Hindi Story: सुबह की ऐसी दर्दीली शुरुआत तो जिंदगी में कभी नहीं हुई थी. मैं आराम से सालों से मुंबई के खार इलाके की इस सोसाइटी ‘पर्ल’ में अपने फ्लैट की बालकनी में चाय और अखबार के साथ अपने दिन की शुरुआत करती हूं. उस दिन जैसे ही चाय पी कर खड़ी हुई, कमर के तेज दर्द से चीख सी निकल गई. लगा बस, सब खत्म. आगे कदम रखा ही नहीं गया. मुश्किल से ही वापस बैठ पाई.

नहाते हुए पति नामक प्राणी संजय ने मेरी चीख सुन कर सोचा, मु?ो फिर कोई छिपकली या कौकरोच दिख गया होगा. उन्होंने मेरी चीख को गंभीरता से न लेते हुए यह सोच कर कि मैं पता नहीं कितने दिन चीख का रिस्पौंस न देने पर ताने मारूंगी, वहीं से पूछ लिया, ‘‘क्या हुआ, रंजू?’’

मैं लगभग रो ही दी, ‘‘जल्दी आओ, कमर में कुछ हुआ है.’’ मुझे इस बात की बड़ी शिकायत है कि औरतों के कमर दर्द को कोई सीरियसली नहीं लेता, हमारे देश में सड़कों के गड्ढे, पुल, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी से भी ज्यादा महिलाओं के कमर दर्द को इग्नोर किया जाता है. और तो और, एक महिला को बता कर देखिए कि सुनो बहन, कमर में बहुत दर्द है. उस का जवाब होता है, ‘अच्छा? तुम्हें भी कमर दर्द रहता है? मु?ो तो पता नहीं कितने सालों से है.’ भई, जब तुम ही हलके में ले रही हो तो कोई और क्या ही पीड़ा सुनेगा.

खैर, संजय आराम से ही नहाए. बस, मु?ो दिखाने के लिए ही अफरातफरी में निकले, ‘‘अरे, दिखाओ, क्या हुआ?’’ मन हुआ कहूं, नई साड़ी थोड़े ही पहनी है, जो पल्लू लहरा कर दिखाऊं. मैं ने फिर उठने की कोशिश की, अब तो मेरी आंखों में सचमुच दर्द से आंसू आ गए, ‘‘संजय. मेरी कमर में कुछ हुआ है, दर्द बरदाश्त के बाहर है.’’

‘‘चाय के साथ कुछ बिस्कुट लिया है तो पेनकिलर दे दूं?’’

‘‘एक बिस्कुट लिया है.’’

‘‘लाता हूं. अभी बैठी रहो.’’ संजय को सम?ा आया कि कुछ तो हो गया है. फटाफट उन्होंने मु?ो वही नैशनल टेबलेट डोलो दी और मु?ो बहुत धीरेधीरे सहारा दे कर बैड पर ले जाते हुए 10 बार टाइम देखा. अब तक तो वे औफिस के लिए तैयार हो चुके होते हैं पर अभी तो टौवल में लिपटे, गीले बालों में घूम रहे थे. लेटने पर मैं ने उन्हें फिर ध्यान से देखा.

‘‘क्या देख रही हो?’’

‘‘हैंडसम तो हो.’’

‘‘शर्म करो, इतने दर्द में हो.’’

‘‘लग रहा है कि पता नहीं तुम्हें कितने दिनों बाद ध्यान से देखा.’’

हंसना, बोलना, शरारत करना मेरा मूल स्वभाव है. लेटेलेटे भी जरा सा हिलते ही मुझे तेज दर्द हुआ, मैं ने एक आह के साथ आंखें बंद कर लीं. अब 35 साल से ढंग के ही पतिपत्नी रहे हैं, सो, उन्हें दर्द की तीव्रता सम?ा आ गई, कहने लगे, ‘‘छुट्टी ले लेता हूं, डाक्टर को दिखा देते हैं, यह तुम्हारा नौर्मल बैकपेन तो नहीं लग

रहा है.’’

उन्होंने सब से पास के हौस्पिटल के डाक्टर नमित का अपौइंटमैंट ले लिया. 3 घंटे बाद जाना था. मुझे लेटेलेटे समझ आ गया था कि कुछ तो गड़बड़ हुई है. हमारी

30 साल की बेटी काव्या औफिस गई हुई थी. मैं ने कहा, ‘‘संजय, अभी काव्या को मत बताना. परेशान हो कर भागी आएगी, शाम को सब पता चल ही जाएगा.’’

‘‘ठीक है.’’

संजय ने ही ब्रैड, बटर और चाय तैयार की. उस के बाद ‘‘घर से ही थोड़ा काम कर लेता हूं, मैं ने ही आज एक जरूरी मीटिंग रखी थी, यह तुम्हारा पानी भी रख देता हूं, कुछ चाहिए होगा तो कौल कर लेना’’ कह कर संजय खाली प्लेट्स उठा कर अपने रूम में चले गए. हमारा 3 कमरों का फ्लैट है, तीसरा कमरा छोटा सा है जिसे लौकडाउन के टाइम संजय ने अपना औफिस बना लिया था. उस के बाद भी जब भी घर पर रहना पड़ता है, वहीं काम करते हैं.

संजय वर्कहोलिक इंसान हैं, खाली बैठना उन की फितरत में नहीं. हां, यह अलग बात है कि औफिस के कामों से फ्री हो कर आजकल अपने रूम में सोशल मीडिया पर खूब टाइम पास कर लेते हैं. जरा सा आवाज दे कर पूछ लो, ‘संजय, क्या

कर रहे हो, रील्स ही देखनी है तो बाहर आ जाओ.’ फट से आवाज आनी बंद हो जाती है.

मैं करवट भी नहीं बदल पा रही थी, दवाई से भी दर्द में जरा भी फर्क नहीं हुआ तो अब चिंता हुई. 10 वर्षों से घर में अंजलि ही सब काम कर रही है. इतने सालों तक टिकी हुई हाउसहैल्प फैमिली मैंबर जैसी ही हो जाती है. वह 40 साल की एक महाराष्ट्रियन महिला है, सांवला सादा सा चेहरा, बड़ीबड़ी आंखें, हमेशा बड़ी बिंदी, हाथों में हरी चूडि़यां, गले में कई मालाएं, सूटसलवार पहने दुपट्टा कमर में खोंसे रहती, गालों पर हमेशा पाउडर के निशान, हमेशा जल्दी में रहती है, चिडि़या जैसी हलकीफुलकी सी. किसी मशीन की तरह उस के हाथ इतने तेज चलते हैं कि उसे लगातार 20 मिनट तक देखें तो सिर घूमने लगता है. मुझे ताई, संजय को दादा कहती है. ताई और दादा मराठी में बड़े भाईबहन को कहते हैं.

आते ही उस ने मुझे लेटे देखा तो हंसते हुए पूछा, ‘‘काय ?ालं ताई, सुस्ती येते आहे का?’’ (क्या हुआ, ताई, सुस्ती आ रही है?’’

मैं ने कहा, ‘‘अंजलि, कमर में कुछ अलग ही तरह का दर्द है, हिल भी नहीं पा रही.  आज जरा खाने का भी काम देख लो.’’

‘‘हो ताई, मैं सब कर देगी. डाक्टर को दिखाया?’’

‘‘अभी दिखाते हैं.’’

‘‘दादानी सुट्टी घेतली का? या मैं चलूं?’’

‘‘नहीं, उन्होंने छुट्टी ले ली है.’’

संजय ने बाहर आ कर कहा, ‘‘अंजलि, अब जरा बाकी के काम भी देख लेना.’’

‘‘हो दादा.’’

अंजलि काफी काम कर के चली गई. मैं नहाने के लिए नहीं उठ पाई. बस, डाक्टर के पास जाने के लिए टीशर्ट, पजामा पहन कर बड़े दर्द में चलते हुए कार तक पहुंची. संजय एक प्राइवेट कंपनी में नैशनल सेल्स मैनेजर हैं. वे अकसर टूर पर रहते हैं. फिटनैस के प्रति हम दोनों बहुत सचेत हैं. क्लिनिक बहुत पास था, पैदल जाएं तो 5 मिनट ही लगता था पर अभी तो पैदल जाने की सोची भी नहीं जा सकती थी. मुझे दर्द में कार के अंदर तक कर बैठने में ही 5 मिनट लग गए.

हौस्पिटल में मुझे से पहले 2 पेशेंट्स और थे, एक बुजुर्ग और दूसरी एक महिला. अब मैं संजय के सहारे के बिना नहीं चल पा रही थी. बैठने में भी मुझे जो तकलीफ हुई, उसे देख कर वहां खड़े एक स्टाफ ने पूछा, ‘‘मैडम, अंदर चल कर लेटना है?’’ मैं ने न में सिर हिलाते हुए थैंक यू बोल तो दिया पर सचमुच लेटने की जरूरत थी.

ऐसे हौस्पिटल पास में हों तो सुविधा रहती है. दूसरी महिला ने मेरी हालत देख कर कहा, ‘‘मेरा बस फौलोअप है, जल्दी हो जाएगा.’’ मैं ने बस गरदन हिला दी. संजय अब तक फाइल बनवा चुके थे. डाक्टर टाइम पर आने के लिए फेमस थे, टाइम पर ही आए. मेरा भी नंबर आया. उन्होंने दर्द की जगह सब चैकअप किया, कहा, ‘‘स्लिप डिस्क लग रही है, पर एक एमआरआई भी करवा लेते हैं, अभी हो जाएगा. उस से डिटेल्स पता चल जाएगी. अभी तो आप को ये कुछ मैडिसिन लेनी हैं और कम्पलीट बैडरैस्ट करना है. बस, वाशरूम और खाने के लिए उठना, कोई एक्टिविटी नहीं. दर्द कम होगा तो फिजियोथेरैपी शुरू होगी.’’

संजय का मुंह छोटा सा हो गया. उन पर प्यार आया, बेचारे, घर के कामों का जरा अंदाजा नहीं, कैसे क्या होगा. एक आम औरत की तरह मेरे दिमाग में सब से पहले यही आया. काव्या से रोज की तरह व्हाट्सऐप पर चैट होती रही थी.

एमआरआई के नाम पर संजय ने मेरी शक्ल देखी. उन्हें पता था कि मैं ने बस इस टैस्ट के बारे में सुन ही रखा है और मैं इस टैस्ट से बहुत डरती हूं. एमआरआई की तैयारी शुरू हुई, एक नर्स लगातार साथ थी. मैं ने कपड़े बदले, गले में पहनी हुई चेन, इयररिंग्स और हाथ की रिंग्स उतार कर संजय को दीं, कहा, ‘‘अपनी जेब में संभाल कर रखना, खो दी तो तुम्हारा और खर्च होगा. सब की सब दोबारा बनवानी पड़ेंगी.’’ मैं मुसकराई थी पर एमआरआई के डर से मेरी आंखों में आंसू थे जो संजय ने साफसाफ देखे, बोले, ‘‘स्टे स्ट्रौंग. बस, ठीक हो जाओ, कुछ नहीं होगा.’’ और मेरे कंधे पर हाथ रख दिए.

मु?ो जैसे सचमुच लगा कि कुछ नहीं होगा, ऐसे स्पर्श में बड़ी ताकत होती है. नर्स ने सम?ाया, ‘‘इस रूम में आप अकेली होंगी पर इस ग्लास के पीछे हम सब होंगे. यह आप अपने हाथ में छोटी सी घंटी रख लो, जैसे ही आप को कोई परेशानी हो, आप इसे हिला देना, हम आ जाएंगे. आप के कानों में रुई लगा रही हूं क्योंकि मशीन बहुत शोर करती है, 45 मिनट में सब हो जाएगा.’’

उस ठंडे कमरे में मुझे अभी से कंपकंपी चढ़ रही थी, मैं ने कहा, ‘‘बहुत ज्यादा ठंडा कमरा है.’’ उस ने कहा, ‘‘आप के ऊपर ब्लैंकेट डाल देती हूं.’’ मुझे बड़ी सी डरावनी मशीन में लिटा दिया गया. उस ने फिर कहा, ‘‘शुरू में अजीब सा लगेगा पर टैस्ट में आप को कोऔपरेट करना होगा वरना सब को परेशानी होगी. आप को भी फिर दोबारा आना पड़ेगा.’’ वह काफीकुछ समझ कर चली गई.

टैस्ट क्या शुरू हुआ, दिल धकधक कर उठा. गहरी सांसें ले कर खुद को सम?ाया, रंजनाजी, तुम बहुत हिम्मती हो, सब ठीक होगा, इतना दर्द है, जरूरी है. एक पल तो ऐसा भी आया कि लगा, घंटी बजा दूं, कहूं, भाड़ में जाए यह टैस्ट, मुझे लाश की तरह इस ठंडी मशीन में बंद नहीं होना लेकिन फिर पढ़ी हुई किताबों की तरफ ध्यान जबरदस्ती लगाया कि फलांनी किताब में क्या अच्छा था, फलांनी किताब में क्या बुरा था, काव्या की बातें याद करने लगी, ओटीटी पर अभी क्याक्या देखना है, लिस्ट बनाने लगी, यों ही ऊलजलूल सोचते हुए काफी टाइम बीत गया था.

कानों में मशीन की इतनी ठकठक की आवाज थी जिसे इग्नोर करना आसान नहीं था. जैसे ही टैस्ट खत्म हुआ, मैं ने अपनेआप को शाबाशी दी, खुद पर नाज सा हो आया. हिम्मती तो मैं हूं. एमआरआई में डिस्क की हालत बुरी ही आई. अब बहुत सारे प्रीकौशन्स रखने थे. डाक्टर से सब समझ कर हम घर वापस आ गए.

अंजलि को शाम के काम भी करने के लिए कह दिया था. अब खाना भी वही बनाने वाली थी. शाम को काव्या आई तो दरवाजा संजय ने ही खोला, ‘‘अरे वाह, पापा, आप? घर पर? व्हाट अ प्लेजेंट सरप्राइज.’’ मुझे बैडरूम में लेटेलेटे काव्या की आवाज सुनाई दी, फिर संजय की परेशान सी आवाज, ‘‘इस से बड़ा सरप्राइज तुम्हारी मां ले कर बैठी है.’’

‘‘क्या हुआ?’’ कहते हुए काव्या सीधे सामने ही दिखी, ‘‘क्या हुआ?’’

मैं हंसी, ‘‘आराम का मूड है.’’

मेरे पास रखा सिंकाई वाला हौटवाटर बैग, दवाएं, काफीकुछ कह रहे थे और मैं अभी तक हिली भी नहीं थी. उस ने मां की तरह डांटा, ‘‘सीधे से बताओ, हर चीज को मजाक समझ रखा है.’’

‘‘स्लिप डिस्क.’’

‘‘कब?’’

‘‘सुबहसुबह.’’

‘‘और मुझे अब तक क्यों नहीं पता है?’’

‘‘तुम परेशान हो कर भागती आती, बेटा. पापा घर पर ही थे, कोई बात नहीं.’’

‘‘तो अब, बस, पापा से ही बात करना. मुझे अब किसी से बात ही नहीं करनी. रंजू संजू ने परेशान कर के रख दिया है.’’ काव्या बिलकुल मां वाले अंदाज में गुस्सा करने लगी.

पीछे से संजय ने नारदमुनि वाला काम किया, ‘‘काव्या, तुम्हारी मम्मी ने ही मुझे बताने से मना किया था पर वह सचमुच बहुत पेन में है, चलो, रानी बेटी. अभी गुस्सा मत करो, सौरी.’’

फिर वह मेरे पास आ कर मुझ से लिपट गई. इस लिपटने पर मुझे ऐसा रोना आया कि मैं बहुत देर तक रोई. सुबह से दर्द में हालत खराब थी ही, बेटी ने जब ऐसे में अपने से लिपटा लिया तो मेरे आंसू बहते चले गए. उसे सब डिटेल्स बताई गईं. वह दर्द देख कर बहुत दुखी हुई.

धीरेधीरे अब यह होता कि कभी काव्या वर्क फ्रौम होम करती, कभी संजय. 15 दिनों के बाद दर्द हलका सा कम हुआ तो डाक्टर के निर्देशानुसार फिजियोथेरैपी शुरू होनी थी. मैं अभी कहीं जा कर फिजियोथेरैपी करवा नहीं सकती थी. डाक्टर ने ही एक फिजियोथेरैपिस्ट अमित गुप्ता को घर भेजा. करीब 30-35? साल का, स्लिमट्रिम, चुस्तदुरुस्त, स्टाइलिश हेयरकट, आकर्षक मुसकराता चेहरा, अमित गुप्ता. उस ने घर आ कर एमआरआई की रिपोर्ट देखी, मेरा दुखदर्द सुना, बोला, ‘‘मैम, प्रौब्लम तो है पर जल्दी ठीक हो जाएंगी, ऐक्सरसाइज और रैस्ट से ही फायदा होगा.’’ इस समय संजय घर पर थे. उन्होंने पूछा, ‘‘कब तक दर्द कम होगा?’’

‘‘करीब एक महीना तो लगेगा दर्द कम होने में. आज से ऐक्सरसाइज शुरू करता हूं. पूरी तरह से नौर्मल होने में तो कुछ महीने लग जाएंगे.’’ ऐक्सरसाइज शुरू हुई. शुरू में दर्द होना ही था, हुआ. एकदो बार दिन में कभी भी अपनेआप करनी थी. वह 20 मिनट का सैशन ले कर चला गया. इस बीच संजय लगातार अपना काम छोड़ कर मेरे सामने ही बैठे थे.

उस के जाने के बाद संजय ने कहा, ‘‘क्या बंदर की तरह कूद रहा था. तुम्हारे हाथपैर कितना तोड़मोड़ कर गया है न, दर्द हुआ होगा?’’

‘‘हां, पर कुछ आराम सा भी मिल रहा था.’’

‘‘उम्र काफी कम है.’’

मैं ने संजय को इस बात पर ध्यान से देखा, संजय की टोन में ऐसा कुछ था जिस पर मेरा ध्यान गया. अमित 20 मिनट का सैशन लेता. घर आने की उस की फीस हजार रुपए थी. उस के क्लिनिक पर जाने पर वह 500 रुपए लेता था. मैं तो अभी क्लिनिक पर जाने लायक हुई नहीं थी, सो अभी तो वही आ रहा था.

लिविंगरूम में एक दीवान था जिस पर लेट कर मैं ऐक्सरसाइज करती. एक स्ट्रेचिंग में वह अपने कंधे पर मेरे पैर रख कर उन्हें ऊपर उठाता, एक स्ट्रेचिंग में वह मेरे दोनों पैर के बीच अपना एक पैर रख कर बिलकुल प्रोफैशनल तरीके से बिना मेरी ओर देखे मेरा घुटना मोड़ कर खींचतान करता. मैं कनखियों से वहां बैठे संजय के चेहरे को देखती, जिन्होंने अपने सामने रखे लैपटौप को देखना छोड़ दिया था. वे बड़ी बारीकी से सबकुछ देखा करते.

अमित के किसी भी तरह से छूने से मैं बिलकुल असहज नहीं थी. वह अपना काम बिलकुल प्रोफैशनल तरीके से करता वरना औरत तो अनुचित स्पर्श तुरंत पहचान लेती है. पर उतनी देर संजय मु?ो बहुत गंभीर दिखते. शायद, स्वाभाविक भी था. उन की पत्नी को कोई इस तरह पहली बार छू रहा था.

जिस दिन काव्या घर पर होती, वह तो उसे हायहैलो बोल कर अपने रूम में जा कर अपना काम करती रहती. संजय कभी कहते, ‘‘आज जीन्स देखी उस की? क्या हीरो बना घूमता है.’’ मैं जब कहती, ‘‘नहीं, मेरा बस ऐक्सरसाइज पर ध्यान रहता है.’’ तो वे खुश होते. यह सच भी था, मेरा ध्यान उस के कपड़ों की तरफ इतना गया भी नहीं था और अगर गया भी था तो संजय के सामने मैं कोई कमैंट न करती. मैं इतना सम?ा गई थी कि उन्हें कुछ असुविधा सी होती है पर हां, मुझे मन ही मन हंसी आने लगी थी.

उन्होंने एक हफ्ते में ही पूछना शुरू कर दिया था कि फिजियोथेरैपी कब तक होगी? एक अच्छी बात अभी और हो रही थी, सालों से वे अपने कामों में इस कदर व्यस्त चल रहे थे कि हमारी लाइफ कुछ नीरस सी हो चली थी. अब उन का ध्यान मेरी हर बात पर जाता. एक दिन कहने लगे, ‘‘तुम्हारे गोरे पैरों पर रैड नेलपेंट बहुत अच्छा लगता है.’’

मैं ने कहा, ‘‘अच्छा? अभी देखा क्या? बड़ी फुरसत में लग रहे हो आजकल.’’ वे घोंप गए. एक दिन पूछने लगे, ‘‘रंजू, तुम एक पैर में ही क्यों एंकलेट पहनती हो?’’ मुझे हंसी आ गई, ‘‘मेरा स्टाइल है.’’

‘‘हां, काफी स्टाइलिश लगता है. ऐक्सरसाइज करने के भी तुम्हारे कपड़े काफी स्टाइलिश हैं.’’

एक दिन हम तीनों डिनर कर रहे थे, काव्या अपने एवरग्रीन मूड में थी, ‘‘और बताओ, मम्मी, क्या चल रहा है?’’

जवाब संजय ने दिया, ‘‘तुम्हारी मम्मी की तो बस ऐक्सरसाइज चल रही है आजकल. मेरी तो जरूरी मीटिंग छूट रही हैं. आज भी उस के आने के टाइम ही मीटिंग थी, छोड़नी पड़ी.’’

‘‘क्यों छोड़ी? ऐक्सरसाइज तो होती रहती है, मैं भी तो अंदर बैठ कर मीटिंग जौइन करती रहती हूं.’’

मुझे शरारत सूझ, ‘‘पापा ज्यादा सीरियसली ड्यूटी कर रहे हैं, वे यहीं बैठते हैं, सब कामधाम

छोड़ कर.’’

काव्या और मेरी नजरें मिलीं. मैं ने उसे जो इशारा किया, वह समझ गई और इतना हंसी कि संजय ने कहा, ‘‘तुम दोनों कुछ भी इशारे कर के किसी भी बात पर हंसती रहती हो.’’ फिर मुझे देखा, ‘‘तुम मेरा मजाक बना रही हो जबकि मैं तुम्हारी इतनी सेवा कर रहा हूं, जब वह हीरो आता है, सब काम छोड़ कर तुम्हारे पास बैठता हूं.’’

‘‘पर क्यों? अपना काम मत छोड़ा करो, पापा. उन की ऐक्सरसाइज में आप को क्या करना होता है?’’

अब इस बात का जवाब संजय क्या ही देते, मु?ा से पूछने लगे, ‘‘रंजना, कितना आराम हो गया है?’’

‘‘काफी ठीक लगने लगा है.’’

‘‘गुड.’’

‘‘अब कल उस से पूछती हूं कि कितने दिन फिजियोथेरैपी करनी है.’’

‘‘ठीक है.’’

अगले दिन अमित ने खुद ही पूछ लिया, ‘‘मैम, अभी आप को कुछ आराम आ गया हो तो आप खुद भी ये सब ऐक्सरसाइज कर सकती हैं. अब मैं वीक में एकदो दिन आ कर देख लूंगा. असल में क्लिनिक में पेशेंट्स इतने हैं कि होम विजिट के लिए टाइम बहुत मुश्किल से मिल रहा है.’’

‘‘ठीक है, यह ठीक रहेगा. अब मैं काफीकुछ कर पा रही हूं.’’ मैं ने देखा कि संजय के चेहरे पर राहत के भाव आए.

अमित के जाने के बाद पुराने दिन अचानक लौट आए, ‘‘कल काफी काम है, औफिस में देर होगी. बहुत काम पैंडिंग हो गया है,’’ कह कर वे अपने रूम में जा कर  काम में ऐसे खोए कि डिनर के समय ही निकले. अंजलि डिनर बना कर चली गई थी.

मैं लेट कर पिछले दिनों पर नजर डाल रही थी, दर्द के दिनरात थे लेकिन अपनों का साथ रहा था. फ्रैंड्स कभी आ कर चली जाती थीं, कभी फोन पर हालचाल पूछ लेती थीं. लेटेलेटे रिश्तेदारों से भी बात होती रही थी. किताबें भी खूब पढ़ ली थी. ओटीटी पर मूवीज शोज खूब देख लिए गए थे. इन सब के बीच सब से सुखद रहा था, युवा फिजियोथेरैपिस्ट की उपस्थिति के समय संजय का लगातार मौजूद रहना, एक पल के लिए भी वहां से न हटना.

मैं सब समझ रही थी और जो मैं समझ रही थी, वह मजेदार था. संजय ने इसी बहाने मेरे आसपास बहुत दिनों बाद काफी समय बिताया था. ऐसा लग रहा था जैसे मैं ने उन्हें कितने दिनों बाद जीभर कर देखा है. कभीकभी समय कितने ही रूप ले कर आता है, मेरे लिए भी यह समय बेहद दर्द का भी था और कुछ नया भी था.

व्यस्त पति के साथ कुछ समय बिताया था. वे मेरे पास समय निकाल कर बैठे थे. फुरसत से बातें भी की थीं. यह सब पुराने दिनों के लौट आने का समय भी लगता रहा था. कुल मिला कर मुझे दर्द से परेशान होने से ज्यादा इस बात की खुशी ज्यादा हुई थी. Hindi Story

 

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