Heart Touching Story: कमरे में घुसते ही उस ने अपना कोट उतार कर खूंटी पर टांगा. हैंडबैग सोफे पर रखा. दोनों हाथ कमर पर टिका कर खुली आंखों से टकटकी लगाए खिड़की से बाहर देखने लगी.
जाड़े के मौसम की पहली बर्फ गिरी थी. पूरा परिदृश्य मौन में डूबा था. वह अपनी सिमटी सांसें रोके खड़ी थी. सोचने लगी, जब कभी बर्फ गिरती है तो मन इतना बेआवाज क्यों हो जाता है कि उस अखंड मौन को तोड़ने की हिम्मत नहीं होती. डर लगता है कि जरा सी हरकत की या सांस तक जोर से खींची तो सृष्टि की संगति टूट जाएगी. खिड़की पर धुंध उतर आई थी या फिर उस की आंखों के चंद कतरे आंखों में ही अटके थे. किस कदर टूट चुकी थी वह? कितनी कोशिश की थी, कितना सम झाया था मन को उस ने? पर मन, कहां मानता है.
‘‘कब तक चुप्पी साधे रहोगी, अनीता? कुछ तो कहो?’’
‘‘तुम कभी नहीं जान पाओगी, कैथरिन? कितनी दर्दनाक और तीखी आवाज होती है यह मार. चाहे वह मौसम की हो या जुदाई की या फिर इंतजार की. इस चुप्पी में कितना वक्त गुजारा, कह नहीं सकती. अब तक तो सब का साथ था. एक आस थी. अब केवल मैं हूं और मेरा अकेलापन,’’ कहतेकहते उस के भीतर चुपके से एक उदासी उतर आई थी.
‘‘अब बस भी करो प्लीज, कुछ हासिल नहीं होने वाला. गौर से सुनो, जो न कभी अपना था, न हो सकता है, उस का क्या शोक मनाना. फाड़ दो अपने जीवन की किताब से वे भयभीत अतीत के पन्ने. शुरू करो एक नया अध्याय. मुड़मुड़ कर देखती रहीं तो भविष्य के रास्ते भी बंद हो जाएंगे. यकीन करो, समय के साथ यह मौसम भी बदल जाएगा. चलो, उठो, मैं तुम्हें घर छोड़ कर आती हूं.’’
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