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ठगों ने घोड़े के शौकीन को जिस तरह ठगा, जान कर हैरान रह जाएंगे आप

शातिर ठग कब, कहां और किस को ठगी का शिकार बना डालें कुछ कहा नहीं जा सकता. आएदिन कभी औनलाइन शौपिंग में ठगी तो कभी नकली ज्वैलरी को असली बता कर ठगी करने के कारनामे आप ने सुने होंगे पर हम आप को एक ऐसी ठगी के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे जान कर आप अपना माथा ठोक लेंगे.

महंगी नस्ल के घोड़े का शौकीन

पंजाब के फरीदकोट के रहने वाले इंद्र सिंह को महंगी नस्ल के घोड़े से खासा लगाव है. इन्हें घोड़े की सवारी करना इतना भाता है कि इस के आगे फरारी या मर्सिडीज कार की कोई औकात नहीं. एक बार काले घोड़ों को दौड़ते भागते देखा तो इन का मन भी काला घोड़ा खरीदने को मचल उठा.

घोड़े के शौकीन इंद्र सिंह को किसी ने काला घोड़ा बेचने वाले एक शख्स के बारे में बताया तो वे घोड़ा खरीदने जा पहुंचे.

कीमत जान कर आश्चर्य होगा          

घोड़ा बेचने वाले शख्स ने घोड़े की कीमत 22 लाख रूपए से उपर बताई. पर मोलभाव के बाद साढ़े 17 लाख पर सौदा पट गया.

इंद्र सिंह ने पहले तो घोड़े के साथ मूंछों पर ताव देते हुए फोटो खिंचाई फिर घोड़े को अपने घर ले आए. वहां इस नायाब घोड़े को देखने कई लोग पहुंचे, जिन्हें इंद्र सिंह सीना चौड़ा कर दिखाते और घोड़े की खूबियां भी बताते.

बदलने लगा घोड़े का रंग

कुछ ही दिनों बाद घोड़े का रंग बदलने लगा और वह कई जगह से सफेद होने लगा तो इंद्र सिंह का माथा ठनका. घोड़े को नहलाने पर वह लगभग सफेद घोड़ा हो गया.

दरअसल, घोड़ा था ही सफेद जिसे इंसानों के बालों को रंगने वाला हेयर डाई से काला कर दिया गया था. इंद्र सिंह को तब अपने साथ किए ठगी का पता चला तो उन्होंने अपना सिर धुन लिया.

पुलिस में दी शिकायत

आननफानन में उन्होंने इस ठगी की जानकारी अपने कुछ जानकारों को दी और पंजाब के फरीदकोट थाना सिटी में शिकायत दर्ज कराई. पुलिस को दी शिकायत में उस ने बताया कि वह महंगी नस्ल का घोड़ा खरीदने का शौकीन है और इस से पहले भी वह कई घोड़ों को खरीद चुका है.

इस बार जब वह एक घोड़ा खरीदने बरनाला पहुंचा तो वहां आरोपी मेवा सिंह सहित कुल 8 लोग काले रंग का घोड़ा ले कर आए और उसे यह घोड़ा साढे 17 लाख में बेच दिया. उस ने पुलिस को बताया कि घोड़ा काले रंग का था जिसे डाई कर के काला कर दिया गया था. बहरहाल, पुलिस ने मामला दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी है.

अगर आप भी शौकीन हैं तो…

अगर आप भी घोड़े के शौकीन हैं तो घोड़ा असली है या नकली इस बात की जानकारी लेने के साथसाथ घोड़े का रंग पक्का है या नहीं, यह पता जरूर कर लें क्योंकि हमारे देश के ठग कब और कहां आप को चूना लगा दें कहना कठिन है.

किसानों की मूल परेशानियों को दरकिनार कर कृषि कुंभ का आयोजन

उत्तर प्रदेश में किसान के सामने सबसे बड़ी परेशानी छुट्टा जानवरों की है. पहले बुंदेलखंड के इलाकों में “अन्ना प्रथा” के नाम पर छुट्टा जानवर छोड़े जाते थे. उस समय वहां खेत मे फसल नहीं होती थी. आज पूरे प्रदेश में यह हाल है कि किसान दिन भर खेत की रखवाली करता है रात में आवारा पशुओं का झुंड उसको बर्बाद कर देता है.

ऐसे में किसानों को खेतों में तारबंदी करानी पड़ रही जो महंगी है. किसानों की जमीनों के झगड़े निपट नही रहे . सरकार इन मुद्दों को दरकिनार कर कृषि कुंभ का आयोजन कर किसानों को भरमाने का काम कर रही है. सरकार को लगता है कि बड़े आयोजन करके छोटी छोटी परेशानियों को दरकिनार किया जा सकता है.

लखनऊ में तीन दिवसीय कृषि कुंभ का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से किया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री  योगी आदित्य ने अपनी सरकार की वाहवाही करते  कहा  की उत्तर प्रदेश में यह ऐतिहासिक कृषि कुंभ मेला पहली बार आयोजित किया जा रहा है हम इस तकनीक के सहारे उत्तर प्रदेश में कृषि की संभावनाओं को और मजबूती प्रदान करने का काम करेंगे जिससे लागत में कमी और उत्पादन में वृद्धि हो सके. कृषि के क्षेत्र में इजरायल और जापान ने काफी तरक्की की है जिनकी तकनीक के माध्यम से हम अपने प्रदेश में भी समृद्धि ला सकेंगे इससे हमारा सीधा लक्ष्य है कि किसानों आय दुगनी की जा सके.

23 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश के लिए भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार को 20 नए कृषि विज्ञान केंद्र समर्पित किए हैं ताकि हम किसानों और अन्य दाताओं को उन्नति की ओर अग्रसर कर सकें. देश के अंदर गांव गरीब किसान और नौजवान महिलाएं तथा समाज के प्रत्येक पिछड़े तबके के वर्ग को हमें आगे ले जाना है जिससे उनकी मंशा पता चलती है कि पहली बार किसी सरकार ने इस वर्क को अपने एजेंडे में रखा हैं.

केंद्र सरकार ने पहली बार किसान स्वायल कार्ड की शुरूआत किया जिसे किसानों की जमीनों की गुणवत्ता के बारे में उन्हें पूरी जानकारी मुहैया कराई गई. 14 लाख हेक्टेयर भूमि को हम सिंचाई के उपयुक्त बना लेंगे. यह पहली बार होगा अमरोहा संभल बिजनौर को भी हम बेहतर सिंचाई के लिए जल्द ही मजबूत कर लेंगे. इस वर्ष हम लोगों ने 53 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा जिसका सीधा पैसा किसानों के खाते में भेज दिया गया जिसको आरटीजीएस के माध्यम से पहुंचाया गया.

हमारी सरकार ने किसानों के हित में क्या लाभ मिलना चाहिए उस आधार पर सभी संस्थाओं के साथ मिलकर योजनाएं बनाई चाहे किसी भी वर्क का किसान हो हम उसकी उन्नति के लिए कार्य कर रहे हैं.

अपराधों के पीछे है सामाजिक आर्थिक मनोविज्ञान

किसी भी देश की राजधानी में बढ़ते अपराधों को कानून व्यवस्था का मामला बता कर टाला नहीं जा सकता. बढ़ रहे अपराध कानून व्यवस्था के साथसाथ देश के सामाजिक आर्थिक मनोविज्ञान को भी  उजागर करते हैं. दिल्ली में रोजाना लूटपाट, चोरी, छीनाझपटी, डकैती, लालच, बेईमानी से लोगों से पैसे ऐंठ लेने जैसी 8-10 घटनाएं आम हैं.

दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में बदमाशों ने दो सगी बहनों की घर में घुस कर निर्मम हत्या कर दी. वारदात के बाद आरोपी कीमती गहने और नकदी लूट कर चले गए. दोनों  अविवाहित बहनें आशा पाठक और ऊषा पाठक करीब 35 सालों से इस इलाके में रहती थीं. ऊषा हापुड़ डिग्री कालेज में म्यूजिक टीचर थीं और आशा कृषि भवन में इंडियन काउंसिल औफ एग्रीकल्चर रिसर्च में लाइब्रेरियन थीं.

पुलिस ने खोजबीन की तो देखा कि घर में सारा सामान बिखरा पड़ा हैं. बदमाश कितना माल ले गए, पता नहीं चल पाया. मृतक बहनों के रिश्तेदारों से पता चल पाएगा.

मौरिशनगर में बाइक सवार बदमाशों ने स्कूटी सवार युवक को गिरा कर दो लाख रुपए लूट लिए. युवक अपने मालिक की पेमेंट ले कर आ रहा था. इसी तरह सराय रोहिल्ला इलाके में बदमाशों ने वीना साहनी नामक महिला को सम्मोहित कर लाखों की ज्वेलरी लूट ली.

यमुना पार इलाके में एक महिला को दिवाली पर लक्ष्मी के रूठने की बात कह कर सोने की चैन लूट ली. महिला के पास दो युवक आए और कहा कि आप ने लक्ष्मी रूठी हुई है इसलिए कुछ अनर्थ हो जाएगा. यह कह कर युवकों ने महिला से सोने की चैन उतरवा ली और भाग गए.

शाहदरा के आनंद विहार में वैवाहिक विज्ञापन के जरिए एक युवती से दोस्ती गांठ कर फाइनेंस स्कीम में कई गुना रिटर्न का झांसा दे कर 9 लाख रुपए ठग लिए गए. युवती का वैवाहिक वेबसाइट क के जरिए एक युवक से परिचय हुआ था. युवक ने सुमित जैन नाम से वैवाहिक वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन करा रखा था. उस ने खुद को शेयर मार्केट से जुड़ी एक बड़ी कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत अधिकारी बताया.

युवक ने युवती और उस के भाई को कम इंवेस्टमेंट में बहुत ज्यादा का लालच दिया. युवती और उस का भाईर् लालच में आ गए. आरोपी ने दोनों से करीब नौ लाख रुपए अलगअलग बैंक खातों में जमा करा लिए. इस के बाद आरोपी ने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया.

हथियारों के बल पर लूटपाट करने वाले अपराधी भी हैं तो लोभलालच दे कर बिना शारीरिक हानि पहुंचाए धन ऐंठने वाले भी. अपराधी नाबालिग से ले कर युवाओं, महिलाओं, वृद्घों तक को लूटने में नहीं झिझकते.

दिल्ली पुलिस के आंकड़ों की बात करें तो दिल्ली में हर रोज 8-10 वारदातें होती हैं. इस साल दिल्ली में 15 अक्तूबर तक केवल लूटपाट की 1936 घटनाएं हो चुकी हैं.

खास बात यह है कि अपराधों में पढ़ेलिखे युवकों संख्या अधिक हैं. इन में कई इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट डिग्री धारक हैं तो कई सामान्य ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट भी हैं. ऐसे अपराधियों के खुलासे वास्तव में समाज की सोचनीय दशा की ओर संकेत उजागर करता है.

समाज किस ओर जा रहा है? हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, जैसे सवाल उठना भी लाजिमी है.

असल में आज युवा बिना मेहनत किए रातोंरात अमीर बन जाना चाहते हैं. मांबाप जब तक जेब खर्च देते रहते हैं तब तक ठीक है, जेब खर्च बंद होने या खर्चा अधिक करने वाले युवा अपराध के जरिए पैसा जुटाने लगते हैं. दोस्तों में पार्टियां, महंगे गजेट्स, गाड़ी और प्रेमिकाओं के खर्च मेहनत की कमाई से कोई नहीं उठाना चाहता.

पढ़ेलिखे युवा डिग्रियां ले कर रोजगार के लिए ऐसे सोचते हैं मानो उन्हें घर बैठे ही मिल जाएगा. बहुत से शिक्षित युवकों को पता ही नहीं होता, उन्हें नौकरी कहां तलाशनी है.

समाज में भी आज पैसे की अहमियत अधिक बढ़ गई है. यह पैसा आप ने कहां से कमाया, इसे नहीं देखा जाता. बस पैसा चाहे काली चोरी, बेईमानी का ही हो इसीलिए समाज में अपराधियों की भी इज्जत पैसे की वजह से बढ़ रही है.

युवा जब मेहनत नहीं करना चाहेगा और बढती इच्छाओं की पूर्ति धनाभाव के चलते कर नहीं पाते तो अपराध के रास्ते अख्तियार करना आसान लगते लगता है.

लिहाजा बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था की वजह कम, इस के पीछे सामाजिकआर्थिक कुव्यवस्था अधिक जिम्मेदार है. धनलिप्सा, बढती होड़, धन का दिखावा, भौतिक सुविधाओं की बेलगाम इच्छाओं पर लगाम कैसे लगे, इन सब बातों को समाज को ही सोचना होगा.

बाजार : सैफ अली खान, रोहन मेहरा और राधिका का शानदार अभिनय

पैसा, धोखा, लालच, वासना, क्रोध, ईष्या/जलन, आलस्य व अहंकार इन इंसानी स्वभावों के साथ शेयर बाजार के उतार चढ़ाव व उससे जुड़े इंसानों की जिंदगी में झांकने वाली रोचक कहानी है-फिल्म ‘‘बाजार’’. जो कि हर वर्ग के दर्शक को पसंद आएगी. फिल्म में इस बात को भी रेखांकित किया गया है कि सपना और महत्वाकांक्षा बहुत अलग चीज हैं. ‘‘बाजार’’ में इस सवाल को बड़ी बारीकी से उठाया गया है कि पैसा कमाने के लिए या बड़ा आदमी बनने के लिए आप किस हद तक जाएंगे, कितनी लाइन क्रौस करेंगे?

फिल्म की कहानी के केंद्र में चार मुख्य पात्र हैं. शकुन कोठारी (सैफ अली खान) व उनकी पत्नी मंदिरा कोठारी (चित्रांगदा सिंह) तथा रिजवान अहमद (रोहन मेहरा) और उनकी प्रेमिका व सहकर्मी प्रिया रौय (राधिका आप्टे). सूरत में आंगड़िया के यहां नौकरी से शुरुआत कर शकुन कोठारी मुंबई में डायमंड मार्केट के साथ ही शेयर बाजार के राजा बने हैं. पचास करोड़ की कंपनी को उन्होंने पांच हजार करोड़ में बदल दिया. अब वह 10 हजार करोड़ के ऊपर का गेम खेल रहे हैं. वह ऐसे उद्योगपति हैं, जो पैसे के लिए कुछ भी करेंगे.

शेयर बाजार से जुड़े लोग उन्हे धोखेबाज इंसान मानते हैं, जबकि खुद शकुन का मानना है कि वह तो सिर्फ व्यापार कर रहा है. पर उन्हें अपनी बेटियों के भविष्य का डर जरूर सताता है. शकुन कोठारी जिस उद्योगपति के यहां नौकरी करते थे, उसी की बेटी मंदिरा से शादी की है. शकुन कोठारी व मंदिरा समाज की नजर में पति पत्नी हैं, मगर इनके बीच काफी कड़वाहट है.

उधर इलाहाबाद में एक छोटी सी दुकान में काम करने वाले रिजवान अहमद का सपना मुंबई में बहुत बड़ा आदमी बनना है. उसकी तमन्ना शकुन कोठारी के साथ काम करने और शकुन की तरह मैगजीन के कवर पर अपनी फोटो छपे देखना है. रिजवान अहमद सिर्फ सपने नहीं देखता, बल्कि अति महत्वाकांक्षी युवक है. मुंबई में प्रिया रौय व रिजवान एक ही जगह काम करते हैं और फिर दोनों के बीच रोमांस भी है. इनके रोमांस के साथ साथ इनकी अपनी एक यात्रा है. पर यह जोड़ी बहुत परफैक्ट है. स्टाक मार्केट पर नजर रखने वाली सेबी के इंस्पेक्टर गुप्ता (मनीष चौधरी) लंबे समय से शकुन कोठारी की जांच कर रहे हैं, पर शकुन कोठारी कोई सबूत ही नही छोड़ता.

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इधर शकुन और रिजवान दोनों अपने सपने व महत्वाकांक्षा को पूरी करने की दौड़ में लगे हुए हैं. दोनों शून्य से शुरुआत कर आकाश तक पहुंचते हैं. फिर किस तरह से टेलीकौम घोटाला होता है. पर अपनी इस यात्रा में शकुन व रिजवान दोनों में से कौन क्या खोता हैं? जब दोनों एक ही मुकाम पर पहुंच जाते हैं, तब दोनों के बीच क्या होता है, इसकी भी यात्रा है.

बतौर स्वतंत्र निर्देशक गौरव के चावला की यह पहली फिल्म है. पर पहली ही फिल्म में उन्होंने कमाल का निर्देशन किया है.

शेयर बाजार बहुत ही शुष्क विषय है. ऐसे विषय पर मनोरंजक फिल्म बनाना आसान नहीं कहा जा सकता. मगर पटकथा लेखकों व निर्देशक की सूझबूझ के चलते यह ऐसी दिलचस्प व मनोरंजक फिल्म बनी है, जिसे देखते हुए वह इंसान भी आनंद लेता है, जिसे शेयर बाजार की जटिलताओं की समझ नहीं है. एक बेहतरीन पटकथा लेखन के लिए फिल्म के पटकथा लेखकों की भी दाद देनी पड़ेगी. फिल्म के संवाद काफी बेहतरीन बन पड़े हैं. फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि फिल्म सिर्फ शेयर बाजार की ही बात नहीं करती, बल्कि पारिवारिक रिश्तों, दोस्ती, प्यार व इंसानी भावनाओं की भी बात करती है.

इतना ही नही फिल्म में हर किरदार की अच्छाई व बुराई के साथ अपने सपनों/महत्वाकांक्षा को पाने के तरीकों और उसके परिणाम भी मनोरंजक व दिलचस्प तरीके से पेश किए गए हैं. फिल्म में इस बात को भी बड़ी बेबाकी के साथ चित्रित किया गया है कि जिस इंसान को आप अपना आदर्श मानते हैं, उसके करीब न जाएं यानी कि उससे न मिलें, अन्यथा उसकी हकीकत जानकर आपको झटका/सदमा लगेगा.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो शकुन कोठारी के किरदार में सैफ अली खान अपने अभिनय से काफी प्रभावित करते हैं. लंबे समय से उनका करियर गड़बड़ चल रहा था. लेकिन इस फिल्म से उन्होंने साबित कर दिखाया कि अभिनय में उनका कोई सानी नहीं है. एक काइयां गुजराती व्यापारी के रूप में वह एकदम जमते हैं.

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रिजवान अहमद के किरदार में अपने समय के स्टार कलाकार रहे स्व.विनोद मेहरा के बेटे रोहन मेहरा ने ऐसा मंजा हुआ शानदार अभिनय किया है कि कहीं इस बात का अहसास नहीं होता कि बतौर अभिनेता यह उनकी पहली फिल्म है.

प्रिया रौय के किरदार में राधिका आप्टे ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह बेहतरीन अदाकारा हैं. यूं तो चित्रांगदा सिंह भी अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं, मगर किरदार की मांग के अनुार कहई जगह उनका अभिनय कुछ कमतर नजर आता है.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बाजार’’ का निर्माण निखिल आडवाणी, वायकाम 18, कायटा प्रोडक्शन, इम्माय इंटरटेनमेंट ने किया है. फिल्म के निर्देशक गौरव के चावला, पटकथा लेखक निखिल आडवाणी, परवेज शेख असीम अरोड़ा, संगीतकार तनिष्क बागची, यो यो हनी सिंह, सोहल सेन, कनिका कपूर, कैमरामैन स्वप्निल सोनावणे तथा फिल्म के कलाकार हैं – सैफ अली खान, चित्रांगदा सिंह, रोहन मेहरा, राधिका आप्टे, डेन्जिल स्मिथ, सौरभ शुक्ला, प्रियंका, अनुप्रिया गोयंका व अन्य.

फैशनेबल लुक्स से दीवाना बनाना चाहती हैं तो वार्डरोब करें अपडेट

आप क्या पहनते हैं, कैसे रहते हैं उस से आप की पसंदनापसंद और जीने का अंदाज पता चलता है. अपनी पर्सनैलिटी को आकर्षक और अपडेट बनाए रखने के लिए जरूरी है आप का वार्डरोब भी अपडेट रहे. इस बारे में फैशन डिजाइनर आशिमा शर्मा के अनुसार आप के वार्डरोब में इस तरह के कपड़े जरूर होने चाहिए:

औफिस के लिए स्टाइल

हमें फैशन के साथ भी खेलना चाहिए और अपने स्टाइल को भी कुछ इस तरह से कैरी करना चाहिए कि वह औफिस के आउटफिट में भी पूरी तरह से सूट करे. मंडे ब्लूज और वीकैंड हैंगओवर को अपने लुक पर हावी न होने दें और अपने वर्कप्लेस पर फैशन दिवा की तरह ही जाएं. औफिस के फैशन में आप को संतुलन बनाए रखने की जरूरत होती है.

लंबे कट वाली कुरतियां

आजकल लड़कियों में लंबे कट वाली कुरतियां काफी लोकप्रिय हैं. दीपिका पादुकोण, नरगिस फाखरी, जैकलिन, जाह्नवी जैसी कितनी ही बौलीवुड बालाएं इन कुरतियों में नजर आती हैं.

कई तरह की कट वाली कुरतियां चलन में हैं जैसे बीच में कमर के ऊपर से ले कर नीचे तक, साइड कट, कुरते के दोनों तरफ लंबा कट आदि. इस तरह की कुरतियों को आप जींस और ऐंकल लैंथ की लैगिंग के साथ भी पहन सकती हैं. इन कुरतियों के साथ हुप इयररिंग्स, फ्लैट्स, जूतियों का कौंबिनेशन अच्छा लगता है. इन्हें आप कालेज, औफिस या किसी और मौके पर भी कैजुअल वियर के रूप में पहन सकती हैं.

लेयरिंग ड्रैसेज

औटम सीजन में गौर्जियस दिखने के लिए आप लेयरिंग वाली डै्रस पहन सकती हैं. लेयरिंग ड्रैस का मतलब है 2-3 कपड़ों को एकसाथ पहनना और यह आजकल काफी ट्रैंड में है. ट्रांसपैरेट शर्ट और जैकेट आदि के नीचे सौलिड कलर वाला टौप पहनें. यह लुक काफी प्रिटी लगता है. इस ड्रैस के नीचे शौर्ट्स और जींस पहनें.

फ्लोरस ड्रैसेज

आप के वार्डरोब में फ्लोरस ड्रैसेज जरूर होनी चाहिए. फ्लोरल पैटर्न वाली ड्रैसेज अकसर स्प्रिंग और समर सीजन में पहनी जाती हैं. इस मौसम में बड़े फ्लोरल प्रिंट चलन में हैं और दिन के समय पहनने के लिए एकदम परफैक्ट हैं. क्रौप टौप के साथ फ्लोरल प्रिंट पैंसिल और पिं्रटेड स्कर्ट पहनें. उस पर हाई हील्स और हुप इयररिंग्स पहन कर स्टाइल पूरा करें. नाइटी फ्लोरा ड्रैस भी पहन सकती हैं. इसे प्लेन डार्क कलर के श्रग के साथ कैरी करें.आप दोस्तों के बीच काफी स्टाइलिश नजर आएंगी. रैग्युलर जींस और टौप के साथ फ्लोरल स्टोल या डैनिम शर्ट और क्रौप टौप के साथ फ्लोरल शर्ट भी कैरी कर सकती हैं.

साटन ड्रैस

स्टाइलिश दिखने के लिए स्मार्ट, शाइनी, ग्लौसी और सुपर सौफ्ट साटन ड्रैसेज आप के वार्डरोब में जरूर होनी चाहिए. एसिमैट्रिकल बोडीकौन और ओवर साइज साटन टौप्स आजकल ट्रैंड में हैं. इसी तरह आप साटन स्पोर्ट रफल स्कर्ट के साथ गोल्ड कलर क्रौप टौप पहन कर भी स्टाइलिश दिख सकती हैं.

प्रिंट जितने छोटे उतने अच्छे

अगर आप औफिस में बेवजह के अटैंशन से बचना चाहती हैं, तो बड़े प्रिंट के कपड़े पहनने से बचें. आजकल फ्लोरल प्रिंट्स टै्रंड में हैं. अपने ब्लाउज का चयन करते समय आप इन्हें ट्राई कर सकती हैं. आप सफेद अथवा पिस्ता कलर वाले बेस के साथ छोटे गुलाब के प्रिंट वाला ब्लाउज ले सकती हैं.

प्रोम ग्लैम आउटफिट

कुछ महिलाएं सोचती हैं कि शाइनी सीक्वैंस वर्क वाले कपड़े उन के लुक को ओवर ऐक्सपोजर वाला बनाते हैं, लेकिन हम आप को बताना चाहते हैं कि यह उस से काफी अलग है. खूबसूरती से डिजाइन की गई मोतियों और सितारों वाली ड्रैस आप के वार्डरोब को बहुत इंटरैस्टिंग बनाती है. सीक्वैंस वर्क वाले कपड़े पहनने पर ज्वैलरी पहनने की भी जरूरत रहेगी. बगैर डायमंड नैकलैस भी आप खूबसूरत दिखेंगी.

मोंटे कार्लो की कार्यकारी निर्देशिका मोनिका ओसवाल कुछ स्टाइल टिप्स दे रही हैं, जिन पर गौर कर आप फैशन गेम में खुद को आगे रख सकती हैं.

रंगों के साथ खेल

न्यूट्रल कलर जैसे कि काला, मैरून, सफेद, नेवी, क्रीम, चारकोल और ग्रे कलर अपनाएं. इन में से ज्यादातर रंग पैंट, सूट, स्कर्ट और शूज के लिए पूरी तरह से फिट बैठते हैं.

इन रंगों को सौफ्ट फैमिनाइन रंगों जैसेकि आइस ब्लू, सौफ्ट पिंक आदि के साथ मैच कर के पहनें.

ऐसी ऐक्सैसरीज से बचें

याद रहे, प्रिंट आप की ऐक्सैसरीज की कमी को पूरा करने के लिए होते हैं. इसलिए प्रिंट वाले ब्लाउज के साथ बड़ेबड़े डैंगल इयररिंग्स, लाउड हैडबैंड, ब्राइट ग्लौस वाली चीजों से भी बचें ताकि आप का लुक प्रोफैशनल लगे.

सौलिड कलर के कपड़ों में आप फिर भी कुछ ऐक्सैसरीज इस्तेमाल कर सकती हैं जैसेकि डायमंड के स्टड्स, पर्ल स्टड्स और पर्ल नैकपीस आदि. अपनी ऐक्सैसरीज में बहुत सारे अलगअलग रंगों के इस्तेमाल से बचें. बालों में फ्रैश ब्रैड, साइड चोटी अथवा फ्रैंच रोल ट्राई करें. आजकल स्लीक हेयरस्टाइल का फैशन है. आप पूरी तरह से बंधे हुए बालों के साथ पोनीटेल ट्राई कर सकती हैं. जिन के बाल छोटे हैं उन के पास बालों को खुला रखने का विकल्प हमेशा रहता है, लेकिन जिन के बाल लंबे हैं उन्हें उन को बांध कर रखने की सलाह दी जाती है.

मैटेलिक शेड्स ड्रैसेज

मैटेलिक खास कर गोल्ड और सिल्वर कलर की ड्रैसेज भी आप के वार्डरोब में जरूर होनी चाहिए. थोड़े क्रिएटिव अंदाज वाली शाइनी, मैटेलिक ड्रैस पहन कर आप पार्टी की शान बन सकती हैं. आप ने मैटेलिक कलर की मिडी पहनी हो या औफशौल्डर बौडीहगिंग ड्रैस, आप का स्टाइल दूसरों से अलग दिखेगा.

कट्स और कर्व्ज

जब भी प्रोफैशनल वर्क क्लोथ्स की बात आती है, तब आप की डै्रस हमेशा इस तरह से सिली होनी चाहिए कि वह आप के शरीर पर सही ढंग से फिट हो. हमेशा परंपरागत कट वाली ड्रैस ही चुनें. ऐसे कपड़े पहनने से बचें जिन की फिटिंग अच्छी न हो. ज्यादातर भारतीय महिलाओं का शरीर गिटार अथवा पीयर शेप में होता है (बौटम थोड़ा अधिक हैवी होता है) इसलिए अच्छी फिटिंग वाले ट्राउजर, पैंट का चुनाव करें. पैंट फिट जरूर होनी चाहिए, लेकिन यह बहुत टाइट भी न हो और इस के अंदर से पैंटी लाइन बिलकुल न दिखें. आप की स्कर्ट घुटनों अथवा उन से नीचे तक पहुंचनी चाहिए और यह इतनी लूज होनी चाहिए कि आप आराम से बैठ सकें. काम की जगह पर टाइट फिटिंग वाले कपड़े न पहनें.

अकेली महिला के जीवन को आसान बना सकते हैं मनी मैनेजमैंट के ये गुर

नीरा का पति उस की गोद में 3 साल की बच्ची छोड़ कर 2 साल बाद लौटने की कह नई जौब के सिलसिले में आस्ट्रेलिया चला गया. मगर कुछ ही महीनों बाद उस ने वहां दूसरी शादी कर ली और फिर नीरा को पति से अलगाव स्वीकारना पड़ा.

नीरा ने जिंदगी की नई चुनौती को स्वीकार अपनी बेटी की परवरिश करते हुए इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स कर नौकरी कर ली. तलाक पर जो धनराशि मिली उसे बैंक में जमा करा दिया. इस तरह उस की जिंदगी आराम से गुजरने लगी.

जी हां, अगर 40 पार साथी का साथ छूट जाए तब भी आर्थिक सबलता जीने की ललक बरकरार रखती है. मगर आराम से बीत रही जिंदगी में कोई एक गलत कदम जीवन में उथलपुथल भी मचा सकता है.

कुछ ऐसा ही नीरा के साथ भी हुआ. अच्छीभली नौकरी करने और तलाक पर मिली धनराशि से उस का जीवन आराम से गुजर रहा था कि अपने भाई के कहने पर नीरा ने अपनी इंटीरियर की शौप खोल ली. मगर बाजार की स्थिति का सही अंदाजा न लगाने और बिना पूछताछ किए महंगी दर पर लोन लेने की वजह से उसे लोन की किस्तें भरने में परेशानी होने लगी, जिस की वजह से वह डिप्रैशन में रहने लगी. फिर घाटा झेल कर उसे दुकान बंद करनी पड़ी.

सोचसमझ कर निर्णय लें

अकेली महिला की जिम्मेदारी उस की खुद की होती है और अगर ऊपर से बच्चों के पालनपोषण की भी जिम्मेदारी हो तो उसे कोई भी निर्णय बहुत सोचसमझ कर लेना चाहिए. पेश हैं, इस संबंध में कुछ टिप्स:

– सब से पहले खुद को मजबूत रखें, टूटें नहीं.

– खुद की गुरु बनें. अपनी इच्छाशक्ति को प्रबल बना कर अपनी आर्थिक स्थिति पर को मजबूत बनाने की कोशिश करें.

– नौकरी करें या व्यवसाय अपनी जमापूंजी का उपयोग इस तरह करें कि जीने की स्वतंत्रता बनी रहे.

– नौकरी या बिजनैस करने की सोच रही हैं तो बाजार की स्थिति पर जरूर ध्यान दें, क्योंकि बाजार का नफानुकसान एक महत्त्वपूर्ण पहलू है.

– अगर आप स्वतंत्र व्यवसाय कर रही हैं, तो उन संस्थानों के बारे में भी जानकारी हासिल करती रहें जो जरूरत पड़ने पर लोन दे सकते हों. लो रेट इंट्रैस्ट स्कीम, इंसैंटिव वगैरा की सही जानकारी रखें. व्यवसाय में चतुरता और सतर्कता हर पल जरूरी है.

– अकसर महिलाएं घूमनेफिरने, अपने शौक पूरे करने के चक्कर में अपनी जमापूंजी बेहिसाब खर्चने लगती हैं. ब्यूटी क्लिनिकों में महंगे उपचारों पर हजारों रुपए बरबाद करती हैं, इस से उन को कंगाल होते देर नहीं लगती.

– अगर हाल ही में अलगाव या तलाक हुआ हो तब भी निराशा और अकेलेपन के चलते बेतुका खर्च संभव है.

– दोस्तों, रिश्तेदारों के साथ आनाजाना, खानापीना जरूर रखें, लेकिन ध्यान रहे कि पैसा आप का मुख्य सहारा है. अगर यह पास न रहा तो यह कटु सत्य है कि आप का कोई न होगा. इसलिए खर्च के मामले में अपने संतुलित दिमाग का प्रयोग करें.

– कई बार अकेलेपन के चलते महिलाएं खुद को पापी मान कर दानदक्षिणा, पंडितोंमौलवियों के जाल में फंस कर अपनी जमापूंजी लुटाने लगती हैं. अगर आप के साथ भी ऐसा होने लगा है तो सतर्क हो जाएं.

– आर्थिक स्वतंत्रता का मुख्य उद्देश्य है इंसान को सबल आधार मिले ताकि वह सुरक्षित जीवन जी सके. इस के लिए खर्च के मामले में सतर्क रहने की जरूरत है. किसी के भी कहने से कहीं भी जमापूंजी फंसाने से बचें.

ये रोजगार आप को कम जोखिम में ज्यादा मुनाफा दे सकते हैं:

– आजकल वैब डिजाइनिंग, ऐनिमेशन, ग्राफिक्स आदि कोर्स कर के व्यवसाय किया जा सकता है या फिर मीडिया, फिल्म मेकिंग संस्थानों से जुड़ा जा सकता है.

– औन लाइन ब्लौग राइटिंग के जरीए अपनी रचनात्मक प्रतिभा का इस्तेमाल रोजगार के तौर पर कर सकती हैं.

– इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स कर फ्रीलांस बिजनैस कर सकती हैं या फिर किसी संस्थान में भी नौकरी कर सकती हैं.

– अगर भाषा ज्ञान, साहस और प्रस्तुतीकरण की क्षमता है तो पत्रकारिता में डिप्लोमा, डिगरी ले कर इस क्षेत्र में काम कर सकती हैं.

क्या द्रोण आचार्य कहलाने के पात्र थे

महाभारत काल में और आज के समय में समाज, नैतिक मूल्यों, विचारधारा और शिक्षा आदि क्षेत्रों में बहुत बदलाव आया है. कुछ सामाजिक परिस्थितियों के चलते तो कुछ भारतीय समाज के गिरे हुए नैतिक मूल्यों के प्रसार ने शिक्षा जैसे सामाजिक कार्य को भी व्यवसाय बना दिया है. यहां हमारा उद्देश्य शिक्षकों की बदलती स्थिति की चर्चा करना नहीं बल्कि एक ऐसे गुरु की छवि की चर्चा करना है जिसे बरबस ही प्रसिद्धि मिल गई, जिस का प्रमाण है कि आज भी कई लोगों के मुख से यह कहते सुना जा सकता है, ‘आज द्रोणाचार्य जैसे आदर्श गुरु नहीं रहे और अर्जुन जैसे शिष्यों की संख्या भी नाममात्र रह गई है.’ जिन लोगों ने महाभारत नामक ऐतिहासिक ग्रंथ का गंभीरता से अध्ययन किया है उन की नजर में परशुराम के शिष्य और पांडवों व कौरवों के गुरु आचार्य द्रोण की छवि कदापि आदर्श गुरु की नहीं हो सकती. महाभारत को धार्मिक ग्रंथों के बजाय ऐतिहासिक ग्रंथों की श्रेणी में इसलिए रखा गया है, क्योंकि महाभारत में धर्म का पालन अगर कौरवों ने नहीं किया तो पांडव पुत्र भी धर्म के मार्ग से कई बार विचलित हुए हैं. अत: इसे धार्मिक न कहा जाए तो शायद ज्यादा बेहतर होगा.

अब बात आती है गुरु द्रोण की आदर्शता को ले कर प्रमाण की. चलिए, द्रोण के जन्मकाल की विचित्र कथा से शुरू करते हैं. द्रोण, जो जाति प्रथा के कट्टर समर्थक थे, उन के खुद के जन्म की कथा बेहद विचित्र है. मुनि भरद्वाज बहुत कठोर व्रतों का पालन करने वाले थे. एक दिन उन्हें एक खास तरह के यज्ञ का अनुष्ठान करना था. इसलिए वह मुनियों आदि को साथ ले कर गंगा में स्नान करने गए. वहां महर्षि भरद्वाज ने घृताची अप्सरा को देखा जो पहले से ही स्नान कर के नदी के तट पर खड़ी वस्त्र बदल रही थी. वस्त्र बदलते समय उस रूपवती का वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्था में देख कर भरद्वाज महर्षि का मन डोल गया. ऋषि का मन उस अप्सरा में आसक्त हुआ, इस से उन का वीर्य स्खलित हो गया. ऋषि ने उस वीर्य को द्रोण यानी यज्ञकलश में रख दिया. तब उस कलश से बालक उत्पन्न हुआ. बालक का जन्म द्रोण से हुआ था इसलिए उस का नाम द्रोण ही रख दिया. इस प्रकार द्रोण को ऋषि भरद्वाज की संतान माना जाता है. कितनी विचित्र है यह कथा.

स्पष्ट है द्रोण किसी विवाहेत्तर संबंध से उत्पन्न हुए. द्रोण ने प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता भरद्वाज से प्राप्त की किंतु मूल रूप से वह परशुराम के शिष्य कहलाए. परशुराम जिस समय वन में जाने की इच्छा से अपना सर्वस्व दान कर रहे थे तो द्रोण उन के सामने पहुंचे और बोले, ‘‘मैं भरद्वाज पुत्र द्रोण धन की इच्छा से आया हूं और ऐेसे धन की याचना करता हूं जिस का कभी अंत न हो.’’ किंतु उस समय परशुराम अपना सबकुछ दान कर चुके थे. उन्होंने द्रोण को अस्त्रशस्त्रों का ज्ञान अथवा अपना शरीर दान में लेने के लिए कहा. द्रोण ने उन से अस्त्रशस्त्र का ज्ञान दानस्वरूप ग्रहण किया.’’ इस में कोई शक नहीं कि द्रोणाचार्य एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण योद्धा थे किंतु ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध व प्रतिशोध की भावनाओं से भरपूर द्रोण ने भेदभाव और पक्षपात की नीति को अपना कर खुद अपनी छवि पर कई दाग लगा दिए.

बात गुरु द्रोण के विद्याकुल से शुरू की जाए तो इस तथ्य को साबित करने में आसानी हो जाएगी कि द्रोण में प्रतिशोध व क्रोध की भावना शुरू से ही कूटकूट कर भरी हुई थी, जिसे वह जीवन के आखिरी समय तक त्याग नहीं सके. द्रोण व द्रुपद एक ही गुरु महर्षि अग्निवेश के शिक्षार्थी थे. दोनों की गहरी दोस्ती एक मिसाल थी. इसी गहरी दोस्ती के चलते द्रुपद के राजसिंहासन पर बैठने के बाद द्रोण ने अपने दोस्त को उस के वचन की याद दिलाई किंतु द्रुपद ने द्रोण को अपमानित कर दिया. शायद द्रोण, द्रुपद के राज्य न देने को ही अपमान समझ बैठे. उस समय उन के मन में बेहद क्रोध तथा प्रतिशोध की भावना को महाभारत ग्रंथ के संभवपर्व के 12वें श्लोक में इस प्रकार प्रकट किया है : द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाज: प्रतापवान.।

मुहूर्ते चिंतयित्वा तु मन्युनाभिपरिप्लुत:। स विनिश्चित्य मनसा पांचाल बुद्धिमान।

जगाम कुरु मुख्यानां नगरं नाग साहृयम्॥ (अर्थात राजा द्रुपद के मना करने पर प्रतापी द्रोण क्रोध से जल उठे और दो घड़ी तक गहरी चिंता में डूबे रहे. वे बुद्धिमान तो थे ही, पांचाल नरेश से बदला लेने के बारे में मन ही मन कुछ निश्चय कर के कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर चले गए.)

भीष्म के द्वारा द्रोण को कौरवों तथा पांडवों का गुरु नियुक्त करने पर द्रोण को दु्रपद से प्रतिशोध लेने का मार्ग नजर आने लगा. अपने इस मनोभाव को उन्होंने भीष्म के समक्ष प्रकट भी किया. महाभारत के संभवपर्व के 76वें श्लोक में वह कहते हैं: अभ्यागच्छं कुरुन् भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वतै:।

ततोऽहं भवत: कामं संवर्धयितुमागत:। इदं नागपुरं रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते।

(अर्थात मैं गुणवान शिष्यों के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि चाहता हुआ आप के मनोरथ को पूर्ण करने के लिए ही पांचाल देश से हस्तिनापुर नगर में आया हूं. बताइए, मैं आप का कौन सा प्रिय कार्य करूं.) गुरु द्रोण द्वारा शिक्षा शुरू करने की नींव ही उन का खुद का स्वार्थ था. यह बात किसी से नहीं छिपी कि अर्जुन द्रोण का प्रिय शिष्य था. उसे उन्होंने पूर्ण रूप से शिक्षा दी. किंतु वास्तव में उचित न्याय तो उन्होंने अर्जुन के साथ भी नहीं किया था. यह अलग बात है कि अर्जुन ने अपनी निष्ठा व लगन के आगे द्रोण को वह सबकुछ सिखाने के लिए विवश कर दिया जो सब उन्होंने अपने पुत्र अश्वत्थामा को गुपचुप सिखाने का प्रयास किया था. महाभारत संभवपर्व के 16वें तथा 17वें श्लोक में वर्णित है :

कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात। पुत्राय च ददौ कुंभमविलंब चकारणात॥

यावत् ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम्। द्रोण आचष्ट पुत्राय तत कर्म जिष्णुरौहत॥

(अर्थात द्रोणाचार्य अन्य सब शिष्यों को तो पानी लाने के लिए कमंडल देते जिस से उन्हें लौटने में कुछ विलंब हो जाए, परंतु अपने पुत्र अश्वत्थामा को बडे़ मुंह का घड़ा देते जिस से वह पानी भरने के कार्य से शीघ्र निवृत्त हो जाए. जब तक दूसरे शिष्य लौट नहीं आते, तब तक द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा को अस्त्र संचालन की कोई उत्तम विधि बतलाते थे.) चूंकि अर्जुन ने उन के इस कार्य को जान लिया था अत: वह शीघ्रता से कमंडल भर कर आचार्यपुत्र अश्वत्थामा के साथ ही गुरु के समीप आ जाता जिस से गुरु द्रोण उन्हें गुप्त अस्त्र विद्या सिखाने के लिए विवश हो गए. वास्तव में पुत्र मोह में जितना अंधा धृतराष्ट्र को माना जाता है उतना ही पुत्र मोह द्रोण में भी था. वह अपने पुत्र अश्वत्थामा को संसार का सब से बड़ा धनुर्धर बनाना चाहते थे. किंतु हालात के चलते अर्जुन ने वह स्थान प्राप्त कर लिया.

अर्जुन के बढ़ते हुए धनुष कला कौशल को देख कर द्रोण ने ईर्ष्या भाव से रसोइए से यहां तक कह दिया कि तुम अर्जुन को कभी अंधेरे में भोजन न परोसना और मेरी बात भी अर्जुन से कभी न कहना. ध्यान देने योग्य बात है कि अर्जुन को अंधेरे में धनुष अभ्यास की प्रेरणा अंधेरे में भोजन कर रहे भीम से प्राप्त हुई थी. द्रोण की भेदभाव व पक्षपातपूर्ण नीति से महाभारत के पाठक तब अवगत हो जाते हैं, जब एकलव्य की कथा उभर कर आती है. द्रोणाचार्य का अस्त्र कौशल सुन कर हजारों राजा और राजकुमार धनुर्वेद की शिक्षा लेने के लिए वहां जमा

हो गए. तदनंतर निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य द्रोण के पास आया, पर उसे निषाद पुत्र जान कर धर्मज्ञ आचार्य ने धनुर्विद्या विषयक शिष्य नहीं बनाया. एकलव्य ने द्रोणाचार्य के चरणों में प्रणाम किया और वन में लौट कर उन की मिट्टी की मूर्ति बनाई तथा उसी में आचार्य की परम उच्च भावना रख कर उस ने धनुर्विद्या का अभ्यास शुरू किया. एकलव्य ने अपने निरंतर अभ्यास से धनुर्वेद का ज्ञान अर्जित किया तथा स्वयं को द्रोणाचार्य का शिष्य माना. किंतु द्रोण ने क्या किया? अपने एक ऐसे शिष्य से जिसे शिक्षा देने में उन्होंने जरा भी परिश्रम नहीं किया, गुरु दक्षिणास्वरूप उस के दाहिने हाथ का अंगूठा केवल इस कारण से गुरुदक्षिणा में मांग लिया कि वह उन के प्रिय शिष्य अर्जुन से अधिक निपुण था और अर्जुन को उन्होंने वचन दिया था कि द्रोण का कोई भी शिष्य उस से बढ़ कर नहीं हो सकता. ईर्ष्या तथा द्वेष की भावना से भरा द्रोण का हृदय क्षण भर के लिए नहीं कांपा जब उन्होंने एकलव्य से कहा कि

तमवतीत् त्वयाडंगुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति। (अर्थात तुम मुझे गुरुदक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा दे दो.)

इतने वर्ष बीत जाने पर भी द्रोण के मन से द्रुपद के प्रति प्रतिशोध की भावना खत्म नहीं हुई. गुरुदक्षिणा के रूप में उन्होंने कौरवों एवं पांडवों से द्रुपद को युद्ध में कैद करने के लिए कहा. पांडवों द्वारा यज्ञसेन द्रुपद को मंत्रियों सहित संग्राम भूमि में बंदी बना कर द्रोणाचार्य को उपहारस्वरूप दे दिया गया. द्रोण ने उस समय द्रुपद का अपमान करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा. वह द्रुपद से व्यंग्यपूर्ण बोले : विमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया।

प्राप्य जीवं रिपुवशं सखिपूर्व किमिष्यते॥ (अर्थात मैं ने बलपूर्वक तुम्हारे राष्ट्र को रौंद डाला, तुम्हारी राजधानी मिट्टी में मिला दी. अब तुम शत्रु के वश में पडे़ हुए जीवन को ले कर यहां आए हो. बोलो, अब पुरानी मित्रता चाहते हो क्या?)

ऐसा कह कर द्रोणाचार्य कुछ हंसे. इस के बाद बोले, ‘‘वीर, प्राणों पर संकट आया जान भयभीत न होओ. तुम बचपन में मेरे साथ आश्रम में खेलेकूदे हो उस से तुम्हारे ऊपर मेरा स्नेह व प्रेम बहुत बढ़ गया है. तुम इस राज्य का आधा भाग मुझ से ले लो.’’ इस प्रकार द्रोण ने द्रुपद से प्रति- शोध लिया किंतु प्रतिशोध की भावना यहीं पर समाप्त नहीं हुई. महाभारत युद्ध में सेनापति बनने पर द्रोण ने द्रुपद की हत्या कर के अपने प्रतिशोध को अंतिम रूप दिया.

ऐसा नहीं है कि महाभारत के रचनाकार ने द्रोण के सभी क्रियाकलापों को नजरअंदाज किया है. महाभारत के द्रोणपर्व के अध्याय 190 के 32 से ले कर 40 तक के 9 श्लोकों में द्रोण की आलोचना भी की गई है किंतु यह आलोचना इतनी माने नहीं रखती. महाभारत के इतने श्लोकों में से केवल 9-10 श्लोकों में एक ऐसे व्यक्ति की थोड़ी सी आलोचना की गई जिस ने अपने शिष्यों के होते हुए बुरे कर्म को भी अपनी आंखों के सामने होते देखा किंतु मौन रहे. धृतराष्ट्र की राजसभा में उस समय कौरवों तथा पांडवों के गुरु द्रोण भी उपस्थित थे जब द्रोपदी को चोटी से पकड़ घसीट कर भरी सभा में लाया गया. द्रोपदी उस समय रजस्वला थी और एक ही वस्त्र में थी. ऐसी स्थिति में दुर्योधन का उसे अपनी जंघा पर बैठने के लिए कहना, दुशासन द्वारा उस के चीरहरण का प्रयास करना कोई छोटी बात नहीं थी किंतु ऐसे गंभीर अवसर पर भी गुरु द्रोण चुप रहे. उन्होंने अपने शिष्यों से एक शब्द भी नहीं कहा. वह चाहते तो अपने शिष्यों को ऐसा दुष्कर्म न करने का आदेश दे सकते थे किंतु नहीं. आखिर कैसे गुरु थे वह?

पांडवों को जब वनवास हुआ तो द्रोण जानते थे कि सबकुछ गलत हो रहा है किंतु उन्होंने अपना मौन नहीं तोड़ा. अगर वह चाहते तो कौरवों का साथ छोड़ कर पांडवों के साथ हस्तिनापुर का त्याग कर सकते थे. पितामह भीष्म की तरह वह हस्तिनापुर के साथ किसी बंधन से नहीं जकड़े थे. किंतु शायद राजसी सुख को त्यागना उन्हें गवारा नहीं था. पांडव जब अज्ञातवास का 1 वर्ष पूरा कर रहे थे तो द्रोण कहते हैं सांम्प्रतं चैव यतं कार्य तचक्षिप्रमकालिकम।

क्रियतां साधु संचिनत्य वासश्चैषां प्रचिन्त्यताम॥ यथावत पांडुपुत्राणां सर्वार्थेषु धृतात्मनाम।

(विराटपर्व, श्लोक 7-8) (अर्थात इस समय जो कुछ करना है सोचविचार कर शीघ्र किया जाना चाहिए. इस में विलंब उचित नहीं है. सभी विषयों में धैर्य करने वाले उन पांडवों के निवास स्थान का ही ठीकठाक पता लगाना चाहिए. वे सभी शूर और तपस्या से आवृत्त हैं, अत: उन्हें पाना कठिन है. पा लेने पर भी पहचानना तो और भी कठिन है.)

द्रोण एक ओर तो अपने शिष्य अर्जुन की प्रशंसा करते नहीं थकते थे किंतु दूसरी ओर गोहरणपर्व के 18वें और 19वें श्लोक में दोगलेपन की नीति अपनाते हुए वह कहते हैं: यदेतत प्रथमं वाक्यं भीष्म: शान्तनवोब्रवीत।

तेनैवाहं प्रसन्नो वै नीतिरत्र विधीयताम्॥ यथा दुर्योधनं पार्थों नोपसर्पति संगरे।

साहसाद यदि वा मोहात यथा नीतिर्विधीयताम॥ यानी अब ऐसी नीति से काम लेना चाहिए जिस से अर्जुन इस युद्ध में दुर्योधन के पास तक न पहुंच सके. साहस से अथवा प्रमादवश भी दुर्योधन पर उस का आक्रमण न हो, ऐसी नीति निर्धारित करनी चाहिए.

द्रोण के ही नेतृत्व में अभिमन्यु की जिस निर्ममता से हत्या की गई उसे कैसे भूला जा सकता है. द्रोण के चरित्र पर इतने आक्षेप होने के बावजूद उन्हें शोहरत मिली हुई है. समझ में नहीं आता इस का क्या कारण हो सकता है? शायद परशुराम सरीखे गुरु के शिष्य होने के गौरव से वह खुद गौरवान्वित हो गए या महाभारत युद्ध के कारण, जो उन के शिष्यों की आपसी फूट का परिणाम था या केवल इसी कारण कि उन्होंने राजघराने के बच्चों को ही अपना शिष्य बनाया. कारण चाहे कुछ भी रहा हो, गौरव तो उन्हें मिला ही है.

धार्मिक आतंकवाद का मुहरा बनते बच्चे

राजस्थान के डूंगरपुर जिले में कुआं तहसील है और इस तहसील के एक गांव के 10 वर्षीय बालक प्रशांत को महंत बना दिया गया. खेलनेकूदने की उम्र में 7वीं कक्षा के छात्र प्रशांत को इसलिए महंत बनाया गया क्योंकि यादव जाति के महंत ईश्वरदास के समाधि लेने के बाद महंत की गद्दी खाली हो गई थी और पुत्र होने के कारण प्रशांत को इस गद्दी का हकदार माना जाने लगा और नए महंत के रूप में उसे गद्दी सौंप दी गई. इस गद्दी को सौंपने के लिए सूरत के महंत आए थे जिन्होंने मंत्रोच्चार कर और दीक्षा दे कर प्रशांत को यह गद्दी सौंप दी. इस तरह धर्म और जाति की जंजीर से बांध कर एक बचपन का गला घोंट देना कोई पहली या नई बात नहीं बल्कि राजस्थान सहित देश के अलगअलग राज्यों में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं और देशभर में आज लाखों बच्चों को धर्म के शिकंजों में बांध कर धर्म के वीभत्स स्वरूप को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसे रोकने के लिए न तो देश में कोई कानून है और न ही इस का विरोध करने की किसी में हिम्मत.

राजस्थान के 28 और गुजरात के 45 गांवों के लोग महंत बनाए गए इस मासूम को अब अपना गुरु मानेंगे और इस बच्चे द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलेंगे. गांव के लोगों का कहना है कि यह बालक समाज की उन्नति और विकास के लिए काम करेगा और उन की जाति में होने वाली किसी भी तरह की कुरीतियों और बुराइयों का विरोध कर उसे खत्म करने का प्रयास करेगा. सवाल उठता है कि वह बच्चा जिस की खुद की शिक्षा ही न पूरी हो पाई हो, जो अभी दूसरों से ज्ञान पाने का जरूरतमंद हो और भलेबुरे में भेद न जानता हो वह दूसरों को क्या शिक्षा देगा या कौन सी सही दिशा दिखाएगा. दरअसल, इस तरह बालक को महंत की पदवी दे कर जाति विशेष का गुरु बना देना कोई समाज सुधार का काम नहीं बल्कि यह तो धर्म के ठेकेदारों की एक साजिश है जिस में इस मासूम बच्चे को देवता या महंत का स्वरूप बता कर इस के माध्यम से लोगों को ठगने का निशाना आसानी से साधा जा सकता है.

सस्ते मजदूर बच्चे धर्म के ठेकेदारों द्वारा बच्चों को बड़ी संख्या में शिष्य बना कर अपने साथ रखने, धर्म की शिक्षा देने या बाल महंत बनाने का सब से बड़ा कारण यह है कि धर्म की शिक्षा प्राप्त ये बच्चे इन सब से वफादार होने के साथसाथ सस्ते मजदूर के रूप में काम करते हैं. इन धार्मिक बाल मजदूरों को दो वक्त की रोटी और पहनने के लिए कपड़े के अलावा किसी चीज से मतलब नहीं होता क्योंकि ये बड़े साधु, महंत या धर्म के ठेकेदार इन बच्चों को अपने अनुसार ढाल लेते हैं. वहीं इन के भोलेपन के कारण लोगों का इन पर भरोसा भी ज्यादा होता है और चढ़ावा भी ज्यादा चढ़ता है. लेकिन चढ़ावे की राशि में से बड़ा हिस्सा इन बड़े महंतों की झोली में ही चला जाता है तो आखिर क्यों न ये बड़े महंत शिक्षा के नाम पर इन धार्मिक बाल मजदूरों को अपने यहां पालें.

बच्चों का शोषण देश भर में सैकड़ों नहीं हजारों ऐसे आश्रम हैं जहां बच्चों को धर्म की शिक्षा दी जा रही है. इन बच्चों को धर्म की शिक्षा सिर्फ इसलिए दी जाती है कि ये कम उम्र से ही धर्म के प्रति इतने कट्टर हो जाएं कि धार्मिक आतंकवादी का रूप ले लें और धार्मिक गतिविधियों के अलावा कुछ दूसरा सोच भी न सकें.

यही नहीं इन आश्रमों में शिक्षा के लिए आए इन बच्चों के शारीरिक शोषण से भी इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन ये बच्चे खुल कर विरोध भी नहीं कर सकते और करते भी हैं तो इन की आवाज को बहुत आसानी से दबा दिया जाता है. पिछले दिनों एक बाबा के छिंदवाड़ा स्थित आश्रम के कुछ बच्चों की मौत आश्रम के परिसर में हो गई थी. इन बच्चों की मौत कोई स्वाभाविक मौत नहीं बल्कि यह किसी न किसी तरह के शोषण का ही नतीजा था. कहा जाता है कि इस तरह के आश्रमों के बच्चों से उलटेसीधे काम करवाने के साथसाथ उन का यौन शोषण भी किया जाता है. लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस तरह की दुर्घटनाओं के बाद भी जल्दी कोई जांच नहीं होती और होती भी है तो आखिरकार मामले की लीपापोती कर दी जाती है.

गेरुआ या सफेद वस्त्र पहन अपने को धन के लोभ या माया से दूर बताने वाले धर्म के ठेकेदार देखने में तो साधारण लगते हैं. इन के नाम से कोई संपत्ति भी नहीं होती है लेकिन अपनी संस्थाओं के नाम से दुनिया भर में ये अरबों की संपत्ति रखते हैं. अलगअलग धर्म के ठेकेदार आए- दिन एकदूसरे पर तरहतरह के आरोप लगाते रहते हैं. कभी ईसाइयों पर धर्म परिवर्तन की तोहमत हिंदू धर्म के ठेकेदार लगाते हैं तो कभी मुसलिम धर्म के ठेकेदार इसलाम को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश में लगे हैं. ये सभी धर्म के ठेकेदार एकदूसरे पर आरोप सिर्फ इसलिए लगाते हैं ताकि ये खुद को एकदूसरे से बेहतर बता कर अपना बचाव कर सकें. पर इन सभी धर्मों के ठेकेदारों का मकसद एक ही होता है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर ज्यादा से ज्यादा चंदा उगाही की जा सके और होता भी यही है. दुनिया भर में लाखों लोग अपनी मेहनत की कमाई में से हर साल धर्म के ठेकेदारों को अरबों का दान दे देते हैं और इस तरह इन पंडेपुजारियों और धर्म के ठेकेदारों की दुकानदारी चलती रहती है.

देश भर में तमाम ऐसे गैर सरकारी संगठन भी बने हैं, जो बच्चों के कल्याण एवं विकास के लिए काम करते रहें. ये गैर सरकारी संगठन फैक्टरियों, दुकानों व घरों में काम करने वाले बाल मजदूरों को पकड़वा कर उन्हें शोषण से मुक्त करवाते हैं. लेकिन देश भर के इन तमाम धार्मिक संस्थाओं के बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे लाखों बच्चों को छुड़वाना तो दूर इन के खिलाफ आवाज उठाने की भी इन में हिम्मत नहीं होती. इस का एकमात्र कारण है कि धर्म के इन ठेकेदारों को बड़ी संख्या में जनता का समर्थन हासिल है और इस जन समर्थन के चलते ही राजनेता या प्रशासन इन का विरोध करने से डरते हैं ताकि जनता का विरोध न झेलना पड़े. छिंदवाड़ा के आश्रम में बच्चों की मौत के बाद देश भर में लोगों ने जिस तरह ऐसे बाबाओं या सफेदपोशों का विरोध किया एवं उन के पुतले फूंके उस से यह तो लगा है कि लोगों में जागरुकता आ रही है. यदि लोग इसी तरह जागरूक बनें और इन धर्म के अंधविश्वासी पचड़ों से बाहर निकल अपने जीवन में वैज्ञानिक सोच को विकसित करें तो वह दिन दूर नहीं जब किसी 10 साल के बच्चे को अपना महंत बना कर उस की पूजा करने के बजाय मांबाप अपने बच्चे को शिक्षित कर उस का आने वाला कल संवारेंगे ताकि पढ़लिख कर उन का बच्चा भी अपनी सोच से देश, समाज, घरपरिवार की सेवा कर सके.

धर्म का नया अवतार ‘खबरिया चैनल’

खबरिया चैनलों में अब खबरें कम धर्म की धारा ज्यादा बहती है. सुबह से ले कर रात तक छोटे परदे पर राशिफल, ग्रहों की चाल, धर्म पर चलने के उपदेश दिए जा रहे हैं. इस सदी में धर्म सब तरफ दिखाई दे या न दे लेकिन धर्म के साए में चलने वाले चैनल अब चारों तरफ उछलकूद मचाते और शांति का उपदेश देने की कोशिश करते जरूर दिखाई देते हैं. अब ये चैनल वही करने पर उतारू हो गए हैं जिसे तांत्रिक, धर्मगुरु, ज्योतिषी व धर्म के ठेकेदार करते हैं. 2-1 धार्मिक चैनल लोकप्रिय क्या हुए टेलीविजन पर इनचैनलों की बाढ़ ही आ गई. धार्मिक चैनलों को पहले भक्ति का चैनल कहा जाता था, जिसे समाज का एक खास तबका ही देखना पसंद करता था लेकिन अब इन्हें देखे बिना युवा हो या बुजुर्ग इन के दिन की शुरुआत ही नहीं होती.

हालत यह है कि धर्म की झंकार अब अंगरेजी और कारोबारी चैनलों की चाल पर भारी पड़ने लगी है. टैम के ताजा आंकड़े बताते हैं कि उच्च आय वर्ग के 31 और मध्यम आय वर्ग के 29 प्रतिशत लोग धार्मिक चैनल देखना पसंद करते हैं यानी 60 प्रतिशत दर्शक आध्यात्मिक चैनलों को अपने करीब बताते हैं. आंकड़े यह भी कहते हैं कि पहले जहां धार्मिक चैनलों का मार्केट शेयर 0.2 प्रतिशत के करीब था, वह अब बढ़ कर 0.9 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. यहां यह भी गौर करने की बात है कि बिजनेस चैनलों का मार्केट शेयर 0.5 प्रतिशत है जबकि अंगरेजी चैनल अभी 0.9 प्रतिशत की अपनी हिस्सेदारी बनाए हुए हैं. अपनी बढ़ती लोकप्रियता के चलते आज धार्मिक चैनल विदेशों में भी लोकप्रिय हो रहे हैं. चैनलों पर धर्म का बाजार

सत्संग और धार्मिक कार्यक्रमों के अलावा धार्मिक चैनलों पर स्वास्थ्य, योग को भी प्राथमिकता दी जा रही है. इन पर दिखाए जाने वाली आयुर्वेदिक दवाओं और स्वास्थ्य नुस्खों को बेच कर मोटी रकम ऐंठी जा रही है. धार्मिक उत्पाद तथा सत्संग, भजनकीर्तन की आडियोवीडियो कैसेट, सीडी, डीवीडी, धार्मिक पुस्तकों के अलावा अगरबत्ती, धूपबत्ती, मालाएं, रुद्राक्षों से ले कर रत्न कहे जाने वाले कीमती पत्थर धड़ल्ले से सेहत और शांति के नाम पर बिक रहे हैं. इन सभी चीजों के साथसाथ टेलीशौपिंग भी आमदनी का एक खास जरिया है. हर्बल दवाओं व आयुर्वेदिक दवाओं का लगभग 10 करोड़ से ज्यादा का कारोबार होता है. आज देश मेें धर्म और अध्यात्म का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक धर्म का कारोबार 2 हजार करोड़ रुपए से ऊपर चला गया है. टीवी चैनलों पर तथाकथित आध्यात्मिक गुरुओं के प्रवचनों ने इसे फलनेफूलने में बड़ी मदद की है. सिर्फ टीवी चैनलों पर ही 15 से 20 करोड़ रुपए का कारोबार होता है. यह बाजार सालाना लगभग 40 फीसदी की दर से विकास कर रहा है.

अंधविश्वास को पुख्ता करता मीडिया धर्म के इस बाजारवाद में इलेक्ट्रौनिक मीडिया अंधविश्वासों को इस कदर पुख्ता कर रहा है कि यदि सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण या और कोई खगोलीय घटना हो, तो हमारे हिंदी खबरिया चैनल किसी पंडित या ज्योतिषी के साथसाथ किसी ऐसे व्यक्ति को भी बुलाते हैं जो वैज्ञानिक दृष्टि से इन घटनाओं को परखता है. बीच में एंकर साहब बैठते हैं और फिर विज्ञान और अंधविश्वास के बीच खेल शुरू हो जाता है. नदियों में ग्रहण के अवसर पर स्नान करते हुए श्रद्धालुओं की तसवीरें दिखाई जाती हैं और ग्रहण जैसी कुदरती घटना को इस तरह पेश किया जाता है मानो धरती पर कोई बहुत बड़ा अजूबा हो रहा है जिस का हमारे जीवन पर गहरा असर पड़ने वाला है.

भविष्य के खोखले सपने हर समाचार चैनल पर आप को ग्रहों का हाल बताने वाले, टैरोकार्ड खींच कर भविष्यफल निकालने वाले और ग्रहों की शांति के उपाय बताने वाले मिल जाएंगे. सुबह भविष्यफल बताने वालों की भीड़ लग जाती है. हर चैनल ग्रहनक्षत्रों की चाल से दर्शकों की राशि के अनुसार उन के आज के दिन का अंदाजा लगाता नजर आता है. आज के दिन कौन सा रंग आप के लिए शुभ है, किस से कितनी बात करें, दोस्त से कैसा व्यवहार करें, किस वाहन का प्रयोग करें. सब अटपटे सुझाव राशिफल में पेश कर के मूर्ख जनता की जिंदगी को अपने इशारों पर नचाते हैं और अंधविश्वास में जकड़ी जनता अपना हर कदम राशि के हिसाब से रखती है और दिन का अंत अगर अच्छा हो जाए तो उस का श्रेय राशि को देती है. ये कार्यक्रम घंटों चलते हैं और अकसर फोनइन कार्यक्रम होते हैं जिन में दर्शकों की भागीदारी भी रहती है.

ज्यादातर चैनल ज्योतिषी या भविष्यफल जानने के लिए खास कार्यक्रम पेश करते हैं. इन कार्यक्रमों में एक ओर जहां जैकी श्रौफ रंगबिरंगे पत्थर बेचते नजर आते हैं वहीं बेजान दारूवाला के साथ फिल्म अभिनेत्री रति अग्निहोत्री एकमुखी रुद्राक्ष के साथ कीमती पत्थर बेचती है. कुकुरमुत्ते की तरह उग आए निजी मनोरंजन चैनल तो पैसे कमाने की होड़ और अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए मनगढ़ंत कहानियों को आधार बना कर कार्यक्रमों को पेश कर अंधविश्वासों व कोरी कल्पनाओं को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि इस के लिए दोषी क्या सिर्फराशिफल दिखलाने वाले वे चैनल हैं या फिर वे दर्शक भी हैं जो ऐसे ऊटपटांग कार्यक्रमों को देख कर चैनल वालों को ऐसा करने को उकसाते हैं.

ऊलजलूल कहानियां एक चैनल अचानक चीखते-चिल्लाते हुए घोषणा करता है कि उसे ‘रावण की ममी’ मिल गई है. ‘रावण की ममी मिली, विज्ञान को चुनौती.’ यह चैनल अपने अति उत्साह में यह भूल गया कि वह विज्ञान को नहीं, बल्कि महर्षि वाल्मीकि को चुनौती दे रहा है.

अभी कुछ ही दिन पहले एक समाचार चैनल बता रहा था, ‘यह रास्ता यमलोक को जाता है.’ उस का दावा था कि यमलोक का पता चल गया है. एक दूसरा चैनल दर्शकों को जानकारी दे रहा था कि महाभारत की कथा के अनुसार स्वर्ग की सीढ़ी यहां से शुरू होती है और बाकायदा अपनी कैमरा टीम के साथ वह उस स्थान की तसवीर दिखाता है जहां से पांडव स्वर्ग पहुंचे थे. पुनर्जन्म की घटना पर अधिकतर चैनल अपना कार्यक्रम प्रसारित कर ही रहे हैं. सिर्फ यही नहीं, बल्कि न्यूज चैनल पर मुख्य समाचारों व सामाजिक सरोकारों के मुद्दों को अनदेखा कर सनसनी जैसे कार्यक्रम दिखा कर भूतप्रेत से संबंधित बेकार के मुद््दों को समाचार चैनल दर्शकों के सामने पेश कर रहा है, जिस में भूत बंगले, डायन, चुड़ैल जैसी मनगढं़त कहानियों को दिखाया जाता है. इस के अलावा राम की अयोध्या, शिव की नगरी, साईं बाबा की खुली आंखें जैसे कार्यक्रम समयसमय पर दिखाए जाते हैं. दूसरे ग्रहों से पृथ्वी पर आने वाले एलियन भी आजकल खबरिया चैनलों पर छाए रहते हैं.

इन चैनलों पर ‘आहट’, ‘रूह’, ‘शरारत’, ‘डरना मना है’, ‘काल कपाल महाकाल’ जैसे धारावाहिकों को दिखा कर दर्शकों को दिग्भ्रमित किया जाता है. देर रात इन कार्यक्रमों को इस अंदाज में दिखाया जाता है कि लोगों के अंधविश्वास कोे बढ़ावा मिले. इन मूल्यहीन व अंधविश्वासों से भरे धारावाहिकों को नितांत अवैज्ञानिक तथ्यों के सहारे पेश किया जाता है और उन का प्रसारण कर जनता में अंधविश्वास फैलाने का काम किया जाता है, जिस के चलते और कुछ तो नहीं लेकिन धर्मभीरु जनता पहले से भी कहीं ज्यादा अंधविश्वास से प्रेरित हो जाती है. यदि कुछ साल पहले और अब प्रसारित होने वाले धारावाहिकों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि पहले किसी भी धारावाहिक में भूतों पर विश्वास और अंत में केवल वहम, धन हड़पने की साजिश और इन के पीछे के वैज्ञानिक तथ्यों को दिखाया जाता था. इस से दर्शकों के मन पर बैठा भूतों का वहम दूर होता था. लेकिन आजकल के धारावाहिकों में भूतप्रेतों को एक आस्तिव के रूप में दिखाया जाने लगा है. यही कारण है कि लोगों का भूतप्रेतों में भरोसा बढ़ा है.

प्रवचनों की बहार आम लोगों की बदलती रुचि को देखते हुए बाबाओं ने भी बेहद शातिर ढंग से अपनेआप को बदला है. प्रवचन तो बाबाओं के वही हैं पर जिन कथा आयोजनों पर पहले 5 से 25 हजार रुपए तक का खर्च आता था, अब उसी कथा में संगीत पर भी पूरा ध्यान दिया जाता है और उस पर 30 हजार से ले कर 8-10 लाख रुपए तक खर्च हो रहा है. आसाराम व सुधांशु जैसे महाराजों के प्रवचनों के लिए लगने वाले पंडाल व आशियाने पर करीब 50 हजार से 4 लाख तक खर्च आता है. पहले जब खुले मैदान में ये बाबा बोलते थे तो उसे प्रवचन कहते थे लेकिन अब जब ये वातानुकूलित आडिटोरियम में बैठ कर बोलते हैं, तो वह प्रवचन आध्यात्मिक उपदेश में तब्दील हो जाता है.

आम आदमी की जिंदगी के अहम हिस्से बनते जा रहे समाचारपत्र, पत्रिकाएं, रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा व इंटरनेट जैसे संचार माध्यम कुछ नया और अपना प्रचारप्रसार बढ़ाने के लिए किसी भी निराधार और अवैज्ञानिक तथ्यों को पाठकों व दर्शकों के सामने परोसने में नहीं हिचकिचाते हैं. बाजारवाद और आगे बढ़ने की इसी अंधी दौड़ ने इन संचार माध्यमों को अपने सामाजिक दायित्व से बेखबर कर दिया है. यह सब देश व समाज को कहां ले जाएगा इस का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोहन भागवत के इरादे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मोहन भागवत ने 3 दिन तक दिल्ली के सरकारी विज्ञान भवन में संघ की सोच और इरादों पर काफीकुछ नया कहा जो अब तक लिखी गई संघ की किताबों में नहीं था. जातिवाद यानी वर्ण व्यवस्था पर हर तरह से टिका संघ अब कहने को तो सब को साथ ले कर चलने की बात कर रहा है पर जमीनी तौर पर उस की सरकार ने न तो मुसलमानों के लिए, न पहले के अछूतों और शूद्रों के लिए, जो अब दलित और पिछड़े कहे जाते हैं, नया करने का कुछ ऐलान किया है. बातें करने में हमारे पंडे, पुरोहित, ऋषिमुनि हमेशा ही माहिर रहे हैं. बात तो उन धर्मग्रंथों की है जो वर्ण व्यवस्था, छूतअछूत को हम पर थोपते हैं. क्या संघ उन्हें हिंद महासागर में फेंकने को तैयार है? कहने को कि हम सब को बराबर मानते हैं पर शादी तो कुंडली देख कर ही होगी, खाना तो बराबर वालों के साथ ही खाएंगे. मोहन भागवत ने इस अलगाव की दीवारों को मिटाने की कोई कोशिश की ही नहीं.

जिन देवीदेवताओं में ऊंचनीच का भेदभाव रहा, उन्हीं ने अपनों से लड़ाई की है. भारत भूमि में रहने वालों पर जीत की वजह से ही उन्हें पूजा जाता है और उन्हीं को सिरमाथे पर रख कर कैसे कह सकते हैं कि हम सब को बराबर मानते हैं. रातदिन जो पाठ और कहानियां हिंदुत्व के नाम पर कही जाती हैं उन में जन्मों का जिक्र होता?है, दस्युओं, दैत्यों का जिक्र होता है. जिन के वारिस ही आज देश की बहुसंख्यक जनता हैं, उन के बारे में हिंदुत्व की क्या कोई नई सोच मोहन भागवत की कहने की हिम्मत है?

बारबार उन की पूजा करना जिन्होंने ऊंचनीच का भेदभाव खुल्लमखुल्ला थोपा था, उन की पूजा के नाम आज बदल लेना, उन के मंदिरों को बचाने के नाम पर आज बड़ी जमात को देशद्रोही बना देना किसी नई सोच की तैयारी नहीं लगता. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संचालक मोहन भागवत ने नई विदेशी तकनीक से बने, विदेशी माइको पर 3 दिन तक सरकारी विज्ञान भवन में संघ के नए इरादों और नई सोच पर वह कहा जो अब तक संघ के इश्तिहारों में नहीं हुआ करता था. मसलन, उन्होंने सब को, सारे देशवासियों को, सभी जातियों और धर्मों के लोगों को साथ बराबर की हैसियत से ले चलने की बात कही जबकि अब तक माना यही जाता है कि संघ उस वर्ण व्यवस्था में पूरा भरोसा करता?है जिस में शासक ऋषिमुनियों के इशारों पर चलते थे, क्षत्रिय केवल लड़ते थे, वैश्य खेती और व्यापार करते थे व शूद्र सब की सेवा करते थे. यह सब काम लोग अपने पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार करते थे और इसी को करने के लिए उन का इस मानव योनि में अपनी जाति में जन्म हुआ है.

अब सुर बदलेबदले नजर आ रहे हैं. पर असल में हमेशा ही हमारे पंडे, पुरोहित, शास्त्री, प्रवचनकर्ता, ज्ञानी बातों के धनी रहे हैं. वे लच्छेदार बातें कहते रहे हैं. पुराणों से मनमरजी की कहानियां चुन कर अपनी जरूरत के हिसाब से पेश करते रहे हैं. मोहन भागवत ने जोकुछ कहा उन की सरकार केंद्र और 19 राज्यों में क्या उस पर कुछ फैसले ले चुकी है या लेने वाली है. अगर हां, तो मोहन भागवत ने कुछ गिनाया नहीं. कहने और करने में बहुत फर्क है. जब से दलितों को छिटकने न देने की कोशिशें हुई हैं, ऊंचे वर्ण के लोग बिदकने लगे हैं. मुसलमानों को साथ ले चलने की बात कही गई पर भाजपा मुसलिमों को टिकट देती ही नहीं. दलितों को भी केवल आरक्षित सीटों पर ही टिकट दिए जाते हैं और शायद ही कोई दलित चेहरा भाजपा में असल में मोटा पद संभाले हुए हो.

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