Gen Z Micro Labeling: अगर आपने कभी किसी को कहते सुना है कि मैं इंट्रोवर्ट नहीं हूँ, मैं ओम्निवर्ट हूँ या मैं लेजी नहीं हूँ मैं बेड-रॉटिंग कर रहा हूँ या मुझे एंग्जायटी नहीं है मुझे हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी है तो आप Gen Z की सबसे बड़ी आदत माइक्रो-लेबलिंग से परिचित हो चुके हैं. आइये थोड़ा और करीब से जानते हैं कि क्या है Gen Z की माइक्रो-लेबलिंग?
पहले की दुनिया बहुत सिंपल थी. इंसान या तो खुश होता था या दुखी होता था. या तो प्यार होता था या नहीं होता था. या तो वो इंट्रोवर्ट था या एक्सट्रोवर्ट था. Gen Z ने इस सिंपल दुनिया को थोड़ा जटिल कर दिया है. जेन-जी ने बीच के सारे शेड्स को निकालकर हर एक शेड को एक नया नाम दे दिया है. इसी को माइक्रो-लेबलिंग कहते हैं.
अब सैड होना काफी नहीं है. आपको बताना पड़ेगा कि आप सैड गर्ल ऑटम में हैं या आप मेन कैरेक्टर एनर्जी से बर्नआउट में चले गए हैं. अब रिलेशनशिप सिर्फ बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड नहीं रहा. अब यह टॉकिंग स्टेज में होता है, सिचुएशनशिप है, फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स है या स्लो बर्न है. अब काम न करना भी आलस नहीं है. वो बेड-रॉटिंग है, वो गॉब्लिन मोड है.
अब सवाल यह है कि आखिर इमोशन्स की यह नई परिभाषायें आईं कहाँ से? इसकी तीन बड़ी वजह हैं. पहली है थेरेपी टॉक. Gen Z पहली जनरेशन है जो खुलकर मेंटल हेल्थ पर बात करती है. टिकटॉक और इंस्टाग्राम पर थेरेपिस्ट गैसलाइटिंग, लव बॉम्बिंग, बाउंड्रीज, अटैचमेंट स्टाइल जैसे हर रोज नए शब्द सिखाते हैं. तो जो चीज पहले बस मूड खराब थी, अब उसका नाम है एंग्जियस अटैचमेंट.
दूसरी वजह है एल्गोरिदम. इंस्टाग्राम और टिकटॉक आपको बताते हैं कि आप कौन हैं? अगर आप दिन भर पलंग पर हैं तो एल्गोरिदम कहेगा आप क्लीन गर्ल नहीं हैं, आप बेड-रॉटिंग कर रहे हैं. अगर आप सबकी मदद करते-करते थक गए हैं तो आप पीपल प्लीजर हैं. एल्गोरिदम ने हर आदत को एक एस्थेटिक बना दिया है.
तीसरी सबसे बड़ी वजह है कंट्रोल की चाह. दुनिया बहुत अनिश्चित है. जॉब का पता नहीं, क्लाइमेट का पता नहीं, AI नौकरी खा जाएगा. जब बाहर कुछ भी कंट्रोल में नहीं लगता तो कम से कम अपने अंदर के एहसास को नाम देकर तो कंट्रोल किया जा सकता है. नाम मिल गया तो लगता है कि हाँ, मैं अकेला नहीं हूँ, मेरे जैसे और भी लोग हैं.
इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी. फायदा ये है कि अब बात करना आसान हो गया है. पहले हम कहते थे पता नहीं क्या हो रहा है? अब हम कहते हैं मेरा सोशल बैटरी खत्म हो गया है और सामने वाला तुरंत समझ जाता है. लेकिन इसका नुकसान ये है कि हम कभी-कभी लेबल में ही फंस जाते हैं. हर आलस प्रोक्रास्टिनेशन नहीं होता और हर गुस्सा ट्रॉमा रिस्पॉन्स नहीं होता. कभी-कभी हम बस थके होते हैं इसलिए लेबल को मदद के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, पिंजरे के लिए नहीं. असल में Gen Z ने हमें ये सिखाया है कि इंसान सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होता. इस ब्लैक एंड व्हाइट के बीच में 50 शेड्स और होते हैं और हर शेड का एक नाम होना जरूरी है ताकि वो दिखे, ताकि वो वैलिड भी लगे. Gen Z Micro Labeling




