Caste Discrimination: दलितों की गहरी आस्था भीमराव अंबेडकर में है क्योंकि उन्हें एहसास है कि उन्होंने उन के भले और अधिकारों के लिए जो किया वह आसान न था. इस के लिए उन्हें शक्तिशाली ब्राह्मण लौबी से जूझना पड़ा था. अब ऐसा क्यों है कि दलित उन के बताए रास्ते पर नहीं चल पा रहा तो इस का जवाब यह है कि अंबेडकर के हाथ में सुदर्शन चक्र और तीरकमान जैसे जानलेवा हथियार नहीं हैं और वे कोई चमत्कार नहीं दिखाते.
20 वर्षीय साहिल वाकोडे मासूम और खूबसूरत होने के साथसाथ प्रतिभाशाली छात्र भी था. पिछले साल जब जेईई जैसी कठिन परीक्षा पास कर उसे आईआईटी बौंबे में एडमिशन मिला था तो उस के सपनों को मानों पंख लग गए थे. महाराष्ट्र के यवतमाल का रहने वाला साहिल अपने पिता रवीन्द्र वोकाड़े और मां सोनाली वोकाड़े का इकलौता बेटा होने के नाते उतना ही लाड़ला था जितना कोई दूसरा होता है.
पेरैंट्स ने उसे दर्जनों नसीहतें दे कर कई उम्मीदों के साथ मुंबई भेजा था जिन पर साहिल खरा भी उतरा था. फर्स्ट ईयर में ही उसे 8.5 सीजीपीए यानी 85 फीसदी मार्क्स मिले थे. मैथमेटिक्स ओलंपियाड में गोल्ड मैडल भी उसे मिला था. आईआईटी बौंबे जैसे नामी संस्थान के लिहाज से ये नंबर काफी अच्छे माने जाते हैं.
जेईई में भी उसे 94 फीसदी मार्क्स के चलते एससी कोटे में 614वीं रैंक मिली थी. इसी रैंक के आधार पर उसे आईआईटी मद्रास और आईआईटी दिल्ली में भी एडमिशन मिल रहा था. लेकिन यवतमाल से नजदीक होने के चलते उस ने मुंबई को चुना था जो देश के तीसरे नंबर का आईआईटी है. इसी रैंक के चलते उसे अपनी पसंदीदा ब्रांच `एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिग` भी मिल गई थी. कुल जमा अपनी अब तक की उपलब्धियों से साहिल संतुष्ट और खुश था. अब होस्टल में रहते वह दूसरे मिडिल क्लास टीनएजर्स की तरह यूपीएससी का सपना देखते छिटपुट तैयारी भी करने लगा था. स्पोर्ट्स में बैडमिंटन उस का पसंदीदा गेम था.
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