Jantar Mantar Protest: नरेंद्र मोदी की सरकार को अपने बहुमत, मशीनरी, ताकत और हिंदू स्वयंसेवकों कि अंधभक्ति पर बड़ा भरोसा है. उसे लगता है कि विरोध और असहमति की हर आवाज कुछ दिनों का शोर है. जबकि, लोकतंत्र का इतिहास बारबार बताता है कि जब हताशपरेशान जनता ऊबने लगती है तब सब से मजबूत सरकारों की भी कुरसी हिल जाती है. लोकतंत्र में अंतिम शक्ति प्राइम मिनिस्टर औफिस (पीएमओ) में या नागपुर में नहीं और न ही सरकारी फाइलों में, बल्कि उन लोगों के बीच है जो सड़क पर उतर कर अपनी बात कहने का साहस रखते हैं. 20 जुलाई, 2026 के बाद यह साफ़ हो गया है कि कौकरोच अपने बिलों से बाहर निकल आए हैं. वे असल में कौकरोच नहीं हैं, वे इस देश की शिकार जनता है जो व्यवस्था की कागजी, कानूनी व लाठी की मार पर हर रोज खाती है.
मोदी सरकार के शासन के दौरान देश के ध्वस्त हो चुके एजुकेशन सिस्टम के खिलाफ कौकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के एक आह्वान पर लाखों युवाओं का एकजुट हो जाना, राजधानी दिल्ली के जंतरमंतर पर उमड़ पड़ना, नीट पेपर लीक के खिलाफ जनआंदोलन का शुरू होना, पर्यावरणविद और शिक्षासुधारक सोनम वांगचुक का आंदोलन के समर्थन में लंबा अनशन और फिर 20 जुलाई को संसद कूच के लिए उमड़े जनसैलाब का जो घटनाक्रम सामने आया है, उस ने एक बार फिर यही संदेश दिया है कि लोकतंत्र की असली शक्ति बंदूकों से लैस तंत्र में नहीं, बल्कि लोक में है, उसी लोक में जिस के सैलाब ने बंगलादेश, श्रीलंका, सीरिया और नेपाल में सत्ता का तख्ता पलट दिया.
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