Gen Z Protest India: दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों लुका छिपी के खेल में प्रोटेस्टर पुलिस और सरकार के लिए आफत सी बन चुके हैं. उनकी हिम्मत तोड़ने पुलिस उन्हें गिरफ्तार तो कर लेती है पर पहले के आंदोलनकारियों की तरह ज्यादा देर तक हिरासत में लेने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही. तय है वह नहीं चाह रही कि अब कोई नए अभिजीत दिपके और नेहा बोरा पैदा हों. वजह इन्हें गिरफ्तार करने के बाद युवाओं की भीड़ की हिम्मत टूटती नहीं वह खुद ही मोर्चा संभाल लेती हैं..दो चार तो संभल नहीं रहे अगर ऐसे ही कुछ और पैदा हो गए तो उन्हें गिरफ्तार लेना तो दूर की बात है घूरना भी महंगा पड़ जायेगा.
नेहा बोरा को गिरफ्तार कर चंद घंटों बाद ही छोड़ दिया गया, अभिजीत के खिलाफ जरुर क़ानूनी काररवाई की गई जिन्हें उम्मीद है कोर्ट से जमानत मिल जाएगी और वे फिर से तिरंगा थामे सड़कों पर आ जाएंगे. पुलिस और सरकार को सूझ ही नहीं रहा है कि इन जुनूनी युवाओं के साथ क्या सलूक किया जाए कि वे ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की जिद छोड़ अपने अपने घरों में जाकर अष्टमी, नवमी की पूजन करें और दशहरे पर किसी रामलीला मैदान में पोपकोर्न खाते रावण दहन का लुत्फ़ उठाएं.
दिक्कत तो यह है कि नए दौर के ये युवा इन धार्मिक ढकोसलो में यकीन नहीं करते. क्योंकि उन्हें देश की चिंता है धर्म की होती तो माथे पर लाल चूनर बांधे जोर से बोलो जय माता दी.. और तू ने मुझे बुलाया शेरा बालिये मैं आया मैं आया शेरा बालिये .... जैसे गलाफाडू भजन गाते किसी भंडारे में कन्या भोज करा रहे होते. इस चक्कर और ऊहापोह में ठंडी होने के बजाय प्रोटेस्ट की आग और ज्यादा सुलग रही है.
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