Thiruparankundram Deepam Controversy : ब्राह्मणिक समावेशन शब्द अब बहुत ज्यादा चलन में नहीं है जिसे समझने के लिए ब्राह्मण और समावेश का मतलब समझ आना ही काफी है. इस शब्द का पिछले दिनों मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद ऐतिहासिक, राजनीतिक, न्यायिक और धार्मिक लिहाज से गहरा ताल्लुक पैदा हो गया है. उत्तर भारत में सोशल मीडिया पोस्टों के जरिए यह विवाद और फसाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है कि दरअसल शिव का बेटा कार्तिकेय ही मुरुगन है और तमिलनाडु सरकार का हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी उस के सामने दीया न जलाने का फैसला शिव और सनातन का अपमान है जिसे विपक्षी दल कर रहे हैं.

इस से पहले इस विवाद और आरएसएस की भगवा मंडली, जिस के मुखिया मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी हैं, की तमिलनाडु के बारे में चिंता का कारण समझने की कोशिश करते हैं. यह कारण कोरा आर्थिक है. 1950-51 में मद्रास राज्य, जो ब्रिटिश सरकार का हिस्सा था, में कहींकहीं प्रिंसली स्टेट्स थीं, वहां की प्रतिव्यक्ति आय 229 से 234 रुपए थी जबकि उस समय राष्ट्रीय प्रतिव्यक्ति आय 265 रुपए थी.

उस समय हिंदू धर्म के गढ़ उत्तर प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय 240 से 265 रुपए थी. उत्तर प्रदेश मद्रास प्रोविंस से अमीर था. अब 1980 की राममंदिर की लहर के बाद जहां उत्तर प्रदेश की प्रगति रुकने लगी, वहीं तमिलनाडु की छलांगें मारने लगी.

2025 का अनुमान है कि देश की प्रतिव्यक्ति आय 2,12,000 रुपए है जबकि तमिलनाडु इस से कहीं ज्यादा 3,30,000 से 3,50,000 रुपए है. इस के मुकाबले 2025 में उत्तर प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय मात्र 83,000 से 1,08,000 रुपए है.

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