Serbia Gen Z Protest: सर्बिया का चुनावी नतीजा दुनिया भर के दक्षिणपंथी शासकों के लिए एक अलार्म है जिसने साबित यह किया है कि राष्ट्रवाद, धार्मिक ध्रुवीकरण और धर्म स्थलों की सरपरस्ती में चल रही राजनीति और सत्ता का किला कागजी होता है जिसे जेन जी ही ढहा सकती है. जिसका अहम मकसद सिस्टम में सुधार का है जो न हो तो वह सत्ता भी हथियाने से भी चूकती नहीं.
दक्षिणी यूरोप के छोटे देशों में में शुमार सर्बिया के चुनावी नतीजे दुनिया भर के लिए अहम हो चले थे जिनसे इकलौती अहम बात यह साबित होना थी कि अति राष्ट्रवाद पर युवाओं की लोकतांत्रिक चेतना भारी पड़ेगी या फिर कट्टरवाद का कागजी किला जिसकी बुनियाद ही हुक्मरानों की मनमानी, अहंकार, रूढ़ियां और धर्म की राजनीति हैं ज्यों का त्यों खड़ा रहेगा. एक तरह से यह चुनाव यह भी साबित करने बाला था कि डराने और बांटने की राजनीति की कोई `एक्सपाइरी डेट` होती भी है या नहीं और होती भी है तो उसकी मियाद लगभग कितनी होती है.
बीती 26 अक्तूबर को सर्बिया के इलेक्शन कमीशन ने जब नतीजे घोषित किए तो वहां यह मियाद 14 साल निकली. जेन जी की महज डेढ़ महीने पहले विधिवत गठित हुई नई नवेली पार्टी स्टूडेंट लिस्ट ने सत्तारूढ़ सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी यानी एसएनएस को चलता कर दिया. लेकिन यह बदलाब बहुत आसान नहीं था. इसके लिए सर्बिया के छात्रों को कोई दो साल सड़कों पर आंदोलन और धरने प्रदर्शन करना पड़े थे. इस आंदोलन को खत्म करने और छात्रों की हिम्मत तोड़ने के लिए राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वुसिक ने वे तमाम हथकंडे आजमाए जो आमतौर पर कोई भी तानाशाह अपनाता है.
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