादी उस की सगी बूआ के बेटे से हुई है. इस में हिंदूमुसलिम वाली कोई बात नहीं है.

पोल खुलते ही करते हैं वार, जालिम हैं धर्म के दुकानदार

इस साल जनवरी में चंडीगढ़  में शराब के एक ठेके व बार का उद्घाटन हुआ. बार के मालिक ने इस मौके पर पूजापाठ कराने के लिए धर्मगुरु बुला लिए. वे अपने धर्मग्रंथ समेत आए व पाठ कर के अपनी दानदक्षिणा ले कर चले गए.

तभी किसी ने धर्मस्थान के प्रबंधकों को खबर दे दी कि पवित्र ग्रंथ शराबखाने में रखा है जो उन के धर्म की बेइज्जती है. बस, फिर क्या था, वहां बवाल मच गया. बहुत देर बाद माफी मांगने पर मामला शांत हुआ.

धर्म के दुकानदार शराबियों के साथ होने से भी परहेज नहीं करते. वे बुराई में भी हिस्सेदारी निभाने के लिए धार्मिक कर्मकांड के जरीए मदद कर रहे हैं. ऐसी धार्मिकता किस काम की जो बुराई का साथ दे?

दरअसल, धर्म की किताबों में देवताओं द्वारा सुरापान करने का जिक्र भरा पड़ा है. काली व भैरव वगैरह के मंदिरों में शराब का भोग लगता है. प्रसाद में दारू बांटी जाती है, इसलिए चंडीगढ़ की घटना पहली या अकेली नहीं है. जहांतहां अकसर ऐसा होता रहता है. बरेली में भी अंगरेजी शराब की दुकान के उद्घाटन पर पूजापाठ हुआ था.

सच की खिलाफत

धर्म की दुकानदारी करने वाले पंडेपुरोहित नहीं देखते कि वे किस के बुलावे पर कहां और क्या करने जा रहे हैं. उन्हें सिर्फ अपनी दानदक्षिणा झटक कर जेब गरम करने से मतलब होता है.

धर्म के दुकानदार सत्य व अहिंसा की दुहाई तो देते हैं, लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए. उन की बुनियाद तो गढ़े हुए भगवान के झूठ पर टिकी रहती है. अपने मतलब के लिए तो वे हिंसा करने से भी बाज नहीं आते हैं, इसलिए आएदिन बहुत सी चौंकाने वाली घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनी रहती हैं.

सदियों से धर्म के दुकानदारों को अपनी पोल खुलने का खतरा बराबर बना रहता है. वे यह भी जानते हैं कि अगर भोलीभाली जनता ने जागरूक हो कर अपने दिमाग के खिड़कीदरवाजे खोल लिए तो उन की दुकानदारी बंद हो जाएगी इसलिए वे जनता को जगाने वालों को हमेशा अपना दुश्मन समझते हैं.

अधर्मी बता कर वे लोगों को भड़काते हैं. साथ ही, उन के गुरगे अंधविश्वासों की पोल खोलने वालों पर जानलेवा हमले करते रहते हैं. मामला लाखों का नहीं अरबों का है. सारे धर्म दुनियाभर में एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं.

हिंसा के साथ आसाराम केस में 6 गवाह जान गंवा चुके हैं. धर्म की खिलाफत में 5 फरवरी, 2015 को कोल्हापुर, महाराष्ट्र के गोविंद पंसारे की हत्या हुई थी. गोविंद पंसारे के हत्यारोपी की हिट लिस्ट में एक नाम मराठी पत्रकार निखिल वागले का भी था. उस ने साल 2011 में अंधविश्वास उन्मूलन बिल पर एक टैलीविजन शो किया था, जिस में तर्क से झुंझला कर एक कट्टरपंथी प्रोग्राम के बीच से उठ कर चला गया था. तब से इस पत्रकार को धमकियां मिल रही थीं.

धर्म के नाम पर मौत के घाट उतारना नई बात नहीं है. यूरोप में गैलीलियो, कौपरनिकस और ब्रूनी जैसे महान वैज्ञानिकों की हत्याएं हुईं, क्योंकि उन की खरीखरी, सच्ची बातें धर्म के दुकानदारों के गले नहीं उतरती थीं.

इसलामिक कट्टरपंथी सामूहिक नरसंहार करते हैं ताकि लोग दहशत में रहें व मजहब के नाम पर फैलाए गए उन के झूठ से परदा हटाने की हिम्मत न करें.

सच का साथ देने वाले बहुत से लोग हमारे देश में अब तक अपनी जान गंवा चुके हैं. महाराष्ट्र के मशहूर लेखक डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर अपनी कलम से 30 बरसों तक धार्मिक अंधविश्वासों के खिलाफ लड़े. उन्होंने मराठी भाषा में अंधविश्वास उन्मूलन पर किताब लिखी.

डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर ने अंधश्रद्धा उन्मूलन समिति बनाई थी. इस समिति के जरीए उन्होंने लोगों को जागरूक करने के लिए बड़ा ही जबरदस्त व कामयाब आंदोलन चलाया था. इस वजह से धर्म के दुकानदारों को उन से खतरा पैदा हो गया था, इसलिए 20 अगस्त, 2013 को गोली मार कर उन की हत्या कर दी गई.

जुल्म की इंतिहा

गुरमीत रामरहीम अपनी खिलाफत करने वालों को मरवा कर, जमीन में गड़वा कर ऊपर से पेड़ लगवा देता था. जाहिर है, धर्म के दुकानदार बेहद जालिम होते हैं. वे चाहते हैं कि लोग उन की तसवीर का सिर्फ एक ही रुख देखें. बहस न करें. उन का कहा व उन के नियम मानें. सच बोलने पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मामले दर्ज करा दिए जाते हैं.

लोग सिर्फ उतना ही देखते हैं जितना धर्म के दुकानदार खुद उन्हें दिखाते हैं. उस से आगे जा कर सोचने व बोलने वाले को बुरा व नास्तिक बता दिया जाता है. ऐसी बहुत सी तरकीबें चालाक लोगों ने अपने हक में ईजाद कर रखी हैं ताकि धर्म की अफीम पी कर लोगों का दिमाग कुंद रहे, वे उन के चंगुल में फंसे रहें.

धर्म के दुकानदार दिनरात लोगों को लूट कर अकूत धनदौलत इकट्ठी करने में लगे रहते हैं. बेहिसाब चढ़ावे को हथियाने, हड़पने, गद्दी के वारिस बनने के लिए लड़तेझगड़ते हैं. मुकदमेबाजी व खूनखराबा करते हैं. साथ ही, अपनी खिलाफत करने वालों को खत्म करने के लिए वे मरनेमारने तक को तैयार रहते हैं.

ईश निंदा के कानून अब मर से गए हैं, लेकिन फिर भी धर्म के दलालों को शिकायत करने से तो कोई नहीं रोक सकता. एक शिकायत के बाद अदालतों में पेशियों का लंबा सिलसिला चलता है.

बहुत से पाखंडी पुलिस तक से मुकाबला करने के लिए गोली, बारूद, बम व असलहा वगैरह रखते हैं. रामपाल व रामरहीम के आश्रम में भारी तादाद में हथियारों का जखीरा निकला था. बहुत सी धार्मिक जगहों व अखाड़ों वगैरह में लाठी, डंडे, तीर, तलवार, बरछी, भाले वगैरह रखे जाते हैं.

यह बात दीगर है कि सब देखसुन कर भी लोगों की आंखें नहीं खुलती हैं. वे धर्म की आड़ में तिजारत करने वालों के झांसे में आ ही जाते हैं.

लड़ाई दीए और तूफान की

हमारे देश में धर्म व अंधविश्वासों का साथ चोलीदामन की तरह है. इन के बीच फर्क की लकीर अब बेहद महीन व धुंधली सी हो गई है. अंधभक्ति के खिलाफ बोलना भी सामूहिक जुर्म करने वालों के खिलाफ जैसा जोखिम भरा काम है. हमारे देश में पढ़ेलिखे लोग भी तकदीर संवारने के लिए अंगूठी पहन लेते हैं.

मंगलयान छोड़ने से पहले इसरो के आला अफसर तिरुपति मंदिर जा कर कामयाबी के लिए प्रार्थना करते हैं. डाक्टर, इंजीनियर तरक्की के लिए वास्तु के नाम पर फेरबदल करा लेते हैं. दुखों से छुटकारा पाने के लिए औरतें बाबाओं के पास चली जाती हैं, वहां चढ़ावा चढ़ाती हैं और उन के झांसे में आ कर आबरू तक गंवा देती हैं.

जमीन के भीतर हजारों टन सोना दबा होने का सपना आया सुन कर जहां पुरातत्त्व के सरकारी महकमे खुदाई करने पहुंच जाते हैं, उस देश में तर्क के साथ वैज्ञानिक बातें करना बेमानी लगता है. जहां गुरु व भगवान की सेवा के नाम पर नौजवान व कमसिन लड़कियों को डेरों व आश्रमों में सौंप दिया जाता है, वहां सच्ची बात कहना मुश्किल व हिम्मत का काम है.

बाजार में खरीदारों को अपनी तरफ लुभाने के लिए दुकानदार विंडो ड्रैसिंग जैसे तमाम उपाय करते हैं. अपना माल बेचने के लिए अच्छेअच्छे नमूने शोकेस में सजा कर दिखाते हैं. इसी तरह धर्म के दुकानदार भी अच्छी बातों का ढोल भक्तों को ललचाने, बहकाने व भरमाने के लिए बजाते हैं. असल में तो बुरे कामों से परहेज वे खुद भी नहीं करते, तभी तो आसाराम, रामरहीम, रामपाल व फलाहारी जैसे बहुत से जेल की हवा खा रहे हैं.

पुराने जमाने में तालीम की कमी में लोग कुदरती आपदाओं, हादसों व बीमारियों के बारे में नहीं जान पाते थे इसलिए बस्ती के किसी सयाने के पास चले जाते थे. वह भी अंधों में काना राजा की तरह होता था. अपना रोब व असर बनाए रखने के लिए वह उन्हें देवीदेवता या भूतप्रेत की वजह से यह सब होना बता देता था. साथ ही, राख, तावीज या कोई धागा वगैरह दे देता था. यह गोरखधंधा आज भी जारी है.

यह है उपाय

केंद्र सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी महकमे में विज्ञान व तकनीक के संचार की एक परिषद है. यह विज्ञान मेलों, विज्ञान दिवस, बाल विज्ञान कांग्रेस, पुरस्कार व नुमाइश वगैरह से जागरूकता लाने के काम करती है. इस के कामकाज में अंधविश्वासों को दूर करना भी शामिल है. यह बात अलग है कि ज्यादातर लोग इस के बारे में नहीं जानते हैं.

विज्ञान व तकनीक में तरक्की को ले कर भले ही कर्नाटक अगड़े राज्यों में हो, लेकिन वहां अंधविश्वासों का अंधेरा आज भी कम घना नहीं है.

मसलन, देवदासी प्रथा पर विवाद होते रहते हैं. मदे स्नान कुरीति के तहत ब्राह्मणों के खाने के बाद बची पत्तलों पर पिछड़े इसलिए लोटते हैं कि ऐसा करने से उन की बीमारियां ठीक हो जाएंगी.

नरबलि देने वालों को फांसी देने और जादूटोना व तंत्रमंत्र वगैरह को अपराध घोषित करने के लिए साल 2013 के दौरान महाराष्ट्र व कर्नाटक में अंधविश्वास उन्मूलन के बिल आए थे ताकि धर्म की आड़ में ऊलजुलूल बातों पर आंखें मूंद कर भरोसा करने वाले शोषण के शिकार न हों, क्योंकि यह बात मानवाधिकारों के खिलाफ है.

दुनिया के कई देशों में भूतप्रेत, डायनचुड़ैल वगैरह के नाम पर औरतों व बच्चों के साथ बहुत ही वहशियाना हरकतें की जाती हैं इसलिए इस मसले को हल करने की गरज से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 दिसंबर, 2017 को जिनेवा में अंधविश्वास के चलते प्रताड़ना व मानवाधिकार के मुद्दे पर एक बैठक की थी. उस बैठक में अंधविश्वास रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाने की मांग उठी थी.

हमारे संविधान में मूल कर्तव्यों के तहत लिखा गया है कि सभी नागरिकों को वैज्ञानिक नजरिए को बढ़ावा देना चाहिए इसलिए हम सब का फर्ज भी यही है कि बेखौफ हो कर सच व तर्क का साथ दें. सभी बातों को विज्ञान की कसौटी पर कसें और धर्म के दुकानदारों का भंडाफोड़ करें, पर ये बातें सिर्फ किताबी हैं. पुलिस अफसर हो, जज या मजिस्ट्रेट, धार्मिक सवाल उठाने पर अगर शिकायत हो तो मामला दर्ज कर ही लेता है.

धर्म की दुकानदारी कर रहे मक्कार अभी भी मजे से अपना धंधा चला रहे हैं. उन का राजपाट अभी तो कहीं नहीं जाता दिख रहा है.

अमृतसर रेल हादसा : संवेदनाओं और सहानुभूति से पहले सबक की जरूरत

किसी तरह की संवेदना प्रगट करने या श्रद्धांजलि देने से पहले उन लगभग दौ सौ श्रद्धालुओं को कोसा जाना बहुत जरूरी है जो ना जाने किस अज्ञात शक्ति या रक्षक कहे जाने वाले भगवान भरोसे रेल की पटरी पर खड़े जलते रावण की मौत का तमाशा देख रहे थे लेकिन खुद काल के गाल में समा गये. अपनी दुखद मौत के जिम्मेदार ये लोग खुद थे, किसी और के सर इस हादसे का ठीकरा नहीं फोड़ा जा सकता और अगर किसी के सर फोड़ा जा सकता है तो वह भगवान है जो खामोशी से अपने भक्तों की दर्दनाक मौत का तमाशा देखता रहा.

अमृतसर में जो हुआ वह कोई नया नहीं था फर्क इतना भर था कि एक और धार्मिक हादसा नए तरीके से हुआ. हजारों की तादाद मे रेल की पटरी पर भगवान भरोसे खड़े लोग जलते रावण की मौत का तमाशा देख रहे थे. भगवान ने इन्हें आगाह नहीं किया कि हट जाओ तुम्हारी खुद की मौत धड़धड़ाती हुई आ रही है. उस पालनहार सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान भगवान ने अपने भक्तों की जान बचाने कोई उपक्रम नहीं किया और न ही कोई लीला दिखाई, तो लगता है उससे ज्यादा क्रूर कोई है ही नही.

पर अमृतसर में बात भगवान की नहीं बल्कि उसके दलालों और दुकानदारों की थी, जो अपना पेट पालने साल भर ऐसे धार्मिक आयोजन करते हैं जिनमे ज्यादा से ज्यादा भीड़ जमा हो और लोग पैसा चढ़ाएं या फिर किसी भी तरह से धर्म पर खर्च करें. यह दुखद हादसा पिछले कई धार्मिक हादसों का दोहराव है जिनमें सैकड़ों हजारों लोग किसी भगदड़ मे मारे गये या फिर सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़े. इस हादसे ने सिर्फ और सिर्फ धार्मिक समारोहों की पोल खोली है कि कैसे लोग उनमे बेकाबू होकर अपनी जान तक पर खेल जाते हैं.

धर्म और उसके ठेकेदारों ने सिखाया यही है कि अनुशासनहीन बन कर अव्यवस्था फैलाओ तो जल्द दर्शन होंगे, इसीलिए लोग पागलों की तरह मंदिर के पट खुलते ही दर्शनों के लिए टूट पड़ते हैं. बच्चे बूढ़े और औरतों सहित विकलांग तक एक दूसरे को धकियाते पत्थर की मूर्ति के नजदीक पहले पहुंचने की होड़ मे जानवरों को भी मात करते नजर आते हैं. एक अमृतसर ही नहीं बल्कि पूरे देश मे भक्त दशहरे की शाम से रावण दहन का तमाशा देखने घरों से पैदल और वाहनों पर सवार होकर निकल पड़े थे. दशहरे की रात मध्य प्रदेश के जबलपुर मे इस प्रतिनिधि ने जो देखा वो भी दिल दहला देने वाला था. पूरे शहर मे जबरजस्त भीड़ थी, लोग एक दूसरे को धकियाते भागे जा रहे थे, झांकिया और जलता रावण देखने इन लोगों को भी अपनी और दूसरों की जान की परवाह नहीं थी.

हादसा अमृतसर मे हुआ तो इसमे गलती उन्ही लोगों की थी जो हमेशा की तरह हुजूम बनाकर इकट्ठा हुए थे. पर इनसे बड़े दोषी वे पंडे पुजारी होते हैं जो अपने उदर पोषण के लिए ऐसे मेले ठेले लगवाते हैं, लेकिन उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता कि पर्दे के पीछे दरअसल मे है कौन, ये रिवाज या परम्पराएं शुरू किसने और क्यों कीं और आज इन पर हर कोई अपनी रोटियां सेक रहा है. नेताओं को धार्मिक भीड़ में वोट तो पंडों को नोट दिखते हैं. ऐसे आयोजनों मे कारपोरेट की भूमिका भी अहम हो चली है जो अपने उत्पादों के प्रचार प्रसार और ब्रांडिंग के लिए आयोजको को दिल खोलकर चंदा देता है.

यानि हर कोई धर्म के नाम पर बढ़ती अनुशासनहीनता का जिम्मेदार है, मीडिया भी बढ़ा चढ़ाकर ऐसे आयोजनों को प्राथमिकता देता है, लेकिन यहां दोष इन शिकारियों के साथ शिकारों का ज्यादा है क्योंकि उनमे अच्छे बुरे की तमीज करने की बुद्धि है, यह और बात है कि धर्म की बात आते ही यह बुद्धि बेवकूफी में तब्दील हो जाती है. लोग अंधे बहरे और गूंगे आस्था के नाम पर हो जाते हैं जैसे अमृतसर में हुए इन बेचारों को तो पता ही नहीं चला कि किन पापों की सजा उन्हें भगवान ने दी.

राम की इस लीला को समझने ज्यादा जोर दिमाग पर देने की जरूरत नहीं, सिवाय यह समझने के कि इस देश में ऐसे हादसे ही धर्म की महत्ता बनाये हुए हैं, ये हादसे न हों तो लोग भगवान को मानना ही छोड़ देंगे .इधर सरकार ने भी उम्मीद के मुताबिक भगवानो और धर्म की हकीकत पर मुआवजे का पर्दा तुरंत डाल दिया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास अफसोस जाहिर करने के पीछे जाने क्यों यह कहने की हिम्मत नहीं थी कि यह तो हरि इच्छा थी. अब इसमे न तो कहीं आतंकवादी थे, न नक्सली थे और न ही वामपंथी बुद्धिजीवी थे जो देशद्रोही होते हैं. अब सीधे सीधे राम को तो दोषी कोई ठहरा नहीं सकता, इसलिए हादसे के सच पर सब चुप रहे.

धार्मिक हादसों में सरकारी मुआवजे का खेल इसीलिए खेला जाता है कि लोग कहीं भगवान की असलियत के बारे में ज्यादा न सोचने लगें. अमृतसर हादसे में मृतकों के परिजनों को मुआवजा देना एक बेतुकी बात थी, उल्टे होना तो यह होना चाहिये था कि सरकार मृतकों के परिजनो से जुर्माना वसूलती, क्योंकि वे गलत तरीके से रेल की पटरी पर खड़े थे और अगर यह गलती नहीं है तो हर सड़क हादसे पर भी सरकार को मृतक को मुआवजा देना चाहिये और यातायात अवरुद्ध करने वालों को कोई सजा नहीं देनी चाहिये, पर सरकार ऐसा नहीं करती, बल्कि धर्म के नाम पर अपनी गलती से मरे लोगों को मुआवजा देकर ऐसे हादसों को प्रोत्साहित ही करती है जिससे लोग धर्म को न कोसें और कड़वा सच यह कि ऐसा होता भी है.

होना तो यह चाहिये कि धार्मिक आयोजन प्रतिबंधित किए जाए, इनमे अरबों रुपए फूंकते हैं, हजारों लोग हर साल मारे जाते हैं, करोड़ों लोगों का कीमती वक्त जाया होता है, सिर्फ इसलिए कि इन धार्मिक ड्रामों से पंडे पुजारियों की रोजी रोटी चलती है. दूसरे ये आयोजन लोगों को अनुशासनहीन बनाने के अलावा अंधविश्वासी और पाखंडी भी बनाते हैं, लगता नहीं कि धर्म के अंधे लोग और सरकार इस पर कभी सोच पाएंगे.

अमृतसर हादसे में मारे गये लोगों से मानवीय संवेदनाओं और सहानुभूति से ज्यादा जरूरत यह सबक लेने की है कि  लोग अपनी लापरवाही और अंधभक्ति के चलते मारे गये. इस दुनिया मे बकौल स्टीफन हाकिंग कोई भगवान है ही नहीं जो किसी की किस्मत लिखता हो.

अमृतसर रेल हादसा : यह कैसी आस्था

अमृतसर में दशहरे के दिन शाम को जब रावण को जलाया जा रहा तभी आज के रावणरूपी लापरवाहों की लापरवाही ने कईयों की जिंदगी छिन ली. पंजाब के अमृतसर में जोड़ा रेल फाटक के पास रावण दहन देख रहे लोगों पर ट्रेन के चढ़ जाने से अब तक मिली जानकारी के अनुसार लगभग 70 से अधिक लोगों के मरने की खबर है, वहीं लगभग इतने ही लोग घायल हैं, जिनमें कईयों की हालत गंभीर है.

जानकारी के मुताबिक रेलवे ट्रैक के पास भारी भीड़ जमा होकर रावण दहन का कार्यक्रम देख रही थी. रावण जल रहा कि तभी अचानक उसका अधजला भाग टूटकर गिर गया. लोग डर कर इधरउधर भागने लगे और अचानक भगदङ मच गई. तभी अचानक ट्रेन आ गई और देखते ही देखते लोगों को अपनी चपेट में ले लिया. लोगों की भीड़ पर ट्रेन चढ़ गई जिससे 70 लोगों की मौत होने की अब तक खबर है. ट्रेन पठानकोट से अमृतसर आ रही थी.

वीभत्स नजारा

घटना में बड़ी संख्या में लोग बुरी तरह घायल भी हुए हैं जिससे मृतकों की संख्या बढ़ने का अंदेशा है. घटना इतना वीभत्स था कि कहीं किसी के हाथ तो कहीं किसी के पैर यहां वहां कटे पड़े थे.

इस वीभत्स और दिल दहला देने वाली घटना ने एक बार फिर धर्म का काला चेहरा उजागर कर दिया है, जहां जानें जाती हैं, लोग घायल होते हैं, सरकार मुआवजे का एलान करती है, 2-4 दिन दुख प्रकट किया जाता है और फिर सब शांत. पीछे रह जाता है दर्द, सूनापन और कभी न लौट कर आने वाले वे लोग जिनसे एकएक घर एकएक परिवार खुशहाल रहता था.

लोगों की जिंदगी पर भारी आयोजकों की कमाई

हर साल रावण जलाने के नाम पर आयोजकों की कमाई का जरीया बना यह रावण दहन न सिर्फ पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का काम करता है, बल्कि बिना सरकारी अनुमति के यहांवहां ऐसे आयोजन कईयों की जिंदगीमौत की वजह भी बनती है.

जिस जगह यह हादसा हुआ वहां इसकी अनुमति ली गई थी या नहीं यह तो जांच का विषय है पर दुखद तो यह है कि जब यहां रावण जलाया जा रहा था, उस वक्त 2 रेलगाड़ियों का एकसाथ अगलबगल से गुजरना रेलवे कर्मचारियों और अधिकारियों पर भी सवालिया निशान लगाता है कि क्या इतने बङे कार्यक्रम की जानकारी उन्हें नहीं थी?

मालूम हो कि सैकड़ों की संख्या में पहुंचे लोगों के बीच कई नेता भी थे जिन्हें बतौर चीफ गेस्ट बुलाया गया था.

कब रुकेगा यह सिलसिला

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इस क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू, जो पंजाब सरकार में मंत्री भी हैं, की पत्नी नवजोत कौर बतौर अतिथि शामिल थीं मगर घटना के तुरंत बाद वे वहां से निकल गईं, तब जब उनको घायलों को मदद करनी चाहिए थी.

आयोजकों की टोली भी जो लोगों को धर्म के नाम पर मंच पर खड़े होकर रावण को बुराई का प्रतीक बताते रहे वे भी धीरे-धीरे खिसक लिए और वहां रह गया मातम, चीखपुकार और साथ ही एक प्रश्नचिह्न भी कि आखिर कब तक लोगों की जिंदगियों से इस तरह खिलवाड़ चलता रहेगा?

जिम्मेदार कौन

रामरावण की कथा के अनुसार रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण सृष्टि के लिए विनाशक थे जिन्हें खत्म किया जाना जरूरी था. पर आज के रावणरूपी राक्षसों का क्या जो 3 साल की मासूम बच्चियों तक को हवस का शिकार  बना डालते हैं. धर्म अगर यह कहता है कि इनको जलाना बुराई पर अच्छाई की जीत है तो फिर आज की घटती घटनाओं पर धर्म और धर्म के तथाकथित ठेकेदार खामोश क्यों हैं? क्यों धर्म के ठेकेदार समाज में घट रही वीभत्स घटनाओं पर लामबंद हो इसकी मुखालफत नहीं करते? क्यों धर्म के नाम पर सिर्फ चढावा, पूजापाठ और पाखंड भर रह गया है?

जाहिर है, इससे धर्म के पंडितों और भक्तों की झोली नहीं भरेगी जो ऐसे आयोजनों के बंद होने से और भी बेहाल हो जाएंगे.

दूसरी ओर ऐसे हादसे बहुत कुछ अंधविश्वास और धर्मभीरू होने की वजह से भी होते हैं. रावण को जलते देखने से शारीरिक कष्ट दूर हो जाते, तो न फिर विज्ञान की जरूरत थी और न ही डाक्टरों की. रेल की बीच पटरियों पर खड़े होकर रावण को जलते देखना मौत को जानबूझकर गले लगाने जैसा ही है.

भीङ अधिक थी और रावण जल रहा था. तभी उसका अधजला आधा भाग अचानक गिर गया जिसकी वजह से मची भगदङ में लोग इधरउधर भागने लगे. लोग डर कर नही भागते तो इतना बङा हादसा नहीं होता.

धर्म का कुरूप चेहरा

अमृतसर हादसा भी धर्म का एक कुरूप चेहरा ही है, जिसने न जाने कितनों की न सिर्फ जिंदगी छीन ली, बल्कि कितनों का घर उजाङ दिया.

माफी तो उन्हें भी नहीं मिलनी चाहिए जिन्होंने सबकुछ होते देख लापरवाही बरती जिसका परिणाम रेलगाड़ी के रूप में मौत बनकर आया.

क्या समाज, सरकार, आयोजक, नौकरशाह और धर्म के तथाकथित गुरू इस दर्दनाक मौत की जिम्मेदारी लेंगे?

पिछले 10 सालों के हादसे

धार्मिक स्थलों पर पिछले 10 सालों में जितनी घटनाएं हुईं हैं वह रोंगटे खड़े करता है. इन घटनाओं में सैकड़ों जानें गई हैं :

*2006 को नैना देवी में भगदङ. 160 मरे 400 से अधिक घायल हुए.

*2008 को राजस्थान में जोधपुर के चामुंडा देवी मंदिर में भगदङ से 120 लोग मारे गए थे और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे. यह भगदङ नवरात्र के समय हुआ था.

*2010 को उत्तर प्रदेश के रामजानकी मंदिर में भगदङ से 63 लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.

*2011 को हरिद्वार में हर की पौङी पर भगदङ से 22 की जान गई थी और कई घायल हुए थे.

*2012 को बिहार के पटना में अदालत गंज में छठ पूजा के दौरान भगदङ से 20 लोगों की मौत हुई थी. दर्जनों लोग घायल हुए थे.

*2013 को मध्यप्रदेश के रत्नगढ मंदिर में भगदङ से 89 लोग मारे गए थे और 100 से अधिकलोग घायल हुए थे.

*2015 को झारखंड के बैद्यनाथ धाम में भगदङ से 11 की मौत हुई थी और 50 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.

कोहली कर सकते हैं यह विराट कमाल

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली जब टीम में अपनी जगह बना रहे थे तब अपने समय के ‘मास्टर ब्लास्टर’ भारतीय बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने एक बात कही थी कि अगर कोई उन के रिकौर्ड तोड़ सकता है तो वह है विराट कोहली.

क्रिकेट में अपने आदर्श की कही इस बात पर अब विराट कोहली खरे उतर रहे हैं और अगर उन की बल्लेबाजी रंग दिखाती है तो वे जल्दी ही एक खास मुकाम पर पहुंच सकते हैं. 29 साल के विराट कोहली वनडे इंटरनेशनल मैचों में 10 हजार रन बनाने वाले 5वें भारतीय बल्लेबाज बन सकते हैं.

21 अक्तूबर 2018 को वेस्टइंडीज के खिलाफ शुरू होने वाली 5 वनडे मैचों की सीरीज में विराट कोहली यह कारनामा कर सकते हैं. उन के नाम अभी तक 211 वनडे इंटरनेशनल मैचों में 9779 रन हैं और वे 10000 रनों का जादुई आंकड़ा छूने से महज 221 रन दूर हैं. अगर सबकुछ सही रहा तो वे इस सीरीज में ही ऐसा कर देंगे. उन से पहले सचिन तेंदुलकर, सौरभ गांगुली, राहुल द्रविड़ और महेंद्र सिंह धौनी वे भारतीय बल्लेबाज हैं जो वनडे मैचों में 10 हजारी बन चुके हैं.

वनडे मैचों में सचिन तेंदुलकर ने रिकॉर्ड 18426 रन बनाए हैं. उन्होंने 266 मैचों की 259 परियों में 10000 रन पूरे किए थे जबकि विराट कोहली ने 211 मैचों में अभी सिर्फ 203 परियां ही खेली हैं.

उम्मीद है कि वेस्टइंडीज के खिलाफ धमाकेदार बल्लेबाजी कर के विराट कोहली अपने चाहने वालों को यह नायाब तोहफा जरूर देंगे.

रेमंड ग्रुप के विजयपत सिंघानिया और बेटे गौतम के बीच बढ़ता तनाव

परिवारों में आपसी प्रेम, शांति, तालमेल को ले कर दिए जाने वाले तमाम धार्मिक उपदेशों पर पारिवारिक कलह भारी पड़ रही है. परिवारों में तनाव बढ़ता जा रहा है और गंभीर अवसाद का रूप ले रहा है.

पतिपत्नी, बापबेटे, भाईभाई, बहनभाई के बीच झगड़ा मर्यादाओं को लांघ रहा है. खून के रिश्ते तारतार होते दिख रहे हैं. वह चाहे राजनीतिक परिवार हो, औद्योगिक हो या अन्य सामान्य परिवार. लोभ, लालच, वर्चस्व की इच्छा हावी हो रही है. परस्पर मानसम्मान, आदर भाव खत्म होते नजर आते हैं.

पीढ़ियों के गैप की समस्या आज की नहीं है. पितापुत्र, दादापौत्र के बीच वक्त अंतराल की दिक्कतें आम बात हैं. पीढियों के बीच समय के मुताबिक सोचविचार, आचारव्यवहार में अंतर होना स्वाभाविक है. आम घरों में यह समस्या आए दिन देखी जा सकती है. सामान्य परिवारों की इस तरह की समस्याएं जगजाहिर नहीं होतीं लेकिन किसी मशहूर, प्रतिष्ठित राजनीतिक, औद्योगिक, फिल्मी परिवार में कलह हो तो समाचारों की सुर्खियां बन जाती हैं.

एक बार फिर मशहूर टैक्सटाइल कंपनी रेमंड के मालिक विजयपत सिंघानिया और उन के पुत्र गौतम सिंघानिया के बीच तनाव गहराने की खबर छाई हुई हैं. विजयपत सिंघानिया को पत्र के जरिए बताया गया है कि उन्हें रेमंड ग्रुप के मानद चेयरमैन पद से हटा दिया गया है. विजयपत सिंघानिया ने कहा है कि उन्हें हटाने के संबंध में जब तक बोर्ड के निर्णय का प्रमाण नहीं दिया जाएगा तब तक वह फैसले को नहीं मानेंगे.

रेमंड के निदेशक और कंपनी सेक्रटरी थामस फर्नांडीज ने 7 सितंबर को लिखे पत्र  में बताया था कि कंपनी बोर्ड ने सिंघानिया के व्यवहार के कारण उन्हें मानद चेयरमैन पद से हटाने का निर्णय लिया है. इस से पहले 30 अगस्त को विजयपत ने कंपनी बोर्ड को लिखे पत्र में उन्हें हटाने के लिए बेटे की चालबाजी का जिक्र किया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि गौतम ने उन की कई कीमती वस्तुएं वापस करने से इनकार कर दिया है.

गौतम ने पिता के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मेरे पिता को याद नहीं है कि उन्होंने ये चीजें कहां रख दीं. मेरे पास उन का कुछ भी नहीं है. मैं ये  चीजें रख कर क्या करूंगा. मैं पिता के ऐसे व्यवहार से दुखी हूं. उन्हें समस्या है तो बैठ कर सुलझाने को तैयार हूं. उन के पद पर बने रहने से मेरा कोई लेनादेना नहीं है. यह बोर्ड का फैसला है.

पिछले साल अगस्त में विजयपत ने आरोप लगाया था कि उन के बेटे ने उन से कार और ड्राइवर छीन कर पैसेपैसे के लिए मुहताज कर दिया है. वह 7,100 करोड़ के 30 मंजिला जेके हाउस को छोड़ कर  किराए के मकान में रह रहे हैं. उस वक्त गौतम ने कहा था कि उन के पिता को वक्त के साथ बदलने की आदतें बदलनी होंगी.

इस परिवार की जड़ें औद्योगिक नगरी कानपुर से जुड़ी हुई हैं. हार्वर्ड से पढे विजयपत 1980 में रेमंड ग्रुप के चेयरमैन बने थे. उन के नेतृत्व में  पोलिएस्टर, फिलामेंट यार्न, इंडिगो डेनिम, कोल्ड रोल्ड स्टील और चार्टर एयर सर्विस जैसे क्षेत्रों में शुरुआत की गई.

2001-2002 में ग्रुप का राजस्व 991 करोड़ था. यह 2014-15 में पांच गुना बढ कर 5,332.61 करोड़ तक पहुंच गया. इस के बाद गौतम सिंघानिया के नेतृत्व में 2017-2018 के दौरान गु्रप का राजस्व 6,025 करोड़ हो गया.

विजयपत और गौतम के बीच टकराव जेके हाउस को ले कर हुआ था जिस पर 1945 से रेमंड का मालिकाना हक रहा है. 30 मंजिला जेके हाउस मुंबई के पौश ब्रीच कैंडी एरिया में स्थित है. 2007 में इस का रीडवलपमेंट हुआ था. इस के लिए रेमंड, पशमीना होल्डिंग्स और विजयपत, उन के भाई की पत्नी और उन के दो बेटों के बीच  त्रिपक्षीय एग्रीमेंट हुआ था. इस के  मुताबिक रीडवलपमेंट के बाद जेके हाउस को किराएदारों को 9 हजार रुपए प्रतिवर्ग फुट की दर पर दिया जाने वाला था.

पिछले साल के शुरू में जेके हाउस का काम पूरा होने के बाद रेमंड ने पुराने किराएदारों को घर बेचने का फैसला किया. गौतम सिंघानिया ने शेयरहोल्डर्स से इजाजत लेने का निर्णय लिया. गौतम ने शेयरहोल्डर्स को उन्हें प्रोपर्टी बेचने के खिलाफ वोट डालने को कहा गया. उन का कहना था कि इस एरिया में प्रापर्टी की रेट 1 लाख रुपए प्रतिवर्ग फुट हो गए हैं इसलिए 9 हजार रुपए प्रतिवर्ग फुट के  रेट पर इन्हें बेचने से कंपनी को नुकसान होगा.

जून 2017 में रेमंड के शेयरहोल्डर्स ने ओरिजिनल रीडवलपमेंट एग्रीमेंट खारिज कर दिया. 97 प्रतिशत शेयरहोल्डर्स ने प्रस्ताव के विरोध में वोट डाला. गौतम वोटिंग में शामिल नहीं हुए.

इससे से पहले विजयपत ने रेमंड में अपनी 31.7 प्रतिशत हिस्सेदारी गौतम को गिफ्ट की थी. इस की  कीमत 1,000 करोड़ रुपए से अधिक थी.

विवाद के बाद विजयपत ने बौंबे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि वह बेटे गौतम के व्यवहार से परेशान हैं. उन के वकील ने अदालत से कहा कि गौतम ने विजयपत से कार और स्टाफ तक वापस ले लिया और वह जेके हाउस की एवज में रेंटल इनकम टैक्स भी नहीं दे रहे हैं.

इसी तरह की बातों को ले कर पितापुत्र के बीच विवाद थम नहीं रहा है. पीढियों के अंतराल की समस्या का समाधान खुद परिवार ही निकाल सकता है. परिवार के सदस्यों में एकदूसरे के प्रति परस्पर पे्रम, मानसम्मान, स्नेह, कर्तव्य की भावना हो. छोटेमोटे मसले स्वयं मिलबैठ कर सुलझाने की क्षमता हो.

आखिर बड़ों को हमेशा बदलते वक्त के साथ अपनी आदतें भी बदलनी होगी. दोनों ओर की जिद, अड़ियल रवैया खून के रिश्तों में सदैव घातक रहा है. यह समस्या किसी धार्मिक उपदेश से सुलझने वाली नहीं है. खूनी संबंधों में किसी तरह की कोई मध्यस्थता कारगर नहीं होती. दो सदस्यों के मन के कटुता के भाव खुद वही मिटा सकते है

VIDEO : ‘जंगली’ का Teaser हुआ रिलीज

पारिवारिक हास्य फिल्म ‘‘बधाई हो’’ का निर्माण करने के बाद अब ‘‘जंगली पिक्चर्स’’ कंपनी बहुत जल्द ‘‘द मास्क’’ और ‘‘द स्कौर्पियन किंग’’ के निर्देशक चक रूसेल की नई पारिवारिक रोमांचक फिल्म ‘‘जंगली’’ को प्रदर्शित करने वाली है. हाल ही में जंगली पिक्चर्स हौलीवुड फिल्म ‘‘जंगली’’ का टीजर लेकर आयी है.

फिल्म का टीजर जंगल की यात्रा कराते हुए पार्श्व आवाज के माध्यम से फिल्म की कहानी पर रोशनी डालता है. टीजर देखकर फिल्म देखने की उत्सुकता बढ़ती है. जंगली पिक्चर्स की अध्यक्ष प्रीति सहानी फिल्म ‘‘जंगली’’ के टीजर की चर्चा करते हुए कहती हैं – फिल्म ‘बधाई हो’ को दर्शकों की तरफ से मिल रही प्रशंसा को देखते हुए हमने फिल्म ‘जंगली’ के टीजर को पेश कर फिल्म की एक झलक दिखाने का निर्णय लिया. पारिवारिक दर्शकों के लिए ‘जंगली’ एक खास फिल्म है.’’

पारिवारिक रोमांचक फिल्म ‘‘जंगली’’ में जबरदस्त एक्शन के साथ ही पूरे विश्व में हो रहे हाथियों के शिकार पर एक संदेशपरक फिल्म है. यह फिल्म हाथी और इंसान के बीच अविश्वसनीय दोस्ती की कथा बयां करती है.

फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे अभिनेता विद्युत जामवाल ने कुछ दिन पहले अपने दोस्त भोला हाथी के साथ अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर डालकर फिल्म ‘‘जंगली’’ की कहानी और हाथी के साथ अपनी बौंडिंग की तरफ इशारा कर दिया था. पांच अप्रैल 2019 को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘जंगली’’ के टीजर की चर्चा चलने पर अभिनेता विद्युत जामवाल कहते हैं – ‘‘इस फिल्म में अभिनय करना मेरे लिए अद्वितीय अनुभव रहा. प्रकृति के साथ एक दिन बिताना और जानवरों की दुनिया में स्वागत किया जाना अविश्वसनीय था. इस फिल्म से मैंने इंसान व जानवरों के बीच के अद्भुत रिश्तों को भी जाना. इस फिल्म में अभिनय कर मेरी अभिनय क्षमता में विकास हुआ. ’’

इस दिवाली औनलाइन फोड़ें पटाखे, ये हैं 4 बेहतरीन वेबसाइट्स

दिवाली पर बच्चे खुले स्थानों पर पटाखे फोड़ना पसंद करते हैं, लेकिन आज के समय में फैलते प्रदूषण के कारण लोग पटाखे फोड़ने से पहरेज करते हैं और यह सही भी है. लेकिन इस सब के चक्कर में बच्चे थोड़ा निराश हो जाते हैं. ऐसे में उन्हें औनलाइन पटाखों का एक्सपीरियंस दिखाकर खुश किया जा सकता है. आइए डालते हैं कुछ ऐसी ही वेबसाइट्स पर एक नजर-

मिनी क्लिप फायरवर्क्स

इस वेबसाइट पर आपको लंदन की आतिशबाजी देखने को मिलेगी. आपका बच्चा जितने फायरवक्र्स पर क्लिक करता है, उसे उतने ही अधिक प्वाइंट्स मिलते हैं. इसमें आतिशी पटाखों का नजारा दिखाया जाता है जो आपके बच्चों को पसंद आएगा. इसमें हाइएस्ट स्कोर वाले नामों को भी दिखाया जाता है.

वाई8 डाट काम

इस वेबसाइट पर पटाखों से जुड़े कई गेम्स मौजूद हैं. इनमें फायरवक्र्स बैटल, हनाबी शूटर, फायरवक्र्स कार्ट रेसिंग, फायर रॉकेट आदि प्रमुख हैं. यहां आपको बच्चों के लिए इस तरह के करीब 21 गेम्स मिलेंगे.

फायरवर्क्स टेटरिस

यदि आपको टेटरिस गेम पसंद है तो क्यों न इस दिवाली पर पटाखों की टेटरिस खेलें. टेटरिस में अलग-अलग कलर्स के गोले दिखाई देते हैं और आपको उन्हें कौम्बिनेशन में जमाना होता है. यह आपको उन पुराने गेम्स का विंटेज एहसास कराएगा जो दशकों पहले होते थे.

दिवाली फायरवर्क्स गेम

इस गेम में आपको रियल दिवाली का एहसास होगा. आसमान में चमकते आतिशी नजारे और उनसे बनते स्कोर. यह गेम बच्चों के साथ ही किशोरों को भी खासतौर पर पसंद आएगा.

फायरवर्क्स टेटरिस

यदि आपको टेटरिस गेम पसंद है तो क्यों न इस दिवाली पर पटाखों की टेटरिस खेलें. टेटरिस में अलग-अलग कलर्स के गोले दिखाई देते हैं और आपको उन्हें कॉम्बिनेशन में जमाना होता है. यह आपको उन पुराने गेम्स का विंटेज एहसास कराएगा जो दशकों पहले होते थे.

दिवाली फायरवर्क्स गेम

इस गेम में आपको रियल दिवाली का एहसास होगा. आसमान में चमकते आतिशी नजारे और उनसे बनते स्कोर. यह गेम बच्चों के साथ ही किशोरों को भी खासतौर पर पसंद आएगा.

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