Voting Rights: क्या वोट का अधिकार एक शासन पद्धति को लोकतंत्र में बदल देता है. 1952 में भारत में जब पहली बार देश में सभी नागरिकों को ले कर चुनाव हुए तो क्या लोकतंत्र आ गया था. चुनाव हमारे यहां पहले भी होते रहे थे पर ब्रिटिश इंडिया में वोट देने की शर्तें इतनी कठिन थीं कि ब्रिटिश इंडिया, रियासतों को छोड़ कर बाकी में से सिर्फ 3-4 फीसदी लोग वोट दे पा रहे थे.

कांग्रेस को वोट के हक का पता था और कांग्रेसी न केवल चुनावों में भाग लेते थे, वे अपने अध्यक्ष को भी चुनते थे, वोटों से. दूसरी तरफ हिंदू महासभा, राम राज परिषद, आर्य समाज जैसे संगठनों में वोट देने का रिवाज नहीं था. वहां गुरु या कहीं से आ टपका जना नेता या प्रमुख बन जाता था और फिर वह अपनी गद्दी या तो अपने बेटे को दे देता था या फिर चेले को. आम लोग जो उस गुट से जुड़े रहते थे, उन्हें वोट करने का कोई अधिकार नहीं था.

आज यह सवाल अमेरिका में भी खड़ा हो गया है कि क्या वहां वोटों की सरकार वास्तव में लोकतांत्रिक सरकार है. वहां सत्ता वोट पाए लोगों के हाथों में है या वोट देने वाली पब्लिक के हाथों में. लग तो ऐसा रहा है कि वहां भी वोट दे कर नेता चुन कर सत्ता पर बैठा दिए गए जने के हाथों में अधिकारों के इतने हथियार हैं जितने जरमनी के एडोल्फ़ हिटलर के पास थे. डोनाल्ड ट्रंप ने लोकतंत्र और राष्ट्रीय पद की गरिमा ही नहीं, जनता के हकों, जनता के लोकतंत्र पर भी गहरी काली स्याही पोत दी है.

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