Baby Do Die Do Review: फिल्म का यह अजीबोगरीब नाम दरअसल फिल्म की लीड कैरेक्टर ‘बेबी कारमारकर’ का अंगरेजी में किया गया एक चुटीला अनुवाद है. हुमा कुरैशी और उस के भाई साकिब सलीम के प्रोडक्शन में बनी यह फिल्म बौलीवुड के पुराने घिसेपिटे रिवेंज वाले ढर्रे में आती है. हां, इसे मौडर्न क्राइम थ्रिलर टच दिया गया है जो थोड़ाबहुत कोरियन इंस्पायर लगता है.

कहानी की शुरुआत में बेबी के बचपन का एक ऐसा हादसा दिखाया गया है जहां उस की जुड़वां बहन की उसी के सामने हत्या की जाती है, जिस के बाद वह अंदर से पूरी तरह पत्थर बन जाती है और बदला लेने की ठान लेती है. वह अपने मुंहबोले बाप ‘पापा’ (चंकी पांडे) के लिए हिटवुमन बन जाती है.

बेबी का सब से बड़ा हथियार कोई चमचमाती बंदूक या चाकू नहीं, बल्कि एक लाल रंग का छाता है, जो पिस्टल की तरह काम करता है. इसी खूनी खेल के बीच उस की जिंदगी में सिद्धू (रचित सिंह) नाम का एक सीधासाधा म्यूजिक टीचर आता है, जिस से उसे प्यार हो जाता है. अब वह अपराध के इस दलदल से बाहर निकलना चाहती है मगर ‘पापा’ ऐसा नहीं होने देना चाहता. वह बेबी को खत्म करने का प्लान बनाता है. इस के लिए वह जफर काटकर की मदद लेता है. यह जफर वही है जिस ने बेबी की बहन का कत्ल किया था. मगर फिल्म के अंत तक बेबी खुद उन्हें अपने रास्ते से हटा देती है.

फिल्म की सब से बड़ी कमजोरी इस की प्रिडिक्टिबिलिटी है. यह कहानी छतीसों बार फिल्मों में दिखाई गई है. क्लाइमैक्स तक के ट्विस्ट और टर्न में कोई चौंकाने वाली फीलिंग नहीं आती. इस के अलावा दूसरे हाफ में आ कर स्क्रिप्ट बिखरी हुई लगती है क्योंकि इतने सारे किरदार, जैसे भ्रष्ट पुलिसवाले, चालाक वकील, गुंडे और बिल्डर्स एकसाथ आ जाते हैं कि डायरैक्टर खुद कन्फ्यूज्ड हो जाता है कि किसे कितना वक्त दे.

हालांकि सिनेमैटोग्राफर तोजो थौमस ने वह मुंबई दिखाने की कोशिश की है जिस में गेटवे औफ इंडिया या मरीन ड्राइव नहीं है, बल्कि यह वह डिप्रैशन से भरी ‘साइन सिटी’ जैसी जगह है जहां तेज बारिश हो रही है, चौलों में लोग एकदूसरे के ऊपर चढ़े जा रहे हैं और बड़ीबड़ी इमारतें पुरानी जमीनों को निगल रही हैं.

ऐक्ंिटग की बात करें तो हुमा कुरैशी ने इस मूक हत्यारी के किरदार को ठीकठाक निभाया है. वह स्क्रीन पर किसी ‘ऐक्शन स्टार’ की तरह उड़उड़ कर लातें नहीं मारती, बल्कि उस का साधारण दिखना ही उस का सब से बड़ा धोखा है.

वहीं, रचित सिंह ने बेबी के सीधेसाधे बौयफ्रैंड के रूप में बढि़या काम किया है. चंकी पांडे ने अपनी कौमेडी वाली छवि से बिलकुल अलग हट कर एक शांत और खतरनाक बौस के रूप में चौंकाया है. सिकंदर खेर के पास बहुत कम स्क्रीन टाइम रहा हालांकि गैंगस्टर या माफिया जैसा किरदार अब उस पर दोहराव जैसा लगने लगा है. सीमा पाहवा का भी रोल हलका है.

फिल्म का एक और दिलचस्प हिस्सा इस का डार्क ह्यूमर और गाने हैं. अंधेरी ईस्ट के एक गे क्लब में फिल्माया गया गाना ‘अल्फा क्यू…’, जिस में साकिब सलीम एक कैमियो में नजर आता है और एक शादी के बैकग्राउंड में बजने वाला म्यूजिक ‘म्यूचुअल फंड्स आर सब्जैक्ट टू मार्केट रिस्क…’ फिल्म के माहौल को मजेदार बनाते हैं. डायरैक्टर ने इस तरह के अच्छे प्रयोग किए हैं.

सिनेमैटोग्राफी फिल्म के अनुकूल है और बीजीएम भी फिल्म के डार्क थ्रिलर टोन के अनुसार फिट है. कुल मिला कर, ‘बेबी डू डाई डू’ एक बार देख कर भूल जाने लायक फिल्म है. इस का इंपैक्ट जरा सा भी जेहन में नहीं रहता. Baby Do Die Do Review

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