आम चुनाव में माहौल को मोदीमय होते देख सरकारी विभागों ने भी माहौल के बदलते मिजाज में ढलने का प्रयास शुरू कर दिया था. पहले केंद्र सरकार के औद्योगिक नीति और संवर्द्धन विभाग ने और बाद में योजना आयोग ने विकास के गुजरात मौडल की तारीफ की. दोनों ने गुजरात के कारोबारी माहौल पर रिपोर्ट तैयार कराई और रिपोर्ट में इस मौडल की प्रशंसा की. आयोग की रिपोर्ट में शीर्ष पर शुमार 8 राज्यों में गुजरात शीर्ष पर है.
रिपोर्ट में राज्यों के कारोबारी माहौल और वहां के ढांचागत विकास को तरजीह देते हुए मानक तैयार किए गए हैं.
कमाल तो यह है कि पिछले 10 साल से वहां नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री रहे लेकिन तब किसी ने उन के मौडल की तरफ झांका तक नहीं. वे कई बार कहते रहे कि उन के पास विकास का मौडल है लेकिन किसी ने उन की बात पर ध्यान नहीं दिया. अचानक उन का विकास मौडल सब को आकर्षित करने लगा. सब उस के मुरीद हो गए. योजना आयोग की आंखें देर से खुलीं.
इस से यह स्पष्ट है कि हमारी आंकलन की प्रक्रिया बेकार है, व्यवस्थित नहीं है. उस में मनमरजी और अवसरवादिता है. विकास का मौडल यदि चापलूसी और अवसरवादिता के आधार पर तैयार किया जा रहा है तो इसे नकार दिया जाना चाहिए. चापलूसी और अवसरवादिता से अपनाया गया मौडल खतरनाक हो सकता है.