Democracy in India: लोकतंत्र जनता के लिए होता है और जनता भाषा, मजहब, विचार, संस्कृति, खानपान, पहनावे और जीवनशैली के हिसाब से डाइवर्स होती है. आज एक चुनाव, एक राष्ट्र, एक भाषा और एक सुप्रीम लीडर के नाम पर इस लोकतंत्र और इस की डाइवर्सिटी को खत्म कर लोकतंत्र की जगह एकतंत्र लाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. आरएसएस की मानसिकता तो यही है कि जिस में विरोधी विचारों के लिए कोई जगह ही नहीं है. सरकार से असहमत लोगों को सुप्रीम अदालत में कौकरोच कहा गया. शिक्षा मंत्री के खिलाफ प्रोटैस्ट कर रहे लोगों को आतंकवादी बताया गया और हर उस आवाज को कुचलने की कोशिश की गई जो सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत करती है. क्या वन नैशन, वन इलैक्शन और वन सुप्रीम लीडर वाली यह मानसिकता लोकतंत्र के नाम पर एकतंत्र लाने की साजिश नहीं है?
भारत की मिट्टी में ही डाइवर्सिटी समाई हुई है. यहां 20 कोस में संस्कृति बदल जाती है. भारत में सैकड़ों बोलियां बोली जाती हैं. 780 से ज्यादा भाषाएं हैं. भाषा, कल्चर और परंपराओं की इसी विविधता के कारण दुनिया में भारत की एक अलग पहचान है लेकिन पिछले 12 सालों में एक चुनाव, एक राष्ट्र, एक भाषा और एक सुप्रीम लीडर के नाम पर इस विविधता को कुचल कर एकतंत्र लाने की कोशिशें हो रही हैं. सीजेपी का प्रोटैस्ट असल में इसी मानसिकता के खिलाफ एक जनआक्रोश है.
आरएसएस के हिंदू राष्ट्र में अल्पसंख्यकों और विरोधियों के लिए जगह नहीं है. भारत में हिंदू 80 प्रतिशत हैं लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदुओं की इस आबादी में हिंदू कोई नहीं है. हिंदुओं की यह बहुसंख्यक आबादी असल में आज भी वर्णव्यवस्था के हिसाब से बंटी हुई है. 10 फीसदी के आसपास ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं. इन वर्णो के अलावा लगभग 54 फीसदी आबादी शूद्रों की है जिन्हें संवैधानिक भाषा में ओबीसी कहा गया गया है. ओबीसी के बाद अछूतों यानी एससी की आबादी लगभग 16 प्रतिशत है और एसटी यानी आदिवासियों की आबादी 8 फीसदी के आसपास है. मुसलिम 14 और ईसाई 2 प्रतिशत हैं. बाकी के 4 प्रतिशत में बौद्ध, सिख, जैन, पारसी व लिंगायत हैं.
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