फीफा में भ्रष्टाचार

अतर्राष्ट्रीय फुटबाल महासंघ यानी फीफा के 7 अधिकारियों को स्विट्जरलैंड के जांच अधिकारियों ने भ्रष्टाचार, पैसे की कालाबाजारी और फीफा में 2 दशक तक धोखाधड़ी के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया. इन अधिकारियों पर 10 करोड़ डौलर यानी तकरीबन 6 अरब 40 करोड़ रुपए से अधिक की रिश्वत लेने का आरोप है. अधिकारियों की गिरफ्तारी के बाद फीफा के अध्यक्ष सैप ब्लाटर पर उंगली उठने लगीं कि उन्हें अब पद छोड़ देना चाहिए. लेकिन अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में ब्लाटर 5वीं बार चुनाव जीत गए. चुनाव जीतने के बाद ब्लाटर ने कहा कि अमेरिका की न्यायपालिका ने जिस तरह फुटबाल की वर्ल्ड गवर्निंग बौडी को निशाना बनाया उस से वे परेशान थे. साथ ही उन्होंने यूरोपीय फुटबाल अधिकारियों के नफरत फैलाने के अभियान की भी आलोचना की. अब सवाल है कि आखिर अमेरिका फीफा में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है जबकि फुटबाल खेल को अमेरिका पसंद भी नहीं करता और क्रिकेट से तो नाता ही नहीं. जाहिर सी बात है फीफा की कमाई पर अमेरिका की नजर हो सकती है. फीफा की कमाई लगातार बढ़ रही है. पिछले वर्ष विश्वकप के सफलतापूर्वक आयोजन के बाद फीफा की 2 अरब डौलर यानी लगभग 128 अरब रुपए की कमाई हुई. पिछले 10 सालों में फीफा की कमाई में असाधारण रूप से वृद्धि हुई है. वर्ष 2006 में जब जरमनी में फीफा का विश्वकप आयोजन किया गया तो उस समय फीफा की कमाई 749 मिलियन डौलर यानी तकरीबन 48 अरब रुपए की हुई थी. रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भी अमेरिका की इस करतूत से काफी खफा हैं. उन्होंने फीफा अधिकारियों की गिरफ्तारी को अमेरिकी एजेंडा करार दिया और कहा कि यह अमेरिका की दूसरे देशों में अपना दखल बढ़ाने की एक और खुली साजिश है. इधर, अमेरिकी अधिकारी कहते हैं कि बहुत सारे देश फीफा से त्रस्त हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घूसखोरी देख कर अमेरिकी न्याय विभाग ने कहा कि अगर कोई इस पर कार्यवाही नहीं कर रहा है तो वह खुद भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करेगा. उधर, फीफा के पूर्व उपाध्यक्ष जैक वार्नर कहते हैं कि अमेरिका विश्वकप 2022 की मेजबानी न मिलने के कारण बदले की भावना से ऐसा कर रहा है.

हरहाल, फीफा पर लगे इस दाग से खिलाडि़यों और खेलप्रेमियों को गहरा सदमा तो लगा है. फीफा से 209 देशों के राष्ट्रीय फुटबाल संघ जुड़े हुए हैं जिन में 47 एशिया में हैं. इन में भारत का औल इंडिया फेडरेशन भी जुड़ा हुआ है. ऐसे में इस का असर भारत पर भी पड़ना लाजिमी है. भ्रष्टाचार हर देश में है और बड़ेबड़े पदों पर बैठे अधिकारियों की मंशा अब सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने की रह गई है. और जहां लाखोंकरोड़ों नहीं, अरबोंखरबों डौलरों की बात हो तो अमेरिका वहां दखल न दे, ऐसा हो ही नहीं सकता. अमेरिका को जहां फायदा नजर आता है वहां वह अपनी दखलंदाजी शुरू कर देता है.

डरे हुए हैं आईपीएल के आका

जिस तरह से क्रिकेट खेल का व्यवसायीकरण हुआ है उस से क्रिकेट अब खेल नहीं, बल्कि कामधेनु गाय है और इस कामधेनु गाय को बीसीसीआई यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और आईसीसी यानी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कौंसिल दुह रही है. इस गाय को दुहने की कोशिश एस्सेल ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा ने 8 साल पहले की थी आईसीएल यानी इंडियन क्रिकेट लीग की शुरुआत कर. लेकिन धनकुबेरों के पुराने धुरंधरों ने इस की काट के लिए आईपीएल की शुरुआत कर आईसीएल को डुबो दिया. अब आईपीएल की सफलता और इस की कमाई को देख कर सुभाष चंद्रा की लार टपकने लगी है और वे फिर से आईसीएल की शुरुआत करने का संकेत दे रहे हैं. अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए इस बार वे फूंकफूंक कर कदम रख रहे हैं. कहा जा रहा है कि आईसीसी और बीसीसीआई से बचने के लिए न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और स्कौटलैंड जैसे देशों में समानांतर क्रिकेट बोर्ड का भी गठन हो चुका है और खिलाडि़यों को भी मोटे पैसे का लालच दे कर जोड़ने का काम किया जा रहा है.इधर, भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट सीरीज बहाल हो, इस के लिए भी कोशिशें जारी हैं क्योंकि दोनों देशों के बीच जब भी मुकाबला होता है, कमाई जम कर होती है. माना जा रहा है कि इस वर्ष विश्वकप क्रिकेट के लीग मुकाबले के लिए एक वर्ष पूर्व ही टिकट बिक गए थे. ऐसे में आईपीएल के आका भी चाह रहे हैं कि दोनों देशों के बीच मुकाबला हो. मुंबई हमले के बाद भारत और पाकिस्तान क्रिकेट का रिश्ता टूटे कई वर्ष बीत चुके हैं. इस कारण पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की आर्थिक हालत काफी खराब हो चुकी है. बीसीसीआई के आका भी चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच क्रिकेट सीरीज बहाल हो. बीसीसीआई में अनुराग ठाकुर सचिव पद पर काबिज हैं, अरुण जेटली और अमित शाह भी क्रिकेट राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं. ये लोग चाहते तो हैं कि भारतपाक के बीच क्रिकेट सीरीज बहाल हो पर पार्टी स्टैंड इस की अनुमति नहीं दे रहा है. इसलिए मजबूरी में ये भी चुप्पी साधे हुए हैं. इस से बड़ी परेशानी बीसीसीआई को यह सता रही है कि कहीं आईसीएल ने फिर से सिर उठा लिया तो अंधी कमाई का हिस्सा आईसीएल की झोली में न चला जाए.

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