Hindi Stories: पिता की संपत्ति के बंटवारे में शुरू हुआ भाईबहन का झगड़ा अदालत की चौखट पर पहुंच कर सुखद मोड़ लेगा, कोई नहीं जानता था. विवाह संपन्न हो चुका था. अब केवल वरवधू पक्ष के लोग एकदूसरे की हंसी उड़ा रहे थे. बुजुर्गों ने युवकयुवतियों के लिए मैदान खाली छोड़ दिया था. पूर्णिमा का घूंघट उतर चुका था और आलोक नजरें बचा कर उस के सौंदर्य को दिल में किसी तसवीर की तरह उतार रहा था. आलोक की बहन अलका बहुत चहक रही थी. वह नए फैशन की घाघराचोली पहने थी, जिस पर दुपट्टा संभाले नहीं संभलता था. चपलता पर सुंदरता सोने पर सुहागे का काम कर रही थी. वधू के बाद अगर कोई आकर्षण का केंद्र था तो बस अलका.

कुछ देर तक कौफी के दौर के साथ छेड़खानी चलती रही. तभी किसी ने फरमाइश की कि कुछ गानाबजाना हो जाए, तो ‘हो जाए,’ का नारा गूंज उठा. स्पष्ट था कि पहल दूल्हे को ही करनी थी. आलोक ने पीछा छुड़ाने की बहुत कोशिश की, पर यार लोग कहां मानने वाले थे.

लड़कियों ने छेड़ा, ‘‘जीजाजी, गाना नहीं आता तो रोना ही शुरू कर दीजिए.’’

आलोक के ताऊ के लड़के ने नाटकीयता से मुंह लटकाते हुए उत्तर दिया, ‘‘बेचारे के हंसनेगाने के दिन खत्म हुए, अब तो रोना ही रोना रह गया है.’’

ठहाके पर ठहाके लगे. वधू शरमा रही थी क्योंकि छींटाकशी अंत में उस पर ही तो थी. सभी लोग आलोक के पीछे पड़ गए. वह बड़े संकट में था. वह तो कभी स्नानगृह में भी नहीं गाता था. जब सम झ गया कि उसे कुछ न कुछ कहना ही पड़ेगा तो पूर्णिमा की साड़ी की ओर देख कर उस ने भोंडी आवाज में गाने का प्रयत्न किया, ‘हवा में उड़ता जाए, तेरा लाल दुपट्टा मलमल का, हो जी, हो जी…’

सुनते ही ठहाकों से सारा घर हिल उठा. पूर्णिमा शर्म से सिकुड़ गई, पर मंद मुसकराहट को न छिपा पाई.

अब वर पक्ष के सभी लोग पूर्णिमा के पीछे पड़ गए. लेकिन उस के मुंह पर तो मानो ताला ही पड़ गया था. सच तो यह था कि उसे मालूम था कि ऐसा अवसर अवश्य आएगा, इसलिए उस ने कई भजन याद कर रखे थे. परंतु यह माहौल न तो भजनों का था और न ही उसे मालूम था कि अवसर आने पर उस की जीभ तालू से चिपक जाएगी. जब इसरार अधिक होने लगा तो उस ने बारीक आवाज में कंपनभरे स्वर में गाया, ‘मोहे ला दे लाल चुनरिया जयपुर से…’

आगे कंठ अवरुद्ध हो गया पर तालियों से आसमान गूंज उठा. अब सब इधरउधर देखने लगे कि अगला बलि का बकरा किसे बनाया जाए.

वधू पक्ष का तुषार बहुत उछल रहा था. अलका के आगेपीछे इस तरह घूम रहा था कि सब का ध्यान उन दोनों पर ही केंद्रित होने लगा.

‘‘तुषार…तुषार…’’

‘‘नहींनहीं, मु झे कहां आता है गानावाना,’’ वह आंखें मटकाते हुए बोला.

‘‘छोड़ो भी ये नखरे और सुना डालो कोई फड़कती चीज.’’

वैसे तुषार इस की प्रतीक्षा कर रहा था कि कोई कहे और उस के मुंह से गीत फूट पड़े. बिना अधिक बोले वह गला खंखारने लगा तो शांति छा गई. अलका को सामने देखा तो उस पर दृष्टि गड़ा कर गाने लगा:

‘चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल, एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल.’

तालियों पर तालियां पिटीं. सब को मजा आ गया.

सहेलियों ने उकसाया, ‘‘देखती क्या है अलका, दे जवाब.’’

अलका को जोश आ गया. उस ने भी नाटकीयता से गला खंखार कर गाया :

‘दुनिया में हूं दुनिया की तलबगार नहीं हूं. बाजार से गुजरी हूं खरीदार

नहीं हूं.’

‘हाय…हाय…’ का नाद फूट पड़ा.

अब सब तुषार के पीछे पड़ गए. तुषार ने आंखें मटका कर गरदन झटक कर गाया :

‘तुम तीर मारो मेरे सीने पर, मगर इतना खयाल रखना कि सीने में दिल है और दिल में तुम्हारा मुकाम है.’

तहलका मच गया. बूढ़ेबूढि़यां भी आ कर  झांकने लगे कि क्या गदर मचा रखा है. शादी के अवसर पर रौनक और शोर न हो तो शादी ही क्या हुई. बीती हुई जवानी को याद कर के वे शीघ्र ही वापस चले गए.

‘‘अलका…अलका…’’ चारों ओर से आवाजें गूंजीं.

अलका को भी मानो नशा आ गया था. वह चूकने वाली न थी. निमंत्रण की प्रतीक्षा किए बिना ही तुकबंदी की :

‘निशाने पर निशाना न लगाओ हुजूर. बंदी खड़ी है निगाहें चूक जाएंगी.’

तालियों की गड़गड़ाहट से लगा कि आसमान टूट कर धरती पर आ गिरेगा.

अब सुहागरात थी. आलोक और पूर्णिमा न जाने कितनी सदियों से गुजर गए, न जाने कितने पहाड़ पार कर गए.

इसी उतारचढ़ाव के बीच आलोक ने पूछा, ‘‘यह तुषार कौन है?’’

पूर्णिमा की हंसी पूर्णमासी की चांदनी सी बिखर गई, ‘‘पिताजी के मित्र का लड़का है. काफी दिलफेंक व आशिकमिजाज है.’’

‘‘अलका के आगेपीछे बहुत घूम रहा था,’’ आलोक ने मुसकरा कर कहा.

‘‘डोरे तो उस ने मेरे ऊपर भी बहुत डाले थे.’’

‘‘अच्छा,’’ आलोक ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘फिर क्या हुआ?’’

‘‘मैं बच गई. मैं ने अचूक बाण इस्तेमाल किया.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘रक्षाबंधन के दिन गलती से भैया के साथ आ गया. मैं ने तुरंत ही राखी उस की कलाई पर बांध दी. उस की जेब में सिर्फ 10 रुपए थे, वे मैं ने  झटक लिए, बेचारा देखता ही रह गया.’’

आलोक और पूर्णिमा दोनों खिलखिला कर हंस पड़े, पर दूसरे ही क्षण एकदम चुप हो गए. दीवारों के भी कान होते हैं. सब सुन रहे होंगे. सुबह होते ही दोनों की खिंचाई होगी.

कुछ दिनों बाद तुषार का पत्र अलका के नाम आया. अलका ने भी पत्र का उत्तर दिया. इस तरह यह सिलसिला चल पड़ा. नौबत यहां तक आ गई कि दोनों एकदूसरे से विवाह करने का प्रण कर बैठे. शायद प्रथम दृष्टि में ही दोनों में एक रासायनिक प्रतिक्रिया हो गई

थी. दोनों परिवारों को गंभीरता से सोचना पड़ा.

तुषार रासायनिक अभियंता था और

हाल ही में एक सुप्रसिद्ध सौंदर्य

सामग्री बनाने वाली कंपनी में अच्छे वेतन पर लगा था. आलोक के पिता ने सबकुछ ठीक देखा और रिश्ते में कुछ बुराई नहीं महसूस की. वे पेशे से वकील थे, इसलिए जरा दूर की सोचते थे. सोचने लगे, ‘जब लड़का शादी की इतनी हठ कर रहा है तो दहेज में क्यों न कटौती की जाए?’

तुषार ने कहा, ‘‘मु झे कोई दहेजवहेज नहीं चाहिए, केवल अलका चाहिए. आप उसे तीन कपड़ों में ही विदा कर दें.’’

तुषार के मातापिता ने सम झाया, ‘‘अरे, ऐसा भी कहीं होता है? अच्छेभले खातेपीते घर के हैं. माना कि हम कुछ नहीं मांगेंगे, पर शादी तो धूमधाम से होनी चाहिए.’’

इस चक्कर में दोनों दलों ने खुल कर बात नहीं की. परिणाम यह हुआ कि अलका को बहुत सामान्य दहेज मिला, जो एक गरीब से गरीब परिवार भी दे देता है. तुषार को भी बस ऐसे ही टाल दिया. रिश्तेदारों को कुछ मिलने का तो कोई प्रश्न ही न था. सभी असंतुष्ट हो कर चले गए.

कटु टिप्पणियां सुनतेसुनते तुषार का मन भी खट्टा होने लगा. यह शादी कर के क्या उस ने भूल की? लेकिन अब वह कोई आवाज उठाने की स्थिति में न था. हां, अलका को देख कर, उस के चुलबुले स्वभाव के कारण सब भूल गया. दोनों में प्यार स्वाभाविक व प्रेरणादायक था. अंत में प्रेम की ही जीत हुई.

विवाह के बाद रक्षाबंधन का पहला त्योहार आया. आदत के अनुसार अलका एक बड़ी सुंदर सी राखी लाई.

तुषार ने कटाक्ष किया, ‘‘यह क्या? एक तो इतनी महंगी और फिर डाक से भेजने में खर्चा भी अधिक है.’’

‘‘राखी में खर्चा नहीं देखा जाता. भैया को हमेशा बड़ी राखी ही अच्छी लगती है,’’ अलका ने धीरे से कहा.

‘‘भई, पहले की बात और थी…बाप का खर्चा और बेटे की जेब. अब तो मेरी जेब कट रही है,’’ तुषार ने व्यंग्य से पूछा, ‘‘कुछ मिलेगा भी या यह सब एकतरफा खेल है?’’

तुषार का यह स्वार्थी रूप अलका ने पहली बार देखा. दरअसल दहेज की कटु बातें उस के दिल में घर कर गई थीं. जानेअनजाने वह कंजूसी का ताना दे ही देता था. कभीकभी अलका को भी लगता था कि मांबाप ने उस के प्रति बहुत अन्याय किया है.

‘‘भैया ने कभी 100 रुपए से कम नहीं दिए पर राखी को रुपयों से तौलना ठीक नहीं है. यह तो मन की भावना है,’’ अलका ने अपने को तसल्ली दी.

‘‘हां…’’ तुषार ने तीव्र व्यंग्य कसा, ‘‘मान का तो पान भी बहुत होता है. अगले पत्र में तुम्हारे लिए पान ही आता होगा.’’

उधर आलोक और पूर्णिमा में काफी बहस हुई थी.

‘‘माना कि पहले 100 रुपए देते थे पर तब तुम अकेले थे. तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं थी. अब मैं हूं,’’ पूर्णिमा ने रहस्यपूर्ण मुसकान फेंकते हुए कहा, ‘‘और आने वाला भी कुछ न कुछ खर्च मांगेगा ही.’’

‘‘वह तो ठीक है, पर अचानक इस तरह बदल जाना कुछ ठीक नहीं लगता. क्या सोचेगी अलका?’’ आलोक ने दुविधा भरे स्वर में कहा.

‘‘सम झदार होगी तो सम झ जाएगी. आखिर उसे भी तो अपनी गृहस्थी चलानी है.’’

‘‘नहीं, इस बार…’’

पूर्णिमा ने बात काटते हुए कहा, ‘‘देखो, हमें वही करना चाहिए जो आगे भी निभा सकें. क्या जीवनभर 100 रुपए दे सकते हो? अरे, राखी है या पैंशन?’’

आगे कुछ कहने से पहले ही पूर्णिमा ने आलोक के मुंह पर हाथ रख दिया. बड़ी कठिनाई से 21 रुपए देने को राजी हुई. मनीऔर्डर में एक रुपए से और अधिक कमीशन लगता, इसीलिए आलोक ने 20 रुपए ही मनीऔर्डर से भेज दिए.

तुषार ने 20 रुपए की बत्ती बनाते हुए कान में घुमा कर कहा, ‘‘चलो, कान का मैल तो निकल जाएगा. हां, तो इस का क्या लाऊं…सोहनहलवा या…?’’

अलका को पहले ही बुरा लग रहा था, सो तुषार के ताने से रोने लगी.

तुषार ने घाव पर नमक छिड़का, ‘‘दहेज में कटौती और राखी की छुट्टी, भाई हो तो ऐसा.’’

भाई एकदम ही इस तरह बदल जाएगा, यह अलका ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. उस ने चिढ़ कर रुपए पाने का न तो पत्र लिखा और न ही धन्यवाद देने की आवश्यकता सम झी. पत्रव्यवहार कम होता चला गया और संबंधों की मधुरता में भी कमी आ गई.

बच्ची को ले कर वह एक बार मायके गई थी. स्वागत व लेनदेन में कोई कमी तो नहीं हुई, परंतु अलका ने महसूस किया कि सबकुछ पराया सा लग रहा है. मानो सब ने चेहरों पर मुखौटे पहने हुए हों. कहीं अपनापन नहीं लगा.

वह सोचने लगी, ‘क्या अब वह केवल मेहमान की हैसियत से ही यहां आएगी?’ जो कमरा उस का था, वह अब आलोक की पुत्री का था. यादों की लकीरें दीवारों पर उभर कर आ रही थीं, पर उन लकीरों पर अब दूसरी लकीरें खिंच रही थीं. पूरे उत्साह से महीनाभर रहने आई थी, पर 7 दिनों में ही मन उखड़ गया. तुषार के व्यंग्यबाणों से बचने के लिए वह जल्दी जा भी न सकती थी. विष के घूंट पी कर रही.

मां भी अब अधिक बातें नहीं करती थीं. वे अपनी अनेक बीमारियों में इतनी परेशान रहती थीं कि पास बैठने वाला उकता कर बच भागने का रास्ता ढूंढ़ने लगता था.

हां, मां के पास एक आकर्षण था. सोनेचांदी के भारी आभूषणों से उन की छोटी सी पेटी भरी हुई थी. पति फौजदारी के वकील थे, सो बहुत कमाया था. कर से बचने के लिए सोना खरीद कर ले आते थे. आय के पन्ने साफ रखते थे. अलका को मालूम था और इन आभूषणों के प्रेम से ही वह मां से बंधी हुई थी.

‘मां, क्या करोगी इतने सारे गहनों का?’ एक बार अलका ने शादी से पहले पूछा था.

‘करूंगी क्या,’ मां ने परिहास में हंसते हुए कहा था, ‘छाती पर धर कर ले जाऊंगी.’

‘नहीं मां, सच बताओ न?’ अलका ने बहुमूल्य जड़ाऊ हार से खेलते हुए पूछा था.

‘पगली, मैं क्या करूंगी? अरे, आलोक की बहू और तु झ में बांट जाऊंगी. तु झे क्या पसंद है, बता?’

‘सच अम्मा,’ अलका ने दोनों मुट्ठियों में गहने बटोर कर छाती से चिपकाते हुए कहा, ‘मु झे तो सभी चाहिए. दोगी न, मां?’

मां खिलखिला कर हंस पड़ीं, ‘जा, ले जा.’

अलका की ललचाई आंखों के आगे मां ने एकएक आभूषण सहेज कर वापस पेटी में बंद कर के ताला लगा दिया और चाबी कमर में खोंस ली.

पूर्णिमा को लोभी मां ने रीति के अनुसार ही गहने दिए थे. तुषार ने दहेज न लेने का ऐलान कर दिया था, जिस कारण अब वह पछता रहा था. उस की बात पकड़ते हुए मां ने दोनों को एकएक अंगूठी ही दे कर पीछा छुड़ा लिया था.

आजकल की दर से वे सारे गहने

8 लाख रुपए से कम के न होंगे. चोरी और डाके अधिक पड़ने लगे थे, सो पिता ने न चाहते हुए भी अब अधिकांश बैंक के लौकर में रख दिए थे.

एक मुकदमा लड़ने के लिए पिता कचहरी में गए हुए थे. मामला कत्ल का था और फीस काफी तगड़ी ली थी. बहस के दौरान पिता इतने आवेश में आ गए कि दिल का दौरा पड़ गया. तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, परंतु 4 घंटे के अंदर उन्होंने दम तोड़ दिया.

गठिया और आंतों के कैंसर से पीडि़त मां 2 साल तक और घिसटती रहीं. अंत में उन्होंने भी संसार से विदा ले ली.

ससुर की मृत्यु के समय तुषार न आ सका था. कंपनी के काम से बाहर गया हुआ था. जब सूचना मिली तो केवल ससुराल जा कर शोक प्रकट करने में उस की कोई रुचि नहीं थी. सास की मृत्यु के समय वह अलका के साथ लंबी छुट्टी ले कर आया था.

आलोक व पूर्णिमा अचरज में पड़े थे कि भलेमानस अब जा क्यों नहीं रहे हैं? सब काम पूरे हो गए, कुछ भी तो नहीं बचा, लेकिन शालीनता व संकोच के मारे वे उन को जाने के लिए कह न पा रहे थे.

आलोक दफ्तर से आ गया था. पूर्णिमा ने मेज पर चाय सजा दी थी. अलका ने नजरें  झुकाते हुए कहा, ‘‘भैया, हम जाने की सोच रहे हैं,

वैसे जाने का जी तो नहीं करता, परंतु इन की छुट्टियां खत्म होने वाली हैं.’’

पूर्णिमा के स्वर में हलका व्यंग्य था, ‘‘अरे, जल्दी क्या है? घर एकदम सूना लगने लगेगा. कुछ दिन और रह जातीं. हमारा भी मन लगा रहेगा.’’

‘‘सो तो ठीक है…’’ अलका कहतेकहते रुक गई.

आलोक ने ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘अब रोक भी कैसे सकते हैं. आखिर नौकरी तो नौकरी ही है.’’

अलका ने तुषार से  िझ झकते हुए कहा, ‘‘आप ही कहिए न?’’

‘‘कुछ बात है क्या?’’ आलोक ने पूछा. तुषार ने सकुचाने का नाटक करते  हुए कहा, ‘‘बात यह है भैया,  अकसर सच कहने में बड़ा संकट होता है.’’

‘‘सम झा नहीं मैं. साफसाफ कहो न?’’

‘‘आप को बुरा तो लगेगा, पर एक न एक दिन तो कहना ही पड़ेगा, सो, अभी कह कर दिल हलका कर लें,’’ तुषार गंभीर स्वर में बोला.

‘‘हांहां, कहो न?’’

‘‘हम पिताजी की संपत्ति में बंटवारा चाहते हैं.’’

‘‘बंटवारा, कैसा बंटवारा?’’ पूर्णिमा ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘पिता की संपत्ति में बेटे और बेटी का बराबर का अधिकार होता है. हम चाहते हैं कि आप अलका का हिस्सा उसे दे दें.’’

आलोक अचानक चुप हो गया. ऐसी तो उसे न कोई आशा थी और न विश्वास. सोचने लगा, ‘लगता है तुषार और अलका का सिर फिर गया है.’

पूर्णिमा ने ही कहा, ‘‘बंटवारे को है ही क्या? यह मकान है, सो हमें ही छोटा पड़ता है. पिताजी की एक यही निशानी है, क्या इसे बेच दें?’’

‘‘नहींनहीं,’’ अलका ने तुरंत कहा, ‘‘ऐसा हम ने कब कहा?’’

‘‘तो फिर और क्या रहा? रुपए तो कुछ ऐसे छोड़े नहीं हैं. जो कुछ था वह मां की बीमारी और तीमारदारी में खर्च हो गया चाहो तो पासबुक देख लो,’’ आलोक ने दुखी हो कर कहा.

‘‘नहीं भैया, हमें आप के ऊपर पूर्ण विश्वास है, बल्कि दुख है कि मां

के अंतिम समय में हम उन के पास न

रह सके.’’

‘‘तो फिर अब क्या रहा?’’ पूर्णिमा ने पूछा.

‘‘गहने…आभूषण…’’ तुषार ने तीखेपन से कहा.

पूर्णिमा ने ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘गहनों पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है. वे सब मांजी मु झे नमिता के लिए दे गई हैं.’’

नमिता आलोक व पूर्णिमा की पुत्री थी.

‘‘आप के पास कोई सुबूत है क्या?’’ तुषार ने पूछा.

‘‘सुबूत की क्या जरूरत है? क्या हमारा कहना काफी नहीं है?’’ पूर्णिमा ने कहा.

‘‘नहीं,’’ तुषार ने कड़वाहट से कहा, ‘‘जायदाद का मामला है. सब लिखापढ़ी में होना दिखाइए. देखिए, अगर मैं ने शादी में दहेज न लेने की गलती की तो इस का मतलब यह तो नहीं कि आप संपत्ति में से भी कुछ न दें.’’

‘‘ओह,’’ आलोक ने व्यंग्य से कहा, ‘‘तो अब दहेज मांग रहे हो. भई, तुम ने दहेज मांगा नहीं, हम ने दिया नहीं. बात समाप्त. रहा मां के आभूषणों का, सो वह सब पूर्णिमा और नमिता के हैं. उन पर आप का कोई अधिकार नहीं है.’’

‘‘तो आप नहीं देंगे?’’

‘‘नहीं,’’ आलोक ने दृढ़ता से कहा.

‘‘अंजाम बुरा होगा,’’ तुषार ने धमकी दी.

अलका ने तुषार की बांह पकड़ते हुए कहा, ‘‘अब छोड़ो भी.  झगड़ा करने से क्या लाभ? मैं ने सोचा था कि भाभी ईमानदारी से हमारा हिस्सा दे देंगी. जाने दो, इन्हें ही मुबारक हो.’’

तुषार ने बांह  झटकते हुए कहा, ‘‘कैसे छोड़ दें? लाखों के आभूषण हैं. कानून तुम्हें अधिकार देता है. फिर बेटी तो हमारी भी है. क्या सारे गहने इन की बेटी को ही चढ़ जाएंगे.’’

पूर्णिमा ने क्रोध से कहा, ‘‘जी हां, आप कुछ भी कहें, मैं एक भी गहना नहीं दूंगी.’’

तुषार ने  झटक कर उठते हुए कहा, ‘‘इस का निर्णय अदालत करेगी.’’

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया. लगा, एक और मौत हो गई है.

1 महीने के बाद आलोक के पास वकील का नोटिस आया जो तुषार ने भिजवाया था, ‘अगर आभूषणों का बंटवारा उसे स्वीकार नहीं है तो उसे अदालती कार्यवाही करने पर मजबूर होना पड़ेगा.’

आलोक और पूर्णिमा हतप्रभ हो कर उस नोटिस को हाथ में लिए बैठे रहे. मामला इतना बढ़ जाएगा, ऐसी आशा न थी. घर का मामला कचहरी में पहुंचेगा, एकदूसरे पर कीचड़ उछाला जाएगा, बदनामी भी होगी. बहुत सोचते रहे. अंत में नोटिस का उत्तर न दे कर चुप्पी साध गए कि शायद उन्हें बुद्धि आ जाए.

पर ऐसा नहीं हुआ. एक दिन दोनों पक्ष के लोग अदालत में पहुंच ही गए. बुलावे में देर थी, इसलिए बाहर टहल रहे थे.

नमिता ने बूआ की पुत्री सुरुचि को देखा. वह शरमा कर बहन को देख रही थी.

नमिता ने पास आ कर कहा, ‘‘हैलो.’’

सुरुचि ने भी कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘कैसी हो?’’

‘‘अच्छी हूं. आप?’’

‘‘अच्छी हूं, मु झे ‘आप’ नहीं ‘तुम’ कहो.’’

आलोक का दिल भर आया. सोचने लगा, ‘एक भूल से दूसरी भूल ठीक नहीं हो जाती.’

‘‘अलका…’’

अलका ने चौंक कर भाई को देखा.

‘‘सुनो, तुम घर आ जाओ. तुम्हें जितने आभूषण चाहिए, ले जाओ. चाहो तो सब ले जाओ.’’

अलका रो पड़ी, ‘‘भैया, मु झे आभूषण नहीं चाहिए. मु झे केवल तुम्हारी कलाई पर राखी बांधने का अधिकार चाहिए.’’

तब न तो तुषार ने विरोध किया और न ही पूर्णिमा ने. Hindi Stories

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