सौजन्य - सत्यकथा

‘‘ऐजी, कैसी ॒शक्ल बिगाड़ रखी है तुम ने. क्या मेरे वियोग में खानापीना तक छोड़ दिया है?’’ सुमन ने संजीव के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा.‘‘क्या करूं सुमन, जब से तुम मायके आई हो, मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता. न घर में जी लगता है, न बाहर.’’ मायूसी से संजीव फुसफुसाया, ‘‘बहुत दिनों से तुम्हारा प्यार नहीं मिला है. एक पप्पी दो न!’’‘‘पागल हो गए हो क्या. देख रहे हो, कितने लोग हैं. यहां पप्पी मांग रहे हो.’’ सुमन हाथ छुड़ाने का नाटक करती हुई बोली, ‘‘घर चलो, जी भर कर प्यार कर लेना.’’
‘‘बस एक...’’ संजीव गिड़गिड़ाया.

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