धर्म, सर्जिकल स्ट्राइक के बहाने धर्मयुद्ध का बहाना जनता को बहकाने में सदा सफल रहा है. बचपन से ही जब धर्म एक व्यक्ति की जिंदगी की धुरी बन चुका हो तो ‘धर्म खतरे में है’ कह कर उसे कुछ भी काम करने को राजी किया जा सकता है. देश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी शासन स्तर पर और आर्थिक मामलों में कुछ अच्छा कर पाने में अपने को असफल महसूस कर रही है, इसलिए वह पाकिस्तान का नाम ले कर ‘धर्म खतरे में है’ का नारा लगाने में लग गई है. सर्जिकल स्ट्राइक डे मनाना उस की खिसियाहट का ही एक नमूना है.

पाकिस्तान क्या सर्जिकल स्ट्राइकों से डर चुका है और उस के हरे झंडे क्या सफेद हो गए हैं? क्या पाकिस्तानी प्रधानमंत्री घुटनों के बल चल कर आते दिख रहे हैं? क्या पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया है? क्या पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सर्जिकल स्ट्राइकों से डर कर छुट्टी पर चले गए हैं? सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक लाभ लेना देश के लिए महंगा पड़ेगा.

पाकिस्तान, जो कभी भारत का अभिन्न अंग था, आज भारत का शत्रु है पर घुसपैठ कर उस के कुछ जवानों को मार देने से दोनों के बीच की कटुता कम नहीं होगी, बल्कि और बढ़ेगी. 70 वर्षों का इतिहास गवाह है कि लगातार पाकिस्तान को शत्रु कहने से कोई लाभ नहीं हुआ. 1965 और 1971 की विजयों के बाद भी भारत पड़ोसी पाकिस्तान की सेना को निरुत्साहित नहीं कर पाया है.

सर्जिकल स्ट्राइक छोटे उद्देश्य के लिए की जाती है और आमनेसामने बैठी सभी सेनाएं ऐसा करती रहती हैं ताकि वे एकदूसरे के प्रति सतर्क रहें और चौकन्नी भी. इस का जय या पराजय से कोई संबंध नहीं. सर्जिकल स्ट्राइक सफल होना ऐसी शान की बात है जैसी माओवादियों का बस्तर में सुरक्षाबलों की गाडि़यों को बम से उड़ा देना. यह किसी समस्या का अंत नहीं है.

अगर आज कुछ चाहिए तो तनाव कम चाहिए क्योंकि भारत और पाकिस्तान की बहुसंख्य जनता दुनिया की सब से गरीब और फटेहाल है. हमें सर्जिकल स्ट्राइक तो गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अंधविश्वासी सोच, अशिक्षा पर करनी है. सेना अपना काम करे. देश सेना के साथ है. सेना की छोटी टैक्निकल कार्यवाहियों को व्यर्थ का प्रचार देना जनता को धोखा देना है. वोटों की खातिर सेना का इस्तेमाल करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि इस से सेना को राजनीतिक सत्ता का चसका लगने लगता है.

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