Heart Touching Story: कमरे में घुसते ही उस ने अपना कोट उतार कर खूंटी पर टांगा. हैंडबैग सोफे पर रखा. दोनों हाथ कमर पर टिका कर खुली आंखों से टकटकी लगाए खिड़की से बाहर देखने लगी.

जाड़े के मौसम की पहली बर्फ गिरी थी. पूरा परिदृश्य मौन में डूबा था. वह अपनी सिमटी सांसें रोके खड़ी थी. सोचने लगी, जब कभी बर्फ गिरती है तो मन इतना बेआवाज क्यों हो जाता है कि उस अखंड मौन को तोड़ने की हिम्मत नहीं होती. डर लगता है कि जरा सी हरकत की या सांस तक जोर से खींची तो सृष्टि की संगति टूट जाएगी. खिड़की पर धुंध उतर आई थी या फिर उस की आंखों के चंद कतरे आंखों में ही अटके थे. किस कदर टूट चुकी थी वह? कितनी कोशिश की थी, कितना सम झाया था मन को उस ने? पर मन, कहां मानता है.

‘‘कब तक चुप्पी साधे रहोगी, अनीता? कुछ तो कहो?’’

‘‘तुम कभी नहीं जान पाओगी, कैथरिन? कितनी दर्दनाक और तीखी आवाज होती है यह मार. चाहे वह मौसम की हो या जुदाई की या फिर इंतजार की. इस चुप्पी में कितना वक्त गुजारा, कह नहीं सकती. अब तक तो सब का साथ था. एक आस थी. अब केवल मैं हूं और मेरा अकेलापन,’’ कहतेकहते उस के भीतर चुपके से एक उदासी उतर आई थी.

‘‘अब बस भी करो प्लीज, कुछ हासिल नहीं होने वाला. गौर से सुनो, जो न कभी अपना था, न हो सकता है, उस का क्या शोक मनाना. फाड़ दो अपने जीवन की किताब से वे भयभीत अतीत के पन्ने. शुरू करो एक नया अध्याय. मुड़मुड़ कर देखती रहीं तो भविष्य के रास्ते भी बंद हो जाएंगे. यकीन करो, समय के साथ यह मौसम भी बदल जाएगा. चलो, उठो, मैं तुम्हें घर छोड़ कर आती हूं.’’

‘‘कैथरिन, तुम भी न, बातबात पर रोब जमाती हो.’’

‘‘अनीता, आज कोई बहाना नहीं चलेगा,’’ मैं ने दृढ़ता से कहा.

अनीता को उस के घर छोड़ने के पश्चात कैथरिन का मन कहां टिकने वाला था. वह अनीता के अतीत के घेरों में घिर गई. उस ने क्लाइव को फोन करने की ठानी. क्लाइव तथा अनीता दोनों एक ही मैडिकल कालेज में पढ़ते हैं. कैथरिन को विश्वास था कि इस स्थिति में एक क्लाइव ही है जो सम झदारी से अनीता को संभाल लेगा. उस ने क्लाइव का फोन मिलाया.

‘‘हैलो क्लाइव, अगर तुम्हारे पास थोड़ा समय हो तो मैं तुम से शाम को मिलना चाहती हूं. आ जाओ.’’

‘‘क्या इत्तफाक है कैथरिन, मैं भी तुम्हीं से मिलने की सोच रहा था.

आज नहीं, शुक्रवार को शाम 6 बजे

ठीक रहेगा?’’

‘‘हांहां, ठीक है, मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

पूरे 6 बजे घंटी बजी, ‘‘अंदर आओ,

क्लाइव. बैठो, बहुत सर्दी है. बोलो,

चाय या कौफी?’’

‘‘जो आसान हो.’’

चाय पीतेपीते कैथरिन ने कहना शुरू किया, ‘‘क्लाइव, कुछ दिनों से मैं अनीता को ले कर बहुत चिंतित हूं. तुम उस के मंगेतर हो. सोचा, तुम्हें बता देना जरूरी है. मैं नहीं जानती, उस ने तुम्हें अपने बारे में क्या और कितना बताया है?’’

‘‘मैं भी तुम से इसी बारे में बात करना चाहता था. पूरे 2 वर्षों की निरंतर कोशिश के पश्चात उस दिन जब मैं ने अनीता से अपने रिश्ते का वास्ता देते बड़ी आत्मीयता से कहा, ‘अनीता, विश्वास करो, मु झे हर पल तुम्हारी चिंता सताए रहती है. मैं जानना चाहता हूं कि तुम हर समय खोईखोई सी क्यों रहती हो? तुम्हारे चेहरे पर निर्जनता तथा शून्यता देख कर मैं मन कचोट कर रह जाता हूं. उत्तर में तुम्हारी आंखें नम हो जाती हैं. मैं तुम्हारे घावों को फफोल कर तुम्हें उदास नहीं देखना चाहता. मैं तो तुम्हारे दुखसुख में तुम्हारे साथ खड़ा रहना चाहता हूं. कुछ तो बताओ. कई बार तो मु झे तुम्हारे व्यवहार से ऐसा एहसास होता है कि हम साथसाथ होते हुए भी अकेले होते हैं. प्लीज, प्लीज, मैं जानना चाहता हूं.’

‘‘‘सा झेदार बनना चाहते हो, सुन सकोगे?’ उस ने तुनक कर कहा.

‘‘‘बता कर तो देखो, तुम्हारा मंगेतर हूं. भागीदार बनना चाहता हूं.’

‘‘‘तो सुनो, बचपन में ही मां का देहांत हो गया. मां जातेजाते पिता का अतापता तो क्या, उन का नाम भी साथ ले गईं. कौन थे मेरे पिता, यह तो तुम मु झे देखते ही जान गए होगे. मिक्स्ड रेस का बच्चा होने के कारण भारतीय समाज ने तो अपनाया नहीं, अंगरेजी समाज के अनुकूल मां हो नहीं पाईं. मां की मृत्यु के पश्चात सोशल सर्विसेज वाले मु झे बालगृह में ले गए. जब से होश संभाला है, बस यही धुन सताए जा रही है, मेरी पहचान? मेरा अस्तित्व? कोई तो होगा, जो मेरे मातापिता को जानता होगा? तुम कभी नहीं सम झ पाओगे,’ उस ने लावारिस लहजे से कहा.

‘‘‘पगली कहीं की. हम जीवनसाथी बनने वाले हैं. बोलती जाओ, मैं सुन रहा हूं,’ मैं ने प्यार से कहा.

‘‘‘स्कूल में रहते कुछ न कर सकी. मेरे अस्तित्व की जिज्ञासा के जनून ने क्याक्या नहीं करवाया मु झ से. तुम विश्वास नहीं करोगे. अकसर बाजार में सड़क के इस पार या उस पार किसी अधपहचाने चेहरे को पहचानने की ललक में ठिठकठिठक कर खड़ी हो जाती. कभी बटुए से अपनी तसवीर निकाल कर चेहरे मिलाने की कोशिश करती. और कभी किसी का अपने जैसा रंग देख कर रुक जाती. किस प्रकार थक चुकी थी खोजबीन करतेकरते. आखिर में मन को सम झा ही लिया. अब मु झे आत्मनिर्भर होने की प्रतीक्षा थी.

‘‘‘2 वर्ष पश्चात बालगृह में मेरा 18वां जन्मदिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया. उस दिन से मेरे लिए वहां के दरवाजे सदा के लिए बंद हो गए. काउंसलर का छोटा सा फ्लैट मिल गया. सोशल सर्विसेज वालों ने उस में फर्नीचर भी रखवा दिया. उस दिन से जीवन की विकट से विकट स्थिति का सामना मु झे अकेले ही करना था. कई बार तो बिस्तर पर लेटेलेटे दोपहर हो जाती. खिड़कियों में लगे परदे मेरी ही तरह दिनरात, सुबहशाम अकेले मौनभाव में लटके रहते. कभीकभी तो रात का सन्नाटा सांयसांय करता सुनाई देता. नींद न आने पर खिड़की से चांद को बातों में उल झाए रखती. घंटों उन्हीं बातों में खो जाती. परीक्षा के परिणाम अच्छे निकले, मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया. क्लाइव, मैं तो उस दिन को धन्यवाद देती हूं जब तुम्हारी और मेरी मुलाकात हुई. तुम्हारे साथ मेरे जीवन का नया अध्याय आरंभ हुआ. उस समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो तुम मेरे लिए बेवक्त वसंत लाए हो. नया बोध, नई उमंग, नई तरलता. मैं ने स्वयं को आकाश में उड़ते पाया. एक अज्ञात तन्मयता मेरे अंतर्मन तक एक अनोखी खुशी का संचार करने लगी.’

‘‘‘अनीता, एक बात बताओ, तुम मु झ से इतनी कतराती क्यों थीं? मु झे देखते ही राह क्यों बदल लेती थीं?’

‘‘‘मेरे भीतर बैठा अज्ञात अस्वीकरण का डर, कि कहीं तुम भी मु झ जैसी पहेली को सुल झाने का प्रयत्न तो नहीं कर रहे? इसी हीनभावना को सहतेसहते मन में अनेक प्रश्न उठते रहे. क्लाइव, तुम ने कभी ध्यान से मेरे चेहरे को देखा है? सांवला रंग, घुंघराले कालेकाले बाल, मोटे होंठ, रहनसहन का लहजा अंगरेजी? बस, यही सवाल मेरे अस्तित्व को ढकते रहे. जिन का उत्तर ढूंढ़तेढूंढ़ते मैं ने इन प्रश्नों के द्वार पर चुप्पी की चट्टान रख दी. क्या बताती अपना अधूरापन. इन्हीं प्रश्नों में उल झी तुम से कतराती रही, कहां तुम और कहां मैं…’

‘‘‘इस से क्या फर्क पड़ता है. मैं तुम्हारे साथ हूं. फिर कभी मत दोहराना इस बात को. अब जरा मुसकराओ तो?’ मैं ने उस का हाथ पकड़ कर स्नेह से कहा.

‘‘उस ने भारी मन से दबी सी मुसकराहट दी. उस की बातें सुन कर मेरा मन भारी हो गया. अनीता बोलती गई, मैं सुनता रहा.’’

‘‘‘क्लाइव, अकसर सोचती हूं अगर कैथरिन मेरे जीवन में न होती तो मैं कहां होती? कैथी बहुत ही सुशील व सुल झी हुई लड़की है. संस्कारों से भरपूर. जब कभी भी मेरी अक्ल रेल की पटरी से उतरने लगती, वह सम झदारी से उसे सीधा पटरी पर डाल देती. शनिवार को अकसर हम टाउन, डिस्को या कभी लंच पर चले जाते. उस दिन शनिवार का दिन था, हम दोनों बस के इंतजार में खडे़ थे.

‘‘‘तभी किसी ने मेरा नाम पुकारा-हैलो अनीता. अपना नाम सुन कर मैं चौंकी. पुकारने वाली ने पूछा कि पम्मी कैसी है?

‘‘‘मां का नाम सुनते ही मेरी टांगें कांपने लगीं. मैं निशब्द खड़ी की खड़ी रह गई. वह आगे बोली कि अनीता, तुम्हें याद नहीं क्या? मैं तुम्हारी मम्मी की सहेली, सौफी. हांहां, तू कैसे पहचानेगी? हम दोनों शैविंगटन स्कूल में साथ पढ़ते थे. देखूं तो सही, कितनी सुंदर निकली है. बिलकुल फोटोकौपी है मां की. तेरी मां भी बहुत सुंदर थी. स्कूल के सभी लड़के दीवाने थे उस के. नचाती थी सब को. उस का टांका तो जिम्मी जेम्स विलियम्स से जुड़ा था. बहुत प्यार करती थी उस से. अच्छा लड़का था. स्कूल के पास ही रोप लेन में उस का घर था. बहुत अमीर था, तभी सभी लड़कियों का चहेता था. सौरी अनीता, मेरी बस आ गई है. उन्हें मेरी याद दिलाना. इतना कह कर वह बस में चढ़ गई.’ और उस के जाते ही अनीता फूटफूट कर रोने लगी. बात वहीं थम गई.

‘‘कैथरिन, उस दिन मैं उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहता था किंतु लाचार था.’’

‘‘आगे मैं बताती हूं क्लाइव, तुम्हारे चले जाने के बाद मैं और अनीता दोनों इकट्ठे लंच करने वाले थे. अनीता प्रश्नों के घेरे में घिरी रही. उस दिन किसी ने पहली बार उस के पिता का जिक्र किया था. उस के मन में उल्लास की फुल झडि़यां जल रही थीं. बचपन से जिस की खोज थी, उस का सूत्र मिल गया था. अनीता बहुत खुश थी. लंच के बाद सीधे हम उस के फ्लैट पर पहुंचे. हम दोनों सोफे पर बैठे थे. वह आत्मीयता से एक अबोध बालक सी मन की तमाम खुशियां उड़ेलती जा रही थी. मैं ने उन्हें सोखतेसोखते स्नेहभरी मुसकान से कहना शुरू किया :

‘‘‘अनीता, पापा को ढूंढ़ना चाहोगी? सुराग तो तुम्हें मिल गया है.’

‘‘खुशी से लिपट कर बोली, ‘कैसे?’

‘‘‘उसी सूत्र से जो तुम्हें आज मिला है? तुम्हारे पापा का नाम कंप्यूटर पर सर्च करेंगे, इकट्ठे बैठ कर. पर शर्त यह है कि एक दिन में आधे घंटे से अधिक नहीं.’ क्योंकि कंप्यूटर में मैं बिंदास थी.

‘‘2 सप्ताह तक कोई सुराग नहीं मिला. एक दिन मैं ने एक लिफाफा थमाते कहा, ‘यह लो, अनीता, आगे तुम्हारा काम है.’

‘‘कांपते हाथों से लिफाफा खोलते ही वह खुशी से  झूमने लगी. एकाएक दुविधा में पड़ गई. एक ही सांस में उस ने अनेक प्रश्नों की बौछार कर दी, ‘कैसे…कैसे संबोधित करूंगी? क्या लिखूंगी? वे क्या सोचेंगे? जवाब देंगे भी या नहीं?’

‘‘‘ईमेल से एक साधारण सा पत्र लिख कर भेज दो.’

‘‘अनीता ने डरतेडरते लिखना प्रारंभ किया :

‘डियर सर,

‘अगर आप 1980 में शैविंगटन सैकंडरी स्कूल में पढ़े थे तो, कृपया मु झे इस पते पर लिखिए. मैं आप से मिलना चाहती हूं.’

‘‘पत्र मेल करते ही उस की बेचैनी और बढ़ गई. हर रोज वह फोन के चारों ओर मंडराती रहती. बारबार कंप्यूटर में ईमेल देखती.

‘‘उधर, जेम्स विलियम्स को मेल देखते हैरानी के साथसाथ जिज्ञासा हुई. सोचने लगे, अनीता नाम की तो क्लास में कोई लड़की नहीं थी. फिर सोचा, शायद मु झ से जूनियर रही हो. मिलूंगा, वरना पता कैसे लगेगा?

‘‘अनीता की बेसब्री बढ़ती जा रही थी. वह बारबार मु झ को फोन करती. मैं उसे हर बार यही कह कर आश्वासन देती, ‘रिलैक्स अनीता, रिलैक्स.’

‘‘रात के 11 बजे थे, मेरे फोन की घंटी बजी. मैं हैरान थी कि इस वक्त कौन हो सकता है? मैं ने फोन उठाया. अनीता का फोन था.

‘‘‘कैथरिन, कैथरिन, अनुमान लगाओ क्या हुआ? मु झे विश्वास नहीं हो रहा, एक सप्ताह पश्चात मिलने के लिए उन्होंने मु झ को समय दिया है.’

‘‘‘सच, तैयारी आरंभ कर दे,’ मैं

ने कहा.

‘‘रेंगतीरेंगती शुक्रवार की शाम भी आ पहुंची. सुबह उठते ही खिड़की से बाहर देखते ही भीतर की खुशी के मारे चीख निकल गई. समूचे यूके ने बर्फ की चादर ओढ़ रखी थी. घरों की छतों से बर्फ की  झालरें लटक रही थीं. अनीता खुद को संभाल नहीं पा रही थी. उस का मन  झूम रहा था. गा रहा था. वह खुश थी. आज उस का खुद उसी से परिचय होने वाला था. वह घंटी बजने के इंतजार में थी. घंटी बजी. उसे लगा, मानो मन की मुराद मिल गई हो. दरवाजा खोलते ही सामने फूलों का गुलदस्ता लिए मिस्टर जेम्स खड़े थे.

‘‘‘आप अनीता? मैं जेम्स,’ उन्होंने मुसकराते हुए हाथ मिलाया.

‘‘‘आइए, अंदर आइए.’

‘‘अपनेअपने उल्लास के कारण दोनों चुप थे. धीरेधीरे अनीता ने अपना अतीत उन के सम्मुख उड़ेल डाला. वह कभी अनजान चेहरे को पूरी तरह पहचानने की ललक में जेम्स को कनखियों से देखती, कभी मैंटल पीस पर पड़ी अपनी फोटो से उन का चेहरा मिलाने की कोशिश करती. पहली मुलाकात थी, दोनों ने चुप्पी में कितना वक्त गुजारा, कह नहीं सकती. सां झ उतर आई थी. जेम्स के जाने का समय हो गया था. खुशी उस के अंगप्रत्यंग से छलकने लगी. दोनों का आपस में मिलना, ईमेल लिखना, फोन पर बातें करने का क्रम कई सप्ताह तक निरंतर चलता रहा. धीरेधीरे उस का आत्मविश्वास अपना स्थान ग्रहण करने लगा.

‘‘?इधर, जेम्स सोचने लगे, यह मैं क्या कर रहा हूं. कभीकभी कई बातों का दबे रहना ही बेहतर होता है. एक दिन अचानक सबकुछ वहीं रुक गया. एक बार फिर वह छली गई. अस्वीकृति की भावना से घिरी प्रश्न करती, क्यों वक्त बारबार उस को कुरेद रहा है? कैसे गुजारे उस ने 20 वर्ष इस एहसास के बिना? क्या होगा अगर उस का होना लोगों की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरा? उसे उस का होना ही खटकने लगा.

‘‘करीब 2 वर्ष बीत गए टैक्स्ट, मेल की आस में. मौसम आए और चले गए. दूसरी सर्दी की बर्फ भी पिघल चुकी थी. क्रोकोसिज फूल और डैफोडिल्स फूल धरती से उभरउभर कर  झांकने लगे. नई मिट्टी सजसंवर कर पहले जैसी प्रसन्न दिखने लगी थी. ऐसा लगता था, मानो इन पर बौछार की चोट पड़ी ही न हो. किंतु उस का मन बौछार की अनेक चोटें खा चुका था. उसे इंतजार था एक मेल का. एक बार पापा जेम्स कह दें, ‘अनीता बेटा, मैं हूं न?’ तो जीवन का अर्थ ही बदल जाएगा. उसे बहुत बड़ी चोट पहुंची. वह ठुकराए जाने का मातम मनाती रही. अकसर कहती, ‘कैथरिन, मैं जानती हूं, मेरे इस व्यवहार से तुम चिंतित हो, पर तुम्हारा मेरे साथ खड़े रहना मेरे लिए सुरक्षाकवच है. तुम्हारी इस वटवृक्ष सी सघनता का एहसास है मु झे. तुम निष्पक्ष हो कर सोचतीविचारती हो. जरूर कोई हल निकाल लोगी.’

‘‘उस की असहनीय पीड़ा को मैं न देख सकी. एक दिन मैं ने उस से फोन पर कहा, ‘अनीता, एक और संभावना है.’

‘‘‘क्या है? क्या है? जल्दी बताओ?’

‘‘‘तुम ने कभी डीएनए के बारे में सोचा है?’

‘‘‘वाऊ, डीएनए,’ उस ने उचक कर कहा.

‘‘‘यह टैस्ट दोनों के लिए ठीक रहेगा. आजकल तो यह साधारण सी बात है.’

‘‘‘विचार तो अच्छा है पर कैसे?’ उस ने उत्सुकता से कहा.

‘‘हम दोनों ने इंटरनैट पर डीएनए की संभावना का अन्वेषण आरंभ कर दिया. विकल्प तो अच्छा था, प्रश्न यह था कि जेम्स विलियम्स के सम्मुख यह प्रस्ताव रखा कैसे जाए?

‘‘‘अनीता, यह तो तुम्हें ही करना होगा.’

‘‘‘ठीक है,’ सोचविचार के बाद उस ने स्वयं ही सु झाव दिया, ‘क्यों न एक और ईमेल किया जाए?’ और वह लिखने बैठ गई :

‘‘‘मेरे प्यारे जेम्स विलियम्स,

‘‘‘मैं नहीं सम झ पाई ऐसा क्या हुआ, जिस से अचानक वक्त ने हमारे बीच एक खामोशी की दीवार खड़ी कर दी. मैं तो यह जानती हूं, कुछ ही समय में आप ने जो आजीवन साथ रहने वाली सुरक्षा का आभास दिया है उस के लिए मैं सौ बार आप की आभारी हूं. आप से मिल कर अपने अस्तित्व से मेरा परिचय होने लगा है. आप से आखिरी निवेदन है, अगर हम एक डीएनए टैस्ट करवा लें, तो वह दोनों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता तय करेगा. टैस्ट के परिणाम को मैं मन से स्वीकार करूंगी. प्लीज, मना मत करना, विनम्र निवेदन है.

‘‘‘आप की अनीता.’

‘‘ईमेल तो वह कर चुकी थी किंतु उस के भीतर का दुबका डर उसे डरा रहा था. उस ने प्रबल इरादे से अपने अस्तित्व को ढूंढ़ने की ठान ली थी. बारबार ईमेल चैक करती. हवा के  झोंके की आवाज सुन कर बिस्तर से भाग उठती इसी उम्मीद में कि शायद…उस वक्त स्लीपर पैरों में टंगे रहते. हाउस कोट बांहों में डोलता रहता. वह निराश खड़ी बादलों को आतेजाते देखती रहती. फिर सोचती, भला उन्हें क्या पड़ी है, तभी तो अचानक मिलनाजुलना स्थगित हो गया. कारण बता देते, मैं सम झ जाती. मेरी आशाओं को सूत्र में पिरो कर एक ही  झटके में तोड़ कर बिखेर डाला. फिर बोल उठती, नहींनहीं, ऐसा नहीं सोचना चाहिए. पिता का एहसास तो दिया है. बेशक, कुछ समय के लिए ही सही.’

‘‘अनीता का मेल पढ़ते ही जेम्स के लिए वक्त वहीं थम गया. पहली बार जीवन के चौराहे के मोड़ पर निर्णय लेना कठिन हो गया था. कोसने लगे स्वयं को. सोचने लगे, अनीता से मिल कर जुल्म किया है उस पर. मैं ही दोषी हूं. क्यों भावावेश में आ कर उस की आशाएं बांधीं? उस से साफसाफ कह देना चाहिए था. क्यों इतना कायर हो गया था. यही देख कर कि पिता से मिलने की खुशी उस की आंखों से छलक रही थी. शायद, अनीता ठीक ही कहती है. जेम्स ने अनीता के मेल का उत्तर दिया :

‘‘‘प्रिय अनीता,

‘‘‘बहुत सोचविचार के बाद इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि इतना तो मैं तुम्हारे लिए कर ही सकता हूं. तुम्हारा सु झाव ठीक है. डीएनए दोनों के लिए ठीक रहेगा. मैं नहीं जानता इस टैस्ट के लिए कब और कहां जाना है? यह तुम्हीं निश्चित कर के मु झे मेल कर देना. मैं वहीं पहुंच जाऊंगा.’

‘‘‘तुम्हारा जेम्स.’

‘‘जेम्स का मेल पढ़ते ही अनीता बादलों के संग  झूमने लगी, गुनगुनाने लगी.  झट से उस ने मेरा फोन मिलाया.

‘‘‘कैथरिन, बू झो तो जानूं?’

‘‘‘बताओगी भी या पहेलियां बु झाती रहोगी?’

‘‘‘पापा जेम्स का मेल आया है. लिखते हैं समय व स्थान निश्चित कर उन्हें मेल कर दूं.’

‘‘अनीता ने सभी औपचारिकताएं पूरी कर के जेम्स को मेल तो कर दिया. किंतु उस के मन का दबा भय फिर उसे डराने लगा. अगर जेम्स वहां नहीं पहुंचे तो? कभी फूल ले कर उन की पंखडि़यां तोड़ने लगती. आएंगे? नहीं आएंगे? नहीं का सोचते ही उदास हो जाती. अब उसे प्रतीक्षा थी परिणाम की.

‘‘मेल पढ़ते ही जेम्स का मन बेईमान होने लगा. कोसने लगे खुद को.

‘‘‘क्यों परिस्थितियां सम झते हुए भी खुद को जोखिम में डाल लिया है. कुल्हाड़ी मार ली अपने ही पैरों पर. परिवार के बारे में क्यों नहीं सोचा. नहीं जाऊंगा तो क्या होगा? नहींनहीं, उस ने पूछ कर ही तय किया है. सच से कैसे मुंह मोड़ सकता हूं.’

‘‘आज परिणाम का दिन था. अनीता का जन्म होने वाला था. रातभर उसे नींद नहीं आई. सुबह के 9 बजने वाले थे. कोहरे की धुंध हटी नहीं. सूरज उगा या नहीं, इस का सही अनुमान लगाना कठिन था. नियुक्त समय शाम के 5 बजे था. अनीता सुबह 9 बजे ही तैयार हो गई. वह चहक रही थी. उस के जीवन के अर्थ की उपलब्धि होने वाली थी. 10 बजते ही उस ने मु झे फोन किया, ‘कैथरिन, याद है न?’ नकारात्मक विचार उसे दुविधा में डालने लगे. उस का वजूद हां या न पर निर्भर करता था. उस के मस्तिष्क में यही सवाल उठता, जिस परिवार की कल्पना वह बचपन से करती आई है, क्या उस का नाम उन रिश्तों से जुड़ पाएगा? क्या हां सुनते ही जेम्स का मन आर्द्र हो उठेगा? क्या जेम्स आगे बढ़ कर उस से कहेंगे, ‘अनीता बेटा, मैं हूं न. तुम्हारी पहचान. चलो घर चलें.’

‘‘फिर सोचती, क्यों इतनी स्वार्थी बन रही हूं. इतना बड़ा सच जान कर उन के परिवार में उथलपुथल मच जाएगी? क्या सहज होगा ऐडजस्ट करना? अचानक इतनी बड़ी बेटी कहां से आई? सभी पूछेंगे. उन के घर का उठनाबैठना कैसा होगा? क्या उन के परिवार में स्वीकारा जाएगा मु झे?

‘‘‘अगर परिणाम न हुआ तो नन्हा सा अक्षर जीवन के माने ही बदल डालेगा. वक्त वहीं ठहर जाएगा. जीवन के पन्ने कोरे ही रह जाएंगे. उस की स्थिति उस वक्त एक खूंटे से अलग हुए बछड़े की सी होगी, जो अभी भी खूंटे से मिलने की आस में था. वह उस उम्मीद की डोर पकड़े बैठी थी जो कुछ क्षणों में गांठ भी बन सकती थी. वह प्रश्नों में उल झी छटपटा रही थी.

‘‘टैस्ट के लिए उधर जेम्स तैयार होते हुए बहुत धर्मसंकट में थे. सोच रहे थे, ‘हां तो कर दी, अगर परिणाम हां हुआ तो कैसे संभालूंगा स्थिति को? कैसे सामना करूंगा परिवार का? क्या प्रतिक्रिया होगी मेरी पत्नी की, बच्चों की? गिर जाऊंगा सब की नजर में? क्या स्पष्टीकरण दूंगा परिवार को? अनीता हम से अलग क्यों है? अभी तक तो किसी को भनक तक नहीं है. कैसे घर ले जाऊंगा अनीता को? अगर न हुआ तो अनीता पहले से भी अधिक टूट जाएगी. कैसे सांत्वना दूंगा अनीता को? क्यों बंटी हुई हैं मेरी भावनाएं अनीता के प्रति?’

‘‘शाम के 4 बज चुके थे. 5 बजे सैंटर पहुंचना था. जेम्स हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. फिर सोचा, मेरे पास अब खोने को है ही क्या? आखिरकार वे वहां पहुंच ही गए. डाक्टर ने दोनों का डीएनए टैस्ट के लिए सैंपल ले लिया. सैंटर में अनीता बेचैनी से आगेपीछे चक्कर लगा रही थी. कभी लोगों से टकराती, कभी मेरा हाथ पकड़ती, कभी उठती, कभी बैठती.

‘‘जेम्स के चेहरे पर भी बेचैनी की लकीरें साफ  झलक रही थीं, वे भी बैठेबैठे कभी हाथ मलने लगते, कभी खड़े हो कर टहलने लगते. दोनों आमनेसामने बैठे अपनी इच्छाओं के अनुकूल अपनी मनोकामना पूर्ण होने का इंतजार कर रहे थे. दोनों की आंखें डाक्टर के कमरे के दरवाजे पर टिकी थीं. डाक्टर ने बाहर आते ही दोनों के हाथों में एकएक लिफाफा थमाया. जेम्स लिफाफे को घुमाफिरा कर देखने लगे. अनीता के हाथ कांप रहे थे. दोनों परिणाम के लिए उत्सुक थे, एक डर के साथ. दोनों ही लिफाफे को खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे.

‘‘स्थिति को भांपते हुए डाक्टर ने जेम्स को कमरे में बुलाया. अनीता का दिल धड़कने लगा, सांसें गले में अटक गईं. उस की नजरें टकटकी लगाए दरवाजे के खुलने का इंतजार कर रही थीं. कुछ देर बाद दरवाजा खुला. जेम्स को देखते ही वह कड़कती सर्दी की रातों में नदी के पानी की तरह जम गई. हाथों से लिफाफा गिर गया. सबकुछ स्पष्ट था. जेम्स के डीएनए से उस का डीएनए मैच नहीं हुआ.

‘‘अब अनीता के चेहरे पर सन्नाटा ही नहीं, एक बेचैनी सी चुप्पी, जो जिस जगह टूटती है अपना निशान छोड़ देती है, उतर आई थी. वह ठगी सी एक बु झती दीपशिखा सी बु झ गई. पलभर के लिए उसे ऐसा लगा जैसे वह ठहरी हुई पहाड़ी है, जिस पर सारे मौसम आते, फिसल जाते हैं. उसे अब इन्हीं मौसमों के संग रहना और बहना सीखना होगा.

‘‘जातेजाते जेम्स ने अपना रूमाल उस की ओर किया. वह उस का जाना न देख सकी.’’ Heart Touching Story

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