चंद्रमणि बोली, ‘‘भाभी, आप चिंता मत कीजिए,’’ इतना कह कर दोनों बच्चों को ले वह कर चली गई. चंद्रमणि व सविता आपस में तो बहुत बातचीत करती थीं पर जिस दिन चंद्रमणि ने अपने अतीत की व्यथा मुझे कह सुनाई थी, उस के बाद से वह मुझ से एक मर्यादा में ही संक्षिप्त बात करती थी. यह मेरे परिवार व स्वयं मेरे लिए भी उचित था. उस रोज मैं सुबह से ही बड़ा खुश था. सविता को यह करना, वह करना की हिदायत देते नहीं थक रहा था. आखिर वह घड़ी आ ही गई. मैं बड़ी ही फुरती से टैक्सी की ओर लपका और जय के उतरते ही उसे गले लगा लिया. बरसों बाद मिले 2 मित्रों की भांति हम दोनों ही अपने जज्बातों पर काबू न रख सके. तभी सविता की ओर नजर गई तो देखा उस ने जय के बेटे को बड़े स्नेह से अपनी गोद में ले रखा था. उस मासूम, सफर से थके व उदास बच्चे को देख एकाएक मुझे कुछ ध्यान आया, ‘‘अरे यार, भाभी कहां हैं? क्यों, साथ नहीं लाया?’’

मेरी बात का जवाब दिए बगैर वह सविता की ओर देख कर बड़े आदर से, ‘‘नमस्ते भाभी,’’ बोला. इस पर सविता बोल पड़ी, ‘‘आप इन्हें बैठने तो दीजिए. सारी बातें खड़ेखड़े ही करेंगे?’’

तब जय बोला, ‘‘भाभी ठीक कह रही हैं?’’ सविता पानी ले आई. पानी पीते हुए मैं फिर पूछ उठा, ‘‘अब तो बता तू इतने छोटे से बेटे को अकेले कैसे ले आया, भाभी को क्यों नहीं लाया?’’

अब जय ठंडी सांस खींच कर बोला, ‘‘यार, क्या बताऊं, बेटे के पैदा होते ही उस ने दम तोड़ दिया था...घर पर सुबह से शाम तक तो आया के पास रह जाता है पर अब इतने दिन कैसे और किस के पास छोड़ता इस 8 महीने के बच्चे को? फिर यहां तो कोई औपचारिकता भी नहीं, मैं ने सोचा कुछ दिन भाभी को ही तकलीफ देनी होगी.’’ सविता उस बच्चे को अपनी गोद में सोया देख सजल नेत्रों से उस के सिर पर ममत्व का हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘भैया, कैसी बात करते हैं आप भी? इस में तकलीफ कैसी?’’ मैं बड़े ही दुखी मन से बोला, ‘‘क्या यार, तुझ पर इस कदर परेशानी आई और मुझे पता तक नहीं.’’

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