Hindi Stories: “वैदो बहन के साथ आए हैं. उन की ससुराल इसी अनुमंडल के धौरय्या थाने के तहत आने वाले एक गांव में है. वे अपनी एलिमनी के लिए कोर्टकचहरी आती रहती हैं. हां, यहां आप की पोस्टिंग के बाद पहली बार आई हैं.”

अंदर किचन के पास से 2 महिलाओं की आवाजें आ रही थीं.  उस ने वैदो बहन के वैवाहिक जीवन में अनबन के चर्चे पहले भी सुने थे. 7वीं पढ़ी वे एक होशियार और जागरूक महिला थीं. रामभक्त पिता साल में चारछह महीने अयोध्या में रहते थे. पहली कन्या संतान का नाम बड़े प्यार और गर्व से रखा- वैदेही. विवाह के पहले वैदेही ही उन का सारा कामकाज देखती थी. बुआई से ले कर कटाई तक, पर्वत्योहार के सारे काम, उसी की देखरेख में होते थे. दो छोटे भाइयों की पढ़ाईलिखाई सब उन्हीं के जिम्मे थी. गांव के लोग भी उन की सूझबूझ के कायल थे.

हाथमुंह धो, सोम डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ा. बातों में मशगूल नेहा को उस के आने का भान ही नहीं हुआ. सोम ने सुना, वैदो बहन कह रही थी, ‘छोटी, उस दिन तो मुझे लगा कि आज मैं नहीं बचूंगी. मुझे खत्म करने की उन की तैयारी पूरी थी. शाम का समय सूरज डूब चुका था लेकिन अंधेरा अभी नहीं हुआ था. मेरे पति फैक्टरी से लौटे नहीं थे. मैं अकेली थी. बंद दरवाजे के बाहर मेरी सास पहरा दे रही थी. एक खिड़की खुली थी. बाहर कुछ संदिग्ध दिखने वाले मुस्तंडे चहलकदमी कर रहे थे.’

‘तुम्हें डर नहीं लगा?’

‘डर तो लग रहा था लेकिन तभी एक टैक्सी घर के सामने आ कर रुकी और गुणेश्वर बाहर निकला.’

‘गुणेश्वर भाईजी कहां से आ गए?’

‘मैं ने ही उसे चिट्ठी लिख कर बुलवाया था.’

इस बीच, नेहा की नजर श्याम पर पड़ी. “अरे, आप कब आए?”

“मैं तो कब से तुम दोनों की बातें सुन रहा था.”

सोम ने वैदो बहन के पैर छुए. खाना लग गया था. सब ने खाना खाया.

“दीदी, अब आप थोड़ा आराम कर लीजिए,” नेहा ने कहा.

सोम ने नेहा से पूछा, “किस काम से आई हैं?”

“वो तो विस्तार से आप को वही बताएंगी. लगता है, कोर्ट से एलिमनी (निर्वाह राशि) में मिली जमीन की पैदावार उन की ससुराल वाले उन्हें नहीं लेने दे रहे हैं. नकदी तो उन के पति की तनख्वाह से कट कर सीधा कोर्ट में जमा हो जाती है.”

“फसल कटवाने के लिए तो उन्हें वहां रहना होगा.”

“वह कर चुकी हैं. अपने हिस्से की जमीन पर दो कमरे, किचन और बाथरूम बनवाया है. बुआई के समय जाती हैं. कटनी के समय उन की ससुराल वाले कच्चीपक्की फसल पहले ही कटवा लेते हैं, कहते हैं, ‘कोई काट ले गया.’ फसल उन के हाथ कभी नहीं लगी. कोर्ट का फैसला आए पूरे 3 साल हो चुके हैं.”

शाम की चाय पर सब साथ बैठे तो सोम ने कहा, “दीदी, दिन में नेहा से आप जो बात कह रही थीं, वह अधूरी रह गई थी?”

नेहा बोली, “हां, हां दीदी.”

“पहले तो मेरी सास मुझे गांव में ही रखना चाहती थी. जब मैं उन के साथ रहने के लिए जमशेदपुर आई तो सास मुझे कहीं बाहर जाने नहीं देती थी. इन के आते ही मेरी शिकायत ले कर बैठ जाती- कोई लूर-ढंग नहीं है. आलसी है, वगैरहवगैरह. किसी पड़ोसी से भी मिलने नहीं देती थी. किसी तरह मैं ने एक चिट्ठी लिख कर खिड़की से पड़ोसी को पोस्ट करने को दे दिया. यहां के हालात बताते हुए मैं ने लिखा कि किसी को मुझे लिवा लाने को भेजो. गोणु के उस शाम आने से उन का प्लान फेल हो गया. मुझे भेजने से वे लोग इनकार नहीं कर पाए. इस तरह मैं बच गई.”

सोम अब बोला, “मारने से उन को फायदा?”

“दहेज की शर्त थी- 25 हजार रुपए और इन की इंजीनियरिंग की पढ़ाई का खर्चा. ये रूपवान थे, मैं तो बस ठीकठाक थी. सोचा था, घरगृहस्थी के कामों में मेरी निपुणता, मेरी सूझबूझ, मेरी सहजता शायद मुझे स्वीकार करने में उन की मदद करेगी. लेकिन डोली उतरते ही मेरा रंगरूप मेरी सास को नागवार गुजरा. कुछ ही दिनों बाद जब घरआंगन के लोग मेरे गुणों की तारीफ करने लगे तो सास बिफर कर बोली, ‘सो, क्या मेरा बेटा मुर्खचपाट है? वह सक्षम है, सब संभाल लेगा. इस के लिए उसे किसी जनानी की जरूरत नहीं.’”

दीदी ने आगे कहा, “मदन जी की पढ़ाई तक वे चुप रहे. लेकिन मेरी सास ने इन की दूसरी शादी करने का मन बना लिया था. इस बीच अलगअलग बहाने बना कर वे लोग पिताजी से पैसे भी मांग लेते थे. पढ़ाई के दौरान वे सिर्फ दो बार छुट्टियों में घर आते. उस समय भी मेरी सास हम दोनों को ज्यादा से ज्यादा समय अलग ही रखना चाहती थी. पांच साल में मुश्किल से दोचार दिन ही हमदोनों ने पतिपत्नी के रूप में बिताए होंगे.”

“आप जमशेदपुर कैसे और कब आईं?”

“टाटा में मेकैनिकल इंजीनियर की नौकरी जौइन करने के बाद इन्हें खानेपीने में दिक्कत होने लगी. उसी समय मेरी सास को हाई ब्लडप्रैशर ने परेशान कर दिया था. वे अपने इलाज के लिए बेटे के पास आईं तो मुझे भी साथ लेती गईं. वहीं मुझे पक्का पता चला कि ये लोग इन की दूसरी शादी करने वाले हैं.”

“कैसे?”

“एक दिन कुछ लोग मेरी सास से मिलने आए थे. बंद कमरे में लेनदेन की बातें चल रही थीं, जो मैं ने सुन लीं. वहां दोतीन घर बाद एक परिवार रहता था. उन की होने वाली पत्नी इसी परिवार के बगल के गांव की थी. एक दिन जब मेरी सास इन के साथ डाक्टर के पास गई थी तब उसी परिवार की एक महिला ने आ कर मुझे सब बता दिया. अब मुझ से रहा नहीं गया. मैं ने उन्हें धमकी दे डाली कि यदि आप ने शादी की तो मैं कंपनी में शिकायत कर दूंगी और पौलिगामी के अपराध में आप की नौकरी चली जाएगी. मैं ने यह भी कहा कि अखिल भारतीय महिला आयोग में भी शिकायत दर्ज करवाऊंगी. इस के बाद तो दोनों मांबेटे की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. यह समझ कर कि मुझ से खतरा है, उन्होंने मुझे खत्म करने की योजना बनाई डाली.”

“आप गोणू भाई जी के साथ मायके आ गईं?”

“हां. लेकिन मेरे घर वालों को मेरी बातों पर यकीन नहीं हुआ. सभी मुझे ही दोष देने लगे. मेरी मां ने कहा, ‘अरे, नैहर और ससुराल में फर्क होता है. धीरेधीरे मानसम्मान मिलता ही.’

“जिन को स्त्रियों का सम्मान करना आता है वे शुरू से ही करते हैं. लेकिन जिन को गोरी चमड़ी और पैसे का लोभ हो उन के लिए और कुछ मायने नहीं रखता. जब आप लोग मेरी लाश देखेंगे तब शायद विश्वास होगा.

“मेरी बात सुन कर सब चुप हो गए.

“लेकिन मदन कुछ ही दिनों बाद मुझे लेने आए, कहा कि वैदेही को कोई गलतफहमी हुई है. और मेरे घर के लोग मान भी गए. इतना ही नहीं, पिताजी से उन्होंने मोटरसाइकिल खरीदने के लिए डेढ़ लाख रुपए भी ऐंठ लिए. पिताजी ने मुझे यह बात बताई तो मैं ने कहा, ‘आप कुछ भी कर लीजिए, आप की बेटी को ससुराल में सुख नहीं मिलने वाला. आप का पैसा व्यर्थ जाएगा.’ मेरी बात सुन कर पिताजी ने पैसे वापस ले लिए. इस पर मदन को इतना गुस्सा आया कि वे बिना मुझे लिए और बिना किसी को बताए वापस चले गए. इस घटना के दो महीने बाद खबर आई की मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली है. और जैसा कि इन परिस्थिति में अकसर होता है, मुझे दुखियारी समझा जाने लगा और पुरुष प्रधान इस समाज के बहुतों का मानना था कि जरूर लड़की में ही कोई खोट रही होगी.

“कुछ दिनों बाद मैं ने पिता जी से कहा, ‘मुझे तलाक के लिए केस करना है और उन से एलिमनी लेनी है.’

“जगहंसाई के डर से पिताजी नहीं मान रहे थे, लेकिन आखिर मान गए.

“जब कोर्ट में केस फाइल हुआ तब एलिमनी के भय से मेरे पति सुलह करने आ पहुंचे. मैं किसी भी तरह नहीं मानी और वे लौट गए.

“कोर्ट का फैसला करीब एक साल बाद आया. मुझे निर्वाहनिधि के रूप में उन्हें 5,000 रुपए हर महीने देने थे. लेकिन मेरे स्तर के अनुसार निर्वाह करने के लिए यह राशि बहुत कम थी. मैं ने उन के हिस्से की जमीन से भी निर्वाह के लिए कुछ जमीन देने की कोर्ट से अपील की. एक साल बाद कोर्ट के फैसले से मुझे 10 बीघा जमीन की पैदावार पाने का हक मिला.”

इस के बाद वैदेही फैसले की प्रति ले आई.

सोम बोला, “मैं क्लब जा रहा हूं, वहां अनुमंडल के सभी पदाधिकारी आते हैं, एएसपी, एसडीओ सदर, एसडीएम वगैरहवगैरह. मैं वहां आप का केस रखूंगा.”

“फैसले के बाद से मैं एक बार भी पैदावार नहीं ले पाई हूं. मेरे ससुर बहुत ही प्रभावशाली व्यक्ति हैं. उन का पौलिटिकल कनैक्शन भी है और लोकल थाने में प्रभाव भी.”

सोम जब क्लब पहुंचा तब करीबकरीब सभी आ चुके थे. एएसपी सुरेश बैडमिंटन खेल रहे थे. हाथ के इशारे से दोनों ने एकदूसरे का अभिवादन किया.

गेम के बाद सुरेश जब पास आए तो बोले, “क्या बात है सोमेश, गंभीर लग रहे हो?”

“ये दस्तावेज देखिए, नेहा की ममेरी बड़ी बहन से संबंधित हैं.” इतना कह कर सोम ने उन्हें बताया कि कैसे स्थानीय थाने की मिलीभगत से वैदेही देवी को वर्षों से फसल नहीं काटने नहीं दिया गया.

सुरेश ने कहा, “यह सब सुन कर तो लगता है कि भारत में 21वीं सदी आई है क्या? कहते हैं हम दुनिया की 5वीं सब से बड़ी अर्थव्यवस्था हैं. अभी भी दहेज, औरतों को सताया जाना- ये सब क्या है, क्यों है. किसी मौल में जाओ तो लगेगा कि हम 21वीं सदी हैं. बाहर निकलो तो वही गंदगी, बेतरतीब ट्रैफिक आदि. गांव में बड़े परदे पर लोग पंचायत भवन में ओलिंपिक देखते हैं. और अगले दिन औनर किलिंग के नाम पर किसी लड़की की हत्या हो जाती है.”

इतने में सदर एसडीओ, खान साहब, भी आ गए. सुरेश के हाथ में दस्तावेज देख बोले, “क्या जनाब, क्लब में भी औफिस का काम. अरे भई, यहां तो रिलैक्स किया करो.”

सभी हंसने लगे. सोम ने उन्हें भी सारी बात बताई. वे थोड़ा गंभीर हुए लेकिन फिर मजाकिया तौर पर सुरेश से बोले, “यह आप के राज में क्या हो रहा है? अभी धौरय्या थाना प्रभारी से जवाबतलब कीजिए.”

थाना प्रभारी जब मोबाइल पर आए तो केस उन्हें समझाने के बाद सुरेश बोले, “आप तो वहां करीब दोढाई साल से हैं और आप के रहते कोर्टऔर्डर की अवहेलना कैसे हुई और आप ने एक मजबूर औरत की मदद नहीं की. क्या आप के सस्पैंशन की संचिका आगे बढ़ाई जाए?”

थाना प्रभारी के बहुत गिड़गिड़ाने और मिन्नत करने के बाद सुरेश नरम हो कर बोले, “मेरी बात ध्यान से सुनिए. परसों सबइंस्पैक्टर मिश्रा पुलिस फोर्स के साथ फसल कटवाने जाएंगे. वैदेही देवी भी साथ होंगी. इस बीच यदि फसल के साथ किसी तरह की छेड़खानी हुई तो समझ लीजिए सस्पैंशन पक्का.”

रात के 9 बजे जब सब उठने लगे तब सुरेश सोम से बोले, “दीदी को परसों सवेरे 6 बजे तैयार रहने को कहना. कटाई के लिए मजदूरों का इंतजाम करने कल ही एक सबइंस्पैक्टर को भेजते हैं.”

घर आ कर सोमेश ने वैदो बहन को सारी बातें बता दीं.

रात बिस्तर पर लेटेलेटे सोम नेहा से बोला, “दीदी की सास कितनी दुष्ट थी, यह इस बात से जाहिर है कि उस ने दोनों के वैवाहिक जीवन की शुरुआत ही नहीं होने दी. स्त्रीपुरुष जब पतिपत्नी के रूप में समय गुजारते हैं तभी वे सही मायनों में एकदूसरे को पहचान पाते हैं. वही एक पल होता है जब मनुष्य पूरी तरह अपने स्वाभाविक रूप में होता है. इसलिए मदन जी को वैदो बहन के गुणों का अभास ही नहीं हुआ. अगर हो जाता तो शायद वे दीदी को बिना उन के रूप पर ध्यान दिए अपनाते और यह शादी बच जाती.”

उधर धौरय्या थाने का प्रभारी, काबिल सिंह, भागाभागा वैदेही देवी के भूतपूर्व ससुर विश्वनाथ सिंह के पास पहुंचा और सारी बातें बताईं.

विश्वनाथ सिंह स्थिर स्वर में बोले, “महाराज, आप बड़े कमजोर दिल के आदमी लगते हैं. इतनी सी बात पर सस्पैंड कैसे हो जाइएगा? कहिए तो रातोंरात फसल कटवा दें.”

“ऐसा तो कभियो मत कीजिएगा. नहीं तो सस्पैंशन पक्का समझिए. इस बार आप का एमएलए, एमपी और मंत्री किसी का कनैक्शन काम नहीं आएगा. इस बार आप की बहू के बहनोई का कनैक्शन बहुत तगड़ा है.”

“कैसी बहू? हमरा कौनो बहु-अहु नहीं है. और यह बहनोई कहां से आ गया? उस की तो कोई बहन-उहन हइए नहीं.”

“है न, उन की फुफेरी बहन के हसबैंड, सोमेश्वर सिंह. वे एसडीओ पीडब्लूडी हैं और एएसपी साहब उन के बगल के गांव के हैं. दोनों में दांतकाटी दोस्ती है. एसडीओ सदर तो सोमेश जी को बेटा की तरह मानते हैं. वे अपनी ईमानदरी के लिए भी जाने जाते हैं. यहां आप की बिरादरी के आसपास के आधे से अधिक गांव में सोमेश जी के संबंध हैं. और कितना बताएं. बात मानिए, इस बार पीछे हटने में ही भलाई है.”

“हम को डरा रहे हैं.”

“नहीं, समझा रहे हैं. इस बार जाने दीजिए. सोमेश जी आखिर कब तक यहां रहेंगे. उस के बाद फिर बाजी आप के हाथ में होगी.”

“वो बात नहीं है. वो कहावत सुनी है न आप ने, बुढ़िया के मरने का नहीं, जम के फड़कने का डर है. ठीक है, आप कुछ मत कीजिए, देखते हैं कि परसों फसल कैसे कटती है.”

जो सबइंस्पैक्टर मजदूरों का इंतजाम करने गया था उस ने खबर भेजी कि सब इंतजाम हो गया है. दीदी को कल सबइंस्पैक्टर मिश्रा जी के साथ भेज देना.

सुरेश ने सोम से कहा, “दीदी से एक अर्जी मेरे और एसडीओ सदर के नाम लिखवा कर जरूर भिजवा देना.”

अगले दिन वैदेही सवेरे 8 बजतेबजते खेत पर थीं. फोर्स खड़ी थी लेकिन काटने वाले मजदूर अभी आए नहीं थे.

जिस इंस्पैक्टर ने मजदूरों का इंतजाम किया था उसे भी आश्चर्य हो रहा था. जब 10 बजे तक भी कोई मजदूर दिखाई नहीं पड़ा तब मिश्रा जी बोले, “ई का मजदूर का इंतजाम किए थे, अभी तक तो एको टर्न अप नहीं किया है. जा कर बस्ती में देखिए कि का बात है.”

बस्ती पास ही थी. हवलदार लौट कर बोला, “कुछ औरतों, बच्चों और बूढों के अलावा वहां कोई नहीं है. बहुत भोर में लगभग 5 किलोमीटर दूर दूसरे गांव में 4-5 दिनों के लिए धान की कटनी के लिए गए हैं सब.”

मिश्रा जी ने कहा, “साला, ई तो सरासर बदमाशी है. कोनो हम लोग बेगार तो खटवा नहीं रहे थे. अब बताइए काबिल सिंह, एएसपी साहब को क्या जवाब देंगे.”

काबिल ने कहा, “अब इस में हम क्या कर सकते हैं, सर?”

“खैर जाने दीजिए, वैसे हम सब समझते हैं, साहब को ही सब बताएंगे.”

वैदेही जीप में बैठेबैठे सब सुन रही थी. मिश्रा जी को पास बुला कर बोली, “आप इन लोगों को नहीं जानते, निहायत ही कमीने किस्म के लोग हैं. आप लोग निश्चिंत हो कर जाइए, मैं आज रात रुक जाती हूं. आप लोग कल सवेरे आ जाइएगा. कल कटनी जरूर होगी.”

मिश्रा जी वैदेही के विश्वास पर चकित हुए, बोले, “ठीक है, साहब से पूछ लेते हैं.”

सुरेश ने सोम से बात की. दोनों थोड़ा चिंतित थे. लेकिन वैदेही से बात कर के वे आश्वस्त हुए. पर उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर कल कटनी होगी कैसे. वैदेही ने अपने शेड की साफसफाई करवाई और खानेपीने की भी व्यवस्था हो गई.

सुरेश ने अगले दिन किसी ऐसीवैसी घटना के मद्देनजर, सदर एसडीओ से कह कर खेत के आसपास धारा 144 लगवा दी और इस की सूचना काबिल सिंह को भी भेज दी.

शाम को काबिल सिंह ने विश्वनाथ सिंह से बात की, “महाराज ई का कर दीए कि कोई मजदूरे नहीं आया.”

“मैं ने क्या कहा था, देखते हैं कैसे होती है कटनी. देखिए आगेआगे होता है क्या. वैसे पौलिटिकल पैरवी भी लगवा दिए हैं. ऊपर से भी खबर आता ही होगा.”

“कुछ ऐसावैसा मते कीजिएगा, धारा 144 लागू है.”

“आप हम को बुड़बक समझे हैं का, अब रखिए.”

शाम को वैदेही मजदूरों की बस्ती में गई. घरघर जा कर सब से मिली. कजरी, बसंती और सावंली और उन के बच्चों से तो उस की नजदीकी पहले से ही थी. वे जब आंगन में कुटाईपिसाई का काम करने आतीं तब वैदेही की ही देखरेख में उन के लिए खिचड़ी पकती थी. वैदेही अकसर दाल के अलावा अपनी सास से चोरीछिपे उस में सब्जियां भी मिलवा देती थीं. सुखदेव ने सभी औरतों को एक जगह जमा होने को कहा.

जब 100 के करीब औरतें जमा हो गईं तब वैदेही ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा, “आप लोगों ने मुझे तब से देखा है जब मैं इस घर की बहू बन कर आई थी. आप में से कईयों ने और उन के आदमियों ने करीब से मुझे देखा है. बताइए क्या कुसूर था मेरा? इस के अलावा कि मैं देखने में सांवली थी. मुझे मानसिक और शारीरिक कष्ट दिए गए. पति के साथ मुझे वैवाहिक जीवन बिताने से वंचित रखा गया. और जब उन्हें लगा कि इतना काफी नहीं है तो उन्होंने मेरी पति की दूसरी शादी कर दी. अब कोर्ट से जब मेरे भरणपोषण के लिए जमीन दी गई है तो आज तक किसी न किसी तरह से उन्होंने मुझे पैदावार लेने नहीं दी, जबकि हर बार मैं ने आप लोगों की सहायता से फसल लगवाई और उस के लिए पैसे खर्च किए.

आप ही बताइए यह कहां का इंसाफ है? एक वैदेही सीता तो अपने कष्ट का निवारण करने इसी धरती में समा गई थी, मैं कहां जाऊं. मुझे तो बस इसी धरती से उपजी फसल का सहारा है जो मुझे आप सब काट कर दिला सकती हैं. आप सब भी एक औरत हैं और मेरा दर्द समझती हैं. आप के परिवार के मर्द ऐसे ही नहीं चले गए. उन्हें अधिक पैसे का लोभ दे कर किस ने दूर भेज दिया है, यह भी शायद आप जानती होंगी. लेकिन आप तो यहां हैं, आप तो मेरी मदद कर सकती हैं. मैं आप को भी आप का वाजिब हक दूंगी. सिर्फ मजदूरी ही नहीं मिलेगी, आप को आप का हिस्सा मिलेगा. और सिर्फ आज नहीं, हर साल जब आप लोग मेरी फसल लगाएंगी और काटेंगी. अब फैसला आप पर है कि कल आप हंसुआ ले कर खेत पर आती हैं या नहीं?”

कजरी के साथ कुछ और औरतें सामने आईं और बोलीं, “छोटी मालकिन, हम लोग जरूर आएंगी. इतनी बात हमें पता नहीं थी. वैदेही ने यह आवाह्न अंगिका में किया था जिस से वे सब समझ सकें. सुखदेव ने उस का वीडियो बना लिया और उसे सोशल मीडिया पर पूरे विस्तार से पोस्ट भी कर दिया. वैदेही अपने शेड में आ कर सो गईं. उन्हें सोशल मीडिया वाली बात का कुछ पता नहीं था.

रात करीब 8 बजे जब सुरेश, सोमेश और अन्य अफसर क्लब में बैठे ब्रिज खेल रहे थे, सुरेश का मोबाइल बज उठा. डायल पर एसपी का नाम था. वह थोड़ा दूर हट गया और थोड़ी देर एसपी की बात सुनने के बाद इशारे से सोम को पास बुला लिया और दसरे कमरे में चला गया. स्पीकर औन था. एसपी कह रहे थे, “डीजी का फोन डीआईजी को आया था. यह वहां क्या हो रहा है, सुरेश? मामला सब-जुडिस है और तुम फोर्स ले कर वहां पहुंच गए हो.”

सुरेश ने कहा, “बिलकुल नहीं सर, कोई स्टेऔर्डर नहीं है. होता तो विश्वनाथ सिंह रुकने वाला नहीं था. अभी तक वह और्डर ले कर मेरे पास आ चुका होता.”

“लेकिन डीजी कह रहे थे कि उन्हें केंद्रीय मंत्री का फोन आया था कि वैदेही देवी को जो जमीन मिली है उस पर उच्चतम न्यायालय से स्टे लग गया है.”

“ऐसा नहीं है सर, ऐसा होता तो मैं इस में क्यों पड़ता. वैसे भी, सिविल मैटर में हम लोग कहां टांग अड़ाते हैं जब तक ला एंड और्डर का मामला न हो.”

“ठीक है, डू व्हाट यू थिंक बेस्ट इन द सिच्युएशन.”

“देखा सोम, यह विश्वनाथ सिंह ऐसे नहीं मानने वाला. अब तो मैं कटनी होने तक किसी का फोन ही नहीं उठाऊंगा. देखें कौन क्या करता है.”

सोम से रहा नहीं गया, वह भी सुरेश के साथ जाने को तैयार हो गया. वे दोनों और मिश्रा जी सवेरे 7 बजे ही वहां पहुंच गए. दिसंबर का प्रथम सप्ताह था. सूरज थोड़ा ही क्षितिज से ऊपर आया था. वैदेही पहले से ही वहां खड़ी थी. अभी कोई मजदूर नजर नहीं आ रहा था. सबों के चेहरे पर बेचैनी साफ नजर आ रही थी.

वैदेही बोली, “विश्वास रखिए, आज कटनी जरूर होगी.”

इतने में दूर 2 औरतें आती हुई दिखलाई पड़ीं. उन के हाथ में धान की कटनी करने वाला हंसुआ था. कुछ देर बाद कुछ और औरतें और फिर और. तादाद बढ़ती ही गई. अब तक तो सिर्फ औरतें थीं. करीब सौ से अधिक. थोड़ी देर बाद दूसरी ओर से मर्द भी आने लगे थे, झुंड के झुंड. लगता था जो दूसरे गांव चले गए थे वे भी लौट आए थे. शायद अपनी पत्नियों की वजह से. देखतेदेखते करीब 400 मजदूर जमा हो गए.

मिश्रा जी बोले, “सर, यह तो चमत्कार है. पता नहीं दीदी ने रात मजदूरों की घरवालियों से क्या कहा. अब तो एक दिन में ही फसल कट जाएगी.”

सुरेश ने कहा, “तब देर किस बात की, हाथ लगवाइए, साढ़े सात बजने को हैं.”

मिश्रा जी काम में लग गए.

सोम ने नेहा को फोन पर बताया, “पता नहीं क्या हुआ कि इतने मजदूर आ गए.”

नेहा हंसती हुई बोली, “अरे आप को पता नहीं है. दीदी ने कल रात मजदूरों की बस्ती में जो आह्वान वहां की औरतों का किया था उस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. अब तक 50 हजार से ज्यादा व्यूज, 10 हजार लाइक्स और 1,500 कमैंटस आ चुके हैं. उन में से एक अखिल भारतीय महिला आयोग की चेयरपर्सन का भी है. उन्होंने एक पीड़ित महिला की इतनी तत्परता से मदद करने के लिए स्थानीय प्रशासन को धन्यवाद दिया है. दीदी ने तो रातोंरात आप लोगों को हीरो बना दिया है.”

“ठीक है, अब रखते हैं. देखते हैं कि यह वीडियो भेज कौन रहा है.”

सोम ने देखा कि सुखदेव धान की कटनी का वीडियो बना रहा था. वह सुरेश से घटना के वीडियो के वायरल होने की बात बताने ही जा रहा था कि सुरेश का मोबाइल बजने लगा. मोबाइल रिसीव करते हुए उस ने दबी आवाज में बताया कि एसपी साहब का है. सुरेश ने स्पीकर औन कर दिया था. एसपी कह रहे थे, “वेलडन सुरेश. तुम ने सही समय पर सही काम किया है. इस से पुलिस विभाग की कितनी प्रशंसा हो रही है, तुम समझ सकते हो. डीआईजी साहब ने फोन कर के मुझ से कहा कि चलो, पुलिस विभाग की किसी काम के लिए प्रशंसा तो हो रही है. कीप इट अप.”

“क्या सर, आज उन्हें मामला सब्जुडिस नहीं न लगा?” सुरेश की बात पर एसपी हंसने लगे.

सुरेश ने सोम से कहा, “अरे यार, यह क्या हो रहा है, डीआईजी, एसपी इन लोगों को कैसे पता चला?”

सोमेश ने यूट्यूब का वीडियो दिखाते हुए कहा, “यार, यह देख. ऐसे पता हो रहा है.” और सुखदेव की तरफ दिखा कर बोला, ‘और उसे देख, जो दिखलवा रहा है.”

“अभी थोड़ी देर रुक जा, शायद टीवी चैनल वाले भी आ जाएं.”

दिन के करीब डेढ़ बजे थे. मजदूर कटनी में व्यस्त थे. पेड़ के नीचे आधी छांव आधी जाड़े की धूप में सब को अच्छा लग रहा था. सोम, सुरेश और वैदेही शेड के बराम्दे में बैठे थे. मिश्रा जी ने बताया, “मजदूर अब कटनी खत्म कर के ही खाना खाएंगे. तीन साढ़े तीन बजे तक कटनी पूरी हो जाएगी. सब के लंच के लिए पूरी, सब्जी और अचार आ गया है. यहीं भिजवा दें?”

“ठीक है, आप लोग भी खा लीजिए.”

कटनी समाप्त होने वाली थी. अब जब तक फसल दोतीन दिन सूखेगी नहीं, तब तक आगे का काम नहीं होगा. वैदेही ने तय किया कि वह कल दोपहर में निकलेगी और उस ने अपना निर्णय सोम और सुरेश को बता दिया था. दो सशस्त्र कांस्टेबल वैदेही के पास रख दिए गए थे. जब तक धान तैयार नहीं हो जाता है तब तक तो मजदूर ही रातभर कटे हुए फसल की रखवाली करेंगे.

सोम और सुरेश जब चलने लगे तब सुरेश ने काबिल सिंह को बुला कर कहा, “जब तक धान तैयार नहीं हो जाता, यह अब आप की जिम्मेदारी है, कोई चूक नहीं होनी चाहिए.”

“नहीं होगी, सर. बिलकुल नहीं होगी. आप निश्चिंत हो कर जाएं. पिछला भूलचूक माफ कर दीजिएगा, सर.”

अगले दिन वैदेही ने सभी मजदूरों व उन की घरवालियों को अपने पास बुलाया.

“अब आप लोग ही इस के मालिक हैं. मैं एक अकेली जान और दूसरा मेरा मैनेजर. इसी के भरणपोषण के लिए आप जो दे दीजिएगा, मैं ले लूंगी. मैं ने अपने जन्मस्थान में निर्धन परिवार के बच्चों के लिए 7वीं कक्षा तक एक मुफ्त का स्कूल भी खोला है. यहां भी आप सब के बच्चों के लिए एक स्कूल खोलने जा रही हूं. यह जो मेरा शेड है, यहीं पर फिलहाल दो कमरों का इंतजाम करना होगा. आप तो जानते ही हैं कि इस दस बीघे में तीन फसलें होती हैं. मुझे लगता है कि इन दो स्कूलों का और हम सब का भरणपोषण बहुत हद तक हो ही जाएगा. नहीं हुआ, तो बांकी इंतजाम भी हम कर ही लेंगे.”

इतना कह कर वैदेही ने उन लोगों से विदा ली. एक दिन बाद जब वैदेही नैहर जाने लगी, तब सोम ने उन से पूछा, “यहां आप के धान-चावल की तैयारी?”

“बस्ती के मजदूर हीरा हैं हीरा. कहते हैं पता नहीं कितने पुश्तों से इन खेतों में खूनपसीना बहा रहे हैं. वे सब ईमानदारी से कर लेंगे. और फिर मुझे पहुंचा कर सुखदेव भी तो वापस खेत पर आ जाएंगे.”

करीब 6 महीने बाद वैदेही फिर नेहा और सोम से मिलने आईं. दोपहर के खाने पर सभी मिले. वैदेही ने कहा, “तुम लोगों को एक बात बतानी थी. मुझे पहले पूछना चाहिए था. लेकिन सोचा, तुम लोग मना थोड़े ही करोगे. मैं ने अपने हिस्से की 5 बीघा जमीन अपने पति के दोनों बच्चों के नाम कर दी है. कागज तैयार हैं.”

सोम और नेहा एकदूसरे को आश्चर्य से देख रहे थे.

नेहा ने पूछा, “दीदी, जब वापस ही करना था तो फिर हासिल करने के लिए इतनी जद्दोजेहद क्यों? और आप के जीवननिर्वाह का प्रश्न भी तो है. अभी सारी जिंदगी पड़ी है. कैसे होगा?”

“हासिल करना सिद्धांत की लड़ाई थी. हक की लड़ाई थी. वो तो मैं ने आप सब की मदद से जीत ली. रही निर्वाह की बात, तो उस के लिए मैं ने 5 बीघे तो रख लिए हैं. उस में मेरा और बहुत हद तक मेरे स्कूल का खर्चा भी निकल जाएगा. एक और बात सोचने की है कि मेरे बाद तो ये जमीन उन लोगों को ही वापस चली जाती. बाकी जमीन पर तो मैं ने मजदूरों का कब्जा दिलवा दिया है. इतने पुश्तों से चली आ रही गुलामी से मैं ने उन्हें मुक्त करवा दिया है.”

शाम को क्लब में जब सोम और सुरेश अकेले थे तब सुरेश ने कुछ दार्शनिक अंदाज में कहा, “सचमुच, औरतों को समझना बहुत मुश्किल है.”

“लेकिन यह तो सोच कि यहां तो मैं था, तुम थे. जहां कोई न होगा वहां की वैदेहियों का क्या होता होगा? निर्वाह रकम की तो छोड़, क्योंकि तलाक तो होगा नहीं, तब या तो ससुराल में मार खाएंगी या नैहर में भाई और भौजाइयों का दुर्व्यवहार सहेंगी. सोच, क्या होता होगा वहां जहां कोई सोम न होगा और न सुरेश, बस काबिल सिंह और विश्वनाथ ही होंगे. इस संसार में किसी जीव ने अपनी मादा के साथ इतना दुर्व्यवहार न किया होगा जितना मनुष्य ने किया है.” Hindi Stories

लेखक – ललन प्रसाद सिंह

 

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