Gender Affirming Surgery: ट्रांसजेंडर्स के प्रति समाज का संकुचित नजरिया धर्म की देन है जो इसको पूर्व जन्म के कर्मों से जोडकर उन्हें उपेक्षित रखने की बड़ी वजह है. लेकिन जेंडर अफार्मिंग सर्जरी की बढ़ता चलन धर्म की इस धूर्तता की भी पोल खोल रहा है. यह सर्जरी हालाँकि बहुत आसान नहीं है लेकिन अब बहुत ज्यादा मुश्किल भी नहीं रह गई है. देश भर के अस्पतालों में सालाना कोई दो हजार ऐसी सर्जरी होती हैं.
बहुत आसान शब्दों में समझें तो मन में जैसा जेंडर होता है वैसा ही शरीर के जेंडर को भी बना देने का आपरेशन जेंडर अफार्मिंग सर्जरी कहलाता है. असल में कुछ लोगों के साथ होता यह है कि उनका शरीर तो लड़कों जैसा होता है लेकिन मन से उन्हें बहुत तेजी से लगता है कि वे दरअसल में लड़की हैं. उन्हें नीचे भेजते वक्त उपर बाले से कोई मिस्टेक हो गई है जिसे अब सुधारा जाना नामुमकिन है. ठीक उलट कुछ लड़कियों को भी यही महसूस होता है कि वे हकीकत में लड़का हैं पर भगवान जल्दबाजी में इस तरफ ध्यान नहीं दे पाया.
ऐसे लोगों को ट्रांसजेंडर कहा जाता है जिनके दिलोदिमाग पर बचपन से ही ऊपर बताया बोझ होता है जो उम्र बढ़ने के साथ साथ और बढ़ता जाता है. फिर एक मुकाम ऐसा भी आता है कि वे इस भार को बर्दाश्त नहीं कर पाते और डिप्रेशन में चले जाते हैं. कुछ तो इस श्राप से मुक्ति के लिए आत्महत्या तक कर लेते हैं.. ऐसी स्थिति जिसमे आदमी अपनी लैंगिक पहचान यानी जेंडर आइडेंटिफिकेशन को लेकर फ्रस्टेशन में फस जाता है को विज्ञानं जेंडर डिसफोरिया कहता है.
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