Hindi Stories: पिता की संपत्ति के बंटवारे में शुरू हुआ भाईबहन का झगड़ा अदालत की चौखट पर पहुंच कर सुखद मोड़ लेगा, कोई नहीं जानता था. विवाह संपन्न हो चुका था. अब केवल वरवधू पक्ष के लोग एकदूसरे की हंसी उड़ा रहे थे. बुजुर्गों ने युवकयुवतियों के लिए मैदान खाली छोड़ दिया था. पूर्णिमा का घूंघट उतर चुका था और आलोक नजरें बचा कर उस के सौंदर्य को दिल में किसी तसवीर की तरह उतार रहा था. आलोक की बहन अलका बहुत चहक रही थी. वह नए फैशन की घाघराचोली पहने थी, जिस पर दुपट्टा संभाले नहीं संभलता था. चपलता पर सुंदरता सोने पर सुहागे का काम कर रही थी. वधू के बाद अगर कोई आकर्षण का केंद्र था तो बस अलका.

कुछ देर तक कौफी के दौर के साथ छेड़खानी चलती रही. तभी किसी ने फरमाइश की कि कुछ गानाबजाना हो जाए, तो ‘हो जाए,’ का नारा गूंज उठा. स्पष्ट था कि पहल दूल्हे को ही करनी थी. आलोक ने पीछा छुड़ाने की बहुत कोशिश की, पर यार लोग कहां मानने वाले थे.

लड़कियों ने छेड़ा, ‘‘जीजाजी, गाना नहीं आता तो रोना ही शुरू कर दीजिए.’’

आलोक के ताऊ के लड़के ने नाटकीयता से मुंह लटकाते हुए उत्तर दिया, ‘‘बेचारे के हंसनेगाने के दिन खत्म हुए, अब तो रोना ही रोना रह गया है.’’

ठहाके पर ठहाके लगे. वधू शरमा रही थी क्योंकि छींटाकशी अंत में उस पर ही तो थी. सभी लोग आलोक के पीछे पड़ गए. वह बड़े संकट में था. वह तो कभी स्नानगृह में भी नहीं गाता था. जब सम झ गया कि उसे कुछ न कुछ कहना ही पड़ेगा तो पूर्णिमा की साड़ी की ओर देख कर उस ने भोंडी आवाज में गाने का प्रयत्न किया, ‘हवा में उड़ता जाए, तेरा लाल दुपट्टा मलमल का, हो जी, हो जी...’

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