Democracy in India: पिछले 12 वर्षों से भाजपा सरकार ने मनमानी करते हुए अपने विरोधियों को हाशिए पर धकेला और लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने की कोशिश की. उस ने हर विरोध को दबा दिया और हर आवाज को कुचल दिया लेकिन सीजेपी प्रोटैस्ट के दौरान युवाओं का जो आक्रोश दिल्ली के जंतरमंतर पर फूटा उस से देश के कोनेकोने से युवाओं की आवाज बुलंद हुई. इस आंदोलन ने साफ कर दिया कि यह मुल्क एक व्यक्ति, एक संगठन, एक पार्टी या एक विचारधारा की बपौती नहीं है बल्कि यह 140 करोड़ लोगों का देश है. यह देश एकतंत्र का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का शानदार उदाहरण है.
पिछले 12 सालों में जब भी मजदूर, किसान, टीचर, पर्यावरण की चिंता करने वाले और अपने अधिकारों की बात करने वाले लोग मौजूदा तानाशाही सरकार की जनविरोधी नीतियों से तंग आ कर सड़कों पर उतरे, उन से सीधे मुंह बात नहीं की गई. उन पर लाठियां भांजी गईं, पेलेट गन चलाई गईं, रास्ते पर बैरिकेड लगाए गए. यही नहीं, उन्हें देशद्रोही तक कह दिया गया. सवाल यह है कि जिस सरकार ने पिछले 12 सालों से अपने तमाम विरोधियों को हाशिए पर धकेले रखा था और अपने खिलाफ उठी तमाम आवाजों को कुचला था, वह सीजेपी के प्रोटैस्ट के दौरान इतनी लाचार कैसे हो गई कि युवाओं ने उसे झुका दिया? क्या इसे लोकतंत्र का नया सवेरा कहा जा सकता है? यह भाजपा सरकार के लिए सब से बड़ा झटका है.
- 2020 में सीएए-एनआरसी के खिलाफ शाहीनबाग में महिलाएं 100 दिनों तक बैठी रहीं. वहां भी सरकार ने बात करने के बजाय लाठी भांजी, गोली चलाई और गोली मारो का नारा दिया. कोरोना का बहाना बना कर आंदोलन को कुचल दिया.
- 2021 के किसान आंदोलन के दौरान 3 काले कानूनों के खिलाफ लाखों किसान सालभर तक दिल्ली की सीमा पर बैठे रहे. इस दौरान 700 से ज्यादा किसान शहीद हुए. किसानों के लिए बैरिकेड लगाए गए, कीलें बिछाई गईं, सड़कें खोद दी गईं और उन्हें आतंकवादी व खालिस्तानी तक कहा गया. आखिर में कानून तो वापस हुए लेकिन एमएसपी की गारंटी आज तक नहीं मिली.
पिछले 12 सालों में बीजेपी लगातार इतनी मजबूत होती गई है कि लोकतंत्र के सभी अंग इस की मुट्ठी में पहुंच चुके थे. चुनाव आयोग जैसी संस्था बीजेपी का दफ्तर बन गई. मेनस्ट्रीम मीडिया सरकार की प्रवक्ता बन गई. ईडी, सीबीआई और पुलिस बीजेपी के इशारों पर नाचते दिखाई देने लगे. विपक्ष को दुश्मन मान लिया गया और हर विरोधी आवाज को कुचलने का सिलसिला जारी रहा.
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