Hindi Story: रोमेश अंकल और प्रीति आंटी को वामिका में अपनी बेटी जया की झलक दिखाई दी. वामिका पर इसलिए भी उन की निर्भरता और भरोसा बढ़ता गया. ऐसे में वामिका का उन्हें छोड़ कर जाना दुख दे रहा था, वहीं उस का मुखौटा चढ़ा चेहरा हैरत में डाल रहा था.

बह के 4 बज रहे थे. अरुण को जगाते हुए वामिका बोली, ‘‘अलार्म बज गया, जल्दी से उठ जाओ.’’

‘‘कुछ देर और सोने दो न.’’

‘‘कैसी बातें करते हो, तुम्हें जाना है यह बात तुम्हें रोज याद दिलानी पड़ती है,’’ वामिका गुस्से से बोली.

मजबूरी में अरुण को उठना पड़ा. उस ने जल्दी से कपड़े पहने और दरवाजे की ओर बढ़ गया.

‘‘गेट खोल कर तालाचाबी वहीं लटका देना और तुम बाहर चले जाना. चाबी मैं आ कर ले लूंगी,’’ वामिका ने रोज की तरह उसे आज फिर याद दिलाया.

‘ओके’ कह कर अरुण जैकेट के हुड से सिर ढके हुए चुपचाप बाहर निकल गया.

उस के जाते ही वामिका ने राहत की सांस ली. एक घंटे बाद वह भी दबेपांव कमरे से बाहर गई और गेट का ताला लगा कर चाबी ले कर वापस आ गई. अभी समय बहुत था, उस ने चादर खींची और सो गई.

अरुण वामिका का बौयफ्रैंड था. वामिका रोमेश अंकल के घर पर किराएदार के रूप में रह रही थी. अंकलआंटी काफी बुजुर्ग थे. उन्होंने कमरा किराए पर देने से पहले शर्त रखी थी कि यहां उस से मिलने कोई लड़का नहीं आना चाहिए. वामिका ने घर लेने के लिए हर शर्त मंजूर कर ली थी लेकिन अरुण से दूर रहना उस के लिए नामुमकिन था. अंकल की नजर बचा कर वह रात में अरुण को कमरे में बुला लेती और सुबह उन के उठने से पहले उसे जाने को कहती. इस से परेशानी दोनों को हो रही थी लेकिन कोई दूसरा उपाय नहीं था.

अरुण अभी बेरोजगार था और वामिका की अभीअभी नई नौकरी लगी थी. अरुण एक अन्य लड़के के साथ कमरा शेयर कर के रहता था. बड़ी मुश्किल से अपनी परेशानी का हल निकालने का उन्हें यही तरीका सही लगा था.

रोमेश अंकल के दोनों बच्चे विदेश में रहते थे. वे स्वभाव से सज्जन थे. वामिका भी उन्हें भली लड़की लगी थी. जब वह पहली बार कमरा देखने के लिए उन के पास आई तो आंटी के मुंह से अनायास ही निकल गया था, ‘यह तो बिलकुल अपनी जया जैसी लगती है. जरूर किसी भले घर की होगी.’

अंकल ने उस के बारे में पूरी जानकारी ले ली थी. वामिका ने फोन से अपने पापा से अंकल की बात भी करा दी थी. बात कर के वे संतुष्ट हो गए थे. बहुत जल्दी वामिका ने अंकलआंटी अपने शीशे में उतार लिया. वह सुबह जल्दी उठ जाती और उस का पहनावा भी बहुत सादा रहता जो जीवन के सात दशक पार कर चुके बुजुर्गों को प्रभावित करने के लिए काफी था. वह सुबह 9 बजे औफिस के लिए निकल जाती और शाम को 7 बजे तक घर लौट आती. आते ही पहले वह थोड़ी देर अंकलआंटी के साथ बैठ कर उन के दिनभर के कामों के बारे में पूछती और उस के बाद अपने कमरे में जाती थी.

अकसर वह खाना घर पर खुद ही बना लेती थी. कभीकभी अरुण के लिए बाहर से भी और्डर कर देती. जिस दिन उसे अरुण के साथ डिनर बाहर करना होता वह अंकलआंटी को पहले ही सूचित कर देती थी. वामिका की यह बात उन्हें बहुत अच्छी लगती थी. वामिका को यहां आए एक महीना हो गया था. उस की हिम्मत अरुण को घर लाने की नहीं हो रही थी. वे घर से बाहर छुट्टी के दिन ही खूब मौजमस्ती करते और पूरा दिन एकसाथ गुजारते.

रविवार का दिन था. वामिका अरुण के साथ दिन गुजार कर रात घर देर से लौटी.

अंकल उस के आने का इंतजार कर रहे थे. वह बोली, ‘‘अंकल, आप परेशान मत

हुआ करें. मैं हूं न. आप को वैसे भी चलनेफिरने में दिक्कत होती है. रात को गेट पर ताला मैं लगा दिया करूंगी  बस, इस की एक चाबी और बनवा दीजिए जिस से मु?ो सुबह आप को डिस्टर्ब न करना पड़े. मैं अकसर सुबह घूमने भी जाती हूं.’’

रोमेश अंकल ने पत्नी प्रीति की ओर देखा. आंखों ही आंखों में उस का इशारा सम?ा कर उन्होंने ताले की दूसरी चाबी वामिका को थमा दी.

‘‘बेटी, समय से गेट बंद कर देना. हमें चिंता लगी रहती है.’’

‘‘आप निश्चित रहें, अंकल. मेरे होते आप को कुछ चिंता करने की जरूरत नहीं. मैं रात को गेट बंद करने के बाद आप को फोन से बता दिया करूंगी. आप की टैंशन खत्म हो जाएगी. मेरे लायक और भी कोई काम हो तो बेटी समझ कर बे?ि?ाक मुझ से कह दिया करें. मुझे आप की मदद करने में अच्छा लगता है. आप को देख कर मुझे अपने मम्मीपापा याद आ जाते हैं. घर पर भी मैं उन के साथ काम में हाथ बंटाती हूं.’’

‘‘तुम्हारे मम्मीपापा ने तुम्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं, बेटी. हमेशा खुश रहना,’’ अंकल भावुक हो कर बोले थे.

गेट की चाबी मिल जाने पर वामिका बहुत खुश थी. यहां आ कर उसे अरुण से दूर रहने में तकलीफ हो रही थी. अंकल बहुत जल्दी गेट बंद कर देते थे. उस समय तक पड़ोस के लोग भी उठे रहते. वामिका ने ताले की एक चाबी और बना ली और वह अरुण को थमा दी.

देखने में खूबसूरत, दुबली, पतली, लंबी वामिका काफी आकर्षक थी. ग्रेजुएशन के बाद वह और अरुण दोनों नौकरी के लिए एक ही कोचिंग इंस्टिट्यूट में तैयारी कर रहे थे. दोनों कब एकदूसरे के नजदीक आ गए, पता ही न चला. 2 साल के अंदर उन की बहुत अच्छी जानपहचान हो गई थी. पहले दोस्ती प्यार में बदली और अब वे एकदूसरे के साथ खुल कर जिंदगी का मजा ले रहे थे. दोनों को इस फिजिकल रिलेशन से कोई एतराज न था. जमाने की हवा ही ऐसी थी. साथ रहने के लिए शादी की जरूरत नहीं थी.

वामिका ने सोच लिया था नौकरी लगते ही वे दोनों शादी कर के घर बसा लेंगे. उस ने अपने इस रिश्ते के बारे में अभी घर पर किसी को कुछ नहीं बताया था. वह नौकरी लगने का इंतजार कर रही थी. वामिका की मेहनत रंग लाई और उस का सलैक्शन बैंक में हो गया. यह सुन कर अरुण की खुशी का ठिकाना न था. वह वामिका को बांहों में भर कर बोला, ‘वामिका, तुम्हारी मेहनत तो सफल हो गई, मेरी पता नहीं कब होगी.’

‘थोड़ा धैर्य रखो. तुम भी जल्दी ही कहीं अच्छी जगह सैटल हो जाओगे.’

‘नौकरी के सिलसिले में तुम्हें दूसरे शहर जाना है. मैं तुम्हारे बगैर कैसे रहूंगा?’

‘यह तो मुझे सोचना चाहिए. वैसे, मेरे पास एक उपाय है. तुम चाहो तो कंपीटिशन की तैयारी मेरे साथ नए शहर में आ कर कर सकते हो.’

‘तुम्हारा दिमाग बहुत तेज चलता है. मैं ने इस बारे में सोचा ही नहीं था. वहां जा कर मेरे खर्चे बहुत बढ़ जाएंगे.’

‘उस की चिंता मत करो. थोड़ीबहुत मदद मैं कर दूंगी. बाकी घर से तुम्हें खर्चा मिलता ही है. हम दोनों मिल कर इस समस्या को हल कर लेंगे.’

2 महीने बाद वामिका नए शहर में आ गई थी. उस के पीछेपीछे अरुण भी वहां पहुंच गया था. वामिका को रहने के लिए एक घर की जरूरत थी. वह ऐसा घर ढूंढ़ रही थी जहां अरुण को आनेजाने में परेशानी न हो. उसे रोमेश अंकल का घर पसंद आ गया था. घर किराए पर देने के लिए अंकल ने ऐसी शर्त रख दी कि उसे पूरा करने के एवज में उसे इस घर से हाथ धोना पड़ता. यह जगह उस के औफिस के नजदीक थी और सब से बड़ी बात, किराए का कमरा एक तरफ था जिस का अंकल के कमरों से कुछ लेनादेना नहीं था. आनेजाने के लिए भी उन की तरफ से हो कर नहीं जाना पड़ता था. इस से हर समय उस पर अंकलआंटी की नजर नहीं पड़ सकती थी.

वामिका ने सोच लिया था कि वह बहुत जल्दी अंकलआंटी का विश्वास जीत लेगी. वैसे तो, उसे आधुनिक परिधान पसंद थे लेकिन उन के सामने वह साधारण कपड़ों में ही नजर जाती थी. कई बार वह आधुनिक ड्रैस बैग में साथ रख कर औफिस ले जाती. वह रोज उन से मिल कर उन का हालचाल पूछ लेती. वे भी खुश हो कर उसे अपने परिवार की बातें बता देते. यहां उन से मिलने आनेजाने वाला कोई नहीं था. औफिस से आ कर वह थोड़ी देर उन के पास जरूर बैठती. बात करने का एक कारण यह भी था कि उसे पूरी जानकारी रहती कि रात में कोई उन के पास रहने के लिए तो नहीं आने वाला. आश्वस्त होने के बाद ही वह अरुण को फोन कर अपने पास बुला लेती थी.

वामिका के मम्मीपापा उम्रदराज थे. वे गांव छोड़ कर बेटी के पास नहीं रह सकते थे. उस का भाई दूसरे शहर में नौकरी करता था. उस के पास मिलने आने वाले न के बराबर थे. अपने लिहाज से उसे यह घर बहुत अनुकूल लगा था. अंकल से गेट की चाबी पा कर वह समझ गई कि उस ने उन का विश्वास जीत लिया है. रात को वह अकसर हुड वाली जैकेट पहन कर ही गेट के नजदीक जाती थी. उस की और अरुण की लंबाई भी लगभग बराबर ही थी. अरुण जब घर आता तो उसी तरह की हुड वाली जैकेट और जींस पहनता जैसे वह पहनती जिस से दूर से देख कर किसी को उन पर शक न हो.

उन की प्लानिंग इतनी सटीक थी कि किसी को भी उस पर शक होने की गुंजाइश नहीं थी. पड़ोस में रहने वाली माया आंटी ने एकदो बार अरुण को देररात घर में घुसते और सुबह जल्दी जाते हुए देखा था. यह देख कर उन के मन में शक हुआ और उस ने यह बात प्रीति आंटी को बता दी.

वह बोली, ‘तुम्हें कोई गलतफहमी हुई होगी, माया. वामिका ऐसी लड़की नहीं है.’

‘लेकिन…’

‘ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता. वह लड़की हम से कुछ नहीं छिपाती. अपनी सब बातें हमारे साथ बांटती है.’

उन्हें उस पर इतना विश्वास था कि उन्होंने इस बारे में उस से कुछ भी पूछना ठीक नहीं सम?ा. एक दिन रोमेशजी ने जरूर इस बारे में पूछा जब उन्होंने सुबहसवेरे किसी को गेट खोल कर बाहर जाते हुए देखा था.

‘‘वामिका तुम सुबह बहुत जल्दी उठ जाती हो.’’

‘‘आप को कैसे पता चला, अंकल?’’

‘‘कल मेरी तबीयत खराब थी. घड़ी देखी, सुबह के 4 बज रहे थे. तुम ने गेट बड़ी जल्दी खोल दिया था.’’

‘‘हां अंकल, मैं भी अकसर घूमने जाती हूं.’’

‘‘इतनी सुबह अकेले टहलना ठीक नहीं है.’’

‘‘मैं अकेली नहीं होती हूं. बगल में मेरी एक फ्रैंड रहती है. हम दोनों साथ जाते हैं. यहां से पार्क कुछ ही दूरी पर है. वहां पर काफी लोग सुबहसुबह टहलने आ जाते हैं.’’

‘‘अपना खयाल रखा करो, बेटी. टहलना अच्छी बात है लेकिन उस के लिए कोई रिस्क लेना ठीक नहीं. किसी दिन अपनी फ्रैंड से भी मिला देना. पता तो चले वह किस के घर पर रहती है.’’

‘‘अंकल, मुझे घर पर दोस्तों को लाना अच्छा नहीं लगता. इस से आप की प्राइवेसी भंग होती है. दिनभर हम औफिस में साथ ही रहते हैं,’’ वह बोली.

वामिका ने मन ही मन सोचा कि अच्छा हुआ अंकल अरुण को पहचान नहीं पाए वरना उस के सारे किए पर पानी पड़ जाता.

‘‘आप मुझे उठा देते, अंकल. आप की तबीयत खराब थी. मैं आप की मदद कर देती.’’

‘‘दिनभर औफिस के काम से थक जाती हो. हमारी तो उम्र हो गई है. यह सब लगा ही रहता है.’’

‘‘इस का मतलब, आप मुझे अपना नहीं समझते.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते, बेटी.’’

‘‘आइंदा कभी तबीयत खराब हो तो मुझे जरूर खबर करिएगा,’’ वामिका ?ाठी नाराजगी दिखाते हुए बोली.

उन्हें वामिका का इस तरह अपनापन दिखाना बहुत अच्छा लगा. आजकल के जमाने में जहां बच्चे बुजुर्गों से बात करने तक की भी जरूरत नहीं समझते वहां वह अपने समय के साथसाथ उन्हें अपनापन भी दे रही थी.

औफिस के लिए निकलते हुए अकसर उन से बाजार से संबंधित काम के बारे में भी पूछ लेती, ‘‘आंटी, कुछ लाना हो तो कह दीजिए. मैं तो मार्केट से हो कर आती ही हूं. मुझे अच्छा लगेगा कि मैं आप के लिए कुछ कर सकूं.’’

पहले वे उस से कुछ कहने में झिझकते थे लेकिन धीरेधीरे वे अपनी जरूरत उसे बताने लगे. वामिका उन्हें बड़े प्यार से पूरा कर देती. दैनिक जरूरत का सामान रोमेशजी औनलाइन और्डर कर देते थे. छोटेमोटे काम करने में वामिका को परेशानी नहीं थी और न ही अंकल को. 9 महीने बीत गए थे. वामिका और अरुण का समय अच्छे ढंग से चल रहा था और अंकलआंटी का भी. उस ने सब के साथ बहुत अच्छा तालमेल बिठा रखा था. अरुण दिनभर पढ़ाई की तैयारी में लगा रहता. शाम को वे दोनों मिलते. कुछ वक्त साथ बिता कर वामिका घर आ जाती.

रात को अरुण उस के फोन का इंतजार करता. मौका मिलते ही वह उस के पास पहुंच जाता. कमरे में आ कर वे अपनी जिंदगी भरपूर एंजौय करते. अरुण की मेहनत रंग ले आई थी. उस का सलैक्शन समीक्षा अधिकारी के पद पर हो गया था. जल्दी ही उसे नियुक्ति मिलने वाली थी.

यह सुन कर वामिका के पैर धरती पर नहीं पड़ रहे थे. वह बोली, ‘‘तुम सोच भी नहीं सकते अरुण, आज मैं कितनी खुश हूं. मु?ो इस दिन का बहुत समय से इंतजार था.’’

‘‘यह सब तुम्हारे प्यार के कारण ही संभव हो पाया वरना मैं दिनप्रतिदिन हिम्मत हारता चला जा रहा था. तुम ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी.’’

‘‘नौकरी जौइन करते ही तुम अपने रिश्ते के बारे में मम्मीपापा को बता देना. मु?ो पूरा विश्वास है उन्हें हमारे प्यार से कोई एतराज नहीं होगा.’’

‘‘जौइनिंग पीरियड ठीकठाक कट जाए, उस के बाद देखते हैं आगे क्या होता है.’’

अंकलआंटी की निर्भरता दिनप्रतिदिन वामिका पर बढ़ती जा रही थी. उस ने उन की आंखों के सामने ऐसा कोई काम नहीं किया जिस से उन्हें उस पर शक हो. अगलबगल में कभी कोई कुछ कहता तो वे उसे नजरअंदाज कर देते. वे जानते थे वामिका ऐसी लड़की नहीं है जो उन का विश्वास तोड़ दे. वह दिन आ गया जिस का वामिका को बहुत समय से इंतजार था. अरुण को दूसरे शहर में नौकरी जौइन करने जाना था. 2 दिन की छुट्टी ले कर वामिका उस के साथ चली गई थी.

‘‘अरुण, अब हमें देर नहीं करनी चाहिए.’’

‘‘थोड़ा सब्र रखो, वामिका. मम्मीपापा भी इस दिन को देखने के लिए बहुत बेचैन थे. उन्हें यह नहीं लगना चाहिए कि नौकरी लगते ही बेटा उन के हाथ से निकल गया.’’

वामिका को उस की बात ठीक लगी. अब अरुण से उस की मुलाकात हफ्ते में एक दिन वीकैंड पर ही हो पाती. कभीकभी वह मम्मीपापा से मिलने गांव चला जाता. वामिका भी अपना ट्रांसफर उसी शहर में कराने की कोशिश कर रही थी. उसे उम्मीद थी शादी के बाद उन दोनों को कपल पोस्ंिटग एक ही शहर में मिल जाएगी लेकिन तब तक उसे इंतजार करना था. उस के लिए एकएक दिन काटना मुश्किल हो रहा था.

आखिर वह दिन आ ही गया जिस का उसे इंतजार था. अरुण ने घर पर बात कर ली थी. उस के मम्मीपापा इस रिश्ते के लिए तैयार हो गए थे. वामिका के मम्मीपापा को भी वामिका के अरुण से शादी करने पर कोई एतराज नहीं था. उस ने अपनी मम्मी को नौकरी लगते ही अपने और अरुण के बारे में सबकुछ बता दिया था. जिस से वे उस पर शादी का दबाव न डालें. वामिका ने घर छोड़ कर दूसरे शहर जाने की बात अंकलआंटी को सुनाई तो वे उदास हो गए.

‘‘इस में उदास होने की क्या बात है, अंकल. मैं आप से मिलने आती रहूंगी. मैं बाहर नहीं जा रही. इसी देश में हूं. जब मौका लगेगा, मैं आप से मिलने आ जाऊंगी.’’

‘‘तुम्हारे आ जाने से ऐसे लगा था कि हमारी अपनी बेटी हमारे साथ आ कर रहने लगी है. हमारी निर्भरता तुम पर दिनप्रतिदिन बढ़ती जा रही थी और जब हमें तुम्हारी आदत पड़ी, अब तुम जाने की बात कर रही हो.’’

‘‘जिंदगी में तरक्की सब को चाहिए होती है, अंकल. आप भी यही चाहते हैं कि आप की बेटी का घर बस जाए. मेरे मम्मीपापा की भी यही इच्छा है कि मैं शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा लूं. मैं उन का सपना पूरा करना चाहती हूं. आप को मेरी शादी में जरूर आना है.’’

‘‘यह हमारे लिए संभव नहीं हो पाएगा. तुम ही बाद में हम से मिलने सपरिवार आ जाना.’’

‘‘यही ठीक रहेगा, अंकल. अब मैं यह घर खाली कर के जा रही हूं. चाहती तो थी जीवनभर यहां रहूं लेकिन नौकरी की वजह से मु?ो भी दूसरे शहर जाना पड़ रहा है. अंकल, जाते समय घर ठीक से साफ नहीं कर पाऊंगी. मेरे पास इतना समय नहीं है.’’

‘‘कोई बात नहीं, बेटी. हम करवा लेंगे. तुम निश्ंिचत हो कर जाओ.’’

वामिका के जाते समय उन्हें लग रहा था जैसे उन के अपने शरीर का कोई हिस्सा उन से दूर जा रहा है. वामिका ने जरूरी सामान लोडर में डाला और आंखों में आंसू भर कर जाने लगी. जाते समय गेट की चाबी उन्हें थमाते हुए बोली, ‘‘अंकल, आप ने मुझ पर बहुत भरोसा किया. यह गेट की चाबी है. कोई और किराएदार आएगा तो उसे भी इस की जरूरत पड़ेगी.’’

‘‘हम ने इतना भरोसा किसी पर नहीं किया बेटी जितना तुम पर किया है. तुम्हारे जैसे लोग जीवन में बहुत कम मिलते हैं.’’

वामिका भरे मन से वहां से चली गई. रोमेश और प्रीति को उस के जाने का बहुत बुरा लग रहा था. दूसरे दिन सुबह कामवाली के आने से पहले वे दोनों वामिका के कमरे में गए. वहां बैड के नीचे एक थैला रखा था. रोमेश बोले, ‘‘लगता है जाते समय इसे ले जाना भूल गई. खोल कर देखो कोई जरूरी सामान तो नहीं है. बेचारी परेशान हो रही होगी इस के बगैर.’’

प्रीति ने थैला बाहर खींचा. उसे देख कर वह सन्न रह गई.

‘‘क्या है इस में?’’

‘‘आप खुद ही देख लीजिए.’’

रोमेशजी उसे देख कर अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर सके. उस में शराब की  कुछ खाली बोतलें रखी हुई थीं.

‘‘विश्वास नहीं होता इतने संस्कार वाली लड़की ऐसी चीज को हाथ लगाती थी. भला, उसे इस की क्या जरूरत पड़ गई थी?’’

‘‘अब अविश्वास वाली कौन सी बात है? सबकुछ तो सामने दिख रहा है. इन्हें ले जा कर चुपचाप नीचे रख दो. कूड़ेवाला आएगा तो अपने साथ ले जाएगा. इस के साथ एक छोटी थैली भी रखी हुई है. पता नहीं उस में क्या होगा?’’ प्रीति बोली.

‘‘उसे न ही खोलो तो अच्छा होगा. मु?ो पूरा विश्वास है उस में भी हमें चकित कर देने वाला कुछ ऐसा होगा जिस की हम कल्पना नहीं कर सकते.’’ तभी रोमेश ने मेज की दराज खोली. उस में गेट के ताले की डुप्लीकेट चाबी रखी हुई थी. कबाड़ से भरे थैले में हुड वाले 2 एकजैसे काले जैकेट पड़े थे. यह देखसुन कर दोनों दंग रह गए.

‘‘हम सोच भी नहीं सकते थे कि उस लड़की के 2 चेहरे हो सकते हैं. देखने में बहुत भली लगती थी,’’ रोमेश बोले.

‘‘वह भली लड़की ही थी. उस की अपनी जिंदगी चाहे कुछ भी रही हो लेकिन उस ने हमें कभी निराश नहीं किया. यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए. जितनी देर को भी वह हमारे पास आती थी, घर में खुशी बिखेर कर चली जाती थी.’’

रोमेश अभी तक अपने को संयत नहीं कर पा रहे थे लेकिन प्रीति ने इस बात को बड़ी सहजता से ले लिया था. अब उसे यकीन हो गया था कि बगल वाली माया ने कई बार अरुण को उन के घर आते हुए देखा था लेकिन उन्हें उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ था. होता भी कैसे? वामिका ने अपना जो रूप उन्हें दिखाया था वह इस से कहीं भी मेल नहीं खाता था. अब उन्हें एक बात लगातार परेशान किए जा रही थी कि उस ने यह सब सामान जानबू?ा कर घर पर छोड़ा था या वह इसे ले जाना भूल गई थी. अब परेशान होने से कोई फायदा नहीं था. इतना वे जान गए थे कि अब वामिका कभी लौट कर उन से मिलने नहीं आएगी, न कभी उन से फोन पर बात करेगी. Hindi Story

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