सवाल मोक्ष का हो तो अंधविश्वासी जान तक देने से नहीं चूकते. पर परदे के पीछे से इस खूनी खेल को रचने वालों के चेहरे आखिर क्यों नहीं बेनकाब होते, क्या जानना नहीं चाहेंगे.

दिल्ली के बुराड़ी इलाके के भाटिया परिवार के 11 लोगों की सामूहिक आत्महत्या की चर्चा दुनिया भर में रही, जिस में मृतकों के दिमागी दिवालिएपन व धार्मिक उन्माद की बात कम और मोक्ष पर चर्चा ज्यादा रही थी. किसी बुद्धिजीवी या चिंतक दार्शनिक ने इस बुजदिली भरे हादसे का जिम्मेदार धर्म को बताने की हिम्मत नहीं की.

अगर भाटिया परिवार का मकसद मोक्ष था तो इस साल भी अमरनाथ यात्रा पर गए लाखों तीर्थयात्रियों का मकसद भी मोक्ष और दूसरे पुण्य कमाना ही है. इत्तफाक की बात यह है कि इसी तारीख तक अमरनाथ यात्रा में मारे गए श्रद्धालुओं की संख्या भी 11 ही थी. फर्क इतना भर था कि वे 11 लोग एक ही परिवार के न हो कर देश के अलगअलग राज्यों और जातियों के थे.

आंध्र प्रदेश के फायवलम की 75 वर्षीय थोटा राधनम की मृत्यु 3 जुलाई को तड़के हार्ट अटैक से हुई. मौत के वक्त वे एक लंगर की रसोई में थीं. आंध्र प्रदेश के ही अनंतपुर के रहने वाले

65 वर्षीय राधाकृष्ण शास्त्री की मौत अमरनाथ गुफा के नजदीक संगम नाम की जगह पर हुई. उन्हें भी दिल का दौरा पड़ा था. उत्तराखंड के निवासी पुष्कर जोशी बरारी मार्ग और रेलपथरी के बीच पहाड़ से पत्थरों के गिरने के कारण घायल हो गए थे. उन्होंने इलाज के दौरान बालटाल आधार शिविर अस्पताल में दम तोड़ दिया था.

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