NEET Exam Controversy: पिछले कुछ सालों से सरिता पत्रिका लगातार नीट और एनटीए को भंग करने का मुद्दा उठाती रही है. सीजेपी के प्रोटेस्ट से बहुत पहले से नीट और एनटीए जैसी संस्थाओं को भंग करने की बात सरिता ने ही की थी. इसी मुद्दे पर जून और जुलाई में सीजेपी का ऐतिहासिक प्रोटेस्ट हुआ और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा लेकिन बीजेपी सरकार ने नीट पर रोक नहीं लगाई. अब तमिलनाडु सरकार ने यह कदम उठाया है. तमिलनाडु सरकार का यह कदम महत्वपूर्ण क्यों है? आइये जानते हैं.

तमिलनाडु विधानसभा में नीट को पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव पारित होना एक ऐतिहासिक कदम है. यह सिर्फ प्रस्ताव भर नहीं है बल्कि यह उन लाखों परिवारों की आवाज है जो पिछले 8 साल से इस परीक्षा के नाम पर पिस रहे हैं. जब सदन में यह प्रस्ताव पास हो रहा था तो भाजपा के चारों विधायकों ने वॉकआउट कर दिया जो कि स्वाभाविक था क्योंकि बीजेपी को वैसे भी छात्रों की जान और उनके भविष्य से कोई लेना-देना नहीं है. बीजेपी को सिर्फ अपनी जिद और अपने कॉरपोरेट दोस्तों की कोचिंग फैक्ट्रियों की चिंता है. तमिलनाडु ने आज देश को रास्ता दिखाया है कि कोई राज्य अपने बच्चों के हित में कैसे खड़ा हो सकता है?

नीट छात्रों के भविष्य के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ है. नीट ने मेहनत की जगह किस्मत और पैसे को ही एग्जाम का नाम दे दिया है. एक बच्चा 11वीं और 12वीं में दिन-रात एक करके पढ़ता है, स्कूल में टॉप करता है लेकिन उसकी 2 साल की मेहनत का कोई मतलब नहीं. फाइनल फैसला 3 घंटे के एक पेपर से तय होता है. पेपर के दिन अगर किसी बच्चे को बुखार है, सेंटर 300 किलोमीटर दूर दे दिया गया या पेपर ही लीक हो गया तो स्टूडेंट की पूरी जिंदगी बर्बाद. क्या कोई भी समझदार देश अपने डॉक्टरों का भविष्य एक दिन की लॉटरी पर छोड़ सकता है?

नीट का सबसे खतरनाक पहलू है कोचिंग माफिया. नीट आने के बाद सरकारी स्कूल लगभग बेकार हो गए. अब डॉक्टर बनना है तो 10वीं के बाद ही 3 से 5 लाख रुपये की कोचिंग करनी पड़ेगी. गांव का किसान, रिक्शा वाला, छोटे दुकानदार का बेटा ये फीस कहां से देगा? नीट का नतीजा ये है कि मेडिकल की सीटें अब अमीरों के बच्चों के लिए आरक्षित हो गई हैं. तमिलनाडु सरकार ने खुद आंकड़े दिए हैं कि नीट से पहले उनके सरकारी स्कूलों से हर साल सैकड़ों बच्चे डॉक्टर बनते थे. नीट के बाद ग्रामीण और दलित-आदिवासी छात्रों का एडमिशन आधे से भी नीचे गिर गया है यानी नीट के जरिये बीजेपी ने पिछडी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों का रास्ता बंद कर सामाजिक न्याय की हत्या कर दी.

नीट को राज्यों के अधिकार से बाहर कर सेन्ट्रलाइज कर देना राज्य के संवैधानिक अधिकारों पर डाका ही है. शिक्षा हमारे संविधान में समवर्ती सूची में है यानी शिक्षा पर केंद्र और राज्य दोनों का अधिकार है लेकिन भाजपा सरकार ने एकतरफा फैसला लेकर पूरे देश के मेडिकल कॉलेजों का एडमिशन अपने हाथ में ले लिया. दक्षिण के राज्यों की अपनी शिक्षा नीति है, अपनी भाषा है, अपनी स्वास्थ्य जरूरतें हैं. नीट के जरिये वहां के बच्चों को मजबूर किया जा रहा है कि वो हिंदी और अंग्रेजी में दिया हुआ पेपर दें और उसी में पास हों. ये संविधान पर सीधा हमला है.

नीट सिर्फ तबाही लेकर आया है. नीट भंग करने का सबसे बड़ा और दर्दनाक कारण नीट से होने वाली मौतें भी हैं. पिछले कुछ सालों में अकेले तमिलनाडु में ही डेढ़ दर्जन से ज्यादा छात्रों ने नीट में फेल होने या उसके डर से आत्महत्या कर ली. दुनिया की कोई भी परीक्षा इतनी खूनी नहीं हो सकती. जब एक परीक्षा के लिए बच्चे अपनी जान देने लगें तो समझ जाइए कि उस व्यवस्था में कुछ बहुत बुनियादी गड़बड़ है और इस पूरी गड़बड़ी की जिम्मेदार सीधे-सीधे भाजपा सरकार है.

भाजपा नीट को पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त भर्ती के नाम पर लाई थी लेकिन 8 सालों में हुआ क्या? हर साल पेपर लीक, सेंटर पर धांधली, रिजल्ट में गड़बड़ी और NTA की नाकामी. 2024 के नीट-UG पेपर लीक कांड के बाद पूरे देश में छात्र सड़कों पर थे लेकिन केंद्र ने जांच के नाम पर खानापूर्ति कर स्टूडेंट्स को शांत करा दिया. 2026 में फिर पेपर लीक हुआ तो मामला गंभीर हो गया और पूरे देश के स्टूडेंट्स सड़कों पर उतर आये.

नीट के नाम पर जो सेन्ट्रल एग्जाम की नौटंकी की गई इसमें भाजपा का असली मकसद शिक्षा सुधार नहीं था, मकसद था शिक्षा का कॉरपोरेटीकरण करना. नीट ने कोचिंग इंडस्ट्री को 10 हजार करोड़ का बाजार दे दिया. NTA एक ऐसी दुकान बन गई जो एग्जाम के नाम पर गरीब छात्रों से हर साल 500 करोड़ रुपया फीस वसूलती है और बदले में जवाबदेही जीरो रखती है. जब तमिलनाडु विधानसभा में नीट से छुटकारा पाने का क़ानून पास हुआ तो केंद्र की बीजेपी सरकार ने उसे अपने राज्यपाल के जरिए रुकवा दिया. 13 अगस्त 2026 को फिर से प्रस्ताव पास हुआ तो भाजपा के लोग बहस करने की बजाय सदन से भाग गए. इसका मतलब साफ है. भाजपा को छात्रों की चिंता नहीं बल्कि उसे अपनी जिद और अपनी विचारधारा की चिंता है.

डॉक्टर बनाने के लिए स्टूडेंट्स को रट्टा मारने वाली मशीन बनाने की जरुरत नहीं बल्कि इसके लिए संवेदनशील और मेहनती दिमाग चाहिए. तमिलनाडु का पुराना मॉडल सबसे बेहतर था. 12वीं के नंबर और राज्य का कोटा. इससे गांव का कोई भी होनहार बच्चा मेहनत करके डॉक्टर बन सकता था.

नीट एग्जाम के खिलाफ तमिलनाडु का यह प्रस्ताव बाकी सभी राज्यों के लिए एक नजीर है. केरल, कर्नाटक, पंजाब, हिमाचल और झारखंड जैसे गैरबीजेपी राज्यों को भी नीट जैसे ख़ूनी एग्जाम के खिलाफ एकजुट हो जाना चाहिए. कोई भी परीक्षा जो गरीब को आगे बढ़ने से रोके, जो छात्रों को आत्महत्या पर मजबूर करे और जो राज्यों के अधिकार छीने ऐसी परीक्षा असल में संवैधानिक मूल्यों की हत्या ही है. भाजपा को तो छात्रों से सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए और नीट को तुरंत खत्म करना चाहिए. NEET Exam Controversy

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