Dhamaal Film Review: अगर आप अपनी जेब खाली कर के इस उम्मीद में थिएटर जा रहे हैं कि ‘धमाल’ आप के दिमाग को रिलैक्स देगी, तो गलतफहमी में हैं. यह फिल्म सिरदर्द की गारंटी देती है. साल 2007 में आई पहली ‘धमाल’ हौलीवुड की फिल्म ‘इट्स अ मैड, मैड, मैड, मैड वर्ल्ड’ की नकल जरूर थी लेकिन उस में कम से कम साफसुथरा मजाक और अच्छी कौमिक टाइमिंग थी.
अब 19 साल बाद निर्देशक इंद्र कुमार उस फिल्म का लास्ट कतरा निचोड़ रहे हैं. दरअसल, ‘धमाल’ दर्शाती है कि बौलीवुड में कौमेडी में नए विचारों का अकाल पड़ा है. कहानी के नाम पर वही घिसापिटा ‘गुप्त खजाना’ जैसा बचकाना प्लौट. फिल्म में गुड्डू (अजय देवगन) और जौनी (संजय मिश्रा) को एक सीक्रेट खजाने की भनक लगती है, जिस का रास्ता पृथ्वी नाम का आदमी जानता है. उस का पीछा करते हुए ऐक्सीडैंट होता है. इस में लल्लन (रितेश देशमुख), आदी (अरशद वारसी) और मानव (जावेद जाफरी) भी अपने को चमकाने के लिए कूद पड़ते हैं.
अब 3 अलगअलग टीमें उस खजाने तक पहले पहुंचने की होड़ में लग जाती हैं. खजाना किसी गुप्त आइलैंड में बड़े ‘एम’ नुमा 2 पहाड़ों की गुफाओं में है जहां सभी पहुंचते हैं. मगर किसी के हाथ खजाना नहीं लगता और अंत में बता दिया गया है कि असल खजाना परिवार होता है. यह प्लौट ऐसा लगता है कि ‘छोटा भीम’ कार्टून का कोई एपिसोड चोरी कर लिया गया हो.
फिल्म में कोई कहानी ही नहीं है जिसे थोड़ा भी डिस्कस किया जाए. स्क्रीन पर अचानक औक्टोपस, मगरमच्छ या नकली शेर तक आ जाते हैं ताकि जबरदस्ती की अफरातफरी मचाई जा सके. फिल्म में मजाक भी बौडीशेमिंग पर टिका है. लल्लन की पत्नी पारू (अंजलि आनंद) के भारी शरीर पर बने भद्दे जोक्स, तुतलाने का मज़ाक और आदिवासियों की खिल्ली उड़ाना ही मेकर्स के लिए ‘एंटरटेनमैंट’ है.
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