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Love Story In Hindi : चार मार्च – क्या हर्ष और आभा शादीशुदा जिंदगी में खुश नहीं थे?

Love Story In Hindi : ‘‘हर्ष,अब क्या होगा?’’ आभा ने कराहते हुए पूछा. उस की आंखों में भय साफ देखा जा सकता था. उसे अपनी चोट से ज्यादा आने वाली स्थिति को ले कर घबराहट हो रही थी.

‘‘कुछ नहीं होगा… मैं हूं न. तुम फिक्र मत करो,’’ हर्ष ने उस का गाल थपथपाते हुए कहा.

मगर आभा चाह कर भी मुसकरा नहीं सकी. हर्ष ने उसे दवा खिला कर आराम करने को कहा और फिर खुद भी उसी के बैड के एक किनारे अधलेटा सा हो गया.

आभा दवा के असर से नींद के आगोश में चली गई. मगर हर्ष के दिमाग में कई उलझनें एकसाथ चहलकदमी कर रही थीं…

कितने खुश थे दोनों जब सुबह रेलवे स्टेशन पर मिले थे. हर्ष की ट्रेन सुबह 8 बजे ही स्टेशन पर लग चुकी थी. आभा की ट्रेन आने में अभी

1 घंटा बाकी था. यह समय हर्ष ने उस से व्हाट्सऐप पर चैटिंग करते हुए ही बिताया था. जैसे ही आभा की ट्रेन के प्लेटफौर्म पर आने की घोषणा हुई, वह आभा के कोच की तरह बढ़ा. आभा ने भी उसे देखते ही जोरजोर से हाथ हिलाया.

स्टेशन की भीड़ से बेपरवाह दोनों वहीं कस कर गले मिले और फिर अपनाअपना बैग ले कर स्टेशन से बाहर निकल आए. एक होटल में कमरा ले कर दोनों ने चैक इन किया. अटैंडैंट के सामान रख कर जाते ही दोनों फिर एकदूसरे से लिपट गए.

थोड़ी देर तक एकदूसरे को महसूस करने के बाद वे नहाधो कर नाश्ता करने बाहर निकले. आभा का बाहर जाने का मन नहीं था. वह तो

हर्ष के साथ पूरा दिन कमरे में ही बंद रहना चाहती थी. मगर हर्ष ने ही मनुहार की बाहर जा कर उसे जयपुर की प्याज की स्पैशल कचौरी खिलाने की जिसे वह टाल नहीं सकी थी. हर्ष को अब अपने उस फैसले पर अफसोस हो रहा था कि न वह बाहर जाने की जिद करता और न यह हादसा होता.

होटल से निकल कर जैसे ही वे मुख्य सड़क पर आए, पीछे से आती एक अनियंत्रित कार ने आभा को टक्कर मार दी. वह लहूलुहान सी वहीं सड़क पर गिर पड़ी. हर्ष ऐंबुलैंस की मदद से उसे हौस्पिटल ले गया. ऐक्सरे जांच में आभा के पांव की हड्डी टूटी पाई गई. डाक्टर ने 6 सप्ताह के लिए पलस्तर बांध हौस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया.

तभी मोबाइल की आवाज से आभा की नींद टूटी. उस के मोबाइल में रिमाइंडर मैसेज बजा. लिखा था, ‘से हैप्पी ऐनिवर्सरी टु हर्ष.’ आभा दर्द में भी मुसकरा दी. पिछले साल उस ने हर्ष को विश करने के लिए यह रिमाइंडर अपने मोबाइल में डाला था. दोपहर

12 बजे जैसे ही रिमाइंडर मैसेज ने उसे विश करना याद दिलाया उस ने हर्ष को किस कर के अपने पुनर्मिलन की सालगिरह विश की और उसी वक्त इस में आज की तारीख सैट कर दी थी.

मगर आज वह चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाई थी, क्योंकि वह जख्मी हालत में बैड पर थी. उस ने एक नजर हर्र्ष पर डाली और रिमाइंडर में अगले साल की डेट सैट कर दी. हर्ष अभी भी आंखें मूंदे लेटा था. पता नहीं सो रहा था या कुछ सोच रहा था. आभा ने दर्द को सहन करते हुए एक बार फिर से अपनी आंखें बंद कर लीं. अब आभा का दिमाग भी यादों की बीती गलियों में घूमने लगा…

लगभग सालभर पहले की बात है. उसे अच्छी तरह याद है वह 4 मार्च की शाम. वह अपने कालेज की तरफ से 2 दिन का एक सेमीनार अटैंड करने जयपुर आई थी. शाम के समय टाइम पास करने के लिए जीटी पर घूमतेघूमते अचानक उसे हर्ष जैसा एक व्यक्ति दिखाई दिया.

वह चौंक गई, ‘हर्ष यहां कैसे हो सकता है?’ सोचतेसोचते वह उस व्यक्ति के पीछे हो ली. एक शौप पर आखिर वह उस के सामने आ ही गई. उस व्यक्ति की आंखों में भी पहचान की परछाईं सी उभरी. दोनों सकपकाए और फिर मुसकरा दिए.

हां, यह हर्ष ही था उस का कालेज का साथी, उस का खास दोस्त, जो न जाने उसे किस अपराध की सजा दे कर अचानक उस से दूर चला गया था. कालेज के आखिरी दिनों में ही हर्ष उस से कुछ खिंचाखिंचा सा रहने लगा था और फिर फाइनल परीक्षा खत्म होतेहोते बिना कुछ कहेसुने हर्ष उस की जिंदगी से चला गया था. कितना ढूंढ़ा था उस ने हर्ष को, मगर किसी से भी उसे हर्ष की कोई खबर नहीं मिली. आभा आज तक हर्ष के उस बदले हुए व्यवहार का कारण नहीं समझ पाई थी.

धीरेधीरे वक्त अपने रंग दिखाता रहा. डाक्टरेट करने के बाद आभा स्थानीय गर्ल्स कालेज में लैक्चरर लग गई और अपने विगत से लड़ कर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगी. इस बीच आभा ने अपने पापा की पसंद के लड़के राहुल से शादी भी कर ली.

2 बच्चों की मां बनने के बाद भी आभा को राहुल के लिए अपने दिल में कभी प्यार वाली तड़प महसूस नहीं हुई. शायद अब भी दिल हर्ष के लिए ही धड़कना चाहता था.

शादी कर के जैसे एक समझौता किया था उस ने अपनी जिंदगी से. हालांकि समय के साथसाथ हर्ष की स्मृतियों पर जमती धूल की परत भी मोटी होती चली गई थी, मगर कहीं न कहीं उस के अवचेतन मन में हर्ष आज भी मौजूद था. शायद इसीलिए वह राहुल को कभी दिल से प्यार नहीं कर पाईर् थी. राहुल सिर्फ उस के तन को ही छू पाया था, मन का दरवाजा आभा उस के लिए नहीं खोल पाई थी.

जीटी में हर्ष को यों अचानक अपने सामने पा कर आभा को यकीन ही नहीं हुआ. हर्ष का भी लगभग यही हाल था.

‘‘कैसी हो आभा?’’ आखिर हर्ष ने ही चुप्पी तोड़ी.

‘तुम कौन होते हो यह पूछने वाले?’ आभा मन ही मन गुस्साई, मगर प्रत्यक्ष में बोली, ‘‘अच्छी हूं… आप सुनाइए… अकेले हैं या आप की मैडम भी साथ हैं?’’

‘‘अभी तो अकेला ही हूं,’’ हर्ष ने अपने चिरपरिचित अंदाज में मुसकराते हुए कहा और फिर आभा को कौफी पीने का औफर दिया. उस की मुसकान देख कर आभा का दिल जैसे उछल कर बाहर आ गया. दिल ने कहा कि कमबख्त यह मुसकान… आज भी वैसी ही कातिल है? लेकिन दिमाग ने सहज हो कर हर्ष का प्रस्ताव स्वीकार लिया. शाम दोनों ने साथ बिताई.

थोड़ी देर तो दोनों में औपचारिक बातें हुईं और फिर 1-1 कर के संकोच की

दीवारें टूटने लगीं. देर रात तक गिलेशिकवे होते रहे. कभी हर्ष ने अपनी पलकें नम कीं तो कभी आभा ने अपनी आंखें छलकाईं. हर्ष ने खुद को आभा का गुनहगार मानते हुए अपनी मजबूरियां बताईं. अपनी कायरता भी स्वीकार की और यों बिना कहेसुने चले जाने के लिए उस से माफी भी मांगी.

आभा ने भी जो हुआ सो हुआ कहते हुए उसे माफ कर दिया. फिर डिनर के बाद बिदा लेते हुए दोनों ने एकदूसरे को गले लगाया और अगले दिन शाम को फिर यहीं मिलने का वादा कर के दोनों अपनेअपने होटल की तरफ चल दिए.

अगले दिन बातचीत के दौरान हर्ष ने उसे बताया कि वह एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में साइट इंजीनियर है और इसी सिलसिले में उसे महीने में लगभग 15-20 दिन घर से बाहर रहना पड़ता है और यह भी बताया कि उस के 2 बच्चे हैं और वह अपनी शादीशुदा जिंदगी से काफी संतुष्ट है.

‘‘तुम अपनी लाइफ से संतुष्ट हो या खुश भी हो?’’ एकाएक आभा ने उस की आंखों में देखते हुए पूछा.

‘‘दोनों स्थितियां अलग होती हैं क्या?’’ हर्ष ने भी प्रति प्रश्न किया.

‘‘वक्त आने पर बताऊंगी,’’ आभा ने टाल दिया.

आभा की ट्रेन रात 11 बजे की थी और हर्ष तब तक उस के साथ ही था. दोनों ने आगे भी टच में रहने का वादा करते हुए बिदा ली.

अगले दिन कालेज पहुंचते ही आभा ने हर्ष को फोन किया. हर्ष ने जिस तत्परता से फोन उठाया उसे महसूस कर के आभा को हंसी आ गई. बोली, ‘‘फोन का ही इंतजार कर रहे थे क्या?’’

अब हर्ष को भी अपने उतावलेपन पर आश्चर्य हुआ. बातें करतेकरते कब 1 घंटा बीत गया, दोनों को पता ही नहीं चला. आभा की क्लास का टाइम हो गया. वह पीरियड लेने चली गईर्. वापस आते ही उस ने फिर हर्ष को फोन लगाया. फिर वही लंबी बातें. दिन कब गुजर गया पता ही नहीं चला. देर रात तक दोनों व्हाट्सऐप पर औनलाइन रहे और सुबह उठते ही  फिर वही सिलसिला.

अब तो यह रोज का नियम ही बन गया. न जाने कितनी बातें थीं उन के पास जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थीं. कईर् बार तो यह होता था कि दोनों के ही पास कहने के लिए शब्द नहीं होते थे. मगर बस वे एकदूसरे से जुड़े हुए हैं यही सोच कर फोन थामे रहते. इसी चक्कर में दोनों के कई जरूरी काम भी छूटने लगे. मगर न जाने कैसा नशा सवार था दोनों ही पर कि यदि 1 घंटा भी फोन पर बात न हो तो दोनों को ही बेचैनी होने लगती.

ऐसी दीवानगी तो शायद उस कच्ची उम्र में भी नहीं थी जब उन के प्यार की शुरुआत हुई थी. आभा को लग रहा था जैसे खोया हुआ प्यार फिर से उस के जीवन में दस्तक दे रहा है. मगर हर्ष अब भी इस सचाई को जानते हुए भी यह स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि उसे आभा से प्यार है.

‘‘हर्ष, तुम इस बात को स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि तुम्हें आज भी मुझ से प्यार है?’’ एक दिन आभा ने पूछा.

‘‘अगर मैं यह प्यार स्वीकार कर भी लूं तो क्या समाज इसे स्वीकार करने देगा? कौन इस बात का समर्थन करेगा कि मैं ने शादी किसी और से की है और प्यार तुम से करता हूं,’’ हर्ष ने तड़पते हुए जवाब दिया.

‘‘शादी करना और प्यार करना दोनों अलगअलग बातें हैं हर्ष… जिसे चाहें शादी भी उसी से हो जब यह जरूरी नहीं, तो फिर यह जरूरी क्यों है कि जिस से शादी हो उसी को चाहा भी जाए?’’ आभा ने अपना तर्क दिया. उस का दिल रो रहा था.

‘‘चलो, माना कि यह जरूरी नहीं, मगर इस में हमारे जीवनसाथियों की क्या गलती है? उन्हें हमारी अधूरी चाहत की सजा क्यों मिले?’’ हर्ष ने फिर तर्क किया.

‘‘हर्ष, मैं किसी को सजा देने की बात नहीं कर रही… हम ने अपनी सारी जिंदगी उन की खुशी के लिए जी है… क्या हमारा अपनेआप के प्रति कोई कर्तव्य नहीं? क्या हमें अपनी खुशी के लिए जीने का अधिकार नहीं? वैसे भी अब हम उम्र की मध्यवय में आ चुके हैं. जीने लायक जिंदगी बची ही कितनी है हमारे पास… मैं कुछ लमहे अपने लिए जीना चाहती हूं. मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती हूं… मैं महसूस करना चाहती हूं कि खुशी क्या होती है,’’ कहतेकहते आभा का स्वर भीग गया.

‘‘क्यों? क्या तुम अपनी लाइफ से अब तक खुश नहीं थीं? क्या कमी है तुम्हें? सबकुछ तो है तुम्हारे पास,’’ हर्ष ने उसे टटोला.

‘‘खुश दिखना और खुश होना दोनों में बहुत फर्क होता है हर्ष. तुम नहीं समझोगे.’’

आभा ने जब यह कहा तो उस की आवाज की तरलता हर्ष ने भी महसूस की. शायद वह भी उस में भीग गया था. मगर सच का सामना करने की हिम्मत फिर भी नहीं जुटा पाया.

लगभग 10 महीने दोनों इसी तरह सोशल मीडिया पर जुड़े रहे. रोज घंटों बातें करने पर भी उन की बातें खत्म नहीं होती थीं. आभा की तड़प इतनी ज्यादा बढ़ चुकी थी कि अब वह हर्ष से प्रत्यक्ष मिलने के लिए बेचैन होने लगी. लेकिन हर्ष का व्यवहार अभी भी उस के लिए एक पहेली बना हुआ था.

कभी तो उसे लगता जैसे हर्ष आज भी सिर्फ उसी का है और कभी वह एकदम बेगानों सा लगने लगता. वह 2 कदम आगे बढ़ता और अगले ही पल 4 कदम पीछे हो जाता. वह आभा का साथ तो चाहता था, मगर समाज में दोनों की ही प्रतिष्ठा को भी दांव पर नहीं लगाना चाहता था. उसे डर था कि कहीं ऐसा न हो वह एक बार मिलने के बाद आभा से दूर ही न रह पाए… फिर क्या करेगा वह? मगर आभा अब मन ही मन एक ठोस निर्णय ले चुकी थी.

‘4 मार्च’ आने वाला था. आभा ने हर्ष

को याद दिलाया कि पिछले साल इसी दिन वे

2 बिछड़े प्रेमी फिर से मिले थे. उस ने आखिर हर्ष को मना ही लिया था यह दिन एकसाथ मनाने के लिए और बहुत सोचविचार कर के दोनों ने उस दिन जयपुर में मिलना तय किया.

हर्ष दिल्ली से और आभा जोधपुर से सुबह ही जयपुर आई. होटल में पतिपत्नी की तरह रुके. पूरा दिन साथ बिताया… जीभर कर प्यार किया और दोपहर ठीक 12 बजे आभा ने हर्ष को ‘हैप्पी ऐनिवर्सरी’ विश किया और फिर उसी समय अपने मोबाइल में अगले साल के लिए यह रिमाइंडर डाल लिया.

रात को जब बिदा लेने लगे तो आभा ने हर्ष को एक बार फिर चूमते हुए कहा, ‘‘हर्ष,

खुशी क्या होती है, यह आज तुम ने मुझे महसूस करवाया है… थैंक्स… अब अगर मैं मर भी जाऊं तो कोई गम नहीं.’’

‘‘मरें तुम्हारे दुश्मन… अभी तो हमारी जिंदगी से फिर से मुलाकात हुई है… सच आभा मैं तो मशीन ही बन चुका था. मेरे दिल को फिर से धड़काने के लिए शुक्रिया. और हां, खुशी और संतुष्टि में फर्क महसूस करवाने के लिए भी,’’ हर्ष ने उस के चेहरे पर से बाल हटाते हुए कहा और फिर से उस की कमर में हाथ डाल कर उसे अपनी ओर खींच लिया.

‘‘अब आशिकी छोड़ो… मेरी टे्रन का टाइम हो रहा है,’’ आभा ने मुसकराते हुए हर्ष को

अपने से अलग किया.

उसी शाम दोनों ने वादा किया था कि हर साल 4 मार्च को वे दोनों इसी तरह इसी जगह मिला करेंगे. इसी वादे के तहत आज भी दोनों यहां जयपुर आए थे और यह हादसा हो गया.

‘‘आभा, डाक्टर ने तुम्हारे डिस्चार्ज पेपर बना दिए. मैं टैक्सी ले कर आता हूं,’’ हर्ष ने धीरे से उसे जगाते हुए कहा तो आभा फिर से भयभीत हो गई कि कैसे वापस जाएगी अब वह जोधपुर? कैसे राहुल का सामना कर पाएगी? मगर फेस तो करना ही पड़ेगा. जो होगा, देखा जाएगा. सोचते हुए आभा जोधपुर जाने के लिए अपनेआप को मानसिक रूप से तैयार करने लगी.

आभा ने राहुल को फोन कर के अपने ऐक्सीडैंट के बारे में बता दिया. राहुल ने सिर्फ इतना ही पूछा, ‘‘ज्यादा चोट तो नहीं आई?’’

आभा के नहीं कहते ही राहुल ने अगला प्रश्न दागा, ‘‘सरकारी हौस्पिटल में ही दिखाया था न… ये प्राइवेट वाले तो बस लूटने के मौके ढूंढ़ते हैं.’’

सुन कर आभा को कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि उसे राहुल से ऐसी ही उम्मीद थी.

आभा ने बहुत कहा कि वह अकेली जोधपुर चली जाएगी, मगर हर्ष ने उस की एक न सुनी और टैक्सी में उस के साथ जोधपुर चल पड़ा.

आभा को हर्ष का सहारा ले कर उतरते देख राहुल का माथा ठनका. आभा ने परिचय करवाते हुए कहा, ‘‘ये मेरे पुराने दोस्त हैं… जयपुर में मेरे साथ ही थे.’’

राहुल ने हर्ष में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘टैक्सी से आने की क्या जरूरत थी? ट्रेन से भी आ सकती थी.’’

आभा को जोधुपर छोड़ उसी टैक्सी से हर्ष लौट गया.

आभा 6 सप्ताह की बैड रैस्ट पर थी. दिनभर बिस्तर पर पड़ेपड़े उसे हर्ष से बातें करने के अलावा और कोई काम ही नहीं सूझता था. कभी जब हर्ष अपने प्रोजैक्ट में बिजी होता तो उस से बात नहीं कर पाता था. यह बात आभा को अखर जाती थी. वह फोन या व्हाट्सऐप पर मैसेज कर के अपनी नाराजगी जताती. फिर हर्ष उसे मनुहार कर के मनाता. आभा को उस का यों मनाना बहुत सुहाता. वह मन ही मन अपने प्यार पर इतराती.

ऐसे ही एक दिन वह अपने बैड पर लेटीलेटी हर्ष से बातें कर रही थी और उस ने अपनी आंखें बंद कर रखी थीं. उसे पता ही नहीं चला कि राहुल कब से वहां खड़ा उस की बातें सुन रहा है.

‘‘बाय… लव यू…’’ कहते हुए फोन रखने के साथ ही जब राहुल

पर उस की नजर पड़ी तो वह सकपका गई. राहुल की आंखों का गुस्सा उसे अंदर तक हिला गया. उसे लगा मानो आज उस की जिंदगी से खुशियों की बिदाई हो गई.

राहुल ने आंखें तरेर कर पूछा, ‘‘कौन है यह? कब से चल रहा है ये सब?’’

‘‘यह हर्ष है… वही, जो मुझे छोड़ने आया था,’’ आभा अब राहुल के सवालों के जवाब देने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो चुकी थी.

‘‘तो तुम इसलिए बारबार जयपुर जाती थी?’’ राहुल ने फिर पूछा पर आभा ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अपनी नहीं तो कम से कम मेरी इज्जत का ही खयाल कर लेती… समाज में बात खुलेगी तो क्या होगा, कभी सोचा है तुम ने?’’ राहुल ने उस के चरित्र को निशाना बनाते हुए चोट की.

‘‘तुम्हारी इज्जत का खयाल था इसीलिए तो बाहर मिली उस से वरना यहां इस शहर में भी मिल सकती थी और समाज? किस समाज की बात करते हो तुम? किसे इतनी फुरसत है कि इतनी आपाधापी में मेरे बारे में कोई सोचे? मैं कितना सोचती हूं किसी और के बारे में और यदि कोई सोचता भी है तो 2 दिन सोच कर भूल जाएगा. वैसे भी लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है,’’ आशा ने बहुत ही संयत स्वर में कहा.

‘‘बच्चे क्या सोचेंगे तुम्हारे बारे में? उन का तो कुछ खयाल करो,’’ राहुल ने इस बार इमोशनल वार किया.

‘‘2-4 सालों में बच्चे भी अपनीअपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाएंगे…? राहुल मैं ने सारी उम्र अपनी जिम्मेदारियां निभाई हैं. बिना तुम से कोई सवाल किए अपना हर फर्ज निभाया है, फिर चाहे वह पत्नी का हो या मां का. अब मैं कुछ समय अपने लिए जीना चाहती हूं. क्या मुझे इतना भी अधिकार नहीं?’’ आभा की आवाज लगभग भर्रा गई थी.

‘‘तुम पत्नी हो मेरी… मैं कैसे तुम्हें किसी और की बांहों में देख सकता हूं?’’ राहुल ने उसे झकझोरते हुए कहा.

‘‘हां, पत्नी हूं तुम्हारी… मेरे शरीर पर तुम्हारा अधिकार है… मगर कभी सोचा है तुम ने कि मेरा मन आज तक तुम्हारा क्यों नहीं हुआ? तुम्हारे प्यार के छींटों से मेरे मन का आंगन क्यों नहीं भीगा? तुम चाहो तो अपने अधिकार का प्रयोग कर के मेरे शरीर को बंदी बना सकते हो… एक जिंदा लाश पर अपने स्वामित्व का हक जता कर अपने अहम को संतुष्ट कर सकते हो, मगर मेरे मन को तुम सीमाओं में नहीं बांध सकते… उसे हर्ष के बारे में सोचने से तुम रोक नहीं सकते,’’ आभा ने शून्य में ताकते हुए कहा.

‘‘अच्छा, क्या वह हर्ष भी तुम्हारे लिए इतना ही दीवाना है? क्या वह भी तुम्हारे लिए अपना सबकुछ छोड़ने को तैयार है?’’ राहुल ने व्यंग्य से कहा.

‘‘दीवानगी का कोई पैमाना नहीं होता. वह मेरे लिए किस हद तक जा सकता है, यह मैं नहीं जानती, मगर मैं उस के लिए किसी भी हद तक जा सकती हूं,’’ आभा ने दृढ़ता से कहा.

‘‘अगर तुम ने इस व्यक्ति से अपना रिश्ता खत्म नहीं किया तो मैं उस

के घर जा कर उस की सारी हकीकत बता दूंगा,’’ कहते हुए राहुल ने गुस्से में आ कर आभा के हाथ से मोबाइल छीन कर उसे जमीन पर पटक दिया. मोबाइल बिखर कर आभा के दिल की तरह टुकड़ेटुकड़े हो गया.

राहुल की आखिरी धमकी ने आभा को सचमुच डरा दिया. वह नहीं चाहती थी कि उस के कारण हर्ष की जिंदगी में कोई तूफान आए. वह अपनी खुशियों की इतनी बड़ी कीमत नहीं चुका सकती थी. उस ने मोबाइल के सारे पार्ट्स फिर से जोड़े तो पाया कि वह अभी भी चालू स्थिति में है. एक आखिरी मैसेज उस ने हर्ष को लिखा, ‘‘शायद नियति ने मेरे हिस्से खुशी लिखी ही नहीं… तुम ने जो खूबसूरत यादें मुझे दी हैं उन के लिए तुम्हारा शुक्रिया…’’ और फिर मोबाइल से सिम निकाल कर टुकड़ेटुकड़े कर दी.

हर्ष कुछ भी समझ नहीं पाया कि यह अचानक क्या हो गया. उस ने आभा को फोन लगाया, मगर फोन बंद था. फिर उस ने व्हाट्सऐप पर मैसेज छोड़ा, मगर वह भी अनसीन ही रह गया.

अगले कई दिनों तक हर्ष उसे फोन ट्राई करता रहा, मगर हर बार फोन बंद है का मैसेज पा कर निराश हो उठता. उस के किसी भी मेल का जवाब भी आभा की तरफ से नहीं आया.

एक बार तो हर्ष ने जोधपुर जा कर उस से मिलने का मन भी बनाया, मगर फिर यह सोच कर कि कहीं उस की वजह से स्थिति ज्यादा खराब न हो जाए उस ने दिल पर पत्थर रख लिया. आखिर हर्ष ने सबकुछ वक्त पर छोड़ कर आभा को तलाश करना बंद कर दिया.

इस वाकेआ के बाद आभा ने अब मोबाइल रखना ही बंद कर दिया. राहुल के बहुत जिद करने पर भी उस ने नई सिम नहीं ली. बस कालेज से घर और घर से कालेज तक ही उस ने खुद को सीमित कर लिया. कालेज से भी जब मन उचटने लगा तो उस ने छुट्टियां लेनी शुरू कर दीं. मगर छुट्टियों की भी एक सीमा थी.

धीरेधीरे वह गहरे अवसाद में चली गई. राहुल ने बहुत इलाज करवाया, मगर कोई फायदा नहीं हुआ. अब राहुल भी चिड़चिड़ा सा होने लगा था.

एक तो आभा की बीमारी ऊपर से उस की सैलरी भी कट कर आ रही थी, क्योंकि उस की छुट्टियां खत्म हो गई थीं. राहुल को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ रही थी जिसे वह सहन नहीं कर पा रहा था.

पतिपत्नी जैसा भी कोईर् रिश्ता अब उन के बीच नहीं रहा था, यहां तक कि आजकल तो खाना भी अकसर या तो राहुल को खुद बनाना पड़ता या फिर बाहर से ही आता.

सारे उपाय करने के बाद अंत में डाक्टर ने भी हाथ खड़े कर लिए. उन्होंने राहुल से कहा, ‘‘मरीज ने शायद खुद को खत्म करने की ठान ली है. जब तक ये खुद जीना नहीं चाहेंगी, कोई भी इलाज इन पर कारगर नहीं हो सकता.’’

आज शाम राहुल ने आभा से तलखी से कहा, ‘‘देखो, अब बहुत हो चुका… मैं अब तुम्हारे नाटक और नहीं सहन कर सकता… आज तुम्हारे प्रिंसिपल का फोन आया था. कह रहे थे कि तुम्हारे कालेज की तरफ से जयपुर में 5 दिनों का एक ट्रेनिंग कैंप लग रहा है. अगर तुम ने उस में भाग नहीं लिया तो तुम्हारा इंक्रीमैंट रुक सकता है. हो सकता है कि नौकरी भी हाथ से चली जाए. मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्यों अच्छीभली नौकरी को लात मारने पर तुली हो… मैं ने तुम्हारे प्रिंसिपल से कह कर कैंप के लिए तुम्हारा नाम जुड़वा दिया है. 2 दिन बाद तुम्हें जयपुर जाना है.’’

आभा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. आभा के न चाहते हुए भी राहुल ने उसे ट्रेनिंग कैंप में भेज दिया. ट्रेन में बैठाते समय राहुल ने कहा, ‘‘यह लो अपना मोबाइल… इस में नई सिम डाल दी है. अपने प्रिंसिपल को फोन कर के कैंप जौइन करने की सूचना दे देना ताकि उन्हें तसल्ली हो जाए.’’

आभा ने एक नजर अपने पुराने टूटे मोबाइल पर डाली और उसे पर्स में धकेलते हुए टे्रन की तरफ बढ़ गई. सुबह जैसे ही आभा की ट्रेन जयपुर स्टेशन पहुंची वह यंत्रचालित सी नीचे उतरी और धीरेधीरे उसी बैंच की तरफ बढ़ चली जहां हर्ष उसे बैठा मिला करता था. फिर अचानक कुछ याद कर के आभा के आंसुओं का बांध टूट गया. वह उस बैंच पर बैठ कर फफक पड़ी. फिर अपनेआप को संभालते हुए उसी होटल की तरफ चल दी जहां वह हर्ष के साथ रुका करती थी. उसे दोपहर बाद 3 बजे कैंप में पहुंचना था.

संयोग से आभा उस दिन भी उसी कमरे में ठहरी जहां उस ने पिछली दोनों बार  के साथ यादगार लमहे बिताए थे. वह कटे वृक्ष की तरह बिस्तर पर गिर पड़ी. उस ने रूम का दरवाजा तक बंद नहीं किया था.

तभी अचानक पर्स में रखे मोबाइल में रिमाइंडर मैसेज बज उठा, ‘से हैप्पी ऐनिवर्सरी टु हर्ष’ देख कर आभा एक बार फिर सिसक उठी, ‘‘उफ्फ, आज 4 मार्च है.’’

तभी अचानक 2 मजबूत हाथ पीछे से आ कर उस के गले के इर्दगिर्द लिपट गए. आभा ने अपना भीगा चेहर ऊपर उठाया तो सामने हर्ष को देख कर उसे यकीन ही नहीं हुआ. वह उस से कस कर लिपट गई.

हर्ष ने उस के गालों को चूमते हुए कहा, ‘‘हैप्पी ऐनिवर्सरी.’’

आभा का सारा अवसाद आंखों के रास्ते बहता हुआ हर्ष की शर्ट को भिगोने लगा.

वह सबकुछ भूल कर उस के चौड़े सीने में सिमट गई. Love Story In Hindi

Social Story : लड़कियां – वह महिला कर्मचारियों के साथ काम करने से क्यों कतरा रहा था

Social Story : नए औफिस में लड़कियां ज्यादा थीं. नहींनहीं यह कहना गलत होगा. दरअसल, यहां सिर्फ वह अकेला मर्द है. बाकी सब औरतें. उस ने हैड औफिस में अपने बौस से रिक्वैस्ट की है जैसे भी हो इस महिलाबहुल प्रतिष्ठान से उसे निकाल दिया जाए या एकाध पुरुष को और भेज दिया जाए. वह कुछ दिनों पहले ही यहां आया था.

ये लड़कियां पूरे समय या तो अपनी सास की बातें करती रहती हैं या फिर किसी रैसिपी पर डिसकस करतीं, कभीकभी कपड़ों की बातें करती हैं. हद तो तब हो जाती जब नैटफ्लिक्स की स्टोरी सुनाई जा रही होती है.

हैरत की बात है कि पीठ पीछे एकदूसरे की चुगली करने वाली लड़कियां लंच टाइम में एक हो जाती हैं. मिलबांट कर खाना खाया जाता है. पीछे की दुकान से समोसे मंगा कर खाए बिना उन का खाना पूरा न होता है.

‘जो जी चाहे करो. प्रजातंत्र है… सब अपनी मरजी के मालिक हो. बस इतनी कृपा करना देवियो कि जिस कंपनी की तनख्वाह ले रही हैं उस का भी कुछ काम कर देना,’ वह मन ही मन सोचता रहता.

उस की आदत है कम बोलने की और अपना काम दुरुस्त रखने की. मन ही मन गौरवान्वित होता है कि बौस ने उसे जानबू  झ कर भेजा है इस औफिस में. इन लड़कियों की मदद करने के लिए पुरुषोचित अभिमान से सीना चौड़ा हो जाता है उस का.

काम करने के गजब तरीके हैं इन लड़कियों के पहली बार जब कुछ नया काम या

नया ऐप खोलना होता तो उन में से 1-2 घबरा जातीं, एक से दूसरे के डैस्कटौप पर काम ट्रांसफर करतीं, मक्खियों की तरह भिनभिन करतीं और फिर काम पूरा होने पर ऐसे चैन की सांस लेतीं जैसे ऐवरैस्ट की चढ़ाई फतह कर ली हो.

वह सोचता है कि जितनी देर आपस में गप्पें लगाती हैं. अगर उतनी देर सैटिंग्स पर जा कर कुछ देखो, इंस्ट्रक्शन पढ़ो, सम  झो, सारा काम करना सीख जाएंगी. तभी उस की तंद्रा टूटी.

‘‘सर, आप को पता है फ्राइडे हमारे औफिस में कैजुअल्स पहन के आते हैं. आप जींस पहन कर आइए न सर,’’ इन लड़कियों में जो सब से ज्यादा बातूनी है, उस ने कहा.

वह उस की बात हवा में उड़ाते हुए रुखाई से बोला, ‘‘हैड औफिस से फोन आया था. डाइरैक्टर साहब को रिपोर्ट करनी है. अगर आप का काम पूरा हो गया हो तो हम निकलें?’’ कहतेकहते वह थोड़ा सख्त हो गया.

लड़की ने भांप लिया और फिर बोली, ‘‘जी सर, बस एक नजर डाल लूं.’’

उस के चेहरे पर पड़ती शिकनें देख कर वह हंस पड़ी, ‘‘सर काम पर नहीं, शीशे पर नजर डालनी है. जरा टचिंग कर के आती हूं… काम पूरा है सर.’’

‘अजीब बेशर्म लड़की है. कुछ भी कह लो इस पर जूं नहीं रेंगने वाली. एक आदत खास है इस में कभी पूछेगी नहीं. हमेशा कुछ बताएगी,’ वह मन ही मन भुनभुनाया.

कार में बैठते ही लड़की का रिकौर्ड चालू हो गया.

‘‘यहां पर आने से पहले 2 साल तक विदेश में थी सर, फिर लौट आई.’’

‘‘क्यों पीआर नहीं मिला क्या?’’ वह बोला.

‘‘जी नहीं यह बात नहीं है. पीआर था, नौकरी भी ठीकठाक थी, पर मेरे हस्बैंड ने कहा वापस चलते हैं तो मैं ने भी अपना मन बदल लिया. यहां पर सारे लोग हैं. मेरे मम्मीपापा, मेरे इनलौज. हम दोनों के फ्रैंड्स, फिर कामवाली बाइयां.

‘‘दरअसल, मु  झे भीड़ अच्छी लगती है, इतनी कि बस टकरातेटकराते बचो.’’

फिर वह गंभीर हो गई. बोली, ‘‘यह बात भी नहीं सर. बात कुछ और ही थी… मेरे बेटे में अपने रंग को ले कर हीनभावना आ गई थी. उस ने कहा कि टीचर गोरे (अंगरेज) बच्चों को ज्यादा प्यार करती है. बस सर, मैं ने अपना मन बदल लिया. वापस आ गए हम दोनों.

‘‘बुरा नहीं लगता आप को,’’ उस ने लड़की से पूछा.

‘‘बुरा क्यों लगेगा?’’

‘‘अपना देश है जैसा भी है… टेढ़ा है पर मेरा है.’’

तभी लालबत्ती पर कार रुक गई. लड़की ने फटाफट अपना बैग खोला और एक पोटलीनुमा पर्स निकाला. थोड़ा सा कार का शीशा नीचे किया और फिर बच्चेमहिलाएं भीख मांग रहे थे, उन्हें पैसे बांटने लगी.

तभी कार चल पड़ी.

उस ने देखा एक छोटा लड़का सड़क से फ्लाइंग किस उछाल रहा था, जिसे इस ने लपक कर कैच कर लिया.

वह बोला, ‘‘कभी भी इन लोगों को पैसे नहीं देने चाहिए. ये आप का बैग छीन कर भाग सकते हैं.’’

‘‘जी सर सही कह रहे हैं पर क्या है न अब परिस्थितियां बदल गई हैं. क्या पता कौन किस मजबूरी में भीख मांग रहा हो. इसलिए मैं ने अपने विचारों को थोड़ा बदल लिया है. मेरा छोटा सा कंट्रीब्यूशन हो सकता है किसी की भूख मिटा दे,’’ उस ने पैसों की पोटली फिर अपने बैग में रख ली.

अब वह ड्राइवर से बोली, ‘‘भैयाजी गाना बदलिए. कुछ फड़कता हुआ सा म्यूजिक लगाइए न.’’

तभी उस के बच्चे की कौल आ गई. उस ने म्यूजिक धीरे करवाया… पूरा रास्ता बच्चे का होमवर्क कराने में काट दिया.

‘‘सर, बहुत शरारती है. मेरा बेटा बिना मेरे साथ बैठे कुछ नहीं करता. इसलिए रोज आधा घंटा औफिस के साथ थोड़ी बेवफाई करती हूं. सर, आखिरकार नौकरी भी तो फैमिली के लिए ही कर रही हूं.’’

हां हूं करते उस ने अपने दिमाग और जबान में मानो संतुलन बनाया, मगर विचारों ने गति पकड़ ली थी…

वह तो पूरी तन्मयता से नौकरी कर रहा

है… पत्नी और बच्चे उस की राह देख कर थक चुके हैं. उस का बच्चा भी आठ वर्ष का है. पर स्कूल से आने के बाद उस की दिनचर्या का उसे पता नहीं है. रात के भोजन पर ही उन की मुलाकात होती है. बिटिया जरूर लाड़ दिखा जाती है.

‘‘सर,’’ लड़की ने उस के विचारों को लगाम दी.

‘‘हां बोलो.’’

‘‘आप भी हमारे साथ ही लंच किया करें. अच्छा नहीं लगता आप अकेले बैठते हैं.’’

‘‘मैं ज्यादा कुछ नहीं खाता. हैवी ब्रेकफास्ट करता हूं. लंच तो बस नाममात्र का.’’

‘‘सर, कल आइए हमारे साथ. देखिए अगर अच्छा न लगे तो फिर नहीं कहूंगी.’’

अब एक बार सिलसिला चल पड़ा तो खत्म न हुआ… दूर से जैसी दिखती थी उस के विपरीत अंदर से बहुत संवेदनशील दुनिया थी इन लड़कियों की.

कोई टूटी टांग वाली पड़ोसिन आंटी को पूरीछोले पकड़ा कर आ रही है, तो एक शाम को अपनी सहेली के तलाक के लिए वकीलों के चक्कर काट रही है.

यहां से घर जा कर किसी को ननद को मेहंदी लगवाने ले जाना है, किसी को बच्चे को साइकिल के 4 राउंड लगवाने हैं, तो किसी के घर मेहमान आए पड़े हैं, जाते ही नहीं.

फिर भी औफिस में बर्थडे, प्रमोशन, बच्चे का रिजल्ट, हस्बैंड का बर्थडे, शादी की सालगिरह हर दिन लंच टाइम पर एक उत्सव है, इन लड़कियों का. फ्राईडे को इस बात का जश्न कि शनिवार, इतवार छुट्टी है. क्या कमाल की दुनिया है.

सब के पास ढेरों काम हैं, औफिस से पहले भी और घर जा कर भी. औफिस के काम में भी पूरी भागीदारी है. उस के विचार बदलने लग पड़े हैं.

उस की हिचक भी निकलती जा रही है. अब उसे नहीं लगता कि वह औफिस में अकेला मर्द है. घर में पत्नी भी खुश… वह रोज घर जा कर बताता है कि खाना कितना अच्छा बना था. यह तारीफ करना भी इन्हीं देवियों ने सिखाया है.

आज फ्राइडे है. उस ने अपनी ब्लू जींस पहनी, पत्नी देख कर हैरान हुई. पूछा, ‘‘आप औफिस ही जा रहे हैं न?’’

‘‘हां तो क्या हुआ? कभीकभी चेंज अच्छा लगता है.’’

‘‘यह भी सही है,’’ पत्नी ने ऊपरी तौर पर सहमति जताई, जबकि वह जानती थी कि वह कितना जिद्दी है, अपने कपड़ों को ले कर. वह भी   झेंप गया था, पर   झटके से घर से निकल लिया.

रास्ते में बौस का फोन आ गया. वे बोले, ‘‘तुम्हारा ट्रांसफर कर दूं… वापस आना चाहोगे?’’

उस को मानो   झटका सा लगा, ‘‘जैसा आप कहें… मु  झे तो जो आदेश मिलेगा वही पालन करूंगा.’’

‘‘नहीं तुम कह रहे थे औफिस में खाली लड़कियां हैं.’’

‘‘सर, लड़कियां ही तो हैं. क्या फर्क पड़ता है? मु  झे तो अब अच्छा लगता है. रौनक वाली जगह है सर.’’

‘‘हाहाहा,’’ उस के बौस की हंसी गूंज उठी. ऐक्चुअली यह बैस्ट पोस्टिंग है तुम्हारी.’’

‘‘जी सर, आप ठीक कहते हैं… यहां सीखने को बहुत कुछ है,’’ और वह मुसकरा दिया.

Kahani In Hindi : जातपांत की बिसात – मिसेज मालती का धर्म कैसे भ्रष्ट हुआ?

Kahani In Hindi : अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सचाई को सांप के मुंह में छछूंदर सा न उगलते बन रहा था न निगलते. उस का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे?

मिसेज मालती अग्निहोत्री ने घर आए मेहमानों का मुसकराते हुए स्वागत किया और उन्हें सोफ़े पर बैठने का इशारा करते हुए कहा–

“आइए, बैठिए.” फिर बालबच्चों के हाल चाल पूछे और किचन की ओर देख कर आवाज लगाई- “रवींद्र, जरा चायनाश्ता ले आओ और…” उन की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी की रवींद्र चायनाश्ते की ट्रे ले कर ड्राइंगरूम में प्रकट हो गया.

“अरे वाह, मालतीजी, आप का कुक तो बहुत ही एफ़िशिएंट है. बात पूरी होने के पहले ही चाय ले  आया,” मेहमान महिला ने प्रशंसनीय भाव से रवींद्र की ओर देखते हुए कहा.

“वह क्या है न मैडम, जब आप सोसाइटी में दाखिल हुए थे, तभी गार्ड का फोन आया यह बताने के लिए कि मेहमान आ गए हैं. बस, तभी हम ने चाय चढ़ा दी थी,” खीसें निपोरते हुए रवींद्र ने जवाब दिया और मालतीजी ने मुसकराते हुए उसे किचन में जाने का इशारा कर दिया.

मालतीजी के बड़े से घर में 3 पीढ़ियां एकसाथ रहती थीं. उन के सासससुर, उन के पति और  उन के 2 बच्चे. इस भरेपूरे परिवार को मालतीजी 3 नौकरों की मदद से चलाती थीं और बाकी समय अपने सोशल वर्क को देती थीं. रवींद्र के इलावा घर में 2 नौकरानियां थीं और ये सब उन के विला के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते थे.

रवींद्र की तारीफ उन का हर मेहमान करता था. उन की गृहस्थी की गाड़ी को निर्विघ्न चलाने में उस का बड़ा हाथ था. 10 वर्ष पहले पिता की असमय मौत और घर की आर्थिक स्थिति के जर्जर ढांचे ने उस के हाथ से स्कूल का बस्ता छीन कर कढ़ाईचमचा थमा दिया था.

मालतीजी को आज भी वह दिन याद है जब 12 साल के नन्हे से रवींद्र ने पहली बार उन के घर की घंटी बजाई थी. किचन में कुक को खाना बनाने के बारे में निर्देश देती मालतीजी ने नौकरानी को दरवाज़ा खोलने के लिए कहा था. कुछ देर में नौकरानी ने आ कर बताया था कि-

‘एक बच्चा आप की सहेली की नौकरानी के साथ आया है.’

‘ओहो, मैं तो भूल ही गई,’ वे माथे पर हाथ मार कर बोली थीं और उन्हें एक दिन पहले अपनी सहेली के साथ फोन पर हुई वार्त्ता याद हो आई थी जब उन की सहेली कह रही थी- ‘हैलो मालती, तुझ से कुछ बात करनी थी.’

‘हां बोल न, इतना क्या सोच रही है,’ मालती ने अपनेपन से कहा था.

‘वह मेरी मेड है न, मीरा,’ सहेली बोली.

‘हां, क्या हुआ उसे?’ मालती ने व्यग्रता से पूछा.

‘उसे कुछ नहीं हुआ, उस की बहन के पति का ऐक्सिडैंट में देहांत हो गया.’

‘ओ गौड, यह तो बहुत बुरा हुआ. वैसे कौनकौन हैं उस के परिवार में?’

‘परिवार में तो 12 साल का बेटा, 6 साल की बेटी और वह औरत खुद है. लेकिन कमाने वाला अकेला उस का पति ही था,’ सहेली ने बताया.

‘सो सैड, अब वह क्या करेगी?’ मालती ने संवेदना दर्शाते हुए पूछा था.

‘मैं सोच रही थी कि उसे और उस के बेटे को कहीं काम मिल जाता तो उन की जीवन की गाड़ी चल पड़ती,’ सहेली ने जरा सोच कर कहा.

‘बात तो ठीक है. और औरत तो चलो काम कर लेगी, लेकिन 12 साल का बच्चा भला क्या काम कर सकता है?’

‘वो, तू कह रही थी न, कि तेरा कुक बहुत बूढ़ा हो गया है, जल्दीजल्दी काम नहीं कर पाता लेकिन खाना तुम्हें उसी के हाथ का पसंद है?’ सहेली ने कहा.

‘हां यह तो है, लेकिन इस से बच्चे का क्या लेनादेना?’

‘क्यों न तू इस बच्चे को अपने कुक की मदद के लिए रख ले. धीरेधीरे जब तक वह रिटायर्ड होगा तब तक यह बच्चा उस से काम सीख लेगा.’

‘हां बात तो ठीक है, लेकिन तुझे तो पता है न, मेरे सासससुर जातपांत को कितना महत्त्व देते हैं. उन के रहते हुए तो हम हर किसी को किचन में घुसा नहीं सकते.’

‘उस की तू चिंता मत कर. ये लोग उच्च कोटि के ब्राह्मण हैं. यह परिवार बहुत ईमानदार और सरल है. इसीलिए तो मैं चिंतित हूं कि ब्राह्मण जात हैं ये, जाने कहां मारेमारे फिरेंगे.’

‘तू क्या उन्हें पर्सनली जानती है?’ मालती ने हैरानी से पूछा.

‘हांहां, कई बार मेरी मेड के साथ आते रहे हैं. लड़का भी बड़ा प्यारा बच्चा है. हाथ से दिए बिना किसी चीज को छूता तक नहीं है. उस की गारंटी तो मैं भी दे सकती हूं.’

‘ऐसी बात है, तो फिर ठीक है. तू उसे कल सुबह अपनी मेड के साथ मेरे यहां भेज देना. मैं बात कर लूंगी,’ मालतीजी ने हर तरह से आश्वस्त हो कर कहा.

एक दिन पहले कि ये सब बातें याद आते ही मालतीजी ने बच्चे को अंदर बुलवा लिया. फिर कुक को दी जाने वाली अपनी हिदायतों की लिस्ट खत्म कर के ड्राइंगरूम में सोफ़े पर आ कर बैठ गईं.

कुछ देर में एक सलोना सा भोलाभाला चेहरा उन के सामने आ खड़ा हुआ. साफसुथरे कपड़े और करीने से बने तेल लगे बाल देख कर उन्हें अच्छा लगा. अपनी बड़ीबड़ी आंखों में आश्चर्य और असमंजस के भाव लिए यह लड़का मालतीजी के दिल को भा गया था. उसे पास बुला कर उन्होंने प्यार से पूछा-

‘तुम्हारा नाम क्या है?’

‘रवींद्र, मां रवि बुलाती हैं,’ अपने पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदते हुए वह बोला.

‘खाना खाया?’ मालतीजी ने थोड़ा झुक कर उस की आंखों में झांकने की कोशिश करते पूछा.

‘सुबह चाय पी थी,’ उस ने एक बार नजर उठाई और फिर झुका ली.

‘काका, रवींद्र के लिए नाश्ता लाना,’ उन्होंने किचन की ओर देख कर अपने कुक को आवाज लगाई.

आलू के 2 परांठे और एक गिलास दूध खत्म करने में उसे कुछ ही मिनट लगे. मालतीजी ने उस के सिर पर हाथ फिराते हुए पूछा- ‘हमारे घर में रहोगे?’

‘हां,’ वह शरमा कर बोला. शायद उस की मां ने उसे पहले से सब समझा कर भेजा था.

‘ठीक है,’ मालतीजी ने उठते हुए कहा.

फिर अपने कुक को बुला कर उन्होंने रवींद्र को उस के सुपुर्द किया और उसे छोटेछोटे काम समझाने की हिदायत दे कर वे अपने काम में व्यस्त हो गईं.

उस की साफसफाई की आदत और हंसमुख स्वभाव ने जल्द ही घर में अपनी जगह बना ली. हालांकि शुरूशुरू में वह टमाटरप्याज काटने के अलावा कुछ खास मदद नहीं कर पाता था लेकिन धीरेधीरे वह न केवल घर के हर सदस्य के हिसाब से खाना बनाना सीख गया था बल्कि हर सदस्य के मिजाज को भी बखूबी समझने लगा था.

वक़्त के साथ किचन के काम का सारा भार बूढ़े होते कुक के हाथों से निकल कर जवान होते रवींद्र के कंधों पर आ गया था. अब तो कुक को रिटायर हुए कई साल हो चुके हैं और किचन में रवींद्र का एकछत्र राज है. यह काम वह सालों से अकेले ही बड़े सलीके से संभालता आ रहा है.

रवींद्र को अग्निहोत्री परिवार में आए एक अरसा हो चुका था. अब वह इस घर का सदस्य था. उस के बिना मालतीजी का किचन ऐसा था जैसे सिंदूर बिना सुहागन. 12 साल का मासूम बच्चा अब 22 साल के सजीले नौजवान में तबदील हो चुका था.

एक सुबह मालतीजी ने रवींद्र को बुलाया और उसे बताया कि अगले दिन सारा परिवार उन की बहन की बेटी की शादी में दूसरे शहर जा रहा है. सुबह नाश्ते के बाद सब निकलेंगे और 2 दिन बाद लौटेंगे. घर में वही सब से पुराना और जिम्मेदार व्यक्ति था, इसलिए घर का ध्यान रखना और किसी अनजान व्यक्ति को घर में न आने देना उसी की जिम्मेदारी थी.

इस खबर को सुनते ही रवींद्र के चेहरे पर एक हलकी सी मुसकान दौड़ गई जो मालती को बड़ी बेमौका लगी.  लेकिन अपने व्यस्त कार्यक्रम के चलते उन्होंने इस ओर कोई खास तवज्जुह नहीं दी. रवींद्र महीने में एक बार अपनी मां और बहन से मिलने जाता था, बाकी समय वह वहीं बना रहता था. उस के रहते मालती को कभी घर की चिंता नहीं करनी पड़ी थी.

2 दिनों बाद थकन से चूर अग्निहोत्री परिवार घर वापस लौटा. मालतीजी रवींद्र को चाय बनाने के लिए  कह कर अपने बैडरूम की ओर बढ़ गईं. वे अपने बैड पर बैठी ही थीं की उन की नजर अपने बैड के साइड में पड़े यूज़्ड कंडोम पर पड़ी तो वे ऐसे चौंक पड़ीं जैसे उन्हे सांप दिख गया हो. वे तुरंत बैड से उठ गईं और सिर पकड़ कर पास पड़ी कुरसी पर बैठ गईं. फिर खुद से ही बड़बड़ाईं-

‘ओह, यह क्या चल रहा है हमारे पीठपीछे… बैडरूम की चाबी रवींद्र के ही पास थी और कुछ दिनों से रवींद्र के रंगढंग कुछ बदले से लग रहे थे, तो यह करतूत तो उसी की है लेकिन उस के इतनी जल्दी पर निकल आएंगे, यह तो मैं ने कभी सोचा भी न था.’

फिर उन्होंने नौकरानी को आवाज लगाई और उसे तुरंत बैड की चादर, तकिए बदलने का आदेश दिया. नौकरानी ने सवालिया नजर बैड की साफ चादर पर डाली, फिर अपनी मालकिन पर डाली.

चादर बदलो, देख क्या रही हो.’ वे गुस्से में बोलीं.

फिर उन्होंने सोचा, चादर तो ये बदल देगी, लेकिन उस घटना को कौन बदलेगा जो उन की गैरहाजिरी में वहां घट चुकी थी.

मालती अपनी सासुमां के जितनी दकियानूसी और संकीर्ण विचारों वाली तो नहीं थी लेकिन इस तरह का उन्मुक्त सैक्स उन के संस्कारों के दायरे से भी बाहर था. जो पाप हो चुका है उस का वे क्या करें, समझ नहीं आ रहा था. काश, कंप्यूटर की तरह ज़िंदगी में भी कोई ‘अनडू’ का विकल्प होता.

वे रवींद्र को आवाज लगाने ही वाली थीं कि पूछूं तो सही कि उस की ये सब करने की हिम्मत कैसे हुई? उस ने यह पाप कर के अपने और हमारे कुल की मर्यादा को दांव पर कैसे लगा दिया? और ये बेशर्म लड़की कौन थी? और फिर अगर सब ठीक लगा तो उस की शादी ही करवा देंगी.

लेकिन फिर उन्होंने खुद को रोका और सोचा कि चूंकि यह पाप तो रवींद्र ने किया ही है, इस में तो कोई शक नहीं है, लेकिन यदि यह बात सीधेसीधे उस से पूछी गई, तो वह शायद सच न बताए और चौकन्ना भी हो जाए. ऐसे में बात की जड़ तक पहुंचना और भी मुश्किल हो जाएगा. इस से बेहतर तो यही होगा कि कुछ दिन अनजान बनने का नाटक करो और उसे अगली बार रंगेहाथ पकड़ो.

बस, फिर तो अगले दिन से मालती की तेज नजर रवींद्र के हर कदम पर रहने लगी. वह कब, किस से और क्या बात कर रहा है, ये सब मालती की नज़रों के कैमरे में हर समय कैद होता रहता.

एक दिन मालती अपनी बालकनी में बैठी शाम की चाय का आनंद ले रही थी. रवींद्र नीचे सब्जी लाने गया था. तभी उन की नजर नीचे पार्क में एक लड़की से बात करते हुए रवींद्र पर पड़ी.

उन्होंने तुरंत अपना दूर का चश्मा लगाया और लड़की को पहचानने की कोशिश करने लगीं. फिर लड़की को पहचानते हुए हैरानी से बोलीं-

‘यह तो सोसाइटी में झाड़ू लगाने वाली जमादारिन की बेटी है.’

जमादारिन की खूबसूरत बेटी को सोसाइटी में सभी लोग पहचानते थे लेकिन उस की खूबसूरती की गाज़ उन्हीं के घर पर गिरेगी, यह मालती ने कभी न सोचा था.

फिर उन्होंने खुद ही को समझाया, जरूरी तो नहीं कि यही वह लड़की हो. हो सकता है कोई और लड़की हो जो उन की गैरहाजिरी में उन के घर रवींद्र के साथ सोई थी और रवींद्र इस लड़की से ऐसे ही बातें कर रहा हो.

इंसान की फितरत भी कितनी अजीब है, जो बात उस की पसंद के दायरे से बाहर होती है उसे वह अपनी सोच के दायरे में भी नहीं आने देना चाहता. फिर चाहे वह सारी संभावनाओं सहित उस के सामने ही क्यों न खड़ी हो.

अब रवींद्र के बहकते कदमों का खुलासा तो हो ही चुका था, लेकिन समस्या उस के बहकते कदमों से ज्यादा यह थी कि लड़की कौन है? अगर कहीं वह जमादारिन की लड़की के साथ सोया है और उन का सारा परिवार आज भी उसी के हाथ का बना खाना कहा रहा है, तब उन के उच्च कुल के धर्म का क्या होगा?

क्या उन का धर्म भ्रष्ट हो चुका है? यही सब सोचसोच कर मालती का सिर दर्द से फटने लगा था. अब उन से रुका न गया और उन्होंने ने सारी बात अपने पति को जा बताई और फिलहाल अम्माजी से छिपाने की प्रार्थना की.

मामला संगीन था. दांव पर पैसा या फिर जान नहीं लगी थी. दांव पर लगा था उन का धर्म. उच्च कुलीन ब्राह्मण होने का जो दर्प सारे अग्निहोत्री परिवार के माथे पर दमकता था, वह आज खतरे में था.

अब रवींद्र के कदमों पर दो नहीं चार आंखों का पहरा लग गया था. लेकिन रवींद्र के बाजार जा कर सौदासुल्फ लाने के समय पर कैसे नजर रखी जाए, इस का इलाज अग्निहोत्री दंपती खोज ही रहे थे कि उस की जरूरत ही न पड़ी.

सारे सचझूठ, सारी मानना और अवमाननाओं पर फुलस्टौप लगाता रवींद्र अगले ही दिन उस जमादारिन की बेटी के साथ वरमाला पहने उन के द्वार पर आ खड़ा हुआ.

अग्निहोत्री परिवार तो जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटक गया. सांप के मुंह में छछूंदर सा इस सचाई को न उगलते बन रहा था न निगलते.

अब मामला पानी की तरह साफ था. रवींद्र को घर से निकालना तो लाजिमी था. लेकिन एक जमादारिन की बेटी के साथ उन के बैड पर सोना और फिर उन्हीं हाथों से उन के परिवार के लिए खाना बनाना, इस पाप का निवारण कैसे होगा…

काश, इस सचाई को भी वे बैड की चादर की तरह बदल पातीं.

उन का धर्म तो भ्रष्ट हो चुका था, लेकिन भ्रम बनाए रखना जरूरी था. पर कब तक और कैसे? जल्द ही यह बात खुल जाएगी और फिर उन की बिरादरी वाले उन का जीना हराम कर देंगे. बिरादरी में उन का उठनाबैठना बंद कर देंगे. कल को उन के बच्चों के रिश्ते करने में प्रौब्लम  खड़ी करेंगे.

‘ओह, अब हम क्या करें?’ यह सोचसोच कर उन का दिमाग घूम रहा था लेकिन समाधान कहीं दूरदूर तक नज़र नहीं आ रहा था.

क्या यह समस्या सच में रवींद्र की शादी से जुड़ी थी या अग्निहोत्री परिवार की जातपांत की ओछी सोच से?

यह समस्या किसी एक अग्निहोत्री परिवार या किसी एक रवींद्र की नहीं है. यह समस्या है हमारे पढेलिखे समाज के बीच पलती सड़ीगली धार्मिक मान्यताओं की. 21वीं सदी के इस तथाकथित आधुनिक व विकसित समाज की, जो चांद पर पहुंचना तो चाहता है लेकिन जमीनी दलदल से अपने पांव निकालना नहीं चाहता.

यह समस्या जुड़ी है सोकौल्ड स्वर्णों से, जो दलितों के विकास का नारा तो लगा सकते है लेकिन उन को अपने बराबर बिठा नहीं सकते. वे उन्हें उठाना तो चाहते हैं, लेकिन सिर्फ उतना ही जितना स्वर्णों से दबे रहते हुए संभव है.

यह समस्या शुरू होती है हमारी सदियों पुरानी वर्णव्यवस्था से और आ कर रुकती है एक बहुत बड़े प्रश्नचिन्ह पर कि आखिर क्या है दलितों का विकास और क्या मतलब है समानता के अधिकार का? इंसान और इंसान के बीच यह फर्क आखिर कब तक बना रहेगा और क्यों? Kahani In Hindi

Story In Hindi : प्रतिक्रिया – मंत्री महोदय क्यों खुश थे?

Story In Hindi : ‘‘गाड़ी जरा इस गांव की तरफ मोड़ देना, सुमिरन सिंह,’’ कार में बैठेबैठे ही मंत्रीजी की आंख लग गई थी, पर सड़क पर गड्ढा आ जाने से उन की नींद खुली. दूर एक गांव के कुछ घर दिखे, अत: तुरंत मन में विचार आया कि क्यों न जा कर गांव वालों से मिल लिया जाए, आखिर वोट तो यही लोग देते हैं.

सुमिरन सिंह ने तुरंत कार गांव की ओर मोड़ दी. मंत्रीजी की कार घूमते ही उन के पीछे चल रहा कारों का पूरा काफिला भी घूम गया. गांव में इतनी बड़ी संख्या में कारें, जीपें आदि कभी नहीं आई थीं, अत: यह काफिला देखते ही गांव में हलचल सी मच गई. जिसे देखो मुखिया के बगीचे की ओर भागा चला जा रहा था, जहां मंत्रीजी का काफिला उतरा था. मुखिया व गांव के अन्य प्रभावशाली लोग मंत्रीजी की खुशामद में लगे थे.

‘‘कहिए, खेती- बाड़ी की दशा इस बार कैसी है. कोई समस्या हो तो मंत्रीजी से कह डालिए,’’ सुमिरन सिंह, जो मंत्री महोदय के सचिव व संबंधी दोनों थे, बोले.

थोड़ी देर उस भीड़ में हलचल सी हुई. फिर तो शिकायतों का ऐसा तांता लगा कि मंत्री स्तब्ध रह गए. गांववासी पीने का पानी, स्कूल, अस्पताल आदि सभी समस्याओं का समाधान चाहते थे. मंत्रीजी ने अपने सचिव से सब लिखने को कहा तथा अपने साथ आए अधिकारियों को कुछ निर्देश भी दे डाले.

‘‘गुजरबसर कैसी होती है? केवल खेती से काम चल जाता है?’’ चलते समय मंत्रीजी ने एक और प्रश्न पूछ डाला.

‘‘कभीकभी मजदूरी मिल जाती है या गायभैंस आदि पालते हैं. दूध व घी बेच कर काम चलाते हैं. अब आप से क्या छिपाना, आप तो माईबाप हैं,’’ मुखिया बोला.

‘‘मजदूरी के लिए तो शहर जाते होंगे, गांव में क्या मजदूरी मिलती होगी?’’ सुमिरन सिंह बोले.

‘‘सरकार की दया से कुछ न कुछ निर्माण कार्य चलता ही रहता है. आजकल 2-3 किलोमीटर दूर सड़क निर्माण कार्य चल रहा है. वहां आधे से अधिक लोग हमारे गांव के ही हैं. सूखा पीडि़तों के लिए ही यह कार्य आरंभ किया गया है,’’ मुखियाजी ने सूचित किया.

‘‘चलिए, क्यों न एक बार सड़क निर्माण कार्य का भी निरीक्षण कर लिया जाए. गांव वालों को भी लगेगा कि आप को उन की कितनी चिंता है,’’ जरा सा आगे बढ़ते ही सुमिरन सिंह ने मंत्री को सलाह दी.

‘‘आप कहते हैं तो वहां का भी चक्कर लगा लेते हैं. वैसे भी आज रूपगढ़ पहुंचना कठिन है. किसी विश्रामगृह में पड़ाव करना होगा,’’ मंत्रीजी ने सचिव की बात का समर्थन किया.

सड़क निर्माण स्थल पर मंत्रीजी को देखते ही भीड़ लग गई. सब एकदूसरे से आगे बढ़बढ़ कर अपनी बात कहना चाहते थे.

‘‘आप को मजदूरी कितनी मिलती है?’’ मंत्रीजी ने पास खड़े एक मजदूर से पूछा.

‘‘10 रुपए मिलते हैं, सरकार,’’ श्रमिक ने उत्तर दिया.

‘‘क्या कह रहे हो भाई? क्या तुम नहीं जानते कि सरकार ने न्यूनतम मजदूरी 16 रुपए निश्चित की हुई है? आप अपने मालिक पर दबाव डाल सकते हैं कि वह आप को न्यूनतम मजदूरी दे,’’ मंत्रीजी श्रमिक को समझाते हुए बोले.

‘‘सरकार, हम ठहरे अनपढ़ और गंवार, यह कायदाकानून क्या जानें. आप खुद ठेकेदार को बुला कर  उसे आज्ञा दें तो वह आप की बात कभी नहीं टालेगा,’’ एक श्रमिक ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘और महिलाओं को कितनी मजूदरी मिलती है?’’ सुमिरन सिंह ने महिलाओं से पूछा.

‘‘हमें तो पुरुषों से भी कम मिलती है. वह भी ठेकेदार की इच्छा पर है, कभी कम दे दिया कभी ज्यादा,’’ महिला श्रमिकों ने उत्तर दिया.

‘‘यह तो सरासर अन्याय है. सुमिरन सिंह, आप इस संबंध में पूरी जांच कीजिए…इन सब को न्याय मिलना चाहिए.’’ मंत्रीजी ने अपना निर्णय सुनाया.

‘‘कहां है ठेकेदार? उसे बुला कर लाओ. मंत्रीजी अभी फैसला कर देते हैं.’’

सुमिरन सिंह का आदेश पा कर श्रमिक इधरउधर भागे, पर कुछ क्षण पहले वहीं खड़ा ठेकेदार मौका मिलते ही न जाने कहां खिसक गया था. मंत्री महोदय के साथ आए लोगों ने भी उसे ढूंढ़ने का काफी प्रयत्न किया और उस के न मिलने पर सड़क निर्माण कार्य से संबंधित अधिकारी मधुसूदन को मंत्रीजी के सामने ला खड़ा किया.

‘‘आप के रहते यह कैसे संभव है कि इन बेचारों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती,’’ मधुसूदन को देखते ही मंत्रीजी गरजे.

‘‘मजदूरी आदि किसे, कब और कितनी दी जाएगी इस सब का निर्णय ठेकेदार ही करता है, हम इन सब बातों में दखल नहीं देते,’’ मधुसूदन ने निवेदन किया.

‘‘यों बहाने बना कर आप कर्तव्यमुक्त नहीं हो सकते. एक सरकारी कर्मचारी के समक्ष इतना बड़ा अन्याय होता रहे और वह कुछ न करे? बड़े शर्म की बात है. मैं तो ठेकेदार से अधिक अपराधी आप को समझता हूं,’’ मंत्रीजी ने उसे लताड़ा.

मधुसूदन चुप रह गया. वह जानता था कि मंत्री के सम्मुख कोई भी तर्क देना व्यर्थ होगा. उसे स्वयं पर ही क्रोध आ रहा था कि वह इस समय मंत्रीजी के सामने पड़ा ही क्यों.

‘‘यह देखना कि इन सब को न्यूनतम मजदूरी मिले, आज से आप का कार्य है. मुझ तक इन की कोई शिकायत नहीं पहुंचनी चाहिए,’’ मंत्रीजी ने मानो अंतिम निर्णय सुनाया.

‘‘नहीं पहुंचेगी, साहब. मैं इन की शिकायतों का पूरापूरा खयाल रखूंगा,’’ मधुसूदन का आश्वासन सुन कर मंत्रीजी कुछ शांत हुए.

यथोचित आदरसत्कार के पश्चात मंत्रीजी विदा हुए तो मधुसूदन ने चैन की सांस ली. फिर उस ने तुरंत अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को आज्ञा दी कि ठेकेदार को उन के समक्ष उपस्थित किया जाए.

ठेकेदार को देखते ही वह आगबबूला हो उठे. उसे खूब खरीखोटी सुनाई.

ठेकेदार चुपचाप सब सुनता रहा. मधुसूदन से झाड़ खा कर वह सीधे मजदूरों के बीच पहुंचा. मजदूरी बढ़ने की उम्मीद से उत्पन्न प्रसन्नता से उन के चेहरे दमक रहे थे.

‘‘मैं जो कुछ कहने जा रहा हूं ध्यान से सुनिए. मुझे सड़क निर्माण कार्य के लिए श्रमिकों की आवश्यकता नहीं है. निर्माण कार्य कुछ समय के लिए रोक दिया गया है,’’ कहते हुए ठेकेदार ने अपनी बात समाप्त की.

कुछ क्षण तक तो वहां ऐसी निस्तब्धता छाई रही मानो सब को सांप सूंघ गया हो. सब के मन में एक ही बात थी कि यह क्या हो गया? मंत्री महोदय तो मजदूरी बढ़ाने की बात कह गए थे पर यहां तो रोजीरोटी से भी गए.

कुछ बुजुर्ग मिल कर ठेकेदार से मिलने भी गए पर उस ने साफ कह दिया कि जब कार्य ही रोकना पड़ रहा है तो वह इतने श्रमिकों का क्या करेगा.

श्रमिकों की इन समस्याओं से बेखबर मंत्री महोदय ने विश्रामगृह में रात बिताई. मंत्रीजी व उन के दल के अन्य लोग अत्यधिक संतुष्ट थे कि किस प्रकार वे तीव्र गति से समस्याओं का समाधान कर रहे थे.

‘‘आगे का क्या कार्यक्रम है, साहब?’’ जलपान आदि कर लेने के बाद सुमिरन सिंह ने पूछा.

‘‘आज हमें रूपगढ़ पहुंचना है. वहां 2-3 उद्घाटन हैं और एक विवाह में सम्मिलित होना है.’’

‘‘रूपगढ़ तो हम जाएंगे ही, पर मार्ग में कुछ अन्य निर्माण कार्य भी चल रहे हैं. अगर वहां होते हुए चलें तो आप को कोई आपत्ति तो नहीं,’’ सुमिरन सिंह बोले, ‘‘देखिए, कल सड़क निर्माण वाले मजदूरों की समस्या आप ने चुटकियों में हल कर दी. बेचारे आप को दुआ दे रहे होंगे.’’

‘‘जो व्यक्ति तुरंत निर्णय न ले सके, जनता की समस्याओं का समाधान न कर सके उसे नेता कहलाने का कोई अधिकार नहीं.’’ मंत्री महोदय गद्गद होते हुए बोले.

‘‘ठीक है, फिर हमारा अगला पड़ाव उस निर्माण स्थल पर होगा जहां एक पुल का निर्माण कार्य चल रहा है,’’ सुमिरन सिंह बोले.

‘‘ठीक है, आखिर उन लोगों के प्रति भी हमारा कुछ कर्तव्य है,’’ मंत्रीजी ने स्वीकृति देते हुए कहा.

मंत्रीजी दलबल सहित पुल निर्माण स्थल पर पहुंचे तो हलचल सी मच गई. सब उसी स्थान की ओर दौड़ पड़े, जिस छोटी सी पहाड़ीनुमा जगह पर मंत्री महोदय खड़े थे.

इतने सारे उत्सुक श्रोताओं को देख कर मंत्रीजी ने एक भाषण दे डाला. उस भाषण में उन्होंने भविष्य का इतना सुंदर चित्रण किया कि श्रमिक अपनी वर्तमान समस्याओं को भूल ही गए.

इसी खुशी भरे माहौल में मंत्रीजी श्रमिकों से अनौपचारिक बातचीत करने लगे और तभी उन्होंने प्रश्न किया कि प्रतिदिन प्रति श्रमिक को कितनी मजदूरी मिलती है?

श्रमिकगण मानो इसी प्रश्न की प्रतीक्षा कर रहे थे. अब उन लोगों में मंत्रीजी को यह सूचना देने की होड़ लग गई कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी से कहीं अधिक दर की मजदूरी मिलती है. यही नहीं, उन्हें अन्य भी बहुत सी सुविधाएं प्राप्त हैं. स्त्री व पुरुषों में मजदूरी के संबंध में भेदभाव नहीं होता. सभी को समान मजदूरी मिलती है आदि.

एक क्षण को मंत्रीजी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. वह तो मन ही मन ठेकेदार को लताड़ने की तैयारी कर चुके थे. सुमिरन सिंह को पहले से हिदायत दे दी गई थी कि ठेकेदार व संबंधित अधिकारी उस समय वहीं उपस्थित रहने चाहिए. पर यहां पूरी बात ही उलटी हो गई थी.

अंतत: उन्होंने श्रमिकों को बधाई दी कि उन्हें इतना अच्छा मालिक मिला है. ठेकेदार को भी श्रमिकों के प्रति उस के सज्जन व्यवहार के लिए बधाई दी तथा दलबल सहित रवाना हो गए.

ठेकेदार आज बहुत प्रसन्न था. उस ने सभी श्रमिकों के लिए मिठाई की व्यवस्था की थी. श्रमिक भी अत्यंत प्रसन्न थे कि उन्होंने मंत्रीजी के सम्मुख सबकुछ ठीकठाक कहा था. केवल एक कोने में सड़क निर्माण कार्य के वे मजदूर खड़े थे, जिन्हें काम से निकाल दिया गया था और उन्होंने ही आ कर यहां सारी सूचना दी थी. उधर मंत्रीजी इन सब से बेखबर रूपगढ़ की ओर बढ़े जा रहे थे. Story In Hindi

Hindi Stories Love : सागर से मुझको मिलना नहीं है

Hindi Stories Love : गंगा गांव की एक भोलीभाली और बेहद खूबसूरत लड़की थी. उस की मासूम खूबसूरती को वैसे तो शब्दों में ढालना बहुत ही मुश्किल है, पर यह समझ लीजिए कि गंगा को देख कर ऐसा लगता था, जैसे खेतों की हरियाली उसी पर छाई हुई है…

अल्हड़, मस्त गंगा पूरे गांव में घूमतीफिरती… कभी गन्ना चूसते हुए, तो कभी बकरी के बच्चे को पकड़ने के लिए… गांवभर के मुस्टंडे आंखें

भरभर कर उसे देखा करते और ठंडी आहें भरते थे, पर गंगा किसी को घास नहीं डालती थी.

गांव के सरपंच के बेटे की शादी का मौका था… सरपंच के घर खूब रौनक थी… दूरदराज के गांवों से भी ढेरों मेहमान आए थे.

गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह और सरपंच में गहरी दोस्ती थी, सो गंगा का पूरा परिवार उस शादी में घराती के रोल में बिजी था. कई सारे इंतजाम लक्ष्मण सिंह के ही जिम्मे थे…

गंगा की मां पार्वती घर के कामों को निबटाने में सरपंच की पत्नी का हाथ बंटा रही थी. गंगा के लिए तो यह शादी जैसे कोई त्योहार, कोई उत्सव जैसी थी… नएनए कपड़े पहनना, सजनासंवरना और नाचगाने में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना…

‘‘अरी ओ गंगा… कुछ काम भी कर लिया कर… सारा दिन यहां से वहां मटकती फिरती है…’’ पार्वती ने कहा.

‘‘अरी अम्मां, काम करने के लिए तू तो है… अभी तो मेरी खेलनेकूदने की उम्र है,’’ गंगा खिलखिलाते हुए बोली.

‘‘देख तो… ताड़ जैसी हो गई है… कल हाथ पीले हो गए, तो अपनी ससुराल में खिलाएगी… पत्थर…’’ पार्वती गुस्सा दिखाते हुए बोली.

‘‘अम्मां… तू फिक्र मत कर… मेरी ससुराल में नौकरचाकर होंगे… मैं नहीं करूंगी कोई कामधाम,’’ गंगा ने तपाक से जवाब दिया.

‘‘तेरे मुंह में गुड़ की डली मेरी लाडो… तेरी खातिर ऐसी ही ससुराल देखेंगे…’’ बीच में गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह बोले.

‘‘यह लो… सेर को सवा सेर. समझाने के बजाय उस की हां में हां मिला रहे हो… ओ गंगा के बापू… क्यों इतना सिर चढ़ा रहे हो… लड़की जात है… दोचार गुण सीख लेगी तो ससुराल में काम आएंगे…’’ गंगा की मां तुनक कर बोली.

‘‘क्यों इस के पीछे पड़ी रहती हो… जब ब्याह होएगा… तो सब अपनेआप सीख जाएगी…’’ लक्ष्मण सिंह ने कहा.

‘‘बापू… यह देखो… यह घाघरा और चोली सिलवाई है… अम्मां की बनारसी साड़ी से… कैसी है बापू?’’ गंगा ने पिता से पूछा.

‘‘बहुत बढि़या है… मेरी लाडो एकदम रानी लगती है रानी…’’ लक्ष्मण सिंह खुश होते हुए बोले.

गंगा लहंगाचोली को अपने तन से लगा कर हिलहिल कर खुद को निहार रही थी.

शाम को सरपंच के यहां से बरात निकलनी थी. गंगा के मांबापू पहले ही वहां पहुंच चुके थे. गंगा सजसंवर कर जब वहां पहुंची, तो सब के मुंह खुले के खुले रह गए…

हर कोई गंगा को ही देख रहा था… सब को अपनी तरफ देखते हुए देख कर गंगा शरमा गई. शर्म के मारे उस के गाल और गुलाबी हो गए…

दूसरे गांवों के सरपंच भी वहां आए हुए थे. सीमन गांव के सरपंच और उन का बेटा निहाल भी इस शादी में आए थे… निहाल बांका जवान था. गठा हुआ शरीर और रोबदार चेहरामोहरा… झबरीली मूंछें और गुलाबी होंठ.

गंगा और निहाल ने एकसाथ एकदूजे को देखा. निहाल से नजरें मिलते ही गंगा का दिल जोरजोर से धड़कने लगा और निहाल तो बस एकटक गंगा को ही देखे जा रहा था… मानो उस की आंखें गंगा के सिवा कुछ देखना ही नहीं चाहती हों.

‘‘चलो चलो… जल्दी करो… वर निकासी का समय हो गया,’’ किसी ने कहा.

गंगा और निहाल की तंद्रा टूटी. बरात गई और बरात वापस भी आ गई… लेकिन गंगा और निहाल तो जैसे एकदूसरे में ठहर गए थे… प्यार का बीज फूट चुका था.

‘‘गंगा…’’ किसी ने धीरे से गंगा को पुकारा.

गंगा ने देखा कि एक कोने में निहाल खड़ा था… उस ने गंगा को इशारा किया कि घर के पीछे आ जाओ.

गंगा का दिल जोर से धड़क रहा था, पर निहाल से मिलने की बेताबी भी थी… सब से नजरें बचा कर गंगा घर के पिछवाड़े में पहुंच गई, जहां निहाल बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘गंगा…’’ निहाल ने गंगा के कान में कहा.

गंगा का पूरा शरीर सिहर गया… मानो निहाल की सांसें, खून के साथ उस की धमनियों में बहने लगी हों.

‘‘हम आज अपने गांव वापस जा रहे हैं,’’ निहाल ने गंगा से कहा.

यह सुन कर गंगा की आंखों में आंसू आ गए और उस ने पलकें उठा कर निहाल को देखा.

‘‘अरी पगली, रोती क्यों हो… अब मैं तुम्हें ब्याह कर हमेशा के लिए साथ ले जाऊंगा,’’ निहाल ने गंगा के आंसू पोंछते हुए कहा.

गंगा थरथर कांप रही थी. निहाल ने उस का माथा चूम लिया. गंगा को ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ था. वह लता की तरह निहाल से लिपट गई.

निहाल उसे उठा कर पिछवाड़े में मवेशियों के लिए बनी कोठरी में ले गया. गंगा सुधबुध खो बैठी थी और निहाल बेताब था. उस अंधेरी कोठरी में अचानक बिजलियां चमकीं… कई सारे जुगनू टिमटिमाने लगे… जज्बातों की बारिश जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रही थी… बांध टूट गए…

कुछ ही पलों में सबकुछ शांत था, मानो एक भयंकर तूफान आया और फिर थम गया, जो छोड़ गया कुछ निशानियां… जिन्हें अब गंगा समेटरही थी.

‘‘गंगा, मैं जल्दी ही आऊंगा और तुम्हें अपनी दुलहन बना कर ले जाऊंगा,’’ निहाल बोला.

गंगा शांत थी. उसे कुछ कहनेसुनने का समय ही न मिला. निहाल फुरती से कोठरी से बाहर निकल गया.

गंगा पिघली जा रही थी. निहाल के प्यार और इस अनोखे एहसास से घिरी गंगा कोठरी से बाहर निकली. निहाल अपने पिता के साथ वापस गांव के लिए निकल चुका था.

गंगा नहीं जानती थी कि जिस पर उस ने अपना सबकुछ लुटा दिया है, वह कौन है, किस गांव का है और उसे लेने कब आएगा.

मदमस्त लहराती चंचल गंगा एकाएक शांत और गंभीर हो गई थी. रातदिन आहट रहती कि अब निहाल आए या उस की कोई खबर ही आ जाए… कई महीने बीत गए, पर निहाल नहीं आया.

पार्वती और लक्ष्मण सिंह समझ नहीं पा रहे थे कि खिलीखिली सी उन की बेटी क्यों पलपल मुरझा रही है.

नदी किनारे बैठ आंसू बहाती गंगा हताश हो गई… उस का धीरज अब जवाब दे चुका था. अम्मांबापू का ब्याह के लिए जोर देना… जैसे गंगा को भीतर ही भीतर मार रहा था.

एक दिन नदी की आतीजाती लहरों को देखतेदेखते जाने कौन सा तूफान गंगा के दिल में उठा कि उस ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा डूबने लगी. उस का दम घुटने लगा. सांसें उखड़ने लगीं. एकाएक हाथपैर मारती गंगा के हाथ में लकड़ी का एक भारी लट्ठा आ गया. गंगा उस के सहारे तैर कर नदी के किनारे आ गई.

पानी में कूदने, डूबने और मौत का सामना कर लौटी गंगा के मन में एक ही विचार बारबार कौंध रहा था कि जानबूझ कर पानी में कूदने या अनजाने में पानी में गिरने पर इनसान कितना छटपटाता होगा… कितनी तकलीफदेह मौत होती होगी… उस समय उसे अगर एक लकड़ी मिल जाए… तो कितनों की जान बच सकती है… बस, उस ने कुछ सोच कर जंगल से लकडि़यां तोड़ीं और उन से एक नाव तैयार की और उतार दी नदी में.

अब गंगा ने तय किया कि उस की जिंदगी का एक यही मकसद होगा… वह इस नाव से सब को पार लगाएगी और डूबतों के प्राण बचाएगी…

गंगा अब ‘नाव वाली गंगा’ कहलाने लगी. गरीब जरूरतमंदों को नदी पार कराने वाली गंगा… डूबतों की जान बचाने वाली गंगा…

अम्मांबापू की उस के आगे एक न चली. गंगा ने शादी करने से साफ मना कर दिया. कह दिया कि ब्याह की बात की तो वह नदी में कूद कर अपनी जान दे देगी. अम्मांबापू ने हार मान ली.

महीने बीते… साल गुजरे… नाव वाली गंगा नहीं बदली. वह डटी रही नदी किनारे… पार करवाती रही नदी… न जाने कितनी जानें बचाईं उस की नाव ने.

इस बार बारिश बहुत हुई. कई गांव के खेतखलिहान, घरजमीन सब बाढ़ की भेंट चढ़ गए. गंगा के गांव में भी बाढ़ ने तहलका मचाया, लेकिन गंगा औरों की तरह गांव छोड़ कर भागी नहीं, बल्कि बाढ़ में डूबे लोगों को बचा कर उन की देखरेख करती रही.

बाढ़ का पानी अब उतार पर था. गंगा अपनी नाव के साथ नदी किनारे बैठी थी कि तभी किसी ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा ने लपक कर अपनी नाव उस तरफ चला दी. उस ने देखा कि एक नौजवान डूब रहा था, घबरा कर हाथपैर मार रहा था.

गंगा ने पास पहुंच कर उसे बड़ी मुश्किल से अपनी नाव पर चढ़ा लिया और उस की पीठ दबा कर पानी निकाला.

‘‘क्यों कूदे…?’’ गंगा ने औंधे पड़े उस नौजवान से पूछा.

‘‘मेरा तो सबकुछ लूट गया है. खेतखलिहान, घरजायदाद सब बरबाद हो गया और परिवार भी… सब बह गए. अब मैंजी कर भी क्या करूंगा… क्यों बचाया तुम ने?’’ उस  नौजवान ने उलटा लेटे हुए ही जवाब दिया.

‘‘तूफान तो आते हैं और चले जाते हैं… पर इस का यह मतलब तो नहीं है कि जिंदगी खत्म हो गई. एक तूफान से क्या घबराना. हिम्मत करो और फिर जीना शुरू करो. हो सकता?है कि कुछ बहुत अच्छा हो जाए…’’ गंगा ने कहा.

इतना सुन कर वह नौजवान पलटा. गंगा का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘निहाल…’’ गंगा बुदबुदाई.

‘‘गंगा…’’ निहाल गंगा को देख कर हैरान रह गया.

‘‘मैं ने तुम्हें धोखा दिया. उसी

की सजा मुझे मिली है,’’ निहाल रोते हुए बोला.

गंगा की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे.

‘‘गंगा, क्या तुम मुझे एक मौका और नहीं दोगी?’’ निहाल ने गंगा की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

गंगा अवाक थी. उस ने निहाल पर एक तीक्ष्ण निगाह डाली और बोली, ‘‘तुम ने पश्चाताप कर लिया. इस से तुम्हारे तनमन का मैल धुल गया है, लेकिन तुम्हारा और मेरा मेल मुमकिन नहीं है. आओ, तुम्हें नदी किनारे लगा दूं, क्योंकि बीच मंझधार में छोड़ना मेरी फितरत नहीं है.’’

निहाल को नदी किनारे पर उतार कर गंगा की नाव चल पड़ी. निहाल देखता रहा दूर तक, उथली लहरों पर गंगा को चप्पू चलाते हुए.

नदी की कलकल से मानो यही आवाज सुनाई दे रही थी :

‘सागर से मुझ को मिलना नहीं है,

सागर से मिल कर मैं खारी हो जाऊंगी.’ Hindi Stories Love 

Health Update : शिफ्ट की नौकरी और शरीर की घड़ी – कैसे रखें तालमेल

Health Update : आज के दौर में शिफ्ट में काम करना आम होता जा रहा है- कभी सुबह, कभी रात तो कभी दोपहर की शिफ्ट. हालांकि यह काम की मांग के अनुसार जरूरी हो सकता है, लेकिन इस का असर शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली यानी बौडी क्लौक पर पड़ता है. लगातार बदलती दिनचर्या नींद, भोजन, हार्मोन संतुलन और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है.

शोध बताते हैं कि शिफ्ट में काम करने वालों में अवसाद, चिंता और अनिद्रा की समस्या अधिक होती है. रात में काम करने से डीएनए की मरम्मत करने वाले जीन की कार्यक्षमता घटती है, जिस से गंभीर रोगों का खतरा बढ़ता है. मेटाबोलिज्म बिगड़ने के कारण कब्ज, अपच और सिरदर्द आम हो जाते हैं. त्वचा संबंधी समस्याएं जैसे मुहांसे और झुर्रियां भी नींद की कमी और हार्मोन असंतुलन से जुड़ी हैं.

इस के अलावा, लगातार शिफ्ट बदलने से तनाव हार्मोन (जैसे कोर्टिसोल) की मात्रा बढ़ जाती है, जिस से चिड़चिड़ापन, उच्च रक्तचाप और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर पड़ने लगती है, जिस से व्यक्ति डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है.

हालांकि, कुछ सरल आदतें अपना कर इस स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है:

– शिफ्ट रोटेशन हर सप्ताह की बजाय कुछ महीनों में करें, ताकि शरीर अनुकूलन कर सके.
– एनर्जी ड्रिंक्स की जगह पानी, हल्की चाय या कौफी लें और पर्याप्त ब्रेक के दौरान हल्का टहलें.
– स्क्रीन से आंखों को हर घंटे कुछ मिनट का विश्राम दें और सीधे बैठने की आदत डालें.
– गहरी नींद के लिए अंधेरे और शांत कमरे में सोएं.
– रात की शिफ्ट में हल्का व प्रोटीनयुक्त भोजन करें, साथ ही फल और नट्स लें.
– रोजाना व्यायाम करें जिस से चिड़चिड़ापन कम हो और एकाग्रता बढ़े.

सही जीवनशैली अपना कर शिफ्ट में काम करने के बावजूद एक स्वस्थ और संतुलित जीवन संभव है.

Sad Hindi Story : जाने के बाद – उजड़े सिंदूर से व्यथित पत्नी

Sad Hindi Story : काश, यह सपना ही होता क्योंकि मेहंदी का रंग हलका भी नहीं हुआ था, मन की हसरतें पूरी भी न हुई थीं और प्रियांश का पार्थिव शरीर कल्याणी के सामने था.

बाहर मीडिया का शोर है. उस से ज्यादा शोर कल्याणी के हृदय में मच रहा है. कितना कुछ है उस के भीतर, उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि वह कहां है. एक पल वह कमरे में चल रहे एसी से खुद को यकीन दिलाती है कि वह पहाड़ों की ठंडी हवाओं में नहीं, मैदानी इलाके में वापस लौट आई है और दूसरे ही पल उसे लगता है कि उस ने एक खौफनाक सपना देखा है और नींद खुल जाने से उस की जान बच गई है. कभी उस के जेहन में खयाल आता है कि अभी उस की शादी ही कहां हुई हैं, अभी तो उस के हनीमून की जगह ही फाइनल नहीं हो पाई है.
प्रियांश भी तो फोन पर यही कह रहा था- ‘सुनो, एक बात तो पूछनी ही रह गई?’
‘यही घंटाभर पहले ही तुम ने कितने प्रश्न किए थे- कौन सा रंग पसंद है? कौन सी मिठाई पसंद है? कौन सी किताब पसंद है? अब और क्या रह गया है? मुझे तो लगता है तुम्हारी कोई गर्लफ्रैंड कभी रही ही नहीं.’
‘तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?’
‘क्योंकि जो बातें तुम मुझ से पूछते हो न, वह टीनऐजर एकदूसरे से पूछते हैं. हमारी 2 महीने में शादी होने वाली है. कुछ मैच्योर बातें करो.’
‘तुम्हीं बता दो न फिर, वह मैच्योर बातें,’ प्रियांश ने कहा.
‘हम लोग हनीमून पर कहां चलें, यह पूछो तो लगे भी कि होने वाले पतिपत्नी की बातें हैं.’
‘ओह हां, दरअसल पूछना तो यही चाहता था मगर वह गले में अटक कर रह जा रहा था,’ प्रियांश ने झिझक कर कहा.
‘सो स्वीट, तुम कितने सौम्य हो, वह गाना सुना है- ‘बड़ा भोला सा है दिलबर…’ मुझे तो लगता है कि तुम शादी के बाद भी मुझ से पूछे बिना मेरा हाथ नहीं पकड़ोगे, कहोगे, ‘सुनो, क्या मैं तुम्हारा हाथ थाम सकता हूं’.’
‘उड़ा लो मजाक, शादी के बाद ही तुम्हें पता चलेगा कि मेरी पकड़ कितनी मजबूत है. अभी तो तुम पराई ही हो मेरे लिए. एक बार हमारी शादी हो जाए, फिर देखना, मेरे हाथों की पकड़. अरे देखो न, जो पूछना था वह तो रह ही गया.’
‘हनीमून की जगह न? मैं हनी हूं और तुम मून हो. जब हम दोनों एकसाथ हो जाएंगे तो वह जगह हनीमून की, अपनेआप ही हो जाएगी. उस के लिए क्यों परेशान हो?’ कल्याणी खिलखिलाई.
‘तो ठीक है मैं बेकार ही एक हफ्ते से टूर एंड ट्रैवल के साथ माथापच्ची करने में लगा हुआ था. सोच रहा था कि तुम्हें सरप्राइज दूंगा. लेकिन मेरे दोस्त तिमिर ने कहा, ‘यार, ऐसी गलती न करना. मैं ने अपनी सुहागसेज लाल गुलाब से भर दी थी और मेघना की छींकछींक कर हालत खराब हो गई. पता चला कि उसे गुलाब क्या हर फूल से एलर्जी है. वह दवा खा कर सो गई और अपनी सुहागरात की ऐसीतैसी हो गई.’
‘अब समझ आया कि फल, फूल, मिठाई के बहाने तुम मेरी एलर्जी का पता लगाना चाहते हो. तो सुनो, न तो मुझे किसी फल, फूल से एलर्जी है और न ही पहाड़ की चोटियों व समुद्र की गहराइयों में जाने से कोई डर या फोबिया है.’
‘तब ठीक है, मैं ने अंडमान और कश्मीर यानी या तो अपने देश के नक्शे में टौप पर या एकदम चरणों में बिछे हुए आइलैंड को फाइनल किया हुआ है. दोनों में से कौन सी जगह है, अब यह सीक्रेट रहेगा,’ प्रियांश ने उत्साह से भर कर कहा.
‘अभी 2 महीने बाकी हैं, देखती हूं तुम्हारे पेट में कितने दिनों तक बात पचती है.’

कल्याणी की आंखें नींद से बो?िल होने लगीं. दवा का असर होने लगा था. मानसिक तनाव घटने से वह नींद की गहराइयों में चली गई.
‘बहनजी, ये गुलाबी लहंगा सगाई के दिन के लिए तो ठीक है मगर शादी के दिन के लिए यह हलका है. यह वाला लहंगा देखिए. यह चटक लाल रंग, इस में जरदोजी और मोतियों का कितना सुंदर काम है. इधर नजर डालिए, इस के निचले भाग में पूरी बरात ही सजी है- डोली ले जाते कहार, आगे शहनाई वादक, डोली के पीछे नाचतेगाते बराती,’ दुकानदार सुभाष पूरी ताकत लगा कर दुकान के सब से कीमती लहंगे को आज ही बेच देना चाहता था. इस परिवार को वह बरसों से जानता है. बड़ी बहन विमिता, भाई आलोक सभी की शादी की शौपिंग उस के शोरूम में आए बिना पूर्ण हो न सकी.
‘ऐसा ही आप ने मेरी शादी पर भी कहा था कि ऐसा लहंगा, बस, एक ही पीस बना है. बाद में मेरी सहेली गौतमी ने भी अपनी शादी में वैसा ही लहंगा पहना हुआ था,’ विमिता तुनक कर बोली.
‘आप ने पूछा नहीं उस से कि उस ने वह लहंगा कहां से खरीदा था?’ सुभाष आज लहंगे को बेचे बिना कहां हार मानने वाला था.
‘आप की दुकान से ही तो लिया था,’ विमिता तुनक कर बोली.
‘आप की शादी की फोटो साथ में ले कर आई थी कि उसे भी ऐसा ही लहंगा बनवाना है, पीछे ही पड़ गई थी. जरा आप ही सोचिए, वह पूरे शहर में लहंगा पसंद करने तो गई ही होगी, फिर भी आप के लहंगे से बेहतर न मिला होगा. तभी तो जिद कर के वैसा ही बनवाया. लेकिन आप की शादी से पहले किसी के पास देखा आप ने ऐसा लहंगा?’
‘हां यह बात तो सही कही आप ने, मेरे लहंगे की कशीदाकारी की तो ससुराल में भी बड़ी चर्चा हुई थी,’ विमिता ने कहा.

‘सुन रही हैं कल्याणी बहन,
आज इस लहंगे को फाइनल कर दीजिए. आप के लिए ही खास तैयार करवाया है. आप बहनों की पसंद तो बचपन से ही हमें पता है, सब से अलग, हट कर है. आप को हुनर की कद्र भी है और समझ,’ सुभाष को लहंगा किसी भी तरह आज बेचना ही है.
‘मुझे इस का रंग कुछ ज्यादा ही चटख लग रहा है,’ कल्याणी हिचकिचाती
हुई बोलीं.
‘अरे बहन, अभी तो उम्र है चटख पहनने की. वह क्या कहते हैं कि मौका भी है और दस्तूर भी. आप के लिए 5 परसैंट डिस्काउंट.’
‘ओके, इसे तैयार करवा दीजिए.’
कल्याणी ने करवट बदली और नींद खुल गई. बैड में अभी भी सूखे फूलों की डोरियां लटकी हुई थीं जिन्हें देख कर कल्याणी की आंखों से आंसू गिरने लगे. वह वर्तमान में लौट आई थी.
तभी कमरे का दरवाजा खुला, विमिता हाथ में भोजन की थाली उठाए चली आ रही थी.
‘‘क्या प्रियांश आ गए?’’ आंखों से बहते आंसुओं को पोंछती हुई कल्याणी ने कहा.
थाली को बैड के साइड टेबल पर रख कर विमिता ने उस के आंसू पोंछे और उस के होंठों की तरफ पानी का गिलास बढ़ाते हुए कहा, ‘‘कल सुबह तक आ जाएंगे,’’
‘‘वे ठीक तो हो जाएंगे न?’’ कल्याणी ने उस के हाथ को बीच में ही रोक कर पूछा.
‘‘हां श-शायद,’’ कहते हुए उस की जबान लड़खड़ा गई.
‘‘ठीक ही होंगे, उन्हें कुछ नहीं हो सकता. मैं भी तो बच गई न उस गोलाबारी के बीच. बहुत से बच गए. सब दौड़ पड़े थे न. प्रियांश को तो गोली लगी थी, वे पीछे रह गए थे. बाद में सब को अस्पताल ले कर गए थे न वे लोग. उन्हें भी ले कर गए थे. वे लोग कह रहे थे, तुम चिंता मत करो, उसे कुछ नहीं होगा,’’ कल्याणी बड़बड़ाने लगी.

विमिता उस की बात में हांहां कहती हुई उस के मुंह में रोटी के दोचार कौर ठूंसने में सफल हो गई.
‘‘सुनो न, वे आतंकवादी उन्हीं घने पेड़ों के जंगल से अचानक निकल कर आए थे जहां सब लोग रील बना रहे थे. गोलियां चलने लगीं, सब भागने लगे. कुछ लोगों को 4 लोगों ने घेर लिया, वहीं पर शूट कर दिया. हम भी हाथ पकड़ कर भागे लेकिन तब तक इन के कमर में गोली मार दी गई थी. मेरे हाथों में भी खून ही खून हो गया था.’’
‘‘मुंह खोलो, यह दवा खा लो,’’ उस की बारबार दोहराई जाने वाली बातों को विमिता ने बीच में ही काट दिया.
कल्याणी अपने मेहंदी रचे हाथों को घूरघूर कर देखने लगी, फिर उठ कर वाशबेसिन में हैंडवाश से हथेलियों को रगड़रगड़ कर धोने लगी मानो हाथों में लगे खून को साफ करना चाह रही हो.
विमिता जो कल से अपनी छोटी बहन की इसी कहानी और हरकत को दोहराते हुए देख रही थी, अपने आंसुओं को पोंछ कर कल्याणी को संभालने के लिए उठी और उस के हाथों को तौलिए से पोंछते हुए बोली, ‘‘यह देखो, तुम्हारे हाथ एकदम साफ हैं, इन में कुछ नहीं लगा है.’’
‘‘मेहंदी लगी हुई है, देखो न, कितनी गहरी रची है. वह तुम्हारी फ्रैंड गौतमी क्या कह रही थी, याद है?’’
‘‘नहीं, मुझे कुछ याद नहीं,’’ विमिता ने कहा.
‘‘यही कि जिस की मेहंदी जितनी गहरी रचती है, उस का पति उसे उतना ही ज्यादा प्यार करता है. सच है एकदम. ये भी मुझे बहुत प्यार करते हैं. यह देखो, मेरी मेहंदी का रंग इसी बात का सुबूत है,’’ कल्याणी की बहकीबहकी बातें सुन कर विमिता का कलेजा मुंह को आने लगा.

उस ने कल्याणी को बिस्तर पर लिटा दिया. उस का माथा दबाती हुई बोली, ‘‘सो जा, बहन. सुबह बहुत से काम करने होंगे.’’
‘‘कौन से काम, मैं कोई काम नहीं करूंगी. कल तो प्रियांश भी अस्पताल से घर आ जाएंगे. वे तो कहते हैं, ‘मैं तो तुम्हें रानी बना कर रखूंगा,’’ कल्याणी बुदबुदाने लगी. दवा के असर से उस की आंखें बंद होने लगीं.
विमिता ने उस के कमरे की रोशनी धीमी कर दी और खाने की थाली ले कर बाहर निकल गई.
तेज पटाखों की रोशनी व शोर, बैंडबाजों की धुनों के बीच घोड़ी पर सवार प्रियांश, उस के दरवाजे बाजेगाजे के साथ पहुंच गया. कल्याणी अपनी छत से उसे देख रही है. नीचे दूल्हे की द्वारचार की रस्म चल रही है.
‘चल कल्याणी, बहुत देख ली अपनी बरात,’ उसे गौतमी ने छेड़ा.
‘‘चल उठ, कल्याणी,’’ विमिता ने उसे जगा दिया.
‘‘प्रियांश, प्रियांश कहां हैं?’’
‘‘बाहर चलो, सभी वही हैं.’’
‘‘लेकिन मैं तो अभी तैयार नहीं हुई. इतनी जल्दी बरात कैसे आ गई, क्या मेरी विदाई ऐसे ही हो जाएगी?’’ कल्याणी ने पूछा.
‘‘तेरी नहीं, प्रियांश की अंतिम विदाई है. जा बहन, उस के अंतिम दर्शन कर ले. वह आतंक का शिकार हो गया है. उसे आने में इसीलिए देर हुई क्योंकि बहुत सी कानूनी कार्यवाही पूरी करनी थी. तुझे तो ग्रुप के साथ पहले भेज दिया गया था. होश में आ, कल्याणी.’’
‘‘तुम झूठ कह रही हो, अभी मेरी शादी ही कहां हुई, अभी तो सिर्फ बरात ही आई है,’’ कल्याणी सच को स्वीकारने की स्थिति में
नहीं थी.
कल्याणी के आगे उस के विवाह कार्ड को लहराते हुए विमिता ने कहा, ‘‘याद कर, एक हफ्ते पहले ही तेरी शादी हुई है. फिर तुम लोग कश्मीर घूमने गए थे और वहीं आतंकवादी हमले में जो लोग शहीद हो गए उन्हीं में एक तेरा, हमारा, हम सब का प्यारा प्रियांश भी था. इस सच को स्वीकार कर लो, बहन. पिछले एक हफ्ते में तेरी जिंदगी इतनी तेजी से भागी है कि तेरे दिलोदिमाग पर गहरा असर हो चला है,’’ विमिता उसे सहारा दे कर बाहर के कमरे में ले आई.
उस कमरे से बाहर गेट तक प्रियांश के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देने के लिए लोगों की कतारें लगी हुई थीं. मीडिया के फ्लैश उसे देखते ही चमकने लगे.
मीडियाकर्मी उस के मुंह पर माइक लगाने को उतावले हो उठे, ‘‘आप बताइए कि यह सब कैसे हुआ?’’
‘‘सब से पहले आतंकियों ने किसे गोली मारी थी?’’
‘‘आप के साथ और कौनकौन था?’’
‘‘कितने आतंकी थे? आप ने उन का चेहरा देखा था या उन के मुंह ढके हुए थे?’’
‘‘उन का हुलिया, मतलब, पहनावा कैसा था?’’
‘‘नहीं, यह सच नही है. कहो कि सब झुठ है,’’ कल्याणी चीत्कार कर उठी और प्रियांश के पार्थिव शरीर से लिपट गई. उस के माथे को बारबार चूमती हुई कहने लगी, ‘‘उठो
प्रियांश, कहो न, कहो प्रियांश, यह सब झुठ है.’’
‘‘मेरे बस में होता तो इस घटना को झुठला देती,’’ कह कर विमिता उस के गले लग कर, फफक कर रो पड़ी. Sad Hindi Story

Hindi Love stories : लिस्ट – रिया ने कविश में क्या देखा

Hindi Love stories : साधारण रंगरूप वाले कविश पर कोई ध्यान न देता था. लेकिन कालेज की सब से खूबसूरत लड़की रिया ने जब उस से दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाया तो वह हैरान रह गया. आखिर ऐसा क्या देखा रिया ने कविश में ?

घड़ी पर नजर पड़ते ही कविश ने जल्दी से नाश्ता किया और कालेज जाने की तैयारी करने लगा. वह बीए सैकंड ईयर में पढ़ रहा था. कालेज की तैयारी वह बहुत इत्मीनान से करता था. उस का रूपरंग साधारण था, रंग थोड़ा दबा हुआ. उस की कोशिश रहती कि कालेज स्टूडैंट्स खासकर लड़कियां उसे देखें. लेकिन उस के साधारण व्यक्तित्व को देख कर कोई भी प्रभावित नहीं होता था. उसे इस बात का बड़ा मलाल रहता.
ड्रैसअप होने के बाद उस ने मेज पर रखा हैलमेट उठाया. उस के साथ घर के सामान की लिस्ट रखी हुई थी जिसे देख कर उसे बड़ा गुस्सा आया. उस ने कई बार मम्मी से कहा भी कि उसे कालेज से आते हुए सामान लाने को न कहा करें लेकिन वह आदत से मजबूर थीं.
अब वह उस से न कहतीं, हैलमेट के साथ लिस्ट रख देती थीं और साथ में रुपए भी. उस ने खिन्न हो कर रुपए और परची जेब में रखी व मोटरसाइकिल स्टार्ट कर कालेज के लिए निकल गया.
उस का कालेज करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर था. कालेज पहुंच कर भी मम्मी को ले कर उस का रोष कम न हुआ था. उसे हमेशा लगता कि मम्मी उसे प्यार नहीं करतीं. उस की छोटी बहन ताशा को वह ज्यादा प्यार करतीं. वह दिखने में मम्मी जैसी सुंदर और गोरीचिट्टी थी. पढ़ने में भी हमेशा अव्वल रहती. उसे मलाल होता कि औरों की तरह उस की मम्मी लड़के को ज्यादा भाव न दे कर ताशा को सिर पर चढ़ा कर रखतीं. घर का कोई काम होता है तो वह ताशा की जगह उसे ही करने को कहतीं.
मम्मी की देखादेखी बड़ा होने पर भी ताशा उसे इज्जत न देती. वह भी उस पर हुक्म चलाती. कालेज में उस का जिगरी दोस्त रोशन था. क्लास खत्म कर वह बाहर निकला तो उसे रोशन कहीं दिखाई न दिया. पता लगा, आज वह कालेज नहीं आया था. उदास हो कर वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया. सामने उस की क्लास के लड़कों का ग्रुप बैठा था.
उस के सामने अपनी फ्रैंड के साथ रिया बैठी थी. वे बीचबीच में एकदूसरे पर कमैंट पास कर रहे थे. रिया क्लास की सब से खूबसूरत लड़की थी. हर कोई उस से दोस्ती करना चाहता था.
कविश की भी उस से बात करने की इच्छा होती. अपने अंदर की कुंठा के कारण वह उस से बात करने में झिझक जाता. रिया और उस की फ्रैंड भी उस की ओर कभी नजर उठा कर न देखते. कविश दूर से उन की चुहलबाजी देख रहा था. घड़ी पर नजर पड़ते ही कविश क्लास की ओर बढ़ गया. कुछ देर बाद वे सब भी क्लास में चले गए.
आर्यन अपने दोस्त पीयूष के साथ अभी भी वहीं बैठा था.
‘‘चलो, क्लास में चलते हैं.’’
‘‘छोड़ यार, मैं कालेज क्लास अटैंड करने नहीं, मस्ती करने आता हूं. कौन सा मुझे पढ़लिख कर नौकरी करनी है.’’
‘‘तुम्हें न सही, मुझे तो करनी है.’’
‘‘तुझे किस ने रोका है? आराम से क्लास में जा. तब तक मैं इधरउधर कालेज में घूम रही खूबसूरत तितलियों के दीदार करता हूं.’’
‘‘तू जानता है, मैं तुझे छोड़ कर नहीं जा सकता, इसीलिए ऐसी बात कह रहा है. अपनी खातिर न सही, मेरी खातिर क्लास में चल. वहां भी बहुत सारी रंगीन तितलियां हैं.’’
न चाहते हुए भी आर्यन उस के साथ क्लासरूम की ओर बढ़ गया. उस ने सर की नजर बचा कर रिया को कुछ इशारा किया और सब से पीछे की बैंच पर जा कर बैठ गया. रिया भी मुड़मुड़ कर उसे देख रही थी. कविश सब से पहले आ कर क्लासरूम में बैठ गया था. उस का ध्यान पढ़ाई पर था. क्लास खत्म होते ही वह सीधे घर की ओर बढ़ गया. रास्ते में उसे मंडी से जरूरी सामान लेना था. मम्मी की सख्त हिदायत थी कि वहां सामान सस्ता मिलता है, इसीलिए वहीं से सामान लाया करो. वह अपनी स्थिति अच्छे ढंग से जानता था कि उस की मम्मी सीमित साधन में घर चला रही थीं.

उस के कहने पर इतना ही बहुत था कि उन्होंने उसे मोटरबाइक दिला दी थी. इस से उन्हें भी आराम हो गया था और कविश को भी. वरना उन्हें खुद रिकशा से जा कर सामान लाना पड़ता. वह एकसाथ घर का सामान ले कर आ जाती थीं. अब उसे बाइक दिला कर वह हर काम उसी से करवातीं. उस पर सामान लादने में उसे हिचक महसूस होती थी. उसे यही डर लगा रहता, कहीं कालेज का कोई साथी उसे इस तरह न देख ले. एक मोटरसाइकिल ही थी जिस की वजह से उस का थोड़ा सा मनोबल ऊंचा रहता था. शुक्र था कि किसी ने उसे देखा नहीं था. घर आ कर उस ने राहत की सांस ली. मां रोहिणी उसी का इंतजार कर रही थी.
‘‘सारे रुपए खर्च हो गए?’’
‘‘200 बचे हैं. मुझे पैट्रोल के लिए चाहिए.’’
‘‘ठीक है.’’

कविश ने मां से ज्यादा बात नहीं की. वह उस से नाराज था. अकसर जब भी वह सामान लाता, उस दिन वह मां से ज्यादा बात न करता. उस का मूड उखड़ा रहता. यह बात रोहिणी भी अच्छी तरह जानती थी. वह उस की नाराजगी को ज्यादा भाव न देती. रोहिणी ने चुपचाप सामान अंदर रखा और उस के लिए मेज पर खाना रख दिया. तभी ताशा भी आ गई. उसे चुप देख कर वह बोली, ‘‘क्या हुआ भैया, किसी से झगड़ा हो गया?’’
‘‘चुपचाप खाना खा ले.’’
‘‘आप मुझ से इस तरह बात क्यों करते हैं? कभी तो प्यार से बोल दिया करिए.’’
‘‘मम्मी है न तुम से बात करने के लिए. तुम्हें क्या फर्क पड़ता है मैं तुम से बात करूं या न करूं?’’ बहस बढ़ती देख कर रोहिणी ने उसे चुप रहने का इशारा कर दिया. खाना खा कर वह अपने कमरे में आ गया और मोबाइल पर रोशन से बात करने लगा. उसे घर पर जरूरी काम था, इसी वजह से आज कालेज नहीं आया था.
दोस्त से बात कर उस का मूड कुछ हलका हो गया था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनों के बीच और साथियों के बीच अपनी अच्छी इमेज कैसे बनाए. कोई उसे कुछ समझता ही नहीं था. घर पर मम्मी और ताशा उसे ज्यादा भाव न देतीं और कालेज में सहपाठी. एक रोशन ही था जो उस की भावनाओं को समझता था, शायद इसलिए कि उस के पास बाइक थी और वह उसे अपने साथ कालेज लाता, ले जाता था.
रात तक उस का मूड कुछ ठीक हो गया था. यह देख कर रोहिणी ने 2 दिन तक उसे बाजार से कुछ लाने के लिए नहीं कहा. लेकिन ऐसा कब तक चलता. हफ्तेभर बाद उस ने फिर उसे एक लिस्ट थमा दी. उसे देख कर कविश का मूड फिर से खराब हो गया. कालेज पहुंच कर उस का जी कर रहा था कि वह उसे फाड़ कर फेंक दे. उस ने लिस्ट ले कर उस की फोटो खींची. दुकानदार के सामने वह लिस्ट ले कर अपनेआप को किसी से कमतर नहीं दिखाना चाहता था. लिस्ट अभी उस के हाथ में थी.

तभी हलकी हवा चली और लिस्ट उड़ कर दूर चली गई. सामने से रिया आ रही थी. उस ने वह लिस्ट उठा ली. यह देख कर कविश धक्क रह गया. उसे लगा, इसे पढ़ कर वह जरूर उस का मजाक उड़ाएगी. वह उसे ले कर उस के पास आई और बोली-
‘‘यह लो तुम्हारी लिस्ट.’’
‘‘थैंक यू.’’
‘‘लगता है घर के काम की जिम्मेदारी तुम पर है.’’
‘‘पापा बाहर नौकरी करते हैं, मम्मी की मदद करनी पड़ती है.’’
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. तुम्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास है. आजकल जवान होते ही युवा घर की ओर कोई ध्यान नहीं देते.’’
कविश को इसी बहाने रिया से बात करने का मौका मिल गया था. वह अपने बारे में उसे ज्यादा से ज्यादा बताना चाहता था.
‘‘मम्मी और छोटी बहन की जिम्मेदारी मुझ पर है, इसीलिए उन के काम में हाथ बंटाता हूं.’’
‘‘मुझे यह जान कर अच्छा लगा,’’ रिया बोली और लिस्ट उसे थमा कर आगे बढ़ गई.
कविश सपने में भी नहीं सोच सकता था कि कागज का यह छोटा सा टुकड़ा वह काम कर देगा जो वह पिछले एक साल से नहीं कर पाया था. उस ने उसे चूम लिया और फिर संभाल कर अपनी जेब में रख लिया. अभी क्लास में 5 मिनट का समय था तब तक रोशन भी वहां आ गया.
‘‘आज बड़े खुश दिखाई दे रहे हो. पहली बार कालेज कैंपस में तुम्हारे चेहरे पर इतनी चमक देख रहा हूं.’’
‘‘बात ही कुछ ऐसी है,’’ कह कर उस ने अभी कुछ देर पहले की घटना सुना दी.
‘‘रिया एक अच्छी लड़की है. वह जानती है किस के साथ कैसी बात करनी है.’’
‘‘मैं समझता था वह आर्यन जैसे लड़कों का साथ पसंद करती है. आज उस ने मेरे साथ बहुत अच्छे ढंग से बात की. मैं कभी इस की कल्पना भी नहीं कर सकता था.’’
‘‘टाइम हो गया. बातें बाद में भी हो जाएंगी. क्लास में चलते हैं.’’
दोनों उठ कर क्लास में आ गए. आज वह पीछे की बैंच पर बैठा था. बातों में उसे थोड़ी देर हो गई थी. रिया ने जैसे ही पलट कर देखा, उस ने एक प्यारी सी मुसकान उस की ओर उछाल दी. यह देख कर वह भी हौले से मुसकरा दी. आज उस का ध्यान पढ़ाई से हट कर रिया पर ही लगा था.
क्लास खत्म होने के साथ वे दोनों कालेज से बाहर आ गए. उस ने पहले रास्ते में रोशन को छोड़ा और उस के बाद मंडी की ओर सामान लेने को मुड़ गया. आज पहली बार उसे सामान लेने में खुशी हो रही थी. घर भी वह अच्छे मूड के साथ पहुंचा था. उस ने सामान उठा कर मेज पर रखा और आवाज लगाई, ‘‘मम्मी, भूख लगी है, खाना लगा दो.’’ इतनी देर में वह हाथ धोने चला गया.

उस का बदला हुआ रूप देख कर रोहिणी हैरान थी. कुछ कह कर वह उसे परेशान नहीं करना चाहती थी. इतना तो वह समझ गई थी कि जरूर कोई बात हुई है जिस की वजह से सामान ला कर भी वह खुश था.
‘‘ताशा नहीं आई?’’
‘‘आ रही होगी. कभीकभी औटो न मिलने की वजह से देर हो जाती है. तुम खाना खा लो वरना खाना ठंडा
हो जाएगा.’’
वह मम्मी से ढेर सारी बातें करना चाहता था लेकिन वह वहां से हट कर किचन में सामान समेटने चली गई थी. तभी ताशा आ गई. आज उस के आने पर कविश को अच्छा लगा था. खाना खाते हुए वह बोला, ‘‘तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है?’’
‘‘आज आप को मेरी पढ़ाई की कैसे याद आ गई?’’
‘‘तुम पढ़ाई में अच्छी हो, इसीलिए जानना चाहता था. कुछ महीने बाद तुम्हारे बोर्ड एग्जाम हैं. इस बार तुम्हें पूरे स्कूल में टौप करना है.’’
‘‘वह तो मैं हर बार करती हूं, भैया. कोई नई बात नहीं है.’’
‘‘मैं तो मेहनत कर के भी अच्छे नंबर नहीं ला पाता. एक तुम ही हो जिस पर सब की उम्मीदें टिकी हैं.’’
‘‘ऐसा नहीं सोचते, भैया. आप मेहनती हैं. मेहनत की बदौलत जरूर कुछ कर लेंगे.’’
‘‘और तुम पढ़ाई की बदौलत एक दिन बहुत बड़ी शख्सियत बनोगी.’’

दोनों भाईबहनों को इस तरह हंसते हुए बात करते देख रोहिणी को अच्छा लग रहा था वरना तो ताशा को देख कर उस का मूड खराब हो जाता था. खाना खा कर वह अपने कमरे में आ गया था. वह अभी तक रिया के खयालों में खोया हुआ था.
कविश रिया से दोस्ती बढ़ाना चाहता था. आज 2 मिनट के लिए ही सही उस से बात कर के उसे बड़ा सुकून मिला था. अगले दिन वह समय से पहले आ कर कालेज गेट के पास ही खड़ा था. रिया को देखते ही उस ने हैलो कहा. बदले में उस ने प्यारी सी मुसकान के साथ हैलो का जवाब दे दिया. तभी वहां आर्यन आ गया और वह उस के साथ बातें करते हुए आगे बढ़ गई. उसे अच्छा लगा था कि रिया ने आज उस की तरफ देख कर उस की हैलो का जवाब दे दिया था. उस ने सोच लिया, एक दिन वह उस के दिल में अपनी जगह बना कर रहेगा.
इतना रिया भी जानती थी कि आर्यन टाइमपास के लिए कालेज आता था लेकिन कविश पढ़ाई को ले कर सीरियस था. अकसर वह क्लास में फर्स्ट लाइन में बैठा रहता और ध्यान से सर की बातें सुनता. रिया पढ़ने में औसत थी. उस ने भी कभी पढ़ाई को गंभीरता से नहीं लिया था. एक दिन क्लास से निकलते हुए रिया बोली, ‘‘कविश, तुम ने वर्मा सर के नोट्स तैयार किए हैं?’’
‘‘थोड़ाबहुत किए हैं.’’
‘‘वैसे तो सबकुछ अब इंटरनैट पर मिल जाता है.’’
‘‘उस की बात और होती है और सर की पढ़ाई की बात कुछ और है.’’

‘‘देखती हूं, तुम बहुत ध्यान से उन्हें सुनते हो. मुझे लगा, तुम ने जरूर अच्छे नोट्स तैयार किए होंगे. हो सके तो कुछ मुझे भी दे देना. मेरा भी भला हो जाएगा,’’ रिया मुसकरा कर बोली तो कविश एकटक उसे देखने लगा.
‘‘ऐसे क्या देख रहे हो?’’
‘‘तुम हंसते हुए बहुत अच्छी लगती हो.’’
‘‘यह तो बहुत घिसापिटा डायलौग है. रोमियो छाप लड़के इस का इस्तेमाल करते हैं. तुम्हें कुछ हट कर कहना चाहिए था.’’
‘‘सौरी, आइंदा इस बात का ध्यान रखूंगा.’’
‘‘चलती हूं,’’ कह कर वह आगे बढ़ गई.
वह रिया को दूर तक जाते हुए देखता रहा. उस ने सोच लिया, घर जा कर वह सब से पहले वर्मा सर की क्लास के नोट्स तैयार करेगा. ये उस के लिए भी अच्छे रहेंगे और इसी बहाने वह रिया को भी प्रभावित कर सकेगा. घर आ कर उस ने जल्दी से खाना खाया और उस के बाद नोट्स की तैयारी में लग गया. रोहिणी को समझ नहीं आ रहा था कि आजकल कविश को क्या हो गया है. वह घर पर भी दोनों से प्यार से बात करता और पढ़ाई पर भी ज्यादा ध्यान देने लगा था.

वह चाह कर भी उस से कुछ नहीं पूछ सकी. रात देर तक बैठ कर उस ने बहुत तैयारी कर ली. अब वह पहले के मुकाबले अपनेआप को आत्मविश्वास से भरा हुआ महसूस करता. उस की चाल में भी यह सब झलकने लगा था. मम्मी के सामान की लिस्ट अब उसे परेशान न करती और वह खुशीखुशी घर के काम निबटा देता. ताशा से उस की शिकायत दूर हो गई थी. वह भी अपनी बातें भाई के साथ बांटने लगी थी.
हफ्तेभर की मेहनत में कविश ने सारे नोट्स तैयार कर दिए थे. उस ने सारी बातें रोशन को बता दी थीं. वह भी उस के लिए खुश था. शनिवार का दिन था. उस ने आज रिया को नोट्स देने के बारे में सोच लिया था. वह क्लास के बाहर उस का इंतजार कर रहा था.
कालेज से निकलते हुए पहले रिया को आर्यन ने रोक लिया. उस की बातों से निबट कर वह आगे बढ़ी. कविश को सामने देख कर उस ने पूछा, ‘‘किसी का इंतजार कर रहे हो?’’
‘‘तुम्हारा कर रहा था. मैं ने वर्मा सर के सारे नोट्स तैयार कर लिए हैं.’’
‘‘थैंक यू, तुम ने मेरी बहुत बड़ी मुश्किल हल कर दी. उन का पढ़ाया हुआ मुझे बिलकुल भी समझ नहीं आता. मैं इस विषय में हमेशा पिछड़ जाती हूं.’’
‘‘बुरा मत मानना, रिया, नोट्स देने से पहले मेरी एक शर्त है.’’
‘‘पढ़ाई पर भी शर्त?’’
‘‘जरूरी है. मैं ने ये नोट्स बहुत मेहनत से तैयार किए हैं केवल अपने और तुम्हारे लिए. प्लीज, इन्हें किसी और को मत देना. उन्हें भी मेहनत करनी आनी चाहिए.’’
‘‘तुम ठीक कहते हो. मेहनत तो मुझे भी करनी चाहिए थी लेकिन मैं इस काम में दिल नहीं लगा पाती. मैं तुम्हारी बात का खयाल रखूंगी,’’ रिया बोली तो कविश ने उसे नोट्स थमा दिए.
‘‘वैसे, मैं इन्हें मेल पर भी भेज सकता था लेकिन हार्ड कौपी में पढ़ने में आसानी रहती है. संभाल कर रखना.’’
‘‘चिंता मत करो, मैं इन की परवा अपने से भी ज्यादा करूंगी. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. जानती हूं इस काम में बहुत मेहनत लगती है.’’
‘‘मेरे लिए कोई और काम हो तो बेझिझक कहना.’’
‘‘है न एक काम. तुम ने इतनी मेहनत की है तो कम से कम एक कप कौफी तो साथ पी सकते हैं. चिंता मत करो, तुम्हें बिल भरने को नहीं कहूंगी. यह काम मुझे करना है. मुझे मेहनती इंसान बहुत पसंद हैं. भले ही मैं खुद इस से जी चुराती हूं.’’
‘‘तुम्हें मेरे साथ बाइक पर चलने में कोई झिझक तो नहीं.’’
‘‘झिझक कैसी, अब हमतुम दोस्त हैं.’’
यह सुन कर कविश की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने बाइक पर किक मारी. बाइक पर बैठ कर रिया ने उस के कंधे पर हाथ रख दिया. उस का स्पर्श पा कर उसे लगा जैसे वह धरती पर नहीं, आकाश की सैर कर रहा है. उस के ख्वाबों को पंख लग गए थे. आज उस की दिली तमन्ना पूरी हो गई थी.
कुछ दूर आ कर रिया बोली, ‘‘सामने वाले रैस्टोरैंट की कौफी बहुत अच्छी होती है. चलो वहीं चलते हैं.’’

न चाहते हुए भी कविश ने बाइक की स्पीड कम की और उस ओर मुड़ गया. वह उस के साथ और कुछ देर बाइक पर घूमना चाहता था. किनारे की मेज पर बैठते ही रिया ने कौफी का और्डर दे दिया था और साथ में कुछ स्नैक्स भी मंगा लिए. उस की हालत देख कर रिया समझ गई कि वह पहली बार किसी लड़की के साथ बैठ कर कौफी पी रहा है.
‘‘मेरे साथ यहां बैठने में डर तो नहीं लग रहा?’’
‘‘कैसा डर, यह तो मेरे लिए खुशी की बात है.’’
‘‘आराम से कौफी पियो. मुझे घर जाने की कोई जल्दबाजी नहीं है. मम्मीपापा दोनों जौब करते हैं. घर पर इस समय कोई नहीं रहता.’’
‘‘घर पर मम्मी और बहन इंतजार कर रही होंगी, उन दोनों को मेरी चिंता रहती है. वे खाना तभी खाती हैं जब मैं घर जाता हूं.’’
‘‘तुम्हारे लिए यह बहुत खुशी की बात है कि तुम्हारे पास ऐसी मम्मी है. हमारे घर पर चंपा सुबह खाना बना कर चली जाती है. जो जब आता है तभी खा लेता है. रात में ही हमारी कभीकभी मुलाकात होती है.’’
‘‘ऐसी जिंदगी का भी अपना ही मजा है.’’
‘‘यह मजा ज्यादा देर सुकून नहीं देता. अपनों का अभाव बहुत खलता है. छोड़ो इन बातों को, तुम आगे चल कर क्या करना चाहते हो?’’
‘‘पहले ग्रेजुएशन पूरी करूंगा, फिर कंपीटिशन की तैयारी. देखो, समय कहां ले जाता है. तुम ने क्या सोचा?’’
‘‘मेरे पापा का बिजनैस है. सोचती हूं वही जौइन कर लूंगी. मुझे कुछ और करना होता तो आर्ट्स न लेती.’’
‘‘इस में क्या बुराई है. विषय तो सभी एकजैसे होते हैं. सब की अपनी अहमियत है.’’
‘‘तुम्हारी बात में दम है लेकिन आजकल यही समझ जाता है जो पढ़ने में होशियार है वह साइंस, कौमर्स ले कर चलता है. बाकी सब्जैक्ट तो मात्र डिग्री लेने के लिए होते हैं.’’
‘‘ऐसा नहीं है, मेहनत तो सभी में करनी होती है.’’
‘‘पढ़ाईलिखाई छोड़ कर कुछ और बात करो.’’
‘‘क्या करूं, समझ नहीं आता. मैं एक साधारण लड़का हूं. आज से पहले किसी लड़की के साथ ऐसे बात नहीं की.’’
‘‘आंटी ने तुम्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं. छोटी उम्र में ही तुम्हें जिम्मेदार बना दिया. इस के आगे रूपरंग माने नहीं रखता,’’ रिया बोली.
कौफी खत्म हो चुकी थी. कविश ने रिया को उस के घर छोड़ दिया था. इसी बहाने उस ने रिया का घर भी देख लिया था. आज का दिन कविश की जिंदगी में बहुत माने रखता था. घर देर से पहुंचने पर रोहिणी ने पूछा, ‘‘इतनी देर कहां लगा दी कविश?’’
‘‘दोस्त के साथ कौफी पीने चला गया था. आप खाना लगा दो, मुझे भूख लगी है.’’

बिना किसी लागलपेट के उस ने अपनी बात मम्मी से कह दी. ताशा तब तक खाना खा चुकी थी. वह बोली, ‘‘एक बात कहूं, भैया, अब आप बहुत खुश दिखाई देते हैं. आप के व्यक्तित्व में काफी परिवर्तन आ गया. ऐसी क्या बात हो गई?’’
उस की बात सुन कर वह मुसकरा दिया, बोला, ‘‘जैसा तू सोच रही है ऐसा कुछ नहीं है.’’
‘‘मैं भी यह कहना चाहती थी, कविश. कुछ तो है जिस ने तुझे बदल दिया.’’
‘‘मुझे किसी ने नहीं बदला, मम्मी. आप ने बदला है.’’
‘‘यह क्या कह रहा है?’’
‘‘मेहनत की कद्र करनी आप ने मुझे सिखाई. आप जानती थी कि रूपरंग, कदकाठी और योग्यता के बल पर मैं किसी को प्रभावित नहीं कर पाऊंगा.’’
‘‘तुम्हें हमेशा ताशा से शिकायत रहती थी. मैं जानती हूं वह पढ़ने में होशियार है और दिखने में खूबसूरत भी. अपनी इन 2 खूबियों के बल पर वह किसी को भी प्रभावित कर सकती है लेकिन तुम केवल मेहनत के दम पर अपना मुकाम हासिल कर सकते हो, इसीलिए मैं ने शुरू से तुम्हें मेहनत करने के लिए मजबूर किया.’’
‘‘मैं आज तक तुम्हें गलत समझता रहा, मम्मी. अब समझ में आया, मम्मी कभी गलत नहीं हो सकती.’’
‘‘देर से ही सही, तुम्हें मुझ पर विश्वास तो आया.’’
‘‘मम्मी, मेरी रिया से दोस्ती हो गई है,’’ कह कर उस ने सारी बातें उन्हें बता दीं.
रोहिणी के मन की मुराद पूरी हो गई. वह कविश के लिए बहुत खुश थी. वह जानती थी, कविश एक साधारण लड़का है जो मेहनत के बलबूते अपनी मंजिल हासिल कर सकता है. इसीलिए वह हमेशा उस के ऊपर जिम्मेदारियां डालती रहती थी.
इस वजह से उसे काम करने की आदत पड़ी. रिया ने समय पर उस की पहचान कर ली. इस से ज्यादा अच्छी बात और क्या हो सकती थी.
अब कविश को हैलमेट के साथ सामान की लिस्ट का भी इंतजार रहता. Hindi Love stories

Hindi Stories Love : अभिलाषा – क्या मजबूरी थी देव की

Hindi Stories Love : अचला ससुराल आते ही 2 बच्चों की सौतेली मां बन गई, खुद मां बनने की इच्छा रहरह कर उस के मन में उठने लगी थी. लेकिन पति चाह कर भी उस की इच्छा पूरी नहीं कर सकता था.

स्कूल जाती हुई गीतू को अचला बहुत देर तक अपलक निहारती रही. फाटक के पास पहुंचते ही गीतू मां को टाटा करने लगी. मां के होंठों पर हलकी सी मुसकराहट आ गई और वह भी प्रत्युत्तर में टाटा करने लगी.
गीतू के जाते ही वह वहीं बरामदे में पड़ी कुरसी पर बैठ गई और पास रखे हुए गमलों को देखने लगी. एक गमले में बेला का फूल था, दूसरे में गुलाब का. वह सोचने लगी, ‘दोनों पौधों के गमले अलगअलग हैं, लेकिन मैं…’
तभी उसे पैरों की आहट सुनाई दी. उस ने पलट कर देखा तो देव को समीप खड़े पाया. उस ने एक बार देव की ओर, फिर गमलों की ओर देखा और फिर वह तुरंत ही देव की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगी.
देव ने पीछे से उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘अचला, क्या बात है, तुम इतनी गंभीर हो कर क्या सोच रही हो?’’
‘‘कुछ नहीं, यों ही इन दोनों गमलों की ओर देख रही थी.’’
‘‘क्या खास बात है इन गमलों में? फूल दोनों ही गमलों में अच्छे निकले हैं.’’
अचला ने एक जोरदार ठंडी सांस ली और बोली, ‘‘हां, फूल दोनों गमलों में अच्छे निकले हैं.’’
‘‘इतनी साधारण बात को तुम इतने गंभीर ढंग से क्यों कह रही हो?’’
‘‘यह साधारण बात नहीं है. तुम देख रहे हो न, दोनों गमलों के फूल अलगअलग हैं.’’
‘‘वह तो होंगे ही.’’
‘‘बस, समझ लें, मेरे प्रश्न का उत्तर भी यही है.’’
‘‘मैं तुम्हारे प्रश्न का अर्थ नहीं समझ,’’ वह अचला के समीप वाली कुरसी पर बैठते हुए बोला.
‘‘विवाह हुए 6 वर्ष हो गए.’’
‘‘तो इस में क्या खास बात है, समय तो आगे ही बढ़ेगा, पीछे थोड़े ही लौटेगा.’’
‘‘लेकिन 6 साल में मैं ने एक बार भी मातृत्व सुख का अनुभव नहीं किया.’’
‘‘क्या गीतू को तुम अपनी बेटी नहीं समझतीं?’’
‘‘कुछ समझती हूं और कुछ समझना पड़ता है.’’
‘‘मुझे अब और बच्चे नहीं चाहिए,’’ कहते हुए वह अंदर चला गया.
अचला ने सोचसमझ कर तलाकशुदा 2 बच्चियों के पिता के साथ शादी की थी क्योंकि देव से उस का औफिस के सिलसिले में मिलनाजुलना हुआ जो प्रेम में बदल गया. देव ने दोनों बच्चियों से मिला दिया था और अचला की दोनों से पटरी भी बैठ गई थी.
अचला के मस्तिष्क में शहनाई गूंजने लगी. उसे विवाह का दिन याद आ गया. ससुराल आते ही देव की मां ने 3 वर्ष की गीतू और 4 वर्ष के सोमू, दोनों को उसे सौंप कर कहा था, ‘‘अचला, ले ये अपने बच्चे संभाल.’’ कुछ दिनों बाद सोमू को तो उस के नाना लिवा ले गए और गीतू उस की गोद में पलने लगी. अचला ने सोचा था कि उसे कभी अपने खुद के बच्चे की जरूरत नहीं होगी पर अब कुछ खटकने लगा था.
वह सोच ही रही थी कि देव फिर आ गया और उसे झकझोरते हुए बोला, ‘‘अरे, तुम भी क्या मूर्खतापूर्ण बातों में उलझ हो. चलो, दोनों खाना बनाते हैं. फिर दोनों को औफिस जाना है, देर हो रही है.’’
वह उठ कर देव के साथ अंदर चली गई. थोड़ी ही देर में तैयार हो कर दोनों औफिस चले गए. कंप्यूटर पर वह एक इलस्ट्रेशन बना रही थी. वह कंपनी की आर्टिस्ट और ग्राफिक डिजाइनर थी. उंगलियां चलातेचलाते सोचती जाती, ‘काश, मैं जिस तरह इस कैरेक्टर को बना रही हूं, उसी तरह अपने बच्चे का भी बना सकती.’
शाम को क्रैच से गीतू को क्रैच की मेड छोड़ जाती थी.
घर लौटने के आधे घंटे बाद फाटक खुलने की आवाज के साथ उस ने मुड़ कर देखा तो गीतू उसे आती हुई दिखाई दी.
गीतू आ कर उस से लिपट गई. वह उसे प्यार करने लगी.
‘‘मौम, मुझे भूख लगी है.’’
‘‘चल, खाने को कुछ देती हूं.’’
वह उठ कर अंदर चल दी. उस ने फ्रिज में से टोस्ट निकाला और प्याले में दूध डाल कर उसे दे दिया.
तो तुनक कर वह बोली, ‘‘मम्मी, मैं पिज्जा खाऊंगी.’’
‘‘बेटी, अभी नहीं है. अभी टोस्ट खा ले, शाम को पिज्जा मंगा दूंगी.’’
‘‘नहीं मम्मी. मैं अभी खाऊंगी.’’
‘‘मैं ने कहा न कि अभी नहीं मंगा सकती. अभी केला खा ले, शाम को टोस्ट दूंगी.’’
‘‘नहीं मम्मी. मैं अभी खाऊंगी.’’
‘‘मैं ने कहा न कि डबलरोटी नहीं है.’’
गीतू पैर फैला कर वहीं फर्श पर बैठ गई और रोने लगी. अचला को क्रोध आ गया. उस ने 2-3 चांटे जड़ दिए और बोली, ‘‘बहुत जिद करने लगी है तू. कह दिया न कि अभी नहीं मंगा सकती. कहां से लाऊं.’’

गीतू का स्वर अधिक तीव्र हो गया. थोड़ी देर तक वह रोती रही, फिर चुप हो गई. अचला ने गैस के चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा दिया. चाय पी कर वह अपने कमरे में चली गई और पैर फैला कर बिस्तर पर लेट गई, सोचने लगी, ससुराल आते ही एक बोझ ढोने को मिला, जिसे वह प्यार से सींचना चाह रही थी पर वह तो पति और बच्चे के बीच में बंधी रबड़ की तरह खिंचती रही.
शाम को जब देव औफिस से आया तो गीतू ने उस से शिकायत की, ‘‘पापा, आज मम्मी ने मुझे मारा था.’’
देव ने कपड़े बाद में बदले, पहले अचला को आवाज दे कर बुलाया और कहा, ‘‘अचला, गीतू कह रही है कि तुम ने उसे मारा था.’’
‘‘तो क्या हुआ, जिद कर रही थी.’’
‘‘लगता है, तुम अब उसे प्यार नहीं करतीं. शादी से पहले तो तुम बहुत लाड़ जताती थीं.’’
‘‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं उसे प्यार नहीं करती?’’
‘‘सुबह की तुम्हारी बातों से मुझे कुछ ऐसा ही आभास हुआ था.’’
‘‘गलत कह रहे हो तुम. मैं उसे बहुत प्यार करती हूं.’’
‘‘इसलिए कि तुम्हें प्यार करना है.’’
‘‘कुछ भी समझ लेकिन मैं उसे चाहती हूं, तभी मैं ने उसे मारा था. अगर गीतू की जगह मेरा बच्चा होता और वह तुम से शिकायत करता तो तुम यह अर्थ न लेते. बच्चे की बातों को गंभीरता नहीं देनी चाहिए. चलो, चाय तैयार है.’’
देव जूतेमोजे उतार कर, तौलिया हाथ में ले कर बाथरूम में चला गया. अचला खाने का प्रबंध करने लगी. कड़ाही में पड़ी आलूप्याज की पकौडि़यां वह करछुल से चलाने लगी. ‘खनखन’ की आवाज के साथ उस के मस्तिष्क में हजारों करछुलें एकसाथ चलने लगीं. सामान मेज पर लगा कर वह देव का रास्ता देखने लगी. उधर उस ने पिज्जा भी और्डर कर दिया. थोड़ी ही देर में देव आ गया और बिना कुछ बोले कुरसी पर बैठ गया. गीतू भी जाने कहां से दौड़ती हुई आ गई और अचला की गोद में हाथ रखते हुए बोली, ‘‘मम्मी, मुझे भी पकौड़ी दो न.’’
‘‘पापा, से ले लो और तुम्हारा पिज्जा आने वाला है.’’
‘‘नहीं, तुम दो. पापा मारेंगे.’’
अचला ने देव की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.

नाश्ता करने के बाद देव उठ कर अचला के पास आया और उस की कमर में पीछे से दोनों हाथ डालते हुए बोला, ‘‘अरे, तुम भी जराजरा सी बात से नाराज हो जाती हो.’’ अचला की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली. देव को प्रसन्न देख कर उस ने कहा, ‘‘एक बात कहूं?’’
‘‘कहो, कहो.’’
लेकिन अचला कुछ संकोच में पड़ गई और कुछ न कह सकी. वह मेज पर से सामान उठा कर रसोई में चली गई.
देव उस के पीछेपीछे रसोई में चला गया और उस के सामने खड़े हो कर बोला, ‘‘अचला, तुम ने बताया नहीं कि क्या बात है.’’
‘‘कुछ नहीं. मैं ऐसे ही.’’
‘‘नहीं, तुम्हारे मन में अवश्य कुछ है.’’
‘‘अब कुछ नहीं है. मन में आई बात चली गई.’’
‘‘मैं नहीं मानता. तुम्हें बताना ही पड़ेगा. क्या औफिस में कुछ हुआ था?’’
‘‘अरे, भई, कुछ बात नहीं है,’’ वह झुंझला कर बोली.
‘‘नहीं, तुम्हें मन की बात बतानी ही पड़ेगी.’’
अचला ऊहापोह में पड़ गई. उस ने धीरेधीरे मुंह से शब्द निकाले, ‘‘मैं आज लेडी डाक्टर के यहां गई थी.’’
‘‘अच्छा, तो अभी तुम्हारी सनक गई नहीं. मैं ने एक बार नहीं, कितनी ही बार तुम से कहा है कि मुझे 2 बच्चों के अतिरिक्त और संतान नहीं चाहिए.’’
‘‘तुम समझते क्यों नहीं हो?’’
‘‘मैं सब समझता हूं और मुझे फिर वही प्रश्न दोहराना पड़ेगा कि क्या गीतू को तुम अपनी संतान नहीं समझती?’’
‘‘लेकिन मैं केवल एक बार अपनी कोख से बच्चे को जन्म दे कर मातृत्व सुख पाना चाहती हूं.’’
‘‘असंभव,’’ कहता हुआ देव झटके के साथ बाहर चला गया.
अचला पौधों में पानी देने लगी. तभी उसे गीतू के रोने की आवाज सुनाई दी. वह टोह लेने लगी कि गीतू कहां है. गीतू की आवाज पास आती गई. वह फाटक से दौड़ती हुई आई और अचला से लिपट गई. अचला बोली, ‘‘क्यों, गीतू, किस ने मारा तुझे ?’’
‘‘मम्मी, तुम मुझे एक छोटा सा भैया ला दो न.’’
‘‘क्यों, यह बात तेरे मस्तिष्क में कैसे आई?’’
‘‘मम्मी, मोहिनी अपने छोटे भैया को मुझे नहीं खिलाने देती.’’
‘‘अच्छा, पापा से कहना, वे ला देंगे,’’ उस ने गीतू को बहला कर फिर खेलने भेज दिया.
जब देव घूम कर वापस आया तो गीतू ने कहा, ‘‘पापा, मेरे लिए भी एक छोटा सा भैया ला दो न. मोहिनी अपने छोटे भैया को मुझे खिलाने नहीं देती.’’
देव ने गीतू की बात सुनी तो कड़क कर अचला को आवाज दी. अचला आई तो वह क्रोध में बोला, ‘‘अच्छा, तो अब गीतू को सिखाया जा रहा है.’’
‘‘मैं ने कुछ नहीं सिखाया.’’
‘‘तब इस के मस्तिष्क में यह बात कैसे आई?’’
‘‘मुझे नहीं मालूम, लेकिन तुम संतान के नाम से चिढ़ते क्यों हों? इतनी अधिक संतान तो है नहीं जिन से ऊबे हो.’’
‘‘संतान, संतान और अब यह गीतू की बच्ची भी.’’

खाना खा कर देव अपने पलंग पर आ कर लेट गया. मन बहलाने के लिए वह मोबाइल के मैसेज चैक करने लगा. डबलबैड के बिस्तर में गीतू बीच में सो रही थी. उस की बगल में अचला आ कर लेट गई. दोनों व्याकुल थे. दोनों की अपनीअपनी अलगअलग इच्छाएं थीं.
वह सोचने लगा, ‘न मैं गीतू की मांग पूरी कर सकता हूं, न अचला की इच्छा.’
व्याकुलता में उस ने करवट बदली. अचला उठी. उस ने बत्ती बुझा दी.
अंधकार के परदे पर देव को बीते दिनों की एकएक छाया उभरती दिखाई दी और वह उन छायाओं के साथ स्वयं भी घुलमिल गया.
जब शीला जिंदा थी तब के लमहे याद आने लगे.
एक दिन जब वह औफिस से कुछ देर से लौटा था तो शीला मुंह फुलाए बाहर बरामदे में कुरसी डाले बैठी थी. देखते ही वह बोली थी, ‘‘देखो जी, मुझे अकेले डर लगता है. तुम जल्दी आया करो. बाहर कुछ लफंगे टाइप लड़के खड़े रहते हैं.’
‘औफिस में कुछ काम अधिक था, इसलिए देर हो गई, मैडम.’
‘लेकिन मेरा तो दिल निकला जा रहा था.’
‘अब तो दिल बच गया न और ये लफंगे तो हर शहर में मिलेंगे. भगवा दुपट्टा लटका कर हरकोई मोरल पुलिसमैन बन गया है और ये भगवाधारी ही लड़कियों/महिलाओं को सब से ज्यादा छेड़ते हैं.’ थोड़ी ही देर बाद शीला ने खाना मेज पर लगा दिया था. तब उस ने कहा था, ‘आओ खाना खाएंगे. बच्चे कहां हैं?’
‘सो गए हैं.’
खाना खातेखाते वह अचानक कहने लगी थी, ‘अब मैं औपरेशन करवा लूंगी.’
‘नहीं, मैं तुम्हें औपरेशन नहीं करवाने दूंगा. मुझे डर लगता है.’
‘तीसरा है, क्या मैं यही करती रहूंगी.’
‘ठीक है. यदि ऐसी बात है तो तुम नहीं, मैं औपरेशन करवा लूंगा,’ उस ने उसे समझते हुए कहा था.
उस ने करवट बदली और वह सोने का प्रयत्न करने लगा. तभी उसे शीला का दूसरा रूप दिखाई दिया.

अस्पताल के कमरा नं. 12 में बिस्तर नंबर 10 पर पड़ी शीला तड़प रही थी. उस की नाक में नली पड़ी थी, आंखों के नीचे गहरी काली छाया थी. चेहरा निचुड़े हुए कपड़े की तरह हो गया था.
उस दिन जैसे ही वह अस्पताल पहुंचा था तो शीला ने हलके से उस की ओर गरदन घुमाई थी. उस की गोद में गीतू थी. शीला ने गीतू को प्यार किया था और पूछा था, ‘सोमू और नंदू कहां हैं?’
देव ने गीतू को नीचे उतारते हुए कहा था, ‘सोमू नानी के पास है और नंदू दादी के पास.’
‘अच्छी तरह हैं न मेरे बच्चे?’ उस ने कराहते हुए पूछा था.
‘हां, हां, बिलकुल ठीक हैं. तुम चिंता मत करो.’
‘मेरी मृत्यु के बाद तुम विवाह कर लेना.’
‘ऐसा क्यों कहती हो, शीलू, तुम ठीक हो जाओगी.’
‘नहीं, ऐसा अब नहीं लगता.’ भयानक दर्द उस के पेट में उठा था. वह दर्द उसे ले कर ही गया.
उस समय शीला की आयु 26 वर्ष और देव की 30 वर्ष थी. शीला की मृत्यु के 4-5 महीने बाद नंदू भी चल बसा.

वह ये बातें सोच ही रहा था कि उसे अचला की चीख सुनाई दी. वह अचला के पास चला गया. तनाव समाप्त हो चुका था. उस ने उस के माथे पर हाथ रखा और बड़ी देर तक वह उस के बालों को सुलझता रहा. अचला चीखने के बाद फिर घोर निद्रा में सो गई.
सुबह उठते ही उस ने अचला से पूछा, ‘‘क्या तुम ने रात में स्वप्न देखा था? तुम बड़ी जोर से चीखी थीं?’’
‘‘मैं ने देखा था कि तुम ने गीतू को एक बड़ा सुंदर गुड्डा ला कर दिया था. गीतू उस से बड़े प्यार से खेल रही थी कि अचानक वह गुड्डा हवा के साथ आकाश में उड़ कर विलीन हो गया था. मैं डर गई थी और उसे पकड़ने के लिए लपकी थी. लेकिन वह हाथ न लगा था और मैं चीख कर रह गई थी.’’
‘‘शाम को गीतू ने जो कहा था, वही तुम्हारे मन में होगा,’’ कह कर वह उदास हो गया.
‘‘मैं तुम से प्रार्थना करती हूं कि तुम डाक्टर के यहां जा कर चैकअप…’’
‘‘तुम हर समय यही रट क्यों लगाए रहती हो.’’
‘‘इस में हर्ज ही क्या है?’’
‘‘मैं फिर कह रहा हूं कि भविष्य में अब कभी इस विषय पर चर्चा मत करना.’’
अचला उसे क्रोधित देख कर वहां से उठ कर चली गई. वह सोचने लगी कि उस की अभिलाषा कभी पूरी न होगी.
उधर देव सोचने लगा कि वह अचला को सुखी न रख सकेगा.
सारा दिन दोनों अनमने से रहे. काम सब होता रहा लेकिन दोनों के बीच तनाव ने फिर उग्र रूप धारण कर लिया.

अंधेरी गहरी रात का सन्नाटा चारों ओर फैल गया था. जाड़े की कंपकंपाहट शरीर को बिजली का सा झटका दे जाती थी. देव व गीतू बिस्तर पर लेटे हुए थे. अचला ड्राइंगरूम में बैठी गीतू की फ्रौक में बटन लगा रही थी और देव के विषय में सोचे जा रही थी कि जाने क्यों वह उस की बात स्वीकार नहीं कर रहा.

देव को नींद नहीं आ रही थी. कमरे में अचला के न होने से उसे सूनापन लग रहा था. अचला के शब्द उस के कानों में बराबर गूंज रहे थे, ‘तुम डाक्टर से चैकअप…’ लेकिन यह बात वह उस से कैसे कहे कि वह औपरेशन करवा चुका है, अब कुछ नहीं हो सकता. शीला की इच्छा बच्चों से भर गई थी और अचला मातृत्व सुख पाना चाहती है. उस के मन में अचला के प्रति सहानुभूति व स्नेह की भावना पैदा हुई. उस ने झटके से रजाई उतार फेंकी और ड्राइंगरूम में पहुंच गया. वह अचला के सामने दयनीय मुद्रा में खड़ा हो गया. अचला ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. वह पहले की तरह काम में लगी रही. देव से रहा नहीं गया तो वह बोला, ‘‘अचला, क्या तुम मुझ से प्रेम नहीं करतीं?’’
‘‘ऐसा मैं ने तो तुम से कभी नहीं कहा.’’
‘‘लेकिन मुझे लगता है.’’
‘‘अपने को भ्रम में मत रखो,’’ उस ने सूई में धागा डालते हुए कहा.
‘‘अचला, मेरी अचला, मुझे कभी घृणा की दृष्टि से मत देखना,’’ वह सोफे पर बैठते हुए बोला.
‘‘अरे, यह तुम क्या कह रहे हो?’’ उस ने देव की बड़ीबड़ी आंखों की ओर देखते हुए कहा.
‘‘मुझे डर लगता है, कहीं तुम मुझ से दूर न हो जाओ,’’ वह बोला.
‘‘अभी तुम जा कर सो जाओ,’’ अचला ने धागा मुंह से काटते हुए कहा.
आज्ञाकारी बच्चे की तरह देव कमरे में जा कर पलंग पर लेट गया. उसे नींद नहीं आ रही थी. थोड़ी देर में अचला सिलाई समाप्त कर के कमरे में पहुंची तो देव को जागता देख कर बोली, ‘‘अरे, अभी तुम सोए नहीं?’’
‘‘नींद नहीं आ रही.’’

अचला पलंग पर लेट गई. देव ने गीतू को अपनी बगल में किनारे पर लिटा दिया और स्वयं उस के समीप आ गया. उस ने अचला के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा, ‘‘अचला, क्या तुम मां बनने के लिए वास्तव में बहुत उत्सुक हो?’’
‘‘तुम ने कहा था न कि इस विषय में अब चर्चा न करना. फिर क्यों इस विषय को छेड़ते हो?’’
‘‘आज मैं कुछ कहना चाहता हूं.’’
‘‘कहो.’’
‘‘तो मैं ने जो पूछा है, उस का उत्तर दो.’’
‘‘मेरा उत्तर तो यही है कि हर स्त्री मातृत्व सुख पाना चाहती है.’’
देव की आंखें गीली हो गईं. उस ने करवट बदल ली तो अचला ने उसे अपनी ओर करते हुए कहा, ‘‘अरे, तुम्हारी आंखों में आंसू? ऐसी क्या बात है कि जबजब इस विषय में चर्चा होती है, तुम गंभीर हो जाते हो?’’
‘‘अचला, तुम कभी मां नहीं बन सकतीं.’’
‘‘क्यों?’’ उस ने आश्चर्यमिश्रित स्वर में कहा.
‘‘मैं सोचता था कि तुम ये बच्चे पा कर कभी संतान की कमी महसूस न करोगी और मुझे कभी इस विषय में सोचना न पड़ेगा, लेकिन अब…’’
‘‘अब क्या?’’
‘‘अब मैं बिना कहे नहीं रह सकता, मैं तुम्हें धोखे में नहीं रख सकता. मैं बहुत पहले ही औपरेशन करवा चुका हूं.’’
अचला जड़ हो गई. उस की दोनों आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी और वह सोचने लगी, ‘मुझे दूसरे के ही पौधे को सींचना है.’
‘‘मैं इसलिए तुम से कहने में संकोच करता था कि तुम दुखी होगी.’’ अचला एक लंबी सिसकी के साथ बोली, ‘‘यह बात तुम ने मुझे पहले क्यों नहीं बताई? मैं मन में यह इच्छा पनपने ही न देती.’’

यह कह कर वह उठी और उस ने गीतू को अपने पास बगल में लिटा लिया और उसे अपने सीने से लगा कर स्नेह करने लगी. Hindi Stories Love

लेखिका : रमा अग्निहोत्री

Family Story Hindi : वसीयत – प्रेम के उफान में कैसे बह निकलती है युवा पीढ़ी?

Family Story Hindi : सामने दीवार पर टंगी घड़ी शाम के 7 बजा रही थी. पूरे घर में अंधेरा पसरा हुआ था. मेरे शरीर में इतनी ताकत भी नहीं थी कि उठ कर लाइट जला सकूं. सुजाता, उस की बेटी, मैं और मेरी बेटी, इन्हीं चारों के बीच अनवरत चलता हुआ मेरा अंतर्द्वंद्व.

आज दोपहर, मैं अपनी सहेली के घर जा कर उस को बहुत अच्छी तरह समझा आई थी कि कोई बात नहीं सुजाता, अगर आज बेटी किसी के साथ रिलेशनशिप में रह रही है तो उसे स्वीकार करना ही हमारे हित में है. अब तो जो परिस्थिति सामने है, हमें उस के बीच का रास्ता खोजना ही पड़ेगा और अब अपनी बेटी का आगे का रास्ता साफ करो.

तो, तो क्या मेरी बेटी अपरा भी. नहीं, नहीं. लगा, मैं और सुजाता एक ही नाव में सवार हैं…नहीं, नहीं. मुझे कुछ तो करना पड़ेगा. फिर किसी तरह अपने को संभाल कर अजीत के आने का समय देख चाय बनाने किचन में चल दी.

उलझते, सोचते, समझते दिल्ली में इंजीनियरिंग कर रही अपनी बेटी अपरा के आने का इंतजार करने लगी. उस ने आज घर आने की बात कही थी.

वह सही वक्त पर घर पहुंच गई. उस के आने पर वही उछलकूद, खाने से ले कर कपड़ों तक की फरमाइशें मानो घरआंगन में छोटी चिडि़या चहचहा रही हो. डिनरटाइम पर सही समय देख सुजाता की बेटी का जिक्र छेड़ा तो वह बोली, ‘अरे छोड़ो भी मां, हमें किसी से क्या लेनादेना.’’

‘‘अच्छा चल, छोड़ भी दूं, पर कैसे बेटा? कैसे इस जहर से अपने गंदे होते समाज को बचाऊं?’’

‘‘मां, सब की अपनीअपनी जिंदगी है, जो जिस का मन चाहे, सो करे,’’ वह बोली.

मैं ने लंबी सांस ली और कहा, ‘‘अच्छा बेटा, मैं सोच रही हूं कि इस कमरे का परदा हटा दूं.’’

‘‘अरे, क्यों मां, कुछ भी बोलती हो. यह क्या हो गया है तुम्हें, बिना परदे के घर में कैसे रहेंगे,’’ वह झुंझलाई.

‘‘क्यों मेरी भी तो अपनी जिंदगी है, जो चाहे मैं करूं,’’ मेरा लहजा थोड़ा तल्ख था. मैं आगे बोली, ‘‘आज आधुनिकता के नाम पर हम ने अपनी संस्कृति, सभ्यता, लोकलिहाज, मानमर्यादा के सारे परदे भी तो उतार फेंके हैं. अपने वेग और उफान में सीमा से आगे बढ़ती नदी भी सदा हाहाकार मचाती है और आज की पीढ़ी भी क्या अपने घरपरिवार, समाज, रिश्तों को दरकिनार कर अपनी सीमा से आगे नहीं बढ़ रही है.

‘‘मैं मानती हूं कि हमारे बच्चे उच्च शिक्षित, समझदार और परिपक्व हैं किंतु फिर भी जीवन की समझ अनुभव से आती है और अनुभव उम्र के साथ. हम सब उम्र की इस प्रौढ़ता पर पहुंच कर भी जीवन के कुछ निर्णयों के लिए तुम्हारे बाबा, दादी, नानू, नानी पर निर्भर हैं.’’ अपरा चुपचाप सुनती जा रही थी.

थोड़ी देर रुक कर मैं फिर बोली, ‘‘प्रेम तो दिल से जुड़ी एक भावना है और विवाह एक अटूट बंधन, जो हमारे सामाजिक ढांचे का आधार स्तंभ है. और यह लिवइन रिलेशनशिप क्या है? बेटा, चढ़ती हुई बेल भी तभी आगे बढ़ती है जब उसे बांध कर रखा जाए, सो बिना बंधे रिश्तों को क्या भविष्य? क्यों आंख बंद कर अपने भविष्य को गर्त में ढकेल रहे हो? हमारी संस्कृति में आश्रम व्यवस्था के नियम भी इसीलिए बने थे, किंतु अब तो ये सब दकियानूसी बातें हो कर रह गई हैं.

‘‘माना कि आज समय बहुत बदल गया है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हम बड़े लोगों ने अपने को नहीं बदला.

बड़ों की स्वीकृति है तभी ज्यादातर शादियां लवमैरिज होती हैं. किंतु आज आधुनिकता के नाम पर अपनी संस्कृति को त्याग, पश्चिम की आयातित

संस्कृति की नकल करना बंद करो. सोचो और समझो कि तुहारे लव, ब्रेकअप, टाइमपास लव और टाइमपास रिलेशनशिप के क्या भयावह परिणाम होंगे. असमय बनाए संबंधों के अनचाहे परिणाम तुम्हारे कमजोर कंधे क्या…? बेटा, हर चीज का कुछ नियम होता है, बिना समय के तो पुष्प भी नहीं पल्लवित होते. इस तरह तो सारी सामाजिक व्यवस्था ही चरमरा जाएगी.

‘‘हमेशा याद रखना कि मांबाप कभी बच्चों का अहित नहीं सोचते. इसलिए अपने जीवन के अहम फैसले तुम खुद लो. किंतु उन से छिप कर नहीं, बल्कि उन्हें अपने फैसलों में शामिल कर के. बचपन तो जीवन के भोर के मानिंद रमणीय होता है किंतु जीवन का अपराह्न आतेआते तपती धूप में मांबाप ही तुम्हारे वटवृक्ष हैं, उन से जुड़े रहो, अलग मत हो.’’

तभी अजीत, थोड़ा माहौल को संभालते हुए, ताली बजाते हुए अपरा

से बोले, ‘‘अरे भई, इतनी नसीहत, तुम्हारी मां तो बहुत अच्छा भाषण देने लगी हैं, लगता है अगले चुनाव की तैयारी है.’’

मैं मन ही मन बोली, ‘नसीहत नहीं, वसीयत.’

पूरी तरह सहज अपरा 2 दिन रह कर फिर दिल्ली जाने के लिए तैयार होने लगी. बुझे मन और आंखों में आंसू लिए, जब उसे छोड़ मैं अपने कमरे में वापस आई तो मेरा मन सामने टेबल

पर रखे कार्ड को देख खुशी से नाच उठा जिस पर उस ने लिखा था, ‘यू आर ग्रेट, मौम.’

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