Editorial :

सरित प्रवाह

कीमतें बढ़ाने की मुहिम

सरकार बिजली कानूनों में बदलाव कर रही है ताकि प्राइवेट बिजली बनाने वालों और उसे ट्रांसमिट करने वालों द्वारा दाम बढ़ाए जाने से अब किसी खास उद्योग या सेवा को सस्ती बिजली न देनी पड़े. पहले सरकारी नीतियों की वजह से पिछड़े इलाकों में बहुत से उद्योगों को सालों तक सस्ती बिजली मिलती रही है. आज भी घरों में सस्ती या मुफ्त बिजली देने के राजनीतिक फैसले लिए जाते हैं.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के अब न रहने पर बिजली को पूरी तरह कमर्शियल बनाने के रास्ते खुल गए हैं. बिजली के दाम मनमाने ढंग से बढ़ाए जा सकेंगे. हर राज्य में एक कमीशन का इंतजाम करने का सुझाव है पर कमीशनों का काम आमतौर पर सरकार की सुनना होगा न कि जनता की. या फिर वे बढ़ती प्राइवेट कंपनियों की सुनेंगे.

वैसे, हर चीज की लागत के पैसे किसी न किसी को तो चुकाने होते ही हैं. यदि एक को मुफ्त में या सस्ते में कुछ दिया जा रहा है तो दूसरे की जेब काटी जाती है और वह दूसरा जो कुछ बनाता है उस के लिए वह ज्यादा पैसे वसूल कर इस नुकसान की भरपाई कर लेता है. सो, जिस चीज की जो लागत हो उस का दाम वही दे जो इस्तेमाल कर रहा है, यही सही है. लेकिन इस से कुछ चीजें बिखर जाती हैं.

जैसे, परिवहन सेवा के तहत रात को चलने वाली बसों के टिकट के दाम इसलिए नहीं बढ़ाए जा सकते कि खर्च तो वही रहता है पर सवारियां कम रहती हैं. इस नुकसान को दिन में वसूला जाता है जब भरभर कर सवारियां चढ़ती हैं. इसी तरह बिजली का मामला है. कुछ बड़े उद्योगों को सस्ती बिजली दे कर उन की बनाईर् चीजों का दाम घटाया जा सकता है और उन चीजों को बनाने वालों से लिया जा सकता है जो या तो महंगा माल बनाते हैं या ग्राहक से बड़ी कीमत वसूल सकते हैं. इसे क्रौस सब्सिडी कहते हैं.

बिजली ही नहीं, बहुत से क्षेत्रों में यह होने लगा है जहां गरीबों के इस्तेमाल की चीजों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं क्योंकि अब सत्ता की डोर वोटरों के हाथों में नहीं, पैसे वालों के हाथों में है. वोटर चाहे जितना घमंड में रहे कि वह अपने वोट से नेता को चुनाव में जीत दिलाता है पर असल जीत तो पैसे वाले पौलिटिकल पार्टी को पैसा दे कर दिलवाते हैं.

भारतीय जनता पार्टी को 2014 में पैसे वालों ने भरभर कर चंदा दिया क्योंकि कांग्रेस पर उस के शासन के आखिरी दिनों में कंप्ट्रोलर एंड औडिटर जनरल विनोद राय ने बहुत से झाठे आरोप लगा दिए थे.

उस के बाद से विपक्षी पार्टियों को पैसा मिलना बंद हो गया है और जनता अब उन की सुन भी नहीं पा रही है. इसलिए न जाने क्याक्या महंगा हो रहा है और पैसा कुछ हाथों में इकट्ठा हो रहा है जिस पर आम वोटर का कोई कंट्रोल नहीं है. स्विच अब बेहद अमीरों के हाथों में है.

लोकतंत्र और धर्मतंत्र

अगर डोनाल्ड ट्रंप के खब्तीपन की वजह से भारतीयों का अमेरिका में जा कर बस जाने का सुहावना सपना टूट जाए तो बहुत अच्छा रहेगा. अमेरिका में बसे भारतीय आज एक अलग जाति व पीआईओ बन गए हैं जो वर्णव्यवस्था में सर्वोच्च सरयूपारी ब्राह्मणों से भी श्रेष्ठ हैं और जिन पर न्यूयौर्क की हडसन नदी का गंगाजल सा पानी छिड़का हुआ है.

पढ़ाई या नौकरी के लिए वीजा ले कर जाने वाले भारतीय अपने साथ कट्टरपंथी सोच को भी ले जाते हैं और फिर अमेरिका पर अपना वर्णभेद, रंगभेद और जन्म से पैदा हुए भेद थोपने लगते हैं. अमेरिका के मागा- मेक अमेरिका ग्रेट अगेन- असल में मेक हिंदुत्व ग्रेट अगेन का ही एक रूप है जिसे वहां बसे भारतीय मूल के लोगों ने मीडिया, किताबों, स्कूलकालेजों, कंपनियों और सब से बड़ी जगह इंटरनैट प्लेटफौर्मों के जरिए रेस से ग्रसित अमेरिकियों को सिखाया है.

भारत से गए अमेरिका में काम कर रहे लोग अमेरिकी संस्कृति को उसी तरह बरबाद कर रहे हैं जैसे उन्होंने पौराणिक समय में भारत की संस्कृति को बरबाद किया था.  भारत की गुलामी के पीछे यही एक कारण है और भारतीय ही अमेरिका में भी यह बीमारी ले गए हैं.

1960-70 तक जो अमेरिका सब से उदार, सब से ज्यादा खुला, सब से ज्यादा स्वतंत्र सोच वाला था, भारतीयों के आगमन से बिगड़ने लगा. भारतीय अपने साथ चिकन टिक्का ही नहीं लाए, मंदिरों की भी बड़ी बिल्ंिडगें लाने लगे. उन के पीछेपीछे कट्टर मुसलिम इसलामी बिल्डिंगें लाने लगे.

अविभाजित भारतीय मूल के पाकिस्तानियों व बंगलादेशियों के साथ दक्षिणएशियाई लोगों ने अमेरिकियों को सिखा दिया कि कैसे शहरों को गंदा रखा जाए, कैसे सड़कों पर कब्जा कर रहना शुरू कर दिया जाए, कैसे सरकारी कामों में रिश्वत ली जाए, कैसे धर्म को व्यापार बनाया जाए और कैसे पाखंडी चमत्कारों पर विश्वास किया जाए.

भारतीय टैक मजदूरों ने अमेरिकी लोगों की नौकरियां ही नहीं छीनीं, अमेरिकियों से उन की काम करने की क्षमता भी छीन ली. चीन की तेज प्रगति और भारतीयों का अमेरिका पहुंचना लगभग साथसाथ हुआ क्योंकि अमेरिकी भारतीयों की तरह आलसी और निकम्मे होने लगे. चीनी नेताओं ने अपने यहां के अनुशासन और अपनी व्यावसायिक शिक्षा का लाभ उठाया.

अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जोकि खब्ती हैं, के कारण यदि एच1बी वीजा जिस के तहत 70 फीसदी भारतीय कर्मचारी हैं और महज 12 फीसदी चीनी दूसरे नंबर पर हैं, बंद हो जाए तो अमेरिका फिर से लोकतंत्र का रक्षक बन सकेगा.

भारतीय मूल के युवा अमेरिका में पढ़ कर या काम सीख कर भारत आ कर कोई कमाल नहीं करते. अमेरिका से लौटे युवा की कोई बड़ी भारतीय कंपनी आज भारत में सफलता से काम नहीं कर रही. लोहा, तेल और कपड़ा बनाने वाली भारतीय परिवारों की पुरानी कंपनियां ही टैक कंपनियां चला रही हैं.

ट्रंप भारत को नुकसान पहुंचाएंगे लेकिन भारतीय तो हर समय भारत को उस से कई ज्यादा गुना नुकसान हर रोज पहुंचाते हैं. हम ढोल पीटते हैं, बस, चाहे भारत में हों या अमेरिकी इंग्लिश सीख कर अमेरिका में.

विदेशों में विदेशी

दुनिया के जिन देशों से अमीर व साफसुथरे लोग दसियों सपने लिए वैधअवैध तरीकों से सुंदर यूरोप, उत्तरी अमेरिका, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जाते हैं, वे सब देश बमों, गोलियों, भुखमरी, अकाल, बीमारियों आदि से बचने के लिए अपने पड़ोसी देशों से शरण लेने लों को आने नहीं देते. जहां से लोग भागभाग कर जा रहे हैं, वे खुद इतने कट्टर देश हैं कि किसी भी बाहरी को आने ही नहीं देते, बल्कि अपनों में भी कईकई खंड बना रखे हैं और आपस में एकदूसरे को परेशान करते रहते हैं.

पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में भी इसलामी देश हैं जहां आपस में लड़ना पहला काम समझा जाता है. भारत और पाकिस्तान तो एकदूसरे से लड़ते ही रहते हैं. यही नहीं, अपने भारत देश में भी एक वर्ग दूसरे वर्ग से लड़ता रहता है.

यूरोप, अमेरिका या आस्ट्रेलिया से अब जब उन्हें निकाला जा रहा है तो वे मानवता, बराबरी, सहृदयता, बेबसी, बेचारगी, बच्चों की सुरक्षा का रोना रो रहे हैं.

अमीर देशों ने कुछ सालों तक इन सिरफिरों को आराम से रहने दिया ताकि वे सस्ते में उन के छोटे काम कर के अपना पेट पाल लेंगे और उन का काम भी हो जाएगा. लेकिन कुछ सालों बाद वे अपनेअपने देश के झागड़े, रीतिरिवाज, कट्टरता इंपोर्ट कर के लाने लगे हैं और गोरे व सभ्य लोगों पर असभ्यता से थोपने लगे हैं.

मुसलिम सड़कों पर नमाज पढ़ने लगे हैं, हिंदू सड़कों पर जुलूस निकालने लगे हैं और वहां की नदियों व तालाबों में फूल और मूर्तियां फेंकने लगे हैं. जबकि उन के मूल देशों में शासक न बोलने की इजाजत देते हैं न मनमरजी से काम करने देते हैं. पर गोरों के देश में जा कर ये लोग अभिव्यक्ति व धर्म की स्वतंत्रताओं का रोना रोने लगते हैं.

यह अच्छी बात है कि अब आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, इंगलैंड, फ्रांस, अमेरिका में वैधअवैध बाहरियों के खिलाफ गोरे एकजुट होने लगे हैं.

मानवता जाए भाड़ में, अपनी जीवनशैली बचाए रखना बेहद जरूरी है खासतौर से उन से जिन की जीवनशैली में गंद, बदमाशी, बेइज्जती, निकम्मापन, दकियानूसीपन भरा है. ये लोग अपनी सरकारों को, अपने देशों को ठीक नहीं कर सकते तो ठीक देशों को खराब करने का इन्हें कोई हक नहीं.

एक राष्ट्रपति का खब्तीपन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फूल कर कुप्पा हो रहे हैं कि पिछले 2 दशकों से जिस ईरानी न्यूक्लियर बमों से पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति परेशान रहे हैं, उन्होंने उन पर अपने बी 32 विमानों से बम गिरा कर नष्ट कर दिया.  उन्होंने खुद ही जानकारी दी कि 22 जून को अमेरिकी टाइम के मुताबिक रात के 8 बजे और भारतीय समय के मुताबिक सुबह 4.30 बजे फोर्डो, नतांज और इस्फहान की गहरी गुफाओं में बने संयंत्रों को उन्होंने इजराइल के उकसावे पर नष्ट कर दिया.

इजराइल इन जगहों को अमेरिका से नष्ट करवाना चाहता था क्योंकि इस तरह के बम उस के पास थे ही नहीं. डोनाल्ड ट्रंप जो यह कह कर राष्ट्रपति बने कि वे यूरोप या एशिया के मामलों में दखल नहीं देंगे, पहले 6 महीनों में ही इजराइली-ईरानी युद्ध में कूद पड़े हैं. अब शायद उस से अमेरिकी निकल नहीं पाएंगे.

जहां आज का अमेरिकी आलसी और आत्ममुखी होता जा रहा है वहां ईरान की धार्मिक कट्टरता का जोश इन बमों के बाद भी किसी भी तरह से कम नहीं हो रहा.

ओसामा बिन लादेन को नहीं भूला जाना चाहिए जिस ने बिना किसी कारण आम हवाई जहाजों को बम बनवा कर 2,500 से ज्यादा अमेरिकियों को मरवा डाला और फिर वर्षों अफगानिस्तान व पाकिस्तान में आराम से रहता रहा.

ऐसा जज्बा अमेरिकियों में सिर्फ फिल्मों में ही दिखता है क्योंकि उन में हिम्मत होती तो न उत्तर कोरिया बनता, न वियतनाम में वे हारते, न अफगानिस्तान में हारते, न इराक, लीबिया पर पहले हमले कर के उन्हें अपने बदहाल तरीके पर छोड़ते.

डोनाल्ड ट्रंप के खब्तीपन से भरे हमले के जवाब में ईरान ने कड़ी कार्रवाई करते हुए उस के कतर स्थित मिलिटरी कैंप को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया. यह देख ट्रंप सीजफायरसीजफायर की बात करने लगे. जबकि इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले से ही ईरान से सीजफायर करवाने के लिए ट्रंप से अपील कर रहे थे. आखिरकार, सीजफायर की बात ईरान ने मान ली, हालांकि तनाव बरकरार है.

आज 8 महीने बाद भी हालात वैसे ही हैं. अमेरिका का डंका नहीं बज रहा है. कोई अमेरिका से डरा हुआ नहीं है. किसी को न मागा का डर है, न ट्रंप का, न ही सीआईए का. Editorial :

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