Youth Protest in India: तिरंगा लेकर प्रदर्शन करने निकले तो पुलिस रोकेगी, सरकार के खिलाफ नारे लगाए तो हिरासत में ले लिया जाएगा और विरोध की आवाज उठाई तो मुकदमों और बांड के चक्रव्यूह में फंसा दिया जाएगा. कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरव दास और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाइयों ने लोकतंत्र अस्तित्व पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या मोदी सरकार में शांतिपूर्ण विरोध करने वालों और सरकार से जवाबदेही चाहने वालों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखा कर चुप कराने की कोशिश हो रही है?

मई 2018 में कर्नाटक (बेंगलुरु) में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह के लिए कहा था कि वे हत्या के मामले में संलिप्त हैं. राहुल की इस बात से बीजेपी के एक नेता विजय मिश्रा इतने आहत हो गए कि उन्होंने सुल्तानपुर की जिला अदालत में 4 अगस्त 2018 को राहुल के खिलाफ IPC की धारा 499 और 500 के तहत मानहानि का मुकदमा कर दिया. ये मुकदमा 8 साल चला.

2018 से 2026 तक चले इस मुकदमे में 30 से ज्यादा पेशियां पड़ीं. इन पेशियों पर राहुल की तरफ से वकील पेश होते रहे. खुद राहुल गांधी व्यक्तिगत रूप से 4 बार अदालत के सामने पेश हुए. आखिरकार 26 अक्टूबर 2026 को चौथी बार फैसले वाले दिन राहुल गांधी जब कोर्ट पहुंचे तो न्यायाधीश शुभम वर्मा ने उन्हें मामले से बरी कर दिया. हालांकि मामला लोअर कोर्ट का है. वादी के पास बड़ी कोर्ट में फैसले को चुनौती देने का अधिकार है. अगर वह ऐसा करता है तो केस अभी आगे दस-पंद्रह साल और चल सकता है.

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