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न्यूड मेकअप का है ट्रैंड

यह जरूरी नहीं है कि आप फुल मेकअप से ही सुंदर दिखेंगी. कम मेकअप में भी आप की सुंदरता सब को आकर्षित कर सकती है. न्यूड मेकअप आप की त्वचा को इवनटोन रखता है, जिस से चेहरा निखर कर सामने आता है. मेकअप बेस जितना न्यूट्रल होगा आप उतनी ही खूबसूरत लगेंगी.

चीक्स मेकअप

टोनर है जरूरी: अपने चेहरे को फेस वाश से धो कर कौटन बौल को टोनर में भिगो कर उस से चेहरे को पोंछें. मेकअप से पहले जितना जरूरी फेस वाश करना होता है उतना ही जरूरी उस पर टोनर लगाना भी होता है. टोनर लगाने से चेहरे का मेकअप बरकरार रहता है और वह फैलता भी नहीं है.

फाउंडेशन का चयन: फाउंडेशन का चयन अपनी स्किन टोन के हिसाब से करना चाहिए. हमेशा अपनी स्किन से मैच करता फाउंडेशन ही चुनें. हर 5 साल में स्किन टोन बदलती है. यानी आप को हर 5 साल में अपनी स्किन टोन के अनुसार अलग फाउंडेशन की जरूरत होती है. इसी तरह फाउंडेशन लगाने के बाद इसे ब्रश से एकसमान करना चाहिए. ताकि स्किन पर एकसमान रंगत दे. फाउंडेशन अपने चेहरे के रंग से एक शेड हलका यूज करें. इस से चेहरा नैचुरल लगेगा. इस के साथ ही कौंपैक्ट भी फाउंडेशन के रंग का ही यूज करें.

कंसीलर पर हमेशा ध्यान दें: कंसीलर से चेहरे के दागधब्बों और मुंहासों को छिपाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही यह चेहरे पर दिखने वाली उम्र की रेखाओं को भी छिपाता है. इस का इस्तेमाल सिर्फ इन चीजों को छिपाने के लिए ही करें और स्किन कौंप्लैक्शन से मैच करता टू वे केक लगाएं. टू वे केक को शरीर के अन्य खुले भागों जैसे कि गरदन, पीठ, कानों एवं कानों के पीछे भी लगाएं.

ब्लशर: चीक्स पर दिन के समय रोजी ब्लशर यूज न करें. इसे रात में लगाएं और वह भी नाक से डेढ़ से 2 इंच की दूरी से लगाना शुरू करें. दिन में गुलाबी गालों पर खूबसूरती की छटा बिखेरने के लिए अपनी स्किन टोन से मैच करता बहुत ही लाइट ब्लश औन लगाना चाहिए. इस से मेकअप नैचुरल दिखता है.

आई मेकअप

आईशैडो: दिन में डार्क कलर का आईशैडो मेकअप को बहुत हैवी बना देता है, इसलिए हमेशा न्यूड या न्यूट्रल कलर का आईशैडो लगाएं. यह नैचुरल भी लगता है और क्लासी भी. मेकअप को नैचुरल दिखाने के लिए लाइट ब्राउन कलर से आंखों को डीप सैट कर के नैचुरल ब्राउन कलर का आईशैडो लगाएं. अगर आप को झुर्रियों की भी शिकायत है तो क्रीम आईशैडो इस्तेमाल करने से बचना चाहिए. उस की जगह पाउडर आईशैडो का इस्तेमाल करें. यह आप के लिए काफी अच्छा रहेगा. शिमर आईशैडो का प्रयोग न करें. यदि आईब्रोज के नीचे हाईलाइट करना चाहती हैं, तो क्रीम कलर से हाईलाइट कर सकती हैं.

आईलाइनर या मसकारा: सुबह के समय कोशिश करें आईलाइनर या मसकारा आंखों के ऊपर और नीचे एकसाथ न लगाएं. एक पतली सी आईलाइनर या काजल की रेखा खींच सकती हैं. डार्क कलर के आईलाइनर को आंखों की लोअरलिड में लगाने से बचें. इस से आंखें थकीथकी सी लगने लगती हैं. इन की जगह व्हाइट या न्यूड कलर के शेड्स का इस्तेमाल कर सकती हैं.

शेप डिफाइन करने के लिए आईलाइनर की जगह आईलैश ज्वौइनर का इस्तेमाल करें, क्योंकि यह दिखाई भी नहीं देता है और आंखों की शेप भी हाईलाइट करता है. आंखों में काजल जरूर लगाएं. इस से आंखें प्यारी और कजरारी दिखती हैं. लेकिन यदि पलकें हलकी हैं और आप उन्हें घना दिखाना चाहती हैं, तो लैशेज को आईलैश कर्लर से कर्ल कर लें. उस के बाद उन पर ट्रांसपैरेंट मसकारा का सिंगल कोट लगाएं.

आईब्रो पैंसिल: आईब्रो पैंसिल या आईब्रो कलर से आईब्रोज को शेप दे सकती हैं. आईब्रो पैंसिल हमेशा लाइट कलर की लें जो आप की आईब्रोज के कलर से हलकी हो. अगर आप बहुत गोरी हैं, तो शेड एक रंग गहरा होना चाहिए. आईब्रो पैंसिल्स कई रंगों में उपलब्ध हैं. वैक्स टच वाली पैंसिल लगाने में बहुत आसान होती है और नैचुरल लुक भी देती है.

लिप मेकअप

अगर आप चाहती हैं कि आप की लिपस्टिक भी लंबे समय तक टिकी रहे तो इस के लिए लिपस्टिक लगाने से पहले कंसीलर का इस्तेमाल करना चाहिए. उस के बाद जिस रंग की लिपस्टिक लगाना चाहती हैं लगाएं, लेकिन उस से पहले लिप लाइनर से लिप्स पर आउटलाइन कर लें. ऐसा करने पर लिप्स काफी आकर्षक लगेंगे और लिपस्टिक भी लंबे समय तक टिकी रहेगी.

यदि लिप्स नैचुरली पिंक हैं, तो उन पर केवल ट्रांसपैरेंट लिप ग्लौस लगाएं. यदि ऐसा नहीं है तो होंठों पर बहुत ही लाइट कलर जैसे कि बबलगम पिंक, पीच पिंक, लेस पिंक या कैमियो पिंक कलर की लिपस्टिक लगाएं. टिशू पेपर से ब्लौट कर लें और फिर ऊपर से हलका सा ट्रांसपैरेंट लिप ग्लौस लगा लें. इस से लिप्स नैचुरल पिंक एवं ग्लौसी नजर आएंगे.

पति क्या करे जब पत्नी हो प्रैगनैंट

आज के दौर में ज्यादातर पतिपत्नी अकेले रहते हैं. ऐसे में गर्भावस्था के दौरान पत्नी की देखभाल और प्रसव यानी डिलिवरी बाद नवजात की देखभाल कठिन काम हो जाता है. इस हालात से निबटने के लिए पति को मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए. उसे प्रसव के दौरान की कुछ जानकारी भी होनी चाहिए. इस बारे में लखनऊ के मक्कड़ सैंटर की डाक्टर रेनू मक्कड़ ने कुछ टिप्स दिए.

आंकड़े बताते हैं कि जिन औरतों के मामलों में गर्भावस्था के दौरान सावधानी नहीं बरती जाती, समय पर इलाज नहीं कराया जाता उन औरतों में प्रसव के दौरान रिस्क बहुत बढ़ जाता है. गर्भावस्था के दौरान औरतों के शरीर में तमाम तरह के बदलाव होते हैं, जिस से शरीर में भी कई तरह के बदलाव होते हैं. समय पर इन बदलावों को डाक्टर से बता कर सलाह लेनी चाहिए.

आने वाले संकट का मुकाबला करने के लिए शरीर को तैयार कर लिया जाए ताकि शरीर किसी भी गंभीर बीमारी के जाल में न फंसे.

खतरे से न घबराएं

गर्भावस्था के दौरान कुछ लक्षण कभी नजरअंदाज नहीं करने चाहिए. योनि, गुदा और निपल से थोड़ा सा भी खून रिसता दिखाई दे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर चेहरे और हाथों में सूजन हो या किसी तरह का कोई उभार हो तो डाक्टर से जरूर बात करें. तेज सिरदर्द भी गर्भावस्था में किसी न किसी गंभीर बीमारी का संकेत देता है.

अगर आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है या फिर धुंधला दिखाई देता है तो इसे भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. पेट में तेज दर्द, कंपकंपी और बुखार भी खतरनाक संकेत माने जाते हैं.

योनि से तरल पदार्थ का निकलना भी खतरे का संकेत है. पेट में बच्चे का घूमना पता न चले तो भी मामला खतरनाक हो सकता है.

जब हो जाए बच्चा

कई बार ठीकठाक प्रसव होने के बाद भी कुछ परेशानियां हो जाती हैं. प्रसव के बाद औरत को सामान्य होने में कुछ समय लगता है. सब से बड़ी समस्या योनि से खून का बहना होता है. आमतौर पर यह सामान्य बात होती है मगर कभीकभी इस में किसी दूसरी बीमारी के लक्षण भी छिपे होते हैं.

इसलिए प्रसव के बाद भी अगर इस तरह की कोई परेशानी आए तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

शिशु का जन्म औपरेशन से हो या फिर सामान्य रूप से शरीर प्रसव के बाद गैरजरूरी म्यूकस, प्लेसैंटल टिशूज और खून को बाहर कर देता है. इसे लोकिया कहा जाता है. यह प्रसव के 2-3 सप्ताह तक चलता है. कभीकभी 6 सप्ताह तक भी चलता है. इस परेशानी को कम करने के लिए आराम करें. खड़े रहने और चलने से परहेज करें. खून को सोखने के लिए पैड्स का प्रयोग करें.

यह अपनेआप ठीक हो जाता है. अगर खून काफी मात्रा में बहता हो, बुखार और ठंड लगे, डिस्चार्ज में कोई गंध हो तो डाक्टर से संपर्क करें. पोस्टपार्टम हैमरेज प्रसव के बाद की गंभीर किस्म की बीमारी होती है, जिस में सामान्य से अधिक खून बह जाता है. इस का कारण प्लेसैंटा का पूरी तरह से बाहर न निकलना, उसे जबरन बाहर खींचा जाना, प्रसव के दौरान गर्भाशय, सर्विक्स या योनि पर चोट लगने से ऐसा होता है. हमारे देश में प्रसव के चलते होने वाली मौतों में 10 फीसदी इसी कारण से होती है.

पोस्टपार्टम हैमरेज का पता चलते ही डाक्टर को अपनी परेशानी के बारे में बताना चाहिए. इस दौरान शरीर की सफाई का खास खयाल रखें. लगातार बुखार बना रहे तो यह किसी इन्फैक्शन का कारण ही होता है. इसे नजरअंदाज न करें. स्तन में गांठ या दूध पिलाने में दर्द हो तो भी डाक्टर से सलाह लेनी होती है. अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल करें. यह न सोचें कि जब तक बच्चे को दूध पिलाएंगी तब तक गर्भ नहीं ठहरेगा.

गैरजाति में शादी पर बवाल

तेलंगाना में एकसाथ 2 मामले सामने आए जिन में ऊंची जाति की लड़की के दलित युवकों से शादी पर लड़की के घर वालों का गुस्सा आसमान पर चढ़ गया. एक मामले में दलित युवक को सरेआम पेशेवर हत्यारे से मरवा दिया गया और दूसरे में बेटी का हाथ काट डाला गया. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इन मामलों को ले कर बहुत सरगर्मी मच गई है, पर ऐसा सारे देश में हो रहा है, अभी से नहीं, सैकड़ों सालों से.

जैसेजैसे गिनेचुने दलित पढ़लिख कर अच्छे पदों पर पहुंच रहे हैं उन में और ऊंचों में दिखने में फर्क कम होता जा रहा है, लड़केलड़कियों में आपसी लगाव बढ़ रहा है. यह पंडों और समाज के ठेकेदारों को मंजूर नहीं क्योंकि हिंदू धर्म और समाज की रगों में राम, कृष्ण, शिव का खून बहे या नहीं बहे, जाति का जरूर बह रहा है और वे उस के एक कतरे को भी बिगड़ने नहीं देना चाहते.

रातदिन जो धर्म का ढोल पीटा जाता है, उस के पीछे छिपी बात यही होती है कि हिंदू धर्म में हो तो जाति को याद रखो. भगवाई साजिश के दौरान दलितों को पूजा करने का हक तो दे दिया गया है पर उन के अपने देवीदेवता को. उन के लिए खोदखाद कर ऊंचे देवीदेवताओं के दासों, मैल, कटे अंग, सेवकों की कहानियां गढ़ ली गई हैं और कौन किस देवता की पूजा करता है, उस से पता चल जाता है कि किस जाति का है. जैसे वाल्मीकि सफाई करने वालों को पकड़ा दिए गए कि इन्हें केवल वे ही पूजें. ऊंची जातियों के लोग वाल्मीकि मंदिरों के आगे फटकते भी नहीं हैं. यही काल भैरव का हाल है.

हैदराबाद की अमृता और प्रणय की शादी आर्य समाज मंदिर में हुई जहां अब सब से बड़ा काम ऊंचीनीची जातियों की शादियों का ही रह गया है. आर्य समाज का वेदों का डंका बजवाने का काम संघ ने अपने सिर पर ले लिया और 100 साल पहले बने मंदिर अब मैरिज सैंटर बन गए हैं. जाति का भेदभाव इस कदर है कि वहां जाते ही पता चल जाता है कि एक ऊंची जाति का है और दूसरा नीची जाति का.

ये मामले उत्तर भारत में बहुत हो रहे हैं. पर मीडिया पर यहां ऊंचों का कब्जा है और मामला दब जाता है. जो मरता है, उस के घर वाले डर कर शिकायत नहीं करते क्योंकि वे तो खुद नहीं चाहते थे कि शादी हो. अगर बच्चों में ऊंचीनीची जाति का फर्क हो तो नीची जाति के परिवार आमतौर पर घबराते हैं क्योंकि सदियों से ऐसे हर मामले में मरते वे ही रहे हैं. 70 साल के संविधान ने अभी कोई फर्क नहीं डाला है क्योंकि समाज तो वैसा का वैसा, चींटी की रफ्तार से चल रहा है.

राजनीति से पहले परिवार की जिम्मेदारी जरूरी है : संयुक्ता भाटिया

लखनऊ की रहने वाली संयुक्ता भाटिया को भी राजनीति के जरीए समाजसेवा करनी थी. वे भारतीय जनता पार्टी महिला मोेरचा में थीं. 1989 में उन्हें लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट से भाजपा ने विधायक का टिकट दिया. उस समय संयुक्ता भाटिया की 2 बेटियां मोना, शिवानी तथा बेटा प्रशांत छोटे थे. ऐसे में उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ने से मना कर दिया. कैंट विधानसभा में संयुक्ता भाटिया का अपना प्रभाव था. वे पूरे क्षेत्र में लोकप्रिय थीं. ऐसे में जब संयुक्ता ने चुनाव लड़ने से मना किया तो पार्टी को उन के पति सतीश भाटिया को विधायक का टिकट देना पड़ा. सतीश भाटिया ने विधानसभा का चुनाव लड़ा और विधायक बन गए. संयुक्ता भाटिया पार्टी के साथ काम करती रहीं.

2017 के नगर निगम चुनाव में जब लखनऊ सीट महिला के लिए आरक्षित हुई तो संयुक्ता ने मेयर का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. पेश हैं, उन के साथ हुई गुफ्तगू के अंश:

मेयर बनने के बाद आप की दिनचर्या में क्या बदलाव आया?

मैं अपने छात्र जीवन से ही सफाई और चीजों को करीने से रखने की आदी रही हूं. जब मैं स्कूल से आती थी तो घर के बाहर घर वालों की चप्पलें बेतरतीब पड़ी देखती थी. मैं स्कूल बैग बाद में रखती थी पहले चप्पलें सही तरह से रखती थी. लाइन में रखी चप्पलें देख कर सब जान लेते थे कि मैं घर में आ चुकी हूं. इस के साथ मुझे साफसफाई का भी शौक था, जो अब भी जारी है. पहले मेरे दिन की शुरुआत घर की साफसफाई से शुरू होती थी और अब शहर की सफाई से. मैं अपना ज्यादा से ज्यादा समय लखनऊ के लोगों को देती हूं. पार्षद से पहले लोग मुझे फोन पर अपनी परेशानियां बताते हैं.

प्रदेश की राजधानी होने के नाते लखनऊ का मेयर होने की चुनौतियां ज्यादा हैं?

लखनऊ की पूरी दुनिया में अपनी एक  अलग पहचान है. यहां की चिकनकारी, कला, रेवड़ी, बाग की संस्कृति मशहूर है. पुराने शहर के साथ नए शहर का अलग विकास हुआ है. राजधानी होने के कारण सब से अधिक बाहरी लोग यहां बसे हैं. ऐसे में दोनों की संस्कृतियों के साथ तालमेल कर शहर को चलना है. ऐसे शहर का मेयर होने का गर्व है. हमें लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है.

अपने समय को मैनेज कैसे करती हैं?

मुझे लोगों के साथ रहने की आदत है. सुबह 8 बजे से रात के 10 बजे तक हमारा लोगों से मिलनाजुलना होता रहता है. लोग सड़क, गंदगी, पानी की कमी, जलभराव, महल्ले से कूड़ा न उठने की परेशानी से परेशान हो कर हमें फोन करते हैं. खुद आ कर मिलते हैं. मैं नियमित अपने औफिस भी जाती हूं. वहां भी सभासदों और नगर निगम के अधिकारियों, कर्मचारियों से मिल कर हम लोगों की परेशानियों को दूर करते हैं.

घरेलू महिला की तरह आप के कुछ शौक हैं?

मुझे घर का इंटीरियर सही और सुंदर रखना पसंद है. यह काम मैं खुद करती हूं. मुझे खाना बनाने का शौक नहीं है. सादा खाना खाती हूं. अपनी ड्रैस का हमेशा खुद चुनाव करती हूं. मैं ज्यादातर साड़ी पहनती हूं. साड़ी खरीदते समय उस से मिलतेजुलते ब्लाउज का सलैक्शन खुद ही करती हूं. मेरा मानना है कि कपड़े पहनते समय अवसर और मौसम का पूरा खयाल रखना चाहिए. मैं अपना हेयरस्टाइल शुरू से ही बौयकट रखती हूं. उस पर साड़ी कम फबती है पर मुझे देख डिजाइनर कहते हैं कि साड़ी पर भी बौयकट अच्छा लगता है.

अपने बच्चों के बड़े होेने पर छोटे बच्चों के साथ कैसे समय गुजारती हैं?

बच्चों के बड़े होने के बाद उन की शादी हुई. उन के बच्चे हुए तो वे मेरे बेहद करीब हो गए. मुझे फिल्में देखने का कभी भी शौक नहीं रहा, बावजूद इस के जब भी मेरे नातीपोते फिल्म देखने को कहते हैं तो मैं उन के साथ फिल्म देखने जाती हूं. उन के साथ शौपिंग करने भी जाती हूं. मैं भले अपने बच्चों के लिए खरीदारी करती हूं, पर मेरे लिए खरीदारी मेरी बहू ही करती है. बच्चों को सही राह पर चलना सिखाना बेहद जरूरी है और इस में मां की भूमिका सब से अहम होती है.

पर्यावरण, गंदगी, अतिक्रमण जैसी परेशानियों के हल का क्या रास्ता है?

हर शहर आबादी के बोझ से दब रहा है. शहरों के विकास की योजना बनाते समय रहने वालों की संख्या, रास्तों, बाजार का भी खयाल रखना चाहिए. शहरों से दूर टाउनशिप विकसित हों, लोगों की गंदगी फैलाने की आदत दूर करनी चाहिए. मेयर को थोड़े और अधिकार मिलने चाहिए ताकि वह अपने शहर की जरूरत के हिसाब से काम कर सके.

शादी के बाद महिलाएं खुद को एक दायरे में समेट लेती हैं?

शादी के बाद भी अपने कैरियर को दिशा दी जा सकती है. मेरी कम उम्र में शादी हुई. बस्ती जैसे छोटे से शहर से लखनऊ आई. बिजनैस फैमिली थी. इस के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखी. घर से निकल राजनीति में काम किया. इस के साथ ही घरपरिवार पर भी पूरा ध्यान दिया. महिला अधिक समर्थ होती है. उसे अपनी ताकत को समझ कर उस पर भरोसा करना सीखना चाहिए.

अंधविश्वास पर लुटती मेहनत की कमाई

बहुत अफसोस होता है जब हम देखते हैं कि हमारे देश में आज भी लोग लोकपरलोक में उलझे हुए हैं. नित नएनए बाबाओं का जन्म होते देख और लाखोंकरोंड़ों लोगों को उन के पीछे भागते देख बड़ा दुख होता है.

इन बाबाओं के पास बेशुमार धन मिलना इस बात का सबूत है कि इन के अनुयायी गरीब नहीं होते. हैरानी होती है जब बड़ेबड़े नेता, अभिनेता, व्यापारी, अधिकारी, जो वर्षों कड़ी मेहनत के बाद अपने इस पद तक पहुंचते हैं, इन चंद उपदेश देने वालों के अनुयायी बन अपना इतनी मेहनत से कमाया धन और समय बरबाद करते हैं.

देश के अमीर होते मंदिर और गरीब होते किसी भी जागरूक व्यक्ति की परेशानी में बल डालने के लिए काफी हैं. हिंदू समाज में मनुष्य के जन्म लेते ही कर्मकांड, आडंबर, चढ़ावा यह सब भी जन्म ले लेते हैं और फिर मृत्यु के बाद तक मतलब कि 13वीं, बरसी व श्राद्ध तक चलते रहते हैं.

अमीर होते मंदिर

हमारे देश में गरीब चाहे और गरीब हो रहा हो, दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद भी वह अपने परिवार के लिए 2 वक्त का खाना नहीं जुटा पाता है, लेकिन हमारे मंदिर चढ़ावा संस्कृति व अंधविश्वास के कारण खूब फूलफल रहे हैं, जहां अमीर वर्ग ही नहीं, बल्कि औसत आय वर्ग के लोग भी अपनी कमाई का काफी हिस्सा दान कर देते हैं. पता नहीं क्या पाने की कामना में?

भारत के सब से अमीर 10 मंदिर

केरल का पद्मनाभन मंदिर, आंध्र प्रदेश का तिरुमाला तिरुपति वैंकटेश्वर, शिरडी साईं बाबा मंदिर, जम्मू का वैष्णो देवी मंदिर, मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर, अमृतसर का गोल्डन टैंपल, मदुरई का मीनाक्षी मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, वाराणसी का काशी विश्वनाथ और गुजरात का सोमनाथ मंदिर.

केरल का पद्मनाभन मंदिर देश का ही नहीं वरन दुनिया का सब से अमीर मंदिर है. इस मंदिर की कुल संपत्ति की कीमत 20 बिलियन डौलर आंकी गई है, जो मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति की कीमत से भी अधिक है.

इन मंदिरों में हर साल करोड़ों रुपयों का चढ़ावा चढ़ता है. इन के अलावा हीरा, सोना, चांदी अलग से. ये तो प्रसिद्ध मंदिरों की बातें हैं. लेकिन छोटेछोटे मंदिर, यहां तक कि सड़क के किनारे पीपल के पेड़ के नीचे बने एक छोटे से मंदिर और छोटे से छोटे पूजन में भी पंडेपुजारियों की जेबें भरना हिंदू समाज हिंदुत्व समझता है, ईश्वरभक्ति समझता है.

किसी के बुजुर्ग मातापिता बीमार होंगे तो भले ही बेटा उन के इलाज पर इतना पैसा खर्च नहीं करेगा, उन की देखभाल के लिए छुट्टी नहीं ले पाएगा, लेकिन उन की मृत्यु के बाद 13वीं तक छुट्टी भी लेगा और उन की 13वीं, बरसी वह सारे कर्मकांड निभा कर पंडितों को खूब दानदक्षिणा भी देगा और पुण्य कमाएगा. अजीब सोच है, अजीब विचार हैं. विचित्र मार्ग है हिंदू धर्म का व ईश्वरभक्ति का.

संत रविदास का कहना है कि पवित्रता ही सच्ची ईश्वरभक्ति है. इस के लिए व्यक्ति को कर्मकांडों के बजाय निरंतर कर्म करते रहना चाहिए.

तीर्थस्थानों पर चढ़ावा

तीर्थस्थानों पर पंडेपुजारियों व भगवावस्त्र धारण कर साधुसंतों का जमावड़ा और लोगों का उन के सामने नतमस्तक होना इस बात का संकेत देता है कि भगवा होना हिंदू धर्म का प्रतीक बन गया है व जनसमुदाय की आस्था व चढ़ावे की कमाई का यह मूलमंत्र है.

भगवा वस्त्र धारण किया हुआ साधु ईश्वर का रूप माना जाता है. उसे दानदक्षिणा दे कर इंसान अपना इहलोक ही नहीं परलोक भी सुधारना चाहता है और सोचता है कि इस से उस के सारे दुखदर्द दूर हो जाएंगे. सभी जानते हैं कि इन तीर्थस्थलों पर ये पंडेपुजारी, साधुसंत किस तरह लोगों को बेवकूफ बना कर लूटते हैं.

कुंभ मेले का आयोजन तो देश में 4 स्थानों पर होता है. हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन. हर जगह कुंभ मेले का आयोजन 12 साल में एक बार होता है, जहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है और बेहिसाब चढ़ावा चढ़ता है. तीर्थस्थलों पर उमड़ने वाली असीमित भीड़ में सिर्फ अशिक्षित जनता ही नहीं, बल्कि उच्चशिक्षित जनता भी शामिल होती है. कितनी परेशानियों से गुजर कर वे घर पहुंचते हैं, कितनी घटनाएं घट जाती हैं. चाहे मेलों में मची भगदड़ हो या केदारनाथ की 2013 की प्रलय, ईश्वर के दर पर मन्नत मांगने गए कितने लोग असमय काल के ग्रास में समा जाते हैं.

हर साल सावन के महीने में शिवभक्त कांवरिए दूरदूर से गंगाजल लेने के लिए आते हैं. यह जल कांवरिए उत्तराखंड के हरिद्वार, गोमुख, गंगोत्तरी और बिहार में सुलतानगंज से गंगा नदी से ले जाते हैं. इन दिनों कांवरियों से इन जगहों पर सड़कें भर जाती हैं. वे पैदल, मोटरसाइकिलों या दूसरी सवारियों पर भी चलते हैं. इन के जाम में फंसने पर कई मरीज समय से अस्पताल न पहुंचने पर बीच रास्ते में दम तोड़ देते हैं.

ढोंगी बाबाओं का इंद्रजाल

आशाराम के लाखों अनुयायी थे. अगस्त, 2013 में एक 16 साल की लड़की ने उस पर यौन शोषण का इलजाम लगाया. वहां से आशाराम के पतन का मार्ग शुरू हुआ. इस समय आशाराम व उस का बेटा नारायण साईं दोनों जेल में हैं.

राम रहीम का प्रकरण भी सब को याद होगा. डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह साध्वी यौन शोषण मामले में जेल काट रहा है. राम रहीम पर दुष्कर्म, हत्या, डेरे के 400 अनुयायियों को नपुंसक बनाने का आरोप है.

दिल्ली के बलात्कारी बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित के मध्यप्रदेश के इंदौर के आश्रम से 3 लड़कियों को छुड़ाया गया. बाबा के चंगुल से आजाद हुई लड़कियों में से एक नाबालिग लड़की ने बताया कि 50-60 नाबालिग लड़कियों को खड़ा कर के पुडि़या में रखा पाउडर खिलाया जाता था, जिस के बाद वे बेचैन हो जाती थीं. उन का दिमाग काम नहीं करता था. उस के बाद बाबा व उस के गुरगे बारीबारी से बच्चियों से दुष्कर्म करते थे.

100 महिलाओं से बलात्कार करने वाला ढोंगी परामानंद बाबा महिलाओं को निर्वस्त्र कर वीडियो बनाता था. पुत्रप्राप्ति के नाम पर बलात्कार करता था.

धन लुटाते धनी

बाबाओं की करतूतें आएदिन अखबारों व टीवी समाचारों की सुर्खियां बनतीं हैं. उन का विलासितापूर्ण जीवन सब के सामने उजागर होता है. इन तमाम कोशिशों के बावजूद आम जनता इन ढोंगी बाबाओं के चक्कर में आ जाती है, जिस का बहुत बड़ा खमियाजा भी उसे भुगतना पड़ा है.

अनपढ़ जनता इन का शिकार बने तो कुछ सोचने की बात भी हो पर इन बाबाओं के अनुयायी अकसर उच्चशिक्षित व अमीर वर्ग के लोग होते हैं, जो इन पर खूब धन लुटाते हैं. अब इन उच्चशिक्षित लोगों को कौन समझाएगा कि जिन्हें दूसरों का मार्गदर्शन करना चाहिए था वही इन के शिकार बन जाते हैं.

क्या अच्छा हो यदि विभिन्न रूपों में चढ़ावे में चढ़ने वाला यह धन देश की गरीबी खत्म करने के काम आए. एक तरफ कुकुरमुत्ते की तरह फैलती झोंपड़पट्टियां हैं, अच्छे अस्पतालों और स्कूलों की कमी है तो दूसरी तरफ सुरसा के मुंह की तरह फूलतीफलती अंधविश्वास की चढ़ावा संस्कृति. शिक्षा ही एक ऐसा हथियार है जो सही और गलत में फर्क करना सिखाता है और अंधविश्वास से दूर रखता है. लेकिन जब पढ़ेलिखे लोग ही सहीगलत का भेद न कर सके तो अनपढ़ गरीब जनता को क्या कहा जा सकता है.

जीने का हक इन्हें भी

ऐसा मालूम होता है कि पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण, वन्य जीवन, जल संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण की कोई समझ है ही नहीं. लगभग हर फैसला विध्वंसक बन जाता है और मंत्रालय राजनीति से प्रेरित हो कर काम करता नजर आता है न कि विज्ञान से. शातिर लोगों को यह बात समझ आ गई है और वे इस का लाभ उठाने में लग गए हैं. हर क्षेत्रीय पशु व पर्यावरण अधिकारी की पर्यावरण में रुचि समाप्तप्राय हो गई है और वे ऐसे निर्णय लेने लगे हैं जो अवैध और पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं. मुझे देश के लिए यह भयानक परिस्थिति लगती है.

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के मुख्य वन्यजीव वार्डन, जिस की जिम्मेदारी वन्य जीवों को बचाने की है, ने वास्तव में पर्यावरण मंत्रालय को लिखा है कि (भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है) नमकीन पानी में रहने वाले मगरमच्छों को मार डाला जाए. वजह, उन्होंने कुछ पर्यटकों पर हमला कर दिया था.

बेतुकी मांग

नमकीन पानी में रहने वाले ये मगरमच्छ बहुत ही संरक्षित और लुप्त होने की कगार पर हैं और वाइल्ड लाइफ प्रोटैक्शन एक्ट 1972 के शैड्यूल प्रथम में है. तरुण कुमार नाम के इस अधिकारी ने इन मगरमच्छों को इस शैड्यूल से हटाने की मांग की है ताकि उन्हें मारा जा सके.

रोचक बात यह है कि मगरच्छ की खाल लाखों में बिकती है. जूते और हैंडबैग बनाने के लिए इन को देश के बाहर तस्करी से ले जाया जाता है. हर वन्य जीव को मारने के अनुरोध के पीछे असल में यह तस्करी होती है, जिस में एक जीव के नाम पर 4-5 को मारने का मौका मिल जाता है.

यह इसलिए सत्य है कि मगरच्छों के केवल 23 आक्रमणों की शिकायत दर्ज हुई है वह भी पूरे द्वीप समूह में पिछले 13 सालों में.

असल में उपराज्यपाल और मुख्य वन्य जीव वार्डन समुद्रीतटों पर होटल बनाना चाहते हैं और होटल वालों के एजेंटों की तरह काम कर रहे हैं. इसीलिए उन्होंने मगरमच्छों की जो गिनती बताई है वह वास्तविकता से ज्यादा है और बिना गिनती के दी गई है. बायोलौजिस्टों का कहना है कि इस इलाके में केवल 500 मगरमच्छ हैं जबकि प्रशासन गिनती बढ़ाचढ़ा कर 1700 बता रहा है.

बढ़ रही है संख्या

सरकारी कमेटी में टूर आपरेटर्स की एसोसिएशन का भी एक सदस्य है. इस ऐसोसिएशन ने ही पर्यटकों पर मगरमच्छों के आक्रमणों से पर्यटकों में फैलते भय की चिंता प्रकट की है और ये द्वीप और उन के तट लेटने और वाटर स्पोर्ट्स के लायक न रहने का डर व्यक्त किया है. यानी एक पूरी प्रजाति को नष्ट कर दिया जाए ताकि पर्यटक वाटर स्कीइंग का बिना डरे मजा ले सकें.

खारे पानी के मगरमच्छ कई लाख साल पुराने हैं. ये 7 मीटर तक लंबे हो सकते हैं और रेंगने वाले रैप्टाइलों में सब से बड़े हैं. यह दक्षिणपूर्व एशिया, उत्तरी आस्ट्रेलिया, सुंदरवन (बंगाल) उड़ीसा में हैं. ये लंबी दूरी तक तैर सकते हैं. वैसे तो ये पानी में रहते हैंपर इन्हें गरमी पाने के लिए जमीन पर आना होता है.

1972 तक इन की संख्या 31 तक रह गई थी पर फिर वाइल्ड लाइफ प्रोटैक्शन एक्ट के बाद 45 साल में ये 500 तक पहुंचे हैं.

मुक्ति (पहला भाग) : जया के साथ आखिर ऐसा क्या हो रहा था

अचानक जया की नींद टूटी और वह हड़बड़ा कर उठी. घड़ी का अलार्म शायद बजबज कर थक चुका था. आज तो सोती रह गई वह. साढ़े 6 बज रहे थे. सुबह का आधा समय तो यों ही हाथ से निकल गया था.

वह उठी और तेजी से गेट की ओर चल पड़ी. दूध का पैकेट जाने कितनी देर से वैसे ही पड़ा था. अखबार भी अनाथों की तरह उसे अपने समीप बुला रहा था.

उस का दिल धक से रह गया. यानी आज भी गंगा नहीं आएगी. आ जाती तो अब तक एक प्याली गरम चाय की उसे नसीब हो गई होती और वह अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाती. उसे अपनी काम वाली बाई गंगा पर बहुत जोर से खीज हो आई. अब तक वह कई बार गंगा को हिदायत दे चुकी थी कि छुट्टी करनी हो तो पहले बता दे. कम से कम इस तरह की हबड़तबड़ तो नहीं रहेगी.

वह झट से किचन में गई और चाय का पानी रख कर बच्चों को उठाने लगी. दिमाग में खयाल आया कि हर कोई थोड़ाथोड़ा अपना काम निबटाएगा तब जा कर सब को समय पर स्कूल व दफ्तर जाने को मिलेगा.

नल खोला तो पाया कि पानी लो प्रेशर में दम तोड़ रहा?था. उस ने मन ही मन हिसाब लगाया तो टंकी को पूरा भरे 7 दिन हो गए थे. अब इस जल्दी के समय में टैंकर को भी बुलाना होगा.  उस ने झंझोड़ते हुए पति गणेश को जगाया, ‘‘अब उठो भी, यह चाय पकड़ो और जरा मेरी मदद कर दो. आज गंगा नहीं आएगी. बच्चों को तैयार कर दो जल्दी से. उन की बस आती ही होगी.’’

पति गणेश उठे और उठते ही नित्य कर्मों से निबटने चले गए तो पीछे से जया ने आवाज दी, ‘‘और हां, टैंकर के लिए भी जरा फोन कर दो. इधर पानी खत्म हुआ जा रहा है.’’

‘‘तुम्हीं कर दो न. कितनी देर लगती है. आज मुझे आफिस जल्दी जाना है,’’ वह झुंझलाए.

‘‘जैसे मुझे तो कहीं जाना ही नहीं है,’’ उस का रोमरोम गुस्से से भर गया. पति के साथ पत्नी भले ही दफ्तर जाए तब भी सब घरेलू काम उसी की झोली में आ गिरेंगे. पुरुष तो बेचारा थकहार कर दफ्तर से लौटता है. औरतें तो आफिस में काम ही नहीं करतीं सिवा स्वेटर बुनने के. यही तो जब  तब उलाहना देते हैं गणेश.

कितनी बार जया मिन्नतें कर चुकी थी कि बच्चों के गृहकार्य में मदद कर दीजिए पर पति टस से मस नहीं होते थे, ऊपर से कहते, ‘‘जया यार, हम से यह सब नहीं होता. तुम मल्टी टास्किंग कर लेती हो, मैं नहीं,’’ और वह फिर बासी खबरों को पढ़ने में मशगूल हो जाते.

मनमसोस कर रह जाती जया. गणेश ने उस की शिकायतों को कुछ इस तरह लेना शुरू कर दिया?था जैसे कोई धार्मिक प्रवचन हों. ऊपर से उलटी पट्टी पढ़ाता था उन का पड़ोसी नाथन जो गणेश से भी दो कदम आगे था. दोनों की बातचीत सुन कर तो जया का खून ही खौल उठता था.

‘‘अरे, यार, जैसे दफ्तर में बौस की डांट नहीं सुनते हो, वैसे ही बीवी की भी सुन लिया करो. यह भी तो यार एक व्यावसायिक संकट ही है,’’ और दोनों के ठहाके से पूरा गलियारा गूंज उठा?था.

जया के तनबदन में आग लग आई थी. क्या बीवीबच्चों के साथ रहना भी महज कामकाज लगता?था इन मर्दों को. तब औरतों को तो न जाने दिन में कितनी बार ऐसा ही प्रतीत होना चाहिए. घर संभालो, बच्चों को देखो, पति की फरमाइशों को पूरा करो, खटो दिनरात अरे, आक्यूपेशन तो महिलाओं के लिए है. बेचारी शिकायत भी नहीं करतीं.

जैसेतैसे 4 दिन इसी तरह गुजर गए. गंगा अब तक नहीं लौटी थी. वह पूछताछ करने ही वाली थी कि रानी ने कालबेल बजाते हुए घर में प्रवेश किया.

‘‘बीबीजी, गंगा ने आप को खबर करने के लिए मुझ से कहा था,’’ रानी बोली, ‘‘वह कुछ दिन अभी और नहीं आ पाएगी. उस की तबीयत बहुत खराब है.’’

रानी से गंगा का हाल सुना तो जया उद्वेलित हो उठी.  यह कैसी जिंदगी थी बेचारी गंगा की. शराबी पति घर की जिम्मेदारियां संभालना तो दूर, निरंतर खटती गंगा को जानवरों की तरह पीटता रहता और मार खाखा कर वह अधमरी सी हो गई थी.

‘‘छोड़ क्यों नहीं देती गंगा उसे. यह भी कोई जिंदगी है?’’ जया बोली.

माथे पर ढेर सारी सलवटें ले कर हाथ का काम छोड़ कर रानी ने एकबारगी जया को देखा और कहने लगी, ‘‘छोड़ कर जाएगी कहां वह बीबीजी? कम से कम कहने के लिए तो एक पति है न उस के पास. उसे भी अलग कर दे तो कौन करेगा रखवाली उस की? आप नहीं जानतीं मेमसाहब, हम लोग टिन की चादरों से बनी छतों के नीचे झुग्गियों में रहते हैं. हमारे पति हैं तो हम बुरी नजर से बचे हुए हैं. गले में मंगलसूत्र पड़ा हो तो पराए मर्द ज्यादा ताकझांक नहीं करते.’’

अजीब विडंबना थी. क्या सचमुच गरीब औरतों के पति सिर्फ एक सुरक्षा कवच भर ?हैं. विवाह के क्या अब यही माने रह गए? शायद हां, अब तो औरतें भी इस बंधन को महज एक व्यवसाय जैसा ही महसूस करने लगी हैं.

गंगा की हालत ने जया को विचलित कर दिया था. कितनी समझदार व सीधी है गंगा. उसे चुपचाप काम करते हुए, कुशलतापूर्वक कार्यों को अंजाम देते हुए जया ने पाया था. यही वजह थी कि उस की लगातार छुट्टियों के बाद भी उसे छोड़ने का खयाल वह नहीं कर पाई.

रानी लगातार बोले जा रही थी. उस की बातों से साफ झलक रहा?था कि गंगा की यह गाथा उस के पासपड़ोस वालों के लिए चिरपरिचित थी. इसीलिए तो उन्हें बिलकुल अचरज नहीं हो रहा था गंगा की हालत पर.

जया के मन में अचानक यह विचार कौंध आया कि क्या वह स्वयं अपने पति को गंगा की परिस्थितियों में छोड़ पाती? कोई जवाब न सूझा.

‘‘यार, एक कप चाय तो दे दो,’’ पति ने आवाज दी तो उस का खून खौल उठा.

जनाब देख रहे हैं कि अकेली घर के कामों से जूझ रही हूं फिर भी फरमाइश पर फरमाइश करे जा रहे हैं. यह समझ में नहीं आता कि अपनी फरमाइश थोड़ी कम कर लें.

जया का मन रहरह कर विद्रोह कर रहा था. उसे लगा कि अब तक जिम्मेदारियों के निर्वाह में शायद वही सब से अधिक योगदान दिए जा रही थी. गणेश तो मासिक आय ला कर बस उस के हाथ में धर देता और निजात पा जाता. दफ्तर जाते हुए वह रास्ते भर इन्हीं घटनाक्रमों पर विचार करती रही. उसे लग रहा था कि स्त्री जाति के साथ इतना अन्याय शायद ही किसी और देश में होता हो.

दोपहर को जब वह लंच के लिए उठने लगी तो फोन की घंटी बज उठी. दूसरी ओर सहेली पद्मा थी. वह भी गंगा के काम पर न आने से परेशान थी. जैसेतैसे संक्षेप में जया ने उसे गंगा की समस्या बयान की तो पद्मा तैश में आ गई, ‘‘उस राक्षस को तो जिंदा गाड़ देना चाहिए. मैं तो कहती हूं कि हम उसे पुलिस में पकड़वा देते हैं. बेचारी गंगा को कुछ दिन तो राहत मिलेगी. उस से भी अच्छा होगा यदि हम उसे तलाक दिलवा कर छुड़वा लें. गंगा के लिए हम सबकुछ सोच लेंगे. एक टेलरिंग यूनिट खोल देंगे,’’ पद्मा फोन पर लगातार बोले जा रही थी.

पद्मा के पति ने नौकरी से स्वैच्छिक अवकाश प्राप्त कर लिया था और घर से ही ‘कंसलटेंसी’ का काम कर रहे थे. न तो पद्मा को काम वाली का अभाव इतनी बुरी तरह खलता था, न ही उसे इस बात की चिंता?थी कि सिंक में पड़े बर्तनों को कौन साफ करेगा. पति घर के काम में पद्मा का पूरापूरा हाथ बंटाते थे. वह भी निश्चिंत हो अपने दफ्तर के काम में लगी रहती. वह आला दर्जे की पत्रकार थी. बढि़या बंगला, ऐशोआराम और फिर बैठेबिठाए घर में एक अदद पति मैनसर्वेंट हो तो भला पद्मा को कौन सी दिक्कत होगी.

वह कहते हैं न कि जब आदमी का पेट भरा हो तो वह दूसरे की भूख के बारे में भी सोच सकता?है. तभी तो वह इतने चाव से गंगा को अलग करवाने की योजना बना रही थी.

पद्मा अपनी ही रौ में सुझाव पर सुझाव दिए जा रही थी. महिला क्लब की एक खास सदस्य होने के नाते वह ऐसे तमाम रास्ते जया को बताए जा रही थी जिस से गंगा का उद्धार हो सके.

जया अचंभित थी. मात्र 4 घंटों के अंतराल में उसे इस विषय पर दो अलगअलग प्रतिक्रियाएं मिली थीं. कहां तो पद्मा तलाक की बात कर रही?थी और उधर सुबह ही रानी के मुंह से उस ने सुना था कि गंगा अपने ‘सुरक्षाकवच’ की तिलांजलि देने को कतई तैयार नहीं होगी. स्वयं गंगा का इस बारे में क्या कहना होगा, इस के बारे में वह कोई फैसला नहीं कर पाई.

जब जया ने अपना शक जाहिर किया तो पद्मा बिफर उठी, ‘‘क्या तुम ऐसे दमघोंटू बंधन में रह पाओगी? छोड़ नहीं दोगी अपने पति को?’’

जया बस, सोचती रह गई. हां, इतना जरूर तय था कि पद्मा को एक ताजातरीन स्टोरी अवश्य मिल गई थी.

महिला क्लब के सभी सदस्यों को पद्मा का सुझाव कुछ ज्यादा ही भा गया सिवा एकदो को छोड़ कर, जिन्हें इस योजना में खामियां नजर आ रही थीं. जया ने ज्यादातर के चेहरों पर एक अजब उत्सुकता देखी. आखिर कोई भी क्यों ऐसा मौका गंवाएगा, जिस में जनता की वाहवाही लूटने का भरपूर मसाला हो.

प्रस्ताव शतप्रतिशत मतों से पारित हो गया. तय हुआ कि महिला क्लब की ओर से पद्मा व जया गंगा के घर जाएंगी व उसे समझाबुझा कर राजी करेंगी.

गंगा अब तक काम पर नहीं लौटी थी. रानी आ तो रही?थी, पर उस का आना महज भरपाई भर था. जया को घर का सारा काम स्वयं ही करना पड़ रहा था. आज तो उस की तबीयत ही नहीं कर रही थी कि वह घर का काम करे. उस ने निश्चय किया कि वह दफ्तर से छुट्टी लेगी. थोड़ा आराम करेगी व पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार पद्मा को साथ ले कर गंगा के घर जाएगी, उस का हालचाल पूछने. यह बात उस ने पति को नहीं बताई. इस डर से कि कहीं गणेश उसे 2-3 बाहर के काम भी न बता दें.

रानी से बातों ही बातों में उस ने गंगा के घर का पता पूछ लिया. जब से महिला मंडली की बैठक हुई थी, रानी तो मानो सभी मैडमों से नाराज थी, ‘‘आप पढ़ीलिखी औरतों का तो दिमाग चल गया है. अरे, क्या एक औरत अपने बसेबसाए घर व पति को छोड़ सकती है? और वैसे भी क्या आप लोग उस के आदमी को कोई सजा दे रहे हो? अरे, वह तो मजे से दूसरी ले आएगा और गंगा रह जाएगी बेघर और बेआसरा.’’

40 साल की रानी को हाईसोसाइटी की इन औरतों पर निहायत ही क्रोध आ रहा था.

– क्रमश:

धर्म के बखान में सरकार

धर्म के हाथ बहुत लंबे हैं.  इन से आप बच नहीं सकते, भारत में तो बिलकुल नहीं.  इस देश में रहना है तो अपना धर्म बताना होगा.  यह कोई और नहीं कह रहा बल्कि देश की सरकार ने ऐसा आलाप किया है.

धर्म को केंद्र में रख कर राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार ने यह लागू कर दिया है कि जो भारत की नागरिकता लेना चाहते हैं उन्हें अब अपना धर्म भी लिख कर बताना होगा.

भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के इस कदम से सवाल उठते हैं कि अगर कोई किसी धर्म में आस्था नहीं रखता तो क्या वह भारत की भूमि में नहीं रह सकता?  क्या यहाँ सिर्फ वही रहेंगे जो धार्मिक हैं?  और अगर यहाँ नास्तिक  रह रहे हैं तो क्या उन्हें देश से निकाला जाएगा?  बहराल, सरकार के निर्देश का पालन करना हम भारतवासियों के लिए अनिवार्य है, जो किया भी जाएगा.

केंद्र सरकार ने कहा है कि जो भी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करेगा, उसे अपना धर्म बताना होगा.  गृह मंत्रालय की ओर से नोटिफाई किए गए नागरिकता (संशोधन) नियमों 2018  के ज़रिए यह बदलाव किया गया है.  भारतीय नागरिकता के लिए रजिस्ट्रेशन के ज़रिए आवेदन करने वाले व्यक्ति की ओर से भरे जाने वाले हर फॉर्म में ‘धर्म’ शब्द को जोड़ा गया है.  यह पहली बार है कि जब भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए व्यक्ति को अपना धर्म बताना होगा.

नए नियमों में कहा गया है कि भारतीय मूल के किसी व्यक्ति, भारतीय नागरिक से विवाह करने वाले किसी व्यक्ति, भारतीय नागरिकों के नाबालिग बच्चों को नागरिकता का आवेदन देते वक़्त धर्म की जानकारी देनी होगी.  अगर किसी के अभिभावक भारतीय नागरिक हैं और किसी के अभिभावकों में से एक स्वतंत्र भारत के नागरिक थे, उन्हें भी नागरिकता का आवेदन करते समय अपने धर्म की जानकारी देनी होगी.  हालांकि, धर्म पर संशोधन भारतीय नागरिकता का आवेदन करने वाले 3देशों – पाकिस्तान, बंगलादेश और अफ़ग़ानिस्तान के अल्पसंख्यकों पर लागू था.  गृह मंत्रालय ने कहा है कि इस से पहले वर्ष 2014 और वर्ष 2016 में नोटिफिकेशन जारी किए गए थे, लेकिन इस बार धर्म को नागरिकता नियमों से जोड़ा गया है.

धर्म की घोषणा अनिवार्य करने का समय महत्वपूर्ण है.  संसद में सरकार का नागरिकता (संशोधन) विधेयक लंबित है.  इस विधेयक से भारत में रह रहे अवैध प्रवासी अपने धर्म के आधार पर भारतीय नागरिकता के लिए पात्र बन जाएँगे.  इस से जुड़े कानून के मसौदे पर संयुक्त संसदीय समिति विचार कर रही है.  नागरिकता को धर्म के साथ जोड़ने के कारण इस की निंदा की जा रही है.

अभी नागरिकता कानून 1995  के तहत धर्म की जानकारी  नहीं दी जाती.  कानून में जन्म, मूल, रजिस्ट्रेशन और देशीकरण के ज़रिए नागरिकता का प्रावधान है.  मौजूदा कानून क्षेत्र के अन्दर जन्म के सिद्धांत पर आधारित है और इस में धर्म का कोई उल्लेख नहीं है.  वर्ष 2009 के नागरिकता नियमों में भी धर्म की जानकारी देने की ज़रुरत नहीं थी.

अंधविश्वास : मेरे सामने सेक्स करोगे, तब मिलेगी संतान

हमारा देश बाबा, पुजारी, तांत्रिक, हीलर, ओझा, फकीर, मौलवी और सत्संग व योगा की आड़ में कृपा बरसाने वालों के भरोसे चल रहा है. कोई समोसे की चटनी से चमत्कार का चूरन खिला रहा है तो कोई स्वदेसी का राग अलाप कर बनियागीरी कर रहा है. हालांकि इनसे भी ज्यादा खतरनाक ये बाबा, पुरोहित और तांत्रिक हैं जो हीलर/दुःख-दर्द निवारक का चोला पहनते हैं और अन्धविश्वासी लोगों की हर समस्या को सेक्स और रेप के जरिये दूर भगाने का स्वांग रचते हैं. जैसा कि महाराष्ट्र के ठाणे में हुआ है.

सामने सेक्स करो, बच्चा होगा 

महाराष्ट्र के ठाणे में खुद को हीलर बताने वाले एक बाबा योगेश कूपेकर की करमात तो देखिये. महाराज अपने शरण में आए भक्तों को संतानोत्पत्ति के नाम पर अश्लीलता की तमाम हदें पार करने के लिए जब तब उकसाते रहते थे. ऐसे में जब एक शादीशुदा और अन्धविश्वासी जोड़ा इनके पास निसंतान होने का दुःख लेकर आया तो उन्होंने 10,000 रुपये के पैकेज में बच्चा देने का वादा किया. हालांकि पैसा लेने के बाद उस दंपत्ति को जो तरीका बताया, वह सुनकर अच्छे अच्छे को शर्म आ जाए. लेकिन बाबा ठहरा बेशर्म. सो उसने फरमान सुनाया कि अगर अगर वे उसके सामने सेक्स करेंगे तो उन्हें संतान प्राप्त होगी. और इसके पीछे लौजिक यह दिया कि महिला के शरीर में कुछ समस्या है. जब वे उसके सामने सेक्स करेंगे तो वह उस कमी को पकड़ लेगा और उसके इलाज के बाद महिला गर्भवती हो जाएगी.

जब तक उन्हें होश आता वे ठग चुके थे. हालांकि बाद में इस दम्पति ने उस तथाकथित बाबा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी. केस लम्बे समय तक चला और आखिरकार कोर्ट ने हीलर को इस मामले में दस साल की सजा सुनाई है.

120 महिलाओं से रेप करने वाला तांत्रिक

इसी तरह का एक और बाबा पुलिस के हत्थे चढ़ गया है जो कहने को तो हरियाणा के फतेहाबाद जिले के एक बालकनाथ मंदिर में महंत था लेकिन उसका असली काम रेप करना था. यह तांत्रिक करीब 120 महिलाओं के साथ रेप कर चुका है और उनके वीडियो बनाकर ब्लैकमेलिंग के जरिए उनसे पैसे भी ऐंठा करता था.

अमरपुरी उर्फ बिल्लू नाम का यह पुजारी प्रेतबाधा के नाम पर महिलाओं को फंसाता था और तंत्र विद्या के दौरान उन्हें नशीली दवा देता था. नशे की हालत में उनके साथ बलात्कार को अंजाम देता फिर उसका वीडियो बना लेता. इस से आजिज आकर जब एक महिला ने तांत्रिक बाबा के खिलाफ रेप का केस दर्ज कराया तब जाकर उसे अरेस्ट किया गया. लेकिन फिर उसे जमानत मिल गई.

बाद में जब उसकी करतूत दिखाता एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो पुलिस सख्त हुई और उसके खिलाफ बलात्कार, आईटी एक्ट और ब्लैकमेलिंग की धाराओं समेत कई आरोपों में केस दर्ज किया गया. जब पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर उसके ठिकानों की छानबीन की तो उसके कब्जे से 120 वीडियो बरामद हुए जिनमें वह महिलाओं की अस्मत से खेल रहा था.

जलेबी बनाते बनाते बाबा बन गया

इस पूरे प्रकरण में दिलचस्प खुलासा यह हुआ कि फर्जी बाबा अमरपुरी 20 साल पहले पंजाब के टोहाना में जलेबी की दुकान चलाया करता था, बाद में वह तांत्रिक बन गया और एक मंदिर का महंत भी. दरअसल जितने भी देश में तथाकथित बाबा है, अमूमन सबका बीता कल खंगाल डालिए. कोई ट्रक ड्राइवर निकलेगा तो कोई ईंट भट्टा व्यापारी. कोई जलेबी बनता होगा तो कोई अपराधी.

ये सब दुनिया भर की अपराध की गलियों से गुजरते हुए मंदिरों को अपने छिपने का अड्डा बनाते हैं और देखते देखते लोगों के महान गुरु बन जाते हैं. इस पूरे घटनाक्रम में उनका शातिर जितना अहम है, उतना ही जनता का मूर्ख होना भी. वरना जो जनता सब्जी के ठेले पर एक किलो मटर भी छांट छांट और मोलभाव कर खरीदती है वह ऐसे फर्जी बाबाओं को इतनी आसानी से भगवान का अवतार कैसे मान लेती ? क्या यह आम लोगों की जिम्मेदारी नहीं है फलां बाबा का आगापीछा चेक करे. सोचने वाली बात है कि जब एक तांत्रिक के कहने पर 120 महिलाएं बहक सकती हैं तो इस देश के कोने कोने में ऐसे बाबाओं की लम्बी कतार है. ये क्या नहीं करते होंगे.

डीएनए में घुसा अंधविश्वास

देश के डीएनए में घर कर चुका यह अंधविश्वास जब तब खूनी वारदातों को अंजाम देने का कारण बनता रहता है. इसका खूनी खेल है कि थमने का नाम नहीं लेता. हाल ही में अक्टूबर, 2018 को बिहार के सीतामढ़ी में अंधविश्वास की दिल दहला देने वाली घटना सामने आई. जब अपने ही अंधविश्वास के चक्कर में आ गए और बेटे की चाहत में अपनी भाभी की बलि चढ़ा दी.

इसी तरह नागदा तहसील के हेड़ी गांव में रहने वाले 25 साल के युवक ने अंधविश्वास में तलवार से जीभ काटकर देवी को चढ़ा दी. कड़ी मशक्कत के बाद डॉक्टरों ने चार घंटे ओपरेशन कर जीभ वापस जोड़ी.

वहीं बेमेतरा के बेरला थाना इलाके में कुछ दिनों पहले अंधविश्वास के चक्कर में पोते ने पत्थर से सिर कुचलकर दादी की हत्या कर दी. फरवरी 2018 में भी तेलंगाना के हैदराबाद में एक शख़्स ने 31 जनवरी को एक बच्चे की बलि दे दी थी. एक तांत्रिक के कहने पर उस शख़्स ने चंद्र ग्रहण के दिन पूजा की और बच्चे को छत से फेंक दिया. गौरतलब है कि तांत्रिक ने उसे कहा था कि ऐसा करने से उसकी पत्नी की लंबे समय से चली आ रही बीमारी ठीक हो जाएगी.

बाबा नया, काम वही

दरअसल योगेश  को इस बात का अहसास हो गया था कि संतान को लेकर दम्पति कुछ भी कर सकता है. इसी का फायदा उठाकर ये बाबा लोग अपनी हवस का खेल खेलते हैं. इसी से मिलते जुलते टोटके आसाराम से लेकर रामपाल तक और बाबा राम रहीम से लेकर वीरेंद्र दीक्षित तक अपनाते रहे हैं. फिर भी लोग हैं कि इनके भक्त बनने के लिए कतार में खड़े दिखते हैं. इस तरह से सिर्फ बाबाओं के नाम बदलते रहते हैं, शोषण और ठगी के कृत्य  वही रहते हैं.

आधुनिक विज्ञान के इस दौर में हम पर अंधविश्वास कितना हावी है, इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि अंधविश्वास के प्रभाव से पढ़े-लिखे लोग भी अछूते नहीं रहते हैं. जहां विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है और अंतरिक्ष में सैटेलाइट तक भेजे जा रहे हैं, वहां इंसानों की बलि दी जाती है और बेमतलब के रीति-रिवाज माने जाते हैं.

और तो और जब डॉ. दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी जैसे लोग इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उनका ही गला घोंट दिया जाता है. जब तक हम खुद को और आने वाली पीढ़ी को वैज्ञानिक नजरिये से सोचना नहीं सिखाएंगे हालात नहीं बदलेंगे.

काशी इन सर्च आफ गंगा : इस फिल्म से दूरी ही भली

फिल्म की कहानी शुरू होती है. जेल में एक इंसान चम्मच को दीवार पर या अपनी जंजीर पर खुरचता नजर आता है, जिसे देखकर दो पुलिस वाले आपस में बातें करते है, फिर कहानी फ्लैशबैक में शुरू होती है.

कहानी बनारस की है, जहां काशी के एक घाट पर होली का त्यौहार मनाया जा रहा है. जब एक स्थानीय गुंडा बबीना (क्रांति प्रकाश झा) लखनऊ से आयी पत्रकार देविना (ऐश्वर्या दीवान) को छेड़ता है, तो घाट पर डोम का काम करने वाले काशी (शर्मन जोशी) उस गुंडे से देविना को बचाता है. फिर देविना के कहने पर काशी उसे अपने घर ले जाता है और अपने बूढे पिता व माता के अलावा युवा बहन गंगा (प्रियंका सिंह) से मिलाता है.

दूसरे दिन उसे पूरा बनारस शहर घुमाता है, रात में देविना उसे अपने साथ रात्रि भोज के लिए आमंत्रित करती है, जहां नाटकीय ढंग से दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ जाते हैं कि उनके बीच शारीरिक संबंध बन जाते हैं. फिर पता चलता है कि गंगा गायब है.

देविना व काशी उस कालेज में जाते हैं, जहां गंगा पढ़ती है. पर कौलेज की प्रिंसिपल कहती है कि गंगा चौधरी उनके कौलेज में नहीं पढ़ती है. उसके बाद देविना एक लड़की श्रुति को काशी से मिलवाती है, जो कि कहती है कि वह गंगा के साथ कौलेज में पढ़ती है और गंगा का शहर के उद्योगपति व राजनेता पांडे (गोविंद नामदेव) के बेटे (पारितोष त्रिपाठी) के साथ प्रेम संबंध थे.

पिता की मर्जी के खिलाफ गंगा से उसका प्यार चलता रहा और गंगा गर्भवती हो गयी थी. उसके बाद से गंगा की श्रुति से मुलाकात नहीं हुई. अब काशी अपनी बहन की तलाश में पांडे के घर जाता है. फिर मसूरी जाकर पांडे के बेटे की हत्या कर देता है. अदालत में कारवाही के दौरान सभी गवाह यही कहते हैं कि काशी की बहन गंगा व उसके माता पिता तो बचपन में ही मारे गए थे.

एक मनोवैज्ञानिक डाक्टर आकर कहता है कि काशी मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार है, जो कि सोचता है कि उसके माता पिता हैं. अचानक काशी का दोस्त रंगीला अदालत में बयान देता है कि पांडे ने ही गंगा की हत्या की है. काशी गुस्से में अदालत के अंदर ही पांडे पर हमला कर देता है, उसी वक्त देविना चालाकी से काशी के हाथ में बंदूक पकड़ा देती है और काशी धड़ाधड़ पांडे पर गोलियां बरसा देता है. काशी को पागल बताकर अदालत जेल भेज देती है. पर इस बीच देविना काशी से प्यार कर चुकी है. इसलिए वह जेल जाकर काशी को सच बता देती है कि उसने पांडे से बदला लेने के लिए यह कहानी रची. श्रुति उसकी बहन ही है. अंततः काशी के हाथों देविना भी मारी जाती है.

बेसिर पैर की कहानी व बकवास पटकथा के चलते दस मिनट बाद ही दर्शक सोचने लगता है कि आखिर फिल्मकार ने यह फिल्म बनायी ही क्यों? किरदार सही ढंग से गढ़े नहीं गए हैं. कहानी भी उबड़ खाबड़ रास्ते से होती हुई आगे बढ़ती रहती है. फिल्म पर लेखक व निर्देशक की कोई पकड़ नजर नहीं आती. दर्शक सिर्फ यह सोचता रहता है कि फिल्म कब खत्म होगी. मनोरंजन के नाम पर सिरदर्द देने वाली फिल्म है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो किसी भी कलाकार का अभिनय प्रशंसनीय नहीं है. शर्मन जोशी ने अपने डूबते करियर पर यह फिल्म करके अपने हाथों कील गाड़ने का काम किया है. फिल्म के किरदार पर उनकी कोई पकड़ नजर नहीं आती. इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि शर्मन जोशी ने ‘काशी इन सर्च आफ गंगा’ जैसी फिल्म क्यों की. निर्देशक की कमी के चलते अखिलेंद्र मिश्रा, गोविंद नामदेव जैसे  वरिष्ठ कलाकारों का भी अभिनय भी उभर नही पाया. ऐश्वर्या दीवान की पहली फिल्म है, पर उनसे उम्मीद नहीं जगती.

दो घंटे पांच मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘काशी इन सर्च आफ गंगा’’ का निर्माण धीरज कुमार, मनीष किशोर, संजय व सुदेश सुवर्णा ने किया है. फिल्म के लेखक मनीश किशोर, निर्देशक धीरज कुमार, संगीतकार अंकित तिवारी, विपिन पटवा व राज आसू, कैमरामैन अत्तर सिंह सैनी तथा कलाकार हैं – शर्मन जोशी, ऐश्वर्या दीवान, अखिलेंद्र मिश्रा, पारितोष त्रिपाठी, गोविंद नामदेव, क्रांति प्रकाश झा, मनोज जोशी व अन्य.

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