Youth Challenges: जेन जी और जेन एल्फा के साथ प्रौब्लम यह है कि उन्हें उस सिस्टम में काम करना पड़ रहा है जो उस जेनरेशन ने तैयार किया जिस पर डिजिटल स्ट्रक्चर जबरन थोपा गया था. पहले ज्यादातर इन्वेंशन मिडिल एज के साइंटिस्ट, एक्सपर्ट्स करते थे लेकिन अब कई सालों से इंटरनैट डिजाइनिंग से ले कर हैकिंग यूथ कर रहे हैं जो सोचते ही बाइनरी लैग्वेंज में हैं. उन को जो एडमिनिस्ट्रेशन का सिस्टम दिया जा रहा है, वह अजबगजब पुराना, सदियों पुराना है.
नीट, सीबीएसई और जेइई एग्जामों में नैशनल टैस्टिंग एजेंसी ने जो एग्जाम पैटर्न बनाया और जिस तरह उसे कन्डक्ट किया उस में हर पौइंट पर एजिंग जेनरेशन बैठी थी जो अपने पावर का मिसयूज करने और सुपीरियर कास्ट को बचाए रखने की मूल बात को ध्यान में रखती है. एनटीए सारे पेपर सैट कराती है तो एल्डरली जेनरेशन से, उस का स्टाफ भी एल्डरली है जो यह देखता है कि कहां ऊपरी कमाई कर सकते हैं. जो कंप्यूटरजेनरेटड काम होता है वह टैंडरों के जरिए दिया जाता है. टैंडर प्रोसैस वही है जिस से सडक़ें, पुल बनते हैं जो आज बनते हैं, कल टूटते और गिरते नजर आते हैं.
टैंडर प्रोसैस जरूरी है क्योंकि एल्डरली जेनरेशनों को मालूम ही नहीं कि कंप्यूटर ओरिएंटेंड सिस्टम की जात क्या है. उन्हें पैसे और कंट्रोल के साथ मैनिपुलेशन चाहिए होता है. कंप्यूटर लौजिक पर काम करता है और धर्मेंद्र प्रधान जैसे लोग अब भी गंगा और गोबर वाले युग के हैं और उन की टीम भी वैसी ही है.
जहां मंत्री, मुख्यमंत्री, पार्षद, प्रधानमंत्री हर समस्या का हल मंदिरों, प्रवचनों, ध्यानों, मंत्रों, पूजाओं में ढूंढ़ते हैं, कंप्यूटर पर स्वास्तिक का टीका लगाते हैं, उस के वालपेपर पर हनुमान या शिव को लगाते हैं उन से लौजिकल एग्जामिनेशन सिस्टम बनवाना इंपौसिबल है. यही इस बार हुआ है.
जेनरेशन जी और जेनरेशन एल्फा आज अफैक्टेड है क्योंकि उसे भारत में 18वीं सैंचुरी के सिस्टम में काम करना पड़ रहा है जहां गंगा का पानी पैरोंपैरों सैकड़ों मील ला कर शिव पर चढ़ाने को न्यू एज कहा जाता है. Youth Challenges





