Hindi Story: सुबहसुबह परिदों के शोर से मेरी नींद टूटी थी लेकिन मैं ने फिर अपनी आंखें बंद कर ली थीं. सुबहसुबह की ताजगी को अपने भीतर उतार रही थी. आदमकद बड़े शीशों वाली खिड़कियों के परदे मेरे पति  प्रशांत ने हटा दिए थे जिस से शीशों से छन कर सुनहरी धूप पलंग तक पहुंच रही थी. खिड़की से बाहर आसमान को छूती हुई पहाडि़यां थीं. बीचोंबीच नैनीताल. नैनीताल के ठीक सामने वाले पहाड़ पर बना था रेलवे का हौलिडे होम. उस में 48 कमरे थे. मैं और मेरे पति ग्राउंडफ्लोर के रूम में थे. सैकंड फ्लोर पर हमारे पारिवारिक मित्र सपत्नीक रुके थे.

वर्षों से योजना बन रही थी. वर्ष 2023 में योजना पूर्ण हुई, मार्च महीने में. काठगोदाम से घुमावदार सर्पीली सड़कों से हम हौलिडे होम आ गए थे. टैक्सी चला रहा व्यक्ति 40 वर्ष का बातूनी था. वह रास्तेभर बोलता रहा था. मैं और हमारी पारिवारिक मित्र सुषमा पीछे की सीट पर थीं. हम उस से बातें करने के बजाय, बातें सुन रहे थे. हरियाली व पहाडि़यों के बीच गुजरती टैक्सी से बाहर देखने से ज्यादा सुंदर कुछ नहीं था. उसी में खोए थे. टूरिस्टों की भीड़ नैनीताल में वर्षभर रहती है, ऐसा टैक्सी ड्राइवर बता रहा था.

मार्च का मौसम सुहावना होता है लेकिन ठंडक रहती है. हम गरम कपड़े साथ लाए थे. ड्राइवर खूब बातें कर रहा था. बातोंबातों में उस ने बताया था, उस का नाम वाहिद था. वह अपनी पत्नी व 2 बच्चों के साथ एक पहाड़ी पर रहता था. बूढ़े पिता की देखभाल उस की पत्नी करती थी. ज्यादा बारिश में धंधा मंदा हो जाता है क्योंकि पहाडि़यों के होने से दुर्घटना होने की संभावना बनी रहती है. वह बता रहा था कि वह कल सुबह आ जाएगा, पूरा नैनीताल घुमा देगा. रेट भी उचित लेगा. ईमानदारी को वह अपना ईमान समझता है. ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाएगा, बेईमानी के पैसों की अपेक्षा वह ईमानदारी की सूखी रोटी पसंद करेगा. जिस समय उस ने हौलिडे होम छोड़ा था, रात के 9 बज रहे थे. इसलिए सुबह ही निकलने की सोची थी.

रात को चारों ओर पहाडि़यों से घिरा नैनीताल रोशनियों से नहाया हुआ था. नैनीताल के निवासी पहाडि़यों पर बने मकानों में बसे थे. मकानों में जगमगाती लाइटें पहाडि़यों पर सुंदरता बिखेर रही थीं. उस सुंदरता का वर्णन शब्द तो क्या करेंगे, सिर्फ महसूस करने की बात थी. मैं उस सुंदरता को आंखों में समेटे नींद की आगोश में चली गई थी.

‘‘क्या सोच रही हो इंदु. क्या पहाडि़यां ही देखती रहोगी? वाहिद आने वाला होगा,’’ प्रशांत ने मु?ो खयालों से बाहर किया.

मैं यह सोचती हुई उठ गई कि अब प्रशांत को कौन सम?ाए या बताए कि पहाडि़यों को देखते हुए कैसा लगता है. बादल जैसे पहाडि़यों पर ?ाक कर उन का चुंबन ले रहे हों या पहाडि़यों के गले लग रहे हों. प्रशांत को ये सब बातें नजर नहीं आतीं. मैं फटाफट वाशरूम में घुस गई. मैं ने गीजर औन कर दिया. जब तैयार हो कर हम कमरे से बाहर निकले तो देखा सुषमा इंतजार कर रही थी नाश्ते के लिए. वाहिद का भी फोन आ गया था वह घर से निकल चुका है हौलिडे होम के लिए.

हम ने कैंटीन मैनेजर को आलूपरांठे, पनीरपरांठे का और्डर दे दिया था. वाहिद जब तक पहुंचेगा तब तक हम नाश्ता कर लेंगे. हुआ भी वही. नाश्ते के बाद हम हौट कौफी का आनंद ले रहे थे कि वाहिद अपनी कार ले कर पहाड़ी पर आ गया.

जब कार पहाड़ी से नीचे उतरने लगती तो मैं आंखें बंद कर लेती डर के मारे. न जाने कितने वीडियो सोशल मीडिया पर देखे आंखों  के सामने घूम जाते. लगता, गाड़ी उलटी हो कर लुढ़क रही है. सीधी खड़ी पहाड़ी पर बनी सड़क से ढलान पर गाड़ी नीचे ले कर जाना मु?ो डरा देता. हम उस दिन लोकल घूमे. शिवालिक पर्वत श्रेणियां देखीं. आसपास की झीलें देखीं, नोकुचियाताल में नौकाविहार किया. रंगबिरंगी नौकाओं की कतारें बड़ी सुंदर थीं. रंगीन परदोंझीलरों में सजी नौकाओं को चलाने वाले हम जैसे टूरिस्टों को वहां का इतिहास बता रहे थे. भीमताल के मध्य बने टापू पर भी गए. खुर्पाताल, मल्लीताल में भी बड़ा मजा आया.

वापस हौलिडे होम तक आतेआते बहुत थक चुके थे. पहाडि़यों से घिरे उस शहर में रोशनियों सी जगमग लिए आंखों में कब सो गए, पता ही नहीं चला.

यहां मेरा उद्देश्य आप को नैनीताल की सैर करवाना नहीं है. नहीं तो, एकएक जगह का वर्णन करने में पन्ने रंगते चले जाएंगे.

नैनीताल की खूबसूरती के बीच मेरी? कलम ने एक कहानी को जन्म दिया. वह कहानी बताती है, चाहे कितनी भी परेशानियां आएं, दुखों के पहाड़ टूट जाएं व्यक्ति की फिक्र जिंदा रहती है, उस का जमीर जिंदा रहता है. हम 3 दिन नैनीताल में घूमते रहे.

तीसरे दिन की बात है, हम ने वाहिद को 4 दिनों के लिए बुक कर लिया था. रोज सुबह वाहिद आता, हमें खूबसूरती की सैर करवाने ले जाता. वाहिद ने यह भी बताया कि उस के 2 बच्चे हैं- एक लड़का और एक लड़की. लड़की का नाम नूर है और लड़के का नाम दानिश. पत्नी रेहाना बहुत मेहनती है, पहाडि़यों पर सागसब्जी उगा कर वह बेचती है घर के बाहर ही. इस में भी थोड़ीबहुत आमदनी हो जाती है. साथ ही, स्वेटर, मफलर, ऊनी कपड़े भी वह बुनती है क्योंकि नैनीताल में वर्षभर ठंडक रहती है. उन से भी उसे कुछ पैसे मिल जाते हैं.

हम जब घूमने के दौरान लंचडिनर के लिए गाड़ी रुकवाते थे तो वाहिद को भी लंचडिनर के लिए बोलते थे लेकिन वह स्पष्ट मना कर देता था, बोलता था, ‘यह मेरा रोज का धंधा है टूरिस्टों को घुमाना, ऐसे ही बाहर का खाना खाता रहा तो बीमार पड़ जाऊंगा. टिफिन ?मैं साथ ले कर चलता हूं.’ वह हमें टिफिन दिखाता.

तीनों दिन उस ने हमारे औफर को मना कर दिया था.

तीसरे दिन वह हमें ‘टिफिन टौप’ ले गया. इसे अंगरेजों का रैस्ट हाउस कह लें या पिकनिक स्पौट, बेहद खूबसूरत जगह थी जहां घोड़े से ही जाया जा सकता था. इसलिए वाहिद ने कहा वह नहीं जा पाएगा, नीचे हम लोगों का इतंजार करेगा. उस ने बताया, ‘मेरा एक फ्रैंड है, वह आसपास होगा या किसी टूरिस्ट को ले कर ऊपर गया होगा. उस को फोन कर देता हूं, वह घोड़ों की व्यवस्था कर देगा.’ तभी एक व्यक्ति ऊपर पहाड़ की चोटी से नीचे आता दिखा.

लगभग 50 वर्षीय व्यक्ति कदकाठी से मजबूत था. शारिरिक श्रम वाले व्यक्ति यों भी अच्छे स्वास्थ्य के धनी होते हैं.

‘‘ओ भोला, इधर आओ,’’ वाहिद ने उसे आवाज दी. उस का नाम भोला था या चलन में शायद उस का यही नाम था.

‘‘जी, वाहिद भाई,’’ भोला घोड़े की रास पकड़ेपकड़े नजदीक आ गया.

तीन घोड़ों का इंतजाम और करो,

4 टूरिस्ट हैं,’’ वाहिद ने उस से कहा.

‘‘जी, वाहिद भाई,’’ कहते हुए उस ने मोबाइल लगाया. जब तक वह मोबाइल पर बात करता रहा, मैं सोचती रही यह भाई वाला गणित सम?ा नहीं आता. इन के नाम के आगे भाई लगा देते हैं.

‘‘थोड़ी देर इतंजार करना होगा,’’ भोला ने मोबाइल बंद करते हुए कहा, ‘‘सभी घोड़े गए हुए हैं.’’ तभी भोला का घोड़ा हिनहिनाया.

‘‘क्या हुआ सुल्तान?’’ भोला ने  घोड़े को पुचकारा.

‘‘वाह, क्या बात है,’’ मैं बोली.

‘‘जी मेम, मेम, यही मेरी रोजीरोटी है, इसी से घर चलता है,’’ भोला बोला.

‘‘ऐसा कोई महीना जब टूरिस्ट न आते हों?’’ मैं ने पूछा.

‘‘बहुत बारिश के समय,’’ भोला ने बताया, फिर वह नैनीताल की खूबसूरती के बारे में बताने लगा.

‘‘आप ही देख लो, अंगरेजों के बसाए शहर के चारों ओर उन की ईमानदारी ?ालक रही है,’’ भोला घोड़े को हथेली पर चने रख कर खिलातेखिलाते बोला.

‘‘मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘‘उन के समय की इमारतों की मजबूती देख लो, आप. और अभी वर्तमान के कुछ सालों की जांच कर लो,’’ भोला बोला, ‘‘आएदिन पुल टूट रहे हैं, सैकड़ों लोगों की मौत हो रही है. कितने भ्रष्टाचार में डूबे हैं हमारे लोग.’’

‘‘बिलकुल ठीक,’’ प्रशांत और उन के मित्र शैलेंद्रजी ने हां में हां मिलाई.

सभी बात करते हुए इंतजार करते रहे. तभी कुछ घोड़े आते दिखे.

‘‘मेम साब, आप लोगों से एक बात बोलनी थी,’’ भोला हाथ जोड़ कर बोला.

‘‘बोलो भोला, क्या बात है?’’ मैं ने कहा.

‘‘आप लोग घोड़े वालों को टिप भी देना किराए के अलावा,’’ भोला बोला.

‘‘क्यों भाई?’’ प्रशांत का सवाल था.

‘‘साब, गरीब लोग होते हैं. किराए के अलावा टिप मिल जाती है, तो ये खुश हो जाते हैं,’’ उस ने स्पष्ट किया.

‘‘ठीक है,’’ सुषमा बोली.

‘‘अब चलें,’’ घोड़े नजदीक आ गए थे.

मैं भोला के घोड़े पर बैठी थी. मैं भोला से बातें भी करना चाहती थी कि जिस से कुछ नया मिले. हर व्यक्ति की सोच और उस की मानसिकता अलगअलग होती है. उसे सुनने में अच्छा लगता है. हम चारों घोड़ों पर अंगरेजों के बनाए पिकनिक स्पौट पर चल दिए जहां वे अपनी थकान उतारने को आते थे.

मैं सोच रही थी वहां इमारतों को देख कर भोला गलत नहीं बोल रहा था. सच्चाई थी उस की बातों में. अंगरेज कलाप्रेमी थे. पहाडि़यों के बीच काटी गई सड़कें सुंदर तो थीं, साथ ही, उन के द्वारा किए गए निर्माण मजबूत और कला के अद्भुत नमूने थे.

यहां की पब्लिक लाइब्रेरी ब्रिटिशकालीन है- दुर्गा लाल शाह म्युनिसिपल पब्लिक लाइब्रेरी. माल रोड पर स्थित मेथाडिस्ट चर्च देश नहीं, पूरी एशिया का पहला मेथाडिस्ट चर्च है. यह सीक्रेट टिकट बिल्ंिडग और गोथिक शैली पर आधारित है. आज भी इस की मजबूती और इस का निर्माण देखने लायक है. बहुत से मिशनरी स्कूलों का निर्माण भी अंगरेजों द्वारा करवाया गया जो नैनीताल के प्रसिद्ध स्कूल हैं.

शेरवुड कालेज में तो महानायक अमिताभ बच्चन, कबीर बेदी, मेजर सोमनाथ शर्मा जैसी जानीमानी हस्तियों ने अपनी शिक्षा पूरी की है.

अंगरेज प्रकृतिप्रेमी और कलाप्रेमी थे. यह नैनीताल में किए गए उन के निर्माणकार्य बताते हैं. टिफिन टौप वाकई कमाल का है. टिफिन टौप सेना के अधिकारी कर्नल जेपी केलेट ने अपनी पत्नी डोरोथी की याद में बनवाया था. डोरोथी पेंटर थी. वहां बैठ कर खूबसूरत पेंटिंग बनाया करती थी.

टिफिन टौप से जब हम नीचे उतरने लगे तो प्रशांत ने किराए के अलावा 100-100 रुपए की टिप तीनों घोड़े वालों को दी. तीनों ने खुश हो कर सैल्यूट ठोका. शुक्रिया अदा करते हुए चले गए लेकिन भोला ने टिप नहीं ली.

मैं ने कहा, ‘‘भोला, तुम टिप क्यों नहीं ले रहे हो जबकि तुम ने कहा था टिप देने को?’’

‘‘नहीं मैडम, किराया तो मैं ले चुका हूं. मैं टिप नहीं लेता. किराया ही बहुत है.’’

‘‘दूसरों के लिए क्यों कहा तुम ने?’’ प्रशांत ने सवाल किया.

‘‘वे ज्यादा खुश हो जाते हैं टिप से,’’ भोला बोला.

‘‘तुम खुश नहीं होते?’’ सुषमा ने सवाल किया.

‘‘मुझे, मुझे टिप से खुशी नहीं मिलती. मुझे किराए से ही खुशी मिल जाती है,’’ भोला बोला.

तभी एक और टूरिस्ट आ गया था. भोला आगे बढ़ गया था.

वाहिद हम को देख रहा था बड़ी देर से. भोला के जाते ही बोला, ‘‘चलें साब, होलिडे होम पहुंचतेपहुंचते अंधेरा होने लगेगा.’’

‘‘ठीक है, वाहिद, चलो.’’

हम चारों गाड़ी में बैठ गए और गाड़ी सर्पीली सड़कों पर फिसलती हुई पहाडि़यों के बीच से नीचे उतरने लगी.

कार की खुली खिड़कियों से आती ठंडीठंडी हवाओं से आंखें बोलि होने लगी थीं लेकिन दिल अतृप्त था. मुझे पता था. कल सुबह हमें नैनीताल से निकलना होगा.

‘‘मैडम, कैसा लगा टिफिन टौप?’’

‘‘बहुत खूबसूरत,’’ मैं ने, बस, इतना ही कहा. मु?ो पता था, कल वाहिद को ही हमें काठगोदाम छोड़ना है.

‘‘कल सुबह कितने बजे आना है, शाम को घर जल्दी जाऊंगा आप लोगों को काठगोदाम छोड़ कर.’’

‘‘क्यों वाहिद?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘कल रेहाना का बर्थडे है, इसलिए कल की शाम मैं घर पर रहना चाहता हूं. हमेशा ही लेट पहुंचता हूं काम की वजह से.’’

‘‘अरे वाह, अच्छी बात है,’’ मैं ने खुश हो कर कहा, ‘‘हमारी ओर से भी ढेर सारी बधाइयां.’’

‘‘शुक्रिया मैडमजी,’’ वाहिद सिर ?ाका कर बोला.

मैं ने नोट किया था, वाहिद उर्दू, हिंदी, इंग्लिश के शब्द अच्छी तरह बोल रहा था.

‘‘पढ़े कहां से हो, वाहिद?’’ शैलेंद्रजी ने पूछा.

‘‘कक्षा 8 तक पढ़ा हूं,’’ वाहिद थोड़ा मुसकराते हुए बोला, फिर आगे बोला, ‘‘जीवन भी स्कूल है. सच्ची पढ़ाई तो जीवन के अनुभवों से हो जाती है. कालेजों में बस डिग्री मिलती है. उस डिग्री को ले कर न जाने कितने लोग बेरोजगार ही घूम रहे हैं. इसलिए हम कम पढ़ेलिखे लोग अच्छे हैं.’’

वाहिद ने एक मोड़ पर गाड़ी

को मोड़ा.

‘‘करेक्ट वाहिद,’’ सुषमा बोली.

वाहिद अब हौलिडे होम वाली सड़क पर था, सीधी चढ़ाई.

कुछ ही देर में हम हौलिडे होम के सामने थे.

जब हम उतरे तो मैं ने 1 हजार रुपए उसे दिए और कहा, ‘‘वाहिद, इन रुपयों से रेहाना के लिए कोई गिफ्ट ले लेना.’’

वाहिद ने तुरंत हाथ जोड़ कर वे रुपए वापस कर दिए, बोला, ‘‘मेमसाब, आप लोगों की दुआएं ही बहुत हैं.

‘‘वाहिद, ले लो, हमारा भी मन रखो,’’ सुषमा बोली.

‘‘अगर देना ही है आप को तो खुद चल कर दीजिए उस के हाथों में. थैंक्यू मैडमजी, अब मैं चलता हूं. कल सुबह कितने बजे आना है?’’ वाहिद बोला.

हम लोगों की ट्रेन काठगोदाम से शाम 5.30 बजे की थी. सारा दिन हमारे पास था, इसलिए सुबह लगभग 10.30 बजे का बोल दिया गया.

‘‘जी साब,’’ कहता हुआ वाहिद गाड़ी स्टार्ट करने लगा.

वाहिद की कार ओ?ाल हो गई, चढ़ाई से उतरते ही मैं सोचती रही कितना खुद्दार है वाहिद.

रात में डिनर हम ने हौलिडे होम की कैंटीन से मंगवाया, छोलेभटूरे और गुलाबजामुन. डिनर के दौरान ही हम सब ने तय किया कि कल सुबह यहां से निकलते समय वाहिद के घर होते हुए चलेंगे और रास्ते में कोई गिफ्ट और केक ले लेंगे जिस से रेहाना खुश हो जाए, वहीं वाहिद का आत्मसम्मान भी बचा रहे.

नैनीताल पहाडि़यों के मध्य रहस्यमयी लग रही थी. चारों ओर पहाडि़यां रोशनियों से नहाई हुई थीं. इतनी सुंदरता बिखरी थी कि शब्द ही नहीं उन का वर्णन करने को, किसी सुंदर स्वप्न सा लग रहा था नैनीताल.

हम लोगों के बिस्तर बड़ीबड़ी खिड़कियों के नजदीक थे जिस से पहाडि़यों की रोशनी दिख रही थी. उन पहाड़ों की रोशनी को देखतेदेखते हम नींद में नैनीताल की पहाडि़यों में घूमते रहे. सुबहसुबह सुनहरी किरणें शीशों से टकरा कर भीतर आने लगीं. मन कर रहा था कि कुछ देर यों ही बिस्तर पर लेट जाएं क्योंकि कमरे में पंखे और एसी नहीं लगे थे. बड़े और भारी कंबल थे, इस का कारण वर्षभर नैनीताल का ठंडा रहना है.

हम ने चाय का और्डर दे दिया था. चाय आने तक कंबल में रहते हैं, सोचते हुए मैं ने कंबल से खुद को पूरा लपेट लिया. चाय आने पर कंबल को लपेटे ही चाय का आनंद लिया. इस दौरान तय हुआ कि नाश्ता बाहर करेंगे. चाय पीतेपीते ही वाहिद का फोन आ गया था. वह निकल रहा है घर से, 10.30 बजे तक पहुंच जाएगा.

उस के आने से पहले हम सब तैयार हो चुके थे.

जब वह आया तो हम ने उसे सब से पहले किसी अच्छे रैस्टोरैंट में नाश्ते के लिए कहा. उस ने कहा, ‘‘?ाल के सामने कुछ बढि़या रैस्टोरैंट हैं जहां साउथ इंडियन डिश मिलती हैं. हम वहीं गए. वड़ासांभर, पनीरडोसा खाया, फिर एक बेकरी से सुंदर केक लिया. रास्ते में एक बढि़या सा कार्डिगन भी लिया.

वाहिद कार में इंतजार कर रहा था, बोला, ‘‘अब चलें काठगोदाम के लिए, वहां भी आप को घूमना है.’’

‘‘वहां भी घूमेंगे, पहले तुम्हारे घर चलते हैं,’’ शैलेंद्रजी बोले.

‘‘क्या?’’ वाहिद बोला.

‘‘कल रेहाना का जन्मदिन है, तुम ने कल बोला था कि हमें काठगोदाम छोड़ कर तुम जल्दी ही आना चाहते हो,’’ शैलेंद्रजी ने कहा.

‘‘हां साहब जी,’’ वह बोला, ‘‘लेकिन आप लेट हो जाएंगे और कहां गरीबों के घर देखेंगे.’’

‘‘अब चलो, सोचो मत,’’ मैं ने कहा.

‘‘ठीक है, साबजी,’’ उस ने गाड़ी आगे बढ़ा दी.

आधे घंटे बाद हम सब वाहिद के घर पर थे.

साधारण से 2 कमरे थे. पहले वाले कमरे में एक पलंग और एक पुराना सोफा था, टीवी भी वहीं था. पलंग पर बेहद कमजोर एक वृद्ध लेटे हुए थे. ‘‘ये मेरे अब्बा हैं,’’ वाहिद बोला.

‘‘नमस्ते,’’ हम ने कहा.

‘‘नमस्ते, नमस्ते,’’ बुजुर्ग ने उठने की कोशिश की.

‘‘अरे नहीं, आप लेटे रहिए.’’ वे वापस लेट गए.

इतने में 2 बच्चे दौड़तेदौड़ते घर में घुसे. बेटी बड़ी सुंदर थी, बेटा भी प्यारा था. बच्चों ने आते ही नमस्ते की. लड़की लगभग 10 वर्ष और लड़का 12 वर्ष का था. वाहिद ने कहा, ‘‘अपनी अम्मी से कहो, शरबत और नाश्ता ले आए, मेहमान आए हैं.’’

‘‘अरे, इस की कोई जरूरत नहीं,’’ प्रशांत बोले.

‘‘नहीं साब, आप मेहमान हैं हमारे,’’ वाहिद ने कहा.

लगभग 15 मिनट बाद बेटी नूर अपनी अम्मी को ले कर बाहर आई. हम चौंक से गए. पत्नी रेहाना व्हीलचेयर पर थी और उसे चलाती हुई बाहर के कमरे में आ गई. उस ने हम से नमस्ते की. चेयर को कमरे के एक तरफ कोने में कर लिया.

कुछ मिनट हमें संभलने में लगे, फिर हम सब ने उसे हैप्पी बर्थडे कहा. ‘‘रेहाना जन्मदिन बहुतबहुत मुबारक हो.’’ उस के हाथों में केक दिया और कार्डिगन वाला पैकेट भी.

वह मुसकराते हुए ‘शुक्रियाशुक्रिया’ बोलने लगी. उस का गोरा चेहरा खुशी से गुलाबी हो गया.

वाहिद की आंखों में आंसू भर आए थे.

‘‘क्या हुआ?’’ सुषमा बोली.

‘‘मैडम ये खुशी के आंसू हैं, आ जाते हैं,’’ वाहिद बोला.

‘‘रेहाना के पैर एक ऐक्सिडैंट के बाद ऐसे हुए हैं. जब बच्चे बहुत छोटे थे 2-3 साल के, उस ऐक्सिडैंट के बाद पैर ठीक न हो पाए. आप लोगों ने मेरे जैसे छोटे आदमी की बात रखी, घर आ कर मुबारकबाद दी, यह मेरे लिए अनमोल तोहफा है,’’ वाहिद ने कहा.

‘‘नहीं वाहिद, बड़े तो तुम जैसे लोग होते हैं जो काम का मेहनताना ही लेते हैं, किराया ही लेते हैं, टिप, बख्शीश नहीं लेते. यही खुद्दारी है, आत्मसम्मान है. वही व्यक्ति बड़ा है,’’ मैं ने कहा.

हम रेहाना के हाथों की अदरक-मसाले वाली चाय, वैजिटेबल पकौड़ों का आनंद ले कर वाहिद के साथ काठगोदाम के लिए निकल गए.

उस दिन वाकई मैं ने एक बड़े व्यक्ति से मुलाकात की थी जो मेरे लिए बहुत सुंदर याद बन गई है. मु?ो रेहाना की आंखों में चमकती खुशी याद आती रही. Hindi Story

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...