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Traditional Dress : फैशन पर प्रभाव डालते धार्मिक विचार

Traditional Dress : दानपिंड बराबर होता रहे इसलिए धार्मिक विचारों का प्रोपगेंडा चारों तरफ से फैलाया जाता है. इसे युवाओं में पोपुलाराइज करने के लिए फैशन का इस्तेमाल किया जाता है.

जब भी फैशन की बात होती है तो आमतौर पर वेस्टर्न पोशाकों की ही तस्वीरें सामने दिखने लगती हैं. पीछे कुछ सालों में देखें तो यह तस्वीर बदल रही है. खासतौर पर 14-15 साल की लड़कियों से ले कर महिलाओं तक में यह बदलाव दिख रहा है. केवल पहनावा ही नहीं फेस्टिवल को जिस तरह से मनाया जाने लगा है वहां भी भारतीय पहनावा सब से आगे दिखने लगा है. लड़कियां सलवार सूट ही नहीं ट्रैडिशनल साड़़ी और डिजाइनर ब्लाउज पहनने लगी हैं. इस के साथ गहने भी पुरानी डिजाइन के खरीदे जाने लगे हैं.

लड़कियों में ही नहीं लड़कों में भी अब भारतीय पहनावे का क्रेज बढ़ रहा है. फेस्टिवल में लड़के भी कुर्तापायजामा के साथ सदरी पहनने लगे हैं. कई लड़के तो खास अवसरों पर धोती पहनने लगे हैं. यही कारण है कि रेडी टू वियर धोती आने लगी है. जिस को पैंट या पायजामे की तरह से पहन लिया जाता है. अब बहुत कम पार्टियों में सूट और टाई वाले लड़के दिखते हैं. मध्यम वर्ग में यह चलन बहुत तेजी से बढ़ा है. अपर क्लास भी इसी तरह का व्यवहार कर रहा है.

फैशन डिजाइनर निवेदिता सिंह सोमवंशी कहती हैं, “अब कोई इवैंट हो या फेस्टिवल सब बड़ी ट्रेडिशनल तरह से मनाए जाने लगे हैं. फेस्टिवल की तो अपनी एक थीम होती ही है जन्मदिन हो शादी या और अवसर इन की थीम भी ट्रेडिशनल होने लगी है. जैसे शादी के पहले हल्दी और मैंहदी होने लगी है. इस की पूरी थीम ट्रेडिशनल होती है. ऐसे में इस में हिस्सा लेने वाले ट्रेडिशनल ड्रैस ही पहनेंगे. वह चाह कर भी वैस्टर्न नहीं पहन सकते. स्कर्ट या गाउन पहन कर कोई हल्दी और मैंहदी के इवेंट नहीं कर सकता है.”

यही हाल शादियों का है. शादी में राजपूताना स्टाइल हर किसी को पंसद आने लगी है. दूल्हे के साथ तलवार सब रखते हैं. पहले यह राजपूत शादियों में दिखता था. एक जमाना था कि दूल्हा कार से ही बारात में जाता था. अब केवल दरवाजे बारात के लिए बग्घी और घोड़े का प्रयोग होता है. केवल इस दिखावे के लिए ही घोड़ा और बग्घी वाले हजारों रुपए खर्च कराते हैं.

बात केवल राजपूताना थीम की ही नहीं है. अब फेस्टिवल और इवेंट दोनों ही जगहों पर हिंदू संस्कृति हावी दिखने लगी है. फोटो, वीडियो और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए इस थीम को सब से ज्यादा पंसद किया जा रहा है.

जिन जातियों में कभी ब्राहमणवाद को विरोध होता है वहां भी शादियों में हिंदी संस्कृति का प्रभाव सजावट से ले कर पहनावे तक पर साफ दिखने लगा है. इस की सब से बड़ी वजह यह होती है कि लोग अपनी पहचान बनाने के लिए नेताओं और मंत्रियों को बुलाने लगे हैं. यह नेता और मंत्री आए तो उन को अच्छा लगे इस के लिए सजावट इन के हिसाब से करनी पड़ती है. पहले कांग्रेसी, बसपाई, वामपंथी और समाजवादी नेता भगवा रंग के कपड़ों को पहनने से परहेज करते थे. अब यह भी भगवा सदरी तो पहन ही लेते हैं. जो बहुत भगवा पहनने से बचते हैं उन को भी सफेद रंग के कपड़ों में संतोष करना पड़ रहा है.

सदरी क्यों है खास

सदरी को नेहरू जैकेट के नाम से भी जाना जाता है. इस की खूबसूरती यह है कि एथनिक लुक के लिए इन्हें कुर्ते के साथ या आधुनिक लुक के लिए शर्ट और ट्राउजर के साथ पहन सकते हैं. हर अवसर पर इस को पहना जा सकता है. कीमत के हिसाब से देखें तो हर आयवर्ग के लिए फिट रहती है. 800 रुपए से ले कर ऊपर इस की कीमत होती है. इस को बनाने में अलगअलग तरह का फैब्रिक प्रयोग किया जाता है. इस को प्रिंटैड शर्ट, सिंपल कुर्ता या सर्दियों के लिए टर्टलनेक के ऊपर पहन सकते हैं. इस के पहनने से कोई भी पोशाक बेहतर लुक देने लगती है.

अलगअलग फैब्रिक से बने होने के कारण यह टिकाऊ होने के साथ ही साथ आरामदायक भी होती है. मौसम के हिसाब से अलगअलग तरह की जैकेट का प्रयोग कर सकते हैं. मौसम के हिसाब से ही इस के रंग भी अलगअलग हो सकते हैं. आज के दौर में नेताओं के द्वारा इस को ज्यादा पहना जाता है. युवा अब पार्टियों में इस का प्रयोग करने लगे हैं. इस को पहनते समय सब से बड़ी मांग इस के ट्रैडिशनल होने के कारण होती है.

बदल रही महिलाओं की सोच

महिलाओं की बात करें तो सलवारसूट पहनने की यह मानसिकता अब मध्यम आयु वर्ग की महिलाओं में अधिक लोकप्रिय है. पहले अधेड़ उम्र की महिलाएं साड़ी पहनने के लिए जानी जाती थीं. सलवारकमीज भी पहनावे का हिस्सा हो गया है. 35-50 साल की महिलाएं सलवार सूट में घूमते हुए देखी जा सकती थी. पहले सलवार सूट पहनने से मना किया जाता था. अब वैस्टर्न ड्रैस की जगह पर सलवारसूट को स्थान दे दिया गया है. पार्टी में अभी भी साड़ी ही सब से ऊपर ट्रैंड कर रही है. फेस्टिवल और शादी साड़ियों के साथ पहना जाने वाला ब्लाउज अलग स्टाइल का हो सकता है.

अब उत्तर भारत की साड़ी पर राजस्थानी लंहगा वाली साड़ी हावी है. पहले दुलहन को शादी में बनारसी साड़ी पहननी जरूरी होती थी और यह साड़ी पीढ़ियों तक चलती थी. सास अपनी बहू को देती थी. अब लंहगाचोली पहना जाने लगा है. इस में भी राजपूताने वाली ट्रेडिशनल लुक सब से प्रमुख होती है. इस में धर्म और संस्कृति का प्रभाव दिखता है. भले ही फैशन की दुनिया में साड़ी को सब से सैक्सी पोशाक माना जाता हो पर इस का धार्मिक महत्व भी कम नहीं है.

पहनावे पर हावी कट्टरपन

इसी लिए लड़कियों में सलवारसूट और महिलाओं में साड़ी का पहनावा बढ़ रहा है. इस में भी कलर और स्टाइल की बात करें तो ट्रेडिशनल स्टाइल सब से आगे है. पिछले 15-20 सालों में जैसेजैसे समाज, राजनीति और विचार पर हिंदुत्व ने कब्जा करना शुरू किया यह बदलाव आने लगा है. पोशआक और पहनावे को ले कर कट्टरपन समाज में दिखने लगा है.

मंदिरों और ऐतिहासिक इमारतों में जहां मस्जिद और मकबरे हैं वहां पहनावे कोड लागू है. जैसे वहां जाने के लिए पूरा तन ढके कपड़े हों. सिर ढका हो. स्कूल और कालेजों में भी यह दिखने लगा है.

आज के 20-25 साल पहले बहुत कम स्कूलों में लड़कियां बुरका पहन कर जाती थीं. आज कान्वैंट और मिशनरी स्कूलों में भी लड़कियां हिजाब पहन कर जा रही हैं. पहले मुसलिम महिलाएं केवल काले रंग के बुरके में ही दिखती थीं आज बुरके के साथ ही साथ तरहतरह के हिजाब भी पहने जाने लगे हैं. इन सब को ले कर तमाम तरह के विवाद भी होने लगे हैं. हर धर्म में उस की संस्कृति यानि कल्चर का प्रभाव दिखने लगा है.

हिंदुओं में यह और भी अधिक दिखने लगा है. जिस का प्रभाव हमारी शिक्षा और घर के रहनसहन पर पड़ने लगा है.

इन वजहों से खर्चे बढ़ गए हैं. ट्रेडिशनल कपड़ों में पोशाकों पर खर्च अधिक होता है. इस के साथ ही साथ उस से मैचिंग ज्वैलरी का भी खर्च है. इस की सब से बडी परेशानी हमारी सोच है. हम नौकरी पर जा रही बहू या बेटी से यह उम्मीद करने लगे हैं कि वह मौडर्न या कहे तो वैस्टर्न ड्रैस पहन कर न जाए. ऐसे में शादी के बाद औफिस जाते समय सलवार कुर्ता या साड़ी का प्रयोग करना पड़ता है. कई घरों में यह झगड़ों की शुरूआत होती है. यह कई बार व्यवहारिक भी नहीं होता है.

असल में इस तरह के पहनावे से हमारी सोच और विचारधारा दिखती है. यह एक बड़ा उदाहरण है कि राजनीति और विचार किस तरह से हमारे घर के अंदर तक दखल देने लगे हैं. इस के पीछे धर्म, ब्राहमणवाद और रूढ़िवादी विचार हैं. जिस को फैलाने का काम मंदिरों से होता है. जब कानून नहीं था तब धर्म के कानून ही जीवन को चलाते थे. मंदिर और ब्राहमण जो कहता था राजा उस की मानता था. राजा के सहारे धर्म अपना राज चलाता था.

आज के दौर में यही हो रहा है. हिंदुत्व को आगे कर के नेता अपना राज चला रहे हैं. मंदिर फलतेफूलते रहें उन को चढ़ावा आता रहे इस के लिए घर, त्योहार, इवैंट हर जगह उस का प्रभाव बनाया जाता है. मंदिरों में ड्रैस कोड हो गया. फेस्टिवल में ड्रेस कोड हो गया ऐसे में हमारा फैशन और पहनावा बदल गया है.

यही नहीं घर का खानपान भी बदल गया है. जो लोग शाकाहारी नहीं है वह दिन देख कर ही नानवेज खाते हैं. शादीविवाह की दावतों में भी अब शाकाहारी का चलन बढ़ गया है. धर्म और कट्टरपन हमारे खाने और पहनने तक को प्रभावित करने लगा है. जो आज की राजनीति और विचारों से ग्रसित है.

Raid 2 : अजय देवगन की नैय्या पार होगी ?

Raid 2 : महीने की शुरुआत में अजय देवगन की फिल्म ‘रेड 2’ रिलीज हुई. मगर जैसी उम्मीद इस फिल्म से थी वैसा कमाल यह फिल्म दिखा नहीं पाई.

पिछले लंबे समय से अभिनेता अजय देवगन की फिल्में बौक्स औफिस पर लगातार फ्लौप होती रही हैं, लेकिन एक मई को रिलीज हुई उन की फिल्म ‘रेड 2’ का ट्रेलर देख कर काफी उम्मीदें बंधी थी, पर अफसोस फिल्म उन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती नजर आई. इस के बावजूद महाराष्ट्र दिन और मजदूर दिवस की छुट्टी के चलते एक मई को पहले दिन ‘रेड 2’ ने बौक्स औफिस पर 19.5 करोड़ रुपए एकत्र किए जो अजय देवगन के खुश होने का एक कारण बन गई.

क्योंकि लंबे समय से अजय देवगन की कोई भी फिल्म पहले दिन डबल डिजिट की ओपनिंग नहीं ले रही थी, पर ‘रेड 2’ ने डबल डिजिट में वह भी 19.5 करोड़ रुपए की ओपनिंग ली. इस अनुपात में देखा जाए तो फिल्म ‘रेड 2’ को 8 दिन के बढ़े हुए सप्ताह में करीबन 150 करोड़ रुपए बौक्स औफिस पर एकत्र कर लेना चाहिए था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

16 मार्च 2018 को राजकुमार गुप्ता निर्देशित फिल्म ‘रेड’ रिलीज हुई थी, इस में अजय देवगन की ही मुख्य भूमिका थी. तब 40 करोड़ की लागत में बनी फिल्म ‘रेड’ ने 153 करोड़ से अधिक कमाए थे. 2018 में अजय देवगन की निजी मल्टीप्लैक्स चैन नहीं थी.

अब 7 साल बाद उसी फिल्म का सिक्वल ‘रेड 2’ एक मई 2025, गुरूवार के दिन रिलीज हुई. इस का निर्माण टीसीरीज के साथ ही अजय देवगन के बिजनेस मैनेजर कुमार मंगत पाठक ने किया है. फिल्म में अजय देवगन के साथ वाणी कपूर, रितेश देशमुख, सौरभ शुक्ला जैसे कलाकार हैं.

निर्माता फिल्म का बजट बताने को तैयार नही हैं. मगर कलाकारों की फौज को देखते हुए फिल्म का बजट 150 करोड़ रुपए होना चाहिए. इस रकम को वसूल करने के लिए फिल्म को बौक्स औफिस पर करीबन 400 करोड़ रुपए कमाने चाहिए.

लेकिन फिल्म को अच्छे रिव्यू नहीं मिले, कई अच्छे रिव्यूअर ने फिल्म की काफी आलोचना की. जिन लोगों ने 2018 में रिलीज फिल्म ‘रेड’ नहीं देखी है, उन्हें तो यह फिल्म पसंद आएगी, पर जिन्होंने ‘रेड’ देखी हुई है, उन्हें ‘रेड 2’ में कुछ भी नया नहीं मिला.

जब पहले दिन फिल्म ने 19.5 करोड़ बौक्स औफिस पर एकत्र किए थे, तब भी निर्माता पर कौरपोरेट बुकिंग, टिकटें खरीदने के साथ ही फर्जी शो रखने के आरोप लगे थे. अजय देगवन ने अपने सभी मल्टीप्लैक्स तो हाउसफुल दिखाए. निर्माताओं ने आरोपों का खंडन भी नहीं किया.

सकनिल्क के अनुसार पूरे 8 दिन के एक्सटैंडेड सप्ताह में ‘रेड 2’ ने महज 96 करोड़ रूपए बौक्स औफिस पर एकत्र किए. सही आंकड़ें क्या हैं, यह निर्माता के अलावा किसी को नहीं पता. मगर यह आंकड़े भी फिल्म को सफल नहीं बताते. सिर्फ अजय देवगन के लिए खुश होने की बात हो सकती है कि पिछली फिल्मों के मुकाबले इस फिल्म में स्थिति कुछ तो बेहतर हुई है.

मजेदार बात यह है कि इसी बीच सिनेमाघरों की संख्या बढ़ाने की आमिर खान व शाहरुख खान की मांग तथा नैटफ्लिक्स के सीईओ द्वारा सिनेमाघर खत्म करने की मांग के बीच आमिर खान ने ऐलान किया है कि वह अपनी फिल्म ‘सितारे जमीन पर’ को सिनेमाघर में रिलीज करेंगे, पर ओटीटी को नहीं देंगे और दो माह बाद वह फिल्म को यूट्यूब पर रिलीज करेंगे.

उधर दिनेश वीजन की फिल्म ‘भूल चूक माफ’ 9 मई को सिनेमाघरों में रिलीज होनी थी, पर जब फिल्म की एडवांस बुकिंग 50 लाख रुपए भी नहीं हुई तो दिनेश वीजन ने एक दिन पहले ऐलान कर दिया कि वह फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज नहीं करेंगे.

अब ‘भूल चूक माफ’ 16 मई से अमेजन पर स्ट्रीम होगी, तो फिल्मों के कंटैंट को सुधारने की दिशा में काम करने की बजाय अलग तरह की जोड़तोड़ निर्माताओं के बीच शुरू हो गई है. यह हालात बता रहे हैं कि सभी फिल्मकार भारतीय सिनेमा को बरबाद करने पर आमादा हैं.

Gold Loan : गिद्ध नजर औरतों के गहनों पर

Gold Loan : बैंक और फाइनैंस कंपनियां गोल्ड लोन के मीठे जाल में फंसा कर महिलाओं के गहने हड़प रहे हैं. यह दरअसल महिलाओं की सारी जमापूंजी को छीन लेने की एक सोचीसमझी साजिश है. जानिए गहनों को निगलने के लिए कैसे एकतरफा नियम है.

फिल्म ‘मदर इंडिया’ देखने वाली पीढ़ी को याद होगा कि कैसे राधा ने अपने बेटे शामू की शादी का खर्च पूरा करने के लिए अपने सोने के कंगन साहूकार सुखी लाला के पास गिरवी रखे थे. हर माह सूद वसूलने के बाद भी सुखी लाला की नीयत उन सोने के कंगनों पर खराब हो गई थी. वह राधा के कंगन हड़प लेने के चक्कर में था, तभी राधा का बेटा बिरजू सुखी लाला के पास से वे कंगन चुरा लाता है. मगर चोरी का इलजाम लगने के बाद बिरजू को गांव से बाहर निकाल दिया जाता है और बिरजू डाकू बन जाता है.

उस डाकू को गोली मारने को महिमामंडित करने के लिए ‘मदर इंडिया’ बनाई गई ताकि जनता को संदेश मिले कि गिरवी रखे गहने तो हमेशा के लिए चले जाते हैं. यह महानता का काम नहीं था, यह कोरा षड्यंत्र था अमीर साहूकारों का धंधा बनाए रखने का.

सच तो यह है कि डाकू बिरजू नहीं, बल्कि वह साहूकार सुखी लाला था जिस की नीयत राधा के कंगनों पर खराब हो गई थी और सूद की रकम पाने के बाद भी उन्हें वह लौटाना नहीं चाहता था.

सोने के प्रति दशकों पहले का लालच आज भी ज्यों का त्यों है. आज तमाम सरकारी और गैरसरकारी बैंक व प्राइवेट बैंकिंग वित्तीय संस्थान साहूकार सुखी लाला की भूमिका में हैं जिन की गिद्ध नजरें औरतों के सोने पर टिकी रहती हैं, जिसे अपने पास गिरवी रखने के लिए पहले तो वे खूब चिकनीचुपड़ी बातें कर ग्राहकों को फांस लेते हैं और फिर पहला मौका मिलते ही वे उस सोने को हड़प जाते हैं. सरकार पूरी तरह इन संस्थानों के साथ है, जनता का सोना हड़पने की तमाम कोशिशें जारी हैं.

इस साजिश के पीछे अमीरों के बैंक और उन में काम कर रहे कर्मचारी जुटे हुए हैं. ऐसी खबरें आएदिन अखबारों की सुर्खियों में रहती हैं जब बैंक में अपने घर का सोना गिरवी रखने के बाद ग्राहक बैंक द्वारा ठगा जाता है.

अभी 3 अप्रैल, 2025 की न्यूज है जब रायचूर पुलिस में एक कम्प्लैंट हुबली के विद्यानगर में बैंक औफ महाराष्ट्र के जोनल अधिकारी सुजीत डिसूजा ने रायचूर में गांधी चौक के पास बैंक औफ महाराष्ट्र शाखा के प्रबंधक के नरेंद्र रेड्डी के खिलाफ दर्ज करवाई. नरेंद्र रेड्डी गोल्ड लोन में हेरफेर कर बैंक का 10.9 करोड़ रुपया ले कर फरार हो गया था.

कितना सुरक्षित आप का सोना

11 जनवरी, 2025 को पाली जिले में धनवर्षा गोल्ड लोन ब्रांच, जिस में कुछ लोगों ने अपना सोना गिरवी रखा हुआ था, के लौकर से असली सोने के गहने निकाल कर नकली जेवर रख दिए गए. जो सोना बैंककर्मियों ने गायब किया उस की कीमत 1.25 करोड़ रुपए के लगभग थी. पीडि़त चांदनी गहलोत, हितेश टांक, सत्यनारायण टांक, किशन लाल, इशिता गहलोत, अमरचंद इस घटना के बाद से सकते में हैं. अब बैंक भी नहीं बता रहा कि उन का सोना उन्हें वापस मिलेगा भी या नहीं. पुलिस में केस दर्ज हो चुका है. पुलिस कछुए की गति से काम कर रही है.

12 दिसंबर, 2024 को दिल्ली के नजदीक नोएडा में गोल्ड लोन देने वाली कंपनी की मैनेजर ने ही करोड़ों का सोना गायब कर दिया. मामला थाना सैक्टर 20 में दर्ज हुआ है. क्षेत्र के सैक्टर 18 स्थित एक गोल्ड लोन उपलब्ध कराने वाली कंपनी में कार्य करने वाली महिला मैनेजर के खिलाफ एफआईआर हुई है, जिस ने करोड़ों रुपए के सोने के जेवरात की धोखाधड़ी कर ली. इस मामले में सहायक ब्रांच मैनेजर ने थाना सैक्टर 20 में मुकदमा दर्ज करवाया है.

मैनेजर का कहना है कि सैक्टर 18 स्थित उन की ब्रांच से कुछ दिनों पहले 15 लाख रुपए का गोल्ड लोन का पैकेट उन के यहां काम करने वाली ब्रांच मैनेजर ने चुरा लिया. ब्रांच मैनेजर अपने कपड़ों में पैकेट छिपाती हुई सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई है.

15 दिसंबर, 2024 को रोहतक, हरियाणा के एक बैंक का मैनेजर डेढ़ करोड़ रुपए का सोना ले कर चंपत हो गया. परेशान ग्राहक आज भी बैंक के चक्कर काट रहे हैं. रोहतक के भिवानी चुंगी पर एक निजी बैंक की ब्रांच है, जो लोगों का सोना गिरवी रख कर लोन देती है. बैंक मैनेजर 11 दिसंबर को सुबह 14 पैकेट सोना व 12 दिसंबर को सुबह 10 बजे 11 पैकेट सोना ले कर बैंक से गायब हो गया. कर्मचारियों को जब शक हुआ तो उन्होंने उच्च अधिकारियों को इस की जानकारी दी.

इस के बाद उच्च अधिकारियों ने बैंक के सभी सीसीटीवी फुटेज खंगाले, जिस में बैंक मैनेजर सभी पैकेट ले जाता हुआ दिखाई दिया. जिस समय मैनेजर यह पैकेट ले कर जा रहा था उस वक्त अन्य कर्मचारी भी बैंक में मौजूद थे, लेकिन किसी को भी शक न हुआ और मैनेजर मौके से सोना ले कर फरार हो गया. इस सोने की कीमत डेढ़ करोड़ रुपए से अधिक थी.

बैंकों के कर्मचारियों को पहले इस रिपोर्ट में लिया गया है क्योंकि यही ग्राहकों को दिखते हैं. भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय और बैंकों के बोर्डों में बैठे जो लोग भारीभरकम डौक्यूमैंट बनाते हैं वे किसीकिसी को दिखते हैं पर असली सुखी लाला वे ही हैं.

सोने पर किसी की भी नीयत खराब होते देर नहीं लगती. बैंक के लौकर में आप का सोना कितना सुरक्षित है, इस का अंदाजा इन खबरों से आसानी से लगाया जा सकता है. ये तो चोरी की वारदातें हैं जो आएदिन बैंकों में घट रही हैं. इस के अलावा आप का सोना वित्तीय संस्थानों के नियमों के तहत भी हड़प लिया जाता है. सोने का बाजार जितना तेजी से ऊपर चढ़ रहा है, उस के मुकाबले अन्य सभी व्यापार फीके हैं.

मोदी सरकार ने पहले नोटबंदी कर आप, खासकर, गृहिणियों की बचत का सारा नकद पैसा बाहर निकलवा लिया. उन्हें बैंकों में जमा करवा लिया. इस में से बहुत सा पैसा कमीशन एजेंटों ने उड़ा डाला जिन्होंने आधी रात की डकैती को जामा पहनाया था.

अब तमाम बैंक और वित्तीय संस्थान गृहिणियों के गहने भी निकलवाने की जुगत में हैं. उन के द्वारा जो गोल्ड लोन के बड़ेबड़े विज्ञापन दिए जा रहे हैं उन से ऐसा मैसेज जा रहा है जैसे आप का सोना आप की अलमारी में या लौकर में रखारखा सड़ रहा है. हर बैंक के बाहर गेटनुमा विज्ञापन लगे हैं कि गोल्ड लोन लो, मानो वहां मुफ्त खाने का लंगर लगा हो.

नए जमाने के महाजन

आरबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश की सरकार के अपने कुल स्वर्ण भंडार में से करीब 414 मीट्रिक टन सोना विदेशी तिजोरियों में रखा हुआ है. मार्च 2024 के अंत तक आरबीआई के पास 822.1 टन सोना था. इस सोने का 413.8 टन हिस्सा विदेशी वौल्टों में रखा था. सोना व्यापार, सुरक्षा और अन्य वित्तीय कारणों से विदेश में रखा जाता है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अनेक विदेशी बैंकों ने रूस को अपने यहां जमा सोने को निकालने पर प्रतिबंध लगा दिए थे, जिस से दूसरे कई देश चिंतित हैं.

हाल ही में आरबीआई 100 टन सोना ब्रिटेन से वापस लाया है. दुनियाभर में युद्ध और मंदी की बढ़ती आशंकाओं के बीच आरबीआई अपने स्वर्ण भंडार को भारत में स्थानांतरित करने की योजना बना रहा है. दूसरी तरफ देश के सरकारी व गैरसरकारी बैंक और फाइनैंस कंपनियां भारत के घरों में रखे गृहिणियों के जेवरों को भी बाहर निकालने के लिए गोल्ड लोन जैसे औफर्स का खूब प्रचारप्रसार कर रहे हैं.

सरकारी अधिकारियों की देखरेख में सोना कितना सुरक्षित है, इस की गारंटी कौन सा वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रिजर्व बैंक ले सकता है. जहां भी सोना रखा है वहां दोचार लोगों को ही पता है कि कितना सोना हिसाब में लिखा है और वास्तव में वौल्ट में (तिजोरी में) कितना है. कुछ सौ किलो सोने की हेराफेरी कर डाली जाए तो पीढि़यों तक हिसाब नहीं मिलाया जा सकता.

जमीन और सोना ऐसी चीजें हैं जिन के दाम समय के साथ बढ़ रहे हैं. पुराने समय में लोग जरूरत पड़ने पर अपनी जमीन महाजन या गांव के अमीर किसान के पास गिरवी रख कर पैसा उधार उठाते थे. जमीन पर चूंकि हमेशा से पुरुष अपना अधिकार मानता रहा है तो उस को बेचने या गिरवी रखने के लिए वह अपनी पत्नी या घर की किसी अन्य महिला से पूछने या मांगने की जरूरत नहीं सम झता था. लेकिन जिन के पास जमीन नहीं होती थी या जो जमीन गिरवी नहीं रखना चाहते थे, वे पत्नी के गहने गिरवी रखते थे जिस के लिए उन्हें पत्नी से बड़ी मानमनौअल करनी पड़ती थी.

सोना ऐसी चीज है जिस पर औरत का हक ज्यादा होता है. गहने औरत की संपत्ति भी हैं और उस का लालच भी. औरत के पास उस के गहनों के अलावा और कुछ भी ऐसा नहीं होता जो उसे आर्थिक रूप से मजबूत करता हो. उस के गहनों के साथ उस का भावनात्मक जुड़ाव भी होता है. जैसे, जो गहने उस को मायके से मिले होते हैं उन्हें वह जीवनभर अपने से अलग नहीं करना चाहती है. उन गहनों को खुद से अलग करना उस के लिए जान दे देने जैसा होता है.

घर पर कोई आर्थिक मुसीबत आने पर पुरुष जब स्त्री से उस के गहने मांगता है तो वह क्षण स्त्री के लिए बड़ा कष्टकारी होता है पर यह आश्वासन मिलने पर कि उस के गहने सिर्फ गिरवी रखे जाएंगे और अगली फसल पर पैसा आने, तनख्वाह मिलने या अन्य किसी स्रोत से पैसे जमा होने पर छुड़वा लेंगे तो स्त्री अपने गहने देने को तैयार हो जाती है. औरतों को महाजनों पर भरोसा कम होता है क्योंकि वे उन की चालाकी सम झती हैं जैसे बिरजू सुखी लाला की चालाकी सम झता था पर अपनी मां के हाथों मारा गया.

महाजन के पास गहने गिरवी रखने के बाद हर महीने उस का सूद चुकाना पड़ता था. कई बार ऐसा होता कि गांवदेहातों में अगली फसल खराब हो जाने पर, सूखा पड़ने या बाढ़ में फसल नष्ट होने पर यदि किसान सूद नहीं दे पाता था तो उस की जमीन या सोना महाजन हड़प जाता था. ऐसे में अधिकांश लोग गिरवी रखे अपने गहने और जमीन गंवा ही देते थे.

आज भी दूरदराज के गांवों में सूदखोर महाजन बैठे हैं. कई तो ऐसे हैं जो 12 से 24 फीसदी ब्याज पर जरूरतमंद व्यक्ति का सोना अपने पास गिरवी रखते हैं और फिर उस सोने को बैंक में 9 फीसदी ब्याज पर रख कर गोल्ड लोन उठा लेते हैं. यानी 3 से 15 फीसदी का मुनाफा कमाते हैं.

हालांकि अब ज्यादातर महाजनों और अमीर किसानों की जगह सरकारी व गैरसरकारी बैंकों, कोऔपरेटिव सोसाइटियों, नौन बैंकिंग फाइनैंस कंपनियों ने ले ली है. जो पहले तो खूब मीठीमीठी लुभावनी बातें कर के लोगों को उन के सोने के जेवर गिरवी रख कर लोन लेने के लिए रि झाते हैं और जरा सी गलती होने या किस्त चुकाने में देरी होने पर सोना हड़प कर जाते हैं.

औरतें सरकार और एयरकंडीशंड दफ्तरों में खुली गोल्ड लोन की दुकानों पर आसानी से भरोसा कर लेती हैं. वहां महाजन से ज्यादा खातिर की जाती है. मनचाही चायकौफी पिलाई जाती है. ‘अपनों जैसा’ व्यवहार गोल्ड दे कर लोन लेते समय किया जाता है.

आजकल गोल्ड लोन के इस तरह के इश्तिहारों से अखबारों के पन्ने रंगे नजर आ रहे हैं, टीवी चैनलों पर गोल्ड लोन के विज्ञापन छाए हुए हैं, सड़कों पर बड़ीबड़ी होर्डिंग्स में सस्ते गोल्ड लोन का लालच परोसा जा रहा है. दुकानों, बाजारों, बसअड्डों, मैट्रो स्टेशनों, रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर गोल्ड लोन, गोल्ड लोन की चीखचील्लाहट मची है.

बौलीवुड के नामीगिरामी ऐक्टर गोल्ड लोन का प्रचार करते नजर आ रहे हैं. अक्षय कुमार मणप्पुरम गोल्ड लोन का प्रचार करते हुए कहते हैं, ‘आप के पास सोने की ताकत है तो पर्सनल या बिजनैस लोन क्यों लें, अपने सोने के बदले मिनटों में लोन पाएं.’

फिर वे कहते हैं, ‘अपने सोने के आभूषण गिरवी रख कर तुरंत नकद प्राप्त करें. गोल्ड लोन सब को मिलेगा अब घर बैठे.’

विज्ञापन कुछ ऐसे रि झाते हैं कि ग्राहक को अपने हाथपैर हिलाने की भी जरूरत नहीं है. कंपनी खुद उस के घर पर आ कर उसे नकद पैसे दे जाएगी. आखिर कंपनी या बैंक इतने उदार हृदय के क्यों हो रहे हैं?

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन मुथूट फाइनैंस से गोल्ड लोन लेने के लिए लोगों को उकसा रहे हैं. विज्ञापनों में वे कहते हैं, ‘हाथी (मुथूट का लोगो) पर भरोसा करोगे तो पक्का जीतोगे.’ वे कहते हैं, ‘जब अपनों का साथ हो तभी होता है शुभारंभ. इसीलिए सिर्फ मुथूट फाइनैंस सदियों से देता आ रहा है हर नई शुरुआत में अपनों जैसा भरोसा.’ चायकौफी भी मनपसंद की मिलेगी.

यानी अमिताभ बच्चन कंपनी की तरफ ग्राहक का भरोसा जगा रहे हैं. मुथूट के लिए शाहरुख खान भी प्रचार कर रहे हैं, कह रहे हैं, ‘बुक माई गोल्ड लोन. फर्स्ट टाइम इन इंडिया.’ एक अन्य विज्ञापन कहता है, ‘पर्सनल लोन के मुकाबले गोल्ड लोन लेना ज्यादा आसान.’

आखिर एकाएक ऐसा क्या हो गया कि दुनियाभर के बैंक और कंपनियों की नजरें आप की अलमारी में रखे जेवरों पर गड़ गई हैं? जिन जेवरों को औरतें पीढ़ीदरपीढ़ी सहेजती आ रही हैं, जिन जेवरों से उन के खानदान की पहचान है, उस का गर्व है, जिन गहनों से उन का गहरा भावनात्मक जुड़ाव है, तमाम कंपनियां और बैंक उन्हें आप की अलमारी और लौकर से क्यों निकाल लेने पर उतारू हैं?

दरअसल, जिस तेजी से सोने के दाम बढ़ रहे हैं उस को देखते हुए ही आज दुनियाभर के सरकारी और गैरसरकारी बैंक, साहूकार, कोऔपरेटिव गोल्ड लोन के क्षेत्र में उतर आए हैं. माना जा रहा है कि 6 माह बीततेबीतते सोना डेढ़ लाख रुपए प्रति 10 ग्राम तक पहुंच सकता है. लिहाजा, इस समय पूरी कोशिश इस बात की हो रही है कि किसी तरह भारत की गृहिणी से उस का वह सोना बाहर निकलवाया जाए जो उस ने बरसों की मेहनत से जोड़जोड़ कर एकएक गहने के रूप में संजोया हुआ है.

औरतों के गहनों पर नजर

मुथूट ग्रुप के संयुक्त प्रबंध निदेशक अलेक्जैंडर जौर्ज मुथूट कहते हैं, ‘‘भारत में घरेलू आभूषणों के रूप में +25,000 टन सोना उपलब्ध है और इस का 5 फीसदी से भी कम सोने के ऋण के माध्यम से मुद्रीकृत किया जाता है. विकास की गुंजाइश बहुत अधिक है. मु झे विश्वास है कि हमारी नई गोल्ड लोन श्रेणी हमारी आर्थिक स्थिति को और मजबूत करेगी.’’

असल में यह सोना देश को नहीं, कंपनियों को और खर्चीली सरकार को मजबूत कर रहा है. असली सोना तो मंदिरों में भरा है पर किसी की हिम्मत है कि कहे कि सरकार इसे छीन ले. वक्फ एक्ट समर्थन करने वालों के मुंह पर मंदिरों के सोने के भंडार पर सोने के ताले लगे हैं.

रुद्र प्रताप एक छोटा सा अखबार निकालते हैं. उन की पत्नी एक छोटी सरकारी नौकरी में है. दोनों के 3 बच्चे हैं. 2 बेटियां और एक बेटा. रुद्र को उन के अखबार में कभीकभार ही विज्ञापन मिलते हैं जिस से अखबार का संचालन होता है. घर पत्नी की सैलरी से चलता है. फिर भी तीनों बच्चों की शादियां उन्होंने खूब धूमधाम से कीं.

वह इस कारण क्योंकि रुद्र प्रताप के पास उन के खानदान का पुराना सोना काफी मात्रा में था. 3 बच्चों की शादियां उन्होंने उसी सोने के कुछ हिस्से को बेच कर कीं.

सोने के बढ़ते दामों पर बातचीत करते हुए रुद्र बताते हैं कि जब उन्होंने 2009 में बड़ी बेटी की शादी की थी उस वक्त सोना करीब 15,000 रुपए प्रति 10 ग्राम था. 5 साल बाद जब दूसरी बेटी की शादी की तब सोने की कीमत दोगुनी हो गई यानी करीब 30,000 रुपए प्रति 10 ग्राम और एक साल पहले जब उन्होंने बेटे की शादी की तो सोने का दाम 60,000 रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गया था जो अब 1 साल 2 महीने में बढ़ कर 1 लाख के करीब प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है. सोने के दाम हर दिन ऊपर चढ़ रहे हैं.

अब तो धीरेधीरे चांदी के दामों में भी वृद्धि हो रही है. चांदी का इस्तेमाल अनेक प्रकार के गैजेट्स बनाने में भी होता है. चीन में चांदी की काफी खपत है. हैरानी नहीं होनी चाहिए यदि कुछ ही दिनों में सिल्वर लोन का शोर भी कानों में पड़ने लगे और महिलाओं के चांदी के गहने भी अलमारियों से निकल कर बैंकों में जमा हो जाएं.

वर्तमान समय में लोगों के जीवन स्तर और पैसा खर्च करने की प्रवृत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई है. कोरोना महामारी के बाद तो लोगों का जैसे जीवन पर से भरोसा ही उठ गया है. पता नहीं कब मौत आ जाए तो जितनी ख्वाहिशें हैं उन्हें अभी पूरी कर लो. बुढ़ापे के लिए बचा के रखने का कोई फायदा नहीं है. कुछ ऐसी मानसिकता लोगों पर हावी हो गई है.

बाजार ने भी इस मानसिकता को पकड़ लिया है और उस ने ऐश से जीवन जीने के लालच को बढ़ाया है. अब 18 साल का होने पर एक किशोर अपने मांबाप से साइकिल नहीं, सीधे बाइक की फरमाइश करता है. अमीर घर का हो तो सीधे कार की डिमांड होती है. मांबाप भी उसे बाइक या कार दिलाने में नानुकुर नहीं करते. आईफोन, कंप्यूटर, टेबलेट आदि सब तो अब आम हैं.

स्मार्टफोन अब सिर्फ शौक नहीं रहा बल्कि हर आदमी की जरूरत बन गया है. यहां तक कि बच्चों की भी. ऐसे में पुरुष अपनी सूखी सैलरी से परिवार की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता. जब वह गोल्ड लोन के बारे में सुनता है तो वह सोचता है कि बीवी के गहने जो बरसों से लौकर में पड़े हैं उन को बैंक में गिरवी रख कर लोन ही ले लो और किस्त चुकाते हुए एक निश्चित समयसीमा के बाद गहने वापस पा लो.

बैंक भी गोल्ड लोन के लिए बड़ी आकर्षक बातें कर के ग्राहक को लुभाते हैं, मगर असलियत तब खुलती है जब ब्याज के पैसों के साथसाथ व्यक्ति बीवी के गहने भी गंवा देता है.

नियम व शर्तों की पेचीदगियां

दरअसल गोल्ड लोन लेने की बातें जितनी सहज और आकर्षक लगती हैं, असलियत में वे उतनी ही भ्रामक, उल झी हुई और धोखाधड़ी से भरी हुई हैं.

कोई भी बैंक या उस का एजेंट ग्राहक को पूरी बातें या असलियत नहीं बताता है. आधीअधूरी जानकारी दे कर ग्राहक का सोना गिरवी रखवा लिया जाता है और बाद में जरा सी गलती होने पर बैंक ग्राहक का पूरा सोना हड़प कर जाता है. यानी पुरखों की सारी जमापूंजी और एक गृहिणी की संपत्ति एक झटके में हाथ से निकल जाती है. जब आप बैंक के खिलाफ ऐक्शन लेने की बात सोचते हैं तो बैंक कहता है कि आप ने खुद सारे टर्म्स एंड कंडीशन पर हस्ताक्षर किए हुए हैं.

जब आप गोल्ड लोन लेने के लिए किसी बैंक में जाते हैं तो वे आप के सामने 12 से 15 पेज के दस्तावेज रख देते हैं जो इंग्लिश में होते हैं और उन में जो कुछ बड़ी घुमावदार भाषा में लिखा होता है उसे उच्च इंग्लिश शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी ठीक से सम झ नहीं पाता. सो, एक कम शिक्षित आम व्यक्ति के लिए उस दस्तावेज को पढ़नासम झना कितना मुश्किल है, इसे आसानी से सम झा जा सकता है. आम आदमी तो उस एजेंट की बातों को ही सत्य सम झ कर उस के द्वारा दिए दस्तावेज पर उनउन जगहों पर हस्ताक्षर करता चला जाता है जहांजहां वह करने को कहता है.

व्यक्ति को लगता है कि बैंक कितना उदार है जो इतनी आसानी से मु झे लोन दे रहा है, बैंक का एजेंट खुद चल कर घर तक आया है, खुद सारा फौर्म भर रहा है पर उस को झटका तब लगता है जब सोना वापस करने का समय आने पर बैंक उसे उस की कोई न कोई गलती बता कर उस का सारा सोना हड़प कर जाता है.

क्या हो जब कर्ज न चुके

दरअसल प्रचार की आकर्षक बातों को किनारे रख कर यदि गोल्ड लोन की शर्तों पर ध्यान दें तो यहां भी कर्ज वाला नियम ही लागू होता है और इस नियम के अनुसार यदि आप समय से कर्ज नहीं चुका पाते हैं तो वित्तीय संस्थान को आप का सोना बेचने का हक है.

लोन चुकाने में देरी होने पर बैंक सोने की नीलामी कर सकता है. इस के लिए आएदिन अखबार के किसी कोने में छोटेछोटे अक्षरों में नीलामी की खबर दिखती होगी. आमतौर पर लोग इन खबरों को नहीं पढ़ते जिन में अमुक व्यक्ति का नाम, एड्रैस वगैरह लिखा जाता है कि चूंकि अमुक व्यक्ति ने लोन की किस्त समय से नहीं चुकाई, लिहाजा, तय शर्तों के अनुसार बैंक उस के सोने की नीलामी कर रहा है. कई बार तो ग्राहक को पता तक नहीं चलता और उस का सारा सोना नीलाम कर दिया जाता है.

लोन चुकाने में देरी होने पर आप का क्रैडिट स्कोर भी खराब हो जाता है और भविष्य में किसी अन्य प्रकार का लोन लेने में दिक्कत आती है. ये तमाम बातें कोई भी बैंक या बैंक का एजेंट ग्राहक को उस वक्त नहीं बताता है जिस वक्त वह उस को गोल्ड लोन के फायदे गिनवाते हुए फौर्म भरवा रहा होता है.

बैंक या बैंक का एजेंट गोल्ड लोन लेने वाले को यह भी नहीं बताता कि यदि सोने का भाव गिरता है तो आप को अतिरिक्त सोना गिरवी रखने के लिए भी कहा जा सकता है. सोने की कीमत में गिरावट आने पर बैंक ज्यादा सिक्योरिटी भी मांग सकता है या लोन की रकम कम कर सकता है. ऐसी अनेक बातें हैं जो 15 पेज के इंग्लिश में लिखे एग्रीमैंट फौर्म में घुमाफिरा कर लिखी होती हैं और उन पर वे आप के हस्ताक्षर ले लेते हैं कि आप को उन की सारी शर्तें मंजूर हैं. आप बिना फौर्म को पढ़े आंख मूंद कर हस्ताक्षर करते चले जाते हैं.

यह बात साफतौर पर सम झ लेनी चाहिए कि गोल्ड लोन का समय पर भुगतान करना बेहद जरूरी है. यदि आप समय पर भुगतान नहीं कर पाते तो लोन देने वाली संस्था आप के सोने को बेचने का अधिकार रखती है. सामान्यतया बैंक 3 महीने से 3 साल तक के लिए लोन देते हैं जबकि नौन बैंकिंग फाइनैंस कंपनी में यह अवधि अलग हो सकती है. इसलिए पहले से तय कर लें कि आप किस अवधि में लोन चुका सकते हैं और अपनी योजना के अनुसार ही लोन लें.

एक बात और सम झ लेनी चाहिए कि आप जितना सोना गिरवी रख रहे हैं उस का 75 फीसदी ही आप को लोन मिलेगा. यदि आप के जेवरों की कीमत एक लाख रुपए है तो आप को सिर्फ 75,000 रुपए ही लोन के रूप में मिलेंगे. सोने के बदले कर्ज लेने की दूसरी शर्त यह है कि जिस गोल्ड को आप गिरवी रख रहे हैं, वह कम से कम 18 कैरेट शुद्ध होना चाहिए.

सोने की शुद्धता की जांच बैंक खुद करता है मगर यह जांच वह आप के सामने नहीं करता. आम आदमी उस समय ज्यादा चूंचूं नहीं करता क्योंकि उस से कहा जाता है कि लोन चुकता करने के बाद यही जेवर उसे वापस मिल जाएंगे.

स्टेट बैंक औफ इंडिया 9 फीसदी से शुरू होने वाली ब्याज दरों पर 50 लाख रुपए तक का गोल्ड लोन प्रदान करता है. गोल्ड लोन की अवधि 3 साल तक हो सकती है (अगर ईएमआई में लोन का भुगतान किया जा रहा हो) और अगर बुलेट रीपेमैंट के जरिए लोन का भुगतान किया जा रहा है तो 3 महीने, 6 महीने और 12 महीने.

इन बातों के अलावा ऐसे कई खर्चे हैं जो बैंक शुरू में आप को नहीं बताते हैं. इन एक्स्ट्रा चार्जेज पर वे फौर्म भरते वक्त बात नहीं करते हैं जबकि गोल्ड लोन में भी दूसरे आम लोन की तरह प्रोसैसिंग फीस लगती है, जो बैंकों और नौन बैंकिंग फाइनैंस कंपनी के हिसाब से अलगअलग होती है. इस के अलावा प्रोसैसिंग फीस पर जीएसटी भी लगता है. लोन लेने के लिए प्रोसैसिंग फीस, वैल्यूएशन फीस, लौकर चार्ज, सर्विस चार्ज और एसएमएस चार्ज जैसे कई शुल्क लगते हैं जो एजेंट आप को नहीं बताता है.

बैंक या नौन बैंकिंग फाइनैंस कंपनी गहनों और सोने के सिक्कों के बदले ही लोन देते हैं. आप 50 ग्राम से ज्यादा वजन के सोने के सिक्के गिरवी नहीं रख सकते. वित्तीय संस्थान गोल्ड बार को भी गिरवी नहीं रखते हैं.

लूट नहीं तो क्या

तो, प्रचार की चमकदमक में गुमराह होने से बचें और सैलिब्रिटीज की लच्छेदार बातों में न आ कर गोल्ड लोन लेने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि आप इसे किस उद्देश्य के लिए ले रहे हैं और उस की किस्त आप समय से चुका पाएंगे या नहीं. आप की संपत्ति का उपयोग हमेशा गंभीर और अपरिहार्य परिस्थितियों में होना चाहिए. मामूली जरूरतों को पूरा करने के लिए या महल्ले वालों व रिश्तेदारों को अपनी शानोशौकत दिखाने के लिए अपनी संपत्ति गिरवी रखना सम झदारी नहीं है.

इस बात पर पूरा ध्यान दें कि आप के पास समय से किस्त चुकाने के साधन हैं या नहीं. समय पर भुगतान करना बेहद जरूरी है. यदि आप समय पर भुगतान नहीं कर पाते तो लोन देने वाली संस्था आप के सोने को बेचने का अधिकार रखती है. यह न सोचें कि आप का सोना उन के पास सुरक्षित है.

एक बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, जून 2024 में 6,696 करोड़ रुपए के दिए गए लोन के बदले सोने के जेवर औक्शन कर दिए गए क्योंकि उधार लेने वालों ने लोन चुकाया नहीं. यह पैसा छीना गया. अप्रैल 2024 से जून 2024 के 3 महीनों में 30 प्रतिशत लोन लेने वालों ने गहने नहीं छुड़ाए. बैंकों के लिए स्वर्णिम दिन हैं क्योंकि अब सोने की कीमत बढ़ गई है.

27 मार्च, 2025 को पश्चिम बंगाल के 24 परगना के स्टेट बैंक औफ इंडिया ने एक विज्ञापन जारी किया जिस में सईदा खातून के 22 कैरेट के 60 ग्राम सोने की 3 चूडि़यां नीलाम करने की सूचना थी. अब मई में सोने का दाम 1 लाख रुपए प्रति ग्राम है. सो, यह लूट नहीं है क्या, जो बैंकों ने मचाई है. अगर बैंक यह सोना औक्शन न करता तो ग्राहकों को लाभ ही लाभ होता.

Nepotism : राजनीति में वंशवाद सही नहीं पर स्वाभाविक

Nepotism : राजनीति में परिवारवाद का होना पूरी तरह लोकतांत्रिक है क्योंकि परिवारवाद से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति को मामूली चुनाव जीतने के लिए भी जनता के वोट की जरूरत होती है. अगर कोई व्यक्ति अपने पिता या किसी रिश्तेदार की राजनीतिक विरासत को संभाल रहा है तो इस में गलत क्या है?

बाप से बेटे को विरासत में बहुतकुछ मिलता है. बाप की बनाई गई तमाम जिंदगी की कमाई उस की औलादों को मिलती है. पिता अगर गरीब है तो उस का बेटा अपने पिता की गरीबी का वारिस बनता है और अगर अमीर है तो उस की धनदौलत का वारिस बनता है. यह प्रचलन सदियों से है. राजतंत्र के दौर में रियासतों या देशों के हुक्मरान वंश के आधार पर ही तय होते थे लेकिन जनतंत्र आने के बाद वंशवादी हुक्मरानों पर रोक लग गई.

शासक जनता द्वारा जनता के बीच से तय होने लगे. लोकतंत्र में वंशवाद के लिए कोई जगह नहीं बची लेकिन लोकतंत्र में भाग लेने वाले दलों में वंशवाद खत्म नहीं हुआ. लोकतंत्र में इस वंशवादी परंपरा पर लगातार सवाल उठते रहे हैं.

क्या राजनीति में वंशवाद लोकतंत्र के लिए खतरा है

परिवारवाद की राजनीति का अर्थ होता है जहां सर्वोच्च कमान एक ही परिवार के पास हो जैसे कांग्रेस. कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू के बाद से लगातार पार्टी की सर्वोच्च कमान नेहरूजी के वंशजों के हाथों में रही है. नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब नेहरू की चौथी पीढ़ी के राहुल और प्रियंका गांधी कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं.

उद्धव की शिवसेना, शरद पवार की एनसीपी, ममता बनर्जी की तृणमूल, शिबू सोरेन की झामुमो, लालू प्रसाद यादव की राजद और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी इन जैसे तमाम क्षेत्रीय दलों को भी वंशवाद के आरोपों का सामना करना पड़ता है. परिवारवाद का आरोप सब से ज्यादा कांग्रेस को झेलना पड़ता है. जब भी मौका मिलता है, कांग्रेस की विरोधी पार्टियां खासकर बीजेपी वंशवाद को ले कर कांग्रेस को घेरने की कोशिश करती हैं.

24 अक्तूबर, 2024 को केरल के वायनाड से लोकसभा उपचुनाव के लिए जब कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा ने नामांकन किया था तब भारतीय जनता पार्टी ने प्रियंका के इस नामांकन को ‘वंशवादी राजनीति की जीत और योग्यता की हार’ करार दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर चुनाव में कांग्रेस पर वंशवादी होने का आरोप लगाते हुए नजर आते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव को ‘शहजादे’ शब्द से संबोधित किया था.

हैरानी की बात तो यह है कि कांग्रेस भी बीजेपी और कई क्षेत्रीय दलों पर वंशवाद का आरोप लगाती रही है.

2018 और 2023 के विधानसभा चुनावों के दौरान तेलंगाना तत्कालीन सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने वंशवादी राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने बेटे के टी रामाराव और भतीजे हरीश राव दोनों को मंत्री नियुक्त किया था. इस के अलावा, उन की बेटी के कविता 2018 में मौजूदा सांसद और 2023 में एमएलसी थीं. राष्ट्रीय राजनीति में वंशवाद के आरोपों को झेल रहे राहुल गांधी ने तेलंगाना चुनाव में मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव पर परिवारवाद और वंशवाद का आरोप लगा कर इस मुद्दे को जम कर उछाला.

बीजेपी का परिवारवाद से नाता

कांग्रेस के वंशवाद और परिवारवाद को मुद्दा बना कर ही भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस मुक्त भारत का नैरेटिव सैट करती है. बीजेपी के अनुसार कांग्रेस एक सामंती पार्टी है. यानी, यह गांधी परिवार की राजनीतिक जागीर है.

2014 में नरेंद्र मोदी की जीत को मीडिया ने वंशवादी राजनीति के अंत की शुरुआत बताया था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लोकसभा के आंकड़ों से पता चला है कि भाजपा के वंशवादी सांसदों की संख्या कांग्रेस के वंशवादी सांसदों की संख्या के करीब ही रही है. एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 2019 में कांग्रेस से चुने गए लोगों में वंशवादी राजनेता 12 फीसदी थे जबकि भाजपा में यह 11 फीसदी था और 2024 में कांग्रेस के लिए यह 8 फीसदी और भाजपा के लिए 6 फीसदी था.

यह सच है कि बीजेपी के नेतृत्व में या बीजेपी की संगठनात्मक व्यवस्था में परिवारवाद नहीं है. नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जे पी नड्डा या जयशंकर जैसे बड़े नेता बीजेपी में अपनी योग्यताओं के बल पर ही शीर्ष तक पहुंचे हैं, इसलिए बीजेपी का कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाना पूरी तरह औचित्यपूर्ण दिखाई देता है. लेकिन सच तो यह है कि राजनीति में कुछ भी औचित्यपूर्ण नहीं होता. कांग्रेस के परिवारवाद की विरोधी बीजेपी सत्ता के लिए परिवारवाद के आगे घुटने टेक देती है और सहयोगी दलों के परिवारवाद को गले लगाती नजर आती है.

बिहार में भाजपा का गठबंधन लोक जनशक्ति पार्टी से है. इस के अध्यक्ष चिराग पासवान को यह पार्टी अपने पिता रामविलास पासवान से विरासत में मिली थी. चिराग पासवान अपने पिता की मृत्यु के बाद खाली हुई उन की लोकसभा सीट हाजीपुर से सांसद बने गए हैं और उन्होंने अपनी मौजूदा सीट (जमुई) से अपने जीजा को चुनाव लड़ाया. चिराग की बहन शांभवी भी चुनाव लड़ीं और चिराग पासवान के चाचा पशुपति नाथ पारस भी सांसद हैं.

मेघालय में भाजपा की सहयोगी नैशनल पीपल्स पार्टी है. राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री कोनराड संगमा पूर्व सीएम पी ए संगमा के बेटे हैं. उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ खुद ‘परिवारवादी राजनीति’ का परिणाम हैं. उन के चाचा अवैद्यनाथ गोरखनाथ पीठ के महंत थे. पीठ में हजारों संन्यासी होने के बावजूद उत्तराधिकारी चुनने का समय आया तो अवैद्यनाथ ने अपने भतीजे आदित्यनाथ को चुना. इस के 4 साल बाद जब सांसद अवैद्यनाथ ने अपनी पारंपरिक लोकसभा सीट छोड़ने का मन बनाया तो वहां से भी आदित्यनाथ को ही सांसद बनवाया.

आगे का अंश बौक्स क बाद 

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बीजेपी के लिए वंशवाद का विरोध सिर्फ दिखावा है. लोगों को यह बताने की कोशिश होती है कि बीजेपी पूरी तरह लोकतंत्र में भरोसा करती है, इसलिए वंशवादी राजनीति का विरोध करती है लेकिन सच्चाई यह नहीं है. भाजपा में वंशवाद भरा है. यहां तक कि जिन देवताओं को वे पूजते हैं सभी वंशवाद की देन हैं.

कांग्रेस में वंशवाद है, यह कांग्रेस की कड़वी सच्चाई है. कांग्रेस में हाईकमान एक ही परिवार का क्यों? इस सवाल का जवाब कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं को ढूंढ़ना होगा और हाईकमान को भी अपनी वंशवादी परंपरा को तोड़ कर इसे पूरी तरह लोकतांत्रिक बनाना होगा.
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कश्मीर में जिस पीडीपी के साथ मिल कर बीजेपी ने सरकार बनाई थी, उस की नेता महबूबा मुफ्ती को राजनीति अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद से विरासत में मिली थी.

भाजपा ने महाराष्ट्र में शरद पवार के भतीजे अजित पवार को डिप्टी सीएम बनाया. इस से पहले नरेंद्र मोदी अजीत पवार पर लगातार परिवारवाद का आरोप लगाते रहे हैं. पीएम मोदी एनसीपी को प्राइवेट लिमिटेड पार्टी, परिवार लिमिटेड पार्टी तक कहते थे. कर्नाटक में बीजेपी ने जेडीएस के साथ गठबंधन बनाया, जिस के नेता एचडी कुमारस्वामी हैं जो पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के बेटे हैं.

परिवारवाद से लोकतंत्र को नुकसान

लोकतंत्र में परिवारवाद के लिए कोई जगह नहीं होती और भारत को विश्व का सब से बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है, इसलिए भारतीय राजनीति में परिवारवाद का होना अच्छा संकेत तो नहीं है. राजशाही व्यवस्था में किसी एक परिवार का ही शासन होता था. नेतृत्व परिवार के हाथों में होता था लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवारवाद के लिए कोई जगह नहीं.

सवाल यह है कि क्या भारत की किसी राजनीतिक पार्टी में परिवारवाद या वंशवाद होने से भारतीय लोकतंत्र को खतरा हो सकता है? नहीं. भारत की हर राजनीतिक पार्टी भारत के संविधान के अनुरूप ही बनी है और पूरी तरह लोकतांत्रिक नियमों पर ही चलती है. इसलिए इन में मौजूद परिवारवाद से लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं हो सकता.

कांग्रेस समेत वे तमाम दल जिन में वंशवाद चलता है वे भी पूरी तरह लोकतांत्रिक मूल्यों पर ही चलते हैं. किसी राजनीतिक दल की कमान संभाल रहा कोई व्यक्ति अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभाल रहा है तो इस में गलत क्या है? इतिहास के किसी बड़े मूवमैंट या किसी सामाजिक क्रांति से कई नेता सामने आए. उन्होंने अपने मूवमैंट को राजनीतिक दल के रूप में रूपांतरित किया और मरने के बाद उन के बेटे या बेटी ने उस राजनीतिक दल की कमान संभाली. इस में कुछ भी अलोकतांत्रिक नहीं है.

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का होना पूरी तरह लोकतांत्रिक है क्योंकि परिवारवाद से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति को मामूली चुनाव जीतने के लिए भी जनता के वोट की जरूरत होती है. किसी नेता को विधानसभा या संसद में भेजने का रास्ता जनता तय करती है, इसलिए परिवारवाद से राजनीति में आने वाले लोगों को ‘लोकतंत्र का दुश्मन’ मान लेना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ एक गलत नैरेटिव है.

कोई भी पौलिटिकल पार्टी अपनी निजी स्वायत्तता के साथ अस्तित्व में रह सकती है. निजी स्वायत्तता में उस पार्टी की संगठनात्मक व्यवस्था, उस की कोर कमेटी और पार्टी के नेताओं की भूमिका तय करने का अधिकार पार्टी नेतृत्व के पास होता है. ये सभी कवायदें चुनाव आयोग की गाइडलाइंस के तहत ही तय होती हैं. सभी राजनीतिक दलों को अपना अध्यक्ष चुनना होता है. अब ऐसे किसी चुनाव में यदि पार्टी के लोग सर्वसम्मति से अपना नेता पार्टी में वंशानुगत परंपरा से चले आ रहे किसी व्यक्ति को चुनते हैं तो इस में चुनाव आयोग को कोई आपत्ति नहीं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को खतरा नहीं है.

भाजपा का वंशवाद का विरोध भी सिर्फ चुनावी जुमला ही है. भाजपा जिन देवीदेवताओं के नाम पर वोट बटोर रही है, सभी वंशवाद के प्रतीक हैं. चाहे वे शंकर के पुत्र गणेश हों या दशरथ पुत्र राम. सभी पूजे जाने वाले भगवान अपने पिताओं के वंश से जुड़े हैं. सवाल यह है कि वंशवाद का विरोध करने वाली भाजपा क्या वंशवाद का विरोध करने के लिए इन देवताओं को छोड़ेगी?

USA : पतन की ओर अमेरिका

USA : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यह शिकायत तो वाजिब है कि दूसरे देश अमेरिकी उत्पादों पर भारी टैक्स लगाते हैं ताकि अमेरिकी कंपनियों का सामान महंगा हो कर उन देशों में बिके पर इस का मतलब यह नहीं कि उन देशों से आने वाले सामान पर वे मनमाना टैक्स, जिसे टैरिफ कहा जा रहा है, लगा दें.

अपनी गलती की सजा खुद को देना बेवकूफी है क्योंकि अमेरिका में दूसरे देशों से आयातित सामान और महंगा ही होगा. उस की खपत कहां होगी, इस की गारंटी नहीं है. अगर इस तरह के सामान पर सभी देशों से आयात करने पर ज्यादा टैरिफ अमेरिका में लगेगा तो अमेरिकियों की जेब ढीली होगी. अगर कुछ खपत कम होगी तो इस का मतलब है कि अमेरिकी जनता परेशान होगी.

अमेरिका को सामान निर्यात करने वालों को इस टैरिफ से फर्क इतना ही पड़ेगा कि उन्हें खरीदार दूसरे देशों में ढूंढ़ने होंगे जो आसानी से मिल भी जाएंगे. दूसरे देशों में अमेरिकी निर्यातक और आयातक दोनों नुकसान में रहेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप ने इस तरह का कदम उठाया है तो यह बड़ी बात नहीं है. हर कट्टरपंथी ऐसा ही करता है. वह कोई न कोई सिरफिरा कदम उठाता है. हिटलर ने बेमतलब यहूदियों को मारने का प्रोग्राम तब बनाया जब वह यूरोप के दूसरे देशों पर हमला कर रहा था. बजाय अपना ध्यान सैनिकों की तैयारी में लगाने के, हिटलर की फौजें यहूदियों को लूटने में लग गई थीं.

भारत में जब गरीबी दूर करने का समय आया और औद्योगिकीकरण की जरूरत थी तो हमारे शासकों ने देश को मंदिरमसजिद विवाद में धकेल दिया है. भारत आज 85 करोड़ भूखे लोगों को मुफ्त खाना देने को मजबूर है तो दूसरी तरफ अरबोंखरबों रुपए धार्मिक यात्राओं, मसजिदों, वक्फों के विवादों में बहा रहा है.

अमेरिका में आर्थिक संकट आया है तो जरूरत इस बात की थी कि वह चीन के उत्पादन केंद्र बनने से उसे रोकने के लिए अपने यहां साइंस और टैक्नोलौजी को बढ़ावा दे न कि दूसरे देशों से टैरिफ लड़ाई में उल झ जाए. आज हर देश अमेरिका को दुश्मन मानने लगा है. वे देश जो 100-150 सालों से अमेरिका को मित्र से ज्यादा संरक्षक मानते रहे हैं, अब उसे भक्षक मान रहे हैं जो उन के कारखाने बंद कराना चाह रहा है, उन की जमीन हथियाना चाहता है, वहां बसे उन के नागरिकों को अमेरिका का दुश्मन बता रहा है.

पिछले राष्ट्रपतियों ने अमेरिका को जो प्रतिष्ठा दिलाई थी, डोनाल्ड ट्रंप ने 2 माह में नष्ट कर दी है और उन का वार बहुत ही गहरा है. टैरिफ के अलावा वे मैडिकल सुविधाएं बंद कर रहे हैं, स्कूलों को बंद करा रहे हैं, सुंदर प्राकृतिक जंगलों, पहाड़ों, नदियों को बेसहारा छोड़ रहे हैं. आज अमेरिका हर तरह की रिसर्च पर खर्च घटा रहा है जबकि पाखंडभरे चर्चों को प्रोत्साहित कर रहा है.

जो राष्ट्रपति देश को बाहरी व अंदरूनी दोनों स्तरों पर विवादों में डाल रहा हो उसे सिर्फ खब्ती और सनकी कहा जा सकता है. जो काम दुनिया के चीन, रूस जैसे देश और तालिबान नहीं कर पाए -अमेरिका को नष्ट करने का- वह आज के अमेरिकी राष्ट्रपति खुद कर रहे हैं.

Donald Trump : लोकतंत्र के साथ तानाशाही

Donald Trump : यह लोकतंत्र में नहीं होता, सिर्फ तानाशाही में होता है कि हर वह जना जिस पर कोई शक हो, अपना परिचयपत्र हमेशा, 24 घंटे, अपने साथ रखे. लेकिन अब यह लोकतंत्रों के रक्षक रहे अमेरिका में, चर्च के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) के राज में होने लगा है जिस की कमान डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में है. डोनाल्ड ट्रंप ने आदेश दिया है कि हर गैरनागरिक हर समय अपना परिचयपत्र अपने साथ रखे.

जब गैरनागरिकों के कागज बिना वजह के चैक करने का भी अधिकार पुलिस के पास होगा तो वह हर जना, जो गोरा नहीं है मगर चाहे नागरिक क्यों न हो, के कागज चैक कर सकती है. यह पुलिस चैकिंग दफ्तरों, ट्रेनों, एयरपोर्टों, सिनेमाघरों, बाजारों, सड़कों पर कहीं भी हो सकती है और जब होती है तो उस शख्स को बेहद अपमानजनक लगता है. अगर भूले से भी गैरगोरा नागरिक अपना परिचयपत्र जेब में रखना भूल गया तो पुलिस उसे बंद कर सकती है. वह अकेला रह रहा हो तो घर या होटल से अपना परिचयपत्र आखिर कैसे ला पाएगा.

असल में यह साजिश है कि अमेरिका में कोई ब्लैक, लैटिनो, चीनी, जापानी, दक्षिणी एशियाई रहे ही न. अगर रहे भी तो हर समय डरासहमा रहे. एक बड़ी कंपनी का भारतीय मूल का सीईओ सड़क पर जौगिंग करते हुए रोका जा सकता है कि वह अपना परिचयपत्र दिखाए चाहे वह नागरिक क्यों न हो.

जो भारतीय मूल के लोग बड़ी शान से अमेरिका में रहे रहे हैं और वहां रह कर भी रिपब्लिकन पार्टी को अपनी ऊंची जाति के कारण सपोर्ट करते हैं, अब वे भी हमेशा डरेसहमे रहेंगे.

डिपार्टमैंट औफ इनलैंड सिक्योरिटी ने नए आदेश में हर सरकारी अफसर को हक दे दिया है कि वह किसी से भी कह सकता है कि ‘शो मी योर पेपर्स’. गोरों को छोड़ कर हर जना अब हर समय दुबकासहमा रहेगा जैसा हिटलर की जरमनी में रहता था, स्टालिन के सोवियत संघ में रहता था. इस का फर्क नहीं पड़ता कि वह भारतीय, चीनी, अफ्रीकी, जापानी मूल का जना 4-5 पीढि़यों से अमेरिका में रह रहा हो, अच्छी पोस्ट पर हो, पैसे वाला हो, बड़े मकान में रहता हो.

अमेरिका चर्च के नाम पर यह सब कर रहा है क्योंकि चर्च का काम होता है हरेक को हमेशा डरा कर रखना और यही डराने की आदत सदियों से राजाओं ने अपनाई. हर धर्म इसीलिए यह कहता है कि धर्म के चिह्न हर समय पहन कर चलो ताकि हर समय पता रहे कि कौन एकदूसरे से बात कर रहा है.

लोकतंत्रों ने इस भय को दूर किया. वोटरों ने सत्ता पा कर एक खुले राज का निर्माण किया जिस में न चर्च का डर था न सरकार का. अब सरकार और धर्म बहुत देशों- भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, अमेरिका, रूस, लैटिन अमेरिका- में एकदूसरे के गहरे दोस्त बन गए है और जनता फिर से 18वीं सदी की गुलाम बन गई है.

अमेरिका का विनाश दिख रहा है लेकिन उस से ज्यादा खतरनाक है लोकतंत्र का विनाश. पहले अमेरिका ने लोकतंत्रों को भरपूर समर्थन दिया था, अब वह कट्टरवादी रूस, उत्तरी कोरिया, भारत जैसे देशों के जैसे रहेगा जहां मूल जन्म, धर्म, जाति, रंग सर्वोपरि हैं.

Hindi Kahani : भूलना मत – नम्रता की जिंदगी में क्या था उस फोन कौल का राज?

Hindi Kahani : नम्रता ने फोन की घंटी सुन कर करवट बदल ली. कंबल ऊपर तक खींच कर कान बंद कर लिए. सोचा कोई और उठ कर फोन उठा लेगा पर सभी सोते रहे और फोन की घंटी बज कर बंद हो गई.

‘चलो अच्छा हुआ, मुसीबत टली. पता नहीं मुंहअंधेरे फोन करने का शौक किसे चर्राया,’ नम्रता ने स्वयं से ही कहा.

पर फोन फिर से बजने लगा तो नम्रता झुंझला गई, ‘‘लगता है घर में मेरे अलावा यह घंटी किसी को सुनाई ही नहीं देती,’’ उस ने उठने का उपक्रम किया पर उस के पहले ही अपने पिता शैलेंद्र बाबू की पदचाप सुन कर वह दोबारा सो गई. पिता ने फोन उठा लिया.

‘‘क्या? क्या कह रहे हो कार्तिक? मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं होता. पूरे देश में प्रथम स्थान? नहींनहीं, तुम ने कुछ गलत देखा होगा. क्या नैट पर समाचार है?’’

‘‘अब तो आप को मिठाई खिलानी ही पड़ेगी.’’

‘‘हां, है.’’

‘‘मिठाई?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं, घर आओ तो, मिठाई क्या शानदार दावत मिलेगी तुम्हें,’’ शैलेंद्र बाबू फोन रखते ही उछल पड़े. थोड़ी देर पहले की मीठी नींद से उठने की खुमारी और बौखलाहट एक क्षण में उड़नछू हो गई.

‘‘सुचित्रा, नम्रता, अनिमेष, कहां हो तुम तीनों? देखो कितनी खुशी की बात है,’’ वे पूरी शक्ति लगा कर चीखे.

‘‘क्या है? क्यों सारा घर सिर पर उठा रखा है?’’ सुचित्रा पति की चीखपुकार सुन कर उठ आईं.

‘‘बात ही ऐसी है. सुनोगी तो उछल पड़ोगी.’’

‘‘अब कह भी डालो, भला कब तक पहेलियां बुझाते रहोगे.’’

‘‘तो सुनो, हमारी बेटी नम्रता भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रथम आई है.’’

‘‘क्या? मुझे तो विश्वास नहीं होता. किसी ने अवश्य तुम्हें मूर्ख बनाने का प्रयत्न किया है. किस का फोन था? अवश्य ही किसी ने मजाक किया होगा.’’

‘‘कार्तिक का फोन था और मैं उस की बात पर आंख मूंद कर विश्वास कर सकता हूं.’’

मातापिता की बातचीत सुन कर नम्रता और अनिमेष भी उठ कर आ गए.

‘‘मां ठीक कहती हैं, पापा. क्या पता किसी ने शरारत की हो. परीक्षा में सफल होना तो संभव है पर सर्वप्रथम आना…मैं जब तक अपनी आंखों से न देख लूं, विश्वास नहीं कर सकती,’’ नम्रता ने अपना मत प्रकट किया.

पर जब तक नम्रता कुछ और कहती अनिमेष कंप्यूटर पर ताजा समाचार देखने लगा जहां नम्रता के भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रथम आने का समाचार प्रमुखता से दिखाया जा रहा था. कुछ ही देर में समाचारपत्र भी आ गया और फोन पर बधाई देने वालों का तांता सा लग गया.

शैलेंद्र बाबू तो फोन पर बधाई स्वीकार करने और सब को विस्तार से नम्रता के आईएएस में प्रथम आने के बारे में बताते हुए इतने व्यस्त हो गए कि उन्हें नाश्ता तक करने का समय नहीं मिला.

दिनभर घर आनेजाने वालों से भरा रहा. नम्रता जहां स्थानीय समाचारपत्रों के प्रतिनिधियों व टीवी चैनलों को साक्षात्कार देने में व्यस्त थी, वहीं अनिमेष और सुचित्रा मेहमानों की खातिरदारी में.

शैलेंद्र बाबू के तो पांव खुशी के कारण जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. नम्रता ने एक ही झटके में पूरे परिवार को साधारण से असाधारण बना दिया था.

रात गहराने लगी तो अनेक परिचित विदा लेने लगे. पर दूर से आए संबंधियों के ठहरने, खानेपीने का प्रबंध तो करना ही था. सुचित्रा के तो हाथपैर फूल गए थे. तीन बुलाए तेरह आए तो सुना था उन्होंने पर यहां तो बिना बुलाए ही सब ने धावा बोल दिया था.

वे अनिमेष को बारबार बाजार भेज कर आवश्यकता की वस्तुएं मंगा रही थीं और स्वयं दिनभर रसोई में जुटी रहीं.

अतिथियों को खिलापिला व सुला कर जब पूरा परिवार साथ बैठा तो सभी को अपनी कहने और दूसरों की सुनने का अवसर मिला.

‘‘मुझ से नहीं होता इतने लोगों के खानेपीने का प्रबंध. कल ही एक रसोइए का प्रबंध करो,’’ सब से पहले सुचित्रा ने अपना दुखड़ा कह सुनाया.

‘‘क्यों नहीं, कल ही से रख लेते हैं. कुछ दिनों तक आनेजाने वालों का सिलसिला चलेगा ही,’’ शैलेंद्र बाबू ने कहा.

‘‘मां, घर में जो भी सामान मंगवाना हो उस की सूची बना लो. कल एकसाथ ला कर रख दूंगा. आज पूरे दिन आप ने मुझे एक टांग पर खड़ा रखा है,’’ अनिमेष बोला.

‘‘तुम लोगों को एक दिन थोड़ा सा काम करना पड़ जाए तो रोनापीटना शुरू कर देते हो. पर जो सब से महत्त्वपूर्ण बातें हैं उन की ओर तुम्हारा ध्यान ही नहीं जाता,’’ शैलेंद्र बाबू गंभीर स्वर में बोले.

‘‘ऐसी कौन सी महत्त्वपूर्ण बात है जिस की ओर हमारा ध्यान नहीं गया?’’ सुचित्रा ने मुंह बिचकाया.

‘‘कार्तिक…आज सुबह सब से पहले कार्तिक ने ही मुझे नम्रता की इस अभूतपूर्व सफलता की सूचना दी थी. पर मैं पूरे दिन प्रतीक्षा करता रहा और वह नहीं आया.’’

‘‘प्रतीक्षा केवल आप ही नहीं करते रहे, पापा, मैं ने तो उसे फोन भी किया था. जितना प्रयत्न और परिश्रम मैं ने किया उतना ही उस ने भी किया. उसे तो जैसे धुन सवार थी कि मुझे इस प्रतियोगिता में सफल करवा कर ही मानेगा. मेरी सफलता का श्रेय काफी हद तक कार्तिक को ही जाता है.’’

‘‘सब कहने की बात है. ऐसा ही है तो स्वयं क्यों नहीं दे दी आईएएस की प्रवेश परीक्षा?’’

‘‘क्योंकि वह चाहता ही नहीं, मां. उसे पढ़नेपढ़ाने में इतनी रुचि है कि वह व्याख्याता की नौकरी छोड़ना तो दूर, अर्थशास्त्र में पीएचडी करने की योजना बना रहा है.’’

‘‘तो अब मेरी बात ध्यान से सुनो. अब तक तो तुम दोनों की मित्रता ठीक थी पर अब तुम दोनों का मिलनाजुलना मुझे पसंद नहीं है. बड़ी अफसर बन जाओगी तुम. अपनी बराबरी का वर ढूंढ़ो तो मुझे खुशी होगी. भूल गईं, सुधीर और उस के परिवार ने हमारे साथ कैसा व्यवहार किया था?’’ सुचित्रा बोलीं.

‘‘तो आप चाहती हैं कि मैं भी कार्तिक के साथ वही करूं जो सुधीर ने मेरे साथ किया था.’’

‘‘हां, तुम लोगों ने अपनी व्यस्तता में देखा नहीं, कार्तिक आया था, मैं ने ही उसे समझा दिया कि अब नम्रता उस से कहीं आगे निकल गई है तो किसी से बिना मिले मुंह छिपा कर चला गया,’’ सुचित्रा बोलीं.

‘‘क्या? आप ने मुझे बताया तक नहीं? कार्तिक जैसे मित्र बड़ी मुश्किल से मिलते हैं. हम दोनों तो जीवनसाथी बनने का निर्णय ले चुके हैं,’’ यह बोलते हुए नम्रता रो पड़ी.

‘‘मैं तुम से पूरी तरह सहमत हूं, बेटी. कार्तिक हीरा है, हीरा. उसे हाथ से मत जाने देना,’’ शैलेंद्रजी ने नम्रता को ढाढ़स बंधाया.

एकांत मिलते ही नम्रता ने कार्तिक का नंबर मिलाया. पर बहुत पहले की एक फोन कौल उस के मानसपटल पर हथौड़े की चोट करने लगी थी.

उस दिन भी फोन उस के पिता ने ही उठाया था.

‘नमस्ते शैलेंद्र बाबू. कहिए, विवाह की सब तैयारियां हो गईं?’ फोन पर धीर शाह का स्वर सुन कर शैलेंद्र बाबू चौंक गए थे.

‘सब आप की कृपा है. हम सब तो कल की तैयारी में ही व्यस्त हैं.’

इधरउधर की औपचारिक बातों के बाद धीर बाबू काम की बात पर आ गए.

‘ऐसा है शैलेंद्र बाबू, मैं ने तो लाख समझाया पर रमा, मेरी पत्नी तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं. बस, एक ही जिद पर अड़ी है. उसे तो तिलक में 10 लाख नकद चाहिए. वह अपने मन की सारी साध पूरी करेगी.’’

‘क्या कह रहे हैं आप, धीर बाबू? तिलक में तो लेनेदेने की बात तय नहीं हुई थी. अब एक दिन में 10 लाख का प्रबंध कहां से करूंगा मैं?’ शैलेंद्र बाबू का सिर चकराने लगा. आवाज भर्रा गई.

‘क्या कहूं, मैं तो आदर्शवादी व्यक्ति हूं. दहेज को समाज का अभिशाप मानता हूं. पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है. रमा ने तो जिद ही पकड़ ली है. वैसे गलती उस की भी नहीं है. आप के यहां संबंध होने के बाद भी लोग दरवाजे पर कतार बांधे खड़े हैं.’

सोचने व समझ पाने के लिए शैलेंद्र ने कहा, ‘मेरे विचार से ऐसे गंभीर विचारविमर्श फोन पर करना ठीक नहीं रहेगा. मैं अपनी पत्नी सुचित्रा के साथ आप के घर आ रहा हूं. वहीं मिलबैठ कर सब मसले सुलझा लेंगे.’

नम्रता ने शैलेंद्र बाबू और धीर शाह के बीच होने वाली बातचीत को सुन लिया था और किसी अशुभ की आशंका से वह कांप उठी थी.

शैलेंद्र बाबू और सुचित्रा जब धीर बाबू के घर गए तो उन्होंने 10 लाख की मांग को दोहराया, जिस से शैलेंद्र बाबू निराश हो गए.

जब नम्रता से सुधीर का संबंध हुआ था तब सुधीर डिगरी कालेज में साधारण सा व्याख्याता था पर अब वह भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफसर बन गया था. इसी कारण वर का भाव भी बढ़ गया. अफसर बनते ही सुधीर का दुनिया के प्रति नजरिया भी बदल गया.

शैलेंद्र और सुचित्रा उठ खड़े हुए. घर आ कर बात साफ कर दी गई.

‘यह विवाह नहीं होगा. लगता है और कोई मोटा आसामी मिल गया है धीर बाबू को,’ शैलेंद्र बाबू ने सुचित्रा से कहा.

सुधीर और नम्रता ने कालेज की पढ़ाई साथ पूरी की थी. दोनों के प्रेम के किस्से हर आम और खास व्यक्ति की जबान पर थे. एमफिल करते ही जब दोनों को अपने ही कालेज में व्याख्याता के पद प्राप्त हो गए तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. उन के प्यार की दास्तान सुन कर दोनों ही पक्षों के मातापिता ने उन के विवाह की स्वीकृति दे दी थी.

नम्रता से विवाह तय होते ही जब सुधीर का आईएएस में चयन हो गया तो सुचित्रा और शैलेंद्र बाबू भी खुशी से झूम उठे. वे मित्रों, संबंधियों और परिचितों को यह बताते नहीं थकते थे कि उन की बेटी नम्रता का संबंध एक आईएएस अफसर से हुआ है.

नम्रता स्वयं भी कुछ ऐसा ही सोचने लगी थी. वह जब भी सुधीर से मिलती तो गर्व महसूस करती थी. पर आज सबकुछ बदला हुआ नजर आ रहा था.

सुधीर और उस का प्रेमप्रसंग तो पिछले 5 वर्षों से चल रहा था. सुधीर तो दहेज के सख्त खिलाफ था. फिर आज अचानक इतनी बड़ी मांग? वह छटपटा कर रह गई.

उस ने तुरंत सुधीर को फोन मिलाया. उसे अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि सुधीर और उस का परिवार तिलक से ठीक पहले ऐसी मांग रख देंगे. वह सुधीर से बात कर के सब साफसाफ पूछ लेना चाहती थी. उन दोनों के प्यार के बीच में यह पैसा कहां से आ गया था.

‘हैलो, सुधीर, मैं नम्रता बोल रही हूं.’

‘हां, कहो नम्रता, कैसी हो? कल की सब तैयारी हो गई क्या?’

‘यही तो मैं तुम से पूछ रही हूं. यह एक दिन पहले क्या 10 लाख की रट लगा रखी है? मेरे पापा कहां से लाएंगे इतना पैसा?’

‘शांत, नम्रता शांत. इतने सारे प्रश्न पूछोगी तो मैं उन के उत्तर कैसे दे सकूंगा.’

‘बनो मत, तुम्हें सब पता है. तुम्हारी स्वीकृति के बिना वे ऐसी मांग कभी नहीं करते,’ नम्रता क्रोधित स्वर में बोली.

‘तो तुम भी सुन लो, क्या गलत कर रहे हैं मेरे मातापिता? लोग करोड़ों देने को तैयार हैं. कहां मिलेगा तुम्हें और तुम्हारे पिता को आईएएस वर? तुम लोग इस छोटी सी मांग को सुनते ही बौखला गए,’ सुधीर का बदला सुर सुनते ही स्तब्ध रह गई नम्रता. हाथपैर कांप रहे थे. वह वहीं कुरसी पर बैठ कर देर तक रोती रही.

अनिमेष सो रहा था. वह किसी प्रकार लड़खड़ाती हुई अपने कक्ष में गई और कुंडी चढ़ा ली.

शैलेंद्र और सुचित्रा घर पहुंचे तो देर तक घंटी बजाने और द्वार पीटने के बाद जब अनिमेष ने द्वार खोला तो शैलेंद्र बाबू उस पर ही बरस पड़े.

‘यहां जान पर बनी है और तुम लोग घोड़े बेच कर सो रहे हो.’

‘बहुत थक गया था. मैं ने सोचा था कि नम्रता दीदी द्वार खोल देंगी. वैसे भी उन की नींद जल्दी टूट जाती है,’ अनिमेष उनींदे स्वर में बोला.

‘नम्रता? हां, कहां है नम्रता?’ शैलेंद्र बाबू ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘अपने कमरे में सो रही हैं,’ अनिमेष बोला और फिर सो गया.

पर शैलेंद्र और सुचित्रा को कुछ असामान्य सा लग रहा था. मातापिता की चिंता से अवगत थी नम्रता. ऐसे में उसे नींद आ गई, यह सोच कर ही घबरा गए थे दोनों.

सुचित्रा ने तो नम्रता के कक्ष का द्वार ही पीट डाला. पर कोई उत्तर न पा कर वे रो पड़ीं. अब तो अनिमेष की नींद भी उड़ चुकी थी. शैलेंद्र बाबू और अनिमेष ने मिल कर द्वार ही तोड़ डाला.

उन का भय निर्मूल नहीं था. अंदर खून से लथपथ नम्रता बेसुध पड़ी थी. उस ने अपनी कलाई की नस काट ली थी.

अब अगले दिन के तिलक की बात दिमाग से निकल गई थी. वर पक्ष की मांग और उन के द्वारा किए गए अपमान की बात भुला कर वे नम्रता को ले कर अस्पताल की ओर भागे थे.

समाचार सुनते ही नम्रता के मित्र और सहकर्मी आ पहुंचे थे. सुचित्रा और अनिमेष का रोरो कर बुरा हाल था. शैलेंद्र बाबू अस्पताल में प्रस्तर मूर्ति की भांति शून्य में ताकते बैठे थे. कार्तिक ने न केवल उन्हें सांत्वना दी थी बल्कि भागदौड़ कर के सुचित्रा की देखभाल भी की थी.

कार्तिक रातभर नम्रता के होश में आने की प्रतीक्षा करता रहा था पर नम्रता तो होश में आते ही बिफर उठी थी.

‘कौन लाया मुझे यहां? मर क्यों नहीं जाने दिया मुझे? मैं जीना नहीं चाहती,’ वह प्रलाप करने लगी थी.

‘चुप करो, यह बकवास करने का समय नहीं है. तुम ऐसा कायरतापूर्ण कार्य करोगी, मैं सोच भी नहीं सकता था.’

‘मैं अपने मातापिता को और दुख देना नहीं चाहती.’

‘तुम ने उन्हें कितना दुख दिया है, देखना चाहोगी. तुम्हारी मां रोरो कर दीवार से अपना सिर टकरा रही थीं. बड़ी कठिनाई से अनिमेष उन्हें घर ले गया है. तुम्हारे पिता तुम्हारे कक्ष के बाहर बैंच पर बेहोश पड़े हैं.’

‘ऐसी परिस्थिति में मैं और कर भी क्या सकती थी?’

‘तुम पहली युवती नहीं हो जिस का विवाह टूटा है, कारण कोई भी रहा हो. दुख का पहाड़ तो पूरे परिवार पर टूटा था पर तुम बड़ी स्वार्थी निकलीं. केवल अपने दुख का सोचा तुम ने. तुम्हें तो उन्हें ढाढ़स बंधाना चाहिए था.’

नम्रता चुप रह गई. कार्तिक उस का अच्छा मित्र था. उस ने और कार्तिक ने एकसाथ कालेज में व्याख्याता के रूप में प्रवेश किया था. पर सुधीर के कालेज में आते ही नम्रता उस के लटकोंझटकों पर रीझ गई थी.

नम्रता स्वस्थ हो कर घर आ गई थी पर कार्तिक के सहारे ही वह सामान्य हो सकी थी. ‘स्वयं को पहचानो नम्रता,’ वह बारबार कहता. उस के प्रोत्साहित करने पर ही नम्रता ने आईएएस की तैयारी प्रारंभ की थी. उस की तैयारी में कार्तिक ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. पर आज न जाने उस पर क्या बीती होगी.

‘‘हैलो कार्तिक,’’ फोन मिलते ही नम्रता ने कार्तिक का स्वर पहचान लिया था.

‘‘कहो नम्रता, कैसी हो?’’

‘‘मैं कैसी हूं अब पूछ रहे हो तुम? सुबह से कहां थे?’’

‘‘मैं तो तुम से मिलने आया था पर तुम बहुत व्यस्त थीं.’’

‘‘और तुम बिना मिले चले गए? यह भी भूल गए कि तुम ने तो सुखदुख में साथ निभाने का वादा किया है.’’

‘‘आज के संसार में इन वादों का क्या मूल्य है?’’

‘‘मेरे लिए ये वादे अनमोल हैं, कार्तिक. हम कल ही मिल रहे हैं. बहुत सी बातें करनी हैं, बहुत से फैसले करने हैं. ठीक है न?’’ नम्रता ने व्यग्रता से पूछा था.

‘‘ठीक है, नम्रता. तुम भी मेरे लिए अनमोल हो. यह कभी मत भूलना.’’

कार्तिक ने अपने एक वाक्य में अपना हृदय ही उड़ेल दिया था. नम्रता की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे थे. तृप्ति व खुशी के आंसू.

Family Story : मां तो आने से मना ही करेगी न

Family Story : “मैं सिर्फ आप की पत्नी ही नहीं, किसी की बेटी भी हूं.”

“एक बार फिरसे दोहराना.”

“मैं सिर्फ आप की पत्नी ही नहीं, किसी की बेटी भी हूं. यह क्या बचपना लगा रखा है, अभिनव? ट्रेन का समय होने वाला है, आप अब उतर जाइए.”

“मैं तुम्हें यही समझाना चाहता हूं कि तुम्हारी शादी हो  गई, इस का मतलब यह बिलकुल भी नहीं कि तुम्हारी अपने घर से जिम्मेदारी खत्म. वहां तुम्हारे मम्मीपापा का शरीर बुखार से तप रहा है, तुम्हारा कर्तव्य बनता है कि तुम दोनों घरपरिवार का बराबर ध्यान रखो,” ट्रेन की सीट पर तनाव से भरी पत्नी शीतल का हाथ नजाकत से सहलाते हुए अभिनव ने कहा.

“जी, समझ गई. अब उतर जाएं वरना मेरे साथसाथ आप भी रायपुर पहुंच जाएंगे. फिर मेरी बेटी का ध्यान कौन रखेगा. देखिए, गाड़ी चलने लगी है.”

अचानक अपने मातापिता की तबीयत खराब हो जाने से परेशान शीतल चंद मिनटों में अपने मायके के लिए रवाना होने वाली है. उन की 5 साल की बेटी परी इतने दिन बिना उस के पहली बार अकेले रहेगी. यह सोच उस का कलेजा पहले से ही छटपटा रहा था.

“तुम निश्चित हो कर जाओ, यहां की चिंता मत करना, मैं सब संभाल लूंगा.” अभिनव पलपल चलती ट्रेन के साथ कहतेकहते शीतल का हौसला बढ़ाते चले गए.

“आप के भरोसे मांजी, बाबूजी की जिम्मेदारी छोड़े जा रही हूं, उन्हें मेरी अनुपस्थिति में कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए,” मुरझाया चेहरा लिए शीतल बेबसी से अभिनव की ओर देखते हुए कहने लगी.

“तुम परेशान मत हो, पहुंच कर फोन करना,” अभिनव के पैर अब तेज रफ्तार पकड़ती ट्रेन के सामने कमजोर पड़ने लगे और वह वहीं थम कर उसे अपना हाथ दिखा, विदा करने लगा.

” ठीक है, आप अपना ख़याल रखना.”

भरी आंखों से शीतल अभिनव के ओझिल होते तक उसे निहारती रही.

वापस अपनी सीट पर बैठ मन ही मन वह प्रकृति को धन्यवाद देने लगी. क्या यह उन्हीं का आशीर्वाद है कि कुल 4 बहनें होने पर भी आज उसे अपने परिवार में एक बेटा न होने की कमी नहीं खल रही थी. उसे उन क्षण बचपन से सुनते आए अपने मांपिता को वो चुभनभरे ताने एकाएक याद आने लगे.

“बिना बेटेबहू के आप का बुढ़ापा कैसे बीतेगा?” ये बेटियां तो अपनीअपनी ससुराल में व्यस्त हो जाएंगी. आप की जरूरत के समय उन से आप के साथ खड़े रहने की उम्मीद लगाना बेकार की बात है. वे अपने ससुराल का ध्यान रखेंगी या अपने मायके का? सासससुर, पति, बच्चों की जिम्मेदारी से खाली होंगी तब तो आ पाएंगी. अगर ससुराल वाले ही मना कर देंगे तो क्या घर में महाभारत रचा कर उन का आना मुमकिन होगा. आप अपनी दूसरी व्यवस्था कर के रखिएगा वरना आगे चल कर बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा.”

पर आज अभिनव का ऐसा रूप देख कर उस का मन भर आया. शुरुआत में वे छोटीमोटी बात पर मायके जाने की उस की जिद्द को नज़रअंदाज कर दिया करते थे.

उसे भी महसूस हुआ कि बाकी जीजू की तरह, अभिनव को भी उस का मायके बारबार जाना पसंद नहीं. फिर धीरेधीरे शीतल ने ही उन से कहना बंद कर दिया. अब मुश्किल से केवल साल में एक बार जाने का मौका मिल पाता था.

आज घरवालों की इस कठिन परिस्थिति में भी उन के पास कोई भी बहन मौजूद नहीं हो पा रही थी. सब अपनीअपनी समस्याओं में उलझी हुई थीं. यह बताने पर कि, उस के मांपिता ने अपनी कामवाली बाई को पूरे दिन के लिए रख लिया है, तो अभिनव को यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी. उन्होंने तुरंत कहा कि, “बेटा हो या बेटी, अगर जरूरत पड़ने पर उन के खुद के बच्चे सहारा ना बन सके तो फिर किस काम के?”

उसे बिना बताए तुरंत उस के अकेले का टिकट कटा कर अगले ही दिन भेजने का फ़ैसला कर लिया. यह देख उसे बहुत आश्चर्य हुआ. अगर उसे आज अभिनव और अपने सासससुर का साथ न मिलता तो शायद वह भी न उन के पास पहुंच पाती.

उन्हीं की जिद्द थी कि वह मायके जा कर उन का तसल्ली से इलाजपानी करवा कर ही लौटे. उस ने जब सास, ससुर, उन की और परी का हवाला दिया तो अभिनव कहते हैं,

“तुम्हें इस घड़ी में उन के साथ होना चाहिए. मैं मानता हूं कि तुम्हारे बिना कुछ दिन मुश्किल होगी, पर फिर सब मैनेज हो जाएगा.”

यह कहना उन के लिए शायद आसान होगा पर जब करेंगे तब समझ पाएंगे कि इस कभी न खत्म होने वाली जंग में दो पल का चैन नहीं मिलता कि अगली जंग फिर सामने आ खड़ी होती है.

इतना भी सोचविचार नहीं किया कि अकेले सब कैसे संभाल पाएंगे. वह बखूबी जानती थी कि उस की गैरमौजूदगी में सब को कितनी तकलीफ उठानी पड़ेगी. बेटी के हज़ार खाने के नखरे, सासससुर की डायबिटीज और ब्लडप्रैशर की समय पर दवाई की याद, सब का फरमाइशी खानापीना, घर का राशन, बाई का काम देखना आदिआदि इन सब के बाद उन्हें औफिस का काम भी करना होगा.

ट्रेन की खिड़की के बाहर, सीट में अपनी गरदन टिकाए वह खुले आसमान में बादलों को अठखेलियां करते हुए देख यह सब सोच कर यही मनाती रही कि मांपापा जल्दी ठीक हो जाएं और वह अपनी ससुराल समय से वापस लौट आए.

यह विचार करते उस की रात गुजरती रही और अगली सुबह स्टेशन पर उतरते ही औटो पकड़ अपने घर के लिए रवाना हो गई. उस ने अपने घर में आने की जानकारी नहीं दी थी वरना वे लोग उसे आने के लिए मना कर देते. घर पहुंची नहीं कि उसे देख मां ने सवाल पर सवाल बिछा दिए.

“शीतल तुम्हें आने की क्या जरूरत थी? और परी कहां है?”

“मम्मी, मैं अकेले आई हूं. अभिनव उसे संभाल रहे हैं.”

“आसपड़ोस के लोग और बाई भी है. तुम अपनी गृहस्थी क्यों बिगाड़ कर आई हो. वहां तुम्हारे सासससुर हैं, उन का ध्यान कौन रखेगा?”

“मां, तुम चिंता मत करो. अभिनव हैं न, वे सब देख लेंगे.”

“एक मर्द से घर संभालने की उम्मीद करना…मैं तो न कर सकती.”

“अब आ गई है तो तुम्हें खुश होना चाहिए. बेटी, आज हम दोनों को कई डाक्टरों को दिखाना है. यहां से वहां अकेले ऐसी हालत में तुम्हारी मां और खुद को ले कर कहांकहां भटकता, अच्छा किया जो सही समय पर आ गईं.”

“आप नहीं समझेंगे. मां तो आने के लिए मना ही करेगी”

शीतल को भीतर से लगा कि उस ने यहां आ कर एक नेक काम किया. कुछ देर आज उसे क्याक्या करना है, उन दोनों के साथ प्लान कर वह अभिनव को फोन लगाने लगी.

“हेलो, मैं आराम से पहुंच गई थी. तुम कैसे हो? मांजी, बाबूजी और परी सब कैसे हैं?”

“सब ठीक है. तुम यहां की चिंता मत करो. मैं औफिस के लिए थोड़ी देर में निकल रहा हूं. सभी ने अपना खाना खुद निकाल कर खा लिया है. मां ने बाई से सारा काम करवा लिया. बाबूजी खुद दोनों की दवाई निकाल कर समय से खाने की याद रख रहे हैं. और परी, तुम जैसा करती हो, हम सब को अगली चीज करने की याद दिला रही है.”

“हमारी बच्ची इतनी समझदार हो गई है, यकीन नहीं होता,” शीतल मुसकराती हुई आश्चर्य से कहने लगी.

“तुम न जातीं तो पता ही न चलता कि यह लड़की बिना कुछ कहे या टोके अपने सभी काम खुद से कर सकती है. और तुम विश्वास नहीं करोगी, आज उस ने बिना नखरे किए कद्दू की सब्जी अपने हाथों से खाई है.”

“जो सुधार मैं महीनों से नहीं कर पाई वह आप ने एक दिन में ही कर दिखाया. मान गई आप को.”

“तुम्हारा धन्यवाद. मैं ने कहा था न, सब मैनेज हो जाएगा. अब तुम जब वापस आओगी तो सब की आदतें बिलकुल ऐसे ही रहने देना. तभी अपना टीचिंग जौब वापस चालू करने की सोच सकती हो.”

“आप ने सही कहा. सब ऐसा ही चलता रहा तो जल्द शुरू कर पाऊंगी.”

“चलो, तुम ध्यान रखो वहां. मुझे औफिस के लिए देर हो जाएगी.”

“ठीक है.”

अभिनव की बातें सुन कर मानो उस के मन से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो, वहां सब अपने पति को अच्छे से संभाला हुआ पा कर वह अपनेआप निश्चिंत होने लगी. आज अपने पति के प्रति अलग सा प्यार और झुकाव होते उसे महसूस हुआ.

सभी डाक्टरों को दिखा कर रात हो गई. यह अच्छा रहा कि कुछ बड़ी बात नहीं निकली. बस 2 हफ्ते की दवाइयां और आराम भर से उन के जल्दी ठीक हो जाने का आश्वासन पा कर वे सब बहुत खुश हुए.

वहां कुल 10 दिन बिताने के बीच शीतल को अपने बचपन के वो सभी क्षण याद आ रहे थे जब कभी वे बहनें बीमार पड़तीं या चोटिल होती थीं और कैसे उन की मां दिनरात सेवा में लगी रहतीं. पिता नियम से काम पर जाने से पहले उन्हें कड़वी दवाई के घूंट बड़े प्यार से पिला कर जाया करते थे.

तब उन्हें उन के साथ और प्यार की कितनी जरूरत थी. उन के बिना वे जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे.

वहीं, वे शीतल को एकाएक अपने समक्ष पा कर और इतने संवेदनशील दिल का दामाद पा कर बहुत खुश महसूस कर रहे थे.

यह बात तो पक्की थी कि बिना उन के सहयोग व आश्वासन के बगैर कोई भी बेटी अपना घरबार इतने दिन ऐसे छोड़ कर आने की हिम्मत नहीं जुटा सकती थी.

कुछ दिनों बाद उन की तबीयत सुन आसपास के रिश्तेदार और समाज के लोग एक के बाद एक उन से मिलने घर आने लगे. शीतल को बिना बिटिया के मुसकराते हुए देख उन के साथ हर पल साए की तरह मौजूद पा कर सब हतप्रभ रह गए. सब उस से तरहतरह की पूछताछ करते नहीं थक रहे थे.

सभी सवालों की झड़ी के जवाब दे दे कर उसे पता नहीं क्यों भीतर ही भीतर ऐसा पति पा कर सम्मानित महसूस हो रहा था. क्या एक पति का ऐसा ह्रदय दिखाना क्या इतनी बड़ी बात है.

वैसे, देखा जाए तो पीढ़ियों से यही काम एक बहू आजीवन बड़ी निष्ठा से करती आ रही है, क्या तब भी औरों के लिए एक औरत का इतना त्याग करना इतना ही आदरकारी कार्य माना जाता है? खैर.

मातापिता ने हर किसी के सामने प्रफुल्लित हो अपने दामाद की प्रशंसा करते हुए कहने लगे, “उन्होंने ही जिद्द कर शीतल को हमारे पास अकेले यहां भेजा और अगली ही ट्रेन से. इतने दिनों के लिए हमारे पास निश्चिंत हो हमारा ख़याल रख रही है.

तो फिर क्या था. सब ने केवल एक बात दोहराई, “भई, दामाद हो तो ऐसा.”

“भई दामाद हो तो ऐसा.”

जब एक लड़की की शादी हो जाती है तो उसे, बस, घर की बहू के रूप में ही क्यों देखा जाता है?

जिन्होंने उसे जन्म दिया, पालापोसा, पढ़ायालिखाया, अपने कलेजे का टुकड़ा समझा, हर सुखदुख में चट्टान की तरह साथ दिया. इतने संस्कार और सामंजस्य की घुट्टी पिलाई कि वह ससुराल जा कर एक आदर्श बहू की उपाधि प्राप्त कर सके.

फिर ऐसा क्यों होता है कि किसी मुश्किल घड़ी में या बुरा वक्त आने पर उसे उस के ही जन्मदाता से पराए की तरह बरताव करने के लिए दबाव डाला जाता है. इस बात को क्यों अहमियत नहीं दी जाती कि वह एक पत्नी-बहू-मां के साथसाथ किसी की बेटी भी है.

Romantic Story : नजराना – क्या हुआ था जारा के साथ

Romantic Story : याद एक ऐसा शब्द, जिसे सोचते ही मन मानो कहीं गुम सा हो जाता है. कितनी अनोखी और अनूठी होती हैं ये यादें. कभी होंठों पर मुसकराहट ले आती हैं तो कभी आंखों को आंसुओं से नवाज देती हैं. कुछ पलों को याद कर हम हंस पड़ते हैं, तो कुछ पलों के जिक्र से ही आंखों से आंसुओं की लड़ी बह जाती है. लेकिन कुछ यादें हमारी जिंदगी में हमारे साए की तरह हमारे साथ हर पल रहती हैं.

यादों के कुछ ऐसे ही भंवर में उलझी जारा जब अपनी बड़ी सी काली गाड़ी से उतरी तो अचानक उस की आंखें डबडबा आईं. उस की आंखों के आगे वो सपने तैरने लगे, जो तकरीबन 15 साल पहले उस ने इस मंदिर जैसे स्कूल में बिताए थे. उस के मन में भावनाओं का बवंडर उठ रहा था. अनचाहे ही वह अतीत की उन गलियों में खोती जा रही थी, जिन से वह 15 साल पहले गुजर चुकी थी.

आज वह उस महरून रंग की इमारत के सामने खड़ी थी, जिस की बड़ी सी दीवार पर एक तरफ बड़ी ही खूबसूरती से लिखा गया था, ‘भारतीय विद्या भवन’ और दूसरी तरफ स्टील से बना उभरा हुआ स्कूल का ‘लोगो’ जड़ा हुआ था.

इमारत के चारों तरफ हरेभरे पेड़पौधे बिलकुल वैसे ही लगे हुए थे जैसे उस ने 15 साल पहले इस स्कूल को छोड़ते समय थे. यहां इस जगह की हवा में ही मानो गुलाब की खुशबू घुली हुई हो.

जारा ने लंबी सांस ली तो ये खुशबू उस के जेहन में घुल गई. जारा को मानो कई सालों बाद ऐसा सुकून मिला हो. लेकिन सुकून के साथ वो तमाम यादें भी उस के जेहन में उतर गईं, जिन्हें भुलाने की वो हजार मरतबा नाकाम कोशिशें कर चुकी थी. अब तो मानो वह हिम्मत ही हार चुकी थी या यों कहो कि समझ चुकी थी कि ये यादें उस का साया बन हमेशा उस के साथ चलती रहेंगी. पर इस बार आसपास के माहौल को समझते हुए उस ने अपनेआप को संभाला और अपनी नीले रंग की चिकन की कढ़ाई वाली साड़ी जिस पर जहीन कारीगरी की गई थी, उसे उस के सब से अजीज दोस्त सिद्धार्थ ने दी थी. ये उस का पसंदीदा रंग था. उसे ठीक करते हुए वह आगे बढ़ी और चलतेचलते स्कूल की दहलीज तक पहुंच गई. अंदर जाते हुए उस ने महसूस किया कि इतने सालों में वहां कुछ भी तो नहीं बदला था. वही खुशबू, वही सजावट और सब से बड़ी बात वही रीतिरिवाज.

दरअसल, आज यहां एक अंतर्राष्ट्रीय समारोह था, जिस के मुख्य अतिथि के रूप में जारा को आमंत्रित किया गया था, क्योंकि वह आईपीएस अफसर थी. वैसे तो यह उस के लिए गर्व का समय था, पर आज वह थोड़ी दुखी थी. उसे दुख इस बात का था कि ये सपना जिस का था आज वो ही वहां नहीं था. ये सिद्धार्थ का सपना था, उस सिद्धार्थ का, जिस ने कभी उसे किसी मोड़ पर अकेला नहीं छोड़ा था. जो हमेशा उस का सब से अच्छा दोस्त था. इतना अच्छा कि वक्त आने पर उस के लिए वो किया, जो शायद कोई सगा भी नहीं करता, लेकिन आज वह ही उस के साथ नहीं था.

आज उस दहलीज पर खड़े हुए उस पर फूल बरसाए जा रहे थे और स्कूल की हेड गर्ल द्वारा उस के माथे पर तिलक लगाया जा रहा था, यह देख कर… एक बार फिर वो 25 साल पहले की यादों में गुम हो गई, जब वह भी कभी इस स्कूल की हेड गर्ल हुआ करती थी और बिलकुल इस तरह से ही आईपीएस अफसर को तिलक लगाया करती थी…

उसे याद था कि तब सिद्धार्थ गंभीर स्वर में कहता था, तू देखना एक दिन मैं भी आईपीएस अफसर बनूंगा और मुझे भी ऐसे ही सम्मान दिया जाएगा.

उस ने यह कह तो दिया, पर शायद तकदीर को कुछ और ही मंजूर था…

आज उसे फिर याद आ रहा था कि कैसे वो मस्त, मगन हो कर इस स्कूल में पढ़ने के साथसाथ टेनिस कोर्ट में पूरापूरा दिन खेलती थी और सिद्धार्थ से झगड़ा भी करती थी… पर यहां इस जगह से सिर्फ खुशियों के लम्हे ही नहीं जुड़े थे, बल्कि कुछ ऐसे अंधेरे पल भी थे, जिन्होंने उस की जिंदगी का रुख ही मोड़ दिया.

आज जैसेजैसे वो इस जगह का दौरा कर रही थी, उसे हर मोड़ पर कुछ न कुछ तो याद आ ही जाता. जैसे – कैसे वह हर बार जल्दीजल्दी में उन सीढ़ियों से ऊपर जाती, जिन से जाने के लिए अर्चना मैडम, पीटी टीचर ने मना किया होता था… और कैसे वह 8वीं कक्षा में लंच ब्रेक से पहले ही पीरियड में लास्ट बेंच पर बैठ कर टिफिन खा लिया करती थी.

ये सब सोच कर उस के होंठों पर एक मुसकान तैर गई थी…

लेकिन फिर एक मोड़ ऐसा भी आया, जहां वह स्तब्ध सी खड़ी रही. यह वह मोड़ था, जहां वो लम्हा गुजरा था, जिस ने उस से हमेशाहमेशा के लिए उस का सब से अच्छा दोस्त छीन लेने की तैयारी शुरू कर दी थी. उस की आंखों के आगे उस अंधियारे दिन का दृश्य झिलमिला आया, जब सुबह से ही बादल कड़क रहे थे और चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था… बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी. मां तो ऐसा भयानक मौसम देख कर पहले ही मना कर रही थी, “जारा, आज छुट्टी कर ले…” पर उस ने ही मां को समझा दिया और स्कूल चली गई.

उस दिन हम सब का फेयरवेल था और सब में उत्साह की एक लहर दौड़ रही थी, पर… कौन जानता था कि इस दिन की याद एक काला सच बन कर रह जाएगी…

हम सब स्कूल के औडिटोरियम में थे कि तभी गोली चलने की आवाज कानों में गूंज गई और हाल में भगदड़ मच गई… पर हम ने हिम्मत से फैसला लेने की सोची और शांत हो कर वहीं खड़े रहे. सब डरे हुए थे, पर फोन की लाइट से अंधेरे में रास्ता ढूंढ़ते हुए सब तो किसी तरह बाहर निकल गए, पर खुद मैं ही पीछे… न जाने कैसे मेरा दुपट्टा किसी जगह अटक गया. मैं हड़बड़ा कर उसे निकालने की कोशिश करने लगी, पर अचानक एक गोली चलने की आवाज आई और फिर महसूस हुआ कि वह गोली तो मेरे ही माथे से छू कर गुजर गई थी… एक पल में अंधेरे में भी आंखों के आगे अंधेरा छा गया था.

मैं नहीं जानती कि उस के बाद क्या हुआ… कैसे मैं उस हाल से बाहर निकली… कैसे मैं अस्पताल पहुंची…? बस जानती हूं तो इतना कि जब होश आया तो महसूस हुआ कि मेरी जिंदगी का रुख इस आंधी ने बुरी तरह से मोड़ दिया.

सिद्धार्थ ने मुझे बताया था कि उन गुंडों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था… वो क्यों आए, ये तो उस ने नहीं बताया. ये भी तब बताया था, जब मैं पूरी तरह से होश में नहीं थी… जब होश में आई तो महसूस हुआ कि चारों तरफ अंधेरा था. पहले तो लगा कि वहम है, या सपना है, पर नहीं… यह हकीकत थी… एक कड़वा सच, जिसे वो चाह कर भी अपना नहीं पा रही थी. मैं अपनी आंखों की रोशनी खो बैठी थी… काफी मुश्किलों से उस ने अपने बिखरते अस्तित्व को संभाला था.

लेकिन, कहते हैं न, हर अंधेरी रात अपने साथ नई सुनहरी सुबह भी लाती है… वैसे ही जारा ने भी उम्मीद के साथ अपनेआप को जिंदगी के इस नए ढांचे में ढाल लिया और अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया और बिलकुल सहज तरीके से जीना शुरू कर दिया. उधर उस के मां, पापा और बाकी सभी रिश्तेदारों ने उस के लिए एक ‘डोनर’ की तलाश शुरू कर दी थी… आखिर कब तक वे अपनी लाड़ली बेटी को इस हालत में देखते.

समय कब किसी के लिए रुका था, जो अब रुक जाता. जनवरी से अप्रैल कब निकल गया, किसी को पता ही नहीं चला. पूरे 5 महीने हो गए थे उस हादसे को. अब तो जारा को भी मानो इस अंधेरी रात की आदत सी हो गई थी. उस ने हादसे के बाद भी बोर्ड की परीक्षा अच्छी तरह पूरी मेहनत और लगन के साथ दी थी.

आज 24 अप्रैल था, उस का बर्थडे… एक ऐसा दिन, जब उसे तोहफे में सब का प्यारदुलार और सुंदरसुंदर उपहार मिलते हैं… इस बार भी वह खुश थी… पर कहां जानती थी कि आज ही उस की बेरंग जिंदगी में एक नया मोड़ आने वाला था… आज हमेशा की तरह सिद्धार्थ घर आया. उस के आने की आहट और उस के वही परफ्यूम की महक, जो मेरे आसपास को महका देती थी, जारा को उस के आने का पता चल गया. उस के आने से ही मानो जारा खुश हो गई, क्योंकि उसे पता था कि इस बार भी उस का गिफ्ट सब से हट कर होगा… वो आया और उस के पास बैठ गया.

उस ने उसे बताया कि वो शहर से बाहर थोड़े दिन के लिए कहीं दूर, छुट्टियों पर जाना चाहता था…

उस की यह बात सुन कर थोड़ी सी हैरानी तो हुई थी उसे, पर फिर सोचा कि 12वीं की परीक्षा है, जिस के बाद थोड़े दिनों के लिए कहीं जा रहा होगा… वो ये सब सोच ही रही थी कि तभी उस ने उस के हाथ में एक लिफाफा पकड़ा दिया और कहा कि इस में बहुत ही कीमती चीज है, जिसे वो उसे सौंप रहा था… लेकिन उस ने उसे वो खोलने नहीं दिया और चुपचाप बिना कुछ कहे ही वहां से चला गया.

जब उस का भाई आया, तो जारा ने उसे वो लिफाफा दिया और खोलने को कहा. उस को खोलने पर पता चला कि उस में एक फोटोफ्रेम था, जिस में उन दोनों के फोटो थे और साथ ही एक चिट्ठी भी थी, जिस में कुछ लिखा था… जिसे पढ़ कर उस की आंखों से आंसुओं की बूंदें लुढ़क आईं. सिद्धार्थ को लास्ट स्टेज कैंसर था और उस का ट्रीटमेंट भी अब नहीं हो सकता था. जातेजाते उस ने अपनी आंखें जारा के नाम कर दी थीं.

ये सब सुन कर उस की आंखें नम हो गईं… वैसे तो उसे खुश होना चाहिए था कि उसे उस की अंधेरी दुनिया में एक बार फिर एक रोशनी की किरण कहीं किसी कोने से आती काले बादलों को हटा रही थी. पर आज वो खुश नहीं, बल्कि दुखी थी इस बात से कि वो कैसे इतनी खुदगर्ज हो गई कि वह उस दोस्त का साथ न दे सकी, जिस ने जिंदगी के हर मोड़ पर उस का साथ दिया था. सिद्धार्थ ने कभी भी उस को ऐसा फील ही नहीं होने दिया कि वह कमजोर है, बल्कि वह तो हमेशा की तरह उस को हिम्मत देता रहा और उसे जिंदगी से डट कर लड़ना सिखाता रहा.

पत्र में उस ने लिखा था, सिर्फ अपनी आंखें ही नहीं, उन से देखे सपने भी तुम्हें सौंप कर जा रहा हूं. अब उन्हें पूरा करना तुम्हारा काम… वह खुद तो चला गया, पर मुझे एक नई जिंदगी दे गया… ऐसी जिंदगी, जिस में रंग भी थे और जीने का एक मकसद भी.

सिद्धार्थ के जाने के बाद मानो मैं ने ठान लिया कि उस के सपने को मैं पूरा कर के ही रहूंगी और शायद इस वजह से ही आज मैं इस मुकाम तक पहुंच पाई थी… सिद्दार्थ का आईपीएस बनने का सपना उस ने पूरा किया. उस की आंखों के सपने को उस ने अपनी मेहनत और लगन से पूरा कर दिखाया था.

जारा इतनी गुम थी उन गलियों में कि उसे पता ही नहीं चला कि कब फंक्शन खत्म हुआ और वह कब अपनी गाड़ी में बैठ गई थी. लेकिन जब होश आया तो वह घर नहीं गई, बल्कि उस गार्डन की ओर चल दी जहां कभी सिद्धार्थ को आना पसंद था.

अपने खत में उस ने यह भी लिखा था कि कहीं कभी जिंदगी के किसी मोड़ पर मेरी याद आए तो आ जाना उस जगह, जहां हवाओं में घुले हों मेरे ख्वाब और जुड़ी हुई हैं हमारी अनगिनत यादें… वो अच्छी तरह समझ गई थी कि वो जगह और कोई नहीं, रोज गार्डन ही थी, जहां सिद्धार्थ सपने देखा करता था. सुंदर और रंगीन सपने, बिलकुल वहां लगे फूलों की तरह.

आज इतने सालों के बाद उस जगह में बैठे हुए उसे सिद्धार्थ के होने का अहसास साफ महसूस हो रहा था. वह मानो उस की यादों से बाहर निकल आज उस जगह जारा के बिलकुल पास बैठा हो उस से बात करता हुआ. उस के होने के एहसास भर से उसे 15 सालों की थकान से आराम मिल गया हो. उसे समझ आया कि ऊपर वाले ने उस को सब से बहुमूल्य नजराना दिया था, उस का दोस्त… उस का साथी… सिद्धार्थ… और सिद्धार्थ का नायाब नजराना था उस की आंखें… जातेजाते भी उस ने अपना सब से हट कर, सब से कीमती, सब से प्यारा तोहफा देने का सिलसिला कायम रखा था.

अब तो ऐसा लगता है मानो वो कोई फरिश्ता था, जो दूर कहीं से बस उसे एक नायाब नजराना देने आया था. वो आया… जारा की जिंदगी का अटूट हिस्सा बन गया… और गया तो अपने पीछे जिंदगी में हजारों रंग भर गया… और छोड़ गया वो सपने, जो उस ने देखे थे. जारा उठी और बढ़ चली अपने सिद्धार्थ के सपनों को हासिल करने.

Writer- सावी मंगला

Hindi Story : भूली-सी पीर – कमला अपनी मालकिन को क्या समझाने की कोशिश कर रही थी

Hindi Story : सब्जी की दुकान में न जाने कहाँ से इतनी भीड़ टूट पड़ी थी .“कमला तुम झोला लेकर ज़रा मेरे आगे-आगे चलना .मैंने अपनी गृह सहायिका को बोला ही था कि एक सज्जन ने मुझे घूरते हुए कहा “मैडम सुना नहीं आपने, अपना काम अब खुद करने की आदत डाल लीजिए .क्यों भई? मैंने उनसे पूछा .“कोरोना का आदेश है बहन जी .अपना काम स्वयं करो, नहीं तो मरो .कहते हुए उन्होंने ठठा कर हँस दिया .बेवक्त की हँसी ने मेरे मन को झुंझलाहट से भर दिया था .फिर भी मैंने आहिस्ता से उनसे कहा, “हाँ भई हाँ ! जानती हूँ .“वैसे आपको बता दूँ कमला मेरे परिवार की सदस्य जैसी ही है .बचपन से मेरे साथ जो रहती आ रही  है .”

उन सज्जन को थोड़ा शांत करते हुए मैंने कमली से पूछा .“अब बता, घर में कौन-सी सब्ज़ी की जरूरत है?” ”आप ही देख लो जिज्जी जो आप को अच्छा लगे उसी की जरूरत बन जाएगी .कमला की ओर मैंने मुड़कर देखा, वह मंद-मंद मुस्कुरा रही थी .“अच्छा, तू मेरा मजाक बना रही है न!” सुनते ही कमला बोली  “राम राम जिज्जी आपकी मजाक बनाऊं तो मेरी जुबान ही कट जाए .“अच्छा ठीक है, बातें मत बना, झोला ठीक से सम्हाल .

“सब्ज़ी खरीदने का काम तुझे ही मुबारक हो कमली .

“ तो फिर जिज्जी आप बाहर चली जाओ,मैं ख़रीद लेती हूँ .

कमला को शायद मेरे ऊपर तरस आ रहा था .“कोई बात नहीं आज तो मैं ही ….मैंने उससे कह तो दिया लेकिन चारों ओर तरह-तरह की सब्जियाँ-फल और ऊपर से सड़ी-गली सब्जियों का ढेर .थोड़ी देर में मेरा मन उकताने-सा लगा था लेकिन समय जब कान खींचता है तब हम शिकायत करने योग्य नहीं बचते हैं .

टमाटर उठाते हुए मैंनेबगल वाली डलिया में झाँका चुआ हरे बंदगोभी मेरी ओर ही टकटकी लगाये देखे जा रहे थे .शायद वे मुझसे कुछ कहना चाहते थे .जब मैंने ये सोचा तो थोड़ा और उनकी ओर झुक गई .वे फुसफुसाकर बोले, “मुझे ख़रीदना मत भूलना .आज सुबह से किसी ने मुझे छुआ तक नहीं है .मैंने झट से एक बड़ा-सा बंदगोभी उठा लिया .अभी मैं उसको घुमा-फिरा कर देख ही रही थी कि बगल में खड़ी बहन जी ने हड़बड़ाते लगभग मेरे ऊपर गिरते कहा…… “छोडो इसे .और याद से इसको कभी मत लेना .“क्यों इसको क्या हुआ है?” मैंने कहा .“अरे, आपने सुना नहीं व्हाट्सएप पर इसकी बड़ी चर्चा और निंदा हो रही है .उन्होंने समझदारी की पलकें मेरी ओर झपकाते हुए कहा .मैंने भी बेफिक्री में कह दिया .“बहन जी, वहाँ बंदगोभीकी चर्चा नहीं,कोरोनावाइरस की चर्चा और चीन की निंदा हो रही है .बहन जी भय से काँपते हुए बोलीं .“अरे! हँसो नहीं मैडम,इसमें “कोरोनावाइरस” के तत्व हैं .अरेss! थकान से भरे मेरे मन ने बस इतना ही बोल पाया .लेकिन बंदगोभी अभी भी मेरे हाथ में मुस्कुरा रहा था .मैं उसको रखने के लिए सोचा ही था कि कमला बोल पड़ी .“जिज्जी इसे झोले में डाल दो, ऐसे तो आप आप थक जाओगी .“कमला, थोड़ा धनिया उठा लाओ और बस चलो,अब घर चलते हैं .”

गाड़ी में पीछे की सीट पर सब्जी का झोला रख कमला भी वहीँबैठने लगी .मैंने उससे कहा “तू पीछे नहीं आगे आकर बैठ .अक्सर मेरे इस “प्रपोजल” से वह चहक उठती थी लेकिन आज उसपर कुछ असर ही नहीं हुआ .कमला क्या हुआ ? “कुछ नहीं जिज्जी.“रियरब्यूमिरर” में झाँक कर वह बोली .“तो फिर तू इतनी उदास क्यों है ?” छोडोन ! जिज्जी.कमली जो बात मन को भारी बना दे उसको कह देने में ही भलाई है .मैंने उससे मनुहार करते हुए कहा तो वह मान गई .”जिज्जी एक बात पूछूँ .“हाँ पूछ न! उसमें इजाज़तलेने की क्या बात है .गाड़ी का स्टेयरिंग घुमाते हुए मैंने कहा .“आप बुरा नमनोतो कहें जिज्जी. आपने बंदगोभी क्यों नहीं खरीदा ? आज तो आप “चाऊमीन” बनवाने वाली थीं .“अच्छा, तो तुम अभी तक बंदगोभी में ही बंद पड़ी हो .“नहीं हँसी बात नहीं जिज्जीसही बताओ न ! अरे कमली, सुना नहीं तूने, उसमें “कोरोनावाइरस” का असर है .“आप भी जिज्जी!” कहते हुए कमला अचानक गहरी उदासी में डूब गई .“तुझे क्या हुआ ? तू इतनी परेशान क्यों दिख रही है.”

“कुछ नहीं जिज्जी.”

“नहीं, अब तो तुझे बताना ही पड़ेगा .मैंने कहा .

मेरे बहुत कहने पर कमला बोली – “अब देखो न जिज्जी ये लोग भी किसी के सगे नहीं  होते , जिससे चाहते हैं अपने मतलब भर काम निकाल कर लोगों को लतिया देते हैं .उस पर मोबाइल और वहाट्सएप, सोने पे सुहागा.“कमला तू पहेलियाँ मत बुझा सीधे-सीधे मुद्दे पर आ और बता, मुझे बात क्या है.”

दुपट्टे से गाल पर लुढ़के आँसुओं को पोंछते हुए वह बोली .“अभी कुछ समय पहले ही तो एक बुखार चला था, दिमाग़ीबुख़ार.“हाँ तो . “तो क्या जिज्जी, उसका जिम्मा भी इसी तरकारी पर आया था और अब “किरोनाबाइस” की जिम्मेवारी भी ………. बेचारा ग़रीब बंदगोभी, अब समझ लो इसके लदने के दिन आ गए .कहते हुए कमला ने निगाहें पैरों पर गढ़ा लीं .“कमला अभी भी कुछ कहने को बाकी है उसे भी कह डाल तुझे सुकून मिलेगा.मैंने गाड़ी सड़क के किनारे लगाते हुए कहा.

जिज्जी!, हाँ बोल न ! कमला क्या हुआ ? कमला हमारी सीट की ओर झुक आई.

“जिज्जीउन मजदूरों का क्या होगा जो पोटली भर गृहस्थी लेकर अपने घरों की ओर चल पड़े हैं ?” “तूने उनको कहाँ देखा ?”अपनी बबिताबेबीमोबाइल में देख रही थी, तभी .कमला की बात सुनकर उत्तर न सूझ रहा था .लेकिन कमला की आँखों से पलायन का दर्द आँसू बनकर एक साथ झरझरा पड़ा था .“तू तो सात बरस की थी कमली जब मुंबई से………तुझे याद है क्या ?”वो कुछ कहती उसके पहले मैंने उसकी धडकनों को अपनी धडकनोंसे मिला लिया था .

लेखिका : कल्पना मनोरमा

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