Jantar Mantar Protest: नरेंद्र मोदी की सरकार को अपने बहुमत, मशीनरी, ताकत और हिंदू स्वयंसेवकों कि अंधभक्ति पर बड़ा भरोसा है. उसे लगता है कि विरोध और असहमति की हर आवाज कुछ दिनों का शोर है. जबकि, लोकतंत्र का इतिहास बारबार बताता है कि जब हताशपरेशान जनता ऊबने लगती है तब सब से मजबूत सरकारों की भी कुरसी हिल जाती है. लोकतंत्र में अंतिम शक्ति प्राइम मिनिस्टर औफिस (पीएमओ) में या नागपुर में नहीं और न ही सरकारी फाइलों में, बल्कि उन लोगों के बीच है जो सड़क पर उतर कर अपनी बात कहने का साहस रखते हैं. 20 जुलाई, 2026 के बाद यह साफ़ हो गया है कि कौकरोच अपने बिलों से बाहर निकल आए हैं. वे असल में कौकरोच नहीं हैं, वे इस देश की शिकार जनता है जो व्यवस्था की कागजी, कानूनी व लाठी की मार पर हर रोज खाती है.

मोदी सरकार के शासन के दौरान देश के ध्वस्त हो चुके एजुकेशन सिस्टम के खिलाफ कौकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के एक आह्वान पर लाखों युवाओं का एकजुट हो जाना, राजधानी दिल्ली के जंतरमंतर पर उमड़ पड़ना, नीट पेपर लीक के खिलाफ जनआंदोलन का शुरू होना, पर्यावरणविद और शिक्षासुधारक सोनम वांगचुक का आंदोलन के समर्थन में लंबा अनशन और फिर 20 जुलाई को संसद कूच के लिए उमड़े जनसैलाब का जो घटनाक्रम सामने आया है, उस ने एक बार फिर यही संदेश दिया है कि लोकतंत्र की असली शक्ति बंदूकों से लैस तंत्र में नहीं, बल्कि लोक में है, उसी लोक में जिस के सैलाब ने बंगलादेश, श्रीलंका, सीरिया और नेपाल में सत्ता का तख्ता पलट दिया.

20 जुलाई के बाद कुछ वैसा ही सैलाब दिल्ली के संसद भवन के आसपास देखने को मिला.

सच पूछो तो इस आंदोलन का ‘श्रेय’ जाता है चीफ जस्टिस औफ़ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत को, जिन की एक टिप्पणी, जिस में ‘कौकरोच’ शब्द का इस्तेमाल हुआ, अनजाने में एक बहुत बड़े आंदोलन की चिनगारी बन गई. जस्टिस सूर्यकांत ने हताश जनता को ‘कौकरोच’ कह कर उसे नींद से जगा दिया. जिस शब्द का प्रयोग उन्होंने तिरस्कार के भाव में किया, उसी को लाखों युवाओं ने अपनी पहचान और प्रतिरोध के प्रतीक में बदल दिया. जस्टिस सूर्यकांत के शब्द से आहत हो कर अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके ने उन की अपमानजनक टिप्पणी को चुनौती में बदल दिया और अपने ट्विटर अकाउंट से एक छोटा सा सवाल पोस्ट किया-

“व्हाट इफ औल कौकरोचेस कम टूगेदर?”

“क्या होगा अगर सारे कौकरोच एकसाथ आ जाएं?”

देखते ही देखते यह सवाल लाखों युवाओं की आवाज़ बन गया. इस के बाद अनजाने से दीपके ने एक और पोस्ट किया, जिस में उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में ‘कौकरोच जनता पार्टी’ के लिए लोगों को जुड़ने का निमंत्रण दिया. पोस्ट का आशय था-

“बाहर मौजूद सभी ‘कौकरोचों’ के लिए एक नया मंच शुरू कर रहा हूं. अगर आप जुड़ना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें.”

देश के एजुकेशन सिस्टम से हताश, बेरोजगारी से हताश, गरीबी और लाचारी से हताश युवा जब इस औनलाइन आह्वान पर एकजुट होना शुरू हुए तो देखते ही देखते उन की संख्या किसी भी पौलिटिकल पार्टी के कार्यकर्ताओं की संख्या से कहीं अधिक हो गई. नीट पेपर लीक मामले से शुरू हो कर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को ले कर युवाओं का आक्रोश सोशल मीडिया पर नजर आने लगा. इन आक्रोशित युवाओं से अभिजीत दीपके ने जंतरमंतर पर मिलने का वादा किया.

6 जून, 2026 को अभिजीत दीपके अमेरिका से जंतरमंतर पर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने पहुंचे. उसी दिन उन्होंने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को ले कर छात्रों और युवाओं के साथ धरना शुरू किया. 6 जून को पर्यावरणविद और जानेमाने शिक्षासुधारक सोनम वांगचुक ने भी अभिजीत दीपके के अभियान को समर्थन दिया और वे दिल्ली के जंतरमंतर पर पहुंचे. वांगचुक ने घोषणा की कि यदि सरकार ने आंदोलनकारियों की आवाज नहीं सुनी और उन को गिरफ्तार किया गया तो वे आमरण अनशन करेंगे.

सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी. सरकार की तरफ से एक भी नुमाइंदा जंतरमंतर पर उन का ज्ञापन लेने या बातचीत शुरू करने के लिए नहीं पहुंचा. सरकार का उपेक्षित रवैया देख कर 28 जून को सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल शुरू कर दी. 20 दिन की भूख हड़ताल के बाद भी सरकार टस से मस नहीं हुई. इधर, जनता का जुड़ाव गहराने लगा. जंतरमंतर पर जमावड़ा बढ़ने लगा.

अचानक भूख हड़ताल के 20वें दिन मोदी सरकार के आदेश पर सुबह करीब साढ़े छह बजे बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस के जवानों ने जंतरमंतर को घेर लिया और सफ़ेद चादरों की कनातें सोनम वांगचुक के चारों ओर तान कर उन्हें गालियां देते हुए जबरन धरना स्थल से उठा कर एंबुलैंस में पटक दिया और उन की इच्छा के विरुद्ध ले जा कर सफदरजंग अस्पताल में भरती कर दिया. सरकार ने वही जबरदस्ती कि जो गुजरात में 2002 में की गई थी जब सरकार ने बुरी तरह एक वर्ग को कुचलने दिया. वांगचुक और कौकरोच इस सरकार के लिए गुजरात के अल्पसंख्यक जैसे थे.

जिस तरीके से सोनम वांगचुक को सफेद चादर में लपेट कर पुलिस द्वारा जबरन उठा कर अस्पताल ले जाया गया, वह दृश्य केवल एक व्यक्ति के साथ हुई कार्रवाई नहीं थी, बल्कि उस पूरी सोच का प्रतीक थी जिस में असहमति को समस्या मान लिया गया है. सरकार का यह अनुमान कि वांगचुक को हटाने के बाद आंदोलन समाप्त हो जाएगा, एक गंभीर राजनीतिक भूल साबित हुआ. इस के विपरीत, इस कार्रवाई ने युवाओं के भीतर दबी हुई असंतोष की आग को हवा दे दी. यह केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी बल्कि उस गहरे अविश्वास का परिणाम थी जो पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न मुद्दों पर युवाओं में ही नहीं, हर समझदार जन में लगातार पनपता रहा है. जब एक शांतिपूर्ण आंदोलन को इस तरह कुचलने का प्रयास किया जाता है तो यह संदेश जाता है कि सरकार संवाद के बजाय दमन को अधिक प्रभावी मानती है. सरकार को बुलडोजर व्यवस्था चाहिए, बस.

सफदरजंग अस्पताल में वांगचुक के कमरे के बाहर पुलिस का ऐसा पहरा बिठा दिया गया कि न तो उन की पत्नी गीतांजलि जे आंग्मो उन से मिल सकती थीं और न कोई समर्थक. यहां तक कि उन की मैडिकल रिपोर्ट्स तक उन की पत्नी गीतांजलि से शेयर नहीं की जा रही थीं. हाईकोर्ट के आदेशों के बाद डाक्टरों ने कुछ रिपोर्ट्स जारी कीं और पत्नी को उन से मिलने दिया गया. यह एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक के साथ उस सरकार का सुलूक था जिसे बिना कारण अभी 6 महीने जेल में बंद रखा गया था.

सरकार की इन दमनकारी हरकतों से ‘कौकरोच’ उबल पड़े. दिल्ली से ही नहीं बल्कि अब दूरदराज के बिलों से भी कौकरोच निकल आए. कोई मध्य प्रदेश से, कोई झारखंड से, कोई छत्तीसगढ़ से, कोई उत्तर प्रदेश से, कोई हरियाणा-पंजाब से, हर तरफ से कौकरोच निकलने लगे. सोनम वांगचुक को जबरन धरना स्थल से उठाने के जवाब में जंतरमंतर पर लाखों की संख्या में कौकरोच जमा हो गए. ये लाखों युवा बसों में भरकर हलवापूड़ी के पैकेटों के साथ नहीं लाए गए थे. इन्हें लाने के लिए जगहजगह सेवाशिविर नहीं लगे थे. इन्हें लाने के लिए गलगोटिया यूनिवर्सिटी की क्लासें सस्पैंड नहीं की गई थीं. बल्कि, ये युवा खुए आए थे. आखिरी सफर मीलों तक पैदल तय किया क्योंकि डरी सरकार ने मैट्रो बंद कर दी, सडक़ों पर बैरियर लगा दिए, बस सेवाएं बंद कर दी. फिर भी युवाओं ने संसद कूच का ऐलान किया. और, कौकरोच कमर कस कर सिस्टम की सफाई के लिए निकल पड़े. पूरे देश के शहरों में कौकरोच अपनी जगह चुन कर जमा होने लगे.

कौकरोचों ने जंतरमंतर पर पुलिस की लाठियां खाईं, अश्रुगैस के गोले खाए, पत्थर खाए, सिर फुड़वाए, हाथपैर तुड़वाए, कपड़े फड़वाए, अरेस्ट हुए मगर उन की हिम्मत नहीं टूटी. पुलिस ने उन्हें जबरन पकड़पकड़ कर बसों में भर लिया और गुमनाम स्थानों पर ले जा कर बंद कर दिया. अनेक पर एफआईआर दर्ज कर दी. मगर कौकरोच अब अपने बिलों में वापस नहीं लौटने वाले क्योंकि अब उन्होंने डर से मुक्ति पा ली है. अब तो वे सिस्टम को झुका कर ही दम लेंगे.

पुलिस लगातार अपने कैमरों में प्रदर्शन में हिस्सा लेने वालों के फोटो खींचती रही ताकि भविष्य में दिखा कर उन का कैरियर खराब करने की कोशिश की जा सके पर युवा दबे नहीं, पुलिस के पास लाठियां थीं, आंसूगैस के गोले थे. युवाओं के पास बैकपैक था, हाथ खाली थे लेकिन दिल में जोश था, पैरों में हिम्मत थी.

जिस मोदी सरकार ने 12 सालों में अपनी पहचान ‘न झुकेंगे, न रुकेंगे’ वाली बनाई थी, क्या उसे कौकरोचों ने झुका दिया है? 20 जुलाई को देश ने ही नहीं, बाहरी मुल्कों ने भी लोक की आवाज से डरे हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद के पिछले गेट से चुपचाप निकल कर भागते हुए देखा. उस रोज शाम होतेहोते सरकार को आंदोलनकारी कौकरोचों के प्रतिनिधिमंडल को बातचीत के लिए बुलाने को मजबूर होना पड़ा. जो लोग कल तक विरोध को महत्त्वहीन समझ कर लंबी तान कर सोए हुए थे, उन्हें आखिरकार उठ कर संवाद के दरवाजे खोलने पड़े. राजनीति में इसे चाहे कोई ‘संवाद’ कहे, कोई ‘रणनीतिक फैसला’ बताए या कोई ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ माने, लेकिन यह साफ है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को अनसुना करना संभव नहीं है.

लोकतंत्र का मूल तत्त्व यह है कि नागरिकों को अपनी बात कहने, विरोध करने और अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्वक संघर्ष करने का अधिकार हो. यह अधिकार केवल संविधान की किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उस का सम्मान व्यवहार में भी होना चाहिए. जब तक कोई आंदोलन हिंसक नहीं होता, तब तक उसे दबाने के बजाय समझने और समाधान निकालने की कोशिश होनी चाहिए. लेकिन जंतरमंतर की घटना ने यह संकेत दिया कि वर्तमान मोदी सरकार इस बुनियादी सिद्धांत से दूर है. इस पूरे घटनाक्रम का सब से महत्त्वपूर्ण पहलू युवाओं की प्रतिक्रिया है.

आज का युवा केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि सूचनाओं और जागरूकता से संचालित होता है. उसे अपने भविष्य की चिंता है. वह अभी 80-85 साल तक जिंदा रहेगा. वह निकम्मे हाथों में भविष्य देने को तैयार नहीं है. देश में बढ़ती रोजगार की समस्या ने उसे विचलित कर रखा है. पेपर लीक की बढ़ती घटनाओं से उसे अपना भविष्य बिलकुल काला नजर आ रहा है. लाखों गरीब बच्चे जिन के मांबाप ने उन्हें पढ़ाने के लिए अपनी जमीन, घर, जेवर गिरवी रख दिए, या बेच दिए, वो बच्चे पेपर लीक होने पर जिस हताशा से गुजर रहे हैं, उस का अंदाजा इन सफेदपोशों को नहीं है. जो बच्चे हताशा की सीमा लांघ कर जान दे बैठे उन के मांबाप का दर्द दिन में तीनतीन बार पोशाक बदलने वाले, जनता के पैसे पर दुनियाभर की 8,000 करोड़ रुपए के विमान में सैर करने वाले प्रधानमंत्री समझ ही नहीं सकते हैं.

जंतरमंतर पर कौकरोच जनता पार्टी का आंदोलन इतना व्यापक इसीलिए हुआ क्योंकि आज का युवा सरकार की नीतियों से थक चुका है. वह इस सरकार से खार खाए बैठा है. उसे अभी तक कोई ऐसा मंच नहीं मिल रहा रहा था जहां वह अपनी भावनाएं व्यक्त कर पाता. बारबार पेपर लीक, परीक्षाओं में अनियमितताएं और परिणामों में धांधली ने छात्रों के भविष्य को अस्थिर कर दिया है. नीट जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा, जिस पर लाखों छात्रों का कैरियर निर्भर करता है, में भी पारदर्शिता पर सवाल उठना बेहद गंभीर बात है, जिस के खिलाफ आवाज तो उठनी ही थी. कौकरोच जनता पार्टी ने युवाओं को अपनी आवाज उठाने के लिए मंच उपलब्ध करा दिया.

गौरतलब है कि मोदी सरकार देश के युवाओं को लगातार धर्म की राह पर धकेलने का प्रयास कर रही है. वह इस कोशिश में है कि शिक्षा और रोजगार से विमुख हो कर युवा अपनी पूरी ऊर्जा धर्म, कांवड़ यात्राओं और मंदिरों में झोंक दे. वह सरकार से कोई मांग न करे. जो मांगे बस भगवान से मांगे, मनचाहे राम मंदिर में जा पैसा चढ़ाए, चारधाम यात्रा करे, कुंभ में डुबकी लगाए. फिर भी उसे न मिले तो वह सरकार को नहीं, बल्कि अपनी आस्था और सेवा को दोषी ठहराए.

मगर मोदी सरकार यहीं भूल कर गई है. भले उस ने देश के तमाम बड़े राष्ट्रीय टीवी चैनलों और अखबारों को ‘खरीद’ कर उन को धार्मिक ख़बरों-कामों का अड्डा बना दिया हो, मगर उन की जगह अब सोशल मीडिया ने ले ली है जिस ने समाचार बांचने का काम बखूबी संभाल लिया है.

आज देश का युवा सोशल मीडिया पर हर घटना को देख रहा है, वह उस का विश्लेषण करता है और फिर अपनी प्रतिक्रिया देता है. सोनम वांगचुक के साथ हुई घटना ने युवाओं को महसूस कराया कि उन की आवाज को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. उन के भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है. यही कारण है कि ‘चलो संसद’ के आह्वान को कौकरोचों का अभूतपूर्व समर्थन मिला.

यह पहली बार नहीं हुआ है कि सरकार को लोक ने झुकने के लिए मजबूर किया. नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में कई ऐसे मौके आए हैं जब शुरुआती सख्ती के बाद सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा या विरोध की ताकत को स्वीकार करना पड़ा. मगर कहावत है न, कि, कुत्ते की दुम… हर बार जनता की आवाज को नकारती और फिर उस की सुनने को मजबूर होती मोदी सरकार को अब की बार अपनी तानाशाही काफी महंगी पड़ रही है.

किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन को याद करें. वर्ष 2020 में 3 कृषि कानूनों को कृषि सुधारों की दिशा में बड़ा कदम बता कर सरकार ने जबरन उन्हें किसानों पर मढ़ने की कोशिश की थी. लाखों की संख्या में किसान संसद कूच के लिए घरों से निकल पड़े. आननफानन मोदी सरकार को दिल्ली के तमाम बौर्डर सील करने पड़े. बड़ी संख्या में पुलिस और फोर्स की तैनाती करनी पड़ी. मगर किसान वापस नहीं लौटे. दिल्ली में नहीं घुस पाए तो वे सीमा पर ही धरना दे कर बैठ गए.

कोई सालभर से ज्यादा समय तक वे कड़ाके की सर्दी, झुलसती गरमी, मूसलाधार बारिश में खुले आसमान के नीचे पड़े रहे मगर हिम्मत नहीं हारी. पुलिस के डंडे खाए. बारबार खदेड़े गए. मगर लौटलौट आए.

सरकार सोचती थी कि विरोध कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा. लेकिन हुआ इस का उलटा. एक साल बाद मोदी सरकार को समझ में आया कि ये ‘किसान कौकरोच’ हिलने वाले नहीं हैं, विपक्षी पार्टियों ने भी सरकार पर हमला बोला और मजबूर हो कर मोदी सरकार को 3 काले कृषि कानून वापस लेने पड़े और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की. लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसे अवसर कम ही आए हैं जब संसद से पारित कानून जनता के दबाव के बाद वापस लेने पड़े हों.

इसी तरह शाहीन बाग का आंदोलन भी मोदी सरकार के माथे का कलंक बन गया. नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के विरोध में शुरू हुआ धरना केवल सड़क पर आ बैठी औरतों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उस ने पूरे देश में नागरिक अधिकारों, संविधान और असहमति के अधिकार पर व्यापक बहस खड़ी कर दी. 15 दिसंबर, 2019 को दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में जामिया मिल्लिया इसलामिया में पुलिस कार्रवाई के बाद स्थानीय महिलाओं ने सड़क पर बैठ कर विरोध शुरू किया.

कुछ महिलाओं से शुरू हुआ यह धरना धीरेधीरे देशव्यापी प्रतीक बन गया. आंदोलन में हजारों महिलाएं शामिल हुईं, जिन में बड़ी संख्या बुजुर्ग महिलाओं की थी. तीन बुजुर्ग महिलाओं- बिलकिस, असमा और सरवरी को तो मीडिया में ‘शाहीन बाग दादियां’ के नाम से विशेष पहचान मिली. लेकिन आंदोलन केवल इन्हीं तक सीमित नहीं था, स्थानीय और बाहर से आई अनेक वरिष्ठ महिलाओं ने भी लगातार भागीदारी की.

शाहीन बाग़ का धरना 15 दिसंबर, 2019 से 24 मार्च, 2020 तक चला. इस तरह यह 101 दिनों तक लगातार, चौबीसों घंटे चलने वाला धरना रहा. 24 मार्च, 2020 को कोविड-19 लौकडाउन लागू होने के बाद दिल्ली पुलिस ने धरनास्थल खाली कराया. मगर इस धरने ने सरकार को हिला दिया. हालांकि सरकार ने सीएए कानून वापस नहीं लिया लेकिन आंदोलन के दौरान सरकार ने कई बार यह सार्वजनिक रूप से कहा कि एनआरसी पर अभी कोई देशव्यापी निर्णय नहीं हुआ है और एनपीआर को ले कर भी स्पष्टीकरण दिए गए. लंबे समय तक सीएए के क्रियान्वयन को ले कर अनिश्चितता बनी रही. सरकार अब वह काम चुनाव आयोग से करा रही है.

अग्निपथ योजना के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों ने भी मोदी सरकार को कई स्तरों पर सफाई देने, अतिरिक्त आश्वासन देने और कुछ प्रावधानों में बदलाव करने के लिए विवश किया. इसी तरह समयसमय पर विभिन्न नीतियों और फैसलों पर हुए जनविरोध ने यह संकेत दिया कि लोकतंत्र में जनता की प्रतिक्रिया को केवल प्रशासनिक आदेशों से समाप्त नहीं किया जा सकता.

दरअसल, लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती, वह उन दिनों में होती है जब जनता सरकार के फैसलों पर सवाल उठाती है. यदि सरकार हर विरोध को देशविरोध, राजनीति या साजिश बता कर खारिज करने लगे, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ता है. लेकिन जब वही सरकार बातचीत का निमंत्रण देती है, तो यह स्वीकारोक्ति भी होती है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज की अनदेखी हमेशा संभव नहीं होगी.

20 जुलाई, 2026 के आंदोलन के बाद कौकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधि मंडल को बातचीत के लिए बुलाया जाना इसी राजनीतिक यथार्थ की याद दिलाता है. यह बताता है कि मजबूत बहुमत वाली सरकारें भी जनमत के दबाव से पूरी तरह मुक्त नहीं होतीं. सत्ता चाहे जितनी आत्मविश्वासी दिखाई दे, उसे आखिरकार जनता की आवाज सुननी ही पड़ती है.

हालांकि, लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि सरकार झुकी या नहीं. यह भी देखना होता है कि आंदोलन की मांगें क्या थीं, उस का तरीका क्या था और उस का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा. हर आंदोलन सफल नहीं होता और हर सरकारी फैसला वापस नहीं लिया जाता. लेकिन जब सरकार विरोध करने वालों से संवाद का रास्ता चुनती है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है. इस से लोकतंत्र सुदृढ़ होता है.

भारतीय लोकतंत्र का अनुभव यही कहता है कि सत्ता की सब से बड़ी ताकत उस का बहुमत नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है. और जब यह विश्वास डगमगाने लगता है, तब सत्ता को अपने सब से ऊंचे सिंहासन से उतर कर जनता के बीच आना पड़ता है. किसान आंदोलन इस का प्रमाण है, शाहीन बाग इस की मिसाल है और 20 जुलाई के आंदोलन के बाद हुई बातचीत यही संदेश देती है कि लोकतंत्र में आखिरी शब्द हमेशा जनता का होता है. सरकारें आदेश दे सकती हैं, कानून बना सकती हैं, शक्ति का प्रदर्शन कर सकती हैं, अपने दरवाजे बंद कर कुंभकर्णी नींद सो सकती है, लेकिन जब संगठित जनमत उठ खड़ा होता है और दरवाज़ा खटखटाता है, तो आखिरकार आप को दरवाजा खोलना ही पड़ता है.

आज के युवा गुस्से में कल का निर्माण कर रहे हैं. इन का गुस्सा बेकार नहीं जाएगा. लाठियों की मार काम आएगी, मीलो चलना इन्हें मुश्किल लक्ष्य के लिए तैयार करेगा. कौकरोच जनता पार्टी रहे या न रहे, जो इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं, जो कहीं भी उमड़ कर आ रहे हैं, कल एक नए भविष्य का निर्माण करेंगे क्योंकि इन्हें मालूम है कि मिस मैनेजमैंट कैसा होता है और जनता को क्या कीमत देनी होती है. आंदोलन वह आग है जिस में तप कर स्टील निकलेगा. Jantar Mantar Protest

 

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