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डिलिवरी के बाद कुपोषण से बचें मां और बच्चा

बच्चे को जन्म देने के बाद अकसर महिलाओं को कुपोषण की समस्या से गुजरना पड़ता है. बच्चे के जन्म के तुरंत बाद कुपोषण का बुरा असर मां और बच्चे दोनों पर पड़ता है. गर्भावस्था के दौरान और उस के बाद होने वाला कुपोषण बच्चे के लिए घातक हो सकता है.

गर्भावस्था के बाद कुपोषण के कारण

– स्तनपान इस का सब से पहला और मुख्य कारण है. बच्चे को दूध पिलाने वाली मां को रोजाना कम से कम 1000 कैलोरी ऊर्जा की जरूरत होती है. ज्यादातर महिलाएं या तो सही डाइट चार्ट के बारे में नहीं जानती हैं या फिर इस की अनदेखी करती हैं, जिस के कारण वे डिहाइड्रेशन, विटामिन या मिनरल्स की कमी और कभीकभी खून की कमी की भी शिकार हो जाती हैं. इसे पोस्टनेटल मालन्यूट्रिशन (बच्चे के जन्म के बाद होने वाला कुपोषण) कहा जा सकता है.

– स्तनपान कराने से मां को ज्यादा भूख लगती है और अकसर वह ऐसे खा-पदार्थ खाती है, जो पोषक एवं सेहतमंद नहीं होते. स्वाद में अच्छे लगने वाले खा-पदार्थों में विटामिंस और मिनरल्स की कमी होती है, जिस कारण मां कुपोषण से ग्रस्त हो जाती है.

– बच्चे के जन्म से पहले और बाद में प्रीनेटल विटामिन का सेवन करना बहुत जरूरी है. प्रीनेटल विटामिन जैसे फौलिक ऐसिड पानी में घुल कर शरीर से बाहर निकलता रहता है, जिस के चलते अकसर बच्चे के जन्म के बाद महिलाएं फौलिक ऐसिड की कमी के कारण ऐनीमिया से ग्रस्त हो जाती हैं.

– बच्चे के जन्म के बाद कुपोषण के कारण अकसर महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रैशन की भी शिकार हो जाती हैं. बच्चे को जन्म देने के बाद महिलाओं में भावनात्मक बदलाव आते हैं, जिस के कारण डिप्रैशन की समस्या हो सकती है. इस के कारण कई बार महिलाएं ठीक से खाना खाना बंद कर देती हैं और कुपोषण की शिकार हो जाती हैं.

– गर्भावस्था के दौरान लगभग सभी महिलाओं का वजन बढ़ जाता है. कई बार महिलाएं वजन में कमी लाने के लिए ठीक से पोषक भोजन नहीं करतीं, जिस वजह से कुपोषण की शिकार हो जाती हैं. अत: गर्भावस्था के बाद वजन में धीरेधीरे कमी लाने की कोशिश करें ताकि अचानक कुपोषण की शिकार न हों.

– बच्चे के जन्म के बाद अकसर मां ठीक से सो नहीं पाती. अत: नींद पूरी न होने के कारण शरीर में पोषक पदार्थ अवशोषित नहीं होते, जिस के कारण वह कुपोषण का शिकार हो जाती है.

गर्भस्थ शिशु और नवजात के लिए जोखिम

गर्भवती महिला में कुपोषण का बुरा असर उस के पेट में पल रहे बच्चे पर पड़ता है. बच्चे का विकास ठीक से नहीं हो पाता और जन्म के समय उस का वजन सामान्य से कम रह जाता है. गर्भावस्था के दौरान मां में कुपोषण आईयूजीआर और जन्म के समय कम वजन का बुरा असर बच्चे पर पड़ता है, जिस के कई परिणाम हो सकते हैं.

जन्मजात दोष, ब्रेन डैमेज यानी दिमाग को नुकसान, समय से पहले जन्म, कुछ अंगों का विकास न होना, कुछ बच्चे पैदा होते रोते नहीं. इन में से 50 फीसदी मामलों का कारण आईयूजीआर होता है.

बच्चे के आने वाले जीवन पर असर

अगर गर्भावस्था के दौरान मां में पोषण की कमी हो तो बच्चे को अपने जीवन में इन बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है:

औस्टियोपोरोसिस, क्रोनिक किडनी फेल्योर, दिल की बीमारी, टाइप 2 डायबिटीज, लंग्स डिजीज, खून में लिपिड्स की मात्रा असामान्य होना, ग्लूकोस इन्टौलरैंस (एक प्रीडायबिटिक कंडीशन, जिस में शरीर में ग्लूकोस का मैटाबोलिज्म असामान्य हो जाता है).

मां के लिए समस्याएं

अगर गर्भावस्था के दौरान मां में पोषण की कमी हो तो यह जानलेवा भी हो सकती है. इस के अलावा बच्चे का समय से पहले पैदा होना, गर्भपात जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. महिलाओं में और भी कई समस्याएं हो सकती हैं जैसे संक्रमण, एनीमिया यानी खूनी की कमी, उत्पादकता में कमी, सुस्ती और कमजोरी, औस्टियोपोटोसिस.

कुपोषण को कैसे रोका जा सकता है ?

कुपोषण को संतुलित आहार के सेवन से रोका जा सकता है. महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त मात्रा में फल, सब्जियां, पानी, फाइबर, प्रोटीन, वसा एवं कार्बोहाइड्रेट का सेवन करना चाहिए.

पोषण संबंधी जरूरतें

आयरन : शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए आयरन बहुत जरूरी है. हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है और पूरे शरीर में औक्सीजन पहुंचाता है. अगर शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाए तो शरीर के सभी अंगों तक औक्सीजन पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती. अगर आप आयरन का सेवन ठीक से न करें तो धीरेधीरे हीमोग्लोबिन की कमी होने लगती है और आप एनीमिक हो जाती हैं. आप अपने शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस करती हैं. आप के शरीर में बीमारियों से लड़ने की ताकत नहीं रहती.

बच्चे को जन्म देने के बाद अकसर महिलाएं थकान और कमजोरी महसूस करती हैं. ऐसे में उन्हें आयरन से युक्त आहार का सेवन करना चाहिए. बच्चे के जन्म के दौरान कई बार बहुत ज्यादा खून बह जाने के कारण भी खून की कमी हो जाती है. अत: अपने आहार में आयरन की पर्याप्त मात्रा रखें.

प्रीनेटल विटामिन : गर्भवती महिलाओं को प्रीनेटल विटामिन की सलाह दी जाती है ताकि बच्चे को विटामिंस और मिनरल्स पर्याप्त मात्रा में मिलते रहें. कुछ मामलों में जन्म के बाद प्रीनेटल विटामिंस की जरूरत नहीं होती, इसलिए डाक्टर से पूछ लें कि आप को कितने समय तक विटामिंस जारी रखने चाहिए.

ओमेगा-3 फैटी ऐसिड : बच्चे के जन्म के बाद खासतौर पर स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अपने आहार में ओमेगा-3 फैटी ऐसिड विशेषरूप से डोकोसहेक्सानोइक ऐसिड (डीएचए) का सेवन जरूर करना चाहिए. सालमन और ट्राउट में डीएचए भरपूर मात्रा में होता है. अगर आप शाकाहारी हैं तो अलसी के बीज, सोया, अखरोट और कद्दू के बीच का सेवन करें. इन में ओमेगा-3 पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है.

कैल्सियम : महिलाओं को जीवन की हर अवस्था में कैल्सियम की सही मात्रा की जरूरत होती है. इस के लिए डेयरी उत्पादों, गहरी हरी पत्तेदार सब्जियों, ब्रोकली, दूध एवं दूध से बनी चीजों, कैल्सियम फोर्टिफाइड खा-पदार्थों का सेवन करें.

बच्चे को जन्म देने के बाद सिर्फ कैलोरी के सेवन से बचें : बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती दिनों में महिलाएं बच्चे की देखभाल में बहुत ज्यादा व्यस्त हो जाती हैं. ऐसे में वे सेहतमंद आहार पर ध्यान नहीं दे पातीं और जानेअनजाने में सिर्फ हाई कैलोरी भोजन खाती रहती हैं, जबकि मां को सेहतमंद आहार लेना चाहिए. इस दौरान गाजर, फल, सब्जियां, लो फैट योगर्ट, उबला अंडा, लो फैट चीज, अंगूर, केला, किशमिश, मेवे का सेवन करना चाहिए.

बारबार थोड़ाथोड़ा खाएं : एक ही बार भरपेट खाने के बजाय थोड़ीथोड़ी देर बाद कम मात्रा में खाती रहें. इस से दिन भर आप में ऊर्जा बनी रहेगी. भारी भोजन को पचाने के लिए ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है, लेकिन इस समय मां की नींद पूरी नहीं हो पाती, जिस से भारी भोजन पचाना मुश्किल होता है. इसलिए हलका आहार लें ताकि आप के शरीर में ऊर्जा का सही स्तर बना रहे और आप दिन भर थकान महसूस न करें.

कैफीन का सेवन : कम मात्रा में कैफीन हानिकारक नहीं है, लेकिन शरीर की ऊर्जा बनाए रखने के लिए ज्यादा मात्रा में कैफीन सेहत के लिए हानिकर हो सकती है. इस के बजाय कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से युक्त संतुलित आहार लें ताकि आप के शरीर में दिन भर ऊर्जा बनी रहे. स्तनपान कराने वाली मां को कैफीन का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए, क्योंकि दूध के जरीए यह बच्चे में भी चला जाता है.

डिहाइड्रेशन से बचें : बच्चे को जन्म देने के दौरान शरीर से तरल पदार्थ बहुत ज्यादा मात्रा में निकल जाते हैं, इसलिए इस दौरान हाइड्रेशन का खास ध्यान रखें. डिहाइड्रेशन से मां कमजोरी और थकान महसूस कर सकती है. रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं. पानी की कमी से दूध का उत्पादन भी कम हो सकता है.

बच्चे के जन्म के बाद पोषण और वजन में कमी :  बच्चे के जन्म के बाद अकसर महिलाएं एकदम से अपना वजन कम करना चाहती हैं, जिस के कारण उचित आहार का सेवन नहीं कर पातीं. यह हानिकारक हो सकता है. स्तनपान कराने से वजन खुद ही कम हो जाता है, जबकि स्तनपान कराने वाली मां को रोजाना 300 अतिरिक्त कैलोरी की जरूरत होती है. इसलिए संतुलित आहार के साथसाथ व्यायाम करें और अतिरिक्त कैलोरी के सेवन से बचें. अगर नौर्मल डिलिवरी हुई है, तो आप बच्चे को जन्म देने के कुछ सप्ताह बाद हलका व्यायाम शुरू कर सकती हैं. हालांकि सी सैक्शन के बाद 6 सप्ताह तक व्यायाम नहीं करना चाहिए.

-डा. श्रुति शर्मा

(बैरिएट्रिक काउंसलर और न्यूट्रिशनिस्ट, जेपी हौस्पिटल, नोएडा)

जानिए, कौन से गहने पहन कर आप दूसरों की तारीफ बटोर सकती हैं

इस साल बोल्ड, क्लासिक, कई रंगों के मिश्रण से बने गहने, मीनाकारी और अलगअलग पत्थरों से बने आभूषणों का ट्रैंड है, जिन्हें हर महिला किसी भी अवसर पर पहनना पसंद करती है. इस के अलावा क्लासिक डायमंड ज्वैलरी, जिस में हीरे के अलावा रूबी आदि के रंगबिरंगे पत्थरों को ले कर बने आभूषण भी काफी ट्रैंड में हैं.

रोज गोल्ड का भी खूब चलन है. इस से क्लासी, ऐलिगैंट लुक दिखाई देता है. इंडियन स्किन टोन पर यह बहुत अच्छा दिखता है. भारतीय परिधान ही नहीं उन के साथसाथ गहने पहनने का भी चलन आजकल जोरों पर है.

महिलाओं की पसंद

इस बारे में वोइला के ज्वैलरी डिजाइनर संजय शर्मा कहते हैं कि आज की महिलाएं हर गहने में कुछ नया खोजती हैं, इसलिए हमें उन का ध्यान रखना पड़ता है. ट्रैडिशनल बोल्ड ऐलिगैंट चोकर और इयरग्सिं इस बार खास आकर्षण में हैं, जिन्हें कभी भी पहना जा सकता है. ट्रैप्ड और प्रोटैक्टेड जैमस्टोन में पारंपरिक डिजाइनों को ले कर रत्न जड़े जाते हैं. ये कलरफुल होने की वजह से हर रंग के कपड़ों के साथ पहने जा सकते हैं. आजकल फ्लूइड फौर्म के कपड़े अधिक पहने जाते हैं. ऐसे में उन्हें और अधिक सुंदर बनाने के लिए फ्लूइड वाले गहनों का प्रयोग अच्छा रहता है.

फ्रिल्स और रफल्स वाले परिधान में सब से अधिक गहने पसंद किए जाते हैं. कई रंगों के मिश्रण से बने ये गहने महिलाओं को बेहद पसंद आते हैं. कलर ट्रैंड की बात करें, तो पेस्टल ग्रीन और औरेंज वैडिंग या किसी त्योहार में पहने जा सकते हैं.

कैजुअल वियर के साथ इंडिगो ब्लू, डार्क ब्लू, इंडिगो टर्क्वाइश ब्लू आदि रंगों के गहने पौपुलर हैं. ये गहने किसी भी अवसर पर पहने जा सकते हैं. इन के अलावा सिल्वर औक्सिडाइज्ड गहने किट्टी पार्टी या फिर गरबा आदि के समय पहने जा सकते हैं.

कामकाजी महिलाओं की पसंद

गहनों को डिजाइन करते समय 3 बातों का ध्यान रखना पड़ता है. मसलन, उन की ऐस्थैटिक वैल्यू, पहनने में आरामदायक और कम दाम होना, क्योंकि आजकल की महिलाएं कम दाम में सुंदर डिजाइनें खोजती हैं, जो हर अवसर पर पहनी जा सकें.

ब्राइडल ज्वैलरी में महिलाएं हर तरह के गहने पहनती हैं, जैसे कि मांगटीका, नथ, गले का चोकर, मध्यम हार, लौंग हार, कानों में झुमके या चांद बाली, बाजूबंद, हथफूल, कमरबंद, पायल, बिछिया आदि. इन में भी चोकर नैकलैस सब से अधिक पौपुलर है.

इन के अलावा 38 इंच से 40 इंच लंबी ट्रैडिशनल चेन भी किसी पार्टी में महिला की खास शोभा बढ़ाती है. बड़े इयररिंग्स का भी आजकल अधिक प्रचलन है. इन में नैकपीस न पहनने पर भी आप की खूबसूरती कायम रहती है.

औफिस जाने वाली महिलाओं की पसंद आम महिला से अलग होती है. वे अधिकतर छोटे झुमके, छोटे इयररिंग्स नौर्मल क्लासिक ड्रैस के साथ पहनना पसंद करती हैं. वे अधिकतर ऐसे गहने खरीदती हैं जो उन की हर तरह की ड्रैस के साथ पहने जा सकें.

चलन में गहने

संजय कहते हैं कि ट्रैंड से भी ज्यादा गहने चेहरे के अनुसार पहने जाने चाहिए. ओवल, राउंड, स्क्वेयर चेहरे वाली महिलाओं को इस का ध्यान रखने की जरूरत है. ओवल शेप चेहरे वाली महिला के लिए मार्किज शेप के कान के गहने अच्छे लगते हैं, जबकि राउंड शेप में झुमके पहनना अच्छा रहता है, स्क्वेयर शेप चेहरे के लिए ज्यामितीय आकार के कान के आभूषण अच्छे लगते हैं.

टीनऐजर लड़कियों में छोटे कलरफुल, डैलिकेट गहने पहनने का अधिक ट्रैंड है. अभी नोज पिन और नोज क्लिप्स का प्रचलन उन में अधिक है. इसे वे वैस्टर्न परिधानों के साथ आसानी से पहन सकती हैं.

मिडिल ऐज में ट्रैडिशनल, बारीक काम किए क्लासिक, फाइन गोल्ड के आभूषण अधिक पसंद किए जाते हैं. इस के अलावा झुमके, चांदबाली, जाली का काम, डायमंड लुक अधिक ट्रैंड में हैं. 50 से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए सिंगल लाइन नैकनैस, कुंदन नैकलैस, प्योर डायमंड या गोल्ड के हाथों के कड़े आदि अधिक पौपुलर हैं.

आजकल कलरफुल ज्वैलरी भी खास प्रचलन में है, जिस में नैचुरल स्टोन लगाया जाता है. इस से गहने का दाम अधिक बढ़ जाने की वजह से कई बार सेमीप्रिसिअस स्टोन का भी प्रयोग सोने में किया जाता है, जो देखने में रियल लगता है और बजट में आ जाता है.

जानलेवा रोग पत्नी वियोग : विरह से जूझ रहे पतियों के जख्मों पर नमक न छिड़कें

प्यार वाकई आदमी को अंधा बना देता है. इस के चलते आदमी इतना भावुक, भयभीत और संवेदनशील हो जाता है कि फिर व्यावहारिकता और दुनियादारी नहीं सीख पाता. यही ऋषीश के साथ हुआ, जिस ने नेहा से लव मैरिज की थी. प्रेमिका को पत्नी के रूप में पा कर वह बहत खुश था. पेशे से फुटबाल कोच और ट्रेनर ऋषीश की खुशी उस वक्त और दोगुनी हो गई जब करीब डेढ़ साल पहले नेहा ने प्यारी सी गुडि़या को जन्म दिया.

भोपाल के कोलार इलाके में स्थित मध्य भारत योद्धाज क्लब को हर कोई जानता है, जिस का कर्ताधर्ता ऋषीश था. हंसमुख और जिंदादिल इस खिलाड़ी से एक बार जो मिल लेता था वह उस का हो कर रह जाता था. मगर कोई नहीं जानता था कि ऊपर से खुश रहने का

नाटक करने वाला यह शख्स कुछ समय से अंदर ही अंदर बेहद घुट रहा था. ऋषीश की जिंदगी में कुछ ऐसा हो गया जिस की उम्मीद शायद खुद उसे भी न थी.

गत 3 जुलाई को 32 साल के ऋषीश दुबे ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली तो जिस ने भी सुना वह खुदकुशी की वजह जान कर हैरान रह गया. ऋषीश ने पत्नी वियोग में जान दे दी. उस के मातापिता दोनों बैंक कर्मचारी हैं. उस शाम जब वे घर लौटे तो ऋषीश घर में बेहोश पड़ा था.

घबराए मातापिता तुरंत बेटे को नजदीक के अस्पताल ले गए जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. मौत संदिग्ध थी इसलिए पुलिस को बुलाया गया तो पता चला कि ऋषीश ने जहर खाया था. उस की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. मगर मरने से पहले ऋषीश ने अपनी यादों का जो पोस्टमार्टम कलम से कागज पर किया वह शायद ही कभी मरे, क्योंकि वह जिस्म नहीं एहसास है.

तो मैं नहीं रहूंगा

परिवार, समाज और दुनिया से विद्रोह कर नेहा से शादी करने वाला ऋषीश यों ही 3 जुलाई को हिम्मत नहीं हार गया था. हिम्मत हारने की वजह थी कभी उस की हिम्मत रही नेहा जो कुछ महीनों से उस का साथ छोड़ मायके रह रही थी.

पति से विवाद होने पर पत्नी का मायके जा कर रहने लगना कोई नई बात नहीं, बल्कि एक परंपरा सी हो चली है, जिस का निर्वाह नेहा ने भी किया और जातेजाते नन्हीं बेटी को भी साथ ले गई, जिस में ऋषीश की सांसें बसती थीं.

2 महीने पहले किसी बात पर दोनों में विवाद हुआ था. यह भी कोई हैरत की बात नहीं थी, लेकिन नेहा ने ऋषीश की शिकायत थाने में कर दी.

अपने सुसाइड नोट में ऋषीश ने नेहा को संबोधित करते हुए लिखा कि तुम साथ छोड़ती हो तो मैं नहीं रहूंगा और मैं साथ छोड़ूंगा तो तुम नहीं रहोगी.

4 पेज का लंबाचौड़ा सुसाइड नोट भावुकता और विरह से भरा है, जिस का सार इन्हीं 2 पंक्तियों में समाया हुआ है. दोनों ने एकदूसरे से वादा किया था कि कुछ भी हो जाए कभी एकदूसरे के बिना नहीं रहेंगे यानी बात मिल के न होंगे जुदा आ वादा कर लें जैसी थी.

वादा नेहा ने तोड़ा और इसे पुलिस थाने जा कर सार्वजनिक भी कर दिया तो ऋषीश का दिल टूटना स्वाभाविक बात थी. यह वही पत्नी थी जो कभी उस के दिल का चैन और रातों की नींद हुआ करती थी. एक जरा सी खटपट क्या हुई कि वह सब भूल गई.

अलगाव से आत्महत्या तक

तुम ने मुझे धोखा दिया धन्यवाद… पत्नी को शादी के पहले के वादे याद दिलाने वाला ऋषीश क्या वाकई पत्नी को इतना चाहता था कि बिना उस के जिंदा नहीं रह सकता था? इस सवाल का जवाब अच्छेअच्छे दार्शनिक और मनोविज्ञानी भी शायद ही दे पाएं.

ऋषीश की आत्महत्या की वजह का एक पहलू जो साफ दिखता है वह यह है कि उसे पत्नी से यह उम्मीद नहीं थी. मगर ऐसा तो कई पतियों के साथ होता है कि पत्नी किसी विवाद या झगड़े के चलते मायके जा कर रहने लगती है. लेकिन सभी पति तो पत्नी वियोग में आत्महत्या नहीं कर लेते?

तो क्या आत्महत्या कर लेने वाले पति पत्नी को इतना चाहते हैं कि उस की जुदाई बरदाश्त नहीं कर पाते? इस सवाल के जवाब हां में कम न में ज्यादा मिलते हैं, जिन की अपनी व्यक्तिगत पारिवारिक और सामाजिक वजहें हैं जो अब बढ़ रही हैं, इसलिए पत्नी वियोग के चलते पतियों द्वारा आत्महत्या करने के मामले भी बढ़ रहे हैं.

सामाजिक नजरिए से देखें तो वक्त बहुत बदला है. कभी पत्नी तमाम ज्यादतियां बरदाश्त करती थी, लेकिन मायके वालों की यह नसीहत याद रखती थी कि जिस घर में डोली में बैठ कर जा रही हो वहां से अर्थी में ही निकलना.

इस नसीहत के कई माने थे, जिन में पहला अहम यह था कि बिना पति और ससुराल के औरत की जिंदगी दो कौड़ी की भी नहीं रह जाती. दूसरी वजह आर्थिक थी. समाज और रिश्तेदारी में उन महिलाओं को अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता था जो पति को छोड़ देती थीं या जिन्हें पति त्याग देता था. अब हालत उलट है. अब उन पतियों को अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता जिन की पत्नियां उन्हें छोड़ कर चली जाती हैं.

पति को छोड़ना आम बात

पत्नी वियोग पहले की तरह सहज रूप से ली जाने वाली बात नहीं रह गई कि गई तो जाने दो दूसरी शादी कर लेंगे. ऐसा अब नहीं होता है, तो यह भी कहा जा सकता है कि हम एक सभ्य, अनुशासित और रिश्तों के समर्पित समाज में रहते हैं.

इसी सभ्य समाज का एक उसूल यह भी है कि पत्नी अगर पति को छोड़ कर चली जाए तो पति का रहना दूभर हो जाता है. उसे कठघरे में खड़ा कर तमाम ऐसे सवाल पूछे जाते हैं कि वह घबरा उठता है. ऐसे ही कुछ कमैंट्स इस तरह हैं:

क्या उसे संतुष्ट नहीं रख पा रहे थे? क्या उस का कहीं और अफेयर था? क्या घर वाले उसे परेशान करते थे? क्या उस में कोई खोट आ गई थी? क्या यार एक औरत नहीं संभाल पाए, कैसे मर्द हो? आजकल औरतें आजादी और हालात का फायदा इसी तरह उठाती हैं. जाने दो चली गई तो भूल कर भी झुक कर बात मत करना. अब फंसो बेटा पुलिस, अदालत के चक्करों में. सुना है उस ने रिपोर्ट लिखा दी? अब कैसे कटती हैं रातें? कोई और इंतजाम हो गया क्या?

कोई भी पति इन और ऐसे और दर्जनों बेहूदे सवालों से बच नहीं सकता. खासतौर से उस वक्त जब पत्नी किसी भी शर्त पर वापस आने को तैयार न हो.

 क्या करे बेचारा

पत्नी के वापस न आने की स्थिति में पति के पास करने के नाम पर कोई खास विकल्प नहीं रह जाते. पहला रास्ता कानून से हो कर जाता है जिस पर कोई पढ़ालिखा समझदार तो दूर अनपढ़, गंवार पति भी नहीं चलना चाहता. इस रास्ते की दुश्वारियों को झेल पाना हर किसी के बस की बात नहीं होती. पत्नी को वापस लाने का कानून वजूद में है, लेकिन वह वैसा ही है जैसे दूसरे कानून हैं यानी वे होते तो हैं, लेकिन उन पर अमल करना आसान नहीं होता.

दूसरा रास्ता पत्नी को भूल जाने का है. ज्यादातर पति इसे अपनाते भी हैं, लेकिन इस विवशता और शर्त के साथ कि जब तक रिश्ता पूरी तरह यानी कानूनी रूप से टूट न जाए तब तक भजनमाला जपते रहो यानी तमाम सुखों से वंचित रहो.

तीसरा व चौथा रास्ता भी है, लेकिन वे भी कारगर नहीं. असल दिक्कत उन पतियों को होती है जो वाकई अपनी पत्नी से प्यार करते हैं. ये रास्ता नहीं ढूंढ़ते, बल्कि सीधे मंजिल पर आ पहुंचते हैं यानी खुदकुशी कर लेते हैं जैसे भोपाल के ऋषीश ने की और जैसे राजस्थान के उदयपुर के विनोद मीणा ने की थी.

आत्महत्या और प्रतिशोध भी

गत 14 जुलाई को उदयपुर के गोवर्धन विलास थाना इलाके में रहने वाले विनोद का भी किसी बात पर पत्नी से विवाद हुआ तो वह भी मायके चली गई.

5 दिन विनोद ने पत्नी का इंतजार किया पर वह नहीं आई तो कुछ इस तरह आत्महत्या की कि सुनने वालों की रूह कांप गई. कोल माइंस में काम करने वाले विनोद ने खुद को डैटोनेटर बांध लिया यानी मानव बम बन गया और खुद में आग लगा ली. विनोद के शरीर के इतने चिथड़े उड़े कि उस का पोस्टमार्टम करना मुश्किल हो गया.

विनोद के उदाहरण में प्यार कम दबाव ज्यादा है, जिस का बदला उस ने खुद से लिया. मुमकिन है विनोद को भी दूसरे आत्महत्या करने वाले पतियों की तरह पुरुषोचित अहम पर चोट लगी हो या स्वाभिमान आहत हुआ हो अथवा वह भी दुनियाजहान के संभावित सवालों का सामना करने से डर रहा हो. जो भी हो, लेकिन पत्नी वियोग में इतने घातक और हिंसक तरीके से आत्महत्या कर लेने का यह मामला अपवाद था, जिस में ऋषीश की तरह काव्य या भावुकता नहीं थी. थी तो एक खीज और बौखलाहट जो हर उस पति में होती है, जिस की पत्नी उसे घोषित तौर पर छोड़ जाती है.

क्या पति इतने पजैसिव हो सकते हैं कि पत्नी वियोग में जान ही दे दें? इस का सवाल रोजाना ऐसे मामले देखने के चलते न में तो कतई नहीं दिया जा सकता.

तो फिर जाने क्यों देते हैं

पत्नी वियोग में आत्महत्या मध्य प्रदेश के सागर जिले के 21 वर्षीय ब्रजलाल ने भी की थी. लेकिन यहां वजह जुदा थी. ब्रजलाल की शादी को अभी 3 महीने ही हुए थे कि उस की पत्नी अपने प्रेमी के साथ भाग गई.

ब्रजलाल के सामने चिंता या तनाव यह था कि अब किस मुंह से वह रिश्तेदारों और समाज के चुभते सवालों का सामना करेगा. हालांकि चाहता तो कर भी सकता था, लेकिन 21 साल के नौजवान से ऐसी उम्मीद लगाना व्यर्थ है कि वह दुनिया से लड़ पता.

यहां वजह वियोग नहीं, बल्कि कहीं नाक थी. ब्रजलाल के पास मुकम्मल वक्त और मौका था कि वह अपनी पत्नी की करतूत और उस के मायके वालों की गलती लोगों को बताता और फिर तलाक ले कर दूसरी शादी कर लेता. यह भी लंबी प्रक्रिया होती, लेकिन इस के लिए उस के पास समय तो था पर हिम्मत, सब्र और समझदारी नहीं थी.

समय उन के पास नहीं होता जिन की पत्नियां कुछ या कईर् साल प्यार से गुजार चुकी होती हैं, लेकिन फिर एकाएक छोड़ कर चली जाती हैं, ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो पति बगैर पत्नियों के नहीं रह सकते वे आखिर उन्हें जाने ही क्यों देते हैं?

यह एक दुविधाभरा सवाल है, जिस में लगता नहीं कि पत्नी को चाहने वाला कोई पति जानबूझ कर उसे भगाता या जाने देता हो. तूतू, मैंमैं आम है और दांपत्य का हिस्सा भी है, लेकिन यहां आ कर पतियों की वकालत करने को मजबूर होना ही पड़ता है कि पत्नियां अपनी मनमानी के चलते जाती हैं. वे अपनी शर्तों पर जीने की जिद करने लगें तो पति बेचारे क्या करें सिवा इस के कि पहले उन्हें जाता हुए देखते रहें, फिर विरह के गीत गाएं और फिर पत्नी को बुलाएं. इस पर भी वे न आएं तो उन की जुदाई में खुदकुशी कर लें.

क्या कुछ पत्नियां पति के प्यार को हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं? इस सवाल का जवाब भी साफ है कि हां करती हैं, जिस की परिणीति कभीकभी पति की आत्महत्या की शक्ल में सामने आती है.

कोई पत्नी इस जिद पर अड़ जाए कि शादी के 5 साल हो गए अब मांबाप या परिवार से अलग रहने लगें तो पति का झल्लाना स्वाभाविक है कि जब सबकुछ ठीकठाक चल रहा है तो अलग क्यों होएं? इस पर पत्नी जिद करते यह शर्त थोप दे कि ठीक है अगर मांबाप से अलग नहीं हो सकते तो मैं ही चली जाती हूं. जब अक्ल ठिकाने आ जाए तो लेने आ जाना. और वह सचमुच सूटकेस उठा कर बच्चों सहित या बिना बच्चों के चली भी जाती है. पीछे छोड़ जाती है पति के लिए एक दुविधा जिस का कोई अंत या इलाज नहीं होता.

ऐसी और कई वजहें होती हैं, जिन के चलते पत्नियां आगापीछा कुछ नहीं सोच पातीं सिवा इस के कि चार दिन अकेला रहेगा तो पत्नी की कीमत समझ आ जाएगी.

ये पत्नियां यह नहीं सोचतीं कि उन की कीमत तो पहले से ही पति की जिंदगी में है जिसे यों वसूला जाना घातक सिद्घ हो सकता है. इस पर भी पति न माने तो पुलिस थाने और कोर्टकचहरी की नौबत लाना पति को आत्महत्या के लिए उकसाने जैसी ही बात है.

बचें दोनों

पत्नी को हाथोंहाथ लेने को तैयार बैठे मायके वाले भी बात की तह तक नहीं पहुंच पाते. बेटी या बहन जो कह देती है उसे ही सच मान बैठते हैं और उस का साथ भी यह कहते हुए देते हैं कि अच्छा यह बात है, तो हम भी अभी मरे नहीं हैं.

मरता तो वह पति है जो ससुराल वालों से यह झूठी उम्मीद लगाए रहता है कि वे बेटी की गलती को शह नहीं देंगे, बल्कि उसे समझाएंगे कि वह अपने घर जा कर रहे. वहां पति और उस के घर वालों को उस की जरूरत है. ऐसी कहासुनी तो चलती रहती है. इस की वजह से घर छोड़ आना बुद्धिमानी की बात नहीं.

मगर जब ऐसा होता नहीं तो पति की रहीसही उम्मीदें भी टूट जाती हैं. भावुक किस्म के पति जो वाकई पत्नी के बगैर नहीं रह सकते उन्हें अपनी जिंदगी बेकार लगने लगती है और फिर वे जल्द ही सब का दामन छोड़ देते हैं, इसलिए थोड़े गलत तो वे भी कहे जाएंगे. पत्नी के चले जाने पर पति थोड़ी सब्र रखें तो उन की जिंदगी बच सकती है.

कई मामलों में देखा गया है कि पति अहं, स्वाभिमान या जिद को छोड़ पत्नी के मायके जा कर उस से घर चलने के लिए मिन्नतें करता है तो पत्नी के भाव और बढ़ जाते हैं और वह वहीं उस का तिरस्कार या अपमान कर देती है. ऐसी हालत में अच्छेअच्छे का दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है तो फिर ऋषीश जैसों की गलती या हैसियत क्या जो प्यार के हाथों मजबूर होते हैं.

क्या करे पत्नी

पत्नियों को चाहिए कि समस्या वाकई अगर कोईर् है तो उसे पति के साथ रहते ही सुलझाने की कोशिश करें, वजह पतिपत्नी दोनों वाकई एक गाड़ी के 2 पहिए होते हैं, जिन्हें घर के बाहर की लड़ाई संयुक्तरूप से लड़नी होती है. पति अगर आर्थिक, भावनात्मक या व्यक्तिगत रूप से पत्नी पर ज्यादा निर्भर है या असामान्य रूप से संवेदनशील है तो जिम्मेदारी पत्नी की बनती है कि वह उसे छोड़ कर न जाए.

क्या किसी ऐसी जिद की सराहना की जानी चाहिए जिस के चलते पत्नी खुद अपनी ही वजह से विधवा हो रही हो. कोई भी हां नहीं कहेगा.

मातापिता की भूमिका

पति के घर वालों खासतौर से मांबाप को भी चाहिए कि वे ऐसे वक्त में बेटे का खास खयाल रखें बल्कि वह भावुक हो तो नजर रखें और बहू न आ रही हो तो बेटे को समझाएं कि इस में कुछ खास गलत नहीं है और न ही प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है और हो भी रही हो तो उस की कीमत बेटे की खुशी के आगे कुछ नहीं. इस तरह की बातें उसे हिम्मत देने वाली साबित होंगी. अगर इतना भी नहीं कर सकते तो उस पर ताने तो बिलकुल न कसें.

पतियों को छोड़ कर चली जाने वाली पत्नियां और दुविधा में पड़े विरह में जी रहे पतियों को फिल्म ‘आप की कसम’ का यह गाना जरूर गुनगुना लेना चाहिए- ‘जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकाम वे फिर नहीं आते…’

पत्नी विरह प्रधान इस फिल्म में नायक बने राजेश खन्ना ने आत्महत्या तो नहीं की थी पर उस की जिंदगी किस तरह मौत से भी बदतर हो गई थी, यह फिल्म में खूबसूरती से दिखाया गया है. इसलिए पतियों को भी इस गाने का यह अंतरा याद रखना चाहिए-

‘कल तड़पना पड़े याद में जिन की, रोक लो उन को रूठ कर जाने न दो…’

जुनूनी आशिक : प्राची और आकाश की प्यार और दोस्ती की कहानी

प्राची महाराष्ट्र के ठाणे के उपनगर किशोर नगर स्थित आनंद भवन सोसायटी में रहती थी. वह के.जी. जोशी और एन.जी. वेडकर कालेज से बीकौम द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रही थी. इस के साथ ही साथ वह घर की आर्थिक मदद के लिए ठाणे की एक प्राइवेट कंपनी में पार्टटाइम जौब करती थी.

वैसे तो प्राची अकसर अपने औफिस के लिए दोपहर 1 बजे के आसपास निकलती थी, लेकिन 4 अगस्त, 2018 को शनिवार था इसलिए कालेज बंद होने के कारण प्राची 11 बजे ही औफिस के लिए निकल गई थी.

प्राची हंसमुख और मेहनती युवती थी. औफिस के लोग जितना काम पूरे दिन में नहीं करते थे, उस से अधिक काम वह पार्टटाइम में कर दिया करती थी. यही कारण था कि औफिस स्टाफ और बौस प्राची की बहुत इज्जत करते थे.

उस दिन प्राची स्कूटी से जब ठाणे आरटीओ के सामने पहुंची तो आकाश ने ओवरटेक कर के अपनी मोटरसाइकिल उस की स्कूटी के आगे लगा दी.

प्राची आकाश को जानती थी. अचानक ब्रेक लगाने से वह गिरतेगिरते बची. उसे आकाश की यह हरकत अच्छी नहीं लगी.

इस बेहूदे कृत्य पर प्राची आकाश पर भड़क गई, ‘‘यह क्या बदतमीजी है, तुम ने इस तरह से रास्ता क्यों रोका?’’

‘‘हां, रोका है, एक बार नहीं हजार बार रोकूंगा.’’ आकाश अपनी मोटरसाइकिल स्टैंड पर खड़ी करते हुए बोला.

‘‘देखो, मैं तुम से बहस नहीं करना चाहती. मेरा रास्ता छोड़ो, मुझे औफिस के लिए देर हो रही है.’’ प्राची ने अपनी स्कूटी स्टार्ट करते हुए कहा.

‘‘अगर मैं ने रास्ता नहीं छोड़ा तो मेरा क्या कर लोगी, पुलिस के पास जाओगी? जाओ, शौक से जाओ. पुलिस के पास तो तुम पहले भी गई थी, क्या कर लिया मेरा?’’ आकाश ने प्राची की स्कूटी की चाबी निकालते हुए कहा.

‘‘देखो आकाश, बहुत तमाशा हो चुका. तुम मेरा पीछा करना बंद करो और मेरी स्कूटी की चाबी मुझे दे दो.’’

कहते हुए प्राची अपना हेलमेट सिर पर लगाने लगी. तभी आकाश ने प्राची का हेलमेट छीन कर उसे हवा में उछालते हुए कहा, ‘‘तमाशा हमारा नहीं तुम्हारा है, प्राची. आखिर तुम यह मान क्यों नहीं लेतीं कि तुम्हें मुझ से प्यार है. हम दोनों एकदूसरे के लिए बने हैं. दोनों मिल कर एक नई दुनिया बसाएंगे, जहां हमारे ऐशोआराम के सारे साधन होंगे.’’ आकाश नरम लहजे में प्राची को समझाने की कोशिश करने लगा. लेकिन प्राची ने इस की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया.

‘‘आकाश, यह तुम्हारी गलतफहमी है. मैं ने न तो तुम्हें कभी प्यार किया था और न करती हूं. यह बात मैं तुम्हें कितनी बार कह चुकी हूं. मैं पहले भी तुम्हें अपना एक अच्छा दोस्त मानती थी और आज भी मानती हूं. इस से ज्यादा तुम मुझ से और कोई अपेक्षा न रखो, समझे.’’ प्राची ने साफसाफ कह दिया.

‘‘तो क्या यह तुम्हारा आखिरी फैसला है?’’ आकाश ने निराशा भरे शब्दों में पूछा.

‘‘हां…हां,’’ प्राची ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘हां, अब तुम मुझे भूल जाओ. तुम भी जियो और मुझे भी जीने दो.’’

‘‘प्राची, यही तो मुश्किल है. न तो मैं तुम्हें भूल सकता हूं और न तुम्हारे बिना रह सकता हूं. इस के लिए तो सिर्फ अब एक ही रास्ता बचा है…’’ कहते हुए आकाश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया.

‘‘एक ही रास्ता…क्या मतलब है तुम्हारा? कहना क्या चाहते हो तुम?’’ प्राची ने पूछा.

जब आकाश को लगा कि प्राची मानने वाली नहीं है और न ही वह उस की बात को तवज्जो दे रही है तो गुस्से में वह अपना संयम खो बैठा. उस ने तय कर लिया कि प्राची अगर उसे प्यार नहीं करती तो वह उसे किसी और से प्यार करने के लिए भी नहीं छोड़ेगा.

यह सोचते हुए उस ने अपनी पैंट की जेब से चाकू निकाल लिया और यह कहते हुए उस पर हमला कर दिया कि अगर वह उस की नहीं हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.

प्यार की आग में जल रहे आकाश ने प्राची के ऊपर इतनी ताकत से अनेक वार किए कि उस के चाकू का फल टूट कर जमीन पर गिर गया. इस के बाद वह आत्महत्या करने के मकसद से सड़क के दूसरी तरफ से आती हुई राज्य परिवहन निगम की बस के सामने कूद गया.

गनीमत यह रही कि बस के ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगा दिए, जिस से वह बच गया. उस के सिर में हलकी सी चोट आई थी. वह फटाफट उठा और वहां से औटो पकड़ कर फरार हो गया.

भीड़ ने बस तमाशा देखा

भीड़भाड़ भरे इलाके में फिल्मी स्टाइल से घटी इस घटना को वहां से गुजर रहे लोगों ने देखा था. लेकिन भीड़ में से कोई भी उस की मदद के लिए आगे नहीं आया, बल्कि कुछ लोग तो अपने मोबाइल से फोटो खींचने और वीडियो बनाने में लग गए. हद तो तब हो गई, जब जमीन पर घायलावस्था में पड़ी प्राची दर्द से कराहती और तड़पती रही. उसे उस समय अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं था.

किसी दूसरे शहर से आए 3 लोगों ने जब प्राची को सड़क पर लहूलुहान देखा तो वह उसे अस्पताल ले जाने की कोशिश करने लगे. लेकिन कोई औटो और टैक्सी वाला तड़प रही प्राची को अपनी गाड़ी में ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ. किसी तरह वे तीनों एक प्राइवेट वाहन से प्राची को जब करीब के अस्पताल ले कर पहुंचे तो वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

यह घटना थाणे के नौपाड़ा पुलिस स्टेशन इलाके में घटी थी. इस बीच किसी ने इस मामले की जानकारी नौपाड़ा के थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव को दे दी थी. थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव बिना देर किए सहायक इंसपेक्टर धुमाल और इंसपेक्टर सोडकर के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. वहां अपने एक अधिकारी को तैनात कर के वह क्रिटिकेयर सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल रवाना हो गए.

थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव ने इस मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों और थाणे पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. अस्पताल पहुंच कर थानाप्रभारी ने डाक्टरों से बात की और प्राची के शव का बारीकी से निरीक्षण किया. प्राची के गले और शरीर पर चाकू के 7-8 गहरे घाव थे.

डाक्टरों ने बताया कि प्राची को अगर समय रहते अस्पताल लाया गया होता तो शायद वह बच सकती थी. प्राची के पास से मिले कालेज के परिचय पत्र से प्राची के घर का पता मिल गया था. पुलिस ने यह जानकारी प्राची के घर वालों को दे दी.

बेटी की हत्या की सूचना मिलते ही पिता विकास जाडे सन्न रह गए, घर में रोनापीटना शुरू हो गया. उन्हें जिस अनहोनी का डर था, आखिर वह हो ही गई. घर वाले जिस हालत में थे, उसी हालत में क्रिटिकेयर अस्पताल की ओर दौड़े.

अस्पताल पहुंचने पर पुलिस ने उन्हें सांत्वना दे कर कुछ पूछताछ की. पर प्राची के परिवार वालों ने थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव को बताया कि उस की हत्या आकाश ने की होगी. क्योंकि आकाश ही एक ऐसा युवक था, जो उन की बेटी को एकतरफा प्यार करता था. आए दिन वह उसे परेशान किया करता था. प्राची के परिवार वालों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दी.

सरेराह घटी घटना से पुलिस भी रह गई हैरान

घटनास्थल का मंजर काफी मार्मिक और डरावना था. उस मंजर को जिस ने भी देखा, उस का कलेजा कांप उठा. घटनास्थल पर खून में सना टूटा हुआ चाकू पड़ा था. वहीं पर मृतका की स्कूटी और आकाश की पल्सर बाइक खड़ी थी. उसी समय थाणे के पुलिस कमिश्नर विवेक फणसलकर, डीसीपी डा. डी.एस. स्वामी, एसीपी अभय सायगांवकर मौकाएवारदात पर आ गए. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी थी.

फोरैंसिक टीम का काम खत्म होने के बाद पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने सरसरी तौर पर घटनास्थल का मुआयना कर थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव को आवश्यक दिशानिर्देश दिए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद थानाप्रभारी ने अपने सहायकों के

साथ घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के घटनास्थल से सबूत एकत्र किए.

मौके की काररवाई निपटाने के बाद थानाप्रभारी थाने लौट आए. वह प्राची के पिता विकास जाडे को भी साथ ले आए थे. उन की तहरीर पर उन्होंने आकाश के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. दिनदहाड़े दिल दहला देने वाली इस वारदात से इलाके के लोगों में दहशत फैल गई थी.

आरोपी आकाश की तलाश के लिए डीसीपी ने 5 पुलिस टीमों का गठन किया. सभी टीमों को अलगअलग जिम्मेदारी सौंपी गई.

आकाश पवार भिवंडी के नारपोली थाने के अंतर्गत आने वाले गांव कल्हार का रहने वाला था. थाना नारपोली के थानाप्रभारी सुरेश जाधव सबइंसपेक्टर संजय गलवे, हैडकांस्टेबल संजय भोसले, सत्यवान मोहिते कोली और नंदीवाल को ले कर संजय के घर गए. लेकिन वह घर से फरार मिला. बाद में टीम ने अपने मुखबिरों की इत्तला पर कुछ ही घंटों में आकाश को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली.

उस के सिर में हलकी सी चोट लगी थी, जिस का उपचार करवा कर पुलिस टीम उसे थाना नौपाड़ा ले आई और उसे थानाप्रभारी चंद्रकांत जाधव को सौंप दिया. आकाश ने बिना किसी दबाव के अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस तफ्तीश और आकाश पवार के बयानों के आधार पर प्राची जाडे हत्याकांड की दिल दहला देने वाली जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी-

वर्षीय आकाश पवार एक साधारण लेकिन भरेपूरे परिवार का युवक था. उस के पिता का नाम कुमार पवार था. वह मुंबई की एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे, जहां उन की अच्छीखासी सैलरी और मानसम्मान था. परिवार में किसी भी चीज की कमी नहीं थी. परिवार की गाड़ी बड़े ही आराम से चल रही थी.

आकाश परिवार में सब से छोटा था. इसलिए परिवार के सभी सदस्य उसे बहुत प्यार करते थे. इसी वजह से वह जिद्दी बन गया था. वह जिस चीज की हठ करता था, उसे ले कर ही मानता था.

आकाश सुंदर और स्मार्ट था. इस के अलावा वह फैशनपरस्त और दिलफेंक था. लेकिन पढ़ाई में उस का मन नहीं लगता था. बीकौम पहले साल में फेल हो जाने की वजह से कालेज प्रशासन ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इस के बाद भी वह अपने आवारा दोस्तों से मिलनेजुलने कालेज परिसर में आताजाता रहता था.

करीब 3 साल पहले 2015 में प्राची जाडे और आकाश पवार तब मिले थे, जब दोनों ने इंटरमीडिएट कक्षा में दाखिला लिया था. आकाश पहली ही नजर में प्राची का दीवाना हो गया था. इस के बाद वह प्राची के करीब जाने की कोशिश करने लगा.

65 वर्षीय विकास जाडे कोपरी पुलिस थाने के पास अपने 6 सदस्यों वाले परिवार के साथ रहते थे. उन की किराने की दुकान थी, जो अच्छीखासी चल रही थी. दुकान की आय से परिवार का आसानी से भरणपोषण हो रहा था. उन की चारों बेटियां परिवार के लिए मिसाल थीं. क्योंकि वे सभी अपने काम से काम रखती थीं.

विकास जाडे के लिए उन की बेटियां ही सब कुछ थीं. इसलिए वह अपनी बेटियों की पढ़ाईलिखाई पर अधिक ध्यान देते थे.

जुनूनी आशिक था आकाश

20 वर्षीय प्राची चारों बेटियों में दूसरे नंबर की थी. वह अपनी तीनों बहनों से कुछ अलग थी. नरमदिल, चंचल स्वभाव और आधुनिक विचारों वाली प्राची किसी से भी बेझिझक बातें कर लिया करती थी. उस की मीठीमीठी बातें सब के दिल को छू लेती थीं.

प्राची जितनी पढ़ाईलिखाई में होशियार थी, उतनी ही खेलकूद में निपुण थी. लंबी दौड़, ऊंची कूद में उसे बहुत रुचि थी. इस के अलावा वह स्कूल और कालेज के हर प्रोग्राम में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. वह चाहती थी कि अगर उस की मौत हो जाए तो उस की आंखें दान दे दी जाएं. ताकि उस के न रहने पर उस की आंखों से कोई और यह संसार देखे. और ऐसा ही हुआ. उस की आंखें बेकार नहीं गईं. उस के मातापिता ने आंखें नेत्र बैंक को दान कर दीं.

चूंकि आकाश प्राची के कालेज का साथी था, इसलिए उस की आकाश से दोस्ती हो गई. लेकिन वह दोस्ती सिर्फ औपचारिकता भर थी. प्राची आकाश को सिर्फ अपना दोस्त मानती थी और उस के साथ हंसतीबोलती व घूमतीफिरती थी. लेकिन आकाश पवार ने उस की दोस्ती का अलग ही मतलब निकाल लिया था.

प्राची जब भी आकाश के सामने आती तो आकाश के दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं. प्राची का सुंदर मन रंग और रूप उस की आंखों में समा जाता था. और तो और वह प्राची को ले कर अपने जीवन के रंगीन सपनों में खो जाता था.

प्राची और आकाश की दोस्ती

प्राची और आकाश की दोस्ती को धीरेधीरे 5 साल से अधिक का समय हो गया था. जब आकाश आवारा लड़कों के साथ घूमनेफिरने लगा तो प्राची ने उस से दूरी बना ली. इसी बीच आकाश बीकौम फर्स्ट ईयर में फेल हो गया तो प्राची ने आकाश से अपनी दोस्ती पूरी तरह खत्म कर ली. खुद को व्यस्त रखने के लिए उस ने एक प्राइवेट फर्म में नौकरी कर ली थी.

प्राची के इस रवैए से आकाश को गहरा धक्का लगा. वह उसे प्यार करता था. अपनी जिंदगी से उसे ऐसे जाने नहीं देना चाहता था. प्राची का पीछा कर के वह उस से बात करने की कोशिश करता था. बात न करने पर वह प्राची को तरहतरह की धमकियां देता था.

हद तो तब हो गई जब 11 जून, 2018 कालेज परिसर में उस ने प्राची को अपने एक क्लासमेट के साथ बातें करते देख लिया. आकाश को यह अच्छा नहीं लगा. वह वहीं पर प्राची पर भड़कते हुए बोला, ‘‘देख प्राची, अगर तूने मुझ से दोस्ती तोड़ी तो बहुत बुरा नतीजा होगा. तू मेरी है और मेरी ही रहेगी. मैं तुझे किसी और की नहीं होने दूंगा. खत्म कर दूंगा तुझे.’’

आकाश पवार की इस धमकी से प्राची बुरी तरह डर गई थी. धमकी वाली बात प्राची ने अपने परिवार वालों को बताई तो प्राची के पिता विकास जाडे ने उसी दिन कापूरवाड़ी पुलिस थाने में आकाश पवार के खिलाफ शिकायत कर दी. लेकिन पुलिस ने उस पर कोई कड़ी काररवाई नहीं की. इस की जगह पुलिस ने आकाश पवार से माफीनामा लिखवा कर उसे छोड़ दिया.

प्राची जाडे और उस के परिवार वालों के इस कदम से आकाश पवार की हिम्मत और बढ़ गई. उस ने एकदो बार प्राची से मिलने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ. इस से उस का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और उस ने प्राची के प्रति एक क्रूर फैसला ले लिया. बाजार जा कर वह एक लंबे फल का चाकू खरीद लाया.

घटना के दिन आकाश पवार ने प्राची का पीछा कर रास्ता रोक लिया और वादविवाद के बाद जेब में छिपा कर लाए चाकू से प्राची पर हमला कर उस की हत्या कर दी. पुलिस जांच और आकाश पवार के बयान से पता चला कि मामला एकतरफा प्यार का था.

आकाश पवार की गिरफ्तारी के बाद सड़कों पर कई सामाजिक संस्थाएं उतर गईं. उन्होंने प्राची जाडे की हत्या पर शोकसभा कर के कैंडल मार्च निकाला.

तीर्थयात्राएं : यहां जान की कीमत कुछ भी नहीं

सवाल मोक्ष का हो तो अंधविश्वासी जान तक देने से नहीं चूकते. पर परदे के पीछे से इस खूनी खेल को रचने वालों के चेहरे आखिर क्यों नहीं बेनकाब होते, क्या जानना नहीं चाहेंगे.

दिल्ली के बुराड़ी इलाके के भाटिया परिवार के 11 लोगों की सामूहिक आत्महत्या की चर्चा दुनिया भर में रही, जिस में मृतकों के दिमागी दिवालिएपन व धार्मिक उन्माद की बात कम और मोक्ष पर चर्चा ज्यादा रही थी. किसी बुद्धिजीवी या चिंतक दार्शनिक ने इस बुजदिली भरे हादसे का जिम्मेदार धर्म को बताने की हिम्मत नहीं की.

अगर भाटिया परिवार का मकसद मोक्ष था तो इस साल भी अमरनाथ यात्रा पर गए लाखों तीर्थयात्रियों का मकसद भी मोक्ष और दूसरे पुण्य कमाना ही है. इत्तफाक की बात यह है कि इसी तारीख तक अमरनाथ यात्रा में मारे गए श्रद्धालुओं की संख्या भी 11 ही थी. फर्क इतना भर था कि वे 11 लोग एक ही परिवार के न हो कर देश के अलगअलग राज्यों और जातियों के थे.

आंध्र प्रदेश के फायवलम की 75 वर्षीय थोटा राधनम की मृत्यु 3 जुलाई को तड़के हार्ट अटैक से हुई. मौत के वक्त वे एक लंगर की रसोई में थीं. आंध्र प्रदेश के ही अनंतपुर के रहने वाले

65 वर्षीय राधाकृष्ण शास्त्री की मौत अमरनाथ गुफा के नजदीक संगम नाम की जगह पर हुई. उन्हें भी दिल का दौरा पड़ा था. उत्तराखंड के निवासी पुष्कर जोशी बरारी मार्ग और रेलपथरी के बीच पहाड़ से पत्थरों के गिरने के कारण घायल हो गए थे. उन्होंने इलाज के दौरान बालटाल आधार शिविर अस्पताल में दम तोड़ दिया था.

2 और 3 जुलाई के दरम्यान एक पालकी ढोने वाले की भी मौत हुई थी और एक धार्मिक समिति का कार्यकर्ता भी मारा गया था. बीएसएफ का एक अधिकारी भी खराब मौसम की मार बरदाश्त नहीं कर पाया था. बाकी 5 लोगों की शिनाख्त नहीं हो पाई थी.

मोक्ष और मौत

इन लोगों की अकाल मौतों पर कोई बवाल नहीं मचा, उलटे दबी जबान में यह कहा गया कि ये तो बड़े खुशनसीब थे जो अमरनाथ में बाबा बर्फानी के दरबार यानी इलाके में मरे. ये मरे नहीं हैं, बल्कि शंकर ने इन्हें मोक्ष दे दिया है.

दिल्ली के भाटिया परिवार को अगर मोक्ष का यह मार्ग मालूम होता या उस का ध्यान इस तरफ जाता तो तय है वह सामूहिक आत्महत्या नहीं करता, बल्कि लाखों दूसरे लोगों की तरह अमरनाथ जैसी पवित्र पर जानलेवा यात्रा में जाने का जुआ खेलना पसंद करता. अगर मौसम की मार, हार्टअटैक या दूसरी किसी वजह से मरते तो भी मोक्ष मिलता और बाबा बर्फानी अर्थात बर्फ के बने शिवलिंग के दर्शन हो जाते तो भी मोक्ष मिल जाता.

ये दोनों ही हादसे सीधे धर्म से जुड़े हुए हैं. अमरनाथ यात्रा के दौरान जो तीर्थयात्री मारे गए वे कोई समाजसेवा करने नहीं गए थे, बल्कि उन का मकसद भी मोक्ष था जो मर कर मिला या नहीं यह तो भगवान अगर कहीं हो तो वही जाने.

व्यावहारिक और सीधी तार्किक बात तो यह है कि इन तीर्थयात्रियों ने भाटिया परिवार सरीखी बेवकूफी दूसरे तरीके से की थी. इसलिए मौत भी दूसरे तरीके से आई. ऐसे में मोक्ष और मौत में फर्क कर पाना मुश्किल काम है कि मरने से मोक्ष मिलता है या मोक्ष के मिलने से मौत होती है.

खतरनाक होती तीर्थयात्राएं

धर्म के धंधेबाज और ठेकेदार पंडेपुजारी गलत नहीं कहते कि भगवान यों ही नहीं मिल जाता और जीतेजी तो बगैर तगड़ी दानदक्षिणा दिए बिना मिल ही नहीं सकता, इसलिए भक्त और श्रद्धालु चारों दिशाओं में तीर्थयात्राएं करते हैं इस उम्मीद के साथ कि कहीं तो पाप कटेंगे, परलोक सुधरेगा और मोक्ष मिलेगा.

बात यह भी सच है कि मोक्ष मरने वालों को ही मिलता है और अगर मरने पर मोक्ष की गारंटी कोई ले तो अब भक्तगण बेवक्त मरने को भी तैयार रहने लगे हैं.

अमरनाथ की यात्रा के जोखिम किसी सुबूत के मुहताज नहीं हैं जहां जम्मू के बाद कदमकदम पर मौत भोले के भक्तों के सिर पर मंडरा रही होती है. भूस्खलन, तेज मूसलाधार बारिश, बादलों का फटना इस यात्रा के आम खतरे हैं. दूसरा बड़ा खतरा आतंकी हमलों का भी बना रहता है.

ये उकसाते हैं

हर शहर में अमरनाथ यात्रा पर ले जाने वाले ट्रैवल एजेंट खुल गए हैं जिन के फ्लैक्स, बैनर सभी मंदिरों में लटके रहते हैं. कहींकहीं तो बस या रेल टिकट मुफ्त होता है, चढ़ावे के बदले.

इसीलिए बर्फानी बाबा के दर्शनों के नाम पर देशभर से जत्थे बना कर लोग अमरनाथ की यात्रा पर निकल पड़ते हैं. जम्मू के बाद पहलगाम और बालटाल 2 रास्तों से अमरनाथ की गुफा तक पहुंचा जा सकता है. इन में से बालटाल वाला रास्ता लंबा और खतरे वाला है और हैरत की बात यह है कि ज्यादातर भक्त इसी जानलेवा रास्ते से जाना पसंद करते हैं.

भाटिया परिवार को किसी तांत्रिक ने उकसाया था तो देशभर के तीर्थयात्रियों को दुर्गम और सुगम तीर्थस्थलों पर जा कर मोक्षप्राप्त के लिए उकसाने वाले पंडेपुजारियों की भी कमी नहीं. ये पंडेपुजारी बताते रहते हैं कि इस पापी जीवन को सुधारने के लिए तीर्थयात्रा ही कारगर रास्ता है. जिस ने तीर्थयात्रा नहीं की उस का जन्म व्यर्थ और जिंदगी जानवरों सरीखी है.

तीर्थस्थलों के महत्त्व का बखान इस तरह से किया जाता है कि भक्त वहां जाने के लिए छटपटाने लगते हैं और पैसों की जुगाड़ कर या गाढ़ी कमाई की जमापूंजी खर्च कर निकल पड़ते हैं किसी तीर्थस्थल पर. जिन के पास पैसा नहीं होता उन्हें ये पंडे बनियों के जरीए फाइनैंस करवा देते हैं. इस का ब्याज कितना तगड़ा है यह भक्तिभाव में डूबा कोई भक्त नहीं देखता. वह तो इतना भर समझता है कि अब तीर्थस्थल से बुलावा आ गया है, इसलिए बिना सोचेसमझे निकल पड़ना है.

धर्मप्रधान हमारे देश में आस्था को चुनौती देना या उस के खतरे गिनाना किसी संगीन गुनाह से कमतर बात नहीं होती, क्योंकि इस से धर्म की दुकानदारी मंदी पड़ती है. 11 लोग 4 जुलाई तक मर गए थे यह कोई अफसोस की नहीं, बल्कि कारोबारी तौर पर एक ब्रैंडिंग जैसी बात थी कि ऊपर वाले ने इन्हें इस तरह बुला लिया. ये मरे नहीं है, बल्कि मोक्ष को प्राप्त हो गए हैं.

परेशानियां भी कम नहीं

अमरनाथ गए श्रद्धालुओं के पास अच्छे अनुभव नहीं होते हैं. इस साल मौसम की मार के चलते यह यात्रा कई बार स्थगित हुई और तीर्थयात्री दुर्गम पहाडि़यों पर पड़ेपड़े भोलेभोले जपते रहे. ज्यादातर भयभीत लोगों ने बर्फानी बाबा से बचने की गुहार लगाई और जब मौसम साफ हो जाने पर यात्रा फिर शुरू हो गई तो मान लिया गया कि बाबा उन्हें दर्शन देना चाहते हैं.

यह तो कोई सोचने से रहा कि यह कैसी भक्ति वाली बात है कि पहले तो दुर्गम तीर्थयात्रा के नाम पर खुद अपनी मरजी से जान जोखिम में डालो और फिर भोलेभोले भजो. उस में अगर कोई दम होता तो वह एक झटके में मौसम क्यों ठीक नहीं कर देता? 11 मौतें चमत्कार की बात नहीं थीं. चमत्कार की बात होती इन का मर कर जिंदा हो जाना, क्योंकि ये अमरनाथ के इलाके में थे जहां मौत को इन तक पहुंचने से पहले शंकर से टकराना चाहिए था.

मगर ऐसा हकीकत में नहीं होता. धार्मिक फिल्मों में ही होता है कि मूर्ति की आंख, सिर या हाथ से रोशनी निकलती है और मरणासन्न व्यक्ति भी जिंदा हो कर भजनकीर्तन में शामिल हो जाता है.

लूट लंगर वालों की

अमरनाथ जाने का भक्तों का एक बड़ा लालच वहां के लंगर भी रहते हैं, जिन के बारे में कहा जाता है कि इन लंगरों का खाना जायकेदार और गुणवत्ता वाला होता है. इन लंगरों के बारे में प्रचार यह भी किया जा चुका है कि इन में हर क्षेत्र के व्यंजन परोसे जाते हैं और श्रद्धालु जीभर कर इन्हें मुफ्त में खा सकते हैं.

मगर हकीकत कुछ और है. इस साल भी लंगरों की दुकान खूब चली. कैसे चली इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि ये लंगर वाले देशभर से आ कर इन दुर्गभ रास्तों पर लंगर आयोजित करते हैं. इन के पास तमाम सामान दानदक्षिणा का होता है जो इन की समिति ने अपने इलाके से बटोरा होता है. आटा, दालचावल से ले कर काजूकिशमिश तक ये लोग अमरनाथ यात्रा के नाम पर दान में लेते हैं और लोग पुण्य कमाने की गरज से देते भी हैं.

ये समिति वाले नक्दी भी अच्छी एकत्रित कर लेते हैं और फिर पहाड़ी पर जगहजगह अस्थाई ढाबे खोल कर बैठ जाते हैं. लोग नाम को ही मुफ्त का खाते हैं. वजह हर लंगर में शंकर की बड़ी तसवीर के पास एक दानपात्र रखा होता है, जिस में लगभग हर तीर्थयात्री पैसा चढ़ाता है.

धंधा चोखा है. न कोई मेन्यू, न कोई और्डर या बिल और न ही कोई जीएसटी. बस खाओ और अपनी मरजी से भुगतान करो जो अकसर खाए हुए खाने से ज्यादा ही होता है. लंगरों में समिति वाले यह एहसान जताने से नहीं चूकते कि देखो तुम भक्तों की सहूलत के लिए कहांकहां से आ कर हम यहां सेवा कर रहे हैं यानी तीर्थयात्रियों को उन का फर्ज याद दिलाते हुए उकसाया जाता है कि बढि़या खा तो लिया अब पेमैंट भी कर दो. इसलिए तीर्थयात्री अपनी हैसियत से बढ़ कर दान देते हैं. दान का यह लाखों रुपया समितियां बटोर ले जाती हैं.

इस साल इन लंगरों ने तो हद ही कर दी. जैसे ही मौसम बिगड़ा और राशन की सप्लाई कम हो गई तो ये लोग खुले तौर पर तीर्थयात्रियों से पैसे बटोरते नजर आए.

पंजाब के बरनाला से अमरनाथ की यात्रा पर गए युवा गौरव शर्मा, रोहित कुमार, विनीत कुमार, हरीश, राजेश और टिक्कू जैसे हजारों तीर्थयात्रियों ने अपने परिवार वालों और मीडिया को फोन पर बताया कि 4 दिन से यात्रा बंद है. जिस लंगर में वे ठहरे हैं वहां राशनपानी खत्म हो गया है और मौसम मेहरबान नहीं हुआ तो भूखों मरने तक की नौबत आ सकती है.

एक तरह से इस तीर्थयात्रा की परेशानियों का पिटारा इन युवाओं ने यह कहते भी खोल दिया था कि टैंट वाले अब ठहरने के क्व600 प्रतिदिन वसूल रहे हैं और क्व20 वाली पानी की बौतल क्व60 में बेची जा रही है.

इस खुलासे पर कोई प्रतिक्रिया किसी ने नहीं दी और न ही किसी ने इस प्रचलित बात पर एतराज जताया था कि अमरनाथ के लंगरों में सब कुछ फ्री मिलता है. लंगरों का कारोबारी चेहरा ही पंजाब के इन युवाओं के दर्द से उजागर हुआ था कि दरअसल खानेपीने का सामान बिकता भी है. मौसम साफ हो और यात्रा बिना बाधा चल रही है तो पैसा देना अपनी इच्छा की बात होती है और मौसम बिगड़ जाए तो दान में इकट्ठा की गई रसद बेच कर भी मालभत्ता बनाया जाता है.

फिर किस काम की ऐसी तीर्थयात्रा, जिस में तबीयत से पैसा भी खर्च हो और तरहतरह की परेशानियां भी उठानी पड़ें. लोग जब पर्यटन स्थलों के होटलों में जा कर ठहरते हैं तो उन्हें साफसुथरे कमरे चाहिए होते हैं. खानेपीने की तमाम सेवाएं चाहिए और खतरा तो वे बिलकुल नहीं उठाते. उन्हें यह एहसास रहता है कि वे पैसे दे रहे हैं और एवज में वह सब उन्हें मिलना चाहिए जो जरूरी है.

अमरनाथ या दूसरी तीर्थयात्राओं में इन की सारी हेकड़ी निकल जाती है, क्योंकि तीर्थयात्रा का मकसद घूमनाफिरना या मौजमस्ती करना नहीं, बल्कि मोक्ष की कामना रहती है, जिस के लिए वे पैसे दे कर भी खतरे वाली जगह टूटी खाट पर सोते हैं और लंगर वाले जो परोस दें स्कूली बच्चों की तरह खा लेते हैं.

इधर जब तक वे सकुशल वापस न आ जाएं तब तक परिवार वाले के गले के नीचे खाना नहीं उतरता. जो लोग समितियों वालों, धार्मिक, राजनीतिक हस्तियों के हाथों फूलमालाएं पहन जयजयकारों के बीच बिदा होते हैं उन का अमरनाथ से सकुशल लौैट आना वाकई एक उपलब्धि वाली बात रहती है.

यात्रा चूंकि तीर्थयात्रा होती है, इसलिए वापस आ कर ये लोग मारे झेंप के अपनी परेशानियां नहीं बताते उलटे जम्मूकश्मीर के सौंदर्य का जिक्र करते हैं और फिर बर्फानी बाबा की जय बोल कर जान बच जाने का शुक्र मन ही मन अदा करते हैं.

3 साल पहले भोपाल के एक कैमिस्ट अनिल ललवानी अपने दोस्तों के साथ जोशजोश में अमरनाथ यात्रा पर चले गए थे. जम्मू के बाद जो नजारा उन्होंने देखा तो उन्हें अपनी बीवीबच्चों की याद सताने लगी कि अगर खुदा न खास्ता कुछ हो गया तो उन का क्या होगा. अनिल बताते हैं कि अगर उन्हें कुछ हो जाता तो भोले भंडारी दुकान नहीं चलाते और न ही पत्नी और बच्चों के भरणपोषण के लिए अवतार लेते.

महंगी होती तीर्थयात्राएं

सोचना बेमानी है कि अमरनाथ यात्रा या दूसरी कोई तीर्थयात्रा पहले की तरह सस्ते में निबट जाती है. अब ज्यादातर लोग एसी कोच का महंगा सफर करते हैं और महंगे होटलों में ठहरते हैं, क्योंकि उन्हें आराम और सुखसुविधाएं चाहिए. अमरनाथ यात्रा में वे नहीं मिलतीं पर इलाहाबाद, हरिद्वार, पुष्कर और गया जैसे दर्जनों तीर्थस्थलों में मिल जाती हैं. मगर यहां उन का पैसा लूटने के लिए कदमकदम पर पंडे बैठे रहते हैं जो टीका लगाने से ले कर नाव में घुमाने तक की तगड़ी दक्षिणा प्यार से न मिले तो लड़झगड़ कर वसूल लेते हैं.

तमाम धार्मिक शहरों के मंदिर वगैरह गंदगी और बदबू से पटे पड़े होते हैं जहां मोक्ष तो नहीं पर यह ज्ञान जरूर मिल जाता है कि बड़ी लूट है.

स्थानीय लोग और पुलिस वाले भी पंडेपुजारियों के हमजोली होते हैं, इसलिए इन तीर्थयात्रियों की सुनवाई कहीं नहीं होती उलटे मूर्ति दर्शन से ले कर घूमनेफिरने तक में इन्हें सुरक्षाकर्मियों की झिड़कियां और गालियां सुननी पड़ती हैं. सवाल आखिर पुण्य और मोक्ष का जो ठहरा.

अमरनाथ जैसी यात्राओं पर सरकार भी अरबों रुपए खर्च करती है. सेना के जवानों की ड्यूटी लगाई जाती है जो देशसेवा की जगह धर्मसेवा करने को मजबूर हैं. तीर्थयात्रियों की हिफाजत के नाम पर भारीभरकम रकम फूंकी जाती है जो कोई भगवान नहीं देता, बल्कि आम लोगों के टैक्स की होती है.

हर साल कई मंदिरों में भगदड़ मचने से हजारों लोग कुचल कर मारे जाते हैं. इस पर सभी खामोश रहते हैं. खासतौर से कोई मीडिया वाला धर्म की दुकानदारी के बारे में नहीं बोलता. आखिर उन की भी दुकान धर्म से ही चलती है. टीआरपी और रीडरशिप धर्म की पोल और षड्यंत्र खोलने से नहीं, बल्कि इन का महिमामंडन करने से बढ़ती है, इसलिए अपनी जिम्मेदारी से हर कोई भागता नजर आता है.

भाटिया परिवार की सामूहिक आत्महत्या पर किसी ने मोक्ष की मूर्खता पर सवालिया निशान नहीं उठाए, लेकिन अफसोस तब हुआ जब हर कोई मोक्ष की ब्रैंडिंग करता नजर आया. किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि मोक्ष के लिए मरने पर धर्म जिम्मेदार है. हर किसी ने यही कहा कि मोक्ष के लिए आत्महत्याएं की गईं.

यही प्रोत्साहन अमरनाथ तीर्थयात्रियों को यह कहते दिया गया कि खराब मौसम और खतरों के चलते भी उन की आस्था डगमगा नहीं रही है. सवाल तो यह उठना चाहिए था कि जानबूझ कर मौत के मुंह में जाना कौन सा बुद्धिमानी का काम है और वह भी इतने बड़े पैमाने पर कि दर्जनों लोग मर जाएं और हजारों नर्क से भी बदतर तकलीफें उठाएं.

यात्रा का कोई वजूद नहीं

प्रसंगवश मध्य प्रदेश के मंदसौर में एक बच्ची से हुए जघन्य बलात्कार का जिक्र भी जरूरी है, जिस पर लोगों ने बढ़ती अश्लीलता, इंटरनैट और मोबाइल फोन को जिम्मेदार ठहराया पर भाटिया परिवार या अमरनाथ यात्रा के लिए धर्म को जिम्मेदार ठहराने का सच कोई नहीं बोल पाया.

धर्म का जनून लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है तो इस की वजहें किसी से छिपी नहीं कि यह हिन्दुत्व को मजबूत करने का प्रोपेगंडा है, जिस का दूसरा फायदा लोगों की अपनी दीगर परेशानियों पर खामोश रहने का होता है. अब तो युवा और महिलाएं भी इफरात से तीर्थयात्राओं में बढ़चढ़ कर जाने लगे हैं. मोक्ष की आदिम ख्वाहिश उन्हें अच्छेबुरे की तमीज नहीं सिखा पाती तो अकेले भाटिया परिवार या अमरनाथ यात्रियों की मौतों पर चर्चा ही बेकार है.

जो हुआ वह ऊपर वाले की मरजी थी पर नीचे वालों की कमअक्ली पर जाने कब कोई सार्थक चर्चा या बहस होगी. जब पूरी मशीनरी और सरकार ही पंडेपुजारियों की दुकान और कारोबार बढ़ाने में लगी हो तब लोग मरेंगे ही.

तमाम राज्य सरकारें भी करोड़ों रुपए मुफ्त में तीर्थयात्राओं पर फूंक रही हैं, तो कहा जा सकता है कि महंगाई तो बढ़ेगी ही, क्योंकि टैक्स का पैसा धार्मिक कार्यों पर फूंका जा रहा है. यही तीर्थयात्रा का असली महत्त्व है. हालफिलहाल तो शुक्र इस बात का है कि अमरनाथ जैसी जानलेवा तीर्थयात्रा में मारे गए लोगों को सरकार धर्म शहीद का दर्जा नहीं दे रही है.

नीड़ का निर्माण फिर से (भाग-2) : मानसी ने क्यों तलाक लेने की ठानी

पूर्व कथा

मानसी की जिंदगी में राज आया था जो अचानक उसे छोड़ चला गया था. ऐसे में मनोहर ने उसे सहारा दिया और दोनों का प्रेमविवाह हो गया. लेकिन मनोहर की शराब पीने की लत से मानसी परेशान थी. ऊपर से सास भी नाखुश रहती थी. ऐसे में मानसी के कहने पर मनोहर ने अलग घर ले लिया जहां मानसी ने अपनी बेटी चांदनी को जन्म दिया. मनोहर को व्यापार में घाटा शुरू हो गया और वे वापस सासससुर के पास आ गए. मानसी की तनख्वाह के पैसे शराब में उड़ा देना, उसे मारना, मनोहर की ये सब आदतें नहीं बदलीं. एक दिन राज का फोन मानसी को आता है. उस से मिल कर सारी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं. अपने प्यार की दुहाई देते हुए राज उसे वापस लौट आने को कहता है. आफिस में मानसी की सहेली अचला उसे ऐसा न करने को कहती हैं. लेकिन मानसी तलाक लेने की ठान लेती हैं. उस के मातापिता, ससुर सब समझाते हैं और आखिर में मनोहर की मरजी पूछी जाती है तो वह रो उठता है.

अब आगे…

‘मैं क्या हमेशा से ऐसा रहा,’ मनोहर बोला, ‘मैं मानसी से बेहद प्यार करता हूं. अपनी बेटी चांदनी को एक दिन न देखूं तो मेरा दिल बेचैन हो उठता है.’

‘जब ऐसी बात है तो उसे दुख क्यों देता है,’ मानसी की मां बोलीं.

‘मम्मी, मैं ने कई बार कोशिश की पर चाह कर भी अपनी इस लत को छोड़ नहीं पाया.’

मनोहर के इस कथन पर सब सोच में पड़ गए कि कहीं न कहीं मनोहर के भीतर भी अपराधबोध था. यह जान कर सब को अच्छा लगा. मनोहर को अपने परिवार से लगाव था. यही एक रोशनी थी जिस से मनोहर को पुन: नया जीवन मिल सकता था.

मानसी की मां उसे एकांत में ले जा कर बोलीं, ‘बेटी, मनोहर उतना बुरा नहीं है जितना तुम सोचती हो. आज उस की जो हालत है सब नशे की वजह से है. नशा अच्छेअच्छे के विवेक को नष्ट कर देता है. मैं तो कहना चाहूंगी कि तुम एक बार फिर कोशिश कर के देखो. उस की जितनी उपेक्षा करोगी वह उतना ही उग्र होगा. बेहतर यही होगा कि तुम उसे स्नेह दो. हो सके तो मां जैसा अपनत्व दो. एक स्त्री में ही सारे गुण होते हैं. पत्नी को कभीकभी पति के लिए मां भी बनना पड़ता है.’

मानसी पर मां की बातों का प्रभाव पड़ा. इस बीच उस की सास ने कुछ तेवर दिखाने चाहे तो मनोहर ने रोक दिया, ‘आप हमारे बीच में मत बोलिए.’

‘क्या तुम शराब पीना छोड़ोगे?’ अपने पिता के यह पूछने पर मनोहर ने सिर झुका लिया.

‘तुम्हारे गुरदे में सूजन है. तुम्हें इलाज की सख्त जरूरत है. मैं तुम्हें दिल्ली किसी अच्छे डाक्टर को दिखाऊं तो तुम मेरा सहयोग करोगे?’ वह आगे बोले.

मनोहर मानसी की तरफ याचना भरी नजरों से देख कर बोला, ‘बशर्ते मानसी भी मेरे साथ दिल्ली चलेगी.’

‘मेरे काम का हर्ज होगा,’ मानसी बोली.

‘देख लिया पापा. इसे अपने काम के अलावा कुछ सूझता ही नहीं,’ मनोहर अपने ससुर की तरफ मुखातिब हो कर कुछ नाराज स्वर में बोला.

‘बेटी, उसे तुम्हारा सान्निध्य चाहिए. तुम पास रहोगी तो उसे बल मिलेगा,’ मानसी के पिता बोले.

मानसी 10 दिन दिल्ली रह कर आई तो मनोहर काफी रिलेक्स लग रहा था. उस ने शराब पीनी छोड़ दी थी. ऐसा मानसी का मानना था लेकिन हकीकत कुछ और थी. मनोहर अब चोरी से नशा करता था.

एक रोज किसी बात पर दोनों में तकरार हो गई. पतिपत्नी की रिश्ते के लिहाज से ऐसी तकरार कोई माने नहीं रखती. मानसी के सासससुर दिल्ली गए थे. मनोहर को बहाना मिला. वह बाहर निकला तो देर रात तक आया नहीं. उस रात मानसी बेहद घबराई हुई थी. ‘अचला, मनोहर अभी तक घर नहीं आया. वह शाम से निकला है,’ वह फोन पर सुबकने लगी.

‘अकेली हो?’ अचला ने पूछा.

‘हां, घबराहट के मारे मेरी जान सूख रही है. उसे कुछ हो गया तो?’

अचला ने अपने पति को जगा कर सारा वाकया सुनाया तो वह कपड़े पहन कर मनोहर की तलाश में बाहर निकला. 10 मिनट बाद मानसी का फिर फोन आया, ‘अचला, मनोहर घर के बाहर गिरा पड़ा है. मुझे लगता है कि वह नशे में धुत्त है. अपने पति से कहो कि वह आ कर किसी तरह उसे अंदर कर दें.’

अगली सुबह मानसी आफिस आई तो वह अंदर से काफी टूटी हुई थी. मनोहर ने उस के विश्वास के साथ छल किया था जिस का उसे सपने में भी भान न था. कुछ कहने से पहले ही मानसी की आंखें डबडबा गईं. ‘बोल, अब मैं क्या करूं. सब कर के देख लिया. 5 साल कम नहीं होते. ठेकेदारी के चलते मेरे सारे गहने बिक गए. जिस पर मैं ने उसे अपनी तनख्वाह से मोटरसाइकिल खरीद कर दी कि कोई कामधाम करेगा…’

अचला विचारप्रक्रिया में डूब गई, ‘तुम्हें परिस्थिति से समझौता कर लेना चाहिए.’

अचला की इस सलाह पर मानसी बिफर पड़ी, ‘यानी वह रोज घर बेच कर पीता रहे और मैं सहती रहूं. क्यों? क्योंकि एक स्त्री से ही समझौते की अपेक्षा समाज करता है. सारे सवाल उसी के सामने क्यों खड़े किए जाते हैं?’

‘क्योंकि स्त्री की स्थिति दांतों के बीच फंसी जीभ की तरह होती है.’

‘पुरुष की नहीं जो स्त्री के गर्भ से निकलता है. स्त्री चाहे तो उसे गर्भ में ही खत्म कर सकती है,’ मानसी की त्योरियां चढ़ गईं.

‘हम ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि कोई भी स्त्री अपनी कृति नष्ट नहीं कर सकती.’

‘यही तो कमजोरी है हमारी जिस का नाजायज फायदा पुरुष उठाता रहा.’

‘तलाक ले कर तुझे मिलेगा क्या?’

‘एक स्वस्थ माहौल जिस की मैं ने कामना की थी. अपनी बेटी को स्वस्थ माहौल दूंगी. उसे पढ़ाऊंगी, स्वावलंबी बनाऊंगी,’ मानसी के चेहरे से आत्म- विश्वास साफ झलक रहा था.

‘कल वह भी किसी पुरुष का दामन थामेगी?’ अचला ने सवालिया निगाह से देखा.

‘पर वह मेरी तरह कमजोर नहीं होगी. वह झूठे आदर्श, प्रथा, परंपरा ढोएगी नहीं, बल्कि उस का आत्मसम्मान सर्वोपरि होगा.’

‘मानसी, तू जवान है, खूबसूरत है, कैसे बच पाएगी पुरुषों की कामुक नजरों से? भूखे भेडि़यों की तरह सब मौका तलाशेंगे.’

‘ऐसा कुछ नहीं होगा. अगर हम अंदर से अविचलित रहें तो मजाल है जो कोई हमारी तरफ नजर उठा कर भी देखे,’ मानसी के दृढ़निश्चय के आगे अचला निरुत्तर थी.

अदालत में मानसी ने जब तलाक की अरजी दी तो एक पल के लिए सभी स्तब्ध रह गए. किसी को भरोसा नहीं था कि मानसी इतने बड़े फैसले को साकार रूप देगी. उधर जब मनोहर को तलाक का नोटिस मिला तो वह भी सकते में आ गया.

‘आखिर उस ने अपनी जात दिखा ही दी. मैं तो पहले ही इस शादी के खिलाफ थी. जिस लड़की का माथा चौड़ा हो उस के पैर अच्छे नहीं होते,’ मनोहर की मां मुंह बना कर बोलीं.

‘तुम्हारे बेटे ने कौन सा अपनी जात का मान रखा,’ मनोहर के पिता उसी लहजे में बोले.

‘तुम तो उसी कुलकलंकिनी का पक्ष लोगे,’ वह तत्काल असलियत पर आ गई, ‘अच्छा है, इसी बहाने चली जाए. बेटे की शादी धूमधाम से करूंगी. मेरा बेटा उस के साथ कभी भी सुखी नहीं रहा,’ टसुए बहाते मनोहर की मां बोलीं.

‘इस गफलत में मत रहना कि तुम्हारा बेटा पुरुष है इसलिए उस के हर गुनाह को लोग माफ कर देंगे. मानसी पर उंगली उठेगी तो मनोहर भी अछूता नहीं रहेगा,’ मनोहर के पिता बोले.

‘मैं यह सब नहीं मानती. बेटा खरा सोना होता है. लड़की वाले दरवाजा खटखटाएंगे,’ मनोहर की मां ऐंठ कर बोलीं.

‘शादी तो बाद में होगी पहले इस नोटिस का क्या करें,’ मनोहर की ओर मुखातिब होते हुए उस के पिता बोले.

मनोहर किंकर्तव्यविमूढ़ बना रहा.

‘यह क्या बोलेगा?’ मनोहर की मां तैश में बोलीं.

‘तुम चुप रहो,’ मनोहर के पिता ने डांटा, ‘यह मनोहर और मानसी के बीच का मामला है.’

मनोहर बिना कुछ बोले ऊपर कमरे में चला गया. कदाचित वह भी इस अनपेक्षित स्थिति के लिए तैयार न था. रहरह कर उस के सामने कभी मानसी तो कभी चांदनी का चेहरा तैर जाता. उसे मानसी खुदगर्ज और घमंडी लगी. जिसे अपनी कमाई पर गुमान था. जब मानसी अलग रहने के लिए जाने लगी थी तो मनोहर और उस के पिता ने उसे काफी समझाया था. परिवार की मानमर्यादा का वास्ता दिया पर वह टस से मस न हुई.

10 रोज बाद मनोहर मानसी के घर आया.

‘मानसी, मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं. घर चलो. लोग तरहतरह की बातें करते हैं.’

मनोहर के कथन को नजरअंदाज करते हुए मानसी की त्योरियां चढ़ गईं, ‘तुम यहां भी आ गए. मैं अब उस घर में कभी नहीं जाऊंगी.’

‘मैं शराब को हाथ तक नहीं लगाऊंगा.’

‘तुम ने आज भी पी है.’

‘क्या करूं, तुम सब के बगैर जी नहीं लगता,’ उस का स्वर भीग गया.

‘मैं हर तरह से देख चुकी हूं. अब कोई गुंजाइश नहीं,’ मानसी ने नफरत से मुंह दूसरी तरफ फेर लिया.

‘तो ठीक है, देखता हूं कैसे लेती हो तलाक,’ मनोहर पैर पटकते हुए चला गया.

कोर्ट के कई चक्कर काटने के बाद जिस दिन मानसी को फैसला मिलने वाला था उस रोज दोनों ही पक्ष के लोग थे. मनोहर व उस के मांबाप. इधर मानसी के मम्मीपापा. मनोहर की मां को छोड़ कर सभी के चेहरे लटके हुए थे. जज ने कहा, ‘अभी भी मौका है, आप अपने फैसले पर फिर से विचार कर सकती हैं.’

मानसी ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘सर, यह क्या बोलेगी. औरत पर हाथ उठाने वाला आदमी पति के नाम पर कलंक है. बेहतर होगा आप अपना फैसला सुनाएं,’ मानसी का वकील बोला.

‘आप थोड़ी देर शांत हो जाइए. मुझे इन के मुख से सुनना है,’ जज ने हाथ से इशारा किया.

क्षणांश चुप्पी के बाद मानसी बोली, ‘सर, मनोहर और मेरे बौद्धिक स्तर नदी के दो किनारों की तरह हैं जो कभी भी एक नहीं हो सकते.’

जज ने अपना फैसला सुना दिया. यानी तलाक. मनोहर इस फैसले से खुश न था. उस का जी हुआ कि मानसी का गला घोंट दे. वह मानसी को थप्पड़ मारने जा रहा था कि उस के पिता बीच में आ गए. ‘खबरदार, जो हाथ लगाया. तेरा और उस का रिश्ता खत्म हो चुका है.’

तलाक की खबर पा कर मनोहर के बड़े भाईबहन, जो दूसरे शहरों में थे, आ गए.

‘तू ने जीतेजी हम सब को मार डाला,’ भाई राकेश बोला, ‘क्या मुंह दिखाएंगे समाज में.’

मनोहर की बहन प्रतिमा मानसी के घर आई. मानसी ने उन्हें ससम्मान बिठाया.

‘मानसी, मुझे इस फैसले से दुख है. न मेरा भाई ऐसा होता न ही तुम्हें ऐसा कठोर कदम उठाने के लिए विवश होना पड़ता. मैं उस की तरफ से तुम से माफी मांगती हूं,’ प्रतिमा भरे मन से बोली.

‘दीदी, आप दिल छोटा मत कीजिए. मुझे किसी से कोई गिलाशिकवा नहीं.’

‘मुझे चांदनी की चिंता है. मेरा तो उस से रिश्ता खत्म नहीं हुआ,’ चांदनी के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए प्रतिमा बोली.

‘दीदी, खून के रिश्ते क्या आसानी से मिटाए जा सकते हैं,’ मानसी भी भावुक हो उठी.

प्रतिमा उठ कर जाने लगी तो मानसी बोली, ‘चांदनी के लिए आप हमेशा बूआ ही रहेंगी.’

दरवाजे तक आतेआते भरे मन से प्रतिमा बोली, ‘मानसी, कागज पर लिख या मिटा देने से रिश्ते खत्म नहीं हो जाते. तुम्हारे और मनोहर के बीच रिश्तों की एक कड़ी है जिसे मिटाया नहीं जा सकता.’

मनोहर प्राय: अपने कमरे में गुमसुम पड़ा रहता. न समय पर खाता न पीता. अब उस ने ज्यादा ही शराब पीनी शुरू कर दी. पैसा पिता से लड़झगड़ कर ले लेता. पहले जब कभी मानसी रोकटोक लगाती थी तो वह पीना कम कर देता. अब तो वह भी न रही. निरंकुश दिनचर्या हो गई थी उस की. एक दिन शराब पी कर आया तो अपनी मां से उलझ गया :

‘तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद की है. तुम ने हमेशा मानसी से नफरत की है. उस के खिलाफ मुझे भड़काया.’

‘उलटा चोर कोतवाल को डांटे. मानसी मेरी नहीं तेरी वजह से गई है. बेटा, जो औरत ससुराल की देहरी लांघती है वह औरत नहीं वेश्या होती है. तेरे सामने तो एक लंबी जिंदगी पड़ी है. तेरा ब्याह अच्छे घराने में कराऊंगी,’ मनोहर की मां की आंखों में अजीब सी चमक थी.

‘नहीं करना है मुझे ब्याह,’ मनोहर धम्म से सोफे पर गिर पड़ा.

मनोहर की हालत दिनोदिन बिगड़ने लगी. एक दिन अपनी मां को ढकेल दिया. वह सिर के बल गिरतेगिरते बचीं.

तंग आ कर उस के पिता ने अपने बड़े बेटे राकेश को बंगलौर से बुलाया.

-क्रमश:

धर्म, सर्जिकल स्ट्राइक के बहाने

धर्म, सर्जिकल स्ट्राइक के बहाने धर्मयुद्ध का बहाना जनता को बहकाने में सदा सफल रहा है. बचपन से ही जब धर्म एक व्यक्ति की जिंदगी की धुरी बन चुका हो तो ‘धर्म खतरे में है’ कह कर उसे कुछ भी काम करने को राजी किया जा सकता है. देश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी शासन स्तर पर और आर्थिक मामलों में कुछ अच्छा कर पाने में अपने को असफल महसूस कर रही है, इसलिए वह पाकिस्तान का नाम ले कर ‘धर्म खतरे में है’ का नारा लगाने में लग गई है. सर्जिकल स्ट्राइक डे मनाना उस की खिसियाहट का ही एक नमूना है.

पाकिस्तान क्या सर्जिकल स्ट्राइकों से डर चुका है और उस के हरे झंडे क्या सफेद हो गए हैं? क्या पाकिस्तानी प्रधानमंत्री घुटनों के बल चल कर आते दिख रहे हैं? क्या पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया है? क्या पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सर्जिकल स्ट्राइकों से डर कर छुट्टी पर चले गए हैं? सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक लाभ लेना देश के लिए महंगा पड़ेगा.

पाकिस्तान, जो कभी भारत का अभिन्न अंग था, आज भारत का शत्रु है पर घुसपैठ कर उस के कुछ जवानों को मार देने से दोनों के बीच की कटुता कम नहीं होगी, बल्कि और बढ़ेगी. 70 वर्षों का इतिहास गवाह है कि लगातार पाकिस्तान को शत्रु कहने से कोई लाभ नहीं हुआ. 1965 और 1971 की विजयों के बाद भी भारत पड़ोसी पाकिस्तान की सेना को निरुत्साहित नहीं कर पाया है.

सर्जिकल स्ट्राइक छोटे उद्देश्य के लिए की जाती है और आमनेसामने बैठी सभी सेनाएं ऐसा करती रहती हैं ताकि वे एकदूसरे के प्रति सतर्क रहें और चौकन्नी भी. इस का जय या पराजय से कोई संबंध नहीं. सर्जिकल स्ट्राइक सफल होना ऐसी शान की बात है जैसी माओवादियों का बस्तर में सुरक्षाबलों की गाडि़यों को बम से उड़ा देना. यह किसी समस्या का अंत नहीं है.

अगर आज कुछ चाहिए तो तनाव कम चाहिए क्योंकि भारत और पाकिस्तान की बहुसंख्य जनता दुनिया की सब से गरीब और फटेहाल है. हमें सर्जिकल स्ट्राइक तो गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अंधविश्वासी सोच, अशिक्षा पर करनी है. सेना अपना काम करे. देश सेना के साथ है. सेना की छोटी टैक्निकल कार्यवाहियों को व्यर्थ का प्रचार देना जनता को धोखा देना है. वोटों की खातिर सेना का इस्तेमाल करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि इस से सेना को राजनीतिक सत्ता का चसका लगने लगता है.

इन बाबाओं की नजरों में भाजपा ही क्यों है दुश्मन नंबर-1

जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, देश के कुछ ‘बाबाओं’ की बांछें खिल चुकी हैं और मन हिलोरें मार रहा है उन की अतिमहत्त्वाकांक्षा कि जब चाय बेचने वाला पीएम बन सकता है, भगवा वस्त्रधारी सीएम बन सकता है तो वे क्यों नहीं?

दरअसल, मध्य प्रदेश में जब से विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई है, कई राजनीतिक दल पैदा हो गए हैं. दिलचस्प तो यह है कि इन दलों के नेता खादीधारी के अलावा भगवाधारी बाबा भी हैं, जो कल तक गलीमोहल्लों में घूमघूम कर भक्तों को उपदेश देते रहे थे कि देखो सारा जीवन लोभमोह से मुक्त हो कर ही इंसान मोक्ष प्राप्त कर सकता है.

सीधे मुख्यमंत्री बनने की इच्छा

लेकिन अब मध्य प्रदेश के कुछ बाबाओं की इच्छा है कि वे चुनाव लड़ें और दरअसल, इन की महात्त्वाकांक्षा के पीछे भी खास वजह है. बाबाओं को लगता है कि उमा भारती भी पहले एक साध्वी ही थीं, योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो वे क्यों नहीं?

मध्य प्रदेश सरकार को सीधे तौर पर धमकाने वाले कंप्यूटर बाबा अपनी इन महात्त्वाकांक्षा को तब और बल देने में लग गए जब वे अपने चेलेचपाटियों और भक्तों के साथ तकरीबन साल भर पहले सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए और मठमंदिरों में तमाम सुविधाएं देने की जिद पर अड़ गए.

सरकार को डराने का परिणाम

सरकार चूंकि भाजपा की थी लिहाजा सरकार का मिजाज सख्त नहीं हुआ. पुलिस भी आला हुक्मरनाओं के आदेश की प्रतीक्षा करती रही. सरकार ने पहले तो इन्हें समझानेबुझाने की कोशिश की पर जब नहीं माने तो पानी की बौछारों और पुलिसिया दबिश दे कर इन्हें खदेड़ दिया गया. बस फिर क्या था, मुद्दे ने राजनीतिक रूप ले लिया. विपक्षी कांग्रेस ने सरकार को भगवाधारी विरोधी तक कह दिया. कुछ आग में घी डाल कर इन्हें भड़काने लगे, तो कुछ ने नमकमिर्च लगा दिया.

ऐसे में कंप्यूटर बाबा की हिम्मत बढ़ गई और मारे अपमान का हाथ में जल ले कर यह संकल्प ले लिया कि जब तक सरकार का सर्वनाश न हो जाए, चैन से नहीं बैठेंगे. बाबा घूमघूम कर नर्मदा सेवा यात्रा पर सरकार पर सवाल भी खड़े करने लगे. अवैध रेत खनन को ले कर भी सरकार पर निशाना साधने लगे.

बात चूंकि बाबाओं की नाराजगी की थी लिहाजा आननफानन में सरकार ने कंप्यूटर बाबा सहित 4 अन्य बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया.

आधुनिक रथ यानी चमचमाती महंगी सरकारी गाड़ियों पर सवार बाबा अब अपनी गाड़ी में ‘राज्यमंत्री का दरजा प्राप्त’ स्टीकर लगा कर घूमने लगे. बाबाओं को लगता कि चेलेचपाटियों की तरह अफसर भी उन की सलामी ठोकें. पर अफसरों ने बाबाओं को कोई खास तवज्जो नहीं दी, क्योंकि सरकार खुद ही नहीं चाहती थी कि इन्हें भाव मिलें.

कांग्रेस के पास मौका था. लगे इन बाबाओ को भड़काने कि सरकार ने ठग लिया और सिर्फ झुनझुना पकड़ा दिया है. पर बाबाओं को लगा कि फिलहाल पद ले कर सरकारी सुविधा भोगते रहो. अभी कुछ बोले तो पद और सुविधा दोनों से जाएंगे यानी न माया मिलेगी न राम.

आरपार की लड़ाई

मगर खार खाए बाबाओं को चुनाव से ऐन 2 महीने पहले खुद को अपमानित करने की बात याद आई. बौराए बाबा अब सरकार से आरपार की लड़ाई करने के मूड में आ गए. तुरंत इस्तीफा दे डाला कि दूसरी राजनीतिक पार्टियां उन्हें टिकट दे देंगी. पर किसी से भाव न मिला और न ही टिकट. कंप्यूटर बाबा की इच्छा है कि  कोई भी पार्टी बाबावैरागियों के नाम पर 10-12 टिकट तो जरूर दे दें. पर इस में भी किसी पार्टी ने कोई तवज्जो नहीं दी.

उधर चुनाव से ऐन पहले ऐट्रोसिटी मामले से चर्चा में आए देवकी नंदन ठाकुर ने न सिर्फ अपना राजनीतिक दल बना लिया, भोपाल में कार्यालय तक खोल दिए. इन बाबा यानी देवकी नंदन ठाकुर ने तो यह घोषणा भी कर दी है कि उन की पार्टी मध्य प्रदेश की 230 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

मगर सवाल अहम है, बाबा वैराग्य छोड़ कर राजनीति के रथ पर सवार हो कर भक्तों की परेशानी दूर करेंगे पर इस से पहले वोट तो जनताजर्नादन ही करेगी, यह अलग बात है कि जनता पहले से ही किलसी पड़ी है.

मैं अपने बालों को ले कर बहुत परेशान हूं. बाल न झड़ें और ज्यादा समय तक काले रहें, इस के लिए कोई आसान समाधान बताएं.

सवाल
मेरी उम्र 45 वर्ष है. मेरे बाल बहुत तैलीय हैं. मैं सप्ताह में 3 बार हर्बल शैंपू से बाल धोती हूं. सफेद बालों के लिए हेयर डाई भी लगाती हूं, परंतु 15-20 दिनों में ही फिर माथे व मांग के आसपास सफेद बाल दिखने लगते हैं और बाल झड़ते भी बहुत हैं. मैं अपने बालों को ले कर बहुत परेशान हूं. बाल न झड़ें और ज्यादा समय तक काले रहें, इस के लिए कोई आसान समाधान बताएं?

जवाब
तैलीय बालों के लिए पानी में 1 छोटा चम्मच विनेगर और 2-3 बूंदें लैवेंडर ऐसेंशियल औयल को डाल कर बालों को धोएं. कलर्ड बालों के लिए कोई भी स्थायी उपचार नहीं है. बेहतर होगा कि आप किसी प्रोफैशनल सैलून में जा कर अपना रूट टचअप कराएं. बालों को गिरना रोकने के लिए नारियल के दूध में 1/2 नीबू का रस और 2 चम्मच कैस्टर औयल मिला कर सिर की त्वचा की मसाज करें पर इसे 5-6 घंटों के लिए ऐसे ही छोड़ दें.

बालों को माइल्ड शैंपू से धोएं या गुड़हल के फूलों की पत्तियों को क्रश कर के उन में 1 बड़ा चम्मच भीगा मेथीदाना क्रश कर के मिलाएं. इसे सिर की त्वचा पर 2-3 घंटे लगाए रखें. फिर माइल्ड शैंपू करें.

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बालों के झड़ने से परेशान हैं तो अपनाइये ये उपाय

महिलायें कभी-कभी नोटिस करती हैं कि कई विभिन्न कारणों से उनके बाल दिन पर दिन पतले होते जा रहे हैं. उम्र के साथ, मीनोपाज, प्रेगनेंसी, जेनेटिक्स, बीमारी और अन्य कई कारण ऐसे हैं जो बाल झड़ने में अपनी अहम भूमिका अदा करते हैं. ऐसे बहुत से नेचुरल तरीके हैं जिसे अपनाकर आप इस समस्या से छुटकारा पा सकती हैं. तो आइए आपको बताते हैं कि रसोई घर में मौजूद कुछ चुनिंदा सामग्री के इस्तेमाल से आप कैसे अपने बालों को झड़ने से रोक सकती हैं.

प्याज का रस

प्याज के रस में सल्फर की मात्रा होती है. ये टिशू में मौजूद कोलेजन के उत्पादन को बढ़ावा देते हुए बालों के विकास में मदद करती है. प्याज को पीस कर उसका रस निकाल लें. आप इसे कद्दूकस भी कर सकते हैं. रस को 10-15 मिनट के लिए स्कैल्प पर लगाकर छोड़ दें. इसके बाद बालों को हल्के शैंपू से धोएं. प्याज के रस के अलावा आप आलू का रस भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

सेब का सिरका

सिरका स्कैल्प को साफ कर पी.एच. संतुलन को बनाए रखती है. लंबे घने बालों के लिए एक लीटर पानी में सेब के सिरके को 75 मि.ली. मिलाएं. बालों को शैंपू करने के बाद सेब के सिरके को सबसे आखिर में पानी में डालकर धोएं. इससे बालों में चमक तो आएगी ही, साथ ही लंबाई में भी असर दिखाई देगा.

ग्रीन-टी

सेहत को तंदरूस्‍त रखने के लिए आप रोज अपने आहार में ग्रीन-टी का इस्तेमाल करते हैं और बाद में उसके टी बैग को कूड़े में फेंक देते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही ग्रीन-टी आपके बालों के लिए कितनी लाभकारी होती है? ग्रीन-टी एक बहुत ही अच्छी एंटीआक्सिडेंट होती है, जो बालों को टूटने से रोकने के साथ ही उसके विकास में भी मदद करती है. हल्की गर्म ग्रीन-टी को अपनी स्कैल्प पर लगाएं. करीब एक घंटे के लिए लगाकर छोड़ दें. ठंडे पानी से बालों को धो लें.

आंवला

पोषक तत्वों से भरे इस लाभकारी फल में विटामिन सी का मात्रा काफी होती है, जो बालों के विकास के लिए काफी अच्छा होता है. दो छोटे चम्मच आंवला पाउडर या रस में दो छोटे चम्मच नींबू का रस मिलाएं. हल्का सूखने के लिए रख दें. जब यह सूख जाए, तो गुनगुने पानी में मिलाकर बालों को धोएं.

अंडा

इसमें प्रोटीन की मात्रा के साथ सल्फर, आयरन, जिंक, सेलेनियम, आयोडीन और फास्फोरस होता है, जो अच्छे घने बालों के विकास में मदद करता है. अंडे का कवच बनाने के लिए इसके सफेद भाग को एक कटोरी में डालकर फेंट लें. इसके बाद इसमें एक छोटा चम्मच जैतून का तेल और एक छोटा चम्मच शहद डालकर मिलाएं. तैयार किए पेस्ट को अपने बालों और स्कैल्प पर 20 मिनट के लिए लगाकर छोड़ दें. शैंपू और ठंडे पानी की मदद से बालों को धो लें.

मेथी

बालों के प्राकृतिक रंग को बनाए रखने के लिए काफी लोग परेशान रहते हैं. मेथी में प्रोटीन और निकोटीनिक एसिड होता है, जो बालों के लिए काफी फायदेमंद है. इस पेस्ट को बनाने के लिए मेथी पीस लें. इसमें थोड़ा सा नारियल का तेल डालकर इसे करीब आधे घंटे के लिए अपने बालों और स्कैल्प पर लगाएं. हल्के शैंपू के इस्तेमाल से धो लें.

ये उपाय आपके बालों को झड़ने से रोकने के साथ ही उसे लम्बे और चमकदार बनाने में आपकी मदद करेंगे.

राजस्थान में तीसरे मोर्चे का उदय : बेनीवाल ने फूंका बगावत का बिगुल

राजस्थान के आगामी विधानसभा चुनावों में बसपा, आम आदमी पार्टी, वामपंथी दल और कांग्रेस के बीच गठबंधन की खिचड़ी पक नहीं पाई पर इन दलों को छोड़ कर भाजपा के बागी नेता घनश्याम तिवारी द्वारा गठित नई पार्टी, पूर्व सांसद जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल, समाजवादी पार्टी और निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल ने मिल कर तीसरे मोर्चे के गठन का रास्ता खोल दिया है.

पिछले समय से प्रदेश भर में जगहजगह रैलियां कर भाजपा और कांग्रेस की नींद उड़ा रहे जाट नेता एवं खींवसर से विधायक हनुमान बेनीवाल ने जयपुर में आयोजित हुंकार रैली में इन दलों के नेताओं की मौजूदगी में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का ऐलान किया. मंच पर भारत वाहिनी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष घनश्याम तिवारी, राष्ट्रीय लोकदल के नेता एवं पूर्व सांसद जयंत चौधरी और समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधि शामिल थे.

इन दलों के नेताओं ने कहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले ये चारों दल गठबंधन करेंगे. इन का दावा है कि वे अन्य छोटे दलों को साथ ले कर तीसरी ताकत के रूप में उभरेंगे.

मंच पर मौजूद नेताओं ने उम्मीद जताई कि टिकट बंटवारे के बाद कांग्रेस और भाजपा से नाराज  कई बड़े नेता भी उन के साथ आ सकते हैं. घनश्याम तिवारी और बेनीवाल की पार्टी पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरेगी.

चार दलों के एकजुट होने से सत्तारूढ भाजपा और कांग्रेस को चुनौती मिल सकती है. पिछले समय से प्रदेश के जाट मतदाता कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों से नाराज चल रहे हैं. इस बार हनुमान बेनीवाल के रूप में उन्हें अपना एक मजबूत नेता मिला हैं जिन्हें वे आगे बढाना चाहते हैं.

एक तरह से इस तीसरा मोर्चा जाटों, ब्राह्मणों, पिछड़ों को अपने साथ जोड़ने की कवायद कर रहा है. घनश्याम तिवारी भाजपा में रहते प्रदेश के ब्राह्मण मतदाताओं में अपना प्रभाव रहते थे. उन का यह असर अब भी बरकरार है. हनुमान बेनीवाल जाटों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में जुटे हैं. उन की रैलियों में बड़ी संख्या में जाट युवा मतदाताओं की भीड़ उमड़ रही है. इस से भाजपा और कांग्रेस के जाट नेताओं की नींद उड़ी हुई है.

पिछले कुछ सालों से हनुमान बेनीवाल प्रदेश में खुद को नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, चौधरी कुंभाराम की तर्ज पर जाट नेता के रूप में स्थापित करने में लगे हुए हैं. जाटों की भारी भीड़ भी उन की कईर् रैलियों में दिखाई दी है.

जयपुर में आयोजित हुंकार रैली में हनुमान बेनीवाल ने जाट नेता के रूप में किसानों के लिए कई वादे किए. उन्होंने कहा कि तीसरे मोर्चे की सरकार बनने पर किसानों के पूरे कर्ज माफ, फ्री बिजली, बेरोजगारों को 10 हजार रुपए भत्ता दिया जाएगा. हर साल एक लाख रोजगार दिया जाएगा. इस के अलावा किसानों के हित में स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू कराने, किसानों की फसलों का उचित मूल्य दिलाने जैसे कदम उठाए जाएंगे.

राजस्थान में अभी तक तीसरे मोर्चे की ताकत कभी कामयाब नहीं हुई. प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दोनों बारीबारी से पांचपांच साल तक शासन करती आई है. इस बार भी अभी तक नए तीसरे मोर्चे को सत्ता के लिए तगड़ा संघर्ष करना होगा, वरना भाजपा से तो मतदाता पूरी तरह रूढे नजर आ रहे हैं. पांच साल भाजपा ने प्रदेश की जनता को परेशान किया, अब पांच साल कांग्रेस की बारी आ रही है.

तीसरा मोर्चा केवल दोनों बड़ी पार्टियों के वोट काटने के अलावा बड़ी कामयाबी पा लेगा, ऐसे आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं.

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