Healthy Food: हम अकसर कहते हैं- ‘समय नहीं है’, ‘पैसे नहीं हैं’, ‘खाना बनाने का मन नहीं है’, ‘बाहर का खाए बिना कैसे चलेगा?’ लेकिन जब शरीर जवाब देने लगता है, तब उसी सेहत को वापस पाने के लिए समय भी निकालते हैं और पैसा भी खर्च करते हैं. तो क्यों न बीमारी का इंतजार करने के बजाय आज ही अपनी थाली पर थोड़ा ध्यान दिया जाए? जरूरी नहीं कि खाना बहुत महंगा हो. जरूरी नहीं कि हर चीज और्गेनिक हो. जरूरी नहीं कि स्वाद छोड़ दिया जाए. जरूरत सिर्फ इतनी है कि भोजन में संतुलन आए और बहानों की जगह समझदारी हो.

“आज समय नहीं है, कल से पक्का डाइट शुरू करूंगा.”

“बाहर का थोड़ा सा खा लेने से क्या हो जाएगा?”

“अरे, जिंदगी एक ही बार मिलती है, खानेपीने पर इतनी पाबंदी क्यों?”

हम में से ज्यादातर लोग सेहत को ले कर ऐसी ही दलीलें देते रहते हैं. बीमारी सामने आती है तो डाक्टर की सलाह, दवाएं और परहेज सब याद आ जाते हैं, लेकिन बीमारी से पहले अपने खानपान की जिम्मेदारी लेना हमें अकसर भारी लगता है. स्वाद के आगे सेहत को टालतेटालते हम कब अपनी थाली को ही बीमारियों का रास्ता बना देते हैं, पता ही नहीं चलता. सच तो यह है कि स्वस्थ रहने के लिए महंगे सप्लीमैंट नहीं, बल्कि रोज की थाली में थोड़ी समझदारी जरूरी है. बहाने बनाने से सेहत नहीं सुधरेगी, लेकिन खाने की आदतों में छोटेछोटे बदलाव जरूर बड़ा फर्क ला सकते हैं.

स्वाद के लिए नहीं, सेहत के लिए खाइए

खाना हमारे जीवन की सब से जरूरी जरूरतों में से एक है, लेकिन आज खाना सिर्फ जरूरत नहीं रहा. वह मनोरंजन, तनाव दूर करने का साधन और कभीकभी सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा भी बन गया है. सुबह जल्दी हो तो नाश्ता छोड़ दिया, दोपहर में समय न मिला तो समोसा या बर्गर खा लिया और शाम को थकान के नाम पर चाय के साथ बिस्कुट या नमकीन का पैकेट खोल लिया. रात को देर से खाना और फिर मिठाई से दिन पूरा करना भी आम बात हो गई है. दिक्कत तब शुरू होती है जब यह कभीकभार की आदत रोज की दिनचर्या बन जाती है.

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